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Monday, 2 May 2022

माँ - एक कविता

वह खड़ी रहती है एक दीवार की तरह,
जो हमेशा हमें संभालती रहती है।
बचपन में हमारे शरीर को चोट से बचाती है,
और जवानी में मन को घायल होने से रोकती है,
वह माँ होती है।

उसे पता होता है हम घायल हैं,
हमारे मन के घाव उसे अपने घाव लगते हैं,
वह कोशिश करती है कि,
उन घावों पर दुबारा चोट न लगे।
दुआ सलामती करते हुए कुछ यूं,
वह मरहम पट्टी करती रहती है।

यह काम वह रोज करती है,
क्योंकि उसे पता होता है कि,
मन के घाव ठीक होने में समय लेते हैं।
वह जानती है कि,
शरीर की चोट से तो खून बहता है,
लेकिन मन पर लगी चोट से,
खून बहना तक रूक सकता है।
इसलिए वह एक साथी दोस्त की तरह,
दूर रहकर भी पास ही होती है।

ये अहसास‌, ऐसा विश्वास,
जब तक कहीं और महसूस न हो,
तब तक लोगों से बचना ही चाहिए।

Sunday, 28 November 2021

We dont want MSP - Analysis by Mehak Singh Tarar

नहीं चाहिये MSP -

1. 1980 मे खेती मजदूर दोपहर तक का 3 किलो अनाज लेता था।
सरकार आज 3 किलो गेंहू के बस उतने दाम दे दे कि किसान अपने मजदूर भाई को वर्तमान समय की आधा दिन की मजदूरी (Rs. 200) दे पाये।
बिल्कुल ना दे MSP, हमें नहीं चाहिये।
2. 1967 मे गेंहू का दाम था 76 Rs प्रति क्विंटल ओर सोने (Gold) का रेट था 102 Rs तोला। मतलब 135 किलो गेंहू बेचकर 1 तोला सोना खरीदते थे किसान।
हमे सरकार 135 किलो गेंहू/तोला के हिसाब से पेमेंट करे भले MSP ना दे।
3. 1967 मे 1 सीमेंट का कट्टा 8 Rs का था। मतलब 1 क्विंटल गेंहू मे साढ़े नौ कट्टे सीमेंट आता था।
सरकार आज भी बस साढ़े नौ कट्टे सीमेंट के बराबर गेंहू का रेट दे दो।
4. गेंहू का पहला MSP था 76 रुपये(1967) और उस समय एक क्विंटल में ढाई हजार ईंट आती थी। आज उतनी ही ईंटे 12-14 हजार की आती है।
किसान को घर बनाने के लिए ढाई हजार ईंट बराबर प्रति क्विंटल गेहूँ का रेट दिलवा दो।
फिर MSP बेशक कूड़े मे डाल दो।
5. जब गेंहू का पहला MSP 76 Rs क्विंटल था तो एक क्विंटल मे एक ड्रम(200 लीटर) डीजल आता था।
बस 1 क्विंटल गेंहू में 1 ड्रम डीजल दिलवा दो।
6. मेरी RK डिग्री कॉलेज की BSc की फीस थी सवा छह रुपये ओर उस साल गेंहू था 215/क्विंटल। मतलब किसान 3 किलो गेंहू बेच कर बेटे की सालाना फीस भर देता था।
सरकार जी आज गेहू है 19.25 Rs किलो। बस ब्लॉक स्तर पर 57 Rs सालाना फीस दे कर किसानों के बच्चे पढ़ने वाले कॉलेज खुलवा दो।
फिर बेशक MSP अम्बानी अडानी को दे दो।
नोट:- महक सिंह तरार भाई साहब द्वारा उनकी अपनी पढ़ाई के आधार पर आँकलन। 
7. पिछले बीस साल मे गेहूँ बढ़ा तीन गुणा और यूरिया बढ़ा छहः गुणा।
सरकार जी या तो यूरिया आधे रेट कर दो या गेहू दुगने।
और MSP दे दो बेशक अदानी अम्बानी को। 
#MSP_C2_प्लस_50%

Wednesday, 24 November 2021

One day in Jaipur during all india ride -

फरवरी 2020 में जब भारत घूमते हुए 100 दिन पूरा करने के बाद किसानों के मुद्दों को लेकर फिर से घूमना शुरू किया तो जयपुर में एक बैकपैकर हाॅस्टल में रूकना हुआ, वहाँ उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल का एक लड़का मिल गया, इत्तफाक से हम दोनों का एक म्युचल कांटेक्ट भी निकल गया तो हम काफी देर तक बात करते रहे, बात करते-करते मैंने किसान आंदोलन के बारे में भी चर्चा की, बड़े आराम से हम चर्चा कर रहे थे, किसी पार्टी विचारधारा का समर्थन या विरोध करने की बात नहीं चल रही थी, सिर्फ किसानों की समस्याओं पर बात कर रहे थे, मैंने जो आंदोलन में देखा, जिया, महसूस किया उस हकीकत को साझा कर रहा था। इतने में उसी हाॅस्टल में रहने वाले एक इंजीनियर भाईसाहब आए, भाईसाहब किसी मल्टीनेशनल कंपनी‌ में मोटी तनख्वाह पाने वाले नौकर होंगे, मेरी बात सुनते हुए अंग्रेजी पेलने लगे और किसानों के नाम‌ पर जहर उगलने लगे, मैं चुपचाप सुनता रहा। मैंने तो कान पकड़ लिया था कि कोई कितनी भी भाषाई हिंसा करे, मैं रियेक्ट नहीं करने वाला, मैं अंत तक चुप रहा। वे बोलते रहे, अपने सतही लाॅजिक देते रहे, उत्तराखण्ड का साथी दोस्त भी सुन के मुस्कुरा रहा था। इंजीनियर साहब का बोलना बंद नहीं हुआ था, जबकि मैं उनसे आगे से बात नहीं कर रहा था, इतने में उन्होंने "bloody farmers, fuck farmers, i pay tax for this country, return my tax money" कुछ ऐसा ही कहा। अब ये सुनके मेरा दिमाग खराब हो चुका था। गढ़वाल वाले भाई ने मुझे इशारों में कहा कि मैं शांत हो जाऊं, और मैंने उनकी बातों को नजर अंदाज कर दिया। फिर उस भाई ने कहा - यार ये इंजीनियर साहब कुछ परेशान से हैं, दो दिनों से यहीं हूं, ये भी यहीं हैं, दिन भर किसी से फोन पर ऊंची आवाज में झगड़ते हैं, पत्नी है या प्रेमिका मुझे नहीं मालूम लेकिन खूब लड़ते हैं, मानसिक रूप से सही नहीं लगे मुझे तो इसलिए आपको डिबेट करने से रोक लिया।

Monday, 22 November 2021

कृषि कानूनों को लेकर मोदीजी द्वारा किसानों को समझाने के तरीके -

मोदीजी बहुत अच्छी नियत से कृषि बिल लेकर आए थे, उन्होंने इसके लिए देश भर के किसानों को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वे समझा नहीं पाए। 

मोदीजी के समझाने के तरीके निम्नलिखित हैं -

1. किसानों पर वाटन कैनन से पानी की बौछार करना और लाठियाँ बरसाना।
2. किसानों के ट्रैक्टर रोकने के लिए सड़कें खुदवाना।
3. मीडिया द्वारा लगातार किसानों को बदनाम करना।
4. इनके अपने नेताओं द्वारा खलिस्तानी आतंकवादी देशद्रोही कहा जाना।
5. आंदोलन को बदनाम करने हेतु जातीय धार्मिक कार्ड खेलना।
6. आंदोलन स्थल में कंटीले तार और कीलों से बैरिकेटिंग करना।
7. आंदोलनजीवी कहकर इस देश के किसानों का अपमान करना।
8. शांतिपूर्ण आंदोलन को बाधित करने के लिए इंटरनेट बैन करना।
9. पानी और बिजली की सप्लाई बाधित करना।
10. आंदोलन स्थल में गुंडे भेजकर उपद्रव की स्थिति पैदा करना।
11. किसानों के टैंट को जलाना, नुकसान पहुंचाना।
12. किसानों को मीटिंग में बुलाकर बार-बार अपमानित करना।
13. 50000 से अधिक किसानों पर फर्जी मुकदमें लगाना।
14. 700 से अधिक किसानों की मौत पर चुप्पी बनाकर चलना।
15. किसानों को इनके नेताओं द्वारा गाड़ी से कुचल दिया जाना।

Saturday, 20 November 2021

किसान आंदोलन के एक साल -

Even the darkest night will end and the sun will rise - Victor Hugo

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जितने भी आंदोलन हुए, उसमें भी कभी पूरा भारत नहीं जुट पाया था, ये तो फिर भी किसानों का आंदोलन है, यहाँ तो वैसी देशभक्ति वाली फैंटेसी भी नहीं है, हर किसी के लिए जुड़ पाना आसान नहीं है, श्रम से नफरत करने वालों के लिए, सामंतवादी मानसिकता रखने वालों के लिए और भी मुश्किल है। लेकिन जिनको दिख गया कि ये अपने आप पैदा हुआ आंदोलन है, वे देश के कोने-कोने से आकर जुड़ गए, चाहे अल्पकालिक हो या दीर्घकालिक, सभी राज्यों से लोग अपनी-अपनी शक्ति और सुविधा के हिसाब से जुड़े और आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा, सरकार आगे भी झुकेगी, क्योंकि किसान पीछे हटने वाले नहीं है। 
यह सब संभव हो रहा है अपना सारा अहं, अपनी सुविधाएँ, अपनी जड़ताएँ सब कुछ छोड़कर सिर्फ सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से, तन मन धन सब कुछ दाँव पर लगाकर टिके रहने से, यह काम सिर्फ इस देश का किसान ही इतने लंबे समय तक कर सकता है। फर्ज करें कि एक नौकरीपेशा वर्ग अपनी माँगों को लेकर सड़कों पर है, वह दूसरे ही दिन खाना, पानी, बाथरूम इन समस्याओं से तंग आकर आंदोलन से भाग जाएगा। आंधी तूफान ठंड गर्मी बरसात, ये सब मौसमी मार झेलने के लिए तो रीढ़ ही नहीं बचनी है, आंदोलन कहाँ से करेंगे‌।
किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी जरूरत है स्थायित्व, बस एक जगह टिके रहिए, कुछ भी हो जाए हिलिए ढुलिए मत, किसी की जान भी चली जाए, हिलना नहीं है, टूटना नहीं है, अपना सर्वस्व सौंप देना है, और यह सब इतना भी आसान नहीं है, लेकिन किसानों का फौलादी हौसला यह काम कर रहा है, आर्थिक मानसिक हर तरीके से उन्होंने खुद को इस आंदोलन में झोंक दिया है। साल भर में 700 के आसपास लोग शहीद हुए हैं, वो भी तब ये डाटा हमारे पास है जब कुछ लोगों की टीम लगातार एक‌ साल से लोगों की मौत को रिपोर्ट कर रही है, तब ये आधिकारिक डाटा मौजूद है। मुझे लगता है कि इससे ज्यादा ही मौते हुई हैं, कुछ कुछ तो हमसे छूट ही जाता है। यकीन मानिए इतनी मौतों के बाद, लाठीचार्ज वाटरकैनन, फर्जी केस बनाकर जेल भरने का कार्यक्रम और मीडिया द्वारा बदनामी। सिलसिलेवार ढंग से लगातार की गई इन तमाम तरह की हिंसाओं के बाद भी लोगों का हौसला इंच मात्र भी नहीं हिला है इस आंदोलन में, क्योंकि इनकी माँग जायज है, इसलिए इनके हौसले बुलंद है, भई जीने-मरने का सवाल है। लोगों ने अपनी नौकरियाँ तक छोड़ दी है इस देश के बेहतर भविष्य के लिए और अभी भी आंदोलन स्थल में हैं, क्या डाक्टर क्या इंजीनियर क्या सीए, नौकरी को ही जीवन का अंतिम ध्येय मानने वालों को हैरानी हो सकती है, लेकिन जब तक आप आंदोलन स्थल में जाकर झांकेंगे नहीं तो आपको समझ नहीं आएगा कि इनको साल भर से सब कुछ झेलते हुए सड़कों पर बैठने का हौसला कहाँ से मिल रहा है। सरकार के सामने माफी माँगकर कानून वापस करने की नौबत ऐसे ही नहीं आई है, आप घर बैठे चुनाव वाला केलकुलेशन घुसाते रहिए, लेकिन इस बात को समझिए कि झुकना महत्वपूर्ण है, क्यों झुका इसमें मत उलझिए, झुकना पड़ा ये बहुत बड़ी बात है, बहुमत से चुनकर आई एक पार्टी इतनी आसानी से नहीं झुकती है, और वैसे भी आज नहीं तो कल इन्हें झुकना ही पड़ता, सिर्फ किसी राज्य के चुनाव की बात नहीं है, इनके बहुमत के गुरूर को किसानों ने शिथिल किया है, डंडा किसानों ने किया है, प्रेम शांति और एकता नामक डंडा किसानों ने बजाया है तब जाकर इन्हें झुकना पड़ा है।
#farmersprotest

Friday, 19 November 2021

झांसाराम को पत्र -

प्रिय झांसा,
आज सुबह मैं देर से उठा। उठा तो देखा कि कुछ लोगों के फोन आए थे, नेट आॅन किया तो देखा कि मैसेज में न्यूज देखने की बात कही जा रही है और शुभकामनाएँ दी जा रही है। नींद ढंग से खुली नहीं थी कि एक मित्र का फोन आ गया और उसने कहा कि फेंटा पानी हो गया। फिर एक से बात हुई तो कहा गया कि झांसाराम ने थूक के चाट ली। मैं भी आनन-फानन में तुरंत भावुक। एक पल के लिए यकीन नहीं हुआ कि झांसा झुक सकता है‌। 
पिछली रात नार्थ ईस्ट जाने के लिए पूरा रोडमैप तैयार कर लिया था, और मेरे अकेले घूमने की प्लानिंग ऐसी रहती है कि दुनिया की बड़ी से बड़ी अड़चन आ जाए, मुझे रोक नहीं पाती है, एक बार सोच लिया तो बस कर लिया, लेकिन आपने तो काले कृषि कानून वापिस लेने का फैसला लेकर एकदम चौंका दिया, अब तो आंदोलन स्थल आने का मन बन रहा है, C2+50% फार्मूला और एमएसपी की गारंटी पर कानून बनवाने का रास्ता आपने हमारे लिए तैयार कर दिया है। आपने हमें एक नई जिम्मेदारी सौंप दी है। 
आप इतने जिद्दी हैं, अपनी जिद पर टिके रहते हैं, जो आपको मन करता है वही करते हैं, किसी की नहीं सुनते, लोग कहते कहते थक गये, खूब आलोचना होती है आपकी कि क्यों आप आजतक इतने सालों में एक प्रेस कांफ्रेस तक नहीं कर पाए, लेकिन आपको कभी इंच मात्र फर्क नहीं पड़ा। आपने रियेक्ट नहीं किया, आप अप्रभावित रहे, आप नहीं झुके। लेकिन इस बार क्या हुआ झांसा जी। इस बार तो आपने खुद जो कानून जोर शोर से लाया था, साल भर फायदे गिनाते रहे, विरोध करने वालों को आंदोलनजीवी कहकर गालियाँ दी, अपमानित किया, सैकड़ों किसानों की मौत का मजाक बनाया। लेकिन आज आपको किसानों से माफी माँगते हुए कानून वापस लेने की बात कहनी पड़ी। आपने तो थूक के चाट लिया झांसाराम जी। शायद आगे भी आपको यह प्रक्रिया दुहरानी पड़े इसलिए मैंने आपके लिए आज एक नया नाम सोचा है, आज से आप मेरे लिए झांसाराम, जिल्लेइलाही या फेंटा नहीं कहलाएंगे, आज से मैं आपको थूकचट्टा बुलाऊंगा।
- एक नागरिक

Monday, 25 October 2021

किसानों के लिए 5 महीने की लंबी पदयात्रा -

पिछले 11 महीने के आंदोलन में सैकड़ों ऐसे लोग देखे जो किसानों के मुद्दे को लेकर देश भर में लंबी लंबी यात्राएं कर रहे हैं, कोई कार से जागरूकता फैला रहा है, किसान काफिला नाम की टीम रही जिनकी कार छह महीने से अधिक किसानों के मुद्दों को लेकर भारत के कोने-कोने में जाकर लोगों को जागरूक करती रही, कोई मोटरसाइकिल से निकल गया ( गिलहरी योगदान मैंने भी देने की कोशिश की ), कुछ लोग साइकिल से निकले, ऐसे लोग बहुत रहे, मित्र सोनू भाई भी इनमें से एक हैं जिन्होंने महीनों तक किसानों के मुद्दे को लेकर भारत भ्रमण किया, कुछ समय पहले असम‌ का एक लड़का गुवाहाटी से सिंघु बार्डर यानि आंदोलन स्थल तक की दूरी महीने भर में तय किया। और कुछ लोगों ने महीनों तक कलश लेकर पैदल यात्राएँ भी की, कोई महाराष्ट्र से, कोई मध्यप्रदेश से, तो कोई केरल तमिलनाडु से। विदेशों से हर महीने, तीन महीने में भारत आकर आंदोलन स्थल में रहकर सेवा करने वाले लोग भी बहुत हैं। ऐसे तमाम लोगों की लंबी लिस्ट बनाई जा सकती है। 

इनकी तस्वीर इसलिए भी साझा कर रहा हूं क्योंकि इनकी यात्रा मेरे देखने में अभी तक की सबसे लंबी पदयात्राओं में से एक है। इसके अलावा भी देखें तो पंजाब हरियाणा राजस्थान से आए दिन लोग पैदल यात्रा करके आते रहते हैं, 300-400 किलोमीटर तो अब आम हो गया है, क्या बच्चे क्या बूढ़े कितने लोग ऐसा योगदान दे चुके हैं, बहुत से अपाहिज लोगों ने अधेड़ उमर में अपनी ट्राईसाइकिल तक में आंदोलन स्थल तक की दूरी कई-कई सप्ताह में पूरी की है। हर कोई अपने खर्चे से कर रहा है, ऐसे लोगों के उद्देश्य को देखकर, इनकी जिजीविषा को देखकर लोग स्वेच्छा से मदद भी करते हैं, वो बात अलग है विरोध करने वालों की भी संख्या उतनी ही है।

आंदोलन के ऐसे बहुत से जीवंत पहलू हैं, आंदोलन दिल्ली की सीमाओं में कोई किसान नेता नहीं चला रहा है, आप सारे किसान नेताओं को आज हटाकर बात करिए, फिर भी आंदोलन खत्म नहीं होगा और वो इसलिए क्योंकि किसान आंदोलन भारत के आम‌ लोग चला रहे हैं, चाबी उनके हाथ में है, किसान आंदोलन को खत्म करना है तो जो निःस्वार्थ भाव से पैदल और साइकिल में लंबी दूरी तय कर रहा है उनके हौसले को खत्म करिए, जो लोग वहाँ 11 महीने से सड़कों पर हैं, मौसमी मार और सरकारी मार झेलते हुए इस्पात जैसा हौसला लिए टिके हुए हैं, गोली तक खाने से परहेज नहीं कर रहे कि इससे आने वाली नस्लें बर्बाद हो जाएगी, इनके हौसले को आप जाकर खत्म कर लीजिए, आंदोलन कल क्या आज ही खत्म हो जाएगा। बहुत लोग मुझे पिछले क ई महीनों से घर बैठे कहते आ रहे हैं कि अब तो आंदोलन खत्म हो जाएगा, आज मैं उनसे कह रहा हूं कि आप ये बात 163 दिनों से किसानों के लिए पैदल यात्रा कर रहे उस इंसान को जाकर समझा दीजिए। भारतीय उपमहाद्वीप से कहीं दूर दूसरे महाद्वीप में बैठे लोगों को भी समझ आ गया है कि यह आंदोलन अपना मुकाम हासिल किए बिना खत्म नहीं होगा, लेकिन आप नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि आपने अभी तक महसूस ही नहीं किया है।

किसानों को इतने लंबे समय तक टिके रहने का हौसला कहाँ से मिल रहा है, यह आपको अगर अभी तक नहीं समझ आया है तो इसे जानने के लिए आपको उस जगह में जाकर वहाँ की आबोहवा को महसूस करना पड़ेगा, स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा अहिंसक आंदोलन चल रहा है। हो सके तो वहाँ बैठे लोगों से मिलकर आइए, उनसे बात करिए, क्योंकि किसान देश बचाने निकले हैं।



Friday, 22 October 2021

Gurpreet singh sangha on Farmers protest

 Gurpreet Singh Sangha take on Farmers Protest -

ओ बात सुनो बड़े फन्ने खाँ जी।
ये बदमाशी, ये स्वाग, ये दम्भ, ये अकड़, ये गुरूर, ये मैं, ये हम, ये सब घर पे छोड़ दो।
इस किसान आंदोलन की ज़रूरत पंजाब, हरियाणा, यूपी, राजस्थान के किसानों को है। 
ना कि, इस आंदोलन को इन सब के किसानों के स्वार्थों की।
जब देखो कोई ना कोई एक टेढ़ा चलता है।
कोई कहता है "यूँ हुआ तो असीं पंजाब वापस चले जायेंगे, अगर हमारे सिस्टम नहीं माने"
हरियाणे वाला ने कहा "ये पंजाब वालों का यूँ नहीं चलेगा, इब हम ना सपोर्ट करते फेर इनको"
यूपी वाला भी बोल देता है "आखिर कर, हम जुड़ें हैं साथ में, लेकिन म्हारे हिसाब से चलियो, आजकल नेता हमारा टॉप है"
बात सुनो कान खोल के।
सरकार भूस भर दे गी, अगर अलग होकर लड़े तो।
लफ़्फ़ाज़ी छोड़ोगे तो खुद ध्यान आएगा कि पिट चुके हो अलग अलग लड़कर, अलग अलग वक़्त पर। रेल बनाई है सरकारों ने तुम्हारी वक़्त वक़्त पर।
कोई हरियाणे वाला पंजाब के लिए नहीं, कोई यूपी वाला हरियाणे के लिए नहीं और ना ही पंजाब वाला यूपी के किसान के लिए लड़ रहा है। सबकी लड़ाई अपने जायज़ हकों के लिए है।
किसी का किसी पे कोई एहसान नहीं है। सबको अपनी ज़मीन की, अपनी कमाई की, अपनी ग़ैरत/इज़्ज़त की, अपनी पुश्तों की ग़ुलामी की फिक्र है। 
लड़ सब अपने लिए रहे हैं, लेकिन वक़्त वक़्त पर एहसान ऐसा करते हैं, की आंदोलन किसी ब्रह्मकुमारियों का था, और कोई महान सेवा कर दी इन्होंने।
उन वालों ने न्यू कहा, उन वालों ने ये क्यों कहा, इन वाले तो ये ना बोले, हमारे यहां तो यूँ नहीं होता। हमारे रिवाज़ तो अलग हैं। 
आधा वक़्त यही रंडी रोने चलते हैं।
किस ने कहा है तुम सब "एक" हो? ज़बरदस्ती के?
"तुम एक नहीं हो, लेकिन सब एक जैसे हो। तुम्हारे रिवाज़ बोली अलग हैं, लेकिन तुम्हारे हक़ एक हैं। तुम्हारे धर्म चाहे अलग हैं, लेकिन खून एक है। लोकल मुद्दे चाहे कई अलग भी हों, लेकिन बड़ी लड़ाई एक है/एक से ही है।" 
ये फ़र्क़ समझो मूढ़ मति वालो। 
We are different but we r the same. We are fighting a common enemy. Our interests are common.
जाना है तो जाओ। तुम्हारी मर्ज़ी।
खिंड जाओ, बंट जाओ, कुएं में पड़ो।
याद रखना तुम्हारे बच्चों से जूते चटवाएँगे ये सेठों के बच्चे। नीली वर्दियां पहन के तुम्हारे बच्चे ग़ुलामी करेंगे लालाओं की। उस दिन बस याद करना महाराजा रणजीत सिंह, महाराजा सूरजमल, बिरसा मुंडा को। उस दिन बाइसेप दिखाना अपने, फ़िर पता चलेगा।
हद है यार। सबको पता है, सबको समझ है कि ये आखिरी स्टैंड है। 
फिर भी कोई कांड / गलती होते ही फिर राड़ शुरू कर देते हो, बजाए की एक मिनट में मिट्टी डाल कर आगे बढ़ने के।
फर्क समझो घटनाओं में और एक निरंतर आंदोलन में।
आन्दोलन में हज़ारों घटनाएं रोज़ होती हैं/होंगी। अच्छी भी होंगी, बुरी भी होंगी।
फर्क समझो किसी व्यक्ति में या आंदोलन में।
आंदोलनों में लाखों छोटे बड़े व्यक्ति आएंगे/जाएंगे। अच्छे भी आएंगे, बुरे भी आएंगे। क्योंकि आने तो अपने समाज से हैं ना? चाँद से तो आएंगे नहीं, जो सभी दूध के धुले आएंगे।
ये जानते हुए भी तुम किसी घटना/किसी व्यक्ति के कारण मोर्चा छोड़ने के तरीके सोचोगे/धमकियां दोगे?
एक इन पंजाब वाले धर्म प्रचार वालों का समझ नहीं आता। खुश तुम बहुत होते हो, जब कोई यहां सिख धर्म में रूचि दिखाता है, लेकिन आज तक तुमने एक कैम्प नहीं लगाया, जहां धर्म और कट्टरवाद में फर्क समझाएं हों।
फिर जब लंपट बाबा अमन जैसे, लोगों को बरगला लेते हैं, उल्टे सीधे काम में फंसा देते हैं, फिर रोते हो "पंथ खतरे में है।"
उस पर ये हमारा SKM भी माशा-अल्लाह है। मानवीय अत्याचारों की वजह से आप लाख कोसो तालिबान को, लेकिन वहां अफ़ग़ानिस्तान में अनपढ़ तालिबानियों ने भी बाकायदा एक मीडिया फोरम बनाया, एक स्पोक्सपर्सन बनाया "कि सिर्फ ये बात करेगा मीडिया से। सिर्फ इसकी बात हमारी आधिकारिक बात है।"
स्वीकारो इस बात को की टिकैत को हर कानूनी आरक्षण के पैंतरों की जानकारी ना है, और पंजाब वाले लीडरों की अंग्रेज़ी छोड़ो/हिंदी भी पंजाबी तड़का लगा कर बनती है। क्यों नहीं 11 महीनों में 1 पढ़ी लिखी टीम तैयार करी मीडिया पैनल की?
कारण है "चौधर/सरदारी"। बस माइक मुंह में ठूंसना है, और कैमरा हटने नहीं देना सामने से। ज़िला/तहसील से ऊपर उठे हो लीडरों/अपने रुतबे भी बड़े करो।
और एक बात बताओ। तुम सरकार को फुद्दू समझते हो क्या? क्या वो तुम्हारे रूल्स पर खेलने को बाध्य है?
अभी तो उन्होंने षड्यंत्र से एक दलित मरवाया, विभत्स हत्या करवाई,और इधर शुरू हो गए हमारे कागज़ी शेर "बस करो, बस करो, इससे अच्छा है आंदोलन बंद ही कर दो"
थू है #^$&# है तुमपे 😡
लिख के देता हूँ, वो अगली बार एक लोकल सोनीपत के एक जाट को मरवाएँगे सिखों से। गंदी, क्रूर मौत।
या फिर पंजाब से आती जीप को रोककर मुरथल के पास, कुछ लोकल जाट गाड़ी से निकालकर 2 सिखों को पीट पीटकर मार देंगे।
फिर?
शुरू कर दोगे रुदाली रुदन चूड़ियां तोड़ के? खत्म आंदोलन?
आक थू %^@#*$ है फिर से 😡
क्या इतने सुन्न दिमाग हो तुम लोग, की तुम्हे लगता है कि इस काम के लिए उनके पास हज़ारों सिखों की/ हज़ारों जाटों की लाइन नहीं लगी हुई? 
ग़लतफ़हमी निकाल दो की हर सिख, जाट, किसान, मज़दूर तुम्हारे साथ है। बमुश्किल 50-60% है। इतने ने भी झाग निकाल रखी है सरकार की।
फैक्ट है कि हर तीसरा या चौथा हम में से बिकने तो तैयार है। 
और तुम लगे हो शेखचिल्ली के कबूतर उड़ाने "सुन लो अम्मी मरहूम, यूँ होगा, तभी यूँ होगा।"
आखिर में बस इतना कहूंगा।
खुद के लिए लड़ रहे हो। 
किसी के बाप पे एहसान नहीं कर रहे। 
किसी राज्य का किसी राज्य पर नहीं और किसी जाति/धर्म का किसी दूसरी जाति/धर्म पर कर्ज़ नहीं है और ना ही कोई एहसान है।
और हां, लड़ाई तो अभी और बढ़नी है। 99.99% को तो घर बैठे सेक भी ना अभी तक। बताओ ज़रा एक एक करके, कि क्या क्या खो दिया तुमने, जो लोग दूर बैठे ज्ञान बांटते हैं?
संभल जाओ किसान पुत्रों, पुत्रियों, माताओं, बहनों।
फिर सुनो, ये आखिरी लड़ाई है। और ये लड़ाई सब मांगेगी तुमसे। 
पैसा, पसीना और खून।
चचा इकबाल कह ही गए थे तब हमें कि:
*न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालो*
*तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में*
इकठ्ठे रहे तो ही लड़ेंगे, इकठ्ठे रहे तो ही जीतेंगे ✊

Sunday, 17 October 2021

किसान आंदोलन का विरोध करने वालों के प्रकार -

1. पहले वे लोग हैं जो एकदम बैल बुध्दि हैं, बैल बुध्दि मतलब जो ज्यादा दिमाग नहीं लगाते हैं, इनको कोई भी अपने हिसाब से जब चाहे हाँक सकता है, बहुसंख्य आबादी इन्हीं की है, इन्हें भक्त या भगत भी कहा जाता है, भक्त किसी भी पार्टी, विचारधारा, व्यक्ति का समर्थक हो सकता है, इनके लिए किसान आंदोलन में खलिस्तानी आतंकवादी हैं तो हैं, इनके हिसाब से किसान आंदोलन पंजाब और हरियाणा के लोगों का आंदोलन है आदि आदि। मीडिया ने और आईटी सेल ने कह दिया तो वही आखिरी सच है, आप इनसे कुछ और बात भी नहीं कर सकते‌ हैं, ये अपने कुतर्कों पर इतनी मजबूती से टिके होते हैं कि आपका तर्क कम पड़ जाएगा लेकिन इनका कुतर्क कभी खत्म नहीं हो सकता है।

2. दूसरे वे लोग होते हैं जिनको सरकार के हर कानून का, सरकार के हर कदम का समर्थन करना होता है, भले ही वह कानून आगे जाकर सबसे ज्यादा उन्हें ही क्यों न नुकसान पहुंचाता हो, लेकिन सरकार की भक्ति करनी है तो करनी है, पीछे नहीं हटते हैं, इनसे आप कभी भी कृषि कानूनों के बारे में चर्चा नहीं कर सकते हैं, इनके मस्तिष्क में सब कुछ पहले से फिक्स है, सरकारी फरमान ही इनके लिए आखिरी सच है। सरकार के हर फैसले का मुंह उठाकर विरोध करने वालों को मैं भी इसी केटेगरी का ही मानता हूं। 

3. तीसरे वे लोग हैं जिनको मैं बहुत मासूम मानता हूं, इनमें खूब पढ़े-लिखे प्रबुध्द लोग हैं, ये किसी के अंध समर्थक नहीं होते हैं लेकिन ये हर बात में विशेषज्ञ बनते रहते हैं, भले मानुष लोग होते हैं, देश का समाज का भला हो, यही मानसिकता रखते हैं, इस पर काम भी करते रहते हैं। इन प्रबुध्दजनों को लगता है कि घर बैठे दो चार आर्टिकल पढ़ के, टीवी या वीडियो देख के उन्होंने जो समझ विकसित की है, वही दुनिया का आखिरी सच है, इनके साथ एक सहूलियत यह रहती है कि इनसे आप बहस चर्चा कर सकते हैं। मजे की बात देखिए कि इन मासूम लोगों को 11 महीने से चला आ रहा यह अहिंसक आंदोलन कांग्रेसियों या अन्य किसी पार्टी या विचारधारा द्वारा प्लांट किया हुआ आंदोलन लगता है। 

4. चौथी केटेगरी उन लोगों की है, जिन्हें मैं एक शब्द में धूर्त कहता हूं, महाधूर्त और महामूर्ख जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो भी गलत नहीं होता। ये केटेगरी उन लोगों की है जो देश चलाते हैं, ये वे लोग हैं जिन्होंने इन काले कानूनों को अमलीजामा पहनाया। ये समाज के दुश्मन लोग हैं, ये समाज का भला चाह लें इनसे आप भूलकर भी ऐसी उम्मीद नहीं कर सकते हैं। ये कैटेगरी नौकरशाहों की है, पिछले 11 महीनों से किसान आंदोलन को लेकर कुछ एक वरिष्ठ नौकरशाहों से बातचीत हुई। मुझे लगता था कि जो लोग जिला, राज्य से लेकर केन्द्र स्तर तक प्रशासनिक व्यवस्था देखते हैं, उनमें कुछ तो समझ का स्तर होगा ही। अब चूंकि ये सबसे ज्यादा विशेषज्ञ कहा जाने वाला वर्ग है, तो ये अपनी एक कविता, कहानी या कोई भी बात कुछ विशेष शब्द या भारी भरकम बात कहते हुए रखता है ताकि आमजन से अलग इनकी छवि बने, इसलिए आप देखिएगा कि इनकी सामान्य सी बात में भी आपको आमजन वाली भाषा का पुट नहीं मिलता है, वो बात अलग है कि भाषाई मकड़जाल के पीछे अधिकतर लोग बहुत ही सतही बात ही कर रहे होते हैं। अब इनमें से अधिकतर लोगों की सोच यह है कि किसान आंदोलन बड़े किसानों जमींदारों का आंदोलन है, और वे छोटे किसानों का और शोषण करेंगे इसलिए इस कानून का विरोध कर रहे हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि अगर इस नौकरशाही को किसानों की इतनी ही चिंता होती तो इस कानून का ड्राफ्ट ही तैयार न करते। छोटा किसान बनाम बड़ा किसान जैसा छिछला बचकाना तर्क दे रहे हैं, इनसे कहीं ज्यादा समझदार तो ऊपर की बाकी तीनों कैटेगरी के लोग लगते हैं। 

#farmersprotest

Tuesday, 5 October 2021

लखीमपुर जैसी घटनाओं के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार आप और हम हैं -

जब भी हमारे देश में हिंसा की कोई भी घटना घटित होती है, उसमें हम एक समाज के रूप में सबसे पहले न्याय की माँग करते हैं, आरोपियों के लिए सजा की माँग करते हैं, लेकिन हम यहाँ से आगे नहीं बढ़ पाते हैं। हिंसा क्यों हुई, इस पर कभी ईमानदारी से नहीं सोचते हैं।
हिंसा की कोई भी घटना कैसे होती है, इस पर बात करने के लिए लखीमपुर की घटना को उदाहरण के तौर पर लेते हैं, एक गाड़ी ने लोगों को दिन दहाड़े कुचल दिया, 8 से अधिक लोग ( किसान, स्थानीय लोग और एक पत्रकार ) मारे गये। एक पल के लिए भूल जाते हैं कि कुचलने वाले कौन थे और जो कुचले गये वो कौन थे, बस ऐसे देखते हैं कि एक रसूख गाड़ी वाले ने सड़क पर खड़े आम लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी। आज आप और हम खुद से सवाल करें कि उस गाड़ीचालक को इतनी अधिक हिम्मत आखिर आई कहाँ से? 
किस हिम्मत से उसने लोगों पर गाड़ी चढ़ा दी?
असल में उसे हिम्मत देने वाला कोई और नहीं बल्कि आप और हम हैं, कोर्ट और कानून को अभी किनारे में रखते हैं, हममें सामर्थ्य पैदा होगा, हममें नियत होगी तो कभी भी डंके की चोट पर अपने लिए बेहतर कानून और कोर्ट की व्यवस्था तैयार कर लेंगे। अभी उन आरोपियों पर आते हैं, इस देश में ऐसे तमाम हिंसा करने वाले लोगों को आज भरोसा हो चुका है कि इस देश के आम नागरिक मुर्दे हो चुके हैं, उनको यह लगता है कि हमारा खून सूख चुका है इसलिए हम कुछ दिन‌ मोमबत्ती जलाकर मौन धारण कर लेंगे, तभी ऐसी घटनाओं को चौड़े होकर अंजाम दे जाते हैं। उनको विश्वास रहता है कि आप और हम उनका कुछ भी नहीं कर पाएंगे, वे सोचते हैंं कि वे कुचल कर मार देंगे फिर भी हम एक कान‌ से सुनकर भूल जाएंगे। उनको इतना साहस, ऐसी घटनाओं को अंजाम देने का हौसला आप और हम ही देते हैं। किसी पार्टी, विचारधारा या व्यक्ति से कहीं पहले उन्हें समाज से ताकत मिलती है।
हम छोटी छोटी घटनाओं को ही उदाहरण के तौर पर लेते हैं। हम सड़क में, बाजार में राह चलते छोटी सी बात के लिए अपने से कमजोर निरीह किसी व्यक्ति को डराकर धमकाकर आनंद का अनुभव करते हैं, क्योंकि हमें भरोसा होता है कि सामने वाला हमारे इस हिंसक रवैये के खिलाफ खड़ा नहीं हो पाएगा, खड़ा हो भी गया तो उसका साथ देने कोई नहीं आएगा। देखे लेने और सबक सीखाने जैसी धमकियाँ हम थोक के भाव में देते रहते हैं। इसी मानसिकता को हम निरंतर जीते रहते हैं, कभी हम हिंसा करते हैं, तो कभी हम हिंसा के शिकार होते हैं, हिंसा के इस चैन से हम खुद को आजीवन अलग नहीं कर पाते हैं। 
यहाँ पर एक सवाल आता है कि जब एक समाज के रूप में हिंसा को हम आए रोज इतनी बड़ी मात्रा में जीते हैं, फिर उसी देश में अहिंसा परमो धर्म: जैसे सुविचारों का इतना महिमामंडन कैसे होता है, इतना बड़ा विरोधाभास कैसे। इसके पीछे भी कारण है। असल में हममें से अधिकांश लोग हिंसक हैं, अब चूंकि समाज में गहराई के स्तर तक हिंसा व्याप्त है, ऐसे में अहिंसा जैसी चीज एक सहज जीवनशैली का अंग न होकर एक आदर्श के रूप में प्रचारित कर दिया जाता है, अहिंसा के नाम पर इसलिए हमारे सामने खूब प्रतियोगिताओं, सेमिनार, कथापाठ, संगीत, कविता, सूक्ति आदि का मंचन किया जाता है, हम बड़े जोरशोर से एक एवेंट की तरह इसे सेलिब्रेट करते हैं, ठीक उसी तरह हम इसका आनंद उठाते हैं, जैसे हम हिंसा वाली तमाम घटनाओं को एक एवेंट के रूप में देखकर भुला देते हैं। अहिंसा जैसा सहज मानवीय भाव कभी हमारे जीवन का मूलभूत अंग रहा ही नहीं, अगर होता तो हमें इसे इतना अधिक महिमामंडित करने की आवश्यकता नहीं होती।
अभी कुछ दिन पहले ही हम अहिंसा के पुजारी की बातें कर रहे थे, उनके सुविचारों की बात की हमने, उनके नाम‌ पर सेमिनार किया, लंबे लंबे गद्य लिखे, कविताएँ लिखी, असल में हम यह सब इसलिए करते हैं ताकि हम अपना बचाव कर सकें, इसका हमारे जीवन में अहिंसा से कोई लेना देना नहीं होता है। हम बहुत अधिक क्रूर हिंसक होते हुए भी यह ढोंग कर सकते हैं। अहिंसा नामक बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर आप और हम भरपूर हिंसा कर सकते हैं, करते भी हैं। अब इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारे लिए और क्या होगा कि इतने सहज से भाव को जीने के लिए हमें बार-बार एक व्यक्ति का सहारा लेना पड़ता है। असल में गाँधी के विचार या फिर अहिंसा को जीवन में उतार लेने की सबसे जरूरी शर्त तो यही होनी चाहिए कि हम अपने आसपास ही हिंसा और नफरत के खिलाफ खड़े हो जाएं। लेकिन जब हम खुद हिंसक हैं, हिंसा और नफरत को आए दिन जीते हैं तो हम आखिर कैसे ऐसी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाएंगे।
अभी पिछले एक साल को ही एक बार हम मुड़कर देखते हैं। पिछले साल कोरोना की वजह से लाॅकडाउन में हजारों लाखों मजदूरों का जीवन एक झटके में नरक बना दिया गया, कीड़े मकोड़ों से बदतर पैदल हजारों किलोमीटर पैदल चलकर घर लौटने को विवश हो गये, ट्रकों में दास गुलाम की तरह भूखे प्यासे निकल गये एक अंतहीन सफर के लिए, सीमेंट के मिक्सर तक में लोगों ने सफर किया, माँओं ने सड़कों पर बच्चे पैदा किए, कई बच्चे पैदल चल चलकर भूख से ही मर गये, कुछ को तथाकथित आपातकालीन रेलगाड़ियों ने कुचल दिया, यह सब सोच के ही दिल दहल जाता था, ये सब कुछ हमारी आँखों के सामने हो रहा था। वहीं पर्दे के दूसरी तरफ एक बड़ी आबादी इस हिंसा को मनोरंजन कार्यक्रम की तरह देखते हुए या तो थाली बजा कर सकारात्मकता का नंगा नाच कर रही थी या पकोड़े समोसे तलकर अपने जीवन को सार्थक बनाने में जुटी थी। हम सब भूल गये, एक झटके में भूल गये, हम इतने हिंसक रहे कि हमने नहीं सोचा कि हमारे अपने देश के लोगों की हालत आज जानवरों से भी बदतर हो गई है। एक तरफ लोग मर रहे थे, दूसरी तरफ लोग बड़ी बेशर्मी से उनकी मौत पर सवाल खड़ा कर रहे थे कि किसने कहा था तुम्हें मरने को, ये नीच मरेंगे और देश को बदनाम भी करेंगे, इस स्तर की भी हिंसा देखने को मिली। हमने अपने ही देश के लोगों को बर्बरता से मरने के लिए छोड़ दिया। 
समय बीत गया, फिर दूसरी लहर आई, लाशों का अंबार लग गया, लोग आॅक्सीजन की कमी और अव्यवस्था की वजह से तड़प तड़प कर इस दुनिया को अलविदा कह गये। फिर भी हमने व्यवस्था का महिमामंडन करना, सकारात्मकता का नंगा नाच करना नहीं छोड़ा। हमारे आसपास हमारे कितने अपने हमें छोड़कर चले गये, फिर भी हमारे भीतर इतनी भी नैतिक ईमानदारी नहीं रही कि हम बीमारी से हुई मौत को मौत की तरह देख पाएं। हमने वहाँ भी लाशों पर सवाल खड़ा किया, महानता का ऐसा चश्मा लगा रखा था कि दूसरे देशों से मौत के आंकड़ों की तुलना करते रहे, हमारा बस चलता हम लाशों को उठाकर पूछते कि बताओ कोरोना से मरे थे या किसी दूसरी बीमारी से? हमने कुछ समय के बाद यह सब एक झटके में भुला दिया। हमने अपने भीतर की कुंठा को, हिंसा को जीवन से निकाल फेंकने का नहीं सोचा, अगर किया होता तो आज थोड़ी बहुत संवेदनशीलता की झलक दिखाई देती, लेकिन नहीं हमने उफ्फ तक नहीं किया। हम हिंसा के प्रति इस हद तक सहज हो चुके हैं कि आज एक देश, एक समाज के रूप में हम एक मुर्दाघर बनते जा रहे हैं।
हमारी चुप्पी, हमारी खामोशी, हमारा मौन यूं ही हिंसा को खाद पानी देता रहेगा, कार के नीचे कुचला जाना ही हिंसा का शिकार होना नहीं होता है, हिंसा के खिलाफ न बोलना भी हिंसा का शिकार होना है, तमाम अव्यवस्थाएँ देखकर भी आँख मूंद लेना भी हिंसा का शिकार होना है, वे तमाम लोग हिंसा के शिकार हैं जिन्हें आज भी यह लगता है कि वे कभी भी हिंसा के शिकार नहीं हो सकते।

Tuesday, 7 September 2021

सरकार द्वारा किसान आंदोलन को कुचलने के लिए अपनाए गये तरीके -

भौतिक तरीके -
1. बैरिकेटिंग, कंटीले तार बिछाना, रोड खोदना
2. वाटन कैनन की बौछार, वज्र की गाड़ियाँ और सरकारी बसें
3. हजारों की पुलिस फोर्स, आर्म फोर्स द्वारा हिंसा
4. बिजली और पानी की सप्लाई बंद करना
5. आंदोलन स्थल को क्षति पहुंचाना, किसानों के टैंट जलाना

मनोवैज्ञानिक तरीके -
1. इंटरनेट बैन
2. मीडिया द्वारा बदनाम करना ( खलिस्तानी आतंकवादी आदि)
3. किसानों से बातचीत बंद करना
4. जाति धर्म और क्षेत्रीय आधार पर बाँटने की कोशिश करना
5. किसानों को जलील करना, उनकी पीड़ा का, उनकी मौत का मजाक बनाना

जिन लोगों को इस आंदोलन के बारे में अभी तक समझ नहीं बन पाई है, उनको बताता चलूं कि इनमें से एक भी तरीका अभी तक पिछले 9 महीनों में काम नहीं आया है, आगे भी काम नहीं आएगा, हमेशा बैकफायर ही करेगा। फिर भी सरकार रिपीट मोड में इन्हीं तरीकों को अपनाते हुए बार-बार अपनी फजीहत करवा रही है और किसान आंदोलन को और मजबूत बना रही है। 
#farmersprotest

Tuesday, 31 August 2021

किसान आंदोलन पर चर्चा -

A - आज क्लास में किसान आंदोलन पर चर्चा हुई ?
B - अच्छा।
A - तो तुम्हारी याद आ गई।
B - ये बहुत बढ़िया है।
A - इसमें क्या बढ़िया लगा तुमको?
B - किसान आंदोलन के नाम‌ पर मेरी याद आई न।
A - हाँ तो आज हमने भी एक दो बातें कही।
B - अच्छा।
A - फिर उन्होंने कहा कि नोट्स बनाकर लाना।
B - फिर?
A - तो हमने सोचा तुमसे अच्छा इस विषय में और कौन हमें नोट्स दे पाएगा।
B - मैं नोट्स नहीं दे सकता।
A - तुम दोगे, हम नहीं जानते।
B - सरकार ने बिल लाया है, वहीं से तीनों बिल देख लीजिए।
A - वो हमको समझ आता तुमसे क्यों कहते?
B - सिविल सेवा की तैयारी करने वालों को भी अब बिल समझ नहीं आ रहा, वाह।
A - तुम डिटेल तो दे दो, सही गलत हम तैयार कर लेंगे।
B - यही तो समस्या है।
A - क्या?
B - आप आंदोलन स्थल से दूर बैठकर कागज में सही गलत तय करेंगे। 
A - हमको परीक्षा की तैयारी करने नहीं दोगे तुम?
B - नहीं, आप तैयारी करिए, मैं तो बस बता रहा कि आप कैसे तैयारी कर रहे।
A - हाँ तो नोट्स बना देना।
B - मेरे नोट्स से आपको किसान आंदोलन का एक ही पक्ष मिलेगा।
A - और दूसरा पक्ष?
B - मेरी नजर में तो एक ही पक्ष है किसान का पक्ष।
A - अपनी नजर मत लाओ बीच में, हमको नोट्स तैयार करना है।
B - मेरे लिए ये तीन काले कृषि कानून हैं, इनमें सफेद कुछ भी नहीं।
A - पर हमको तो काला सफेद दोनों लेकर चलना है।
B - देखिए, आप अभी से सही को सही और गलत को गलत नहीं कह पा रहे।
A - हमको नहीं कहना बाबा। हमको दोनों साइड लिखना है बस।
B - हाँ वही तो कह रहा, अभी से आपकी ट्रेनिंग चल रही है।
A - वो सब छोड़ो, हमको दोनों पक्ष का बता दो बस।
B - दोनों पक्ष का मैं कैसे बताऊं, जब दूसरा पक्ष है ही नहीं।
A - जिनको दूसरा पक्ष दिखता हो, उनका पता दो हमें।
B - किसी कट्टर किसान विरोधी को पकड़ लीजिए। 
A - बस करो, नेता पत्रकार नहीं बनना, अधिकारी बनने की रेस में हैं हम।
B - अजी हाँ, हम तो भूल ही गये थे।
A - तुम मदद मत करो है न, अब यूट्यूब से देख के नोट्स बना लेंगे।
B - दृष्टि आईएएस वाले बढ़िया चैक एंड बैलेंस किए हैं। उनके वीडियो देख लेना।
A - ठीक है धन्यवाद। एक और डाउट?
B - पूछिए?
A - क्या सच में ये कृषि कानून वापस होंगे?
B - हां जी।
A - और ये आंदोलन कब तक चलेगा?
B - जब तक बिल वापसी नहीं हो जाती, तब तक।

Sunday, 29 August 2021

लाठीबाज आईएएस बनाम भारत के लोग -

हरियाणा कैडर के आईएएस आयुष सिन्हा के खिलाफ जितने भी सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कार्यवाई की माँग की है, उनमें एक भी आईएएस नहीं हैं, सारे के सारे आईपीएस हैं। दोनों लबी के बीच जो तनातनी चलती है, वह भी ऐसे मौकों के बीच खूब देखने को मिलती है। इसमें एक आईएएस के हिम्मत की दाद देना होगी जिन्होंने पद पर रहते हुए इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी है कि - " सिविल सेवा की परीक्षा पास करने और सिविल होने के बीच कोई संबंध नहीं है। " 
बाकी लोग आईएएस एसोसिएशन से माँग कर रहे कि ऐसे अधिकारियों को वापस बुलाया जाए। अरे भई इस देश के सबसे मजबूत एसोसिएशन से आप यह उम्मीद मत करिए कि वह अपने ही सदस्यों को कमजोर करेगा, उल्टे ऐसे लोगों को एसोसिएशन आगे करता है। क्योंकि जो सबसे बढ़िया लड़ाका होता है वह आईएएस लाॅबी को ही मजबूत कर रहा होता है।
जब भी सरकार को हिंसा करनी होती है और पल्ला झाड़ना होता है वह नवप्रशिक्षित भूखे भेड़ियों को आगे कर देता है। अमूमन शक्ति प्रदर्शन की भूख जिनमें सबसे अधिक होती है, ऐसे भेड़ियों को ही आगे कर दिया जाता है। ऐसे ही एक भेड़िया ये आयुष सिन्हा हैं। इन्होंने प्रोबेशन पीरियड में ही बतौर उपजिलाधिकारी करनाल, हरियाणा में किसानों के ऊपर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवाकर जिसमें एक‌ किसान की मृत्यु भी हो गई, अपनी वफादारी बखूबी निभाई है। प्रोबेशन पीरियड को हम बचपन के किसी खेल की तरह समझें जिसमें शामिल बच्चों की झुंड में जो एक कोई बहुत छोटा बच्चा होता है और उसका दूध भात कर दिया जाता है क्योंकि कच्ची उम्र व अनुभव की कमी की वजह से वह खेल के नियमों से अनभिज्ञ होता है, लेकिन देखने में यही आता है कि वह छोटा बच्चा अपनी अनभिज्ञता के बावजूद सबसे अधिक आतंक मचाता है। एक प्रोबेशन पीरियड में गया आईएएस कुछ ऐसा ही होता है, ये कितनी भी गलतियाँ करें, इनका सब कुछ दूध भात होता है, कोई कार्यवाई नहीं होती है।
इसमें कोई शक नहीं कि एक आईएएस बतौर एसडीएम भी एक आईपीएस से अधिक हनक रखता है इसलिए तो देश के युवा को आईएएस यानि जिसे पूछिए कलेक्टर ही बनना होता है, रूतबा ही ऐसा है, उपद्रव मूल्य अथाह हैं, इतने हैं कि आपको भी जानने समझने में ही लंबा वक्त लग जाता है। आप अधिकतर आईपीएस को देखिएगा, इन लोगों को इस बात का मलाल रहता ही है कि थोड़ा रैंक बेहतर होता तो आज एक आईएएस की फटकार नहीं सुननी पड़ती। इसलिए बहुत से चयनित आईपीएस दुबारा यूपीएससी की परीक्षा भी देते हैं ताकि रैंक बढ़िया आ जाए तो सबसे ऊंचाई में चले जाएँ जहाँ आपका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता जैसी ताकत होती है। खुद आयुष सिन्हा पहले 100 रैंक लाकर रैवैन्यू सर्विसेस में थे, फिर दुबारा परीक्षा पासकर आईएएस हुए।
विरोध प्रदर्शन पहले भी हुए हैं, लाठियाँ पहले भी चली है, लेकिन इतनी बर्बरता पहले नहीं हुई। इस बार का मामला पहले से भिन्न है। अंतर भी है, पहले आईपीएस को आगे किया जाता था, इस बार एसडीएम को ही आगे कर दिया गया, सोचिए कौन अधिक हनक रखता है। मैं यह नहीं कह रहा कि प्रोबेशन में आया एसडीएम बड़ा है, लेकिन सरकार को भी पता है कि आईपीएस स्तर के अधिकारी के हवाले से ऐसी बर्बरता की गई तो उस पर सीधे सवाल खड़े होंगे, आईपीएस तुरंत कटघरे में आएगा, और आईपीएस घेरे में आया यानि सरकार भी घेरे में, इसलिए जो आसानी से कटघरे में नहीं आ सकता, उसे साधा गया है। आईपीएस को वैसे भी सामंती अधिकार नहीं होते हैं, आईएएस को होते हैं, आप भाषा से ही फर्क कर सकते हैं। इस मामले में आप देखते रहिए, आयुष सिन्हा पर कोई खास कार्यवाही नहीं होगी, हरियाणा वाले मामला टाइट रखें तो बात अलग है, कुछ संभावना दिख भी रही है, क्योंकि लाठीचार्ज से एक किसान की मौत भी हुई है, तो मामला बहुत अधिक तूल पकड़ चुका है, फिलहाल के लिए साहब को ज्यादा से ज्यादा छुट्टी पर भेज देंगे यानि सस्पेंड करेंगे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हरियाणा का किसान इतने में मानेगा।
#karnal
#farmersprotest