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Monday, 5 February 2018

- The Munsyari Song ~

                            पहाड़ों की सबसे खास बात जो है वो ये कि अधिकतर पहाड़ी गांवों एवं शहरों के नाम पर बहुत से गाने बने हुए हैं जो उस शहर या गांव का प्रतिबिम्ब होते हैं। इन गानों की एक और अच्छी बात ये है कि आपको थोड़ा भी फूहड़पन देखने को नहीं मिलेगा। यूं कहें कि अगर आप पहाड़ आए और आपने पहाड़ी गाने नहीं सुने तो समझिए आपका पहाड़ आना व्यर्थ ही हुआ, बस आए और चले गए वाली बात होगी बल।
                           हिमनगरी मुनस्यारी के नाम पर तो दर्जनों गाने बने हैं लेकिन ये एक गाना ऐसा है कि मुनस्यारी में जब भी कहीं शादी या कोई उत्सव होता है तो ये गाना बजता ही है, इस कुमाउंनी गाने की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें मुनस्यारी की सड़कें, पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूल, हरे-भरे बुग्याल, झरने, नदियाँ, सुंदर खेत, पत्थरों से बने मंदिर, घरों की वास्तुकला, और यहां के त्यौहार, यहां का खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज और और सामने महान हिमालय,
इस गाने में मुनस्यारी की पूरी संस्कृति समाहित है।



Sunday, 18 June 2017

~ My Family @ Munsyari ~

My big brother Binod Bisht


Bhabhi and Nephew Ayush

Younger brother Tarun singh dhami


Brother Manoj rana

Suresh bhai(Right end) and Rana brothers


Bhuppy rana and Jitin Sayala(middle)


Bachha Party

Massab and gungun


Dadi and Gungun


Nephew Pritesh


Golu


Didi


Baccha Party

Friend from Baadni Village




Judwa brothers


Khem Da


My Students - 1


My Students - 2


My Students - 3


Friday, 16 June 2017

~ मुनस्यारी में काँच की समस्या ~

                              मुनस्यारी में ये एक ऐसी समस्या आ खड़ी है जो दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, और आश्चर्य की बात ये है कि इस ओर किसी का ध्यान भी नहीं जा रहा है। मुनस्यारी में रोज औसतन 20 से 25 हजार रूपए की शराब बिकती है। लोग शराब पीते हैं और बोतलें कहीं एक जगह किसी कमरे में या होटलों में इकट्ठा होती जाती है। कुछ लोग बोतलें कहीं भी फेंक आते हैं, अब जो फेंकी हुई बोतलें हैं वो या तो पहाड़ों में जहां-तहां गिरी मिल जाती है या फिर गदेड़ी(कचरे फेंकने की जगह) में या फिर नालियों में एकत्र हो जाती है। बारिश होती है और सारा कुछ कूड़ा-करकट बह कर नदियों तक चला जाता है। लेकिन इस बहाव से काँच की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती, काँच का प्रतिशत तो जस का तस बना ही हुआ है, या यूं कहें कि बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन कोई भी इस समस्या को एक समस्या के तौर पर देख नहीं पा रहा है।
                               काँच की ये बोतलें समस्या इसलिए बन गई है क्योंकि बोतलें मुनस्यारी आ तो रही हैं लेकिन यहां से वापस नहीं जा पा रही, रिसाइकल होने का कोई उपाय नहीं दिख रहा। और आखिर कोई इतना बड़ा जोखिम उठाए तो उठाए कैसे। कोई अगर काँच की बोतलें इकट्ठी कर रिसायकलिंग के लिए मुनस्यारी से बाहर यानि 300 किलोमीटर दूर हल्द्वानी भेजने की तोहमत उठाता भी है तो उसे इस काम का मूलधन भी नहीं मिल पाएगा, उल्टे अपनी तरफ से पैसे लगाने पड़ेंगे। 11 से 12 घंटे का लंबा सफर तय कर खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होते हुए काँच की बोतलों से लदी गाड़ी जब मुनस्यारी से हल्द्वानी पहुंचेगी तो आप इस बात का अंदाजा लगाइए कि रास्ते में कितनी बोतलें टूटेगी।

समाधान कैसे हो-
अब कोई साधन-सम्पन्न पुरूषार्थी व्यक्ति या कोई नि:स्वार्थ एनजीओ टाइप का कोई व्यक्ति ही चाहिए जो इस समस्या को गंभीरता से ले। कोई कर्मठ संवेदनशील व्यक्ति ही अब इस समस्या से मुनस्यारी को मुक्ति दिला सकता है। अगर ऐसा कुछ नहीं भी हुआ तो भी आने वाले सालों में आज नहीं तो कल ऐसी नौबत आ ही जाएगी कि मुनस्यारी के नागरिकों को खुद आगे आकर नेतृत्वक्षमता स्थापित करनी पड़ेगी और इस काम को अमलीजामा पहनाना पड़ेगा।


Panchachuli Peak- 1, Munsyari

Thursday, 15 June 2017

~ Himalaya Mysteries ~

हिमालय के ऊपरी इलाकों में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो एक खास किस्म की ऊर्जा से संचालित हैं। जब लोग दस-बीस किलोमीटर की चढ़ाई करके जब ऐसी जगहों पर पहुंचते हैं। तो अचानक ही वे महसूस करते हैं कि उनकी सफर की सारी थकान मिट गई। लोग इस भ्रम में रहते हैं कि उस जगह विशेष की खूबसूरती के कारण ऐसा हो रहा है।
लेकिन वजह तो कुछ और ही है।
असल में जब कोई एक लंबी चढ़ाई कर ऐसे ऊपरी क्षेत्रों में जाता है, तो उसकी भूख,प्यास थकान सब झटके में मिट जाती है। और जैसे ही वो उस जगह से नीचे उतरता है यानि उस जगह से दूर होता है,तो फिर से थकान पैर दर्द और बाकी चीजें दिमाग पर हावी होने लगती है। क्या सिर्फ उस जगह की सुंदरता ही एकमात्र वजह है, नहीं ऐसा नहीं है। असल में कारण छुपा है, उस जगह में हजारों सालों से स्थापित पत्थरों में। कहा जाता है कि पत्थरों की स्मरण क्षमता सबसे अधिक होती है, ऐसा इसलिए कि जो वस्तु अपनी प्रकृति में जितनी ठोस होती है, उसकी स्मरण-शक्ति उतनी तीव्र होती है। इसलिए हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में पत्थर की बनी छोटी-छोटी मूर्तियों की पूजा की जाती है, क्योंकि पत्थरों में असीमित ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता होती है।
न जाने हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में स्थापित पत्थरों में कितनी स्मरण-शक्ति है, क्योंकि इनके पास जाने पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये सालों से असीमित मात्रा में ऊर्जा स्पंदित कर रहे हैं। इसलिए तो इतनी चढ़ाई चढ़ने के बाद भी हम इन जगहों में पहुंचने के बाद एक खास किस्म की सकारात्मक ऊर्जा से संचालित होने लगते हैं। सारी थकान किनारे हो जाती है, और हमारे पांव अपने आप चलने दौड़ने लगते हैं, और हमें चाहकर भी वहां रुकने, थमने या आराम करने का मन नहीं करता, हम प्रकृति की गोद में खेलने लगते हैं।


 

~ Swimming Demonstration in the foothills of himalayas ~

पहाड़ों में तालाब नहीं होते, इस एक वजह से अधिकांश लोग स्वीमिंग चीज क्या है, नहीं जानते। जब इन बच्चों को पता चला कि मुझे स्वीमिंग आती है तो वे सिखाने की जिद करने लगे। 10'C में, वो भी इतने ठंडे पानी में नहाना, मैंने तो पानी छूते ही साफ मना कर दिया। बच्चे इस तरह जिद पर उतर आए कि सब एक-एक करके नहाने के लिए उतर गये मानो किसी भी हाल में सीखना ही है। और फिर ऐसे ही पानी में हाथ पांव मारने लगे। स्वीमिंग सीखने के लिए सारे बच्चे पागल हुए जा रहे थे। मैं वहां पास में एक पत्थर में बैठा हुआ था तो वे मुझसे कहने लगे कि भैया वहीं से बता दो, हम फिर ठीक वैसा-वैसा करते हैं। और फिर उनमें से एक बच्चे ने कहा - भैया सीखा दो न यार, आप फिर कल को चले जाओगे तो हमेशा के लिए याद रखेंगे कि आपसे सीखे हैं। और फिर उस बच्चे की बात सुनकर, उन सबके के जुनून को देखकर मैं भी उतर गया कुंड में।
पानी इतना ठंडा था कि शरीर सुन्न हो जाता, साथ ही लाल पड़ जाता, इसलिए हर पांच- दस मिनट में शरीर को गर्म करने के लिए हम सबको पानी से बाहर आना पड़ता। कुछ इस तरह हम घंटों तक इस ठंडे पानी में नहा दिए।
आप पानी को देखिए, बहता हुआ पानी है और ये पानी इतना साफ है कि आसानी से पिया जा सकता है, शहरों में फिल्टर किए पानी से कहीं ज्यादा शुध्द और मीठा।

Location - Bharadi River (tributary of goriganga), Bharadi Mandir, Munsyari



 

Friday, 19 May 2017

कच्चि - पहाड़ी शराब

                       कच्चि उत्तराखंड में बनने वाली स्थानीय शराब है। कच्चि चावल को सढ़ाकर(किण्वन) बनाया जाता है। जितना लंबे समय तक ढंक के रखा गया उतना असरदार। कच्चि की महक बहुत तेज होती है।
कच्चि दो तरह से बनाई जाती है एक खट्टी और एक मीठी। कच्चि पीने वाले इसका फायदा यह गिनाते हैं कि इससे Metabolism बहुत सही हो जाता है। खट्टी वाली कच्चि ज्यादा असरदार होती है यानि पहली बार पीने वाला तो बस एक ही ग्लास में सरेंडर।
                       वैसे कच्चि हो या अंग्रेजी शराब, दोनों बराबर पहाड़ में परिवार उजड़...ने का, सामाजिक टूटन का कारण बन रहे हैं। घर का पुरुष सदस्य शराब पीकर मस्त है, शराब और फिर जुआ, इस आपाधापी में जमा पूंजी, जमीन, खेती-किसानी सब चौपट और महिला तीन पहर बराबर मेहनत कर रही है, घास काट रही है, पशुधन संभाल रही है, पत्थर तोड़ रही है, चूल्हा चौका भी वही देख रही है।
साल भर पहले पहाड़ की महिलाओं ने कच्चि को बंद कराने के लिए गांव-गांव, घर-घर जाकर एक बड़ा Mass Movement किया।
                       जब ये मूवमेंट चला उससे पहले कच्चि बीस रुपए लीटर मिलती थी। मूवमेंट सफल रहा और चार-पाँच महीने तक कच्चि मिलनी ही बन्द हो गयी। जो लोग अपने घरों में कच्चि बनाते थे, उन्होंने इस मूवमेंट के असर को देखते कच्चि बनाना बंद कर दिया। शराब के शौकीन लोगों ने स्थिति को देखते हुए दूर शहरी इलाकों से महंगी अंग्रेजी शराब मंगवाकर पीना शुरू किया।
समय बीता और फिर धीरे-धीरे कुछ गांवों में जहां की स्थानीय प्रशासन थोड़ी लचर जान पड़ी वहां मिलीभगत कर लोगों ने चोरी-छिपे कच्चि बनाना शुरू कर दिया। जिन गांवों में आज कच्चि बनाना पूरी तरह बंद है, वो पड़ोस के गांव से लाकर पी रहे हैं।
                        शराब के कारण अच्छे-अच्छे घर बर्बाद हो रहे हैं, प्रतिशत आज भी वही है। कच्चि को लेकर जो मूवमेंट हुआ उससे ये हुआ कि कीमत बढ़ गई और आज कच्चि पचास रुपए लीटर बिकती है।




Kacchi (Green colour) garnished with flowers during a festival.

 

Friday, 12 May 2017

~ राहुल ऊर्फ शिकारी ~

                                 राहुल अभी सात साल के हैं। दूसरी क्लास में पढ़ते हैं। मुनस्यारी में मेरे सबसे खास दोस्तों में से एक राहुल भी हैं। वे रोज मेरे पास पढ़ने आते हैं, दिन में दो बार मिलने आ ही जाते हैं। उन्हें मेरे कैमरे से बड़ा लगाव है। अब तो वो फोटोग्राफी करना भी लगभग सीख चुके हैं। राहुल के गांव का नाम वल्थी है,हां वल्थी, पहली बार ये नाम मैंने राहुल से ही सुना, पता नहीं पहाड़ी गांवों के इतने खूबसूरत नाम आखिर किसने रखे होंगे। राहुल शुरू से मुझे मामू बुलाते ...हैं, उन्होंने ये रिश्ता कैसे बना लिया मुझे नहीं मालूम, पर वो पहले दिन से मुझे मामू पुकारते आ रहे हैं।
                                 मुनस्यारी में राहुल को लगभग हर कोई शिकारी कहकर बुलाता है। एक बार मैंने खुद राहुल के पापा को ये कहते सुना- और मेरे शिकारी, कहां घूम रहा है। मामी चाची लगभग सब कोई राहुल को शिकारी ही बुलाते हैं। एक मैं ही हूं जिसने आजतक कभी उन्हें शिकारी कहकर नहीं बुलाया। वैसे राहुल को शिकारी बुलाने के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है।
                                साल भर पहले की बात है। राहुल ने एक उड़ती चिड़िया को पत्थर मारकर गिरा दिया, तब से राहुल का नाम शिकारी पड़ गया। अब पता नहीं राहुल ने निशाना लगाकर मारा था या ऐसे ही गलती से पत्थर फेंकते किसी उड़ती चिड़िया को लगा हो। लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों राहुल को लोगों के द्वारा ऐसे शिकारी पुकारा जाना मुझे थोड़ा भी ठीक नहीं लगता, इतना नागवार गुजरता कि कुछ उसके साथ खेलने वाले बच्चों को रोज समझाता कि इसे राहुल ही बोलना नहीं तो मार पड़ेगा समझे ना।
क्योंकि नाम एक ऐसी चीज है जो जीवन भर पीछा नहीं छोड़ती। एक बार बचपन में कोई नाम कहीं से पड़ गया, चाहे वो कितना भी भद्दा, अटपटा सा क्यों न हो, उसे अगर जल्दी से रोकने का कोई उपक्रम नहीं हुआ तो फिर जीवनपर्यन्त उस नाम को ढोना पड़ता है। जब तक सोचने जानने की समझ विकसित होती है तब तक अमुक नाम हमारे व्यक्तित्व की पहचान बन चुका होता है।
 
~ Stories from Himnagri ~
 
Rahul and his snowball

~ Mitali ~