भतीजे आयुष अब चलने लगे हैं, दौड़ने लगे हैं। अभी लगभग डेढ़ साल के हो चुके हैं। आयुष को बाकी बच्चों की तरह चाकलेट, बिस्किट खिलौने इन सब चीजों का उतना शौक नहीं है। आयुष तो ठहरे ठेठ पहाड़ी। वे अभी से चावल दाल के शौकीन हो गये हैं। दिन में दो टाइम उनको चावल ही चाहिए होता है। कभी-कभी तो तीन-चार टाइम चावल ही चावल खाते हैं। इस छोटी सी उमर में चावल-दाल उनका प्रिय भोजन बन गया है, इसके अलावा बाकी अन्य चीजों को वे इतने चाव से नहीं खाते। भात-दाल के प्रति उनका इतना प्रेम है कि मम्मी-पापा जब खाना खाते हैं तो वे लपक पड़ते हैं और उनके साथ भी भोजन कर जाते हैं।
आयुष, मस्त रहिए, सदा इसी तरह खुशियां बिखेरते रहिए, तुम्हारे अच्छे स्वास्थ्य एवं उज्जवल भविष्य की मंगलकामनाओं के साथ...
आशा है घर पर सब ठीक होंगे। अब तो भतीजा आयुष यहाँ से वहाँ दौड़ रहा होगा। भाभी दीदी भी अच्छे होंगे। और शायद आपके कंधे का फ्रेक्चर भी अब ठीक हो गया होगा। तारा, सुरेश, मनोज, भुप्पी, कैलाशदा, जीत्तूदा, हरीशदा, मामू, लालाजी और आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं।
मैं बहुत समय से सोच रहा था कि आपको कुछ लिखूं लेकिन मुहूर्त नहीं बन पा रहा था। कल जब आपने अपने दुकान में हुई चोरी के बारे में बताया तो आंखें चौंधिया गई। मैं रात भर खुद से सवाल करता रहा कि
-क्या सच में ये वही मुनस्यारी है?
वो तो अच्छा हुआ कि आपने बदलते समय की मांग को देखते हुए अपने दुकान में कुछ महीने पहले ही सीसीटीवी लगा लिया और आपको आपका सामान वापस मिल गया। खैर इसमें चोरी करने वाले को मैं उतना दोष नहीं देता, मामला सांस्कृतिक हमले का है, चोरी करने वाला अगर मुनस्यारी का होगा भी तो भी मैं उसे मुन्सयारी का नहीं मानता। यानि जिसके रग-रग में मुनस्यारी का खून होगा और जो यहां की संस्कृति में पला बढ़ा है, उसके मन में ऐसे काम करने का ख्याल आ ही नहीं सकता, असंभव है। चोरी करने वाले को तुरंत समझाइश देकर पहाड़ से दूर मैदानों में भेज देना चाहिए, ऐसे लोग पहाड़ में रहने लायक नहीं हैं। इस एक मामले में कोई रहम, कोई दया नहीं ऐसा मुझे लगता है।
दा, साल 2015 में जब मैं पहली बार मुनस्यारी आया, मैं किसी को जानता तक नहीं था। आपसे भी पहली बार मिला। शायद सप्ताह भर आप लोगों के साथ रहा फिर वापस दिल्ली आ गया था। मुझे आज भी याद है मैं रात को मुन्सयारी पहुंचा था। अगले दिन सुबह जब हम आपके कमरे से फ्रेश होकर शाॅप की ओर निकलने लगे तो मैंने आपसे पूछा कि लाक नहीं लगाओगे क्या, अरे सिटकनी तो लगा लो कम से कम। आपने उस समय कहा था कि " अखिलेश ये मुनस्यारी है "।
दूसरे ही दिन आपकी दुकान पर बैठा था, आपने मुझे काउंटर में बैठा दिया और शायद कुछ काम से चले गये, पैसे रखने वाली तिजोरी भी जस की तस खुली थी। एक मैं अनजान जिसे आपसे मिले सिर्फ एक दिन हुआ है उसे आप काउंटर संभालने के लिए बोलकर घंटे भर के लिए निकल जाते हैं। मुझे उस समय ऐसा लग रहा था कि मैं सपना देख रहा हूं। फिर मैंने देखा आपके चार पांच दोस्त हैं जो बराबर आपका काउंटर संभालते हैं और पैसे के हेरफेर की कोई चिंता ही नहीं। मैं धीरे-धीरे जब चीजों को और ध्यान से देखने लगा तो समझ आया कि यही तो मुनस्यारी की संस्कृति है। इन सब चीजों से मैं इतना प्रभावित हुआ कि दुनिया की सारी चकाचौंध वाली चीजें मुझे मुनस्यारी की इस संस्कृति के सामने फीकी लगने लगी, और मैंने हाथ पांव ढीले कर लिए और एक तपस्वी मन से मुनस्यारी की इस संस्कृति को आत्मसात कर लिया।
और मुनस्यारी ने मुझे जो दिया वो शायद दुनिया की कोई ताकत मुझे नहीं दे सकती। जो प्यार और अपनापन मुझे मुनस्यारी में मिला वो कहीं और मिलना असंभव है। कभी किसी ने छोटे भाई की तरह अपना लिया तो किसी ने बड़े भाई की तरह, तो किसी ने घर के बेटे की तरह लाड़-प्यार दिया। जब मैदानों में आता हूं तो बहुत कोशिश करता हूं इन सब चीजों को भुलाने की। लेकिन नहीं हो पाता यार दा क्या करें।
लोग मुझसे तरह-तरह के सवाल करते हैं, अटकलें लगाते हैं कि तुम्हें पहाड़ से कैसे इतना लगाव हो गया? मैं शांत हो जाता हूं, मुझे पता है मैं बोलूंगा तो भी वे मुझे पूरी तरह से नहीं समझ पाएंगे इसलिए मैं कुछ नहीं बोलता। लोग समझते हैं कि मुझे हिमालय और इन सुंदर वादियों से लगाव है अब उन्हें कैसे समझाया जाए कि जिस संस्कृति का स्वाद मैंने पाया है उसके सामने दुनिया जहां के रूतबे, अर्थबल, संख्याबल एवं सुविधाएं सब कुछ त्याज्य(त्यागने योग्य) हैं और इस बात को वही समझेगा जिसने पूरे समर्पण भाव से इस संस्कृति का रस चखा है।
दा, मुझे अभी फिर से आपकी बात याद रही है जो आपने आज से दो साल पहले कही थी कि " अखिलेश ये मुनस्यारी है"
- हां ये वही मुनस्यारी है जहां आज भी लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने परिजनों के यहां ककड़ी और दूध की बोतलें पूरे विश्वास के साथ मैक्स की गाड़ियों के माध्यम से पहुंचाते हैं।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ दुनिया के सबसे खुश रहने वाले लोग रहते हैं।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहां के स्कूली बच्चे कितने भी उदंड क्यों न हो, वे माथे में टीका लगाना और अपने से बड़ों को हाथ जोड़कर नमस्ते करना कभी नहीं भूलते।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहां एक पत्थर तोड़ने वाले का भी समाज में उतना ही सम्मान है जितना कि एक किसी अधिकारी या नेता का।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहां आपके पड़ोसी आपको सुबह दोपहर रात हर समय पूछते हैं कि खाना खाया कि नहीं और ऐसा करते हुए वे कभी नहीं थकते।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ का कौतिक (मेला) और देवी-देवता की पूजा आज भी लोगों के लिए किसी एक बड़े त्यार(त्यौहार) से कम नहीं।
- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ आज भी मनुष्यता अपने चरमोत्कर्ष पर है।
- हां ये वही मुनस्यारी है जिसे "सार संसार एक मुनस्यार " कहा जाता है और हमें मुनस्यारी की इस अद्वितीय संस्कृति पर गर्व है, बार-बार गर्व है।
मुनस्यारी में काँच की बढ़ती हुई मात्रा को देखते हुए इसे रिसायकलिंग के लिए यहाँ से बाहर ले जाना अब जरूरी हो गया है।। इससे पहले कि ये छोटा सा काम असंभव सा दिखने लगे, सबको मिल-जुलकर इस समस्या को दूर करना ही होगा। ये काम पेपरबाजी, आर्टिकलबाजी, फोटोबाजी, एनजीओगिरी या नेतागिरी से प्रेरित न होकर आपके हमारे यानि जनसाधारण के धरातलीय प्रयास से होगा।
वास्तविक धरातल पर अगर बात की जाए तो मुनस्यारी से काँच इकट्ठा कर हम हल्द्वानी तक किसी ट्रक में लाद कर भेज दें ऐसा सोचना बेवकूफी भरा उपाय होगा इसके अलावा और कुछ नहीं। इसीलिए इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों में तोड़ने की आवश्यकता है।
उदाहरण के लिए जैसे मुनस्यारी में सैकड़ों दुकाने हैं इतने घर हैं कमरे हैं कुछ आफिस हैं। माने कहने का अर्थ ये कि लोगों के बीच जाकर, उनसे बात कर, उनका विश्वास अर्जित कर कोई एक ऐसी खाली जगह सुनिश्चित की जाए जहाँ काँच की बोतलों को इकट्ठा किया जा सके। फिर ये बोतलें मुनस्यारी से रिसाइकल होने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया से आगे भेज दी जाएगी।
समाधान जिन चार चरणों में संपन्न होगा वो कुछ इस प्रकार है-
1)मुनस्यारी से थल- इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मुनस्यारी से थल का रास्ता सबसे अधिक दुर्गम है, और बरसात के समय में लैंडस्लाइड को ध्यान में रखते हुए काँच भेजना मुमकिन नहीं, ये वाकई जोखिम भरा काम होगा। ठीक ऐसा ही जोखिम बर्फबारी के कुछ महीनों में है। कुल मिलाकर अगर मोटा मोटा देखा जाए तो पाँच महीने हटाकर भी सात महीने हमारे पास हैं, इस बीच आसानी से मुनस्यारी से थल को गाड़ियां आ सकती है। मुनस्यारी से काँच भेजने की जिम्मेदारी सिर्फ थल तक ही होगी, वहाँ उनका काम समाप्त हुआ।
2)थल से बागेश्वर- ठीक मुनस्यारी की तरह थल वालों की जिम्मेदारी भी बागेश्वर तक ही होगी। अब यहां थल वालों की जिम्मेदारी दुगुनी हो जाती है। वो ऐसे कि काँच मुनस्यारी से आया है उसे भी आगे भेजना है और थल में भी जमा हुए काँच को इकट्ठा कर आगे भेजना है। लेकिन अब थल वालों के लिए आगे का रास्ता मुनस्यारी की अपेक्षा थोड़ा सुगम ही होगा इसलिए कोई समस्या वाली बात नहीं है।
3) बागेश्वर से अल्मोड़ा- ठीक वैसी ही प्रकिया यहां भी दुहरायी जाएगी।
4) अल्मोड़ा से हल्द्वानी- ये आखरी पड़ाव है यहां से काँच रिसाइकल होने के लिए फैक्ट्री में जाएगा। अच्छा यहां इस एक बात को लेकर संशय है कि अब चूंकि अल्मोड़ा मैदानी इलाके से सबसे पास है तो यहां से हल्द्वानी काँच पहले भी रिसाइकल होने के लिए जाता रहा है या नहीं इस बारे में जिन्हें जानकारी हो वे स्पष्ट करें।
ये तो पूरा रोडमैप तैयार हो गया, अब कैसे इसे धरातल में उतारा जाए, और इसमें क्या क्या समस्याएँ आ सकती है, इस पर ध्यान देने से जो बातें सामने आ रही है वो कुछ इस तरह है -
a) पैसे का लेन-देन - अब चूंकि इस काम में आमदनी कम और लोक-कल्याण की भावना ज्यादा है तो इसमें पैसे को लेकर ज्यादा समस्या नहीं होगी। फिर भी इस समस्या का एक त्वरित उपाय है। अब जैसे मुनस्यारी से गाड़ी थल तक आएगी। उसका जो भी हिसाब किताब है थल में ही पूरा होगा। मुनस्यारी से काँच भेजने वालों को हल्द्वानी तक कितना काँच पहुंचा इससे कोई मतलब नहीं। ठीक कुछ ऐसा आगे भी होगा।
b) काँच कौन इकट्ठा करे - काँच इकट्ठा करने का काम आप करेंगे, मैं करूंगा, ये जनता करेगी। समस्या हमने तैयार की है तो नि:संदेह इसे ठीक भी हम ही करेंगे अब चूंकि ये कोई सौदेबाजी या फायदे वाला काम तो है नहीं कि कोई देवदूत या एनजीओ वाला टपक जाए। सो काम हमें करना है। और क्या ये भी कोई काम है, बोतलें एक किसी जगह में इकट्ठी करनी है। मेरा सुझाव है कि सबसे पहले इस काम की शुरूआत एक मुहिम की तरह स्कूली बच्चों के द्वारा हो। इससे शराब और उससे होने वाले दुष्प्रभाव को लेकर गजब का परिवर्तन होगा। जब कोई स्कूली बच्चा अपने ही घर से बोतलें जमा कर आगे भेजेगा तो उसके घर में शराब पीने वालों में शर्मिंदगी आएगी और फिर शराब और उससे होने वाले नुकसान को लेकर चेतना आएगी। कुल मिलाकर ये कदम एक तरह से शराबबंदी का भ्रूण तैयार करने में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
c) किसकी गाड़ी में जाएगा काँच - जहां तक मुझे याद आ रहा है बिल्डिंग मटेरियल वाली गाड़ियां रामनगर से मुनस्यारी तक आती है। हमने देखा कि बहुत सी ऐसी बड़ी गाड़ियां हैं जो मुनस्यारी से खाली निकलती है। खाली गाड़ियां नहीं भी मिली तो भी कौन सा रोज काँच भेजना है। कम से कम एक ट्रक कांच इकट्ठा होने में पंद्रह बीस दिन का समय लग ही जाएगा। लोक-कल्याण की भावना से काँच भी इकट्ठा होगा, लोग खुलकर सामने आएंगे, गाड़ियों की व्यवस्था भी होगी और काँच गाड़ी में लादकर मुनस्यारी से आगे जाएगा भी।
d) जागरूकता की समस्या - शुरूआत में लोगों को इस मुहिम से जोड़ने में समस्या आ सकती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि पहाड़ में ऐसे छोटे से काम के लिए जागरूकता को लेकर कोई ज्यादा समस्या पैदा होगी। क्योंकि ये वही समाज है जो आज भी सवारी गाड़ियों के माध्यम से चंद खीरे और दूध की बोतलें सौ सौ किलोमीटर दूर अपने रिश्तेदारों के पास भेजते हैं, ये वही समाज है जहाँ आज भी विश्व में सबसे ज्यादा संयुक्त परिवार है, ये वही समाज है जो बिना किसी दिखावे के, बिना किसी सांगठनिक सहयोग के सैकड़ों सालों से पहाड़ों में पत्थर तोड़कर पगडंडियां बनाते आये हैं। ऐसी जिस समाज की बनावट है। ऐसे जीवन मूल्यों को जो समाज आत्मसात किए हुए है, उस समाज से इतनी अपेक्षा तो की जा सकती है कि वह संगठित होकर काँच की इन बोतलों को रिसाइकलिंग के लिए बाहर भेज दे।
आज ये इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा है कि इस जगह के बारे में लोगों को बताकर, यहां की खूबसूरती दिखाकर, भले ही मेरी बात कुछ थोड़े लोगों तक ही पहुंची हो लेकिन फिर भी मैंने यहां का बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है।
असल में महीने भर पहले हम एक पहाड़ी गांव को गये थे। वहां एक दादी ने मेरे कैमरे को देखते ही नाराजगी जताई और बंद करने को कहा। मुझे उस नाराजगी का मर्म समझने में काफी समय लग गया। मानो वो दादी मुझसे मन ही मन कह रहीं हों कि आपने मशीनों से घिरकर अपनी जिंदगी नर्क बना ली है अब ये सब यहां मत आजमाइए।
सोचता हूं अभी तक मैंने मुनस्यारी से जुड़ी जितनी तस्वीरें, वीडियो या अन्य जानकारियां जो भी मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से यहां बांट दी है। उन सबको हमेशा के लिए हटा दूं। लेकिन अब हटाने का क्या फायदा, अब तो आप देख ही चुके हैं।
फिर भी आपमें इंसानियत होगी तो कभी मत आइएगा इन जगहों पर। आइएगा तो भी एक सभ्य इंसान की तरह वरना नहीं। भूखे भेड़िए के भेष में आएंगे और नुकसान पहुंचा के चले भी जाएंगे बाकी लोगों की तरह तो भी कोई क्या कर सकता है। अब इस बात का डर रोज सताने लगा है कि टूरिज्म के चक्कर में मुनस्यारी का हाल शिमला, मनाली, नैनीताल, लद्दाख, श्रीनगर जैसा न हो जाए। वहशीपन लिए भीड़ की मानसिकता कब कहाँ अपनी जड़ें जमा ले। कुछ कह नहीं सकते।
टूरिज्म का आज जैसा माहौल बनाया जा रहा है उससे कैसे कोई जगह बर्बाद हो जाती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण लद्दाख है। खासकर "थ्री इड्यिट्स" फिल्म के बाद लद्दाख जाने वालों का हुजूम बढ़ता ही गया ठीक ऐसा ही कुछ "ये जवानी है दीवानी" फिल्म के बाद मनाली के साथ हुआ लेकिन सबसे अधिक नुकसान लद्दाख को ही हुआ। वहां का रहन-सहन, खान-पान, वहां की पूरी संस्कृति आज खतरे में है। आज लगभग हर युवा के लिए जिंदगी का सपना सा है कि एक बार लेह-लद्दाख जाकर खुद को संतुष्ट कर ले।
आप सोच रहे होंगे कि भाई हम तो अपनी बाइक, अपनी कार लेकर बस घूमने गये थे। किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
पर आपको ये कभी नहीं दिखाई देगा कि जिन बंदरों को आप के अंदर का मूर्ख समाजसेवी रास्ते में कहीं रूककर बिस्किट और चिप्स खिला देता है वही बंदर बाद में इन चीजों के लिए लूट मचाते हैं। जो जंगली जानवर बढ़िया फल, कंद-मूल से चलते थे, आपने उनको भी नहीं बख्शा, उनकी आदतें बिगाड़ दी, वो भी चंद तस्वीरों के लिए। अब चूंकि आपकी हवस इतनी ज्यादा है कि आप ये सब कुछ नजरअंदाज कर जाते हैं।
लद्दाख में आफ रोड गाड़ियों को अपने एडवेंचर के लिए आप कहीं भी ले जाते हैं। आपको इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है कि आप छिपकली सांप आदि सरीसृपों के अंडों को, जमीन में घोसलें बनानी वाली छोटे पक्षियों के अंडे और कुछ छोटे स्तनपायी जीवों को अपनी गाड़ी से कुचल रहे होते हैं।
आप अपनी एसयूवी कार लेकर लद्दाख के छिछले पानी में, नदी के किनारों में दौड़ाते हैं, यूट्यूब के वीडियो मटेरियल के लिए। लेकिन आप ये नहीं देख पाते कि आपकी इस एक हरकत से पर्यावरण का कितना नुकसान होता है। आपके गाड़ी के चक्के ऊपरी मिट्टी को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, उस पानी में उगे जलीय पौधों एवं जलीय जीवों के भ्रूण(अंडे) को कुचल जाते हैं और आपको खबर ही नहीं। आपके गाड़ियों के बार-बार हार्न बजाने से रेसिंग करने तक, ऐसी न जाने कितनी हरकते हैं, इन सबसे पहाड़ों को इन कोमल चट्टानों को कितना दूरगामी नुकसान पहुंचता है, इसे आप कहाँ देख पाएंगे। आजकल जो हाई सस्पेंशन वाली कारें बनती हैं उनका तो विज्ञापन वाला वीडियो भी बिना नदी नालों को नुकसान किए नहीं बन पाता। जैसा देखा वैसा सीखा वाला तर्जुमा है।
असल में देखा जाए तो अधिकतर लोग पहाड़ घूमने नहीं आते। वे तो पहाड़ों को, इन नदियों को, इन खूबसूरत वादियों को अपनी रखैल समझते हैं,जी भर के अपने क्षणिक सुख के लिए अमुक जगह को निचोड़ते हैं अपनी हवस रूपी भूख से। शराब पिया और फेक दिया कहीं भी बोतल, पानी की बोतल भी, चिप्स वगैरह की पन्नी भी। और तो और जहां टूरिज्म नामक भूत पहुंचा वहां उस जगह की फूड हैबिट को ही लील लिया, न जाने ऐसे कितने तरीकों से नुकसान पहुंचता है।
"हमारी सुविधाएं जितनी बढ़ती जाती है उसी के साथ हमारी जिम्मेदारियां भी उतनी ही बढ़ जाती है।" हम प्रकृति की इस साम्यावस्था को कब समझेंगे?
अच्छा स्थानीय फूड हैबिट को नुकसान कुछ इस तरह पहुंचा कि जिन गांवों में सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं वहां भी फास्ट फूड की छोटी-छोटी दुकाने खुल गई इसलिए नहीं खुली कि फास्ट फूड उनके शौक की चीज है और उसके बिना वे रह नहीं सकते बल्कि इसलिए कि बाहर से कोई टूरिस्ट अगर आएगा तो वह अवश्य फास्ट फूड खाएगा ही। आज के जमाने के हिसाब से तो यही सबसे बेहतर विकल्प प्रचलन में है। लेकिन टूरिस्ट एक सीजन में ही आएगा, बाकी समय कैसे किया जाए इस फास्ट फूड का। तो इस समस्या का समाधान भी मानसिकता कर देती है और वो ये कि गांव का व्यक्ति शहर के व्यक्ति को अपने से अधिक कुशल, सभ्य और बुध्दिमान समझता है इस चक्कर में वो अपने खान-पान रहन-सहन,तौर-तरीकों को छोटा समझता है। और शहरी खानपान उसे अमृत तुल्य लगने लगता है। और कुछ इस तरह वो भी फास्ट फूड को अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है।
आज आप उत्तर भारत के किसी भी पर्वतीय इलाके में जाएं आपको भले वहां खाने को कुछ मिले न मिले लेकिन नूड्ल्स और मोमो की दुकानें अवश्य मिल जाएंगी।
आपने तो सालों तक दिन रात काम किया, नाइट शिफ्ट भी किया है। लाइफ में बहुत कुछ देखा है, काफी संघर्ष किया है, जीतोड़ मेहनत की है तब जाकर सफलता के मुकाम पर पहुंचे हैं। अब जब इतना कुछ किया है तो थोड़ा सुकून भी चाहिए, अपनी मानसिक थकान मिटाने आप पहाड़ आएंगे, ऐश करेंगे। जीवन में आपने इतना त्याग,इतना समर्पण कर दिया कि नंगापन मचाने का तो अब तो मानो आपके पास सर्टिफिकेट है, अब चूंकि आपके पास अनाब-शनाब पैसे हैं और इन पैसों से आपको नाना प्रकार की सुविधाएं भोगनी है तो आपके भूख की चिंता लोगों में इतनी ज्यादा है कि आपके हिसाब से खानपान तैयार होता है, बाहर से चीजें मंगाई जाने लगती है, स्थानीय फूड-हैबिट की ऐसी की तैसी। आलीशान होटल तैयार होते हैं, शराब और शबाब की जुगत लगाई जाती है वगैरह वगैरह।
आप आएंगे नुकसान रूपी बटन दबाकर अपनी आत्मलिप्सा भुनाएंगे और फिर चले जाएंगे। और जाकर कुछ अपने साथियों के साथ जानकारियां साझा करेंगे तब तक एक पूरा का पूरा शहर आपकी भूख के मुताबिक तैयार होने लगेगा।
कई लोग स्वयं की खोज में निकला हूं वाली नौटंकी लेकर चलते हैं और वो भी पर्यावरण की खूब ऐसी-तैसी करते हैं। और मन ही मन #peace#serenity की चोचलेबाजी करके घर वापस लौटते हैं। आज मानव मन इतना अधिक संवेदनशील कैसे हो गया है कि जिस हैशटैग से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है बाद में उसी हैशटैग से पर्यावरण को बचाने का रोना रोता है।
खैर कितना लिखा जाए...
आखिरी बात ये कि ...
मुझे कभी नहीं लगा कि हमारे आसपास के वातावरण की ऐसी छोटी-छोटी चीजें जानने-समझने के लिए किसी पढ़ाई या विशेषज्ञता की जरूरत है। बस नेकनीयती हो तो काम बन पड़ता है। जब गांव का अनपढ़ किसान इन चीजों का ख्याल कर सकता है तो आप और हम क्यों नहीं। आप और हम तो वैसे भी पढ़े-लिखे हैं।
और अगर आप मेरे इस माफीनामे को स्वीकार करते हैं तो इन छोटी-छोटी चीजों पर जरूर ध्यान दीजिएगा। क्योंकि ज्वालामुखी एक दिन में तैयार नहीं होता वो तो हमेशा अंधेरे से घिरा होता है और जब फूटता है तो उसी अंधेरे को उजाले में तब्दील कर देता है और हम आश्चर्यचकित हो उठते हैं।
आंटी जी, आपके बेटे ने दसवीं की परीक्षा दी है। वो पिछली बार फेल हो गया था। और फिर क्या हुआ आप भी जानती हैं, ट्रक में बैठ के महीने भर के लिए घर से भाग गया। वापस आया तो फिर वही ताने और मार से उसका स्वागत किया गया। आप भी क्या करेंगी, आप खुद ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, न तो जमीनी समझ है न ही अपने बच्चे की काउंसलिंग करने की कोई जानकारी है। वो क्या सोचता है, क्या करना चाहता है, ये आपको नहीं पता, और इत्तफाक से मुझे भी नहीं पता। बेशर्मों की तरह आप लोगों से सुनता है, मार खाता है, कुल मिला के निर्लज्ज हो चुका है। और हां शराब, सिगरेट बराबर पी रहा है। आपको भी पता ही होगा कि वो ये सब कर रहा है, लेकिन आपने प्रत्यक्ष रूप से उसे पकड़ा नहीं तो आप भी पढ़ाई के नाम से उसे डांट लगा कर काम चला रही हैं।
मैंने उसे महीने भर मुफ्त में पढ़ाया और आपने मुझे कभी-कभार अपने घर में खाने का न्यौता दिया, बस काफी है इतना। इस बीच मैंने उसे रगड़ा, खरोंचा, उसके अंदर झांका, कि कुछ तो काम का बाहर निकले पर अभी फिलहाल सब धुंधला है। लेकिन ये बात स्पष्ट है कि आपके बेटे की पढ़ाई में थोड़ी भी रूचि नहीं है, इस बात को आप गांठ बांध लीजिए। वो कभी-कभी धंधा-बिजनेस करने की बात छेड़ते रहता है, वो भी मजाक में। लेकिन मुझे वहां आशा की किरण दिखाई देती है। लोग बच्चों को शिक्षा देने की बात करते हैं, लेकिन मैं आज आपसे कहना चाहता हूं कि आप उसकी पढ़ाई छुड़वा दीजिए। फालतू पैसे व्यर्थ मत करिए, उसका पढ़ने का मन थोड़ा भी नहीं है।
सुनिए, आज आपके शहर में हूं, कल कहीं और रहूंगा, मेरा कोई निजी स्वार्थ तो है नहीं, इसलिए मुझे आपके बेटे से उसकी पढ़ाई से कोई मतलब नहीं है, लेकिन आपको जमीनी हकीकत बताना मेरा दायित्व है। आपका बेटा एकदम खोखला है, खासकर पढ़ाई के मामले में एकदम डब्बा। उसे जोड़ घटाना तक ढंग से नहीं आता। मेरी राय में आप उसे अभी से बिजनेस लाइन में डाल दीजिए, पूरा एक रूपांतरण हो जाएगा, खाली बैठे शराब सिगरेट कर रहा है, कुछ तो कर्त्तव्यबोध आएगा। कमाने का एक दायित्व हमेशा रहेगा तो शायद कल को नशा पानी भी एक सीमा में रहे। हां खींचतान करके 12th तक ले जाना चाहती हैं तो ठीक है, एक टैग रहेगा कि चलो बारहवीं के बाद ही पढ़ाई छोड़कर काम धाम में लग गया।
और रही बात कि उसके इस बार के दसवीं के पेपर की, इसमें कोई शक नहीं कि इस बार फिर से वो फेल हो जाए, गिरते-पड़ते पास हो भी जाए तो भी कोई मतलब नहीं है। मैं इस बात की गारंटी दे नहीं सकता कि महीने भर मेरे से पढ़के वो दसवीं में पास हो जाएगा, वैसे भी मैं कोई सब्जेक्ट स्पेश्लिस्ट तो हूं नहीं लेकिन मैं इस बात की गारंटी लेता हूं कि अगर वो फेल हो गया तो भी इस बार वो घर से भागने वाला काम नहीं करेगा।
पढ़ाई से इतर मैंने उसमें जीने की, आगे बढ़ने की लालसा भर दी है, मेरा योगदान सिर्फ इतना सा है।
प्रिय अंकिता,
सबसे पहले मैं तुम्हारी खुशहाली की मंगलकामना करता हूं कि तुम्हारी चोट जल्दी से ठीक हो जाए और तुम जल्द से जल्द शास्त्रीय नृत्य और संगीत की धारा में वापस लौट आओ। जब तुमने मुझे बताया था कि तुमने भरतनाट्यम, कुचीपुड़ी, मोहिनीअट्टम सीखा हुआ है, मुझे सुनकर यकीन न हुआ। मैं एक पल के लिए अवाक रह गया। आज तुमने बताया कि हिन्दुस्तानी क्लासिकल का कोर्स तुमने पूरा कर लिया है और अब Carnatic Classical सीख रही हो, साथ ही गिटार भी सीख रही हो। तुमने बताया कि अब से तो यही मेरी दुनिया है। तुमने ये भी बताया कि इंडियन क्लासिकल डांस और संगीत पर लोग हंसते हैं, उन्हें बोरियत होती है। हां सेन्सुउल और फूहड़ जो नहीं है भारी कपड़े जो पहनने पड़ते हैं, थोड़ा सभ्य बनना पड़ता है तो अधिकांश लोगों को तो ये बोर ही करेगा
"You know the ongoing perception is like, they have no idea what are the ABC of Indian classics and without knowing the roots they are busy degrading our own great indian classical dance forms and now what they do..they are very curious about learning various forms of western classics like bachata, hiphop, salsa, zumba etc."
तुम्हें सच कहूं तो ये अब आम बात है, तुम इस पर जरा भी ध्यान मत देना, लोग खोखले होते जा रहे हैं, उन्हें हो जाने दो, वैसे भी ये वैस्टर्न डांस ज्यादा दिन का नहीं है क्योंकि इसका अपना कोई साहित्य, इसकी कोई अपनी संस्कृति नहीं है। और पता है सबसे मजेदार बात क्या है, आजकल हर संडे सरकारें भी सड़कों पर जुंबा डांस कराने लगी हैं, सबको एक तरह का लिबास बांट दिया जाता है और खूब महफिल जमती है। शापिंग माल में तो आये दिन फ्लेश माब(flash mob) का आयोजन होना आम बात हो गई है। लेकिन तुम इन सब से कभी हतोत्साहित न होना, ये मत सोचना कि शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता खत्म हो गई है, बल्कि मैं तो कहता हूं कि तुम पर एक बड़ी जिम्मेदारी आन पड़ी है। तुम्हें आनी वाली पीढ़ियों तक इसे पहुंचाना है, अपनी पुरातन संस्कृति को नये हाथों में सौंपना है।
तुम्हें पता है भरतनाट्यम को देवदासियों का नृत्य कहा जा रहा है और दक्षिण भारत में बड़े ही सुनियोजित तरीके से इसके मूल(Origination) को नष्ट करने की कोशिश हो रही है। Western Forces बड़ी चालाकी से ये काम कर रही हैं। पता है कुछ समय से ऐसा हुआ है कि चीजें बदली है, लोग विरोध करने लगे हैं, और तो और अपने बच्चों को शास्त्रीय नृत्य सीखाने के लिए आगे भी आ रहे हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वहन तुमने भी किया है, तुमने बताया कि तुम्हें सीखाने वाले गुरू एक लड़का है। पता है Western Forces ने यहां भी अपनी घटिया मानसिकता का परिचय दिया है। किसी एक घटना की तस्वीरें और जानकारी इकट्ठी कर वे इस पूरे गुरु-शिष्य परंपरा को कुछ इस तरीके से पेश करते हैं कि देखने वालों को ये लगेगा कि कोई नृत्यांगना बिना शोषित हुए नृत्य नहीं सीखती। मतलब नृत्य सीखाने के नाम पर देवदासियों की भांति बड़ी मात्रा में शोषण होता है वगैरह वगैरह। मैं ये बात समझ सकता हूं कि सुन के अटपटा लगता है, ऐसी चीजों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पर क्या करें ये साक्षात हमारे सामने हो रहा है, हमारी पुरातन संस्कृति, भाषा, बोली, नृत्य संगीत इन सब में कुछ न कुछ खामी निकालकर, इसे सढ़ा हुआ, पुराना माडल बताकर इसे जड़ से मिटाने का प्रयास किया जा रहा है।
सीधा-सीधा ऐसे समझें कि हम भले कितने महंगे प्लेट में खाना खा लें लेकिन एक जो पत्तल या केले के पत्ते में हम कभी-कभी शादी या फेस्टिवल में खाना परोसते हैं, हम अपनी इस संस्कृति को कभी छोड़ नहीं सकते। ये हमारी पहचान है, हमारा सब कुछ है।
खैर तुम समझ गई होगी कि मैं तुम्हें क्या कहना चाहता हूं। पता है मुझे न बहुत खुशी हुई जब तुमने कहा कि निकट भविष्य में तुम अपने बच्चों को शास्त्रीय नृत्य सीखाओगी। सच्चे मन से कहता हूं "अंकिता गर्व है तुम पर"।
जल्दी से पूरी तरह ठीक हो जाओ, खूब आगे बढ़ो, खूब तरक्की करो।
मेरी शुभकामनाएं।
Ankita during bharatnatyam performance
Ankita during Krishna leela Dance
Ankita Performing Kuchipudi
Ankita and his Guru
Ankita Got awarded by legendary singer Shri bala Subramanian in Hyderabad
Awarded in all india artist association Shimla for bharatnatyam
Renowned Artist Shri Sudarshan gaur ji standing on the left.
Singing Hindustani sugam sangeet in all india music and
dance competition conducted by kerala samajam
आयुष,
मैंने तुम्हारे नाम के सामने कोई संबोधन नहीं जोड़ा है। सिर्फ तुम्हारा नाम लिख दिया है। उम्मीद करता हूं कि तुम जब बड़े हो जाओगे तो तुम्हें इस बात का ध्यान हो कि तुम्हें इस नाम को अपने अर्थ तक पहुंचाना है। इस साल तुमने अपनी जिंदगी की पहली बर्फबारी देखी है। जानकर बहुत खुशी हुई, शायद कुछ महीने बाद तुम एक साल के हो जाओगे। फिर बोलने लगोगे, चलने लगोगे। इस बीच तुम्हारे मां-बाप और आस-पास के रिश्तेदार हर कोई तुम्हें बहुत लाड़-प्यार देंगे। हमेशा हंसायेंगे, तुम्हें खुश करेंगे। याद है पिछली बार जब तुम देर तक हंस रहे थे तो मैं तुम्हें देखकर शांत हो गया था फिर तुम भी मुझे देखकर शांत हो गए और फिर मैं जब धीरे से मुस्कुराया तो तुम भी मुस्कुराने लगे थे। हमारी बात हो रही थी, मेरे से बात करने का शुक्रिया आयुष।
आयुष! अभी तुम्हें बहुत कुछ देखना है, सीखना है। तरह-तरह के लोगों से घुलना-मिलना है। उनके चेहरे से चेहरा मिलाना है। उन्हें खुशी पहुंचाने के लिए हंसना भी है। मम्मी-पापा को ज्यादा परेशान मत करना। पता है कई बार तुम्हें गोद में लटकने का मन नहीं करेगा, फिर भी तुम लटकोगे क्योंकि तुम्हारे पास और कोई दूसरा उपाय नहीं है। तुम हंसते हुए सबको खुश रखना। किसी को मत बताना कि तुम क्या चाहते हो। तुम इस बीच किसी से मत घबराना, तुम्हें बहुत से चेहरे और बहुत से भाव दिखाई देंगे, तुम सबको ध्यान से देखते जाना, हमेशा निडर रहना और खूब सीखना। आयुष तुम किसी से शिकायत मत करना, तुम सबको खुश रखना, मैं तो हमेशा तुम्हारे आसपास हूं। मुझे कभी-कभी लगता है कि लोग जब तुम्हें खुश करने के लिए अलग-अलग तरीका अपनाते हैं तो तुम उन पर हंस रहे होते हो। तुम्हारे देवत्व से अनजान वे खुश होते हैं कि उन्होंने तुम्हें हंसाया। पता है जब कभी तुम मेरी ये चिट्ठी पढ़ने लायक हो जाओगे तो किसी को मत बताना कि बचपन में तुम आंखों-आंखों में चाचा से बात करते थे, क्योंकि वे यकीन नही करेंगे।
अभी तुम एक साल के होने वाले हो, कुछ साल बाद तुम बड़े हो जाओगे, चलने लगोगे और जब दौड़ने लगोगे तो खेल के मैदान में हाथों में फुटबाल लिए मैं तुम्हारा इंतजार करुंगा।
मेरे शब्द तुमसे क्या कहते,
वो ये नहीं कहते कि तुम खूबसूरत हो।
वे कहते कि उसने तुम्हारे इन बालों को देखा,
जो कभी-कभी खुलते हैं तो हवा में तैरने लगते हैं,
कभी माथे को चूमते हैं
तो कभी कानों में सुशोभित बालियों को छूते हुए मदमस्त लहराते हैं।
बेफिक्र, बेपरवाह तुम्हारे ये बाल छुपा देना चाहते हैं तुम्हारे चेहरे को भी,
वो कहना चाहते हैं कि तुम मेरा आभूषण भर नहीं हो,
तुम मेरा हिस्सा हो, तुम्हारे बिना अधूरापन सा लगता है।
तुम कभी मुझसे नाराज मत होना,
दिन में कम से कम एक बार मुझ लहराते बालों से मिल लेना,
कुछ एक मिनट के लिए बात कर लेना।
और हां तुम, अब तुमसे कह रहा हूं,
इन दोनों को न तुम ऐसे ही मिलने देना, बात करने देना,
ये दोनों जिन्दगी भर हमेशा तुम्हारा ख्याल रखेंगे।
तुम्हारा शुक्रिया अदा करेंगे।
और तो और जब भी तुम्हारे आसपास निराशा रूपी बादल आने लगेंगे,
तो मोर पंख की तरह तुम्हारे ये बाल लहराने लगेंगे,
चेहरे के करीब से एक लकीर बनाते हुए,
अपने क्षेत्रफल पर अधिकार जताते हुए,
विस्तार को विभाजित करते हुए,
तुम्हारे इन गालों को छूते हुए वो खुली हुवा में उड़ने लगेंगे।
हां तुम इन्हें रोक न पाओगी,
ये लहराने को इतना बैचेन हो जायेंगे कि तुम्हें इन्हें खोलना पड़ेगा,
खुली हवा के हाथों छोड़ना पड़ेगा।
देखो,
तुम्हारे आसपास कुछ पत्तियां गिरी हुई है,
हां वो झड़ चुकी हैं तुम्हारे किसी टूटे बाल की तरह,
वो भी कभी किसी पेड़ का हिस्सा थी।
पर वो अब अकेली पड़ गई है, हवा आती है और उन्हें दूर कहीं ले जाती है।
वो तुम्हारे इन बालों की तरह मजबूत नहीं हैं,
उनकी शक्तियां सीमित हैं,
उनके अणुओं का समुच्चय कमजोर है
इसलिए तो हवा, पानी और मिट्टी हर कोई उनको अस्तित्व विहिन कर देता है।
उन्हें भी पता है कि उनका जीवन क्षणिक है इसलिए उन्हें अब किसी पराये माध्यम(हवा) के सहारे यहां से वहां जाना नहीं पसंद,
वो अपने शरीर पर अब और मिट्टी लादना नहीं चाहती,
उन्हें पानी में भीगना भी नहीं पसंद,
देखो न सूरज की किरणों की वजह से उसकी त्वचा पहले से कितनी फीकी पड़ गई है।
अब तो इस आवारगी से बेहतर वो जल जाना पसंद करेगी।
बिना आवाज किए आग में कहीं जलकर तुम्हें रोशनी और ऊष्मा से भर देगी।
क्या तुम्हें उसका ये समर्पण दिखाई नहीं देता,
क्या तुमने उसके अकेलेपन को महसूस किया,
तुम्हें तो ये पतझड़ का मौसम लगता है।
और सुनो अभी भी वहीं कहीं बैठी न हो न तुम,
देखो वहीं पास में हवा के साथ-साथ एक चिड़िया आयेगी और दाने चुगकर चली जाएगी,
हां ये भी तो उसी हवा का हिस्सा थी, जिसने तुम्हारे बालों को आकर छुआ है।
तुमने उस चिड़िया को नहीं देखा न,
तुम्हें सच में उसे देखना था,
उसके पंख भी लहराते हैं ठीक तुम्हारे इन बालों की तरह,
हां ये दुनिया की सबसे खूबसूरत सममिति है।
सुनो!
तुम्हारा माथा इतना सूना क्यों लग रहा है?
क्या कहा?
तुमने टीका नहीं लगाया,
काश तुमने टीका लगाया होता तो मैं कह पाता,
कह पाता कि लाल रंग का टीका तुम्हारे श्रृंगार को द्विगुणित कर देगा,
गाढ़े लाल रंग का टीका,
जिसमें कुछ पीले चावल चिपके होंगे जो तुम्हारे चेहरे की शोभा बड़ा रहे होंगे।
लेकिन कुछ देर के बाद तुम्हें ये अहसास होगा कि चावल के दाने जो चिपके हुए थे,
वो अब धीरे-धीरे झड़ने लगे हैं।
ये वही चावल के दाने हैं जो जमीन पर गिरने से पहले,
अपने अंग-प्रत्यंग को उस लाल रंग से लपेट देना चाहते हैं।
अपने मूल श्वेत रंग को तो उन्होंने पहले ही खो दिया है,
अब वे इस पीले रंग को त्याग कर लाल हो जाना चाहते हैं।
पता है वे ऐसा क्यों करते हैं,
वो इसलिए कि नीचे गिरने के बाद जब कोई श्वेत चावल का दाना उन्हें देख कर मजाक उड़ाने लगता है तो वे इस लाल रंग को एक साक्ष्य के रूप में दिखाते हैं और अभिमान से कहते हैं कि देखो मुझमें अब पीला रंग ज्यादा नहीं बचा है।
ये देखो लाल रंग, पता है इसे मैं कहां से लेकर आया हूं।
वो जल्दी देखो सामने,
श्वेत चावल - कितनी खूबसूरत है वो।
पीला चावल- हां मैं अभी उस लड़की के माथे पर था, तुम क्या जानो कि मैं उसके सौंदर्य का हिस्सा था। हां ये मेरा सौभाग्य है कि मैं उसकी त्वचा से लिपटकर आज उसके श्रृंगार का हिस्सा बना, उसी ने मुझे बदले में ये कीमती लाल रंग दिया है। पता है वो मुझे छोड़ना नहीं चाहती थी लेकिन मैंने ही अपनी पकड़ ढीली कर ली और नीचे यहां तुम्हारे पास आ गिरा, पता है मैंने ऐसा क्यों किया ताकि वो फिर से मुझ पीले चावल को अपनाए। कल जब फिर से वो खुद को संवार रही होगी तो मैं एक नये पीले चावल का रूप धर लूंगा और पीतल की थाली में उसका इंतजार करुंगा।
मेरे लिए अभी भी यकीन करना मुश्किल हो रहा है, आपने इतना प्रोत्साहित किया इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर,
साथ ही गुरू पूर्णिमा की बधाई।
आज मैं वही लिखूंगा जो नहीं लिखा गया।
पता नहीं आपको याद है कि नहीं लेकिन आप जब इतिहास पढ़ा रहे थे तो आपने एक बार गांधीजी का उद्धरण दिया था कि गांधीजी दातौन करने के बाद उस दातौन को एक जगह साल भर इकट्ठा करते थे फिर उससे खाना पकाने लायक लकड़ी इकट्ठा हो जाती थी।
ये बात इसलिए याद है क्योंकि मैंने इस बात को दिल में उतार लिया।
आगे चलते हैं,
आपने नेपोलियन के बारे में एक प्रसंग बताया था कि वो क्यों अकेले एक बंद कमरे में खाना खाता था, उस प्रसंग से भी मैंने बहुत कुछ अपनी जरूरत के मुताबिक समेट लिया।
और ये काफी हद तक सच है कि किसी के साथ खाना खाने बैठ जाओ तो उसके घर के संस्कार मालूम हो जाते हैं।
आगे-
उस समय हमारा कारवां महाजनपद काल में था,उन दिनों प्रधानमंत्री का एपिसोड काफी चर्चित हुआ करता था,आपने कहा था कि चाणक्य भी देख लिया कीजिए..मैंने शुरू से देखना शुरू किया..ईमानदारी से कहता हूं 38 एपिसोड तक लगातार देखा हूं, विष्णुगुप्त का जीवंत किरदार आज भी आंखों में झूलता है।
अब बात आती है मैप की-
याद होगा आपको,दीवार में कोई मैप चिपका है तो वो दीवार के कोनों के समानांतर/लंबवत् ना हो तो कितना अटपटा लगता है, हां आपकी तरह मुझे भी बिल्कुल यही लगता है।
ये छोटी सी बात सिर्फ मैप ठीक करने तक की ही नहीं बल्कि परफेक्शन की है।जिसे हम जिंदगी के हर पड़ाव में लेकर चलना जरूरी समझते हैं।
इतिहास की पहली क्लास पहला टापिक पहला पेज..शुरूआत हुई थी वो भी रेनेशां से।
आज मैं अंत भी इसी शब्द से करता हूं,मेरे लिए ये सारे उध्दरण ही रेनेशां है।