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Friday, 10 November 2017

Reading List followup -

Louis Fischer:
The Life of Mahatma Gandhi /  The Life of Lenin / Gandhi- His Life & Message For The World

Karl Marx:
Das Capital /  Communist Manifesto, Etc.

F. Engles:
The Origin of The Family, Private Property & The State

Amartya Sen:
Development As Freedom  /  Poverty And Famines  /  On Economic Inequality  /  India- Directions of Development

David Dickson:
The Politics Of Alternative Technology

Bertrand Russel:
Fourth International Conference on World Politics

D. F. Fleming:
The Cold War & Its Origin

R. L. Heil Broner:
The Future as History

H. C. Hilton:
Major Government of Asia

Jankowitsch:
The Third World without Super Powers

Peter Lyon:
Neutralism

F. H. Hinsley:
Power and the Pursuit of Peace

Machiavelli:
The Prince

Richard W. Alstyne:
The Rising American Empire

Dr. Benjamin:
State and Nation

J. L. Brierly:
The Law of Nations

Louis J. Halle:
The Nature of Power

W. S. Smith:
Islam in Modern History

J. Krishnamurti:
Freedom From The Known  /  Beyond Violence  /  Urgency of Change  /  Krishnamurti on Education  /  Education & Significance of Life  /  True Meditation  /  Truth & Actuality

J. L. Nehru:
Discovery of India  /  Glimpse of The World History

Radhakrishanan:
Indian Philosophies  /  Mahatma Gandhi

Arvindo:
All Major Writings

R. N. Tagore:
All Workings Translated in Hindi or English

D. G. Tendulkar:
Mahatma (vol. I to VIII)

A. Nagraj:
Jivan Vidya Ek Parichay  /  Vyawharatmak Janvad  /  Karm Darshan  /  Abhyas Darshan  /  Vyawharvadi Samajshastra  /  Manviya Vyawhar Darshan  /  Manviya Paribhasha Sanhita, Etc.

Peter Watson:
A Terrible Buety (The People and Ideas That Shaped the Modern Mind)

P. Hardy:
The Muslim of British India

Indo-Pak Relations:
Foundation of Pakistan- All India Muslim League–Documents
The Indian Muslim- A Documentary Record
The Concept of an Islamic State- Ishtiaq Ahmad
Paradoxes of Partition (1937-47)
Gandhi- Jinnah Talks
Writings & Speechs of Maulana Mohammad Ali
Speeches by Quid-I-Azam Mohd Ali Jinnah
Pathway to Pakistan
Islamization of Pakiatan
Religion and Politics in Pakistan
India Wins Freedom- Maulana Abul Kalam Azad
Students in Islamic Culture in Indian Environment– Aziz Ahmad
A History of the Idea of Pakistan- K.K. Aziz
Indian Muslim and Ideology of the Secular State– Zia-Ul-Hassan-Faruqi

Sigmund Freud:
Interpretation Of Dreams

John Dewey:
The Great Chain of Being

M. K. Gandhi:
An Autobiography  /  Social Service, Work & Reform   /  Satyagrah in South Africa  /  Constructive Programme  /  Truth is God  /  Trusteeship  /  Village Industries  /  Non Violence in Peace & War  /  My Socialism

Vinoba:
Moved by Love  /  Science and Self Knowledge  /  Thoughts on Education  /  Democratic Values  /  Women’s Power  /  Swarajya Shashtra

R. M. Lohia:
History of Socialist Movement  /  Caste System  /  Wheel of History

J. P. Narayan:
Total Freedom  /  Swaraj for The People  /  MERI VICHAR YATRA- I&II

Vivekananda:
Religion of Love  /  Thoughts on Spiritual Life  /  Spiritual Practice  /  Raj Yoga/ Prem Yoga/ Karma Yoga/ Bhakti Yoga/ Jnana Yoga  /  What Religion Is?  /  Lectures from Colombo to Almora

J. C. Kumarappa:
Economy of Permanence  /  Swaraj for The Masses

Ayn Rand:
The Fountain Head  /  We The Living  /  Atlas Shrugged

Tolstoy:
War and Peace  /  Anna Karenina  /  Hamare Jamane ki Gulami  /  Punrutthan  /  Various Short Stories and Plays.

Albert Einstein:
Ideas and Opinions  /  Out of My Later Years  /  My Views, Etc.

Others:
Western Philosophies on Politics, Sociology, Meta Physics, Social Construction, Micro & Macro Movements Etc.
Indian Literature of Different Languages and Cultures.
Religious Books: Mahabharata/ Geeta/ Ramayana/ Quran/ Bible, Etc.
Major Writings of: Gorki, Chekhow, Mikhaiel Sholokhow, Dostobaski, Georgi Plekhanov, Khalil Gibran, Lenin, Mao, Jean-Paul Satre, Simone de Beauvoir, Krupskaya, Che, Mery Wolstencraft, and others.

Friday, 27 January 2017

Translation work - Rajiv Malhotra Books


~ Multiple intelligence ~

 
         हार्वर्ड के प्रसिद्ध विचारक ऐरल गार्डनर कुछ साल पहले भारत आए थे। बैंगलोर में इंफोसिस की टीम को संबोधित कर रहे थे। असल में उन्होंने एक नयी थ्योरी इजात की जिसका नाम था "Multiple intelligence" यानि intelligence कई प्रकार के होते हैं जैसे कि:- artificial intelligence, spatial intelligence, emotional intelligence, rational intelligence आदि आदि। जो कि व्यक्ति विशेष के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होते हैं।
और ऐरल गार्डनर की इस थ्योरी ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला दी।
                       ऐरल गार्डनर की इस थ्योरी को तथ्यों/प्रामाणिकताओं के अभाव में विश्व भर से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, खैर ये तो होना ही था क्योंकि गार्डनर के पास कोई ठोस अनुभवजन्य साक्ष्य थे ही नहीं। और तो और जब कुछ भारतीय इस नये विचार की उत्पत्ति से संबंधित जानकारी जुटाने लगे तो यह बात सामने आई कि हेरल गार्डनर का यह नया विचार श्री अरबिन्दो के "Plains and parts of being" से आया है। जहां श्री अरबिन्दो कहते हैं कि एक व्यक्ति(being) से संबंधित उसके कई plains और parts हो सकते हैं,  यानि  "Different level of intelligence" हो सकते हैं जो आगे जाकर उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
               ऐरल गार्डनर ने कुछ नये Jargons जोड़ के जिस Multiple intelligence थ्योरी को जन्म दिया वह ज्यादा कुछ नहीं, श्री अरबिन्दो के विचारों का एक फीका और सरलीकृत रूप  है।




- संस्कृत - एक वैज्ञानिक भाषा -


               भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन में संस्कृत के शब्दों को लेकर एक बड़ा अंतर है। स्पंदन का विशेष गुण लिए संस्कृत के शब्द जिनका अनुवाद संभव नहीं है। क्योंकि कुछ शब्द ऐसे होते हैं जैसे कि सेब उसका किसी दूसरी भाषा में सीधा सा अर्थ है जो सेब की ओर ही इंगित करता है। लेकिन कुछ ऐसे शब्द हैं जिनका हम भौतिक स्वरूप देखने पर ये पाते हैं कि वे शब्द एक अनुभव विशेष पर आधारित हैं। और जिस सभ्यता के पास वो अनुभव नहीं हैं, उनके पास शब्दों के अनुवाद भी नहीं हैं। इसलिए संस्कृत के कुछ शब्दों को, जो किसी दूसरी भाषा में भले ही वे एक जैसे लगेंगे लेकिन वे होंगे कुछ और, क्योंकि संस्कृत के शब्दों का अपना स्पंदन है जो अपने मूल में विशिष्ट है और इसलिए इन शब्दों का अनुवाद असंभव है।
जैसे कि योग, आप इसे कसरत, व्यायाम या प्रार्थना नहीं कह सकते।योग जैसे और कुछ संस्कृत के शब्द हैं जो अपनी प्रकृति में विशिष्ट हैं।
                संस्कृत में भर्तृहरि एवं पाणिनी ने इसे और स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि बौध्दिक अर्थों में संस्कृत के इन शब्दों का सबसे बड़ा महत्व इनके उच्चारण ध्वनि से प्राप्त स्पंदन है। दूसरे अर्थों में कहा जाए तो एक ऐसी पध्दति जिसमें स्पंदन है और वो स्पंदन प्रकृति में हमें स्थूल परिणामों के रूप में प्राप्त होता है।
इन शब्दों की ध्वनियां जो अपनी प्रकृति में विशिष्ट हैं, वे किसी दूसरे शब्द से जिसकी अपनी एक अलग ध्वनि है, धुन और गुणधर्म भी अलग हैं, संस्कृत के शब्दों की जगह नहीं ले सकते।
                संस्कृत दर्शन बहुत ही स्पष्ट और साथ ही विशिष्ट भी है क्योंकि इसमें कुछ बुनियादी बीज मंत्र हैं जिनका अनुवाद असंभव है क्योंकि इन मंत्रों के उच्चारण में एक विशेष स्पंदन का गुण है।




~ Relaxation Response and Lucid Dreaming ~


                    1960-1970 का समय।महर्षि महेश योगी अपने "Transcendental Meditation" की वजह से प्रसिद्ध हो चुके थे। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हर्ब बेन्सन ने महर्षि महेश योगी से यह तकनीक सीखी और बहुत सारा पेपरवर्क करके जोड़ घटाना कर Relaxation Response नाम से एक नयी थ्योरी दे दी साथ ही अपने नाम से पेटेंट भी करा लिया और खूब नाम कमाया। और तो और हार्वर्ड में उन्होंने एक नया रिसर्च एंड डेवलपमेंट थिंक टैंक स्थापित किया और उनके इस काम के लिए सरकार से उन्हें करोड़ों डालर का अनुदान भी मिला।
                    आप इस बदमाशी की बानगी देखना चाहें तो यूट्यूब में Relaxation response नाम से देख सकते हैं, सैकड़ों वीडियो मिल जाएंगे।
आज महर्षि महेश योगी नदारद हैं, और नकल करने वाला विश्वप्रसिद्ध।
      
                    स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्टीवन लबर्ज के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला है। स्टीवन लबर्ज एक जाने-माने न्यूरोसाइंटिस्ट हैं। इन्होंने "Lucid dreaming" नाम की नयी थ्योरी दी। लेकिन जब स्टीवन के इस थ्योरी की पड़ताल की गई तो उन्होंने खुद बताया कि उन्होंने भारत आकर एक गुरू से योग निद्रा सीखी थी। वहीं से ये lucid dreaming निकल कर आया।
                अभी कुछ साल पहले मेरे एक दोस्त ने बड़े फैंसी अंदाज में मुझे lucid dreaming के बारे में बताया था कि यूट्यूब में वीडियो देखना इसका और एक बार आजमाना। मैंने देखा भी और आजमाया भी। और देर सबेर जब मुझे योग निद्रा के बारे में पता चला तो लगा कि कैसे हमारी संस्कृति,हमारी विरासत को बड़ी चालाकी से घायल किया जा रहा है। खुद मुझे योग निद्रा के बारे में इतने देर से पता चला, पहले ही Lucid dreaming का घूंट जो पी लिया था।
                  योग निद्रा हमारे लिए old-fashioned हो जाता है और lucid dreaming हमारे लिए किसी Fantasy से कम नहीं। क्योंकि गूगल/यूट्यूब ही अब हमारे ज्ञान का साधन है, जहां योग निद्रा से संबंधित कुछ ज्यादा नहीं मिल पाता लेकिन Lucid Dreaming से जुड़ी हजारों चीजें मिल जाएंगी जिसका निर्माण योग निद्रा को ही पचाकर किया गया है।

Thursday, 22 December 2016

~ Hollywood Movies ~


हालीवुड का आफिस अमेरिका में है।अमेरिका एक ऐसा देश, जो देश कम और बिजनेसमैन ज्यादा है। जो पूरी दुनिया को प्रभावित करता है कभी अपनी नीतियों से, कभी अपने संगठनों के माध्यम से, कभी अपने साधनों(फूड चैन) से तो कभी अपने बनाये नैतिकता के पैमानों से। और साथ ही इन हालीवुड फिल्मों से।
               अमेरिका एक ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा विकसित है,साइंटिफिक है यानि उसके पास अपनी जरूरत के सारे साधन है जो एक देश के लिए सर्वोपरि होते हैं पर कुछ चीजें जो अमेरिका के पास बिल्कुल भी नहीं है और वो है सामाजिकता, साधन शुचिता, मानवता। इन सब मामलों में अमेरिका शून्य है। इसलिए अगर दुनिया में सबसे वाहियात मुल्क कोई है तो वो अमेरिका है।
               अमेरिका के हालीवुड सेंटर से हर साल अच्छी फिल्में आती रहती है। हां अच्छी फिल्में, जिनके मूल में एक ही चीज रहती है वो यह कि दुनिया खतरे में है, दुनिया को बचाना है। इन कबाड़ सी फिल्मों का एक भयावह दौर चल रहा है जहां फिल्म शुरू हुए पांच मिनट भी पूरे नहीं होते कि फिल्म का नायक/खलनायक या आर्मीमैन बंदूक से गोलियां दागते दिख जाता है। असल में मौत को इस तरीके से पेश किया जाता है कि हम जैसे ही देखते हैं, एक अजीबोगरीब साहस से भर जाते हैं। उनके एक्शन से प्रभावित होकर उन्हें हर तरफ फालो करते हैं। पर अमेरिका भी जानता है कि लोग हमेशा मारकाट नहीं देखेंगे इसलिए अपनी छवि ठीक करने के लिए वो साल दो साल में नासा से कुछ खास पकवान यानि Interstellar, Gravity जैसी फिल्में बनाकर हमारे मनोविज्ञान में एक दूसरी दुनिया का चित्रांकन कर देता है और हम ज्ञान विज्ञान की एक अद्भुत झलक पाकर गदगद हो जाते हैं।
               अभी पिछले दस साल में ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ गई है जिसमें लगभग हर दूसरे फिल्म में फौजियों की टुकड़ियां हैं जो बंदूक, टैंक और गोलबारूद से लैस हैं, जो एक ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिसका जन्म उन्हीं के द्वारा हुआ है और लड़ाई को खत्म भी वही करते हैं। अंततः लोगों के दिमाग में जो चीज तगड़े से पहुंचती है वो ये कि दुनिया को बचाना है। कभी कभार सवाल करने का मन होता है कि भाई आखिर दुनिया को किससे बचाना है। हमने ज्यादा से ज्यादा गली में हाथ,पांव या डंडे से लोगों को लड़ते देखा है और दूसरा ये कि हमारा एक बदमाश पड़ोसी देश है जिसकी खबर हमें मिलती है कि वो आये रोज सीमा पार से बंदूक तान रहा है, चीजें यहां तक सीमित हैं। लेकिन ये अमेरिका किससे लड़ रहा है ये नामुराद देश जो पूर्णतः सुविधासंपन्न है। ये अपने फिल्मों के माध्यम से हमेशा ये दिखाने की कोशिश करता है कि उसे किसी ने छेड़ा है और वो उसका बदला लेगा और सामने वाले को मार के ही दम लेगा। कभी सरहद पार के किसी दूसरे देश से लड़ता है कभी समुद्री मार्ग तो कभी हवाई मार्ग से तंग करता है, जब ये सब से उब जाता है तो ग्रह, नक्षत्रों और एलियन से लड़ाई करता है।
                 सोचिए कैसी अजीबोगरीब मस्तक हमारे सामने है। अमेरिका जो विश्व में सबसे ज्यादा "Arms and ammunition" का उत्पादन करता है। अब इसे ऐसे समझें कि अमेरिका के पास हथियार इतनी ज्यादा मात्रा में है कि अब हथियार अमेरिका का एक 'Resource' है यानि किसी एक चीज का उत्पादन इतना हुआ कि वह रिसोर्स में तब्दील हो जाए। और चीज भी ऐसी है जिसका मूल यह कि ये चीज लोगों को मारने के काम में आता है। अब हथियार इतनी मात्रा में बना लिए गए कि फिल्में भी उसी कायाकल्प में बनती है।
              एक ऐसा राष्ट्र जहां हथियार और आर्मी का माहौल वहां की हवा में मूलतः विद्यमान है तो वहां की फिल्मों में डंडे से लड़ने वाली लड़ाइयां तो नहीं दिखाई जा सकती, ये असंभव है। और उसी अमेरिका में ये सुनने मिल जाता है कि वहां एक बीस साल का सिरफिरा लड़का स्कूल में घुसकर तीस चालीस बच्चों को गोली मार दिया। हां ये अमेरिका जैसे विकसित देश में ही हो सकता है।
                चाहे वो John wick, taken जैसी फिल्म हो या James bond, fast and furious series हर फिल्म में वो दर्शकों की आंखों में धूल झोंक देता है। हां जी वो फिल्म इंडस्ट्री इतनी चालाक है जिसकी शायद आप और हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इतनी चतुराई से वो पूरी फिल्म की भूमिका बांधते हैं कि हम उनके काम को नजर अंदाज कर नहीं पाते, हम देखने को विवश हो जाते हैं। वो हर एक्शन फिल्म को पहले देश, पारिवारिक भावनाओं या रिश्तों से जोड़ता है फिर वहां खलल डालता है नायक के दिमाग में गुस्सा भर देता है और फिर खूब तांडव मचाता है, गोलियां बरसाता है, हिम्मत का परिचय देता है और हम उनके इस अभिनय के कायल हो जाते हैं। हमें मौत का यह प्रस्तुतीकरण खूब पसंद आता है।
                 Taken series के अभिनेता लियाम नीसन को अपने फिल्म की बंदूकबाजी को लेकर जब वाहवाही मिलनी शुरू हुई तो शायद इन सब से वे खुश नहीं थे। उन्होंने एक बार मीडिया प्रेस कांफ्रेस में यूएस गन ला को कलंक तक कह डाला। उसके बाद taken फिल्म में बंदूक मुहैया कराने वाली अमेरिकी कंपनी ने नीसन को सब तरफ से बैन करवा दिया कि इन्हें यूएस और हालीवुड की कोई भी अथारिटी अपने हथियार या गैजेट नहीं देगी। सनद रहे कि नीसन ने आगे चलकर मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल में भी काम किया है। नीसन का पश्चाताप कुछ ऐसा ही था जैसा वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल का था। अल्फ्रेड नोबेल को डायनामाइट के आविष्कार के बाद जो उपाधियां मिलने लगी, उससे उनकी भी आत्मा जवाब देने लगी। जीवन के अंतिम समय में वे इन उपाधियों से खुद को अलग करने के लिए जूझते दिखे और आखिरकार उन्होंने नोबेल पुरुस्कार देने की परंपरा इजात की और आज दुनियाभर में अधिकांशतः उन्हें इसी वजह से याद किया जाता है।
               आप सोच रहे होंगे कि यहां सिर्फ अमेरिका को बोला जा रहा है। नहीं ऐसा नहीं है रूस, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे और भी कुछ विकसित देश हैं जो सभ्यता के इस वीभत्स रूप का पोषण कर रहे हैं।हमारे भारत में भी तो मुंबई अंडरवर्ल्ड को लेकर बहुत सी फिल्में बन जाती है। लेकिन अमेरिका इस मामले में सबसे आगे है। चूंकि अमेरिका द्वारा किए जा रहे अत्याचार और दुष्प्रचार के सामने ये बाकी देश छोटे पड़ जाते हैं इसलिए इस एक देश को ही केन्द्र में रखकर बात कही गई है। और आखिर में ये कहना गलत न होगा कि तमाम खूबियों, समृध्दि के उच्च मानदंडो के बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे असभ्य देश है।
              

Thursday, 15 December 2016

~ Three Colours ~

Three colours एक फिल्म है। वैसे एक नहीं तीन फिल्मों का समुच्चय है जिसे "Three colours trilogy" कहा गया।1993 में निर्मित ये फिल्में खास इसलिए है क्योंकि ये नीले, लाल और सफेद इन तीन रंगों पर ही बनी है।
फिल्मों का नाम भी यही है-
Three colours : Blue
Three colours : Red
Three colours : White

ये तीन रंग ही क्यों?
वो इसलिए कि ये तीन रंग या यूं कहें कि ये तीन बीज फ्रांसिसी क्रांति से निकले हैं। जहां नीला रंग स्वतंत्रता(Liberty) का प्रतीक है, लाल रंग बंधुत्व(Fraternity) का और सफेद रंग समानता(Equality) का प्रतीक है।
फ्रांसिसी क्रांति(French Revolution) के बारे में जानना सिर्फ उनके लिए जरूरी नहीं है जो बी.ए. कर रहे हैं या जो यूपीएससी, पीसीएस, बैंकिंग की तैयारी कर रहे हैं। ये उन सब के लिए है जो अपनी जिंदगी संवारना चाहते है, यहां जिंदगी संवारने के मायने सबके अपने अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन ऐसा महसूस होता है कि इस क्रांति से निकले भाव को जानना, इस फल के स्वाद को ग्रहण करना शायद सबके लिए जरूरी है।ठीक उसी तरह जैसे सबका अपना एक बंधा बंधाया अधिकार है कि भई मैं ये काम आजादी से कर सकता हूं, ये बात मैं लोगों के सामने रख सकता हूं, अपने मन मुताबिक कहीं आना-जाना कर सकता हूं, घूम सकता हूं, कमा सकता हूं, अपने हिसाब से कुछ खरीदी-बिक्री कर सकता हूं , शौक पूरे कर सकता हूं। साफ खान-पान, अच्छे शांत इलाके में घर, एक अच्छी नौकरी, तमाम ऐसे सपनों को एक सांचे में ढाल सकता हूं।
और न जाने ऐसी कितनी ख्वाहिशें जो सिर्फ और सिर्फ हमारी होती है। इन सबके लिए ये खुली हवा आखिर हमें कहां से मिली?
हां ये फ्रांसीसी क्रांति की देन है जिसने पुरानी हवा को साफ किया, नये हवा के लिए जगह बनायी, अधिकारों,मूल्यों को परिभाषित कर उनमें जान डाल दी, इसलिए फ्रांसीसी क्रांति बहुमूल्य है, कालजयी है।

आखिर फ्रांसिसी क्रांति इतनी खास क्यों है?
उसकी कुछ वजहें हैं एक ये कि ईसा मसीह के जन्म के बाद अब तक धरती में मानव-जाति ने जितने कदम उठाए हैं उनमें जो सबसे महत्व का काम हुआ तो वो फ्रांसिसी क्रांति थी..भले क्रांति अपूर्ण रह गई लेकिन चीज तो ऊंची रही। इसने मानवता को पुनीत किया, बेड़ियों से जकड़े लोगों को राहत दी, सभी अनजाने सामाजिक मूल्यों को मुक्ति दी, उमंगों को मधुर बनाया, लोगों को शांत किया, मनाया, प्रबुद्ध बनाया और धरती पर एक सभ्यता का अवतरण कर लहरें उठा दी। कुल मिलाकर चीज बड़ी शानदार रही।

दूसरी महत्व की चीज क्या है ये आपको समझने के लिए पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी।
फिल्म में आपको ऐसा लगेगा कि डायरेक्टर ने मानो रंगों को जी लिया है। ऐसा गजब का Colour Rendition( रंगों की व्याख्या) कि कहीं कहीं लगता है कि अभिनयकर्ता को यहां कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है, ये रंग इतनी बातें कर रहे हैं कि शब्दों की कमी पूरी हो गई है।
जैसे कि फिल्म three colours : blue है। उसमें कोई व्यक्ति सड़क किनारे चलते हुए जा रहा है उसी वक्त एक नीले रंग की कार उसके पास से गुजर रही है, और तो और आसमान और वातावरण में एक नीले रंग का प्रकाश बिखरा हुआ है, आफिस में फाइल सामने रखा जा रहा वो भी नीला। फिल्म देखते हुए आप महसूस करेंगे कि लोगों के पहनावे में नीले रंग का कपड़ा चाहे वो उनका कालर हो या जैकेट वो बाकी रंगों से कुछ हटकर नोटिस हो जाता है। आधी रात में खिड़कियों से चमकती नीली रोशनी, जो चेहरे पर पड़ते ही एक नीलाभ प्रतिछाया के रूप में दिखाई देती है और इन सब परिदृश्यों के बीच पिरोया गया है इस नीले रंग के अर्थ को यानि 'स्वतंत्रता', एक अर्थ जो इस रंग के माध्यम से और अधिक गौरवान्वित हो जाता है, अपने मूल को पा लेता है।
              शेष दो फिल्में Red और White में भी ठीक ऐसा ही सिनेमा दिखाया गया है, जैसा Blue में है। एक सिनेमा जो हमें बांधे रखता है और जो कई बार हमारे  धैर्य की परीक्षा भी ले लेता है, जब कैमरे की आंख कुछ सेकेंड के लिए एक ही जगह रूक जाती है, जो शायद हमसे एक आग्रह कर रही होती है कि हम इस थोड़े से समय में दर्शित भाव प्रवणता को समझें, विचार करें।
तीनों फिल्मों में तीन अलग-अलग कहानियां हैं जिसके माध्यम से डायरेक्टर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अर्थ को लोगों के सामने रखा है।



Three colours : blue



 Three colours : White


Three colours : Red
 

Friday, 18 November 2016

Dekalog-1

पावेल दस साल के हैं,उनके पापा एक प्रोग्रामर हैं..पावेल की माता गुजर चुकी हैं..पावेल अपने पापा के साथ ही रहते हैं।पावेल की चहेती उसकी एरिना मासी है।जो आये रोज पावेल से मिलते रहती हैं।
एक दिन पावेल और उसके पिता सुबह नाश्ते की टेबल में बैठे रहते हैं..पावेल नाश्ता कर रहे होते हैं और उसके पिता पेपर पढ़ रहे होते हैं..
पावेल पेपर को इधर-उधर से झांकते हैं और पापा को पूछते हैं..
पावेल- पापा दूसरे देश के लोगों की मौत की खबर भी छपती है क्या?
पापा- हां कभी-कभी।
पावेल- लोग मरते क्यों है?
पापा- ह्रदयगति रूक जाने से,कैंसर से, कभी किसी दुर्घटना से।
पावेल- मेरा मतलब मौत क्या है?
पापा- खून पंप होना बंद हो जाता है तो सिर तक नहीं पहुंच पाता, सब कुछ रूक जाता है..खत्म हो जाता है और मृत्यु हो जाती है।
पावेल- फिर बचता क्या है?
पापा- जो भी हमने जीते जी किया है। एक इंसान के रूप में वो सारी याद जो हमने लोगों को दी है।
पावेल गहरी सोच से घिरे हुए दिखते हैं तो फिर उसके पापा कहते हैं-
पावेल,ये सब अभी ठीक नहीं, अभी इसे रहने देते हैं।
पावेल कुछ देर के लिए चुप हो जाते हैं और फिर कहते हैं- किसी के मरने के बाद लोग शोक यात्राएं करते हैं, आत्मा के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन आपने आत्मा के बारे में कुछ नहीं बताया।
पापा- वो बस एक विदाई समारोह होता है..आत्मा नाम की कोई चीज नहीं।
पावेल- एरिना मासी कहती हैं कि आत्मा होती है।
पापा- हां कुछ लोग इस एक बात पर भरोसा करते हैं, ऐसा करने से जिंदगी आसान हो जाती है।
पावेल- आप करते हैं भरोसा?
पापा- मुझे सच में नहीं पता।
पावेल तुम क्या सोच रहे हो?
क्या कोई बात हुई है?
पावेल पापा की ये बात सुनकर रोने लगते हैं, आहें भरते हुए कहते हैं- मैं आज सुबह बहुत खुश था..जब वो गणित मैंने सही सही बनाया।फिर जब मैं शापिंग के लिए बाहर गया तो मैंने वहां एक कुत्ते को मरा हुआ पाया। मैंने खुद से पूछा- इसमें क्या अच्छा हुआ..इसके मरने की जानकारी क्या किसी को चाहिए?
इसको दफनाने में कितना समय लगेगा?
क्या इन सब बातों का कोई मतलब है?
पावेल फिर कहते हैं कि वो कुत्ता किसी अच्छी जगह पर होगा ना?


एक दिन एरिना मासी पावेल से मिलने आती है..वो पावेल के लिए एक गुरू की तस्वीरें लेकर आती हैं।
पावेल तस्वीरों को देखकर कहते हैं - क्या ये दयालु हैं?
मासी -हां।
पावेल- और क्या बुध्दिमान भी हैं?
मासी - हां।
पावेल- क्या उनको पता है कि लोग किसलिए जीते हैं?
मासी - शायद हां।
पावेल- मासी! पापा मुझे कह रहे थे कि हम इसलिए जीते हैं कि हम अपनी जिंदगी आसान बना सकें..और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए भी इसे आसान बना सकें। पर हम कई बार सफल नहीं हो पाते।
मासी- हां उन्होंने सही कहा है। हम कई बार सफल नहीं हो पाते, पर जिंदगी का मकसद ये है कि हमने दूसरों की कितनी मदद की। अगर हम किसी की सहायता करते हैं चाहे वो छोटी हो या बड़ी, हमें महसूस होता है कि उन्हें हमारी जरूरत है और फिर हमारी जिंदगी आसान हो जाती है।
जैसे तुम्हें आज मैंने ये तस्वीरें दिखाई और तुम्हें खुशी हुई।
ये बात सुनके पावेल धीमी सी मुस्कान फेर लेते हैं, एक असीम आनंद से भर जाते हैं।
मासी आगे कहती है - ये जिंदगी एक तोहफा है।
पावेल - मासी लेकिन पापा लेकिन बहुत अलग सोचते हैं।
मासी - तुम्हारे पापा एक तर्कपूर्ण जिंदगी जीते हैं..उनको भी कभी शंकाएँ होती हैं..लेकिन वे मानने को तैयार नहीं होते।
पावेल यह सुनकर फिर मुस्कुराने लगते हैं,
मासी आगे कहती है-तुम्हारी पापा की जिंदगी अपने जगह सही है लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भगवान नहीं है।
समझ आया?
पावेल- पता नहीं, मुझे समझ नहीं आया?
मासी- बेटा भगवान है। ये बहुत ही आसान है अगर तुम विश्वास करना चाहो तो।
पावेल- आप भगवान पर विश्वास करती हैं?
मासी- हां।
पावेल(निराशा के भाव से) - कौन हैं वो?
मासी आगे आती है और पावेल को गले से लगा लेती है।
और कहती है- कुछ महसूस हुआ।
पावेल- हां,
मासी- हां यही तो भगवान है।

Thursday, 20 October 2016

~ Les Miserables by Victor Hugo ~

एक ऐसा उपन्यास जिसमें छिपा है फ्रांसिसी क्रांति के समय का फ्रांस और जिसे उन्नीसवीं सदी में सबसे ज्यादा ख्याति मिली।
आज से लगभग 150 साल पहले ये नावेल आई थी, लेकिन आज भी इस नावेल पर फिल्में बन रही है, अब तक लगभग 13 फिल्में बन चुकी हैं।
उपन्यासकार विक्टर ह्यूगो को इस नावेल को लिखने में लगभग 17 साल लगे..1845 में उन्होंने लिखना शुरू किया..और 1862 में उनकी ये नावेल प्रकाशित हुई।उस समय प्रचलित लगभग सभी भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया।

मैंने कुछ महीने पहले जब ये नावेल पढ़ा था तो ऐसा लगा कि मैं किसी दूसरी दुनिया में हूं, इस नावेल का 2350 पेज का इंग्लिश वर्जन जो मेरे फोन में पीडीएफ में था...मैंने 3 दिन में खत्म कर दिया।
सच कहता हूं मैंने इससे पहले कभी किसी किताब को इतनी शिद्दत से नहीं पढ़ा है।
आप यकीन नहीं करेंगे, मैं कुछ दिन तो ढंग से सो भी नहीं पाया..एक अलग ही स्टेट आफ माइंड, मेरी हालत तो ठीक कुछ वैसी थी जैसी हिमाचल के कौलंतक पीठ के कौलाचारी लोगों की होती है, कहा जाता है कि वे दो-दो दिन तक लगातार ध्यान में लीन रहते हैं।

अब मैं आपको नावेल के बारे में कुछ बताता हूं जो आपको हिन्दी में कहीं और शायद ही मिले।
नावेल पर सबसे पहली फिल्म 1908 में बनकर आई, उसके बाद से इस नावेल की विषयवस्तु पर फिल्में बनती गई। मेरी नजर में तो ये एक ऐसा बेजोड़ नावेल है जो सबके पढ़ने लायक चीज है। अच्छा इस पर एक फिल्म बनी है 1957 में और एक दूसरी 1978 में, ये दोनों फिल्में यूट्यूब में है।अभी हाल ही में 2012 में इस पर जो फिल्म बनी है वो तो आपको आसानी से मिल जायेगी। लेकिन बात वही है मैंने जब पूरी नावेल पढ़ने के बाद इन फिल्मों को देखा तो ऐसा लगा कि शहद पहले पी लिया हो और अब शक्कर का स्वाद लेने बैठा हूं।

1862 में जब ये नावेल प्रकाशित हुई थी तो पहले ही दिन इसकी 48000 कापियां बिक गई, लोग घंटों तक लाइन में लगे रहते, इस किताब की वजह से आए दिन ट्रैफिक जाम होता।किताब के कापीराइट एवं किताब बेचने को लेकर दुकानदारों के बीच मारपीट,झगड़े होना आम बात हो गई थी।
इस उपन्यास को "सामाजिक अन्याय का महाकाव्य" कहा गया।
उन्नीसवीं सदी में किसी और नावेल ने इतनी प्रसिद्धि नहीं पाई, संपूर्ण यूरोप में इस किताब ने धूम मचा दी।अमेरिका में जब ये नावेल पहुंची उस समय वहां गृहयुद्ध चल रहा था।
अमेरिका में इस नावेल के प्रभाव का अंदाजा आप इस घटना से लगाइएगा..युध्द में जब सैनिक बंदूक लेकर जाते तो हमेशा अपने साथ ये किताब लेकर जाते..कैंपों में या खाली समय में कोई एक सैनिक अपनी टोली के सभी सैनिकों को इस नावेल को सुनाता और सेना का मनोबल बढ़ाता।
अमेरिकी सैनिक एक दूसरे को lee miserables नाम से संबोधित करते।

"Les Miserables" यानी "विपदा के मारे"।
विक्टर ह्यूगो ने नावेल के बारे में कहा - मुझे नहीं पता कि इस नावेल को कितने लोग पढ़ेगें, लेकिन मैं ये कहना चाहता हूं कि ये नावेल सबके लिए है।
ह्यूगो ने प्रकाशकों से गुजारिश करी कि इस नावेल की सस्ती कापियां निकाली जाए ताकि ये जन-जन तक पहुंचे। जब नावेल छप गई तो ह्यूगो ने अपने प्रकाशक को एक सांकेतिक तार भेजा जिसमें उन्होंने एक (?) लिखा था..जवाब में प्रकाशक ने उसी अंदाज में (!) भेजा।
अब आप समझ सकते हैं कि हालात कैसे होंगे।
नावेल की प्रसिद्धि तो हुई साथ ही इसका दूसरा पहलू ये भी था कि इस नावेल को लेकर नेशनल एसेंबली में बहस होने लगी, नावेल पर कैथोलिक चर्च ने 240 बार आक्रमण किया।
वेटिकन के कंसर्वेटिव लोग इस नावेल के सामाजिक प्रभाव को भलीभांति समझ चुके थे, फ्रांस में वर्षों तक इस नावेल पर बैन लगा दिया गया।उस समय के फ्रेंच न्यूजपेपर "the constitutional" ने अपने अखबार में लिखा - अगर इस नावेल की बातें अमल हो गई तो कोई भी सामाजिक ढांचा अस्तित्व में नहीं रहेगा।

इस नावेल का हिन्दी में प्रकाशन भी हो चुका है।
अभी कुछ दिन पहले जब इस नावेल का हिन्दी अनुवाद किताब के रूप में मेरे हाथों लगा है तो महसूस हुआ कि इसके बारे में आपको बताना चाहिए।
हिन्दी में ये किताब दो भागों में प्रकाशित हुई है।



पहला भाग जिन्होंने लिखा है वो हैं गोपीकृष्ण गोपेश जो आज इस दुनिया में नहीं हैं..उन्होंने लगभग 60% अनुवाद कर लिया था जो कि इस नावेल के पहले भाग के रूप में है।
जीवन के अंतिम दिनों में वे अपनी बेटी से, अपने परिजनों से कहते..बस दो साल और मिल जाते..लेकिन कोई उनके मर्म को समझ नहीं पाता कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं बाद में जब उनके कमरे की चीजों को उनकी बेटी ने देखा तो उनको इस किताब का ये अधूरा अनुवाद मिला..उन्होंने फिर इसे प्रकाशित कराया साथ ही इसके बचे हुए भाग के लिए प्रोफेसर लाल बहादुर वर्मा को कहा..उन्होंने इस शेष बचे भाग का अनुवाद किया है।
हिन्दी में इसका यह पहला संपूर्ण अनुवाद है।

विक्टर ह्यूगो की जब मृत्यु हुई तो उस समय उनकी शवयात्रा में लगभग तीस लाख लोग शरीक हुए।कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी में पूरे विश्व में कहीं किसी और व्यक्ति के लिए इतनी भीड़ इकट्ठी नहीं हुई।

ये एक बच्ची की पेंटिंग है। इस पेंटिंग के पीछे विक्टर ह्यूगो का एक पूरा का पूरा illustration है।जब भी इस किताब का जिक्र हुआ इस पेंटिंग का भी जिक्र होता, पेंटिंग को इस किताब के लोगो के रूप में हमेशा जगह मिलती।
और तो और ये पेंटिंग उन्नीसवीं सदी की सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग में से एक थी और हो भी क्यों न, विक्टर ह्यूगो का दृष्टान्त जो इसमें समाया था।