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Saturday, 4 November 2017

~ One Day in Haridwar- A Journey For Lifetime ~

आज आपको एक दोस्त के बारे में बताता हूं जो कुछ समय पहले हरिद्वार से होकर आया है।
कहने को तो उनके परिवार में सब गायत्री दीक्षा वाले हैं लेकिन ये उन सब से हटकर है।
मैंने उससे पूछा कि हरिद्वार कैसे,कहीं इरादा गायत्री दीक्षा लेने का तो नहीं।
जवाब में उसने जो बातें बताई वही लिख रहा हूं..

उसने कहा- नहीं भाई मैं कोई दीक्षा नहीं लेने वाला, थोड़े जिंदगी के दांवपेंच तो समझ लूं पहले।
बारिश शुरू होने के कारण भीड़ कम हुई होगी यही सोचकर बस घूमने चला गया था। लेकिन पता है मैंने गंगा स्नान तक नहीं किया न ही शांतिकुंज गया.

तो हुआ यूं कि जब मैं ट्रेन से हरिद्वार को जा रहा था तो रास्ते में मुझे कुछ लोग मिले। मेरी सामने सीट में बैठे हुए थे, वे लोग बार-बार किसी आश्रमरूपी अस्पताल का जिक्र कर रहे थे। उनके साथ मैं भी आश्रम चला गया,एक दिन वहीं बिताया फिर वापस दिल्ली लौट आया।

पता है वहां एक स्वामीजी हैं बहुत ही काबिल डाक्टर हैं वही अस्पताल के प्रमुख हैं, वे एक साधु की तरह सफेद कौपीन धारण किए हुए रहते हैं किसी से ज्यादा बात नहीं करते अभी उनकी उम्र लगभग सत्तर है,लेकिन अभी भी बीस-तीस के लगते हैं।
स्वामीजी एक बंगाली डाक्टर हैं। उन्होंने कोलकाता से न्यूरोलाजी में एम.डी. किया है। शुरूआती दिनों में जब स्वामीजी ने अपनी प्रैक्टिस शुरू की,थोड़े समय में ही वे डायग्नोसिस में मास्टर बन गये। किसी पेचिंदा केस में जब उनके सीनियर डाक्टर तक फेल हो जाते तब स्वामीजी आसानी से वो केस निपटा लेते। इलाज हेतु विदेशों से उनके पास लोग आने लगे। दूसरे देशों से नौकरी के लिए बुलावा भी आया लेकिन स्वामीजी नहीं गये।

हरिद्वार में उनके एक गुरू थे,स्वामीजी उनके प्रिय शिष्यों में से थे, गुरू की मृत्यु के बाद स्वामीजी को कोलकाता से हमेशा के लिए हरिद्वार बुलाया गया, वहां आश्रम के लोगों ने सर्वसम्मति से स्वामीजी को आश्रम का प्रमुख बनाया।उस समय उनकी उम्र तीस साल के आसपास रही होगी।

पता है साल के कुछ महीने(अक्टूबर से मार्च) स्वामीजी अकेले ही बद्रीनाथ,केदारनाथ के बर्फीले पहाड़ों में ध्यान के लिए चले जाते हैं। मतलब जब लोग नीचे मैदानों की ओर आ रहे होते हैं तब वे ऊपर जाते हैं। स्वामीजी आश्रम छोड़ने से पहले अपने शिष्यों को आगाह कर देते हैं कि मेरी चिंता मत करना मैं जल्द आऊंगा लेकिन वापसी की कोई तारीख नहीं बताते। वहां पहाड़ों में किसी पुरानी झोपड़ी में गैस सिलिंडर की सहायता से आलू चना उबाल के खाते हैं, बर्फ में सब्जियों का गार्डन भी बनाते हैं और आर्मी कैम्प वालों को भी जरूरत पड़ने पर खिलाते हैं। जब ठंड बढ़ने लगती है, तो माईनस बीस डिग्री की ठंड में भी वो एक कौपीन के सहारे रह लेते हैं। पता है कैसे,जब उनकी झोपड़ी पूरी तरह बर्फ से ढंक जाती है तो इन्सुलेशन के कारण गर्माहट आने लगती है बिल्कुल उन ध्रुवीय प्रदेशों के इग्लू(एस्किमो)की तरह। पंद्रह-बीस साल तक लगातार उन्होंने ये तपस्या की और अब अधिकांश समय ध्यान करते हैं। हफ्ते में दो या तीन दिन ही लोगों से मिलते-जुलते हैं।

स्वामीजी की किसी के पास तस्वीर नहीं वो इन सब चीजों से दूर रहते हैं,यहां तक कि गूगल में भी उनकी तस्वीर या ज्यादा कोई जानकारी नहीं है, और तो और जैसे किसी असाध्य रोग का आपरेशन उनके किसी डाक्टर द्वारा ना हो पाये..वो आपरेशन ये न्यूरोलाजी वाले स्वामीजी खुद करते हैं और उनका हर एक आपरेशन सफल होता है। लोगों का और उनके अस्सिटेंट डाक्टरों का विश्वास है कि स्वामीजी में दिव्य आध्यात्मिक शक्ति है।

आश्रम में एक दानपेटी है सब अपने अपने हिसाब से दान दे सकते हैं।वहां एक बड़ा हाल है जहां सब कोई खाना खाते हैं,खाना खाने के बाद बर्तन स्वयं को धोना पड़ता है। हर साल जून के पहले हफ्ते में शिविर का आयोजन होता है, जिसमें विदेशों से डाक्टर आते हैं और सबका मुफ्त इलाज होता है।ऐसे शिविरों का आयोजन समय समय पर होता रहता है।स्वामीजी के अस्पताल में देश विदेश से लोग बड़ी संख्या में इलाज कराने आते हैं, आश्रम में कैंसर,ह्रदय रोग जैसी बहुत सी बीमारियों का इलाज होता है बहुत से स्पेशलिस्ट डाक्टरों की एक टीम है।स्वामीजी गरीबों का मुफ्त इलाज करते हैं और अमीरों से मोटी फीस लेते हैं।
सच कहूं तो हरिद्वार के सारे मंदिरों से कहीं ज्यादा सुकून उस अस्पताल में है।

Har ki Pauri, Haridwar, Uttarakhand


Friday, 3 November 2017

- चलें नेपाल बार्डर -

            शाम को हम दो दोस्तों ने फैसला किया कि कल सुबह नेपाल चलते हैं। असल में मुनस्यारी से नेपाल का रास्ता 4-5 घंटे का है। तो हम अगले ही दिन सुबह 6 बजे मुनस्यारी से नेपाल की ओर निकल गये। जिस मैक्स की गाड़ी से हम मुनस्यारी से बैठे थे वो जौलजीबी तक ही जाती है। वहाँ से आगे नेपाल बार्डर तक यानि धारचूला जाने के लिए गाड़ी बदलनी पड़ती है। धारचूला से वापस मुनस्यारी आना है तो भी ठीक वैसा ही हिसाब। पहले धारचूला से जौलजीबी तक गाड़ियां आती है, वहां से फिर मुनस्यारी के लिए गाड़ी बदलनी पड़ती है।
            सुबह के 9 बज चुके थे। हम जौलजीबी पहुंच चुके थे। जौलजीबी में हमने नाश्ता किया। फिर वहाँ से गाड़ी बदली और धारचूला रवाना हुए। 10:30 के आसपास हम धारचूला पहुंच चुके थे। धारचूला से नेपाल जाने का रास्ता एक झुलानुमा पुल है जो काली नदी पर बना है। यही एकमात्र पुल यहाँ भारत और नेपाल को जोड़ती है। यानि पुल के इस पार का क्षेत्र धारचूला(भारत) और पुल के उस पार का क्षेत्र दार्चूला(नेपाल) कहलाता है।
             हम धारचूला पहुंचते ही सीधे पुल की ओर गये। वहाँ पुल के इस पार भारत के आर्मी वालों ने हमारा बैग चैक किया और फिर पुल पार करने के बाद नेपाली आर्मी वालों ने बैग चैक किया। अब हम नेपाल प्रवेश कर चुके थे। चूंकि हम सुबह से मुनस्यारी से निकले थे, तो हमें जल्द से जल्द कोई होटल ढूंढना था ताकि हम नहा सकें। नहाने की जरुरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि धारचूला का मौसम मुनस्यारी से अपेक्षाकृत गर्म रहता है। तो हमने नेपाल में होटल के लिए गलियां छाननी शुरू कर दी। पहले एक होटल में गये, एक बंदा घुमा के कहाँ अंदर तक ले गया, काफी गंदा कमरा था। हम आगे बढ़े, एक दूसरे होटल में गये, वहाँ न रोशनदान, न खिड़की ना ही एसी। एक तो कहां मुनस्यारी के ठंडे मौसम से हम यहाँ धारचूला की गर्म पहाड़ियों में आ गये थे। ऐसे में बंद से कमरे में रहना मुश्किल जान पड़ रहा था। हम आगे बड़े, खोजते-खोजते एक दो मंजिला होटल में पहुंचे, वहाँ बहुत से छोटे-छोटे कमरे थे। नीचे होटल में एक आदमी खड़ा हुआ था, वही हमें दिखाने के लिए होटल मालिक के पास ले गया। वहाँ एक आंटी बैठी हुई थी। हमने उनसे कमरे के बारे में पूछा तो उन्होने हमें एक कमरे की चाबी थमाई और कहा कि जाइए देख लीजिए।
              ये कमरा छोटा सा था, बाथरूम अटैच था, एक जोड़ी चप्पल पहले से रखा हुआ था, एक बिखरा हुआ तौलिया बिस्तर पर पड़ा हुआ था, और तो और कमरा उतना हवादार नहीं था जैसा हम चाह रहे थे, और हां एसी भी तो नहीं था। हम कमरे के बाहर से ये सब देख रहे थे कि पड़ोस के कमरे से एक यंग कपल निकले, वे शायद देख रहे थे कि कौन पड़ोस में आया है। हमें अब सब कुछ धीरे-धीरे समझ आ रहा था कि हम कहां हैं। हमने मिनट भर में ही कमरा लाॅक किया, होटल की मालकिन ने हमारे त्वरित फैसले को देखते हुए नीचे से आवाज लगाई कि क्या हुआ, कमरा नहीं पसंद आया। हमने इशारों में ऊपर से नहीं कहा और नीचे आकर चाबी थमाते हुए कहा कि एसी नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरे नेपाल में आपको कहीं भी एसी नहीं मिलेगा। यहाँ तो ऐसा ही होटल है। खैर बोलो न आपकी और क्या डिमांड है, 1000 वाला 1500 वाला कमरा देखना चाहेंगे तो वो भी है वगैरह वगैरह। वो आंटी जब ये सब कह रही थी हम चुपचाप उनकी बातों का मर्म समझ रहे थे। इस दौरान जो उनके पीछे एक लड़की खड़ी थी वो हमें बड़ी उत्सुकता से देख रही थी। हमने फिर मालकिन से कहा कि एसी के बिना नहीं जमेगा और फिर हम वहाँ से जो निकले सीधे पुल पार करके वापस धारचूला यानि भारत। अब हमने फैसला किया कि कुछ भी हो जाए नेपाल में नहीं रुकना है। असल में हम जहाँ होटल की तलाश में गये थे वो होटल नहीं कुछ और ही था।

घंटे भर तक नेपाल में होटल के लिए भटकने के बाद हमें कुछ चीजें स्पष्ट हो गई थी --
1. दार्चूला(नेपाल) में एसी नहीं मिलेगा।
2. नेपाल में अत्यधिक गरीबी है, रोजगार का अभाव है।
3. दार्चूला(नेपाल) धारचूला(भारत) से कहीं ज्यादा गंदा और अव्यवस्थित शहर है।
4. पुरूष वर्ग शराब और जुए में मस्त है, इसलिए अधिकतर दुकानों में महिलाएँ ही दिखती हैं।
5. शराब, जुआ, गांजा, वेश्यावृत्ति का प्रचलन जोरों पर है क्योंकि रोजगार की घोर कमी है।
6. नेपाल में दो तरह की दुकानें सबसे ज्यादा दिखी पहली सोने की कारीगरी करने वाली और दूसरी कपड़ों की दुकानें।
7. नेपाल में गर्म कपड़े, कालेज बैग, जूते आदि चीजें थोड़ी सस्ती हैं। आप नेपाल आते हैं तो आपको इसका फायदा जरूर उठाना चाहिए।
            "चूंकि नेपाल में प्राकॄतिक संसाधनों का अभाव है एवं रोजगार के विकल्प बहुत सीमित हैं इस वजह से नशाखोरी, वेश्यावृत्ति ये सब नेपाल में कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।"
                दोपहर के 12:30 जब चुके थे। हमने धारचूला आकर उत्तराखंड टूरिज्म के रेस्ट हाउस KMVN में चेक इन किया। 800 रुपए में सर्वसुविधायुक्त कमरा। चूंकि धारचूला का KMVN नदी के किनारे पर ही है तो गर्जना कर बहती हुई काली नदी और उसके उस पार नेपाल का दृश्य सब कुछ हमारी खिड़की के सामने था।
                अब हमने कुछ देर आराम किया और तैयार होकर वापस नेपाल की ओर निकले। वैसे अगर देखा जाए तो पुल के इस पार धारचूला और उस पार दार्चूला में कोई ज्यादा फर्क नहीं है लेकिन गहराई में उतरकर चीजों को देखा जाए तो जमीन आसमान का अंतर दिखाई पड़ता है।
अब हम दार्चूला(नेपाल) घूमने के लिए निकले ही थे कि तेज बारिश शुरू हो गई, भयंकर ओले गिरने लगे और उमस भरा मौसम अब ठंडा हो चुका था। रास्ते भर कीचड़ ही कीचड़, कच्ची पगडंडियों के कारण फिसलन का खतरा भी था। पर फिर भी हमें नेपाल घूमना था तो हम हल्की बारिश में भी ये सोच कर निकल गये कि अब फिर यहाँ आना हो न हो। वैसे तो दार्चूला में घूमने लायक कुछ खास है नहीं बस यही एक बताने लायक बात है कि किसी दूसरे देश में हैं।
                दार्चूला में हमने एक होटल में थूकपा खाया, एक नुक्कड़ में चाय पी वो भी भैंस के दूध वाली चाय। अब हमने आसपास का एक किलोमीटर का क्षेत्र पूरा घूम लिया फिर समझ आ गया कि यहाँ कुछ खास नहीं है तो फिर हम मार्केट की ओर जाकर कुछ खरीददारी करने लगे। दार्चूला का मार्केट एक छोटे कस्बे जैसा ही है फिर भी आपको नाना प्रकार की बीयर, थाईलैंड चीन आदि देशों के चाकलेट बिस्किट मिल जाएंगे। हमारे दोस्त ने लैदर का जैकेट खरीदा और हमेशा की तरह फिर से उसने एक शाल खरीद लिया। चलो यहाँ तक तो सब ठीक रहा अब हमारे दोस्त ने निशानी के तौर पर एक दो पांच दस आदि रुपयों के नेपाली नोट एवं सिक्के बदलवाए, उसने मुझसे भी पूछा, मैंने मना कर दिया।
      "ऐसी चीजों के लिए तो मैं एक रुपए खर्च ना करूं, वैसे भी वो पैसे तो काम आएंगे नहीं और तो और मैं तो कोई स्मृति चिन्ह लेकर चलता  भी नहीं तो फिर मुझे इन सिक्कों की कोई जरूरत नहीं है। पर सबका अलग-अलग मामला होता है। जो चीजें मुझे महत्वहीन लगती हो वो किसी और को महत्व की भी लग सकती है। वैसे भी मेरा दोस्त दो हजार किलोमीटर दूर मुंबई से खास घूमने के उद्देश्य से छुट्टियाँ लेकर आया था तो उसके लिए जीवन के ये सब पहलू कीमती थे।"
जब दोस्त ने मुझे एक-दो बार पूछा कि भाई दूसरे देश में आए हैं, तु भी कुछ ले ले,तो हमने थाइलैंड और चीन का चाकलेट खरीद लिया, चाकलेट खाने के बाद ये समझ आया कि भारत के चाकलेट्स की कोई बराबरी नहीं है दुनिया में।
             शाम के 6 बज चुके थे अब हम पुल पार कर नेपाल से वापस भारत की ओर लौटे। पुल पार करने का नियम ऐसा है कि एक निश्चित समय तय है- सुबह सात बजे से शाम के सात बजे तक। यानि शाम के सात बजे के बाद आप जिस देश में हैं आपको उधर ही रहना होगा और पुल पार करने के लिए सुबह होने का इंतजार करना होगा।
हम होटल आए और खाना खाकर सो गये। अगले दिन सुबह हमें मुनस्यारी के लिए वापस निकलना था। और धारचूला से निकलकर सुबह 11 बजे तक हमें जौलजीबी पहुंचना ही था। क्योंकि अगर जौलजीबी पहुंचने में देरी हुई तो फिर आगे मुनस्यारी तक जाने के लिए गाड़ियां नहीं मिलती। लिफ्ट मिलना भी लगभग नामुमकिन, आखिरी रास्ता यह रह जाएगा कि या तो जौलजीबी में रुकिए या फिर पर्सनल गाड़ी करिए। यानि मुनस्यारी से होकर धारचूला आएं तो वापसी में कैसे भी करके आपको 11 बजे तक जौलजीबी पहुंचना जरूरी हुआ।
हम अगले दिन तय समय पर धारचूला से जौलजीबी पहुंचे और मदकोट होते हुए दोपहर 2 बजे तक मुनस्यारी पहुंच चुके थे। कुछ इस तरह हमारी नेपाल यात्रा यहीं समाप्त होती है।
Kali River in between Darchula(Nepal-leftside) and Dharchula(India-Rightside)

Thursday, 26 October 2017

~ देवी दर्शन ~

                 अप्रैल 2017 की बात है। दोपहर के तीन बजे थे। मैं उस रोज कुछ एक कारणों से बहुत परेशान सा था। इतना परेशान कि मैं सब कुछ नष्ट कर देना चाहता था। हिमनगरी मुनस्यारी में मेरी खिड़की के सामने हिमालय का अद्भुत दृश्य था, फिर भी वो मुझे सुकून नहीं दे रहा था। कोई भी चीज, सुख-सुविधाएं, मनोरंजन के साधन कुछ भी मुझे राहत नहीं दे पा रहे थे। फिर मैं, जो अब तक अपने कमरे में बंद था, बाहर रोड की ओर निकला और अपने दोस्त की दुकान पर चला गया। मैं वहाँ दुकान के बाहर खड़ा हुआ था। ठीक उसी वक्त विवेकानन्द विद्या मंदिर की छुट्टी हुई थी, बच्चे पैदल अपने घर को लौट रहे थे। इतने में एक बच्ची मुझे देखकर रूक गई और मुझे बड़े आश्चर्य से एकटक देखने लग गई।
                 वो बच्ची मुझे कुछ इस तरह देखे जा रही थी कि मैंने अपनी नजरें फेर ली। फिर कुछ सेकेण्ड बाद मैंने उस बच्ची को देखा, वो अभी भी मुझे वैसे ही देखे जा रही थी, फिर मैंने अपनी नजरें दूसरी ओर कर ली। लगभग मिनट भर उसने मुझे देखा फिर वो नजरें झुकाकर निराशा का भाव लिए वहाँ से चली गई। मुझे एक पल के लिए समझ नहीं आया कि मेरे साथ आखिर ये हो क्या रहा है?
उस बच्ची की उम्र चार या पांच साल रही होगी फिर भी वो मुझे ऐसे देख रही थी मानो वो मुझे समझ रही हो।
मेरे मन में तरह-तरह के सवाल आने लगे कि वो बच्ची आखिर क्यों मेरे पास आकर रुकी, क्यों मुझे इस तरह आश्चर्य से देखकर चली गई।
उस बच्ची के वहाँ से जाने के बाद उसके देखे जाने का प्रभाव थोड़ा कम होने के बाद मुझे ऐसा लगा कि वो कोई सामान्य बच्ची नहीं थी, वो कोई और ही थी, कोई और जो मुझे उस बच्ची के सहारे देख रही थी। और जब मेरा ये एहसास मजबूत हुआ, मैं भागते हुए इधर-उधर गलियां छानने लगा, मैं उस बच्ची को खोजने लगा, पर वो कहीं नहीं दिखी। वो शायद अपने घर जा चुकी होगी।
अब मैं उस बच्ची की आंखों को देखने के लिए तड़प रहा था, मैं उससे बात करना चाहता था, बहुत कुछ पूछ लेना चाहता था। पर उस दिन के बाद वो बच्ची मुझे कभी नहीं दिखी।
                 और इन सब के बीच जो सबसे अद्भुत था वो ये कि मैं पूरी तरह से भूल चुका था कि मुझे कोई परेशानी थी। ऐसा लगा जैसे किसी ने आहिस्ते से मेरे माथे पर और आंखों पर हाथ फेरकर मुझे शांत कर दिया हो। ऐसा लगा जैसे किसी ने एक झटके में ही कोई जादू कर सब ठीक कर दिया हो। आज भी जब उस बच्ची की आंखे मुझे याद आती है तो मेरा विश्वास और मजबूत हो जाता है कि वो एक सामान्य बच्ची नहीं थी। वैसे भी उतने छोटे उम्र के बच्चों में ऐसी दृष्टि और आंखों में इतनी गहराई का होना असाधारण ही कहा जाएगा।

Maa Nanda Mandir, Munsyari

Wednesday, 25 October 2017

~ A trekk to Goriganga River ~

                    अगस्त 2016, मैं मुनस्यारी में था। रोज सुबह मैं डानाधार में स्थित नंदा देवी मंदिर परिसर जाता और वहाँ से दूर बहती हुई गोरीगंगा नदी को देखता। हर रोज यही होता, मैं सुबह नदी को देखता और यही सोचता कि आज नहीं तो कल इस नदी को पास से देखने जाना है। पहले मैं अपने कुछ दोस्तों से कहता कि चलो कभी चलते हैं नदी की तरफ। पर कोई राजी न होता क्योंकि नदी तक जाने में या वहाँ आसपास कोई देखने लायक जगह न थी। फिर मैंने एक सुबह सोचा कि अकेले ही पैदल निकल लूंगा।
                    फिर उस रात मुझे गोरी नदी का सपना आया। मैं उसी दिन अगले सुबह बैग में पानी की बोतल लिए पैदल गोरी नदी की ओर निकल गया।सुबह के 9 बजे थे, मैं डानाधार के रास्ते से तेजी से पगडंडियों से होते-होते पैदल उतरने लगा। हल्की  धूप थी, पहाड़ों में धूप सीधी लगती है तो थोड़ी धूप भी असहनीय हो जाती है। मैं लगातार बिना रूके चला जा रहा था। उन रास्तों में कोई भी दिखाई न देता, अब चूंकि ये रास्ता मेरे लिए नया था तो समझ नहीं आता कि कब किस पगडंडी से आगे जाना है और कौन सी पगडंडी से कम चलना पड़ेगा।
                    मैं सांप, बिच्छू और जंगली जानवरों से भयमुक्त होकर बस चला जा रहा था कि अचानक एक दस फीट लंबे सांप ने मेरा रास्ता घेर लिया। मैं दौड़कर पीछे हटा, कुछ मिनट पश्चात जब वो सांप वहाँ से गया तब मैं आगे बढ़ा। आगे ऐसा हुआ कि एक जगह रास्ता बंद हो गया। मैं फिर लगभग आधा किलोमीटर पीछे लौटा जहां दो तीन पगडंडियां थी। वहाँ किस्मत से मुझे एक दादी मिल गयी। दादी बकरियाँ चराने आई थी। मैंने उनसे गोरी नदी तक जाने का रास्ता पूछा तो उन्होंने फिर मुझे बताया। मैं उनके बताये रास्ते पर चलता गया। एक जगह नहीं रूका, लगातार चलते एक घंटे से ज्यादा हो चुका था। अब मैं संकरी घास से लदी पगडंडियों से गुजर रहा था तो मेरे हाथों में बहुत बार बिच्छू घास लग गया जिससे जलन होने लगी। मैं ये सब नजरअंदाज कर बस चलता गया।मन में सिर्फ वो बहती हुई नदी थी जिसे मैं रोज सुबह दूर से निहारता आया हूं। वहाँ से आगे निकला तो फिर से रास्ता ब्लाक, आगे पगडंडी का कोई नामोनिशान नहीं। वो तो मेरी किस्मत अच्छी रही कि वहाँ पास में एक घर था और बाहर में एक अंकल बैठे हुए थे मैंने उनसे आगे गोरी नदी की ओर जाने का रास्ता पूछा तो पता चला कि वे गूंगे हैं, फिर भी उन्होंने मुझे इशारों से रास्ता बताया, उनके बताये रास्ते पर जब मैं आगे बढ़ा तो फिर रास्ता ब्लाक। या तो उन्होंने मुझे गलत रास्ता बताया या मैं शायद ठीक से समझ नहीं पाया। अब जब मैं उस गूंगे अंकल के पास वापस लौटा तो वहाँ एक और आंटी थी, मैं उन्हें देखकर थोड़ा खुश हुआ कि चलो अब ये मुझे सही रास्ता बता देंगी। जब मैंने उन्हें पूछा तो वो पहाड़ी में बताने लगी, उन्हें असल में हिन्दी नहीं आती थी और उस समय तक मुझे पहाड़ी समझ नहीं आती थी। पर मरता क्या नहीं करता। मैंने उनकी बातों को ध्यान से सुना और उनके बताये रास्ते पर आगे निकला। आगे एक थोड़ी समतल जगह आई वहाँ एक बड़ा सा खेत था, एक दीदी वहाँ फसल की कटाई कर रही थी। मैंने उन्हें नमस्ते किया, वो दीदी मुझे घूरकर देख रही थी(मानो वह सोच रही होंगी कि आखिर जंगल के इन रास्तों से आखिर ये कौन आया, क्यों आया) खैर मैंने उनसे रास्ता पूछा और तेजी से आगे बढ़ता गया।
                        ठीक कुछ ऐसी ही घटना आगे भी हुई। मैं अब जिस रास्ते से गुजर रहा था, वहाँ दो अलग-अलग पगडंडियां आई, वहां पास में एक घर भी था, घर के बाहर एक मां अपनी पंद्रह साल की बिटिया के साथ कुछ काम कर रही थी। मैंने उनके पास जाकर जब रास्ता पूछा तो उन्होंने उत्सुकतावश मुझसे पूछा कि कहाँ से आये हो? मैंने कहा मुनस्यारी से पैदल आया हूं। अब दोनों मां-बेटी मुझे बड़े आश्चर्य से देख रहे थे फिर उन्होंने कहा - गोरी नदी क्यों जा रहे हो?
मैंने कहा - ऐसे ही। फिर उन्होंने हंसते हुए कहा - हम तो वहाँ अर्थियों को ले जाते हैं बेटा पता नहीं तुम इतना दूर क्यों जा रहे हो।
मैंने कहा - अम्माजी गोरी नदी का बुलावा आया है।और फिर उन्होंने कुछ नहीं पूछा और मैं आगे बढ़ा।
मैं लगातार पगडंडियों पर चलकर पसीने से भीग चुका था। अब थोड़ी थकान भी होने लगी थी। मैं लगभग आधी दूरी तय कर चुका था। अब मैं रोड की तलाश करने लगा कि कहीं से गोरी नदी तक जाने वाली रोड मिल जाए, फिर तेजी से सीधे चलता जाऊंगा। और कुछ देर चलने के बाद मुझे रोड मिल गई। पगडंडियों पर दो घंटे से लगातार चलने के बाद जब रोड मिल गई तो खुशी का ठिकाना न रहा। मैं अब दुगुनी तेजी से चलने लगा।
सुबह के 11 बज चुके थे और अब मैं दरांती गांव तक पहुंच चुका था।अब यहाँ से एकएक या डेढ़ घंटे का रास्ता बच गया था। मैं थोड़ा थोड़ा पानी पीकर लगातार चलता गया। पहाड़ों में रहकर मैंने एक चीज सीख ली कि लंबी चलाई में एक जगह रूककर ज्यादा देर आराम नहीं करना चाहिए, दो-चार मिनट से ज्यादा नहीं वरना फिर आगे चलने में दुगुनी मेहनत लगती है, आप समय से पहले थक जाएंगे और चल नहीं पाएंगे। चढ़ाई में ट्रैकिंग करते समय तो इस बात का बखूबी ख्याल रखना चाहिए अन्यथा समस्या को बुलावा है।
दोपहर के 12:30 बजे थे। मैं गोरी नदी पहुंच चुका था। आखिरकार मेरी मुलाकात नदी से हो गई। मैं वहाँ कुछ देर बैठकर बहती नदी की आवाज सुनने लगा, फिर उसका पानी पीया और वापस पैदल दरांती गांव तक आया।
दोपहर के दो बज चुके थे। मैं बुरी तरह से थक चुका था। अब मुझे भूख भी लग रही थी। मैंने दरांती में एक होटल में नास्ता किया फिर लगभग एक किलोमीटर तक पैदल चला। उसके बाद वहाँ कुछ मिनट आराम किया, उसके बाद जब लगा कि और पैदल चलने की हिम्मत नहीं रही तब मैं मदकोट से मुनस्यारी आने वाली गाड़ी में बैठकर मुनस्यारी वापस आ गया। गोरीगंगा नदी का ये सफरनामा यहीं समाप्त हुआ.

Goriganga River

Thursday, 19 October 2017

~ कश्मीर केसर शिलाजीत Trilogy ~

                             2014 की बात है। फरवरी का महीना था। हम चार दोस्त दिल्ली से वैष्णो देवी दर्शन के लिए जम्मू रवाना हो चुके थे। हम शाम को जम्मू पहुंचे और रात को वैष्णो देवी मंदिर के दर्शन कर अगले दिन सुबह श्रीनगर की ओर अपनी कार से निकल गये। हमने कटरा (जम्मू) से एक लोकल टूर आपरेटर से पांच दिन का टूर पैकेज ले लिया था। जम्मू से जैसे-जैसे आगे बढ़ते गये, ठंड भी बढ़ती गई। जवाहर टनल आ चुका था, उससे पहले हमारी गाड़ी की चैकिंग हुई। जवाहर टनल दो किलोमीटर लंबा टनल है जो विश्व के सबसे महंगे नेशनल हाईवे 1-A पर बना है, यही श्रीनगर को शेष भारत से जोड़ता है। असल में जवाहर टनल के पहले एक जगह पुलिस की एक छोटी सी टुकड़ी थी जो बड़ी सख्ती से हमारी गाड़ी की चैकिंग कर रही थी, क्योंकि गाड़ी जम्मू की थी तो श्रीनगर प्रवेश करने से पहले जबरन आंखें दिखा-दिखाकर चैकिंग करना आम बात है। पुलिसवालों ने हम सब को लाइन से खड़े कर चैक किया, हमारे एक दोस्त से उन्हें सिगरेट का पैकेट मिला वो उन्होंने रख लिया फिर हम सबको थोड़े सख्त अंदाज में पूछा- दारू रखे हो तो दे दो। हमने कहा - नहीं है। फिर उन्होंने हमें वहाँ से जाने दे दिया।
                             श्रीनगर के पुलिसवालों की सख्ती को कुछ इस तरह समझा जाए कि वे गाड़ियों से शराब जब्त करते हैं और अपना मजे से पीते हैं। हमारे ड्राइवर ने पहले ही हमको समझा दिया था कि सख्त चैकिंग होगी अपनी जुबान से पलटना मत, सब एक सा जवाब देना कि हमारे पास शराब नहीं है। और हमारे ड्राइवर ने रम की बोतल पता नहीं किसी कोने में छुपा कर रख दिया था। हमारे चार दोस्तों में दो लोग पीते थे तो हमने जम्मू से ही रम की बोतल ले ली क्योंकि श्रीनगर में उसी बोतल की कीमत दुगुनी हो जाती है। पुलिसवालों ने जो हमारे दोस्त का सिगरेट का पैकेट रख लिया था वो उन्होंने बाद में वापस कर दिया। और हम श्रीनगर की ओर बढ़ने लगे।
                              अब चारों ओर हमें दूर-दूर तक बर्फ ही बर्फ दिखाई देने लगा। हमारा ड्राइवर जम्मू का ही था, वो भी चार साल बाद श्रीनगर जा रहा था। वो कह रहा था कि श्रीनगर बिल्कुल नहीं पसंद, हां खूबसूरती के नाम पर तो जन्नत हुआ पर यहां का असली रंग हमें पता है, यहाँ का माहौल हमारे लिए ठीक नहीं, इसलिए मैं इधर ज्यादा नहीं आता। हमने कहा- लगता है आपको श्रीनगर से वहाँ के लोगों से बहुत समस्या है। ड्राइवर बोला - नहीं समस्या वाली कोई बात नहीं है। मैं ऐसा क्यों बोल रहा हूं आपको श्रीनगर पहुंचने पर समझ आ जाएगा।
हम सुबह 7 बजे जम्मू से निकले थे श्रीनगर पहुंचते अंधेरा हो चुका था, बारिश भी होने लगी थी। बढ़ते ठंड की वजह से हमें पेशाब लगी तो हमने गाड़ी किनारे लगाई और जैसे ही पेशाब के लिए उतरे, उतने में ही आर्मी वाले चिल्लाने लगे और दौड़ते हुए हमारी ओर आने लगे। हम दौड़कर वापस गाड़ी में बैठ गए। और हम वहाँ से निकल गये। असल में श्रीनगर में हाईवे में गाड़ी खड़े करना मना है इसलिए ऐसा हुआ। खैर हम श्रीनगर प्रवेश कर चुके थे। हमें अगले तीन दिन डल झील के बोटहाउस में ठहरना था। ठंड काफी बढ़ चुकी थी शायद तीन या चार डिग्री के आसपास तापमान होगा, मैदान के मौसम से इस बर्फीले ठंड में प्रवेश करना, हम चारों दोस्तों के लिए ऐसे मौसम में आना एक नया अनुभव था। जैसे ही हमने बोटहाउस में प्रवेश किया, हम तो अंदर की कारीगरी देखकर ही खुश हो गये। बोटहाउस शानदार था। अब हमने इलेक्ट्रिक बैड चालू किया और जो हम सोये अगले दिन सुबह दस बजे उठे।
                              आज सुबह हमें गुलमर्ग घूमने जाना था। लगभग 12 बजे हम गुलमर्ग के लिए निकले। रास्ते में एक होटल में हम चाय नाश्ता करने रुके। वहाँ हमें आर्मी के कुछ जवान मिल गये। उनमें से एक सरदार जी थे उन्होंने हमसे कहा- यार ये कहाँ घूमने आ गये हो, हम तो परेशान हैं यहाँ की ठंड से और यहाँ के माहौल से भी। हमने उनकी बात को नजरअंदाज करते हुए उनके साथ फोटो खिंचवा ली। अब हम गुलमर्ग पहुंच चुके थे। तापमान शून्य से नीचे जा चुका था। इतनी भयंकर बर्फबारी हो रही थी कि सामने दस फीट से आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
                              हमने वहाँ स्लेज की सवारी की और स्केटिंग भी किया और शाम तक वापस अपने बोटहाउस आ गये। इलेक्ट्रिक बैड आन किया और कंबल में घुसने के बाद हम सब पेट पकड़-पकड़कर हंसने लगे। असल में आज हम चारों दोस्त बेवकूफ बने थे। चाहे वो स्लेज हो,स्केटिंग हो या ऊपर गुलमर्ग तक जाने के लिए दस किलोमीटर के रास्ते के लिए वो अलग से हमारा 1400 रुपए चुकाना और उस नाममात्र सी गाड़ी में बैठने वाले व्यक्ति का गाइड बनकर जबरन नाक रगड़ के हमसे 600 रुपए ले लेना। कुल मिलाकर हमें बुरी तरीके से ठग लिया गया और हममें से कोई उस वक्त इस बात पर ध्यान नहीं दे पाए। हम ये सब याद करके हंस रहे थे तभी किसी ने हमारे कमरे का दरवाजा खटखटाया, बोटहाउस में काम करने वाले ने कहा कि एक कोई व्यक्ति आया है शिलाजीत जड़ी बूटियां वगैरह लेकर, अगर आप देखना चाहें तो। हमने हां कर दी। जो सामान बेचने आया था उसके हावभाव देखकर ही हमने मना कर दिया कि भैया हमें नहीं लेना। फिर उसने कहा- ठीक है पर देख तो लीजिए, दिखाने के पैसे नहीं लूंगा सर। फिर उसने शिलाजीत निकाला और फिर उसकी मार्केटिंग शुरू हो गई।
                               हमारे जो दो दोस्त पीने वाले थे, वे रम पीकर नीचे ही बैठे हुए थे। मैं और एक और दोस्त हम दोनों कंबल में घुसे हुए थे। तो फिर उस विक्रेता ने बताया कि साहब खास आपके लिए लाया हूं, ये शिलाजीत मामूली नहीं है, लद्दाख से लेकर आया हूं। वहीं के पहाड़ों का जो पसीना है उसी का ये बना है। बाकी जगह के पहाड़ों के पसीने से बने शिलाजीत से कहीं अलग। और ऐसी तरह-तरह की लुभावनी बातें। हमारे रम पीने वाले दोस्त अब उसकी बातों में दिलचस्पी लेने लगे। अब उन दोनों को अपने दादा याद आ गये कि मेरी दादाजी को कमजोरी है, ढंग से आजकल चल नहीं पाते हैं, उनके लिए लेना ही है वगैरह वगैरह। अब पता नहीं उन्हें अपने लिए चाहिए था या अपने दादाजी के लिए पर वे तो अपने दादा के नाम पर दो-दो सौ रुपए का शिलाजीत खरीद लिए। फिर जब उस विक्रेता को लगा कि शिलाजीत का मामला खत्म तो अब वो इत्र दिखाने लगा।
                              उसने बताया कि श्रीनगर के फूलों को बाहर ईरान और अरब भेजा जाता है, वहाँ से ये बनकर वापस श्रीनगर आता है, देख लीजिए एक बार क्योंकि आपको ये कहीं और नहीं मिलेगा। इत्र की खुशबू अच्छी थी लेकिन कीमत थी 600 रुपए।  कीमत की वजह से हमारे दोस्त पीछे हटे वरना वे इत्र भी खरीद लेते। अब जब उस विक्रेता को लगा कि और मेरी बिक्री नहीं होगी तो वो जाने की तैयारी करने लगा।जाते-जाते उसने कंबल में लेटे हम दोनों  को देखकर कहा कि आप भी कुछ ले लो, कश्मीर आए हो, हमने साफ मना कर दिया। जैसे ही वो गया, हमने दरवाजा बंद किया और फिर से पेट पकड़ के हंसने लग गये।
                              जो दोस्त मेरे साथ लेटा हुआ था, उसने अन्य दो लोगों को कहा कि तुम लोग को समझ नहीं आया क्या बे, वो बेवकूफ बना के चला गया, मेरे को तो उसे देख के ही शक हो रहा था। शिलाजीत खरीदने वाले ने भी तुनककर कहा- साले उस टाइम बोल नहीं सकता था। और फिर हम सब शिलाजीत की सत्यता प्रमाणित करने में लग गये। हमने पहले नेट में असली शिलाजीत पहचानने के तरीके देखे और उसी तरीके से जांच शुरू कर दी। एक दोस्त ने विधि अनुसार अपने हथेली में शिलाजीत के छोटे टुकडों को लिया और कुछ बूंद पानी डालकर रगड़ना शुरू किया। अगर रंग नहीं छोड़ता तो असली वरना नकली। वो नेट में वीडियो देख शिलाजीत मलता और हम हंस-हंस कर लोट-पोट हो जाते। क्योंकि समय बीतता जा रहा था और हम किसी निष्कर्ष पर पहुंच नहीं पा रहे थे कि असली है या नकली। और फिर हमने उस समस्या को वहीं छोड़ दिया और सो गये।
                               अगले दिन हम 11 बजे उठे आज हमें डल झील का मार्केट घूमने जाना था। चूंकि मार्केट डल झील में ही था तो हम 12 बजे शिकारा(बोट) की सवारी करते हुए मार्केट की ओर निकले, मार्केट यानि फिर से खरीददारी और हमारा पिछला दो बार का ठगे जाने का अनुभव। रास्ते में हमें चिप्स और बिस्किट बेचने वाले मिले, साथ ही केसर बेचने वाले भी मिले पर हमने मार्केट जाने से पहले कुछ भी नहीं खरीदा। हम सबने मार्केट जाकर अपने घरवालों के लिए कश्मीरी कपड़े शाल वगैरह खरीदे। साथ ही एक केसर की दुकान थी, चूंकि यह मार्केट सरकार द्वारा बसाई हुई थी तो गुणवत्ता में कमी या नकली होने का खतरा नहीं था। इसलिए मैंने और मेरे एक दोस्त ने उस दुकान से एक-एक ग्राम केसर तीन सौ रुपए में खरीद लिया।
                               अब हम वापस मार्केट से अपने बोटहाउस की ओर लौट रहे थे। जब हम मार्केट से वापस लौट रहे थे। तो केसर बेचने वाले एक के बाद मिलने लगे। पहले एक मिला उसने 200 रुपए प्रति ग्राम बताया। दिखने में हूबहू वैसा का वैसा उस 300 रुपए ग्राम वाले केसर की तरह। हमारे एक दोस्त ने तो एक ग्राम खरीद भी लिया। फिर हम आगे बड़े, एक और बोट वाला आया, उसने 200 रुपए और 100 रुपए प्रति ग्राम वाले दो अलग तरह के केसर दिखाए। जो  दोस्त अभी कुछ मिनट पहले 200 रुपए प्रति ग्राम के केसर खरीदा था उसके होश उड़ गये। अब हम तीन दोस्तों ने तो केसर खरीद  लिया था, बच गया एक, उसने भी 100 रुपए देकर एक ग्राम केसर खरीद लिया। हम फिर से हंसने लग गये। अब कुछ देर बाद एक और बोट वाला आया, उसने तो हदें पार कर दी। कहने लगा एक ग्राम 50 रुपए,  टिन का डिब्बा खुला और केसर दिखने में बिल्कुल असली सा। हम चारों दोस्त एक दूसरे को देखकर हंसने लग गये। और फिर हम सब ने मिलकर उस 50 रुपए वाले से चार ग्राम केसर लिया वो भी 100 रुपए में।
                               आज जब शाम को बोटहाउस पहुंचे तो हमने अपना सामान किनारे रख केसर के पैकेट को निकाला। 25,100,200,300 रूपए, सभी तरह के केसर हमने निकाले और फिर पोस्टमार्टम शुरू। चूंकि केसर और शिलाजीत को जांचने की क्रियाविधि एक सी थी। तो हम सबने वही केसर का रेशा लिया और पानी की बूंदे डालकर मलना शुरू कर दिया। 5 मिनट, 10 मिनट, 15 मिनट समय बीतता गया। हम फिर एक दूसरे को देख हंसने लगते, हंसी ऐसी कि रुकने का नाम न ले। फिर जब लगा कि ये हमारे समझ से बाहर की चीज है तो हमने हाथ धोया और सो गये।
                                आप हम चारों की हरकतों के बारे में जानकर ये सोच रहे होंगे कि हम लोगों का दिमाग कहाँ था या हम लोग क्यों इतनी बेवकूफी किए जा रहे थे। असल में हर रात बोटहाउस पहुंच कर खाना खाकर कंबल ओढ़कर हम भी यही सोचते थे कि हम चार बदमाश इंजीनियर्स को कोई कैसे ठग सकता है। आखिरकार पैसे व्यर्थ में जाने की चिंता हमें भी थी। असल में हम चारों पहली बार इतनी ठंड झेल रहे थे,हमारे लिए सब कुछ नया था। बाद में समझ आया कि कश्मीर की उस ठंड में हम हाइपोथर्मिया का शिकार हुए थे।


 Gulmarg-1


 Gulmarg-2


 Gulmarg-3


 Gulmarg-4




 Gulmarg-5


Dal lake


Traffic jam at Gulmarg Road


Passing through Anantnag district


Majestic view Before entering jawahar tunnel


Repose & Gulshan gulshan-  Two Beautiful shikaras(boat) at my left side.


Our Ride


Inside Boathouse- 1




Inside Boathouse- 2


 Boating at dal lake


With army people at a tea stall

Snowfall in Gulmarg

 

Tuesday, 17 October 2017

~ बादनी - मदकोट ट्रैकिंग ~

                            हम मुनस्यारी तहसील के गोरीपार क्षेत्र के चिलकोटधार गाँव से शाम को निकलकर रात होते तक पैदल ढलाननुमा रास्ते से बादनी पहुंच चुके थे। हम जिस दोस्त के साथ बादनी आये, उन्हीं के कोई परिचित थे जिनके यहां बादनी में हमने रात्रि विश्राम किया। बादनी में हम जिनके यहाँ रूके हुए थे वहाँ हमने घर के घी से सने हुए पराठे खाए और उनके यहां के गौशाला का गाढ़ा दूध पिया। उस दूध का स्वाद आज भी भुलाया नहीं जाता, वो दूध इतना गाढ़ा था कि मैदान का आदमी नहीं पचा पाएगा, जो रोजाना अपना शारीरिक बल आजमाता हो ऐसे ही लोग इतना गाढ़ा दूध पचा सकते हैं।
                           अब ऐसा हुआ कि सुबह होते ही मैंने पूरा प्लान बदल लिया। जिस दोस्त के साथ हम बादनी पहुंचे थे उन्हें मैंने वहां से अलविदा किया और अपना आगे का रास्ता बदलने का सोचा। इत्तफाक से किस्मत भी ऐसी कि बादनी में हमने जिनके यहां रात्रि विश्राम किया था उन्हें मदकोट जाना था और फिर वहां से वे मुनस्यारी जाने वाले थे। मुझे भी मुनस्यारी वापस लौटना था। तो मैं उन्हीं के साथ सुबह 6 बजे पैदल चिलकोटधार की पहाड़ियों के रास्ते होते हुए मदकोट की ओर निकल गया। बादनी से मदकोट की यह दूरी लगभग 12 से 15 किलोमीटर की थी। हमने जो बादनी से चलना शुरू किया लगातार चलते रहे और लगभग 5 किलोमीटर की दूरी नाप लिए। शुरूआत में रास्ता सीधा-सपाट था, ज्यादा चढ़ाई नहीं थी। हम जब चल रहे थे तो मेरे जूते बार-बार पत्तियों के संपर्क में आकर फिसल रहे थे और मैं खुद को संभालते हुए आगे बढ़ रहा था, असल में मेरे जूतों की तली घिस चुकी थी। महीनों तक पहाड़ों में चल-चलकर मैंने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया।
                           चिलकोट की पहाड़ियों को पार करते हुए हम तेजी से आगे बढ़ रहे थे। सुबह ठीक-ठाक ठंड थी फिर भी लगातार चलते रहने की वजह से हमें पसीना आने लगा था। मैं आगे-आगे चल रहा था और हमारे जो दोस्त थे वे मेरे पीछे चल रहे थे। अचानक से उन्होंने मुझे कहा यार रूकते हैं थोड़ी देर। मैंने कहा - ठीक है। वे थोड़े से थक गये थे। पर मुझे पता नहीं क्या हो गया था, चलने का एक अलग ही धुन सवार था। मुझे उतनी थकान महसूस नहीं हुई जितनी होनी थी। अब हम जब शांत पहाड़ी में बैठे थे तो मैंने उनसे कुछ-कुछ सवाल पूछे कि--
- यार दाज्यू मैं मिलम ग्लेशियर तक चले जाऊंगा न? 70 किलोमीटर की दूरी है तीन दिन का समय लगता है, रास्ता भी काफी दुर्गम है जान का खतरा है, सुना है बहुत पत्थर गिरते हैं वहाँ ऊपर पहाड़ियों से। और पता नहीं मैंने एक सांस में कितने सारे सवाल कर लिए उनसे।
उन्होंने कहा- यार आप तो मुझसे भी अच्छा चल रहे हो। इस तरह से चलोगे तो तीन दिन क्या दो दिन में ही पहुंच जाओगे। बिल्कुल पहाड़ी लोगों की तरह चल रहे, आप मुझे सच में कहीं से भी मैदान के नहीं लग रहे। अब उन्होंने मेरे जूतों को देखकर कहा- आपका जूते का तली देख के तो मुझे डर लग रहा है, मैं ये जूता पहन के अभी चल रहा होता तो कब का खाई में गिर गया होता, पता नहीं आप इन जूतों में कैसे चल ले रहे हो। उनकी ये बातें मेरे लिए किसी पुरुस्कार से कम नहीं थी और फिर मेरा चलने का हौसला दुगुना होता गया।
                            मैं जिनके साथ मदकोट जा रहा था उन्हें चिलकोट की पहाड़ियों में ही बकरी वालों तक भांग/गांजा/माल पहुंचाना था। उन्होंने आवाज लगाई और बकरी वालों को ढूंढकर उन तक सामान पहुंचा दिया। जब वे बकरी वालों से मिलकर वापस आ गये तो उन्होंने एक घटना का जिक्र किया कि बकरी वाले बता रहे थे कि कल चिलकोट की पहाड़ी से पत्थर गिरने की वजह से उनकी दो बकरियां खाई में गिरकर मर गई। अब उन्होंने बताया कि यहाँ से पत्थर गिरते ही रहता था, हर साल ऐसी घटनाएँ आम है। अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी क्योंकि हम अभी उसी रास्ते से गुजर रहे थे जहाँ एक दिन पहले बकरियों की जान चली गई थी। हमारे दोस्त ने कहा - आगे थोड़ा संभल के चलना, पगडंडियां अब थोड़ी जर्जर हालत में मिलेगी। मैं मन ही मन सोच रहा था कि आगे का रास्ता और दुर्गम होगा फिर मैंने सोचना छोड़ दिया और इस बारे में उनसे ज्यादा कुछ पूछा भी नहीं और हम बस चलते गये।
                            हमारे दोस्त ने बकरी वालों के बारे में यानि गड़रियों के बारे में एक गजब की बात बताई। उन्होंने कहा कि बकरी वाले पैदल ही बकरियों को चराते हुए मुनस्यारी से मैदानों क्षेत्रों तक यानि रामनगर तक ले जाते हैं। चूंकि पहाड़ों में ठंड के समय चारे की समस्या होती है तो वे ठंड शुरू होने से पहले ही मैदानों का रूख कर लेते हैं। लगभग 300 किलोमीटर के इस पहाड़ी रास्ते को वे तीन महीने में पूरा करते हैं और फिर वापसी में तीन महीने। यानि छः महीने के एक लंबे सफर के बाद वापस मुनस्यारी लौटते हैं। तब तक पहाड़ों में भरपूर चारागाह उपलब्ध हो जाता है।
                            मैं उनकी बातें कहानी की तरह सुनते जा रहा था, हमारी दायीं ओर मदकनी(मदकन्या) नदी की कल-कल धारा थी, यह नदी पंचाचूली ग्लेशियर से निकलती है और बायीं ओर गोरीगंगा नदी अपने पूरे प्रवाह में बह रही थी जिसका उद्गम स्थल मिलम ग्लेशियर है। और बीच में हम चल रहे थे। बातें करते-करते  कब 11 बज गये पता ही नहीं चला, हम 5 घंटे की पैदल यात्रा कर मदकोट पहुंच चुके थे। हमने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था, चूंकि इस 5 घंटे की चलाई के दौरान हमने पानी की एक बूंद भी नहीं पी थी, तो अब हमने आखिरकार मदकोट पहुंच कर ही पानी पिया और रोटियां खाई। घंटे भर में मदकोट में तहसील कार्यालय का काम निपटाकर अब हम मुनस्यारी जाने की तैयारी करने लगे।

Chilkotdhar Range


Me and my friend from baadni village


Group of Sheeps


My friend with the shephard

Goriganga River

Sheeps All the way


Madkot- Munsyari road

A Wide view of Khulliya Top from chilkotdhar


TREKKING THROUGH CHILKOTDHAR RANGES

Monday, 16 October 2017

~ 25 रुपए में 1200 किलोमीटर का सफर ~

                                अगस्त 2015 की बात है। मैं दोपहर को दिल्ली हजरत निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन में था। दिल्ली से मेरी ट्रेन रायपुर के लिए थी। मैंने पहले ही गोंडवाना एक्सप्रेस की स्लीपर क्लास की टिकट करा ली थी। ट्रेन आने में अभी एक घंटे का समय बचा था। मैं एटीएम की तलाश में इधर से उधर भटक रहा था। उतने में ही घर से फोन आया कि आज सारे बैंक बंद हैं। अब कल पैसे डाल देंगे तेरे एकाउंट में। मेरे तो पांव तले जमीन खिसक गई। जेब और बैग खंगाला तो पता चला कि अब मेरे पास मात्र पच्चीस रुपए रह गये हैं।
                                घरवालों से भी मुझे उसे दिन पैसे डलवाने थे। मैंने पहले किसी को कहा भी नहीं कि पैसे खत्म होने को है। जो दोस्त मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था, मैंने उससे भी पैसे उधार नहीं लिए। मेरा स्वाभिमान अपने चरम पर था और अब सामने मेरी परीक्षा होनी थी। 22 घंटे का लंबा सफर और हाथ में मात्र पच्चीस रुपए। ट्रेन छूटने में पंद्रह मिनट रह गया था, मैं अब यह सोचने लग गया कि इस पच्चीस रुपए का कैसे सदुपयोग किया जाए। क्योंकि अब पैसे मिलने की लगभग सारी संभावनाएँ समाप्त हो चुकी थी। जिन दोस्तों से नेट-बैंकिग रूपी बची-खुची संभावनाएँ थी उसे भी मेरे स्वाभिमान ने खत्म कर दिया। अब अगले दिन सुबह ग्यारह बजे बैंक खुलने का इंतजार करना ही आखिरी रास्ता था। दोपहर तीन बजे से अगले दिन के सुबह ग्यारह बजे का ये पूरा समय, आखिर कटे तो कटे कैसे। आखिर इन पच्चीस रूपयों का क्या किया जाए। मैंने थोड़ी देर सोचा फिर उस पच्चीस रुपए में से दस रुपए का एक लोकल पानी बोतल खरीदा और उसमें से सारी पानी फेंककर रेल्वे स्टेशन में नल से मिलने वाला पीने योग्य पानी भर लिया। और फिर मैं रास्ते भर यही करता रहा। ठीक-ठाक गर्मी थी। इसलिए पानी की जरुरत भी बढ़ गई थी। जब भी कोई स्टेशन आता मैं दौड़कर उतरता और पानी भरता।
                              शाम के पांच बज चुके थे। ट्रेन को चले अभी बमुश्किल दो घंटा भी नहीं हुआ था कि मुझे भूख लगने लगी। मुसीबत ऐसी कि उस दिन मेरे बैग में खाने का कुछ भी सामान नहीं था, अब जो कुछ भी था उस पच्चीस रुपए के सहारे था। उसमें से भी तो अब पंद्रह रूपये बच गये थे। गोंडवाना में पेंट्रीकार नहीं रहती। पर फिर भी चाय समोसे वाले गुजर रहे थे। मैंने हमेशा की तरह इन चीजों से खुद को दूर रखा। और फिर कुछ देर में एक चने वाला आया मैंने उससे दस रुपए का चने खरीद लिए और पांच रूपये बचा लिए। दस रुपए का जो मैंने चना खरीदा था वो मैंने आधा खाया, पेट में कुछ गया नहीं गया पता ही नहीं चला। अब ये ट्रेन का मेरा सफर एक नया मोड़ लेने जा रहा था। शाम के छ: या सात बजे के बीच का समय रहा होगा। उसी समय मथुरा से एक पूरा परिवार चढ़ा। महिलाएँ, बच्चे और एक दादी। सारी की सारी छः सीट मेरे बर्थ के आसपास। साइड अपर में एक कोई बुजुर्ग थे और मैं अपर बर्थ में। बाकी की छः सीट उन परिवार वालों की थी। मैं अब अपर बर्थ में जाकर लेट गया और बाकी बचे चने भी खा लिया। और पानी पीकर लेट गया।
                              अपर बर्थ में कुछ देर लेटा रहा, फिर नीचे उतरकर ट्रेन के दरवाजे के पास जाकर थोड़ी हवा खाई और फिर नीचे लोवर बर्थ में आकर बैठ गया। मथुरा से जो परिवार चढ़ा था। उनके साथ एक बच्चा था, जो लगभग पांच साल का रहा होगा वो मेरे साथ खेलने लग गया। मैं भी उसके साथ कुछ देर खेल लिया। अब चूंकि उस बर्थ में मैं अकेला ही था तो उस बच्चे की दादी से मेरी हल्की फुल्की बातें शुरु हो गई। उन्होंने बताया कि वे गोंदिया वापस अपने घर लौट रहे हैं। दादी ने बताया कि वे काशी, हरिद्वार, ऋषिकेश, वृंदावन, मथुरा आदि जगहों से घूम कर आ रहे हैं। पंद्रह दिन की यात्रा के बाद वे अपने घर गोंदिया(महाराष्ट्र) लौट रहे थे।
                              जो दादी थीं उनसे मेरी अच्छी खासी बात हो गई, क्योंकि वे भी उत्तराखंड की यात्रा से लौट रहे थे, और मैं भी तो महीने भर पहले वहीं था,इस एक वजह से हमारी काफी बातें मिल गई। और ये पहली बार ऐसा हुआ कि मैंने ट्रेन के सफर में किसी से इतनी बात की हो। अब उन्होंने कुछ खाने-पीने की चीजें निकाली और शायद कुछ मिठाइयाँ खाने लगे। उन्होंने मुझसे भी पूछा तो मैंने मना कर दिया। जब वे जिद करने लगे तो मैं भी सोचा कि ये सब क्या हो रहा है। फिर मैंने उन्हें कहा कि नहीं आंटीजी मेरा उपवास है। तभी उस पांच साल के बच्चे ने जो मेरे साथ खेल रहा था, वो बड़ा तेज बच्चा निकला। उसने तुरंत चिल्लाकर कहा कि मम्मी अभी कुछ देर पहले भैया ऊपर बैठ के चना खा रहे थे। उस बच्चे ने तो मुझे धर्मसंकट में डाल दिया। मेरा झूठ पकड़ा चुका था, उस बच्चे की बात से मैं झेंप सा गया। वो आंटी हंसने लगी और कहा लो बेटा अब तो खा ही लो। लंबा सफर है. मेरे पास अब बोलने के लिए कुछ भी नहीं था, मना करता तो भी कैसे, विवश होकर मैंने उनकी दी हुई मिठाई खा ली और पेट भर पानी पी लिया। मीठा खाने के कारण मेरी भूख थोड़ी शांत हुई। अब मुझे कुछ खाने का मन भी नहीं कर रहा था। लेकिन अब नींद आने की समस्या थी। बड़ी मशक्कत के बाद रात के 11 बजे के आसपास मैं सो गया।
                            अगले दिन सुबह 5 बजे मेरी नींद खुल गई। सुबह ब्रश करने के बाद जो भूख लगी उसकी कोई सीमा न थी। एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो रहा था। जैसे-तैसे तीन घंटे बीत गये। 8 बजे उस परिवार के लोगों ने फिर मिठाई निकाली और फिर मुझे मिठाई खिलाई। दादी ने मुझसे एकदम पूछ ही लिया कि बेटा तुम रात को खाना खाए कि नहीं, मैंने तो अभी तक तुम्हें कुछ खाते देखा नहीं। मैंने उन्हें कहा कि रात को ट्रेन रूकी थी तब बाहर जाकर कुछ-कुछ खा लिया था।कुछ इस तरह गोल-गोल घुमाकर मैंने गेंद फेंक दी और दादी ने लपक ली और मुझे दादी के सवालों से मुक्ति मिली। सुबह के 11 बज चुके थे, मेरे फोन में पैसे आने का मैसेज आ चुका था। अब मैं ट्रेन रुकने के इंतजार में था कि अब कोई स्टेशन आए और मैं पैसे निकालकर कुछ खाऊं।
एक कोई स्टेशन आया मैं खुशी-खुशी उतरा पर वहाँ एक भी एटीएम नहीं था। फिर कुछ देर बाद एक और स्टेशन आया वहाँ एटीएम था। मैं दौड़कर गया, पता चला कि एटीएम से पैसे नहीं निकल नहीं रहे थे। उसके बाद फिर एक स्टेशन आया वहाँ एटीएम से पैसे निकल गये। मेरा ट्रेन के सफर का ये संघर्ष अब अपने आखिरी पड़ाव को पार कर सुकून से बैठ गया।
                            अब मैं सोचने लगा कि चलो अब कुछ खाने-पीने की चीजें खरीद ली जाए। पर मैंने कुछ नहीं खरीदा। मेरी भूख शांत हुई या क्या हुआ पता नहीं पर पैसे आने के पश्चात भी मैंने उस दिन कुछ भी नहीं खरीदा। सफर में अभी तीन घंटे और बचे थे। मैंने पानी की बोतल भर ली और मुस्कराकर अपने बर्थ में आकर सो गया। शायद उपवास या रोजा रखने वालों की तरह मैं भीतर तक शांत हो चुका था।

Monday, 24 July 2017

पाना भवन - बादनी गांव

                           प्रत्येक किसान अपने खेत का वैज्ञानिक होता है और वो खेत उसकी प्रयोगशाला। किसान की इस प्रयोगशाला से धरती को, पर्यावरण को, व्यक्ति विशेष को कोई खतरा नहीं, कोई नुकसान नहीं। अब चूंकि किसान अपनी जरूरत के अनुसार धरती का पोषण करता है शोषण नहीं ( अगर आज बाजार के दबाव को हटा कर देखा जाए तो), तो उसका यह काम वाकई धरती को बचाने का एक धरातलीय प्रयास है। किसान का यह विज्ञान कार्ल मार्क्स के कथन "गणित विज्ञान की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है" से भी कहीं आगे है।
मजेदार बात ये भी कि किसान का यह वैज्...ञानिक पहलू एकपक्षीय है क्योंकि उसके विज्ञान में सिर्फ वरदान का पक्ष है अभिशाप का पक्ष नगण्य है।

नोट:- इनके गांव तक जाने के लिए कोई रोड नहीं है, पैदल खड़े पहाड़ चढ़कर ही पहुंचा जा सकता है।


गौशाला


प्रसाधन और स्नानागार की भी सुविधा है


 आंगन


दादी पशुओं के लिए चारा लाद कर ले जाती हुई, यह चारा वो चार-पांच किलोमीटर दूर जंगल से लेकर आती हैं।


पाना जी के घर का एक खूबसूरत सा कमरा- 1


पाना जी के घर का एक खूबसूरत सा कमरा- 2


पाना जी की भतीजी


पाना जी के पिता मुनस्यारी तहसील के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने एयरफोर्स ज्वाइन किया था। साथ ही इन्होंने पैराशूट से गोरीपार से मुनस्यारी पैराग्लाउडिंग की थी जो कि अपने आप में एक कीर्तिमान है।


चिलकोट(मुनस्यारी) की दुर्गम पहाड़ियों में दो पागल किसान। जो हमारे साथ में हैं वे बादनी गांव के हैं जिन्होंने आर्ड्रिनेंस फैक्ट्री की नौकरी छोड़ी, पहाड़ लौटे और किसानी का फैसला लिया।
पाना भवन

Thursday, 15 June 2017

~ A little story behind road cutting issue in Silthing Village, Uttarakhand ~

जब सिल्थिंग गांव के पास से रोड कटिंग होने वाली थी, तो गांव के कुछ लोग अड़ गये और कहा, नहीं चाहिए गांव के पास से रोड, हम पैसों के एवज में अपने खेतों का बलिदान नहीं दे सकते। हमारे खेत बीच में आ रहे हैं, आप एक किलोमीटर दूर से ही रोड कटिंग कर लीजिए। हमें नहीं चाहिए गांव के पास से रोड, एक किलोमीटर दूर ही सही, चलेगा। वैसे भी इतने सालों से बिना रोड के थे। अब तो वैसे भी रोड नजर के सामने है, घर से दिख तो रहा है, बहुत बड़ी बात है।
और फिर एक किलोमीटर दूर से रोड कटिंग हुई।
सिल्थिंग के गांव वालों के इस फैसले पर आसपास के गांवों के लोगों ने, खासकर पढ़े-लिखे तबके ने खूब मखौल उड़ाया कि बढ़िया घर तक रोड आ रही थी, ठीक-ठाक पैसे मिल रहे थे, ये गधे के गधे ही रहेंगे,इनका कुछ नहीं हो सकता।
मजाक बनाने वाले उन लोगों को शायद इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है कि एक किसान (सीमित जमीन वाले छोटे किसान) के लिए उसका खेत कितना मायने रखता है। खेत उसके लिए जमीन का टुकड़ा भर नहीं होता, वो तो उसकी जिंदगी का हिस्सा होता है। खेत उसके आय का स्त्रोत तो होता ही है, जीने की वजह भी होता है। सोचिए कैसा हो अगर कोई आपके जीने की वजह छीन ले और कहे कि लो पैसे और दफा हो जाओ।




step farms, silthing village


Cutted road, Silthing Village


step farms, silthing village

Friday, 12 May 2017

~ बीस मिनट का अंधेरा ~

                         बिठौली परंपरा( दैनिक जीवन की सामग्री लेकर अपनी ब्याही दीदी के घर प्रस्थान) निभाते हुए हम मुनस्यारी ब्लाक के सिल्थिंग गांव में अपने दोस्त के एक रिश्तेदार के यहां ठहरे हुए थे। सिल्थिंग में आज भी कोई नेटवर्क नहीं है। बीसएनएल का नेटवर्क आता है वो भी ना के बराबर।अभी दो महीने पहले ही सिल्थिंग गांव के पास से रोड कटिंग हुई है। इससे पहले गांव वाले पहाड़ी पगडंडियों पर ही निर्भर थे।
                         उस दिन शाम ढलने से पहले बड़ी तेज बारिश होने लगी, थोड़ी देर बाद ओले भी गिरने लगे।मेरे दोस्त पड़ोस में कहीं कच्चि( स्थानीय शराब) पीने के लिए चले गये। मैं अकेले एक कमरे में कुर्सी लगाकर बैठा हुआ था। उस छोटे से कमरे में एक झूमर भी लगा हुआ था, किनारे में एक खाट लगी हुई थी, कंबल और रजाई पड़ी हुई थी और उन रजाईयों के ऊपर बिल्लियों का एक झुंड जो वहां मजे से लेटे हुए थे, कमरे की गंध से ऐसा लगा कि इस कमरे में इन बिल्लियों का ही आधिपत्य होता होगा, एक छोटी सी ट्यूब वाली रंगीन टीवी थी, दीवारों में फिल्मी सितारों के कुछ पोस्टर और उस घर के लोगों की कुछ फ्रेम की हुई तस्वीरें लगी हुई थी। पहाड़ी गांवों के छोटी ऊंचाई में बने घर, अधिकांशत पत्थरों से बने हुए और मिट्टी और गोबर की लिपाई से युक्त, असल में ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि जाड़ों में कम ऊंचाई के पत्थर के घरों में ठंड कम लगती है। पत्थर के ही घर इसलिए क्योंकि इन्हीं की वजह से बर्फबारी और ओलावृष्टि से रक्षा होती है। उस कमरे में टीवी चल रहा था। ठीक इसी बीच हम जिस घर में रूके हुए थे, उनके यहां की दादी आयी और मेरे सामने लगी कुर्सी में बैठ गयी। टीवी चल ही रहा था, तेज बारिश,बिजली की गर्जना और बस कुछ मिनट बाद लाइट चली गई। दादी ने सोलर लाइट जलाई और फिर उन्होंने मुझसे बात करनी शुरू की।
                         सोलर की धीमी मद्धिम रोशनी के बीच मेरी अग्निपरीक्षा शुरू हो चुकी थी। अग्निपरीक्षा इसलिए क्योंकि दादी को हिन्दी बोलना नहीं आता था और मुझे कुमाऊँनी(पहाड़ी)। वो थोड़ा बहुत हिन्दी समझती थी और मैं तो अभी-अभी कुमाऊँनी समझने की राह में था। एक बार को लगा कि यार ये तो गजब फंस गये हम और अब बात करें भी तो कैसे, उस जगह से अचानक उठ के कहीं जा भी नहीं सकते, इसलिए वहां टिके रहे।
                          दादी कुमाऊँनी में सवाल करती और मैं बड़े ध्यान से सुनता, उस भाव को पकड़ने की कोशिश करता, सोच-समझ के जितनी जल्दी हो सके हिन्दी में जवाब देता। दादी फिर मुझसे कुमाऊँनी में सवाल करती और मैं फिर हिन्दी में जवाब देता, और फिर मेरे हर जवाब के बाद में वो "हां भुला(बेटा)" कहती जाती।
दादी ने इस बीच में मेरा नाम,काम,पता पूछा, घरवालों के बारे में पूछा। दादी ने ये भी कहा कि बहुत खुशी हुई कि तुम इतने दूर प्रदेश से हमारे इस गांव में आए। और फिर अपने बेटे और बिटिया के बारे में भी बताया, मां कैसे अपने बच्चों के बारे में जिक्र करते हुए खुश हो लेती है वो मैं दादी की बातों से महसूस कर पा रहा था। दादी बता रही थी कि उनकी आंखें अब ढंग से दिखाई नहीं देती, धुंधलापन आने लगा है, उन्होंने बताया कि दो बार पिथौरागढ़ और हल्द्वानी जाकर उन्होंने जांच भी कराई फिर भी कुछ ठीक नहीं हुआ। आंख की समस्या जस की तस बनी हुई है।
                          दादी कहती है - अब तो बुढ़ाने लगी हूं भुला, अब ज्यादा चलने और गाड़ी में सफर करने की हिम्मत भी नहीं बची, इलाज के लिए अब कितना भटकूंगी, मुस्कुराते हुए कहने लगी कि अब इन आंखों को ऐसी ही चलाऊंगी जब तक चलता है ठीक है।
                          मैं उस बीस मिनट के समय में उस हल्की रोशनी में सिर्फ दादी के साथ था, हमारे बातचीत के बीच किसी प्रकार का कोई व्यवधान नहीं था, दादी के बोले हुए एक-एक शब्द पर मेरी एकाग्रता बनी हुई थी। मैं उस बीस मिनट के अंधेरे में दादी से बात करते ठीक-ठीक कुमाऊँनी समझने लग गया था। एक बार को लगा कि अगर ऐसी स्थिति बार-बार आए तो किसी नयी भाषा को सीखने में कितनी आसानी होगी। और फिर लाइट आ गई, बीस मिनट कट चुके थे। और खाना खाने के लिए बुलावा आ चुका था।

~ Stories from Himnagri ~
 
 
 
-- 'फोटो में सिल्थिंग गांव का वो कमरा' --


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