भारत में शादी सिर्फ दो परिवारों की सहमति तक कभी सीमित नहीं होती है। बल्कि आपको पूरे समाज को लेकर चलना होता है। और हर कोई अलग-अलग तरीके से वही पुराने ढर्रे में ज्ञान देगा। खासकर एक हिंदू परिवार में अगर कोई अपने मन से कम खर्च में एक दिन में मंदिर में अच्छे से शादी करके सब कुछ निबटाना चाहे तो उसके पास ऐसा विकल्प ही नहीं है। पहला तो उसे ग़रीब कमजोर समझा जाता है, सामाजिक प्रतिष्ठा पर बात आती है। दूसरा यह माना जाता कि मंदिर में तो तलाकशुदा और समाज से बहिष्कृत लोग ही शादी करते हैं। एक और विकल्प कोर्ट वालों के लिए चार सौ बीसी का तमगा है ही। यह भी सोचने वाली बात है कि सर्वाधिक हिंदुओं में ही court marriage का विकल्प लोग क्यों चुनते हैं।
फिर एक बड़ा दिखावे वाला सामाजिक दबाव यह है कि एक ही शादी है, इकलौता बेटा/बेटी है। धूमधाम से शादी करेंगे। ये धूमधाम का कॉन्सेप्ट ही आज के समय में कितना फूहड़ कितना अजीब है। हमारी तो जीवनशैली ही धूमधाम वाली हो गई है, रोज़ बाहर खाना, पार्टी मोड में रहना, घूमना, शॉपिंग वाली जगहें जाना, तो उसमें और कितना धूम और धाम चाहिए हमें। अब इसमें भी तर्क ये कि उसने किया तो मुझे भी करना है, मेरी भी सामाजिक जिम्मेदारी है। अरे भाई किसको खुश करना है और खुश करना भी है तो उसी संस्थागत सढ़े हुए खर्चीले ढांचे में क्यों करना है। मुझे लगता है शादी को एक बहुत पर्सनल इवेंट की तरह होना चाहिए जिसमें बहुत करीबी सीमित लोग ही हों। लेकिन नहीं शादी में आपको तो एक बड़ी जनसंख्या का मैनेजमेंट दिखाना होता है। मानो कोई बहुत भारी भरकम युद्ध जितने जैसा काम हो, आपको दस लोग उसी पैटर्न के हिसाब से ज्ञान भी देते हैं कि हम ऐसे किए थे आप भी ये कर लेना।
इसमें आपको उन लोगों को भी लेकर चलना होगा जिनसे आप सालों साल कभी सीधे मुँह बात तक ना करते हों, उनके साथ औपचारिक रिश्ता भी ना हो, लेकिन शादी के दिन के इवेंट के लिए वह अपना भी खास बन जाता है। वह भी दिखावे के उस दिन के लिए खास बनने के ढोंग में शामिल हो जाता है। मैंने तेरा नमक खाया, तू भी मेरा नमक खा।
इतने खतरनाक तरीके से यह सिस्टम बना हुआ है कि आप इसके खिलाफ जा ही नहीं सकते, जैसे अब रिचार्ज में बाध्यता है कि डेटा साथ में मिलेगा ही। वरना फिर आप रिचार्ज ही मत करो या फिर इस दुश्चक्र से बचने के लिए देश ही छोड़ के आपको जाना होगा, आपके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है। ठीक उसी तरह आपको उसी खर्चीले और दिखावे वाले पैटर्न में ही शादी करना होगा, भले उसमें भसड़ दिखावे और औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं होगा, लेकिन करना वही है। आपको अमूमन हर जगह एक ही जैसा एहसास मिलता है, मानो आप कोई सिलेबस निपटा रहे हों, एक ऐसा reunion जिसमें बहुत से लोग इधर-उधर के मिलेंगे लेकिन कोई भावनात्मक जुड़ाव वाली चीज़ नहीं, मिल-जुल लिए और फोटो ले लिया और उसके बाद केवल खाना निपटा के भागने वाले मोड में आप होते हैं, आप वहाँ से कुछ नया कुछ बहुत अच्छा एहसास लेकर नहीं लौटते हैं। और अगर आप इस सढ़े हुए सिस्टम के खिलाफ जाएँगे तो आप देशद्रोही से भी बदतर हैं, आपको जीने का हक़ नहीं है। यहाँ सामाजिक स्वतंत्रता या सामाजिक स्वीकार्यता नाम की चीज़ ही नहीं है।
जब भी लगे कि भारत में लोकतंत्र सढ़ गया या ख़त्म हो रहा, तो रुककर पहले यह ध्यान देना चाहिए कि समाज पहले सढ़ रहा है ख़त्म हो रहा है और एक सढ़ा हुआ समाज सढ़े हुए लोकतंत्र का ही निर्माण करता है।