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Friday, 19 January 2018

रफ कॅापी Part - 5

अनिरुद्ध - कैसी हो तुम?
शालिनी - ठीक हूं आप कैसे हो?

अनिरुद्ध - मैं भी बढ़िया।
शालिनी - एक बात बोलनी थी, बोल लूं?
अनिरुद्ध - हां।
शालिनी - आप थोड़ी कुछ दुआ कर दो प्लीज! मेरे लिए।
अनिरुद्ध - ठीक है लेकिन किसलिए।
शालिनी - बस कर दो मेरे अच्छे के लिए, ऐसा सोचकर।
अनिरुद्ध - अच्छा जी। कर दूंगा। पर मैं ही क्यों?
शालिनी - देखो दुनिया में दो ही चीजें होती हैं एक सही और दूसरा गलत। मैं सही हूं, सही की जरूरत महसूस हुई है और मुझे आप सही लगते हैं इसलिए कह रही हूं। आप कर दोगे ना?
अनिरुद्ध - हां जी पक्का। अच्छा मिंजो एक बात बतानी थी।
शालिनी - बताओ।
अनिरुद्ध - मुझे तुम्हारे गाँव का सपना आया था, मम्मी और बड़का जी साथ थे, चौमास लगा हुआ था, मौसम काफी बिगड़ रखा था, हम शायद पूजा के लिए तुम्हारे गाँव जा रहे थे। मैंने जाने को मना किया तो बड़का जी ने जिद करके मुझे अपने साथ ले लिया।
शालिनी - चल झूठ्ठे। आपको जरूर किसी ने बताया होगा हमारे गाँव के पूजा के बारे में, अभी सप्ताह भर पहले हुई थी पूजा।
अनिरुद्ध - सच कहता हूं, सपने में आया गाँव। मुझे क्या मस्ती चढ़ी है कि तुम्हारी मम्मी के साथ पहाड़ चढूं। हद है।
शालिनी - हां तो अच्छी बात है। अगली बार यहां आओ तो मम्मी जी के साथ चले ही जाना गाँव। रास्ते भर भूत और देवी-देवताओं की पूजा की कहानियां सुनाएंगी। हेहे।
अनिरुद्ध - अच्छा ये बताओ इस बार रोहड़ू के मेले में जाना हो रहा कि नहीं?
शालिनी - मैं नहीं जाऊंगी इस बार। पिछली बार बहुत भीड़ हो रखी थी। मुझे ठीक नहीं लगता अब जाना।
अनिरुद्ध - मैं जाने की सोच रहा था। कुछ यहां दिल्ली के दोस्त भी जाने का मन बना रहे थे उन्होंने कभी देखा नहीं है वहां का मेला, शायद उन्हीं के साथ आऊंगा।
शालिनी - तो घर नहीं आओगे?
अनिरुद्ध - पता नहीं।
शालिनी - मुझे मिलना था।
अनिरुद्ध - क्यों?
शालिनी - बस एक बार मिलना है। बहुत कुछ बातें बतानी है। जो इतने लंबे समय से छुपी हुई हैं।
अनिरुद्ध - जो शालिनी पिछले छ: महीनों से मेरा फोन तक नहीं उठाती थी उसे अब मुझसे क्यों मिलना है।
शालिनी - उस समय चीजें अलग थी। अभी हालात बदल गये हैं। मिलकर ही सब बता पाउंगी। अभी ऐसे फोन पर कहूंगी तो आप संभाल नहीं पाएंगे। इसलिए खुद को रोकती हूं।
अनिरुद्ध - पर ऐसा क्या है बोल भी दो। कुछ तो बताओ।
शालिनी - अभी नहीं। आप रोहड़ू के मेले से रिकांग पियो लौट आना न। फिर बताऊंगी।
अनिरुद्ध - ठीक है मैं देखता हूं, कोशिश करूंगा कि इस बार ज्यादा छुट्टियां मिल जाए।
शालिनी - तो, आप आ रहे हैं।
अनिरुद्ध - हां, मैं आ रहा हूं।
शालिनी - मिलेंगे, मिलेंगे।
अनिरुद्ध - मिलेंगे, मिलेंगे।
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To be continued..

Wednesday, 8 November 2017

ROUGH COPY - A Short Love Story, Part-4

रफ काॅपी - Part 4

लगभग महीने भर के बाद ----

अनिरूद्ध - हैलो, शालिनी कैसी हो? मैं बोल रहा हूं अनिरूद्ध।

शालिनी(गुस्से में) - ठीक हूं। फोन रखो। क्यों काॅल किया?

अनिरूद्ध - मैं तुम्हारे शहर में हूं।

शालिनी - पर मैं नहीं हूं।

अनिरूद्ध - सच कह रही हो? मैंने तो तुम्हें देखा आज।

शालिनी - किसी और को देखा होगा। मैं मौसी के घर हूं।

अनिरूद्ध - अच्छा! फिर वो स्कार्फ में कौन था?

शालिनी - कहा न मैं नहीं हूं अभी हिमाचल में। खामखां तुम्हें गलतफहमी हो रही है।

अनिरूद्ध - ओ! सुनो स्कार्फ डालकर घूमने वाली, तुम्हारी आंखें अभी भी पहचानता हूं। साल भर बाद देख रहा हूं तो क्या भूल जाऊंगा। मुझे पता है तुम हिमाचल में हो।

शालिनी - हां हूं हिमाचल में। तो क्या हुआ?

अनिरूद्ध - कुछ नहीं हुआ यार। एक बात कहनी है।

शालिनी - कहो?

अनिरूद्ध - दूर हो जाओगी, छुप जाओगी, कभी दिखाई न दोगी फिर भी उस स्कार्फ का रंग कैसे बदलोगी। मैं तो उस कपड़े के रंग को आज भी पहचानता हूं। ठीक है चलो बदल लेना स्कार्फ, कोई दूसरे रंग का ले लेना, लेकिन अपनी उन आंखों को कैसे छुपाओगी जो तुम्हारी पहचान है। मैं तो उन आंखों को देखते ही पहचान लेता हूं।

शालिनी - हां तो क्या करूं, घर से निकलना छोड़ दूं। इस बात के लिए कि तुम मुझे पहचान लेते हो।

अनिरूद्ध - तुम्हें जहाँ जाना है जाओ मुझे इसमें क्या आपत्ति क्या हो सकती है, वैसे भी कुछ दिन में वापस दिल्ली लौट जाउंगा। पर मुझसे यूं झूठ तो मत बोला करो। हां अब से तुम्हें झूठ बोलना ही होगा तो कोई ऐसा तरीका ढूंढ लेना जिससे कि मैं तुम्हारी आंखें भी ना देख पाऊं।

शालिनी - तुम आंखें न देखने की बात कहते हो। मेरा बस चले तो मैं ये स्कार्फ भी ना पहनूं। हिमाचल में वैसे भी कौन सा प्रदूषण है जो मुझे स्कार्फ की जरुरत होने लगी।

अनिरूद्ध - अच्छा! ये तो अच्छी बात है तुम्हें गलती से कभी देख लिया करूंगा मैं। मत पहनना स्कार्फ।

शालिनी - ओह! इतना आसान है क्या। तुम लोगों ने बिना स्कार्फ के घूमने लायक माहौल बनाया है हम लड़कियों के लिए जो इतनी बड़ी बात कह रहे।

अनिरूद्ध - मैं कौन होता हूं माहौल बनाने बिगाड़ने वाला। मुझे तो यही लगता है कि स्कार्फ त्वचा की सुरक्षा के लिए होता है अब ये तुम कुछ नया बता रही हो।

शालिनी - हां भई, हर कोई साल भर त्वचा की सुरक्षा के लिए ही पहनता है। हमें तो मानो जैसे कोई समस्या ही नहीं है इन घूरने वालों की बिरादरी से। तुम अपने सोच के दायरे को पर्यावरण प्रदूषण तक ही सीमित रखना। वरना भारी काम हो जाएगा। इतना मत सोचने लग जाना हमारे बारे में। होना वैसे भी कुछ नहीं है। बस कानून बनवाते रहना हम लड़कियों की सुरक्षा के लिए। बस यही कर सकते हो।

अनिरूद्ध - सुनो मैं किसी को नहीं घूरता। बिरादरी में पता कर लेना। हां मानता हूं वो एक समय था जब कभी  घूर लिया करते थे पर अब ये हरकतें नहीं करता मैं, ठीक है।

शालिनी - वाह वाह! तो अपनी बिरादरी में बाकियों को भी थोड़ा गुरू मंत्र दे दिया करो।

अनिरूद्ध - सबके अपने-अपने शौक हैं, नजरिए हैं, मानसिकताओं की जकड़न है। जिसकी जैसी कंडिशनिंग होगी वे उस हिसाब से बर्ताव करें। अगर उन्हें घूरना ठीक लगता हो तो फिर मैं कौन होता हूं, मेरा औचित्य शून्य है। हां जब कभी उन्हें अटपटा लगे, वो खुद अपना सही गलत देख लें। अब इसमें मैं किसी को क्यों परेशान करूं। मैं क्यों किसी की बैचेनी बनूं। तुम इसे रहने दो। कुछ और बात करो।

शालिनी - कब जा रहे?

अनिरूद्ध - कल सुबह की बस है।

शालिनी - फिर कब आओगे?

अनिरूद्ध - पता नहीं।

शालिनी - अच्छा एक बात सच-सच बताओ, मेरे बारे में सोचते हो?

अनिरूद्ध - हां।

शालिनी - ठीक है, तुम्हें सोचना भी चाहिए।

अनिरूद्ध - हां, और तुम्हें भरोसा रखना चाहिए।

शालिनी - सब कुछ अब तुम पर निर्भर करता है। ठीक है चलो रखती हूं, अच्छे से जाना।

अनिरूद्ध - हां, ठीक है। अलविदा।

शालिनी - अलविदा।
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To be Continued ...

Saturday, 14 October 2017

रफ कॅापी Part - 3

महीने भर के बाद अनिरुद्ध फिर शालिनी को फोन लगाता है।

अनिरुद्ध - शालिनी प्लीज फोन मत काटना, दो मिनट के लिए मुझे सुन लो कि मैं क्या कहना चाहता हूं फिर तुम्हारी मर्जी। विनती कर रहा हूं बस एक बार के लिए मुझे अपनी बात पूरी करने दो।

शालिनी - ठीक है बोलो।

अनिरुद्ध - तुम मेरे सपने में आई थी। पता है सपने में तुम बहुत खूबसूरत लग रही थी। तुमने गुलाबी और सफेद रंग का कोई ड्रेस पहना हुआ था।  हम दोनों साथ में कहीं घूमने निकले थे, हम किसी बड़े से झरने के आसपास थे, वहाँ हम दोनों बैठकर बातें कर रहे थे, तुम बार-बार पलकें झपकाकर मुस्कुरा रही थी, तुम बहुत खुश थी मुझसे बात करके। अब ऐसा हो रहा था कि तुम बार-बार झरने को देखकर और उसकी आवाज को सुनकर आंखें बंद कर लेती थी और मैं फिर तुम्हें चुपके से देख रहा था, जो सुकून तुम्हें उस झरने से मिल रहा था, वो मुझे तुम्हें देखकर मिला। एक पल के लिए लगा कि कोई तितली किसी फूल पर बैठी हुई है और हिलने का नाम तक नहीं ले रही। मेरा मन कर रहा था कि धीरे से उस तितली को छू लूं और हमेशा के लिए अपने पास रख लूं।
सपने के दरम्यान मैं बार-बार प्रभु से यह प्रार्थना कर रहा था कि काश ये सिर्फ एक सपना मात्र न हो। लेकिन उठा तो समझ आया कि मैं एक दूसरी ही मायावी दुनिया का हिस्सा था।
इस सपने में आकर तुमने मेरे जहन में ऐसे भाव भर दिए हैं कि मुझे अभी तुम्हारे अलावा कुछ भी नहीं सूझ रहा। समस्त रिक्तियों को भरकर मानो तुम्हारे प्रेम ने मुझे अपने अंतर में रोक कर रख लिया है। सारी उर्जा, मन के सारे भाव और संवेदनाएँ हर जगह तुम अपना अधिकार जता रही हो। ऐसा लगता है कि तुमने मुझे एक ठहराव की ओर खींच लिया है, और उस ठहराव में सिर्फ तुम और मैं।
शालिनी तुम अभी भी मेरी आंखों के सामने झूल रही हो। मुझे नहीं पता कि भाग्य को क्या मंजूर है लेकिन मैं तुम्हें अपनाकर ही रहूंगा।

शालिनी - तो अपना लीजिए न मुझे किसने रोक रखा है। और एक बात याद रखिएगा आपके ऐसे सपनों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मैं इन सब मामलों में अब नहीं बहने वाली, इन सब बातों से मेरा ह्रदय नहीं  पिघलने वाला, बल्कि मुझे तो तकलीफ होती है। आप सपनों की ऐसी बातें कर मुझे कमजोर कर देते हैं, मेरा मन छोटा हो जाता है। ऐसे सपनों का जिक्र कर मुझे एक खोखली उम्मीद की ओर ना धकेलें तो इसी में मेरी  भलाई है। आप बिना कुछ कहे मुझे अपना लें मैं सिर्फ इतना ही तो चाहती हूं।

अनिरुद्ध - ठीक है। पर मैंने जो सपने में देखा वही बात तुम्हारे सामने रखी है। मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं अगर तुम्हें बताता नहीं तो मेरे अंदर ये बातें रह-रहकर मुझे परेशान करती, इसलिए मैंने तुम्हें बताना जरूरी समझा। मैं नहीं कहता कि तुमसे अपनापन मिलने की उम्मीद में ये सब कह रहा हूं। जब लगा कि दिल भारी हो गया है नहीं बता पाया तो मन मसोस कर रह जाऊंगा। इसलिए मैंने बता दिया।

शालिनी - बहुत अच्छा किया आपने। आपको तो मानो एक मौका मिल गया और इस सपने के माध्यम से आपने अपनी भावनाएँ मेरे सामने रख दी। आप बड़े हिम्मतवाले जान पड़ते हैं तभी आप इतना कुछ कर लेते हैं पर क्या आप कभी ये सोचते हैं कि मेरे मन में कितने भाव उमड़ते होंगे, कितनी ऐसी बातें हैं जो मुझे तंग करती है, कितने ऐसे मौके आते हैं जहाँ लगता है कि काश आप पल भर के लिए मेरे पास होते तो क्या हो जाता, मैं कितनी परेशान होती हूं, मुझे कितनी पीड़ा होती होगी ये तो मैं आपकी तरह बोलकर बता भी नहीं सकती। स्त्री हूं, सब झेल लूंगी मैं, मेरे प्रभु ने मुझे इतनी ताकत दी है।

अनिरुद्ध - ठीक है मान लिया कि मैं तुम्हारी पीड़ा समझ पाने में असमर्थ हूं। पर रोज तुमसे बात करने की जिद भी तो नहीं करता। और अगर मैं सप्ताह में या महीने में कभी बात कर लेता हूं तो इसमें क्या बुराई है।  माना कि हम दोनों के जीवन में अभी अधूरापन है और हमारे बीच दूरियां हैं। पर इस एक बात को लेकर हम दोनों एक-दूसरे को और कितनी चोट पहुंचाएंगे। इसीलिए मैं बात कर लेता हूं कि हम दोनों को थोड़ी खुशी मिले।

शालिनी - खुशी? क्या अब आप मुझे रूलाना चाहते हैं। मुझे नहीं पता आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। अब सुनिए मुझे आपसे बात करके खुशी नहीं मिलती, उल्टे मेरा मनोबल टूटता है। आप मेरे से दूर हैं, मुझसे बात नहीं करते हैं, ये मेरी ताकत है। मैं उम्मीद करती हूं आप समझेंगे। अब आप फोन रख सकते हैं। मुझे कुछ काम है।

अनिरुद्ध - सुनो, एक आखिरी बात। फिर फोन रख लेना। आज ब्लाक मत करना, प्लीज।
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और फिर हमेशा की तरह शालिनी फोन काट देती है। नंबर ब्लाक कर शालिनी फिर से अपनी दुनिया में वापस लौट जाती है।

क्रमशः .....

Monday, 25 September 2017

रफ कॅापी Part - 2

महीने भर बाद अनिरुद्ध फिर एक दूसरे नंबर से शालिनी से बात करने का प्रयास करता है। तीन चार बार मनाने बुझाने के बाद शालिनी उसकी बात सुनने को राजी हो जाती है।

अनिरुद्ध - तुम मेरे लिए इतना समर्पित हो। मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करता हूं। पर अभी कहीं से भी मैं इसको संभालने की स्थिति में नहीं हूं ये तुम भी समझती हो। मेरे ऐसे समय में तुम्हारा बेमन से मुझसे बातें करना मुझे ठीक नहीं लगता। तुम इतना गुस्सा क्यों करने लग जाती हो। फिर जब मैं बात नहीं करुंगा  तो फिर दुखियारी की तरह आंगन में बैठे मुझे याद करने लगोगी। क्यों बेवजह इतनी तपस्या करती हो। खुशी-खुशी बात कर लिया करो।

शालिनी - आपने इस बीच मेरी खामोशी नहीं समझी है तो फिर बात करने का फायदा ही क्या है। आप किस तरह से मुझसे बात कर रहे हैं आप देख लीजिए। कहीं से भी नहीं लगता कि आप मेरे हालात को समझ भी पा रहे हैं। मेरे मन में जो आपके प्रति भावना बस चुकी है वो अब सांस छीनते तक जायेगी नहीं, आप फैसला कर लीजिए आप मेरा ये प्रेम संभाल पायेंगे या नहीं। मानती हूं आप पर बड़ी जिम्मेवारियां हैं, लेकिन आप ये भी तो देखिए कि आप बड़े-बड़े फैसले ले लिया करते हैं और यूं चुटकियों में सब ठीक भी कर लेते हैं, लेकिन जैसे ही मेरी बात आती है पता नहीं आपको क्या हो जाता है। आप मुझे लेकर इतने ढीले क्यों पड़ जाते हैं मुझे समझ नहीं आता।

अनिरुद्ध - मैं ढीला नहीं पड़ा हूं। पहाड़ का खून आज भी मेरे रगों में उतना ही बहता है जितना पहले था। रूंजू-चंचल की प्रेम कहानी की तरह मैं भी जीवन के उतार-चढ़ाव, सारे बहाव झेल लूंगा। पर समय के खेल को मैं समझ नहीं पाता इसलिए कहता हूं कि तुम किसी को हां कर अपना जीवन बसा लो यानि और कितना इंतजार। तुम्हारा ऐसे खामोशी से इंतजार करना मुझे डराया है। कितनी यातनाओं से, लड़ाईयों से, घटनाओं से मैं आये रोज गुजरता रहता हूं, कितनी अनिश्चितताओं से भरा ये मेरा जीवन हो चला है, तुम इस बात को खूब समझती हो। और शालिनी तुमने जो ये जिद पकड़ ली है कि मैं कितने भी साल इंतजार कर लूंगी ये आज के समय में कहीं से भी मुझे ठीक नहीं लगता और ये रफ कापी को हटा दो हमारे बीच से। बचकानी हरकत के सिवा और कुछ नहीं लगता मुझे ये। ऐसी छिछली भावनाओं से तुम्हें सिवाय तकलीफ के और कुछ नहीं मिलेगा।

शालिनी - मेरी मर्जी मैं जो भी करुं उस रफ कापी के साथ। आप कौन होते हैं मुझे नीति सिखाने वाले। आप सिर्फ बातें बना रहे हैं और मुझे पता है आप मेरे शहर को कभी नहीं लौटेंगे, हां अब तो मैं ऐसे ही कहूंगी, इसे ही आज से आखिरी सच मान कर चलूंगी।
और ये रफ कापी इससे आपको क्या दुश्मनी है। यही तो आपकी एकमात्र निशानी है इसे अगर मैंने अपनी खुशी के लिए रखा हुआ है तो आपको क्या तकलीफ है।सुनिए, अब आप मेरे शहर को लौटेंगे तो भी मैं न मिलूंगी, क्योंकि मैं भी अपना शहर छोड़ चुकी हूं,मर जाऊंगी पर अपना सही पता नहीं बताऊंगी। देख लीजिएगा आप ढूंढते रह जाएंगे फिर भी न मिलूंगी।

अनिरूध्द - मैं क्यों ढूंढने लगा तुम्हें? और तुम्हें अगर उस कापी में मेरी झलक मिलती है तो अकेले संभालो, इससे ज्यादा और कुछ नहीं।

शालिनी - तो फिर आज के बाद कभी मत पूछिएगा कि मैंने वो कापी रखा है या नहीं। ये सोच लीजिएगा कि मैंने वो कापी जला दी है।
अब रखिए फोन, मत कीजिएगा मुझसे बात। मैं नंबर ब्लाक करते-करते थक चुकी हूं।
और फोन फिर से कट जाता है।
और शालिनी के ब्लाक लिस्ट में फिर से एक नया नंबर आ जाता है।

Thursday, 14 September 2017

- रफ कॉपी - Part 1

                             ये लघु प्रेम कथा अनिरुद्ध और शालिनी की है...दोनों हिमाचल के किन्नौर में रहते हैं। किसी कारणवश दोनों अलग हो चुके हैं। या यूं कहें कि वे एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से कभी मिले ही नहीं। लेकिन एक रफ कॉपी ने इनके मध्य एक रिश्ते को कायम कर दिया है।
...
एक दिन अनिरूध्द शालिनी से कहता है - सच बताना क्या तुमने अभी भी वो रफ कॉपी संभाल कर रखी है?
शालिनी - हां।

अनिरूध्द - पर क्यों?

शालिनी - मुझे पसंद है।

अनिरूध्द - अच्छा! मैंने तुम्हें कुछ दिन इतिहास पढ़ाया था उस कॉपी में, वो सब्जेक्ट भी ऐसा जिससे तुम्हें बिल्कुल भी लगाव न था फिर भी।

शालिनी - हां फिर भी। मुझे पसंद है तो है। मैं हमेशा अपने पास रखती हूं, अभी महीने भर के लिए मामा के घर गई थी तो भी अपने साथ लेकर गई थी। खैर,आप नहीं समझेंगे।

अनिरूध्द - समझाओ।

शालिनी - हर बात बोलकर कही नहीं जाती। ये रफ कॉपी मेरे लिए सिर्फ एक कॉपी नहीं है।

अनिरूध्द(नाराज होकर) - मेरे ख्याल से इस बात को एक साल हो चुके हैं, इस बीच कोई बातचीत नहीं, कोई पता नहीं, सब तरफ से तुमने मुझे ब्लाक कर रखा है। किसी नये नंबर से संपर्क करने की कोशिश करता हूं तो भी ब्लाक। और आज इस रफ कॉपी के सहारे इतनी भावनाएँ क्यों उमड़ रही है?

शालिनी - एक साल, इस एक साल में एक भी दिन ऐसा नहीं था कि मैंने इस कॉपी को अपने से अलग किया हो और आप मुझ पर शक कर रहे हैं। हां किया ब्लाक मेरी मर्जी, पर छुपकर किसी दूसरे की आईडी से हमेशा आपको देखा करती थी, और ये रफ कॉपी, ये साल भर से मेरे तकिए के पास ही रहता था, आज भी है। छोड़िए, मैं आपको कितनी बातें बताऊं, और बोलकर सब कुछ खराब नहीं करना चाहती। आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें तो बेहतर होगा। मुझे और कोई बात नहीं करनी।

अनिरुद्ध - अच्छा ठीक है,पर मेरी एक बात सुन लो।
..
...
.....
और इससे पहले कि अनिरूध्द कुछ कहता, फोन कट जाता है।
स्वाभिमान से परिपूर्ण शालिनी के ब्लाक लिस्ट में आज फिर से एक नया नंबर आ चुका है।

Friday, 19 May 2017

~ आंटीजी को पत्र ~

आंटी जी,
आपके बेटे ने दसवीं की परीक्षा दी है। वो पिछली बार फेल हो गया था। और फिर क्या हुआ आप भी जानती हैं, ट्रक में बैठ के महीने भर के लिए घर से भाग गया। वापस आया तो फिर वही ताने और मार से उसका स्वागत किया गया। आप भी क्या करेंगी, आप खुद ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, न तो जमीनी समझ है न ही अपने बच्चे की काउंसलिंग करने की कोई जानकारी है। वो क्या सोचता है, क्या करना चाहता है, ये आपको नहीं पता, और इत्तफाक से मुझे भी नहीं पता। बेशर्मों की तरह आप लोगों से सुनता है, मार खाता है, कुल मिला के निर्लज्ज हो चुका है।
और हां शराब, सिगरेट बराबर पी रहा है।
आपको भी पता ही होगा कि वो ये सब कर रहा है, लेकिन आपने प्रत्यक्ष रूप से उसे पकड़ा नहीं तो आप भी पढ़ाई के नाम से उसे डांट लगा कर काम चला रही हैं।

मैंने उसे महीने भर मुफ्त में पढ़ाया और आपने मुझे कभी-कभार अपने घर में खाने का न्यौता दिया, बस काफी है इतना। इस बीच मैंने उसे रगड़ा, खरोंचा, उसके अंदर झांका, कि कुछ तो काम का बाहर निकले पर अभी फिलहाल सब धुंधला है। लेकिन ये बात स्पष्ट है कि आपके बेटे की पढ़ाई में थोड़ी भी रूचि नहीं है, इस बात को आप गांठ बांध लीजिए।
वो कभी-कभी धंधा-बिजनेस करने की बात छेड़ते रहता है, वो भी मजाक में। लेकिन मुझे वहां आशा की किरण दिखाई देती है। लोग बच्चों को शिक्षा देने की बात करते हैं, लेकिन मैं आज आपसे कहना चाहता हूं कि आप उसकी पढ़ाई छुड़वा दीजिए। फालतू पैसे व्यर्थ मत करिए, उसका पढ़ने का मन थोड़ा भी नहीं है।

सुनिए,
आज आपके शहर में हूं, कल कहीं और रहूंगा, मेरा कोई निजी स्वार्थ तो है नहीं, इसलिए मुझे आपके बेटे से उसकी पढ़ाई से कोई मतलब नहीं है, लेकिन आपको जमीनी हकीकत बताना मेरा दायित्व है। आपका बेटा एकदम खोखला है, खासकर पढ़ाई के मामले में एकदम डब्बा। उसे जोड़ घटाना तक ढंग से नहीं आता।
मेरी राय में आप उसे अभी से बिजनेस लाइन में डाल दीजिए, पूरा एक रूपांतरण हो जाएगा, खाली बैठे शराब सिगरेट कर रहा है, कुछ तो कर्त्तव्यबोध आएगा। कमाने का एक दायित्व हमेशा रहेगा तो शायद कल को नशा पानी भी एक सीमा में रहे।
हां खींचतान करके 12th तक ले जाना चाहती हैं तो ठीक है, एक टैग रहेगा कि चलो बारहवीं के बाद ही पढ़ाई छोड़कर काम धाम में लग गया।

और रही बात कि उसके इस बार के दसवीं के पेपर की, इसमें कोई शक नहीं कि इस बार फिर से वो फेल हो जाए, गिरते-पड़ते पास हो भी जाए तो भी कोई मतलब नहीं है।
मैं इस बात की गारंटी दे नहीं सकता कि महीने भर मेरे से पढ़के वो दसवीं में पास हो जाएगा, वैसे भी मैं कोई सब्जेक्ट स्पेश्लिस्ट तो हूं नहीं लेकिन मैं इस बात की गारंटी लेता हूं कि अगर वो फेल हो गया तो भी इस बार वो घर से भागने वाला काम नहीं करेगा।

पढ़ाई से इतर मैंने उसमें जीने की, आगे बढ़ने की लालसा भर दी है, मेरा योगदान सिर्फ इतना सा है।

Thursday, 2 March 2017

~ दीपा और मानसी -3 ~

साल 2051,
दीपा और मानसी की 10th की परीक्षा हो चुकी है। आज दीपा और मानसी शहर को जा रहे हैं। मानसी तो पहले जा भी चुकी है। लेकिन दीपा के लिए सब कुछ नया है। दीपा शहर को अपनी आंखों से तराश रही है, उसके मन में अभी तक किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट नहीं आई कि इतना बड़ा शहर, इतने सारे लोग, इतनी गाड़ियां वगैरह।
दीपा मानसी के कंधे पर हल्का मारती है और एक ट्रक की तरफ इशारा करते हुए कहती है, इसे देख कितना कचरा लिए जा रहा है, हेहे, यहां शहर में ट्रकें इसी काम में आती हैं क्या? हमारा तो पूरा गांव महीने भर में इतना कचरा इकट्ठा नहीं करता होगा।
मानसी के बाबा ने कहा - बेटा, शहर आकर लोगों की भूख बढ़ जाती है इनका पेट(माइंडसेट) बड़ा हो जाता है, इनकी जरूरतों की कोई एक निश्चित सीमा नहीं होती। इनके शौक एवं विलासिता मूल्य अथाह होते हैं। तब कहीं जाकर तो इतना कचरा इकट्ठा होता है। और इस पूरी प्रक्रिया में शहर के लगभग हर नागरिक की भागीदारी होती है।

मानसी - बाबा ऐसा न बोलिए आप,  इतना बड़ा शहर है, इतने जिम्मेदार लोग, अफसर वगैरह सब तो यहीं रहते हैं, इतने कचरे के लिए कोई एक सही जगह सुनिश्चित होगी, वहीं जाकर ये कचरा गिराते होंगे, इसका कुछ न कुछ प्रबंधन तो होता ही होगा।

मानसी के बाबा- हां क्यों नहीं। होता है, लेकिन कितने लोग समझेंगे। सबका कचरा ट्रकवाले तक पहुंचता कहां है, गलियों में बिखरा पड़ा रहता है, जहां कोई खाली जमीन दिखती है, वो कुछ ही दिनों में कचरे से पाट दिया जाता है, हालात ऐसी हो जाती है कि न तो वहां से गुजर सकते हैं, न ही उसे एक दिन में साफ किया जा सकता है। हालत ऐसी है फिर भी ट्रक वाले कचरा लोड करते परेशान से रहते हैं कि एक दिन में आखिर और कितना कचरा लोड करते रहें, वो परेशान सिर्फ काम को लेकर नहीं है, वे परेशान इसलिए भी रहते हैं कि आखिर ये कचरा थोड़ा कम क्यों नहीं हो जाता, वे लोगों की बढ़ती भूख और असीमित हसरतों से परेशान हैं।

दीपा - ठीक है बाबा। लेकिन न आप मानसी को यहां मत रखना। यहां रहकर कैसे पढ़ेगी। इसका भी दिमाग खराब हो जाएगा। आप ही देखो, ये देखो सामने इस चौराहे में कितनी धूल उड़ रही है फिर भी ये स्कूली बच्चे, नौजवान और ये गुजरते वृध्दजन हर कोई कितना खुश है, चेहरे देखिए इन सबके, मानो ये धूल इन सबके जीवन का हिस्सा बन चुका है।

मानसी के बाबा - बेटा हमारे गांव के आसपास के क्षेत्र में पढ़ाई की और कोई उचित व्यवस्था भी तो नहीं है। इस शहर के अलावा और जाएं भी तो कहां जाएं। आगे की पढ़ाई करनी है, तो अब ये सब धूल, प्रदूषण वगैरह को तो नजर अंदाज करना ही पड़ेगा।

थोड़ी ही देर में दीपा और मानसी की आटो एक बड़े नाले से होकर गुजरती है, नाली के पास एक ठेला है, वहीं आसपास बहुत से लोग नाश्ते के लिए रूके हैं, कुछ लोगों ने तो नाली किनारे अपनी कारें भी खड़ी कर रखी हैं, सब मजे से नाश्ता कर रहे हैं।

दीपा(मानसी को दिखाते हुए) - मानसी देख तो, ये लोग पागल हो गये हैं क्या, कैसे इतने गंदे जगह में खड़े होकर खा ले रहे हैं, वो भी इतने सारे लोग। दीपा धीरे से मानसी के कान में कहती है- तू मत रहना बहन यहां, देख न बाबा को मना बुझा के कोई और उपाय करने बोल न, मैं वहां अकेली गांव में रहकर तेरे बारे में सोच-सोचकर पागल हो जाऊंगी, तू यहां रहकर इन्हीं लोगों की तरह हो जाएगी, मुझे इस बात का डर हमेशा दीमक की तरह खाता रहेगा।

मानसी- री पगली! अभी 12th पास होने को पूरे दो साल बचे हैं। तू अभी से इतनी चिंता ना किया कर, शायद दो साल में कुछ बदल जाए, कुछ चमत्कार हो जाए।

दीपा- तू रहने दे। मुझे झूठे दिलासे ना दिया कर। ये इतने सालों से क्या बदल गया है, जो इन दो सालों कोई जादू हो जाएगा। जगह-जगह धूल उड़ रही है, नालियां बजबजा रहीं हैं, नजर खुली रखें तो हर सौ कदम में कचरे का एक ढेर है। और क्या पर्यावरण प्रदूषण की किताबें पढ़ेगें क्या, मैराथन करें क्या हम भी शहर के इन लोगों की तरह, ये देख हाथ निकाल आटो से बाहर, ये धूप से चमड़ी जल रही है, इतनी सी बात समझने के लिए क्या यहां शहर में रहकर पर्यावरण संरक्षण का कोर्स करेगी। तुझे जो करना है कर मानसी, अब न रोकूंगी, न ही इस बारे में अब कुछ कहूंगी।

मानसी - तू चाहती क्या है मैं क्या करूं। आगे पढ़ना भी तो जरूरी है। गांव में रहकर क्या होगा, चूल्हा-चौका संभालते ही दिन कट जाएंगे और फिर एक दिन शादी हो जाएगी। तू बोल न दीपा मेरे पास और क्या रास्ता है मैं आखिर करूं भी तो क्या करुं। ये हमारे महान पूर्वजों ने ये ऐसा शहर हमारे सामने खड़ा कर दिया है, हम बेबस हैं, अब जो भी यही है। खुद को इन सबसे अलग करेंगे तो कल को भूखों मरेंगे। बोल न दीपा तू चुप क्यों हो गई? बोल न मैं क्या करूं?

दीपा - सब बोल तो दिया मानसी, नाराज हो सकती हूं, तुझे रोक तो नहीं सकती न, हमारे साफ-सुथरे जंगलों में तेरे लिए कालेज तो नहीं खुलवा सकती न, तुझे जैसा ठीक लगे वो करना, खूब तरक्की करना और हां अब इस बारे में मत पूछना, क्योंकि मेरे पास बोलने को कुछ भी नहीं है।

आटो रूक चुकी है, मानसी की बुआ का घर आ चुका है।

क्रमशः .....

Wednesday, 1 March 2017

~ दीपा और मानसी -2 ~

दीपा - मानसी पता है दादा न कल हम सबको अपने कमरे में बिठा के अपने बचपन के बारे में बता रहे थे।
मानसी - अच्छा! क्या बोल रहे थे।

दीपा - वैसे बहुत लम्बी कहानी है, तू न मुझे बोलने देना।बीच में रोकना मत। नहीं तो भूल जाऊंगी।

मानसी - ठीक है बता तो सही पहले।

दीपा - दादा कहते हैं कि उनका बचपन गांव में बीता। उन्होंने बताया कि जब वे पहली बार 8th क्लास में शहर गये थे तो एक होटल में खाना खाने रूके, वहां एक लड़का हाथ में प्लास्टिक की थैली मुंह में पकड़ा चूस रहा था। दादा ने तुरंत अपने पापा को पूछा कि ये क्या है, तो उस दिन दादा को पता चला कि ये पानी का पाऊच होता है, पता है मानसी उस समय न एक पानी पाऊच सिर्फ एक रूपये का मिलता था।

दादा कहते हैं - मैं उस दिन रात भर सो नहीं पाया, बैचेन होता रहा, मुझे बचपन से यही लगता रहा कि मुझे पानी फ्री मिलना चाहिए, मतलब मैं एक जीव हूं, यानि मैंने एक जीवन धारण किया है तो मैं सांस लेता हूं और जिंदा रहता हूं, उसके बाद मेरी दूसरी बड़ी जरूरत पानी है। और मुझे ये लगता है कि एक इंसान होने के नाते मुझे मुफ्त में पानी मिलना चाहिए। ये मेरा न्यूनतम हक है।
पता है मानसी दादा जब ये सब बोल रहे थे, हम सब कोई ध्यान से कान लगा के सुन रहे थे, एकदम खो से गये थे।

मानसी - हां जैसे मैं खो गयी तेरी बातें सुनके।हेहे। आगे बता न।

दीपा - दादा कहते हैं कि फिर एक दिन उन्होंने पानी की बोतल भी बिकते देखी। जब उन्हें पहली बार पता चला कि पानी की भरी हुई बोतल दस रूपये की बिकती है। तो वे चौंक गये थे। वे अपने बाबा के पास आकर बोले कि ये इतना महंगा क्यों मिलता है, लोग क्यों बेच रहे हैं पानी वो भी इतना महंगा। फिर बाबा ने उन्हें जवाब दिया होगा कि पानी पहले की तरह जगह-जगह मिल नहीं पा रहा है, इसलिए पानी बिकना शुरू हुआ है। फिर दादा ने अपने

बाबा से कहा- हम तो फिर रोज मतलब सौ से दो सौ रुपए तक का पीने का पानी ऐसे ही फेंक लेते हैं। हैं न बाबा?

मानसी - उस समय सब कुछ कितना सस्ता था देख न। तेरे दादा बता रहे हैं कि सौ रुपए तक का पानी ऐसे ही फेंक देते थे, मतलब पानी की दस भरी हुई बोतल। यहां तो आजकल सौ रुपए में मात्र एक ग्लास पानी मिल रहा है। मुझसे तो अब रहा नहीं जाता।

दीपा - हां। मुझे भी उनकी बात सुनके लालच आ गया कि इतना सस्ता पानी पीते थे हमारे दादा लोग। पता है दादा बताते हैं कि उनके समय लगभग आधी नदियां साफ हुआ करती थी। सिर्फ आधी नदियों का पानी ही खराब था। पहाड़ में जितने भी नदी और नौले थे, लोग उसी का पानी पिया करते थे। दादा बताते हैं कि उनके पहाड़ी दोस्तों ने कभी पानी के लिए पैसा नहीं बहाया, उनकी पूरी जिंदगी नदियों, नौलों और झीलों के मीठे पानी से ही गुजरी थी। और तो और पहाड़ी लोग ज्यादा बीमार भी नहीं पड़ते थे। उस समय मतलब पहाड़ों में पानी इतना साफ था कि कोई उतना ध्यान न देता तो भी चलता लेकिन वे अपने आने वाले कल को लेकर हमेशा सचेत रहते। लेकिन मैदानों में तो नदियों का पानी मटमैला होने के बाद भी मैदानी इलाकों के लोग बेसुध से अपनी धुन में मस्त रहते थे।

मानसी - अब मुझे तुझ पर यकीन करने का मन नहीं कर रहा। काश दीपा हम लोग उनके जमाने में जन्म लिए होते। खूब मीठा पानी पीते। सुंदर नदियां देखते, झील देखते, नौले भी देखते। पानी से खेलते।

दीपा - हां और जब तू नदी किनारे किसी पत्थर पर बैठे रहती। मैं तुझ पर पानी छिड़कती। तथास्तु।

मानसी - क्यों घाव पर नमक करती है। आजकल तो पूजा में छिड़कने के लिए और चढ़ावा वगैरह के लिए दुकानों में जो पानी का पैकेट मिल रहा है वो भी कितना महंगा है।

दीपा - अब क्या करें। खरीदना तो पड़ता है। तुझे पता है हमारे दादा लोग के जमाने में एक बोरिंग करके मशीन हुआ करती, उसे हाथों से फेरना पड़ता था, और पानी निकलता था, दादीजी कह रहे थे कि उनका पूरा बचपन हाथ झोंककर बोरिंग का पानी पीकर ही गुजरा है। और तो और वे घंटों बांध और तालाबों में नहाया करते, लबालब पानी हुआ करता था और उतना ही साफ। बताते हैं कि उस जमाने के लड़के गहरे पानी में डुबकी लगाकर एक-दूसरे को छूने का खेल खेलते। आजकल तो हमारे जमाने के लोगों के लिए ये सब किसी सपने से कम नहीं है।

मानसी(हंसते हुए) - सपना ही आ जाए मुफ्त के पानी का, काफी है।

दीपा - तुझे न आएगा मुफ्त के पानी का कोई सपना। आजकल जो उड़ने वाले रोबोट बनने लगे हैं। अब उन्हीं के सपने आएंगे तुझे। वही ले जाएगा तुझे साफ-सुथरी नदियों का पानी दिखाने। हेहे।

मानसी - हां! मेरे बाबा बता रहे थे कि विदेशों में तो ऐसे प्रयोग भी होने लगे हैं। जिनके पास ज्यादा पैसा है वे जब ट्रैफिक में फंसते हैं तो किराए के रोबोट को एक फोन करके बुलाते हैं और फिर रोबोट तुरंत उन्हें उनके आफिस तक उठाकर ले जाता है।

दीपा(हंसते हुए) - हम कब ऐसे उड़ेगें मानसी।

मानसी - हम, हम तोता उड़, मैना उड़ खेलते रह जाएंगे। हेहे।

क्रमशः ....

Monday, 27 February 2017

~ दीपा और मानसी ~

                       दीपा और मानसी दोनों बचपन की सहेलियाँ हैं। एक ही स्कूल में पढ़ती हैं। खास बात ये कि दोनों का जन्म 2035 में हुआ, अभी 2050 आते-आते वो 10th क्लास में पहुंच चुकी हैं। दोनों एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ते हैं, साथ-साथ स्कूल जाते हैं। एक बार दीपा दो दिनों तक स्कूल न आई, मानसी दीपा के घर गई तो पता चला कि उसकी तबियत कुछ ठीक नहीं है, उसे टाइफाइड हो गया है। दीपा ने मानसी से कहा कि बस कल तक ठीक हो जाऊंगी, परसों से साथ में स्कूल जायेंगे।
दोनों सहेलियां आज स्कूल समय पर पहुंच चुकी हैं, आज स्कूल में खेल का आयोजन हो रहा है, दीपा की तो अभी-अभी तबियत ठीक हुई है तो उसने खेल से दूरी बना ली है। मानसी तो वैसे भी कुछ नहीं खेलती तो वे दोनों आज स्कूल के मैदान में बैठे बातें कर रहे हैं---

दीपा - आजकल पानी कितना खराब हो गया है न, इसी कारण मैं जबरन बीमार पड़ गई। देख न मानसी घर के पानी का भी भरोसा नहीं रहा अब।

मानसी - पता है मेरे पापा अभी कुछ दिन पहले काम के सिलसिले में शहर को गये थे, वहां एक लीटर की पानी की बोतल दो सौ रूपये मिल रही है।

दीपा - अरी! दो सौ रुपए,  तुझे पता है मेरे नौनिहाल में आज भी एक झील है, वहां का पानी कोई भी पी सकता है, सबके लिए मुफ्त है, बाहर से आकर बहुत लोग वहां बसने लग गए हैं, और न अब वहां बहुत लोग पानी का धंधा करने लगे हैं, तो गंदगी वहां भी आती जा रही है। अभी तो उस झील का पानी सबके लिए मुफ्त है, शायद कल उसमें भी रूपये चुकाने न पड़ जाएं।
दीपा और मानसी हंसने लगते हैं..

मानसी - हां रे! झील के सभी किनारों पर बाड़ा लगा दिया जाएगा और फिर वहां पर एक आफिस बन जाएगा, हेहे। और, और लाइन से टोकन लेना पड़ेगा फिर पानी मिलेगा।

दीपा - मुझे कभी-कभी लगता है कि लोग न पागल हो गये हैं। कभी-कभी सोचती हूं बड़ी होकर डाक्टर बनूंगी या फिर ऐसे आफिस में बैठने वाली कोई मैडम, जब मैं ऐसा सोचने लगती हूं तो लगता है मैं ही पागल हूं। फिर मैं सोचती हूं मेरे पास अपनी जमीन होती, एक झील सा तालाब उस पर होता तो कितना अच्छा होता।

मानसी - हां फिर हम दोनों मस्त कुर्सी लगा कर लोगों को पानी बेचते, खूब कमाई होती। हमको आगे और पढ़ाई करने की जरूरत ही न पड़ती।

दीपा( माथा पीटते हुए) - हाय राम! मुझसे भी अब ना होती ये पढ़ाई। पढ़-लिख के वैसे भी क्या करेंगे, मुझे तो शहर जाने का वैसे भी मन नहीं करता, मैं तो सोचती हूं यहीं रहकर मां-बाबा के काम में हाथ बटाऊंगी।

मानसी - तू सही कहती है। लेकिन मेरे बाबा 12th के बाद न मुझे शहर भेज देंगे। वे तो अभी से बोलते भी हैं कि मानसी तू अपनी बुआ के यहां रहकर कालेज की पढ़ाई करना। मैं भी कुछ बोल नहीं पाती। पता है दीपा, बुआ जहां रहती हैं वो शहर बहुत गंदा है, जगह-जगह गंदी नालियां हैं, और न वहां पास में कुछ फैक्ट्रियां हैं तो आए दिन छत पर और घर में भी काले धूल की परत चढ़ जाती है। पता है बुआ दिन में तीन से चार बार झाड़ू लगाती है।

दीपा - मानसी तू न जाना मुझे छोड़के। उस शहर में तू कैसे रहेगी। रहने दे पागल कालेज की पढ़ाई, हम अपने इस गांव में ही ठीक हैं। तू काला धूल बता रही है, मुझे तो सुनके ही डर लगने लगा है, लोग तो वहां पानी में भी उतना ही खर्च करते होंगे जितना अपने घर को काले धूल से बचाने में।

मानसी - पता नहीं कैसे रहते होंगे, एक बार मैं छुट्टियों में गयी थी तो जाते ही बीमार पड़ गयी थी, हां तेरे ही जैसा कुछ रोग हो गया था मुझे, पानी से ही होने वाली कोई नई सी बीमारी थी, पता नहीं कुछ अजीब सा नाम था, अभी याद नहीं आ रहा, हेहेहे।

दीपा(हंसते हुए) - तेरे बाबा के पास तो जमीन भी है, एक तालाब खुदवाने को क्यों नहीं कहती। कम से कम तुझे शहर जाना नहीं पड़ेगा।बस एक पानी साफ करने की मशीन लगाएंगे और फिर दोनों बहनें तालाब किनारे बैठकर राज करेंगे।

मानसी - हां, एक बार बाबा कह रहे थे कि तालाब खुदवाना भी बहुत मुश्किल हो चुका है। अच्छे कारीगर नहीं मिलते आजकल, किसी को तालाब बनाने की समझ नहीं है, और वैसे भी सरकारी दांवपेंच और ये गांव के पंचायत की दखल। और बाबा ये भी कह रहे थे कि बारिश तो उतनी होती नहीं, भू-जल स्तर भी तो दिनों-दिन नीचे जा रहा है।

दीपा - तभी मेरे बाबा कहते हैं कि नया तालाब खुदवाना अपने ही पैर में कुल्हाड़ी से वार करना है। मुझे आज उनकी बात समझ आ रही है।

मानसी - अच्छा ठीक है। तुझे पता है कल बुआ फोन करके कहती है कि उनके पड़ोस में कल निगम से मिलने वाले पानी को लेकर दो लोगों के बीच ऐसे जमकर झगड़ा हुआ, एक ने बंदूक से दूसरे को गोली मार दी। बुआ बता रही थी कि तब से कालोनी में पानी को लेकर दहशत का माहौल है।

दीपा - तू देखते जा मानसी आगे और क्या-क्या होता है। ये तो अभी शुरूआत है। तुझे पता है मेरे छोटे भाई ने एक नयी सनक पकड़ ली है, उसे पता नहीं किसने पट्टी पढ़ा दी है, वो आये रोज घर में प्लास्टिक की थैलियां इकट्ठा करता है और हमारे एक पुराने कमरे में इकट्ठा करता जा रहा है, पूछने पर वो कहता है कि रहस्य है रहस्य।

मानसी - मेरे भैया तो आजकल अखबारों में लिखने लगे हैं, मुझे बताते रहते हैं, कभी-कभी तो बोर कर जाते हैं। पता नहीं शहर जाकर कैसे हो गये हैं।
भैया ने कल कुछ सुनाया था, तुझे वो मैं सुनाती हूं-
"तबाही के मुहाने पर खड़ी है फिर भी ये दुनिया न जाने किस तसव्वुर में मगन मालूम होती है।"
दीपा और मानसी ठहाके मारकर हंसने लगते हैं..!
क्रमशः ........

Friday, 24 February 2017

~ पुत्री का मोह ~

                  शान्तनु अपनी पत्नी विभा को लेकर अस्पताल पहुंच चुके हैं। घर के बाकी लोग भी अस्पताल के लिए निकल गये हैं। विभा के पेट में जोर का दर्द उठा है, शायद बच्चे की डिलीवरी का समय आ चुका है, हर कोई डिलीवरी होने के इंतजार में अस्पताल के बाहर मौजूद हैं। उसी समय डाक्टर ये सूचित करते हैं कि कल डिलीवरी होगी। अगले दिन शाम को डिलीवरी होती है। शान्तनु के सारे दोस्त यार अस्पताल के बाहर जमावड़ा लगा चुके हैं। शान्तनु ने अपने दोस्तों को उसी समय एक छोटी सी पार्टी देने के लिए वहीं पास में एक होटल को चिकन बनाने का आर्डर दे दिया है। शराब की कुछ बोतलें भी आ चुकी है। हर कोई अस्पताल के बाहर इसी इंतजार में है कि बेटा हुआ है कि बेटी। कुछ देर में खबर आती है कि बेटा हुआ है, जच्चा-बच्चा दोनों की हालात सामान्य है। शान्तनु से उनके दोस्त यार अब गले मिल रहे हैं, एक एक कर बधाई देते जा रहे हैं। सब तरफ खुशी और उल्लास है।
                    अब पास के होटल में चिकन तैयार हो चुका है, शान्तनु और उसके दोस्त यार सब लोग जमकर शराब पी रहे हैं, चिकन खा रहे हैं। इसी बीच बेटे के नाम और उसके भविष्य को लेकर बातें चलती रहती है तो शान्तनु उसी समय एक अलग ही अंदाज में कहते हैं कि हटा यार लौंडा हुआ है, मेरी ही तरह आवारागर्दी करेगा, शराब सिगरेट पियेगा। काश बेटी होती तो अपना सारा कुछ उस पर न्यौछावर कर देता, कम से कम ये तो भरोसा रहता कि कल को मेरा नाम रोशन करेगी। शान्तनु चेहरे में हल्की सी हंसी लिए हुए अंदाज में ये सब कह रहे थे। अभी बेटे को इस दुनिया में आए मुश्किल से एक घंटा हुआ है, लेकिन शान्तनु के मन में क्या-क्या नहीं चल रहा है। वे बेटे के आने वाले कल को अभी से देखने लगे हैं, उनके मन में यही है कि मैं तो वैसे उतना पढ़ा-लिखा हूं नहीं और मैं इसके लिए कितना भी कुछ कर लूं बेटा बड़ा होकर कल को अपनी मर्जी का मालिक हो जायेगा, मेरे ही सर पर चढ़ेगा, भरोसा तोड़ेगा।वे यही सोच रहे हैं कि बेटियां हमेशा भरोसे लायक होती हैं, जिम्मेदार होती हैं, जीवन भर पिता का मान रखती हैं। पुत्र प्राप्ति के बाद एक पिता के रूप में शान्तनु की ये एक स्वाभाविक सी प्रतिक्रिया है जो हमारे सामने है। सही ही है कि एक पिता चाहे वो अपने युवावस्था के दिनों में कैसा भी हो, हमेशा पुत्री की अभिलाषा रखता ही है। लेकिन इसके ठीक उलट आज विभा बहुत ज्यादा खुश हो रही होगी, यही सोच रही होगी, कि बेटा हुआ जीवन भर के लिए एक सहारा मिल गया।
                   बाप की इच्छा बेटियों को आगे लाती है, और मां की इच्छा बेटों को। और प्रकृति का साम्य यथाभूत बना रहता है।

Tuesday, 31 January 2017

-जादूगर गायब हो गया-

                 एक शहर में एक जादूगर हुआ करता था।दो चार जादू दिखाकर वो ठीक-ठाक कमाई कर लेता था। एक समय ऐसा आया कि लोग उसके जादू से ऊबने लगे। क्योंकि जादूगर के पास लोगों को दिखाने के लिए कुछ भी नया नहीं बचा था। आखिरकार जादूगर का धंधा पूरा बैठ गया। उसने बहुत सोच-विचार किया, लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं दिखा, जादूगर को अपने बारे में ये बहुत अच्छे से पता है कि उसके पास अब कोई नयापन बचा नहीं है, रचनात्मकता की कमी है।        
                 एक दिन जादूगर को उपाय सूझा कि वह लोगों को वही दिखाएगा जिसमें लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। और उसने लोगों की भावनाओं के बीच जादू परोसना शुरू किया, उसने कुछ पौराणिक कथाएं उठाई और अपने तरीके से पेश करना शुरू कर दिया, बहुत से नये नये मिथक गढ़ लिए,  जादू भी दिखाता और अपनी बनाई मिथकीय बातों से लोगों का मनोरंजन भी करता। जादू और कहानियों का ये मिश्रण लोगों को खूब भाया, लोग जादूगर को देखने के लिए दूर-दूर से आने लगे, जादूगर की चर्चाएँ होने लगी, आये रोज टेलीविजन और समाचार पत्रों में उसका नाम आने लगा। अब जादूगर पहले से कहीं ज्यादा विश्वसनीय हो चुका था। लोगों की नजर में अब वो एक भरोसेमंद कलाकार था।
                  इसी बीच जादूगर ने जनमानस के बीच कुछ ऐसा कर दिया की लोग नाराज हो गये। असल में जादूगर कई बार अपने स्वार्थसिध्दि के लिए जादू के माध्यम से लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचा देता था। जादूगर को भी अच्छे से पता है कि उसकी इस छेड़खानी से लोग गुस्सा होंगे, विरोध करेंगे, लेकिन उसकी चर्चा तो होगी ही। लोग फिर से उसका जादू देखने आएंगे ये जानने के लिए कि वो ऐसी क्या गलती करता है, जो लोग इतने खफा हैं। जादूगर इस मनोविज्ञान से भली-भाँति परिचित था। वो ये सब करके बहुत खुश होता था। कई बार तो वो जादू दिखाता था और मंच पर लोग चप्पल जूते फेंक देते। जादूगर उन अतिउत्साही आस्थावान लोगों की हरकत से अपने हिस्से की सहानुभूति खोज लेता, तुरंत चप्पल उठाता और सीने से चिपकाकर शुक्रिया अदा करता। कई बार जादूगर सही गलत की तर्कणाओं से काफी आगे निकल जाता, उसे भी ये अच्छे से पता था कि ये भारतभूमि है यहां जनमानस की सात्वंना हमेशा मार खाने वाले के साथ होती है न कि मारने वाले के साथ। और कुछ इस तरह जादूगर का कद अपने प्रशंसकों की नजर में और बढ़ने लगा। अब उसका धंधा दुगुनी गति से फलित होने लगा।
                   शहर में ऐसा माहौल पनपने लगा कि लोग भ्रमित होने लगे, क्या सही क्या गलत, लोग इसका फैसला नहीं कर पा रहे थे। मतिभ्रम की इस स्थिति से निपटने के लिए शहर के कुछ जिम्मेदार लोगों ने एक संयुक्त सभा का आयोजन किया। बहुत से नेता, लेखक, पत्रकार, शिक्षकगण एवं प्रशासनिक अधिकारी शामिल हुए। सब ने मिलकर सर्वसम्मति से ये फैसला लिया कि हर उस व्यक्ति/विषयवस्तु को लोगों की पहुंच से दूर रखा जाए जो सिर्फ और सिर्फ लोगों को भ्रमित करते हैं और उनके मनोविज्ञान में बेवजह दखल डालते है।
                   अब इस फैसले के आने से ऐसा हुआ कि जादूगर जब भी कहीं जादू दिखाता, उसके बारे में लोगों ने पेपर में छापने से मना कर दिया। जादूगर ने ज्यादा पैसे चुकाने की बात रखी, फिर भी कोई राजी न हुआ। पोस्टर वालों ने उसके पोस्टर छापने से भी मना कर दिया, बदले में साफ-साफ कह देते कि ये पाप हमसे मत करवाइए, अपने बीवी-बच्चों की नजर में हम और नहीं गिरना चाहते। धीरे-धीरे जादूगर का धंधा ठप पड़ गया। जादूगरी के इस मिथकीय मिश्रण की कमर टूट चुकी थी। जादूगर ने तंग आकर सामान समेटा और शहर छोड़ दिया। किसी को नहीं पता कि अभी वो जादूगर कहां है।
और कुछ इस तरह जादू दिखाने वाला वो जादूगर हमेशा के लिए गायब हो गया।

Thursday, 12 January 2017

~ जोधपुर की नीली दीवार ~

              हमारा बचपन जोधपुर की गलियों में बीता है। जाति से राजपूत। हमारी एक ही दीदी है, और हमारे मां बाप को मिलाकर चार लोगों का परिवार। हमने अपनी स्कूली पढ़ाई जोधपुर में की फिर उसके बाद आगे कालेज की पढ़ाई जयपुर में हुई। कालेज की पढ़ाई अभी भी चल रही है। कुछ दिन बाद दीदी की सगाई होने वाली है इसलिए हम छुट्टी लेकर अपने घर जोधपुर आये हुए हैं।
               सगाई का दिन आ गया। सुबह से हर कोई तैयारी में लग गया है। बापजी जो हमेशा पगड़ी लगाए रहते हैं आज सगाई है तो रस्मो रिवाज के लिहाज से उन्होंने हमें भी मजबूर कर दिया कि पगड़ी लगानी पड़ेगी। हमने पगड़ी पहन ली है। सब अपने-अपने कामकाज में व्यस्त हैं। हम पगड़ी लगाये अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खुद को देखते लग जाते हैं। अचानक से हम अपने ही चेहरे को छूने लगते हैं और कुछ सेकेंड बाद पगड़ी निकालकर फेंक देते हैं। फिर एक दीवार का कोना पकड़ लेते हैं ,उस दीवार को अब हम अपने हाथों से मारने लग जाते हैं, और उसी नीली दीवार पर अपना सर पटकने लगते हैं। हल्का सा खून निकलने लगता है। इसी बीच नानी सा हमें देख लेती है। वो हमारे सिर पर से खून निकलता देख चिंताविमुख हो जाती है और पास आकर चोट देखने की जिद करने लगती है हम उन्हें जैसे-तैसे मना करते हैं, और उन्हें झूठ कहते हैं कि ऐसे ही काम करते करते चोट लग गई। उसके बाद हम वहां से अस्पताल जाने का बहाना बनाकर अपने कमरे से बाहर आ जाते हैं। और हमारे घर के पास ही जोधपुर का जो सबसे ऊंचा टीला जैसा स्थान है, आधे घंटे तक दौड़ते हुए हम वहां चढ़ जाते हैं। और फिर जोर-जोर से चिल्लाने लगते हैं।
                   असल में जब हमने आईने में अपना चेहरा देखा तो लगा कि ये चेहरा हमारा नहीं है। और ये घर, ये घर भी हमारा नहीं है। इस घर के लोग, ये रिश्ते-नाते ये कुछ भी हमारा नहीं। ये जोधपुर शहर भी हमारा नहीं। जब हम आईना देख रहे होते हैं तो हमें कहां से अचानक याद आता है कि हमारा जन्म तो छत्तीसगढ़ में कहीं पर हुआ था। हमारी कालेज तक की पढ़ाई भी छत्तीसगढ़ में ही हुई। हमारी तो दो दीदी हैं, और दोनों की शादी हो चुकी है, हमारी एक छोटी बहन भी है लेकिन यहां जोधपुर में जो मेरी एक दीदी है उनकी सगाई भी नहीं हुई। यहां जोधपुर में हमारे बापजी ने पानी की कमी को देखते हुए एक कुंड बनवाया है, वहीं छत्तीसगढ़ में हमारे परदादा ने अपने गांव में दो तालाब बनवाएं हैं। लेकिन हमने दीदी के सगाई का कामकाज क्यों छोड़ दिया और क्यों यहां बेमन से इस टीले पर आ गए। सब हमें वहां खोज रहे होंगे। नानी सा ने तो हमें देख भी लिया था, उन्होंने सबको खबर कर दी होगी। एक तरफ हमें दीदी का चेहरा याद आ रहा है, जो सगाई के लिए सुबह से सज रही हैं और दूसरी तरफ ऐसा लग रहा है कि छत्तीसगढ़ से हमें कोई बुला रहा है। एक तरफ हमारा ये जोधपुर का परिवार है जिसने हमें इतना लाड़-प्यार दिया, पढ़ाया लिखाया, सब कुछ किया। तो दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ का वो शहर है, जहां हमारे मां-बाप और भाई बहन हमें खींच रहे हैं और हम उनके अनुराग के सामने झुक गए हैं।
                   अब हम न तो वापस दीदी की सगाई में जोधपुर की उन गलियों में जा पा रहे हैं, हां उन नीली दीवारों से अब हमें दूर होने का मन कर रहा है। न ही छत्तीसगढ़ लौटना चाहते हैं। हम इन दोनों भावनात्मक रिश्तों के बीच फंस चुके हैं, अब हमारा सर फटने लगा है। हम अब टूटने लगे हैं, रोने लगे हैं, और फिर हम द्वन्द से परेशान होकर उस टीले से नीचे कूदकर अपनी जान देने का फैसला करते हैं। जैसे ही हम उस टीले से नीचे की ओर छलांग लगाते हैं। हमारा सपना टूट जाता है। अब हम जाग चुके हैं।

                 जोधपुर, मैं तो कभी राजस्थान के किसी शहर में नहीं गया हूं। अभी तक उत्तराखंड और हिमाचल घर जैसा लगता था। वो दोनों जगहें मुझे खींचती थी। लेकिन ये जोधपुर का ऐसा अजीब सा सपना क्यों आ गया। मैंने तो इस शहर की तस्वीर भी नेट में कभी नहीं देखी है। अभी देख रहा हूं तो पता चल रहा है कि जोधपुर को नीला शहर कहते हैं। क्योंकि वहां के अधिकतर घर नीले रंग के हैं। हां मेरा घर भी तो इसी रंग का था। हां वो नीली दीवारें, और वो साफ-सुथरी गलियां जहां मेरा बचपन बीता है। हां जोधपुर के उस बड़े से टीले से कुछ किलोमीटर दूर में मेरा घर है। लेकिन मैं अपने घर को कैसे पहचानूंगा। कहीं मुझे वो दीदी दिख गई, जिनकी सगाई होने को थी और जहां से मैं गायब हो गया था, वो परिवार जिसका मैं हिस्सा था, अगर वो मेरे सामने आ गए, तो मैं खुद को कैसे सभालूंगा। क्योंकि मुझे तो हल्का सा उनका चेहरा भी याद आ रहा है।
कुछ भी नहीं पता कि क्या होगा लेकिन एक बार उस शहर के करीब जाना है।
उन नीली दीवारों को छूना है।
उन चौबारों से भी गुजरना है जहां मेरा बचपन बीता है।
हां बापजी का बनाया कुंड भी तो देखना है।
               खैर, पता है मैंने शीर्षक में "जोधपुर की नीली दीवार" ही क्यों लिखा है। वो इसलिए कि मैंने ये टाइटल महीने भर पहले ही लिख दिया था, बस शीर्षक देकर खाली छोड़ दिया था, अब पता नहीं ये आपके यकीन करने लायक है भी या नहीं, पर यही सच है। एक अपनी खास दोस्त को उस समय बताया भी था कि यार मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं इस पर कभी कुछ लिखूंगा।और अब देखिए, शीर्षक लिखने के महीने भर बाद ये हैरान कर देने वाला सपना आ गया।

Wednesday, 4 January 2017

~ A Mystic Girl-3 ~

आज वो छत पर नहीं थी। शायद मैंने ही देरी कर दी। अब इसे संयोग कहें या कुछ और, जब मैं रोड पर टहलते हुए कुछ काम से जा रहा था तो वो मुझे आज फिर दिख गई। लेकिन आज वो मुझे देख न पाई।मेरे ठीक सामने वो साइकल पर थी। जब वो साइकल चला रही थी मेरा ध्यान सीधे उसके पांव पर गया, उसके पांव खाली थे। पैरों में उसने कुछ भी नहीं पहना था। जैसे ही मैंने उसे देखा, उसके थोड़ी ही देर बाद उसके साइकल की चेन उतर गई। एक पल को लगा कि कोई चीज मेरे नजर के सामने स्थायी क्यों नहीं है। इस चैन को भी क्या अभी उतरना था, इतना अच्छा मैं पैडल पर उसके छोटे-छोटे पैरों को गोल घूमते देख रहा था, साथ ही सेकेंड सेकेंड के अंतराल में मिट्टी की एक परत लिए उसकी वो सुंदर ऐंड़ियां देख रहा था। लेकिन ये किसकी नजर लग गई। शायद मैंने ही नजर लगा दी होगी।
                        मुझे लगा कि लो बच्ची अब तो तुम्हारे साइकल का चैन उतर गया अब तो तुम उदास होगी, निराश हो जाओगी, अब मैं छुपकर देखना चाहता हूं तुम्हारे चेहरे के ये भाव। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा,  वो तो जस का तस मुस्कुरा रही थी। कुछ ऐसे जैसे कुछ हुआ ही न हो , जैसे उसे इस बात से फर्क ही न पड़ा हो। झूमते हुए साइकल दोनों हाथों में पकड़कर वो अपने घर के सामने आई और उसने साइकल वहीं रख दिया, और फिर दौड़कर छत की ओर चली गई।
                     आज छत पर तीन बच्चे पहले से हैं जो वहां कुछ-कुछ खेल रहे हैं। हां पत्थर के टुकड़ों का कोई खेल है, जहां तक मुझे लगता है, इस खेल का शायद ही कोई भाषायी नाम है, हां पर बोलियों में अनेकों नाम हो जाते हैं। इसमें पैर से पत्थर या खपरैल के एक छोटे टुकड़े को मारते हुए एक खाने से दूसरे खाने में ले जाते हैं। अब वो लड़की छत पहुंच चुकी है, मुझे लगा कि वो भी उनके साथ खेलने लग जाएगी। लेकिन वो मेरी सोच पर पानी फेर देती है। वो वहीं पर पड़े चाक के टुकड़े को उठाती है, और छत पर अपने लिए अलग से एक सुंदर सा चौखाना बनाने लगती है। और जब वो आयताकार चौखाना बन जाता है तब वो पत्थर से अकेले खेलने लगती है। वहां उसके ठीक पास में जो तीन बच्चे खेल रहे होते हैं। उनमें से एक बच्ची जो छ: या सात साल की होगी, वो इस नये चौखाने और इस पर अपनी इस दीदी के खेल से ऐसा प्रभावित होती है कि वो बच्ची अपना पुराना चौखाना छोड़कर इस नये चौखाने के पास आकर कहती है कि दीदी, दीदी मैं आपके साथ खेलूंगी। लड़की उसे हां कर देती है। और फिर दोनों खेलने लग जाते हैं।
                 उस रहस्यमयी लड़की का हर दिन ये नया रंग देखकर मैं ये भूल जाता हूं कि मैंने इससे पहले इसका कौन सा रूप देखा था। आज फिर उसे देखकर ऐसा लगा जैसे मैं पहली बार किसी नयी सी लड़की को देख रहा हूं। हर दिन एक नयापन, एक नया रहस्य।
               आज जिस तरह से उसने दूसरे बच्चों से अनुरोध किए बिना ही खुद अपने लिए एक नया चौखाना बनाया, और जब एक बच्चा अपना खेल छोड़ खुद ही उसके पास आ गया इससे ये साफ मालूम होता है कि उसकी अपनी गति है, अपने रास्ते वो खुद बनाती है वो भी बिना किसी अड़चन के। लेकिन ये गति उसे कहां से मिलती है, शायद वहीं से मिलती होगी जहां से उसने पेड़ों को महसूस करना सीखा है, आसमान को देखना सीखा है, उस दिन उस गाय से बात करना सीखा और तो और आज साइकल चैन के खुल जाने के बाद कुछ समय के लिए उसे नजर अंदाज करना सीखा।
            वो जब कुछ करने लगती है तो वो अपने आप में नया हो जाता है, आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। आखिर दस साल की इस छोटी सी उम्र में वो इतना सब कुछ कैसे कर लेती है। वो ये सब कर पाती है शायद इसीलिए वो रहस्यमयी है।

Tuesday, 3 January 2017

~ A Mystic Girl-॥ ~

                      आज वो गमले में पानी डाल रही थी। अचानक से वो ठहर गई, एक गाय को वो देखने लग गई, हां एक गाय के द्वारा वो रोक दी गई। इतनी जिज्ञासा भरी आंखें वो भी एक पालतू पशु के लिए। फिर मैंने जब उस गाय को देखा तो पता चला कि वो कचरे के ढेर में पड़ा बासी खाना खा रही थी। लेकिन उस दस साल की लड़की ने उस गाय की इस छोटी से हरकत में ऐसा क्या देख लिया कि वो ऐसे स्थिर हो गई। शायद वो ये तो नहीं सोच रही कि उस गाय को यहां से दूर चले जाना चाहिए, शायद वो चिल्ला कर कहना चाहती है कि मत खाओ ...ये खाना, और रुको, थोड़ा संभल के, वहां पास में प्लास्टिक की थैलियां भी है, तुम उनसे दूर रहना। अगर वहां कहीं स्टेनलेस स्टील के ब्लेड के टुकड़े होंगे तो कैसे करोगी, पता है तुम्हारे लिए ये कितना तकलीफ भरा होगा। तुम दर्द से रोने लगोगी और कोई यहां तुम्हारी नहीं सुनेगा। इसलिए अब मैं और तुम्हें नहीं देखना चाहती। काश मैं तुम्हें अपने इस छोटे से घर में रख पाती, लेकिन ये संभव नहीं है। मेरी विवशता अब यही चाहती है कि तुम इस कचरे के ढेर से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाओ और मुझे इस जन्म में फिर कभी न दिखो।
                      लेकिन वो जब इतना सोच रही थी तो उसने कोलाहल का सहारा क्यों नहीं लिया। क्यों वो एकटक उस गाय को निहार रही थी। क्या सच में उसने एक पशु की पीड़ा को अपना लिया था। उसे देखने पर ऐसा मालूम हुआ जैसे एक गाय का दर्द उसके लिए अटूट करूणा का बहाना बन गया हो, उसने एक बड़ी अजीब सी खामोशी को अपने अंदर संभाल के रख लिया हो, हां कुछ है जिसे मापना असंभव सा है, इसी मौन रूपी खामोशी के दर्शन शायद आंख वालों को ही होते हैं।
                       उस लड़की ने थोड़ी देर बाद फिर से गमले में पानी देना शुरू कर दिया, इसी दौरान आज उसने फिर से मुझे देखा। उसके घर के छत की ऊंचाई मेरे कमरे की छत की ऊंचाई से काफी कम है और मेरे कमरे से पश्चिम दिशा में उसका घर होने की वजह से वो मुझे सिर उठाकर देख रही थी। सुबह की धूप सीधे उसके आंखों में पड़ रही थी अब उसने अपने दोनों आंखों को एक हाथ से छाया देते हुए सायबान जैसा बना लिया। उसने कुछ देर मुझे देखा फिर वो गमलों में पानी देकर चली गई। उसने आज जिस तरह से मुझे देखा, ऐसा लगा जैसे वो मुझसे आग्रह कर रही हो कि आप कृपा करके इस गाय को या तो यहां से कहीं और ले जाइए या किसी साफ सी जगह में ही बासी खाना परोस दीजिए। शायद वो हमें एक संदेश देकर छुप जाना चाहती है कि ये जो भी सब हमारे आसपास हो रहा है, इससे मैं संतुष्ट नहीं है। मैं बार-बार अपनी खामोशी से विरोध करूंगी, नाराजगी जताऊंगी। आपको अगर कुछ लगता है, आपके ह्रदय तक अगर सूचना पहुंचती है तो आप इसे ठीक करने को प्रयत्नशील हों। मैं चुपचाप मुस्कुराकर आपका अभिवादन करूंगी।

Monday, 2 January 2017

~ A Mystic Girl ~


आज सुबह जब मैंने उसे अपने छत से देखा तो रूक सा गया,  लगा कि मेरे सामने सिर्फ वही एक थी जो चलायमान थी, मानो सिर्फ उसी ने गति को धारण कर लिया हो, और उसकी गति की वजह से बाकी सब कुछ स्थिर सा हो गया हो।
                  असल में मेरे सामने एक दस साल की लड़की थी। शायद वो 5th या 6th क्लास में होगी। मेरे कमरे की छत से लगभग दो घरों की दूरी पर उसका छत था। इससे पहले उस पर कभी मेरा ध्यान नहीं गया लेकिन आज उसने मेरा ध्यान खींच लिया। दस साल की वो लड़की श्र, उसके वो छोटे-छोटे पैर, सांचे में ढला उसका गोल सा चेहरा, और उस चेहरे में सपनों से डूबा उल्लास लिए वो लड़की उस समय एक किताब हाथों में लिए कुछ सोच रही थी। आखिर वो कौन सा सब्जेक्ट पढ़ रही होगी, क्या वो सचमुच अपने सबजेक्ट के बारे में ही सोच रही थी क्योंकि आज जब मैंने उसे देखा तो वो खुली हवा में आकृतियां बना रही थी, और फिर थोड़ी देर बाद या तो मुस्कुराती या फिर हंसने लगती हां किसी झूमती तितली की तरह कभी यहां कभी वहां। कभी वो पास में खड़े पीपल के पेड़ को देखती तो कभी खुले आसमान की ओर गर्दन उठाकर देखने लग जाती। फिर वो किताब खोलती, थोड़ी देर के लिए कुछ पढ़ती और चहकते हुए फिर यही प्रक्रिया दुहराती।
                  मेरी नजर तो उसे देखते ही रूक सी गई थी, ये ठीक उसी तरह था जैसे सिनेमा देखते-देखते हम एक विशुद्ध अवस्था के द्वारा रोक लिए जाते हैं। अब जब मैं उसे एकटक देख रहा था, इसी बीच ऐसा हुआ कि अचानक उसने मुझे देख लिया। वो कुछ सेकेण्ड भर के लिए वहां रूकी और फिर कदमों की एक विशेष लयबद्धता का अनुगमन करते हुए वहां से तुरंत चली गई।उसने अपने हाथ ढीले कर लिए, हवा में लहराते हुए वो पहले सामने की ओर एक कदम रखती और पीछे दो कदम, कुछ इस तरह धीरे से वो मेरी आंखों से ओझल हो गई। शायद उसे मेरा देखना पसंद नहीं आया या शायद वो खुद को ऐसे देखा जाना पसंद ही नहीं करती। वो नहीं चाहती कि उसकी इस छोटी सी दुनिया पर किसी का ध्यान केंद्रित हो।
                      उसकी इस छवि ने मुझे आज आश्चर्य में डाल दिया है। क्या मैं उसके सोच की परिधि माप सकता हूं, शायद ये मेरे बस की बात नहीं है। लेकिन आज उसकी इस रहस्यमयता का मैं कायल हो गया। लेकिन यह दृश्य मैं और कब तक देख पाऊंगा,बमुश्किल एक साल। उसके बाद तो वो बड़ी हो जाएगी। पीछे छोड़ जाएगी अपनी कुछ झलकियां। अब वो ऐसे खोये हुए अंदाज में शायद ही पहले जैसे बात कर पाए।ये पेड़, ये खुले आसमान धीरे से उसकी स्मृतियों से मिटते जाएंगे। शायद उसे इस बात का अंदाजा भी न होगा कि कब वो बड़ी हो गई और उसकी ये रहस्यमयी दुनिया कहीं पीछे रह गई। अब चूंकि वो बड़ी होने वाली है तो उसकी मां के द्वारा उसे समझाया भी जाएगा कि बेटा अब तुम बड़ी हो रही हो, तुम्हें अब खुद अपना ख्याल रखना पड़ेगा, तुम्हें ये सीखना पड़ेगा, अपने दोस्तों खासकर अपने आसपास के लड़कों को समझना होगा। साथ ही अपनी सीमाओं का विशेष ख्याल रखना होगा।
                  और धीरे-धीरे उस लड़की की रहस्यमयी दुनिया सिकुड़ती जाएगी। उसे अब अपने उन ख्यालों की दुनिया से बाहर आकर भीड़ का हिस्सा बनना होगा। अब वो सब के बीच हंसना सीखेगी। घूमना, बातें करना सीखेगी। घर, परिवार ,समाज की प्रतिष्ठा बढ़ाये, सबको गौरवान्वित करे इसके लिए उसकी प्रतिभा को और अधिक परिष्कृत करने हेतु सारे उपाय किए जाएंगे और कुछ इस तरह वो इस नई दुनिया का हिस्सा बन जाएगी।