जिन चीज़ों को हम पढ़ के महसूस करते थे, आज उसे महसूस करने के लिए वीडियो देखना जरूरी हो गया है, ऐसे में वीडियो हमें उस जगह को थोड़ा भी महसूस करा नहीं पाता है। इसके उलट वो हमें अलग ही तरह से बेचैन करता है। एक बर्फबारी होने पर पहाड़ों में पहुँचने वाली हज़ारों की भीड़, या एक वीडियो वायरल होने पर किसी स्थान विशेष में खाने पहुँचने वाले लोग हों। दोनों वहाँ लाइन में लगे होंगे, असुविधा में होंगे लेकिन एक अघोषित ट्रेंड के शिकार बने हैं तो फँसे रहते हैं, इंसानी समाज के व्यवहार में ऐसा बदलाव कभी इतिहास में नहीं दिखा है।
आप किसी स्थान विशेष के लिए कैसे भी वीडियो बना लीजिए, उसमें लिखने वाली चीज़ों जैसी स्थिरता नहीं आयेगी। वीडियो का अपना एक अलग stimulation होता है। उसके अपने अलग खतरे हैं, अगर वीडियो फोटो के मामले में एक संजीदगी एक सादगी नहीं बरती गई तो उसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। इसका उदाहरण इसी से समझें कि हिंसा रूपी चीज़ों को वीडियो फोटो में ब्लर किया जाता रहा है, क्यों किया जाता है ताकि आपकी सोच वहाँ उतने तक स्थिर ना हो जाए, आपका दिमाग़ी विचलन वहाँ उसे देखकर स्थिर ना हो। आप किसी की फोटो वीडियो लेकर उसका पूरा जीवन तबाह करने की क्षमता रखते हैं। लंबे समय तक तंग करते हैं और उसमें सोशल मीडिया का तड़का लग गया तो सोने पे सुहागा। मानो आपके हाथ मशीन गन ही लग गया हो। अमेरिकी लेखिका susan ने कैमरे को बन्दूक से भी ज़्यादा ख़तरनाक ऐसे ही नहीं कहा था। पिछले कुछ एक साल में सोशल मीडिया माध्यमों से ये पागलपन बहुत ज़्यादा बढ़ा है। हर किसी को वीडियो रील देखकर केदारनाथ मनाली जाना है, क्यों जाना है उन्हें ख़ुद नहीं मालूम। ठीक कुछ ऐसा ही किसी रेस्तरां या किसी शॉपिंग वाली जगह के साथ भी है। हम किसके माध्यम से संचालित हो रहे हैं हमें ख़ुद इसका भान नहीं। पिछले कुछ वर्षों में जो लोगों के भीतर ये बेचैनी आई है, ये शोर आया है, इसके पीछे बहुत बड़ा योगदान सोशल मीडिया का है। सरकार या पार्टी ख़ुद इससे अछूती नहीं है। ख़ुद सोशल मीडिया ऐप बनाने वालों के कंट्रोल में भी यह चीज़ नहीं है कि वह लोगों के भीतर पैदा हुए इस पागलपन को कैसे रोके, वे ख़ुद अपने बच्चों को और ख़ुद को इन माध्यमों से दूर रखते हैं। आज अधिकतर scholar, scrollers में तब्दील हो चुके हैं। एक बड़ी आबादी ज़ोम्बी बन चुकी है, जिधर चाहें उधर आप उसे आसानी से ट्रिगर कर सकते हैं, बस एक ट्रेंड बनने की देर है।
कोई इस नशे से अछूता नहीं है। हम सब इसकी गिरफ्त में है। कुछ लोग देख पा रहे हैं, कुछ नहीं देख पा रहे हैं। आपको अब लोगों से मिलकर शांति महसूस नहीं होगी, अधिकतर लोग आपको बेचैन ही दिखेंगे मिलेंगे। इसलिए मैंने तो अब लोगों से मिलना बात करना बहुत कम कर दिया है। ये पिछले दो तीन सालों में मुझे लगता है सबके दोस्त कम हुए होंगे, सबके अपने कम हुए होंगे, एक आत्मीय बातचीत के लिए जो कुछ लोग हमारे जीवन में होते थे, वे लोग कम हुए हैं। सोशल मीडिया ने सबके जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया है, अस्थिर कर दिया है, सबके जीवन में भयानक शोर और उत्तेजना भर दी है। इसमें आप देखेंगे कि जानवरों पर भी इसका असर हो रहा है, उनको देखकर भी अब आपको शांति नहीं मिलती है, आसपास में ही गाय कुत्ते बिल्ली उनकी आँखें देखिएगा, अब वे शक भरी निगाहों से देखते हैं, उनकी भी भाव भंगिमा बदल चुकी है, अजीब तरह से व्यवहार करने लगते हैं। उन तक भी हमारा ये नया रेडिएशन कहीं ना कहीं पहुँच ही रहा है।
आपको अपना ख़ुद का लिटमस टेस्ट करना हो, अपने भीतर के अघोषित शोर और उत्तेजना की सूक्ष्म जाँच करनी हो तो उन लोगों से मिलिए, उन लोगों से बात करिए जो सोशल मीडिया ऐप्स का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। आपको उनकी बातचीत और अपनी बातचीत के तौर तरीकों में जमीन आसमान का फर्क दिखेगा, उनके चेहरे के भाव और आपके चेहरे के भाव भी अलग लगेंगे। पूरी जीवनशैली में ही बड़ा अंतर दिखेगा। तब शायद समझ आए कि हम सबके जीवन को, जीवन के एक एक अंग को एक ऐसी अदृश्य शक्ति बार-बार उत्तेजित कर रही है जिसे सोशल मीडिया कहते हैं।
मैं ख़ुद कहीं घूमने जाता हूँ तो उस जगह की फोटो वीडियो देखने से बचता हूँ। पिछले 7-8 साल से ये काम बंद कर दिया है। जब 3G और डोंगल का जमाना था, अनलिमिटेड इंटरनेट नहीं था तब खूब देखा है, और तब के बन रहे वीडियो फोटो उतने बेचैन भी नहीं करते थे। उतनी फोटो वीडियो मिलती भी नहीं था, सीमित और ठोस जानकारियां ही थी। शायद अनलिमिटेड नाम की चीज़ नहीं थी इसलिए तब सोशल मीडिया माध्यमों की पवित्रता भी कुछ हद तक बनी हुई थी, अब तो ये मार्केटिंग टूल बन चुके हैं।
अभी कुछ दिन पहले यहाँ दोस्तों के साथ गया था, यहाँ भी इसकी पहले कभी फोटो वीडियो नहीं देखी, जाकर बड़ा सुकून मिला। कुछ समय पहले vizag भी गया। भारत का कोना-कोना नाप के आने के बाद ये पास की जगह अब तक नहीं गया था। उसकी पवित्रता मैंने बचाकर रखी थी, कभी अलग से फोटो वीडियो देखने की तड़प ही नहीं हुई, जाने के ठीक पहले भी नहीं हुई। और जब गया तो संपूर्णता में उस जगह को आँखों से महसूस किया। घूमना भी एक लक्ज़री है एक आर्ट है, सबको आती नहीं हमारी जाती नहीं।