Saturday, 7 November 2020

सद्गुरू बाबा -

सद्गुरू जैसे बाबाओं पर जैसे ही आप सवाल खड़ा करते हैं, स्वत: ही आप गलत नकारात्मक हो जाते हैं। इन जैसे बाबाओं ने ऐसा आभामण्डल बनाया होता है कि आप इनकी कोई गलती पकड़ ही नहीं सकते, ये बहुत ही ज्यादा स्मार्ट होते हैं। विद्वता के नाम पर इनके पास सिर्फ लच्छेदार तर्क होते हैं, उन्हीं तर्कों को तमाम तरह की उलझनों में जकड़ा हुआ भारतीय समाज विद्वता के डोस के रूप में ग्रहण करता जाता है और उनके मोहपाश में बँधता चला जाता है। सद्गुरू जैसे बाबा इसलिए भी बाकी फर्जी बाबाओं से खतरनाक हैं क्योंकि ये कोई गलती नहीं करते हैं, आपने कभी नहीं सुना होगा कि सद्गुरू से चूक हुई, गलत बयान दिया, बेबाक राय रखी, कुछ नहीं, कुछ भी ऐसा सुनने नहीं मिलेगा। असल में इनका चरित्र दीमक की तरह होता है, ये समाज को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से काट काट के पीछे धकेल रहे होते हैं और समाज को पता भी नहीं चलने देते हैं। इनकी बातें इनके समाधान पानी के बुलबुले की तरह होता है और लोग हैं कि उस बुलबुले को ही बहता हुआ पानी समझ लेते हैं।

Friday, 6 November 2020

हत्या या आत्महत्या?

एक हमारे मित्र रहे। उम्र में बड़े थे, शादी हो चुकी थी, दो छोटे बच्चे (एक लड़का एक लड़की) भी थे। लेकिन रिश्तों के बीच खटास कुछ ऐसी आई कि पत्नी झगड़ के अपने मायके चली गई। साल भर का समय बीत गया, लड़का घर में अकेला रहा। लड़के की माता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी तो अब घर में सिर्फ दो ही लोग रह गये थे, एक लड़का और उसके पिता, और दोनों में बनती भी नहीं थी, दोनों में बातें भी नहीं होती थी, पिता ने कभी लड़की और उसके घर वालों से बात कर मामला सुलझाकर बहू को लाने का प्रयास भी नहीं किया। लड़का आए दिन परेशान रहने लगा, आए दिन पत्नी से वापस लौटने की मिन्नतें करने लगा, पूरे लाॅकडाउन भर हमारे घर आता रहा, वह बहुत अकेला पड़ चुका था, इस उम्मीद से मेरे पिता के पास आता कि वे कम से कम एक अभिभावक की तरह उसकी पत्नी को वापस घर लौटाने में कुछ मदद करें, पिछले कुछ महीनों में मेरे पिताजी ही उसके लिए पिता की तरह हो गये थे, एक मित्र की तरह उसको सबल देते रहे। लेकिन कल सुबह उस लड़के ने सुसाइड कर लिया। उसकी लाश देखने के लिए बच्चों समेत उस लड़की का परिवार देखने आ गया। लड़के के पिता ने बेटे की मौत पर यह तक कह दिया कि जो होना था हो गया, छोड़ो हटाओ। जब से घरवालों ने यह खबर दी है मुझे पता नहीं क्यों बहुत गुस्सा आ रहा है - इस मूढ़ समाज पर, जो ऐसे अपने ही समाज के लोगों को हाशिए में मरने के लिए छोड़ देता है, और ये एक उदाहरण नहीं है। खैर, मेरी नजर में तो समाज परिवार पहले ही उन्हें किश्तों में मार ही रहा था, वो बात अलग है कि उन्होंने सुसाइड करके समाज का सारा आरोप खुद पर ले लिया।

Facebook Feeds - October 2020

ड्रीम11 से लाख गुना बेहतर ताश वाला जुआ है, उसमें समय की खपत कम होती है।

मिर्जापुर-2 में ईशा तलवार का ड्रेसिंग सेंस शानदार है, इतनी सुंदर साड़ियाँ शायद ही पिछले कुछ सालों में किसी फिल्म या वेब सीरीज में दिखी हो।

वांडरलस्टियों, गोप्रो एक्शन कैमरा लटकाकर डामर और सीसी रोड की वीडियो बनाना बंद करो यार।

ग्रेजुएशन खत्म होते तक सुसाइड वाले, आत्मदाह वाले, सल्फाश पोटाश खाने वाले, मच्छर मारने वाला लिक्विड पीकर जाने देने की कोशिश करने वाले, इस तरह के दर्जनों केस देखे, अधिकतर मामले ऐसे परिवारों से थे जो संपन्न थे, प्रतिष्ठित थे। कुल मिलाकर बात ये कि सारी सामाजिक समस्याओं का मूल हमारा परिवार होता है। जब तक परिवार में ये समस्याएँ रहेंगी तब तक मानसिक रोगियों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती रहेगी और सद्गुरू जैसे बाबाओं की दुकान चलती रहेगी।

गाड़ी खरीदने के बाद सबसे ज्यादा पूजा भारत में, फिर भी सड़क दुर्घटनाओं और उससे हो रही मृत्यु के मामलों में हम पूरी दुनिया में नंबर वन है।

जिन समाजों में "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" जैसे ढकोसले नहीं होते, ऐसे समाजों में ही स्त्रियाँ सबसे अधिक सम्मानित और सुरक्षित हैं।

Roadies के इंटरव्यू का स्तर सिविल सेवा परीक्षाओं के इंटरव्यू से कहीं बेहतर होता है।

KBC जैसे शो अश्लीलता के मामले में Big Boss से भी कहीं आगे की चीज है।

रिया के लिए मारो मारो चिल्लाने वाली सारी आवाजें फिलहाल रेपिस्टों की तरफ शिफ्ट हो गई है।

Facebook Feeds - September 2020

आरोग्य सेतु एप्प का क्या हुआ? कोई खबर?

जो कोरोना पिछले छह महीनों से नहीं रूका,वो एक हफ्ते के लाॅकडाउन से क्या रूकेगा#Raipur

हमारे यहाँ माता-पिता इतने महान हुआ करते हैं कि जब वे अपने बच्चों की पिटाई करते हैं तो उस पिटाई के बीच कहीं बच्चा पलटवार ना कर दे इसलिए सुरक्षा के लिए कहानी ऐसी गढ़ दी गई, संस्कार ऐसे ठूंस दिए गए कि बच्चे मार तो खा सकते हैं लेकिन माता-पिता पर हाथ नहीं उठा सकते और न ही उन्हें रोक सकते हैं। अगर किसी बच्चे ने गलती से माता-पिता पर हाथ उठा दिया या उन्हें मारने से रोकने‌ की कोशिश की तो पाप लगता है, और यही पाप आगे चलकर बुढ़ापे में हाथ कांपना, लकवा मारना आदि बीमारियों के रूप में परिलक्षित होता है, इस बात को अगर सच मान लिया जाए तो फिर यही लाॅजिक उन माता-पिता पर भी लागू हो जो आजीवन अपने बच्चों के ऊपर मानसिक शारीरिक हिंसा करते हैं।

लोगों का पूरा ध्यान खाली बन्दर (डाॅक्टर) पर है।असली मदारी (नेता,अधिकारी) मजे में हैं।


सचमुच लोकतंत्र होता, सचमुच सरकार संवेदनशील होती तो जनगणना की तर्ज पर अभी तक घर-घर जाकर टेस्टिंग का काम शुरू हो जाना चाहिए था। 

यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें लोक है ही नहीं, अगर है भी तो उसे हर छोटी सी बात में लाइन में लगवा दिया जाता है। हमें अपनी जान भी बचानी है, लाइन लगाकर भीड़ भी हम बढ़ाएं और दूसरों की जान भी खतरे में डालें। छल क्यों नहीं लग जाता ऐसे लोकतंत्र को।

एक ओवरहाइप्ड अभिनेत्री के आफिस ध्वस्त होने की खबर का राष्ट्रीय मुद्दा बन जाना और उस पर चर्चा करना उतना ही वीभत्स है जितना वो हथिनी के मरने की खबर या अमिताभ के अस्पताल का फुटेज या फिर सुशांत वाला मामला। हर नई खबर जो कि वास्तव में खबर ही नहीं, पहले से कहीं अधिक हाई वोल्टेज ड्रामे के साथ पेश की जाती है ताकि आमजन उसी के ईर्द-गिर्द भुलभुलैया में चक्कर लगाता रहे और असल मुद्दे पीछे छूटते रहें।

मैं अगर उस अभिनेत्री के जगह मैं होता तो क्या पता बिना दोषसिध्दि के इतना अपमान झेलकर कहीं केरोसिन डाल के खुद को जला न लेता। मीडिया चैनल आदि को हटाकर देखा जाए तो सबसे तकलीफदेह इन सबमें यह है कि महिलाएँ ही सबसे अधिक उस लड़की के‌ लिए हिंसा दिखा रही हैं, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम कितने ह्रदयहीन, कितने असंवेदनशील समाज के रूप में आगे बढ़ते जा रहे हैं।

रिया को जेल भेजना स्वागत योग्य कदम है, अभी के समय में उनके लिए सबसे महफूज जगह वही है।

माना जाता है कि जिन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार शोषण झेला हो, उनके डीएनए में गुलामी शोषण का तत्व रह जाता है, ठीक उसी तरह प्रिविलेज क्लास के पास भी उस प्रिविलेज से आई भाषा, कला, वाणी, वाकपटुता, भाषायी चातुर्य, रटंत विद्या, राज-नीति आदि आदि विरासत के रूप में ही डीएनए से मिलती रहती है।

काढ़ा, एंटीबायोटिक आदि से बचें, कोरोना सिर्फ और सिर्फ इच्छाशक्ति से ही मरेगा।

कल से लोग कह रहे कि जीडीपी फलां परसेंट नीचे चला गया, इस बात से घोर असहमति है, मुझे तो उल्टे ग्रोथ दिखाई देता है। जिनको खरीददारी करनी है, कर ही रहे हैं, रूपए का प्रवाह बना हुआ है, लोग बाइक, कार, घर, सोना सब जमकर खरीद रहे, पिज्जा बर्गर दारू सब ऑनलाइन मंगवा रहे तो कैसे जीडीपी नीचे जाएगा भाई। ये सब वर्तमान सरकार को नीचा दिखाने की साजिश है। अब लोग तर्क देंगे कि मजदूर, किसानों, निम्न वर्ग आदि की हालत बद से बदतर हो चुकी, कितनों का धंधा बैठ गया, कितनों की नौकरी छीन गई, तो भाई आपको पता होना चाहिए कि ये सब जीडीपी में काउंट नहीं होता है।

Facebook feeds - August 2020

सड़क 2 फिल्म का ट्रेलर वीडियो डिसलाइक करने में और मन की बात का वीडियो डिसलाइक में एक समानता है वो यह कि दोनों घटनाएँ आजाद भारत में एक विशिष्ट तरह की क्रांति लेकर आई हैं, अब वनटच से घर बैठे सब कुछ हो जाएगा। जैसे उस फिल्म की वीडियो डिसलाइक करने से नेपोटिज्म खत्म हो गया, ठीक वैसे ही मन की बात की वीडियो डिसलाइक करने से रातों रात ही राष्ट्रीय चेतना अनुप्राणित हो गई, युवाशक्ति जागृत हो गई।

दस बजे तक जब होटल खुल सकते हैं तो परीक्षा भी हो सकती है और बस ट्रेन भी चल सकती है।

नासा से बहुत पहले हमारे दादाओं ने UFO देखा हुआ था, बस वे उसे सफेद भूत कहा करते थे।

पत्थरों को हटाकर चूल्हा बना रखा है, शहर में थोड़ा सा गाँव बचा रखा है।

एंटी डिप्रेशन कैंपेन चलाने वाला समाज ही आज उसकी जीवित प्रेमिका को मारने पर उतारू है।

बच्चा भ्रष्टाचार वहीं से सीख जाता है जब उसे होमवर्क के एवज में चाॅकलेट दिया जाता है।

पूरा देश सरकारी कंट्रोल में है, एक फेसबुक के कंट्रोल कर देने पर कैसा आश्चर्य....!

हम भारतीयों की पाचनशक्ति कमजोर होने की एक बड़ी वजह बार-बार थूकना और कुल्ला करना है।

कभी-कभी लगता है जैसे भारत युवाओं का देश बस सरकारी आँकड़ों में है। क्योंकि जैसी फुर्ती यूरोपियन और अन्य कुछ विकसित देशों के 40 पार के उम्र के लोगों की होती है, उतनी फुर्ती वाला जीवन भारत के 25 के उम्र के युवा भी न जीते होंगे। जैसे भारत में लोकतंत्र बस कागज में दिखाने के लिए है, ठीक वैसे ही युवाओं का देश भी बस संख्याबल दिखाने तक सीमित है।

बादशाह और प्रतीक कुहड़ सरीखे गायकों को सुनने वाले को ही Bandish Bandits जैसी फैंसी वेब सीरीज में शास्त्रीय संगीत नजर आ सकता है‌।

जब हम मुस्कुराते हैं, तो हमारी आँखें भी मुस्कुराती हैं।#मास्कमय_जीवन

न तुम्हें 4 करोड़ की स्काॅलरशिप मिलती, न तुम्हारी मौत पर इतना हंगामा होता।

सिविल सेवकों को हमेशा ये देश समाज के लिए ही कुछ करना क्यों होता है?

Facebook Feeds - July 2020

भारत में 700+ जिले, हर जिले में थोड़ा-थोड़ा कोरोना, डेटा मेनीपुलेशन भी गजब चीज है।

कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान जो बच्चन साब को चोट लगी थी,आजकल उसे ClickBait कहते हैं।

माता-पिता अपनी हिंसा बच्चों को हस्तांतरित करने का एक मौका नहीं छोड़ते हैं, खुद जितने मशीनी होते हैं अपने बच्चों को भी वैसा ही बना डालते हैं, इसमें आधार बनता है परिवार, समाज, देश, संस्कृति आदि। इन्हीं टूल्स को काम में लगाकर बच्चे की बुध्दि को संकुचित करने का काम किया जाता है। और मजे की बात ये कि उन्हें अपनी इस गलती का इंच मात्र भी आभास नहीं हो पाता है, उन्हें लगता है बच्चा अगर उनकी तरह रोबोट नहीं बन पाया तो उसका जीवन नर्क हो जाएगा। उन्हें लगता है कि उन्होंने जिस ढर्रे पर पूरा जीवन जिया है, जीवन जीना उसे ही कहते हैं, उसके अलावा भी कोई जीवन होता है, इसकी न तो उन्हें समझ होती है, न ही ऐसी दृष्टि होती है, इसलिए ऐसी कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। उन्हें लगता है वे अग्रगामी हैं, लेकिन असल में होते वे पश्चगामी ही हैं। ऐसी मानसिकता ही समाज को, देश को पीछे ढकेलती है। शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य, सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार यह सब बहुत बाद में आता है, इन सारी समस्याओं की जड़ हमारा अपना परिवार होता है, सब कुछ इसी का विस्तार तो है, हम जब तक इस सच्चाई को नहीं स्वीकारेंगे, तब तक उल्टी दिशा में गंगा बहती रहेगी।

हिन्दी पट्टी के व्यक्ति के मस्तिष्क में एक "राजनीतिक विश्लेषक" Inbuilt होता है।

विद्रूपताओं के दौर में जब-जब पहाड़ों की ओर देखा, इन पहाड़ों ने यही सिखाया कि दुनिया में एक रूपए भी बिना जी तोड़ मेहनत के या फिर बिना भ्रष्टाचार के हासिल नहीं हो सकता है।

जिस देश की महिलाओं को अंत्येष्टि में रोने के लिए प्याज और स्प्रे का सहारा लेना पड़ता हो उस देश के बच्चों का भविष्य कैसा होगा।

पहाड़ में पहाड़ जैसा मजबूत कुछ होता है तो वह है पूर्वजों की बनाई पगडंडियाँ।

हमारे यहाँ माता-पिता अपने बच्चों की तनख्वाह कुछ हजार रूपए बढ़ाकर ही बताते हैं।

जैसे हमारे यहाँ धार्मिक जड़ताएँ हैं, ठीक वैसी ही जड़ता खान-पान को लेकर भी है। सुधार के नाम पर हम ऊपरी काम ही करते हैं, आमूलचूल प्रयोगों से हमारी रसोई आज भी अछूती है।

NCERT ने धर्मनिरपेक्षता, योजना आयोग, पंचवर्षीय योजना, लोकतांत्रिक अधिकार, फूड सिक्योरिटी, नागरिकता, संघवाद, राष्ट्रवाद, भारत के आर्थिक विकास का बदलता स्वरूप, पड़ोसी देशों से संबंध, लिंग, जाति, धर्म, लोकतंत्र की चुनौतियाँ इन सब टाॅपिक को छात्रों के सिलेबस का बोझ कम‌ करने के मकसद से हटा दिया है।

एक बात समझ नहीं आ रही कि लोग आखिर इस अभूतपूर्व फैसले का विरोध क्यों कर रहे हैं?

सामाजिक पिछड़ेपन का बीजारोपण, संग्रहण एवं विस्तारण पिछड़े समाजों द्वारा संभव ही नहीं।

भारत में अनगिनत प्रेम कहानियों की मौत सरकारी नौकरी न मिलने की वजह से हो जाती है।

गाँव में काम करने के शौकीन युवाओं को शाम ढलते तक शहर लौटना ही होता है।

मैं एक दि‌न अपनी सारी RTI, PIL अपने साथ ले जाऊंगा, जो इन कवियों पर मुझे लगानी थी।

कुछ युवा घर की जिम्मेदारियों का वहन इसलिए भी करते हैं ताकि आगे चलकर अपनी बदमाशियों को जस्टिफाई कर सकें।


My thoughts on Gopro Action Cam -

सबसे पहली बात - गो प्रो एक्शन कैमरा है, एक्शन कैमरा है, एक्शन कैमरा है। गोप्रो का कैमरा जब लाँच होता है तो उसके साथ जो विज्ञापन वाली वीडियो आती है उसमें कोई पैराग्लाडिंग कर होता है, कोई स्केटिंग कर रहा होता है, कोई ऊंचाई से छलांग रहा होता है, स्कूबा डाइविंग, सर्फिंग आदि आदि। यानि इन सब फुटेज के माध्यम से अच्छे से समझा दिया जाता है कि एक्शन कैमरे किस काम में लाए जाते हैं, और दूसरे देशों के लोग एक्शन कैमरे का सदुपयोग भी करते हैं, हमेशा उससे कुछ अनूठा काम कर जाते हैं, जो शायद हमारे बस का भी नहीं। इसलिए भी हम भारतीय गोप्रो जैसे कैमरों की खूब फजीहत करते हैं, उससे रोड की वीडियो बनाते हैं, अरे भाई रोड की वीडियो बनाने में कौन सी क्रिएटिविटी होती है यार, मुझे तो आजतक समझ नहीं आया, वैसे ये काम कुछ हद तक दूसरे देशों के लोग भी करते हैं लेकिन वहाँ उनके इस काम‌ में सचमुच एक्शन दिखता है, मेहनत दिखती है, क्रिएटिविटी दिखती है। 

मैंने अपने सोलो राइड में एक्शन कैमरा नहीं लटकाया है, बस कुछ ठंड के कपड़े साथ हैं, यहाँ तक कि DSLR वगैरह भी साथ नहीं है, क्योंकि जितना कम सामान रहेगा, उतना सफर आसान रहेगा। असल मकसद घूमना है, लोगों से मिलना है, लेकिन लेकिन, जिस उम्मीद से कुछ दोस्त डिमांड कर रहे कि वीडियो बनाओ तो सोच रहा कैमरा लटका लूं, अब लोगों को डामर और सीसी रोड देखनी है तो वही सही, लेकिन अब जब वीडियो बनानी ही है तो कुछ उससे रचनात्मक कर जाने की एक जिम्मेदारी बढ़ जाएगी, खुद को भी तो भीतर से लगना चाहिए न कि कुछ ढंग का हो रहा, बाकी लाखों करोड़ों व्यू पाने का क्या है वो तो टिकटाॅक यूट्यूब के काॅमिक वीडियो को भी मिल जाते हैं।

Thursday, 29 October 2020

हम क्यों घूमना चाहते हैं?

पिछले कुछ समय से जितने भी वाॅटरफाल देखा, उनमें से सबसे खूबसूरत और सबसे अधिक गंदगी वाला वाॅटरफाल यही था। गंदगी के पीछे पहला कारण ये कि ये घने जंगल के बीचों बीच है तो मंदिर बन नहीं सकता, कोई पुजारी लगातार समय नहीं दे सकता, यानि कोई रोक टोक नहीं। दूसरा और सबसे बड़ा कारण गंदगी का है - "एक छत्तीसगढ़ी गाना" । साल भर पहले यानि जून 2019 में एक गाना यहाँ शूट किया जाता है, बहुत सुंदर गाना, संगीत की लयबध्दता भी उतनी ही शानदार, मतलब ये पहला ऐसा छत्तीसगढ़ी गाना होगा जिसे देश दुनिया के लाखों लोगों ने पसंद किया। मजे की बात ये कि जब उस गाने की शूटिंग हुई थी तब इस वाॅटरफाल में एक बूंद पानी नहीं था, यानि उस पूरे गाने में वाॅटरफाल जैसा कुछ दिखा ही नहीं। फिर भी उस गाने के रिलीज होने के बाद से गंदगी का ग्राफ ऐसा बढ़ा कि उसने इस मामले में गाने के व्यूवर्स के बढ़ते ग्राफ को भी पीछे छोड़ दिया।उस जगह घूमने जाने वाले अधिकांश लोगों की मानसिकता यही रही कि हम एक ऐसे जगह में घूमने जा रहे जहाँ एक गाने की शूटिंग हुई है, ऐसा लद्दाख में हुआ, शिमला, मनाली, नैनीताल में हुआ‌, ये लिस्ट बहुत लंबी बनाई जा सकती है।

असल में हम जहाँ कहीं भी जाते हैं, हम गंदगी करते नहीं हैं, हमसे हो जाता है, हमारी जीवनशैली (खान-पान के तरीके आदि) इतनी भयावह तो हो ही चुकी है कि हमारी उपस्थिति मात्र ही किसी जगह को नुकसान पहुँचाने के लिए काफी होती है।



Thursday, 22 October 2020

असली चोर कौन?

1947 के बाद से भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीन स्तंभों में अगर किसी स्तंभ के हिस्से थोड़े बहुत आजादी और लोकतांत्रिक मूल्यों के तत्व आए, तो वह सिर्फ और सिर्फ व्यवस्थापिका थी। इसके ठीक उलट कार्यपालिका वैसी ही चलती रही जैसी आजादी के पहले थी और समय के साथ और सढ़ती गई , इसे आप सशक्त होती गई, ताकतवर होती गई मानकर चलें। जबकि व्यवस्थापिका और कमजोर होती गई। इसलिए आज भी जब मौका पड़ता है, लोग आगे आकर " नेता चोर हैं" , "संसद में चोर उचक्के बैठते हैं" , "इन्होंने देश बेच दिया" ऐसे वाक्य कहते हुए सारा ठिकरा व्यवस्थापिका पर फोड़ते हैं। लोग बात-बात पर थोक के भाव में नेताओं को, संसद को चोर की संज्ञा दे जाते हैं। अब चूंकि लोकतांत्रिक मूल्य इन्हीं के पाले में आए तभी तो आज भी जनता बिना खौफ के इनके साथ उठने बैठने का साहस रखती है, गलती दिखी तो सवाल कर लेती है, डांट लेती है, गालियाँ करती है, उनके घर के बाहर धरना देती है, ज्यादा हुआ तो इनके कपड़े पर स्याही छींट देती है और मौका पड़े तो जूता फेंक के मार भी देती है।

लेकिन वहीं देखिए कार्यपालिका के तत्व यानि सरकारी नुमाइंदों (कर्मचारी, अधिकारी आदि) को कभी चोर की संज्ञा नहीं दी जाती है, भले वे पद में रहते हुए आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहें, कितने भी करोड़ों अरबों रूपयों का सांठ गांठ करते रहें, निलंबित होते रहें, लोगों की जिंदगी तबाह करें, समाज की अवनति का मूल कारण बनते रहें फिर भी वे समाज की नजर में सम्मानीय होते हैं, पूजनीय होते हैं, और तो और उन्हें निडर और मजबूत व्यक्ति की संज्ञा भी मिल जाती है।

दारू, रूपया, साइकिल बाँटने वाले नेता आज चुनाव प्रचार में जनता के सामने कोरोना की वैक्सीन बाँटने की बात कर रहे हैं, आप फिर वही करेंगे, नेताओं को गरियाएंगे, लेकिन यह क्यूं भूलते हैं कि ऐसे उलूल-जूलूल आइडिया उन्हें कोई सचिव स्तर का अधिकारी ही दे रहा होता है, सब कुछ उन्हीं का किया कराया होता है, नेता तो महज कठपुतली मात्र होता है, कार्यपालिका जैसा उसे नचाती है, वैसा वह नाचता है। लेकिन चूँकि लोकतंत्र है, नेता चुन कर आता है तो सर्वोच्चता के नाम पर उसे ही आगे कर दिया जाता है तो आपको भी यही महसूस कराया जाता है कि देश की सारी समस्याओं के पीछे नेता जिम्मेदार हैं।

नेताओं के पास गलतियाँ करने के बहुत कम अवसर होते हैं, उसने एक गलती की, जनता और मीडिया उसका नाम उछालने लग जाती है, कलंकित करने लगती है। वहीं सरकारी मुलाजिम कितनी भी गलतियाँ करे, लोगों को प्रताड़ित करे, उनका काम ना करे, ऐसी स्थिति में इनका हिसाब जनता नहीं कर सकती है। इस कारण किसी सरकारी मुलाजिम से सीधे मुंह बात भी नहीं की जा सकती, उससे अलग से मिला नहीं जा सकता, उसे डांटा नहीं जा सकता, उसकी शिकायत नहीं की जा सकती, उनका मीडिया ट्राइल नहीं हो सकता,

स्याही फेंकना तो मतलब निरा स्वपन हुआ। मूल व्यवहारिक हकीकत यही है। आपको कहीं ढूंढने से भी ऐसी खबर नहीं मिलेगी कि "फलां व्यक्ति ने काम न होने की वजह से नाराज होकर जिलाधीश के गाल पर तमाचा जड़ा", यह असंभव चीज है, क्योंकि अगला सुपरमैन जैसी ताकत से लैस होता है। इसलिए आज भी भारत में माता-पिता अपने बच्चों को इसी तरह का सुपरमैन बनाने की ख्वाहिश रखते हैं, जिसके पास बेरोकटोक भरपूर पाॅवर रहे, चौतरफा भ्रष्टाचार कर रूपया भी अनाप-शनाप छाप ले और साथ ही समाज की नजर में सम्मानीय भी रहे। यह काॅम्बो पैकेज लंबे समय के लिए इन्हीं पदों में ही मिलता है, नेता होने में ऐसी सुविधाएँ नहीं है, इसलिए देश के युवाओं का एक बहुत बड़ा तबका नेता नहीं बल्कि अधिकारी होना चाहता है। और ऐसे में देश जश्न मनाता है कि "लो रिक्शेवाले का बेटा बना अधिकारी", तालियाँ। 

अपने गिरेबान में झांककर एक बार पूछिएगा कि जैसा सम्मान आप किसी एक युवा को अधिकारी बनने पर देते हैं ठीक ऐसा सम्मान आप किसी जनप्रतिनिधि को क्यों नहीं दे पाते हैं, जबकि वह सीमित समय के लिए आता है और ज्यादा मेहनत करके आता है। 

भारत के विधायकों और सांसदों के पास ताकत और अधिकार के नाम‌ पर सिर्फ और सिर्फ अधिकारियों को फोन कर चमकाने धमकाने के अधिकार होते हैं, इससे ज्यादा उनके पास कोई अधिकार नहीं होता है। ये बात जनता अच्छे से जानती है इसलिए वह नेताओं से ढेला भर भी उम्मीद नहीं रखती है, जब मन किया कुंठा निकालने के लिए बस गाली देने के लिए उनका इस्तेमाल करती है, ऐसा करते हुए एक दिन नेताओं को हाशिए में ढकेल देती है।

भारत की जनता को यह अच्छे से पता होता है कि सरकारी मुलाजिमों के पास बहुत ताकत होती है, इतनी कि मौका मिलते ही वह ऐसा तंग करेंगे कि जीना दुभर हो जाएगा, और वे ऐसा जीवन भर मरते दम तक कर सकते हैं ये भी जनता जानती है,  इसलिए जनता इनके सामने आजीवन दुबककर रहती है, वह आज भी सरकारी दफ्तरों में एक डर के भाव से जाती है, अपने छुटपुट काम के लिए भी पहचान खोजती है, लिंक खोजती है ताकि असुविधाओं से वह बच सके। भले ही सब सही हो, साफ सुथरा काम करवाना हो फिर भी उसे जबरन गुलाम निरीह जैसा महसूस कराया जाता है, चूंकि सिस्टम ही ऐसा है, तो यह स्वयंमेव होता जाता है। 

सरकारी मुलाजिम व्यक्तिगत रूप से कैसा भी चरित्र का रहे, कितना भी बड़ा तोपचंद ईमानदार जैसा क्यों न हो, वह सिस्टम का हिस्सा बनकर लोगों को कीड़ा ही समझता है, उसे समझना पड़ता है, नहीं समझेगा तो एक दिन भी काम नहीं कर पाएगा, जरा सा भी आत्मबोध हुआ तो उसे अगले ही दिन इस्तीफा देना पड़ जाएगा। इसलिए सिस्टम में रहते हुए या तो वह खामोश हो जाता है, लाइमलाइट से दूर हो जाता है या फिर इन सब चीजों को ढँकने के लिए कभी वह पैदल चलकर महानता का ढोंग करता है, कभी साइकिल चलाकर महान हो जाता है, कभी जमीन में बैठकर खाना खाने से महान हो जाता है, कभी ट्यूबवेल का पानी पीने से महान हो जाता है, कभी काम के सिलसिले में बाइक में बैठने से महान हो जाता है तो कभी खेत में पाँव रखने से महान हो जाता है, ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, यही व्यवस्था है, यही कार्यपालिका का मूल सामंती चरित्र है जिसे भारत का परिवार, भारत का समाज बड़े आदर भाव से देखता है, इसी से मुक्ति पाने की जरूरत है, और उन सारे उपद्रव मूल्य रूपी अधिकारों को शिथिल करने की जरूरत है तभी सही मायनों में गुलामी की जंजीरें टूटेंगी।

Wednesday, 21 October 2020

पुनर्विवाह -

A - तो क्या उसके बाद दुबारा शादी करने का विचार नहीं आया? 
B - सच बताऊँ?
A - बता..
B - मैं आजकल सोच ही नहीं पाती हूं।
A - पर क्यों?
B - समाज का तो पता ही है, दुबारा संभव नहीं।
A - वो ठीक है, मैंने मन का कहा।
B - अब विवाह संस्थान से दूर रहना ही ठीक लगता।
A - ये भी ठीक है, तुम्हारे यहाँ दुबारा ना जुड़ने की ढील भी है।
B - सही कहा, धन्य हो ऐसी प्रथाओं का जिनके‌ कारण यह संभव हो रहा।
A - पूजनीय बना दे तू इन प्रथाओं को।
B - हेहे, और क्या, जातिवादी तो नहीं हूं औरों की तरह।
A - अब ये बात कहाँ से आ गई?
B - कैसी बात कर रहा, गहरे से जुड़ी हुई है।
A - लेकिन इसका विवाह संस्थान से क्या संबंध?
B - लड़कियों में शादी के तुरंत बाद ये डिसआर्डर ज्यादा देखने में आ रहा..
A - जातिवाद का? वो भी शादी के बाद?
B - हाँ जी, शादी होते ही हार्मोनल बदलाव की तरह जातिबोध होने लगता।
A - बावा, ये नया था।
B - नया क्या, हमें खुल के जीना भी न आया यार।
A - सही बात।

Thursday, 1 October 2020

हाथरस रेप केस और हमारा मीडिया -

जब निर्भया केस हुआ था, तब हम इंजीनियरिंग के फाइनल इयर में थे। उस समय फेसबुक में इतना कचरा नहीं फैला था, विज्ञापन नाम की चीज नहीं थी, क्योंकि फेसबुक उतना प्रचलन में भी नहीं था। वेब पोर्टल भी उतने नहीं थे, गिने चुने वेब पोर्टल और वही चुनिंदा न्यूज चैनल। चैनलों में तू तू मैं मैं अभी की तुलना में थोड़ा तो कम ही था। यह सब इसलिए बता रहा क्योंकि उस घटना के पहले दिन से अगले एक दो महीनों तक मैंने खूब न्यूज देखा था। सारे वेब-पोर्टल वेबसाइट आदि नाप लिया था, खूब यूट्यूब और न्यूज चैनलों को फोन और लैपटाप में देखा, कई बार कैफे से दर्जनों मीडिया फुटेज डाउनलोड करके लाता और देखता, अलग ही चूल मची हुई थी। सब कुछ अच्छे से याद है, आतिफ असलम ने "अब कुछ कुछ करेगा पड़ेगा" नाम का एक क्रांतिकारी गाना भी उसी समय लांच किया था, मैं कई दिन तक रोज उस गाने को सुनता रहा। इंटरनेट तब खूब महंगा हुआ करता, फिर भी मैंने जमकर पैसे खर्च किए। 1 GB के बहुत से कूपन वाॅलेट में लेकर घूमता था, मैं तब से फोन में न्यूज देखने लग गया था, लैपटाप में कनेक्ट करके खोज खोज कर देखा करता। वो ऐसा समय था, जब मेरे साथ के युवा 1 GB का कूपन महीने भर चला लेते थे।
उस समय हर कोई रेप के बारे में बात करने लगा था। निर्भया केस चूंकि थोड़ा ज्यादा वीभत्स हो गया था तो लोग बड़े आनंद से दिन रात जिक्र करते रहते, अपनी खोखली संवेदना परोसते रहते, एक‌ अलग तरह का‌ मुद्दा जो मिल गया था। कोई फाँसी मांग रहा था, तो कोई पुलिस को कोस रहा था, तो कोई सरकारी तंत्र को लेकर फायर हो रहा था, लेकिन खुद के समाज में परिवार में खराबी है, इस पर किसी का ध्यान नहीं था। ऐसे भी मित्र इस विषय पर चर्चा करते पाए जाते जो एक दिन पहले खुद किसी लड़की से बदतमीजी छेड़छाड़ किए रहते थे, मतलब घोर आश्चर्य। अरे! दूसरों का क्या कहा जाए हम खुद भी कोई कम बदतमीज नहीं था, जिसको जो मन किया बोल जाता था, काॅमन सेंस नाम की चीज ना के बराबर थी। जैसा समाज था, उसी समाज के ही तो हम बाॅय-प्रोडक्ट थे, कुछ गुण तो आने ही थे। लेकिन इतनी काॅमन सेंस तब भी थी कि मोमबत्ती जलाने वालों के साथ तब भी खड़ा होना शर्म का काम लगता था, चूतियापा तो लगता ही था साथ ही एक अजीब किस्म का अपराध बोध महसूस होता था। 
तो इस पूरे प्रोसेस में एक चीज जो मैंने नोटिस की थी वो यह कि जैसे ही निर्भया प्रकरण हुआ था। उसके बाद से ही देश के अलग अलग कोनों से रेप और छेड़छाड़ वाली खबरों की बाढ़ सी आ गई थी, हर दूसरे दिन कोई न कोई रेप की खबर, क्षेत्रीय से लेकर राष्ट्रीय न्यूज चैनल, हर जगह न्यूज में रेप की खबरें छाई हुई थी। लगभग दो तीन महीने तक रूक रूककर यह सिलसिला चलता रहा फिर धीरे से बंद हो गया। 
अब चूंकि उस समय फेसबुक एकदम नया था, तो यहाँ इन सामाजिक मुद्दों पर ज्ञान पेलने और संवेदना व्यक्त करने की बाढ़ नहीं आई थी। लेकिन निर्भया केस, अन्ना आंदोलन और केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश और 2014 के चुनाव के बाद जो सोशल मीडिया का कबाड़ा होना शुरू हुआ, वह आज तक बदस्तूर जारी है।
महीनों तक न्यूज छानते छानते एक चीज स्पष्ट हुई थी कि रेप जैसी घटनाएँ हमारे समाज में निरंतर होती रहती है। क्योंकि जब निर्भया रेप केस हुआ था, उसी के कुछ समय बाद उससे कहीं अधिक भयावह एक रेप केस की घटना छत्तीसगढ़ के एक गाँव में हुई थी, लेकिन चूंकि गाँव की घटना थी, नार्थ इंडिया या दिल्ली के आसपास का इलाका नहीं था, इसलिए मामला दब गया, किसी वेब पोर्टल तक में नहीं आ पाया, खैर। एक चीज तो स्पष्ट है कि इस देश में जब भी कभी निर्भया रेप केस या हाथरस रेप केस जैसा कुछ हटके कुछ ट्रिगर करने जैसा वाकया सामने आता है तो पूरे देश में रेप की घटनाओं की कवरेज अचानक ही बढ़ जाती है।

Tuesday, 22 September 2020

छत्तीसगढ़ के भूतपूर्व स्वास्थ्य सचिव को पत्र -

प्रति,

भूतपूर्व स्वास्थ्य सचिव,

छत्तीसगढ़ शासन


प्रणाम,

आशा है आप ठीक होंगी। सबसे पहले आपके भारत छोड़ने के फैसले पर आपको कोटिश: साधुवाद। आपने बहुत सही समय पर यह फैसला लिया है, आप कब हमारे राज्य में सेवा देने हेतु आईं इसकी मुझे ठीक-ठीक जानकारी नहीं है, लेकिन कुछ दिनों पहले आपने विदा लिया है, इसकी बखूबी जानकारी है। आप चाइल्ड केयर लीव लेकर अपने परिवार के साथ आने वाले दो साल तक जर्मनी में हैं, यह जानकर बेहद खुशी हुई, वैसे भी सबका अपना निजी जीवन होता है, इसलिए आपके इस फैसले का सम्मान‌ करता हूं, आपने अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देकर समाज के सामने एक नजीर पेश की है। छत्तीसगढ़ में बतौर स्वास्थ्य सचिव अपने कार्यकाल‌ के दौरान खासकर पिछले छह महीनों में कोरोना को लेकर आपने जो लोगों के लिए अभूतपूर्व कार्य किया है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, राज्य की जनता उसके लिए हमेशा आभारी रहेगी। यकींन मानिए आपके द्वारा लिए गए दूरदर्शी फैसलों का फल अभी हमें मिल रहा है, अभी उसके परिणाम देखने को मिल रहे हैं, उम्मीद है आॅनलाइन माध्यमों से आप तक भी ये सुखद परिणाम‌ पहुंचते होंगे। मैं लोगों को समझाता हूं कि डाॅक्टर्स, नर्स, हेल्थवर्कर्स की तारीफ करना बंद कर दें, क्योंकि असली योध्दा तो आप ही थीं, लेकिन इत्तफाक देखिए कि आपके जाने के बाद आज आपको कोई नहीं पूछता। पीड़ा होती है यह देखकर कि जब प्रदेश की जनता स्वास्थ्य सेवाओं और लाॅकडाउन का विरोध करने लग जाती है, भूल जाती है कि इतनी बेहतर व्यवस्था बनाने वालों ने पिछले छह महीनों में दिन रात कितनी मेहनत की है। मैं तो इसमें यह भी मानता हूं कि आप ही की वजह से हममें ये समझ पैदा हुई कि पूरे देश में जब अनलाॅक हो रहा है, तब हम पूरी जागरूकता के साथ मीडिया, सामाजिक संस्थान, प्रदेश की जनता सबको विश्वास में लेते हुए कैसे लाॅकडाउन के नये-नये अभिनव प्रयोग सतत् रूप से करते रहें। काश आज आप यहीं होती तो आपको गर्व महसूस होता, आप देखतीं कि कैसे जिले स्तर के सरकारी मुलाजिमों ने पहले से कहीं बेहतर लाॅकडाउन करके दिखाया है।

आशा करता हूं निकट भविष्य में भी आप ट्विटर के माध्यम से राज्य की खबर लेती रहेंगी और अपना बहुमूल्य मार्गदर्शन राज्य को प्रदान करती रहेंगी।


धन्यवाद।।

Monday, 21 September 2020

हत्या -

हत्या -


शहर में आए हुए उस परिवार को अभी कुछ महीने ही हुए थे। चार लोगों का सुखी परिवार रहा, प्रथम दृष्टया ऊपरी तौर पर देखने में यही मालूम पड़ता था। पिता एक अच्छी सरकारी नौकरी में थे, कालेज में प्रोफेसर रहे। बच्चों की शिक्षा को लेकर जितने वे सजग रहते, बच्चे ठीक उसके विपरित। प्रोफेसर साहब उसी मानसिकता के हिमायती रहे कि डाँट डपट से, ताने से बच्चों को ठीक कर लेंगे। कुछ माता-पिता ऐसे होते हैं जो अपने बच्चों पर शारीरिक हिंसा करते हुए उन्हें ठीक करने, सुधारने के पक्षधर होते हैं, इसके विपरित कुछ माता-पिता ऐसे होते हैं जो समाज की नजरों में अत्यधिक सभ्य, सुशील, प्रतिष्ठित, सम्मानित और विनम्र होने की छवि बनाकर चलते हैं, ऐसे माता-पिता अक्सर बच्चों को निरंतर मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, प्रोफेसर साहब यही दूसरे केटेगरी वाले रहे।


उनकी एक बेटी जो थी, वह अपनी निजी रूचियों से लेकर घर के काम में और पिताजी के ताने सुनने से लेकर पढ़ाई करने में, हर मामले में औसत रही, इस वजह से भी पिता का मौन समर्थन करती रही। लेकिन उनका बेटा उम्मीद से ठीक उल्टी दिशा में चल निकला, अपने भीतर की बची-खुची ईमानदारी को जुटाकर उसका मन छोटी उम्र से ही प्रतिक्रिया करने लग गया, अपने हिस्से का खुला आसमान ढूंढने लग गया। वो बात अलग रही कि बच्चे की यह प्रतिक्रिया समय, काल, परिस्थिति, पारिवारिक दबाव इन कारणों से कभी भी सही दिशा में निरूपित नहीं हो पाई।


जिस तरह का हमेशा से घर में एक मानसिक दबाव का माहौल बनाया गया, इस वजह से वह अपने पिता से बहुत पहले ही दूर हो चुका था। दबाव के विपरित वह ऐसा गया कि अब उसे अपने ही घर में दो वक्त का भोजन करना भी नागवार गुजरता। छोटी सी उमर में वह एक ऐसी प्रताड़ना झेलने को विवश कर दिया गया था जिसे न वह खुद प्रताड़ना समझ पाया था, न ही समाज।बची-खुची कसर तब पूरी हुई जब उसने घर से थोड़े-थोड़े रूपए चुराने लगा, चुराना भी क्या कहें उसे, अपनी सीमित जरूरतों के लिए चंद पैसे घर से बिना बिताए ले लेता था। शुरूआत में वह उतने ही रूपए लेता रहा जितने में वह बाहर जाकर कुछ खरीद कर खा सके क्योंकि घरेलू दबाव ऐसा बना रहा कि पिता ने कभी इस पक्ष पर सोचा ही नहीं कि बच्चों का यह शौक भी पूरा किया जाए कि उन्हें उनके मन मुताबिक कभी कुछ खिला दिया जाए, कुछ खरीददारी कर लिया जाए, बच्चों को मशीन न मानकर कभी उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार कर लिया जाए, उनके साथ बैठकर बातें की जाए, उनके साथ हँसी ठिठौली ली जाए, उनकी बातें सुनी जाए, लेकिन प्रोफेसर साहब तो थे जिद्दी, कैसे अपने बच्चों की या पत्नी की सुनते, अपने अहं को सर्वोपरि मानकर उसी हिसाब से अपनी जिंदगी के पहिये घुमाते रहे।


बेटे द्वारा की गई चंद रूपयों की चोरी को, जिसे कायदे से चोरी कहना भी मूर्खता होगी, इसे उसकी भोली माता हमेशा से छुपाती रहती और पिता तक यह बात पहुंचने न देती। पिता जो चरित्र से एक शक्कीमिजाज, मक्खीचूस इंसान रहे, उनमें शुरूआत से अपने ही परिवार के लोगों के प्रति औरंगजेब जैसा अविश्वास रहा, कुल मिलाकर यही उनका मूल चरित्र रहा, वे अपनी तनख्वाह तक खुद छिपाकर रखते, हिंसा के स्तर पर जाकर एक एक रूपए का हिसाब रखते, यहाँ तक कि अपनी धर्मपत्नी को भी इस बात की जानकारी न होने देते। एक दिन क्या हुआ कि बेटे को पिताजी के तिजोरी की भनक लग गई और उसमें भी उनके बेटे ने पिन से स्टेपल किए हुए रूपयों की गड्डी से अपनी जरूरत के मुताबिक ईमानदारी से एक पचास रूपए का नोट निकाल लिया, पिता को तो पता चलना ही था, उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी पर शक की सुई घुमाई, पत्नी ने हमेशा की तरह छिपाने की लाख कोशिश की लेकिन बात उभर कर बाहर आ गई, उन्होंने बेटे को बैठाकर खूब सुनाया, चूंकि पिताजी ने विनम्रता का चोगा उढ़ा हुआ था तो वे अपने बच्चों पर कभी हाथ नहीं उठाते थे, सिर्फ मानसिक प्रताड़ना देते थे। छोटे बच्चों में मार का असर कुछ पहर तक ही होता है, लेकिन मानसिक प्रताड़ना लंबी दूरी तय करती है, कहीं अधिक दिमागी उथल पुथल करती है।


उनका एकलौता बेटा छोटी उम्र से ही कुछ अलग ही दिखने लगा था, चेहरे का रंग हल्का पीला गोरा लेकिन उस चेहरे में किसी प्रकार की कोई चमक कोई ऊर्जा नहीं, कद काठी से भी औसत, आटे की लोई जैसा उसका शरीर। ऐसा लगता मानो मानसिक प्रताड़ना झेलते-झेलते पूरा शरीर कृशकाय होने की दिशा में गतिमान है। वह भी अपनी बहन की तरह पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में औसत ही रहा। पिता को अपनी उम्मीद के मुताबिक कभी बच्चों से कुछ नहीं मिल‌ पाया, बच्चे भी परेशान रहने लगे कि हम ऐसा क्या कर जाएं कि पिता हमसे खुश होकर हंसते, मुस्कुराते कभी बात कर लें। प्रोफेसर साहब रूटिन तरीके से दूसरे परिवारों के बच्चों से तुलना करके अपने बच्चों को छोटा महसूस कराते रहे। बच्चों में जो थोड़ा बहुत आत्मविश्वास रहा, संभावनाओं के अंकुर रहे, वह फूटने के पहले ही दम तोड़ने लगे। पिता को अपने बच्चो में कुछ भी ऐसा दिखाई नहीं पड़ रहा था कि जिसे प्रस्तुत कर वे समाज के बीच सीना चौड़ा करते हुए अपना गौरवगान कर सकें। वे भी व्यथित रहते कि समस्या कहाँ है, चूक कहाँ रह गई, जबकि वे खुद समस्याओं का पहाड़ बनकर बीच में खड़े थे। उन्हें यह अहसास भी कैसे होता, मन के कोमल भावों पर पहले ही उन्होंने ताला जड़ दिया था, उनके लिए रूपया ही जीवन की सबसे कीमती चीज रही, प्रेम नाम की कोई वस्तु भी होती है, इसकी उन्हें कभी समझ ही नहीं रही, इसलिए इन बहूमूल्य जीवन तत्वों से वे आजीवन वंचित रहे।


यहाँ प्रोफेसर साहब के चरित्र के बारे में कुछ और बातें करना बेहद जरूरी है। अब चूंकि वे सरकारी प्रोफेसर थे, इसमें से आने वाली मोटी तनख्वाह, ऊपर से छोटा सा परिवार था, गाँव में अच्छी खासी खेती किसानी भी थी, यानि यह कि पैसों की कोई कमी नहीं थी, संपन्न थे। फिर भी एक एक रूपए के हिसाब के लिए पड़ोसियों से बहस कर लेते, रेहड़ी (ठेलेवाला) वालों से दो चार रुपए के लिए खूब मोलभाव करते, कुतर्क कर अपने को सही पेश करके ही दम लेते। छोटा हो या बड़ा, अमीर हो या गरीब, हर कोई इनकी इस नीचता या यूं कहें कि इनके इस काइयाँपन के सामने झुकने में ही अपनी भलाई समझता। बाहर के लोगों का तो चलिए एक बार समझ में आता है, वे पैसों के मामले‌ में अपने घरवालों के लिए भी किसी मुंशी लाला से कम नहीं थे। छोटी से छोटी चीज का ऐसा पाई-पाई हिसाब माँगने लगते कि उनके परिवार के सदस्य भी घबरा जाते। इस वजह से भी घर का कोई सदस्य कभी अपने शौक या जरूरतों के लिए कोई चाहकर भी पैसे न माँग पाता। और संभवत: बेटे का हिम्मत करते हुए बिना बिताए घर से पैसे ले लेने का एक प्रमुख कारण यह भी रहा हो। प्रोफेसर साहब सब्जियों की खरीददारी करने बाजार भी जाते तो शाम को ही जाते क्योंकि वह समय ऐसा होता है जब आखिर में बची हुई सढ़ी गली सब्जियाँ कम‌ दाम‌ में मिल जाती हैं, दो रूपए कहीं कम दाम में सब्जियाँ मिल जाएँ इसके लिए वह पूरा बाजार छान मारते, भले ही इसमें घंटे भर का समय क्यों न लग जाए। वे खासकर उन सब्जियों को अधिक खरीद मात्रा में खरीदते जिनका मूल्य कम है, इस वजह से वे कई बार पोषकतत्वों से भरपूर अलग-अलग प्रकार की सब्जियाँ खरीदने से वंचित रह जाते।


जब जब माता-पिता के संज्ञान में यह बात आई कि बेटा चोरी-छिपे घर से रूपए लेता है और बाहर की चीजों पर खर्च करता है, उन्होंने बेटे की इस हरकत को सबके सामने इस तरीके से पेश करना शुरू किया कि बेटा आवारा है, चोर है, गलत संगत में जा चुका है। इसमें मुख्य भूमिका में पिता रहे, माता पीछे पीछे मौन समर्थन देती रही। और जिस गलत संगत के नाम‌ पर वे अपने बेटे को निकृष्ट, चरित्रहिन घोषित करते रहे, उस चरित्रहीनता के नाम‌ पर बेटा करता क्या था, घर का खाना नहीं खाता था, घर में नहीं रहता था, हमेशा आवारागर्द लोगों के साथ बाहर घूमता रहता था, चूंकि माँगने पर भी घर से जेबखर्च नहीं मिल पाता इसलिए घर से कुछ रुपए लेकर हमेशा बाहर की चीजें खाता था, जबकि बाहर की चीजें खरीदकर खाना कभी उसके शौक में शुमार थी ही नहीं; घर के दबाव ने ही अनायास यह दूसरा रास्ता खोल दिया था। और जब बेटा उस रास्ते चल‌ निकला तो फिर वापस लौट नहीं पाया, उसकी जिव्हा को बाहर के खाने की लत हो गई। उस बालमन का दुर्भाग्य देखिए कि उसका मन अब बाहर के खाने में रस ढूंढने लगा, अपनापन ढूंढने लगा, स्वाद खोजने लगा। घर का खाना वह खाता भी तो पिता की उपस्थिति और उनसे डर की वजह से, जिसमें उसे रत्ती भर आनंद न आता, बस पेट भरने के लिए वह खा लेता। कई बार तो ऐसा भी होता कि पिता की अनुपस्थिति में भी वह माँ का मन रखने के लिए हल्का भोजन घर में कर लेता और बाहर जाकर पेट भर कुछ तली हुई चीजें खा लेता और मन तृप्त करता, यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा। बेटा बड़ा हो रहा था, उम्र और घर से उसकी दूरियाँ समानांतर रेखा में चल रही थी, माताजी भी जड़वत बनी रहीं, सब कुछ देखते हुए भी कभी प्रतिकार नहीं कर पाई। निरंतर बच्चों की गलती छिपाते छिपाते अब उनमें भी कभी इतनी ईमानदारी पैदा नहीं हो पाई कि एक बार पूरी ताकत से इन सारी चीजों का विरोध कर जाए। इसीलिए कभी न तो वह अपने पति का विरोध कर पाईं, न ही अपने बेटे का पक्ष लेकर उसका समर्थन कर पाई। शायद नियति को भी यही मंजूर था। समय देख रहा था।


पानी बहुत अधिक बह चुका था। एक तरफ पिता के द्वारा दी जा रही मानसिक प्रताड़ना और दूसरी तरफ माँ से मिल रही मौन सहमति। इस वजह से वह अब बहुत आगे निकल चुका था, जहाँ से अब उसे वापस लाना असंभव की हद तक कठिन हो चुका था। अब उसने अपनी जरूरतों के लिए पैसे इकट्ठे करने के उन सारे तरीकों को आजमाना शुरू कर दिया जहाँ तक वो कर सकता था। वह इस भुलभुलैया में तो प्रवेश कर ही चुका था जहाँ आए रोज उसके सामने ऐसी नई नई जरूरतें पैदा होने लगी थी, जो कभी उसकी प्राथमिकता में भी नहीं थी, लेकिन इन जरूरतों को पूरा करने के लिए अब वह किसी तक जाने को तैयार था। इस पूरी प्रक्रिया में उसे कुछ साथी दोस्त भी मिलते चले गये जो उसका बेड़ा गर्क के लिए पर्याप्त मात्रा में उत्प्रेरक का काम करते रहे। बचपन में घर से अपनी छोटी छोटी जरूरतों के लिए दहाई की संख्या के नोट चुराने वाला वह बालक अब चौथाई संख्या की चोरी तक अपने हाथ लंबे कर चुका था और वह यह सब कुछ बड़े शातिराना तरीके से कर जाता। घरवालों को थोड़ी भी भनक न लगती।


पढ़ाई लिखाई के मामले में वह अपनी बहन से थोड़ा तेज रहा, यानि हर बार वह ठीक-ठाक नंबरों से पास हो जाता। कुछ इस तरह उसने इंटरमीडियट तक की पढ़ाई पूरी कर ली। अब इसके बाद उसे काॅलेज भेजने की तैयारी चल ही रही थी कि एक अनहोनी हो गई। लड़के को एक गंभीर बीमारी हो गई। इतनी गंभीर बीमारी रही कि महीनों तक अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, कई लाख रूपए खर्च करने पड़ गए। ध्यान रहे कि उम्र के इस पड़ाव तक लड़का नशे आदि से कोसों दूर था। उस गंभीर बीमारी की वजह से प्रोफेसर साहब की जितनी भी जमा पूंजी रही, लगभग सब कुछ बेटे के स्वास्थ्य पर खर्च हो गया। फिर भी कंजूस पिता ने इतना तो जमा करके रखा ही था कि आगे का जीवन बिना किसी बाधा के प्रवाह में चलता रहे, सो जीवन चलता रहा।


बेटा साल भर में ठीक होकर घर आ गया, लेकिन अभी भी उसकी महंगी दवाईयाँ चल ही रही थी। अब चूंकि प्रोफेसर साहब थे सरकारी मुलाजिम, तो उन्होंने बेटे के ठीक होने के पश्चात् अपना सारा ध्यान कागजी कार्यवाही में लगा दिया। वर्तमान में चल रहे दवाइयों के खर्च से लेकर पुराने इलाज का बिल, सारा हिसाब तैयार कर लिया और उन पैसों के लिए क्लेम करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनके सारे पैसे वापस आ गये। लेकिन बेटा अभी भी पूरे तरीके से घर नहीं लौट पाया था। 


अस्पताल और दवाईयों के इलाज से शरीर के आंतरिक हिस्सों की समस्याओं से तो छुटकारा पाया जा सकता है लेकिन मन का क्या करे इंसान। मन तो अभी भी वैसे ही घुटन महसूस कर रहा था जैसा पहले करता था। हाँ अब चूंकि लड़का बीमार था, दवाईयाँ चल ही रही थी, इसलिए भी एक सहानुभूति का पक्ष कुछ वर्षों तक बना रहा। इस बीच लड़के ने घर पर रहते हुए स्नातक स्तर की पढ़ाई ओपन यूनिवर्सिटी से पूरी कर ली। अब वह धीरे-धीरे ठीक होने लगा था, लेकिन कुछ चीजें मस्तिष्क के किसी कोने में अभी भी जस की तस जमी हुई थी, और वह थी घर से उसकी दूरी। और इस दूरी को रेखांकित करने में उसके‌ पिता ने महती भूमिका निभाई। अब चूंकि बेटा ग्रेजुएट हो चुका था, इसके बाद भी उसका घर पर रहना पिता को खटकने लगा। प्रोफेसर साहब तो अब अपने बेटे के साथ ऐसा व्यवहार करने लगे मानो सरकार से मेडिकल क्लेम का पैसा मिल जाने के बाद वह भूल ही गये हों कि कैसे मौत के मुंह से अपने बेटे को बचाकर लाए थे।  वह अब अपने बेटे को आए दिन नौकरी आदि के लिए ताने सुनाने लगे। बेटे की घुटन बढ़ने लगी, वह फिर घर से दूरी बनाने लगा, अब चूंकि स्वास्थ्य भी बेहतर होने लगा था तो फिर वही बाहर दोस्तों के साथ घूमना, उनके साथ खानपान। लेकिन उसकी तकदीर में ये खुशियाँ कहाँ लंबे समय तक टिकने वाली थी‌। एक और तूफान उसके जीवन में प्रवेश करने के लिए धीमे से तैयार हो रहा था। 


एक दिन अचानक क्या हुआ कि उस लड़के की तबियत फिर से बिगड़ने लगी। इस बार इतनी तबियत खराब हुई, ऐसी स्थिति होती चली गई कि माँ बाप और परिजनों ने भी आस छोड़ दिया। फिर भी लड़का अपनी इच्छाशक्ति से सब कुछ झेल गया और जिंदगी की रेस जीत गया।


जिंदगी की गाड़ी फिर से पटरी में सरपट दौड़ने लगी। वह दुबारा मरते मरते बचा था, इसलिए घरवाले उसके स्वास्थ्य के प्रति पहले से और अधिक सजग हो गये थे। वह भी यथासंभव घरवालों की आज्ञा का पालन करता रहा। और एक दिन वह पिता की अनुमति लेकर आगे की पढ़ाई करने शहर चला गया। महीने के खर्च के नाम‌ पर भी पिता उतने ही पैसे हिसाब करके उसे देते, जितने में उसका काम हो जाए, उसके अतिरिक्त एक रूपया भी नहीं। भले ही बेटे ने इतनी पीड़ाएं झेली, अपनी जवानी का एक बड़ा हिस्सा अस्पताल में बिता दिया, घरवालों का इतना मानसिक शोषण झेलने के बावजूद वह इस उम्मीद में जी गया कि अब सब बेहतर हो जाएगा। फिर भी अपने उस पाषाण ह्रदयी पिता के अहं के सामने उसका प्रेम, उसका समर्पण गौण ही रहा।


लड़का आगे की पढ़ाई पूरी कर घर लौट आया, और अब घर से ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। अब जैसे जैसे वह बड़ा हो रहा था, शोषण और दबाव की मात्रा भी तो उसी अनुपात में बढ़नी थी और हुआ भी यही। इतना कुछ होने के बावजूद, इतनी संपत्ति, सुख सुविधाएँ होने के बावजूद वह निर्दयी बाप अधीर होकर फिर से आए दिन अपने बेटे के समक्ष नौकरी की उम्मीद का राग अलापने लगा और उसे प्रताड़ित करने लगा। लड़का मन मसोस कर रह जाता, उसे यही लगता कि वही गलत है, उसके‌ पिता एकदम सही हैं, उसे समझ ही न आता कि उससे चूक कहाँ हुई, उसने क्या पाप कर दिया।  जीवन के इस मोड़ पर आकर उसने पहली बार शराब को मुँह लगाया, आनंद के वास्ते नहीं, बल्कि मन का बोझ हल्का करने के लिए उसने ऐसा किया। कुछ इस तरह चंद मिनटों, चंद घंटों के लिए ही सही वह सब कुछ भुलाकर अपने वर्तमान में जीने का सुख पा लेता था।


एक दिन एक बड़ी अप्रत्याशित घटना घट गई जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी। वह लड़का घर से भाग गया। कई दिनों तक नहीं लौटा, इस बीच घरवाले चिंता में पड़ गए, सब जगह पूछताछ की, कुछ परिचितों को खोजने के लिए लगा दिया, पुलिस में इसलिए नहीं कहा ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा पर कोई आँच न आए और शायद इसलिए भी पुलिस तक बात नहीं पहुंचाई होगी क्योंकि माता-पिता को अपनी दी गई प्रताड़ना पर पूरा विश्वास होगा कि बेटा उन्हीं की वजह से ही तो घर छोड़कर गया है। 


इस बीच वह समाज की नजरों में और खराब होता गया। उसके शराब पीने की खबरें भी चलने लगी। भगोड़ा, निकृष्ट, शराबी और न जाने क्या क्या। अपमान और अपवंचना के नाम पर उसके चरित्र के साथ काफी कुछ चीजें जुड़ चुकी थी। फिर भी उस लड़के के भीतर कहीं अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान का तत्व कुछ रह गया था, इसलिए कुछ दिनों के बाद वह घर लौट आया। अपने व्याकुल परिजनों को देखकर रो पड़ा और वादा किया कि वह भविष्य में कभी ऐसा कदम नहीं उठाएगा। 


इस बीच लड़का आए दिन अपने मित्रों के पास जा जाकर रोता था, उसे पता नहीं होता कि वह आखिर क्यों रो रहा है, क्यों परेशान है वो, वो बस रोता था, वह परिवार और समाज की नजरों में इतना बेकार हो चुका था कि उसे भी अब लगने लगा था वह दुनिया का सबसे खराब बेटा है, उसे अपनी पीड़ा की ठीक-ठीक समझ ही नहीं बन पा रही थी, इसलिए वह किसी से ढंग से कह भी नहीं पाता था, इसलिए कोई उसे उतना समझ भी नहीं पाता था, वह पूरी तरीके से अकेला पड़ चुका था, अब उसके मनोभाव सिर्फ दो तरह से ही पकड़ में आते थे, एक उसके चेहरे के भाव और दूसरा उसके आँसू। इस बीच शराब की डोस बराबर उसके दुर्बल हो चुके शरीर में जाती रही। और फिर एक दिन अचानक उसे तेज बुखार हुआ और बिस्तर में लेटे लेटे ही उसने अपना शरीर त्याग दिया।


समाज की नजर में तो यह बुखार से हुई मृत्यु ही कही जाएगी, क्योंकि जिस समाज में माता-पिता को महान मानते हुए उनके पाँव धोकर उन्हें भगवान की तरह पूजने की परंपरा चली आ रही हो वहाँ उनकी सारी गलतियाँ छिप जाती हैं। वह अपने बच्चों को कितनी भी कैसी भी प्रताड़ना दें, वह हिंसा की श्रेणी में नहीं आता है, अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। लोगों की नजर में हत्या का होना तभी माना जाता है, जब कोई व्यक्ति किसी की जीवनलीला समाप्त कर दे। ऐसी घटनाओं के पश्चात हम संवेदनशील समाज के लोग फाँसी की माँग भी कर लेते हैं, लेकिन इन जैसे लोगों का क्या जो आजीवन अपने बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हुए उनका जीवन नर्क बना देते हैं, पहले बचपन की हत्या, फिर युवावस्था की हत्या, इस पूरी प्रक्रिया में कोमल भावनाओं की हत्या, खिलखिलाते ख्वाहिशों की हत्या, सुंदर सपनों की हत्या, न जाने ऐसा कितना कुछ। लेकिन ऐसी हत्याओं को समाज कभी हत्या के रूप में देख ही नहीं पाता है, न ही ऐसे पढ़े-लिखे प्रबुध्दजनों के भीतर छुपे हिंसक प्रवृति के मनुष्य को फिल्टर कर अलग कर पाता है।


प्रोफेसर साहब समाज की नजर में भले मानुष थे, और उम्मीद भी यही है कि वे ऐसे ही आजीवन भले‌ मानुष बने रहेंगे, उन्होंने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया, इस मामले में वे पक्के रहे। लेकिन यह कहना गलत न होगा कि उनकी वजह से आज उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा। बेटे की मृत्यु के कुछ महीने बाद प्रोफेसर साहब वापस अपने राक्षसी स्वरूप में लौट आए। उन्होंने बेटे की मृत्यु के लिए आए दिन अपनी पत्नी को कोसना शुरू कर दिया, कभी-कभी तो अपनी पत्नी को यह तक कह देते कि तूने ही मेरे प्यारे बेटे को मुझसे छीन लिया, तू उसकी देखभाल नहीं कर पाई। मानवीय स्वभाव की भी यह विशेषता रही है कि मन के अंदर भरी हुई चीजें बाहर निकलने के अपने रास्ते खोज ही लेती है। अब चूंकि बेटी का विवाह भी कर लिया था, इसलिए घर में सिर्फ दो लोग रह गए थे, प्रोफेसर साहब की हिंसा झेलने के लिए अब बस घर में उनकी पत्नी रह गई थी। एक दिन उन्होंने तैस में आकर अपनी पत्नी को संपत्ति और अपने जीवन से बेदखल करने की बात कह दी, साथ ही दूसरा विवाह करने की धमकी भी दे दी। हालांकि उन्होंने अपने विवाह करने की धमकी वाली बात पर अमल नहीं किया लेकिन अपनी हिंसा, कुंठा, अहं या जो भी कह लें, इसको अपने जीवन का मूल तत्व मानते हुए आज भी वे उसी ठसक के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।