Monday, 15 June 2026

Chhattisgarh what I have seen


सन् 2000 में उत्तराखंड और झारखंड के साथ इस राज्य की नींव रखी गई थी। इन तीनों राज्यों के बनने में सबसे बड़ा कारक प्रशासनिक सहूलियत थी। राज्य बनने का कोई बहुत बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक आधार इन राज्यों के पास कभी नहीं रहा, जिस तरह से तेलंगाना के पास था। अलग भाषा, अलग संस्कृति, अलग भाषाई लिपि-व्याकरण इन सब की मजबूती नहीं रही। ये तत्व किसी भी राज्य के लंबे अस्तित्व के लिए, उसकी आंचलिकता बनाये रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं। यह सब आधार ना होने के बावजूद इन राज्यों को राज्य बनने का सौभाग्य पहले मिल गया। उत्तराखंड को तो एक तरह से सवर्ण राज्य बना दिया गया, कालांतर में उसके दुष्प्रभाव खुलकर देखने को भी मिले, जमकर पलायन हुआ। झारखंड और छत्तीसगढ़ की कहानी लगभग एक ही रही। दोनों जगह प्रशासनिक कारण ही रहे, इनकी अपनी कोई ख़ास ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहचान नहीं रही, भोजन खानपान और स्थानीय भाषा का ऐसा कोई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला नैसर्गिक तत्व नहीं रहा, संस्कृति के नाम पर जो भी बनाया गया उसके पीछे जबरन थोपने वाली संस्कृति हावी रही। 


यहाँ से हम सिर्फ़ अकेले छत्तीसगढ़ राज्य को देखें तो छत्तीसगढ़ी को राजभाषा कहा गया जबकि भाषा की न्यूनतम शर्त भी यह पूरी नहीं करती जो कि व्याकरण है। मूल रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा कम और बोली अधिक रहा, जिसे उधार में लिपि की आवश्यकता होती है, देवनागरी लिपि में ही संधि समास और पूरा व्याकरण बना दिया गया, देवनागरी में ही लिखा जाने लगा, इसी में ही भाषा की खानापूर्ति कर दी गई। संस्कृति के नाम पर राष्ट्रीय मंच पर दिखाने के लिए स्टेपनी की तरह आदिवासी संस्कृति को आगे कर दिया गया। यहीं से असल समस्या शुरू होती है। ऐसे राज्यों के साथ हमेशा पहचान का संकट होता है। ऐसे ही राज्यों को दूसरे राज्यों में पूछा जाता है कि यह राज्य कहाँ पड़ता है, झारखंड में है क्या? यह सवाल बहुत लाजिमी है। ऐसे राज्यों का कोई मुख्य भोजन नहीं होता है, अगर स्थानीय भोजन होता भी है तो वह उस तरह से जगह नहीं बना पाता, ऐसा तभी होता है जब आपके पास भाषाई और सांस्कृतिक आधार नहीं होता है। फिर आपके राज्य में इंदौर के पोहे बेचे जाते हैं, अमृतसर के छोले कुलछे बेचे जाते हैं, हरियाणा की जलेबी बेची जाती है, यूपी का चाट और दाल पकवान बेचा जाता है, साउथ इंडियन खाने की चैन तैयार होती है, लेकिन स्थानीय जैसा कुछ होता ही नहीं है। हाँ, दिखावे के लिए एक दो सरकारी खोमचे बना दिए जाते हैं जहाँ स्थानीय भोजन की खेप मिल जाती है। 


जब आपके पास अपना ख़ुद का भाषाई और सांस्कृतिक आधार नहीं होता है, ऐसी स्थिति में ब्रिटिश संविधान विशेषज्ञ आइवर जेनिंग्स की भाषा में उधार लिए गए दस्तावेजों का संग्रह की तर्ज में सब कुछ उधार में ही चलता है। चाहे वह भाषाई आदान-प्रदान हो, या भोजन के तरीके हों। सब कुछ उधार वाला वाला ही हावी होता है। ऐसे राज्यों में ही स्थानीय भोजन को लेकर दिखावे से जड़ित आयोजन किए जाते हैं। उत्तराखंड में मड़ुवे की रोटी का शासकीय प्रचार होता है, इसी तरह झारखंड में धुसका और छत्तीसगढ़ में बोरे बासी अंगकार रोटी को महिमामंडित करने का यत्न किया जाता है। कभी आपने नहीं सुना होगा कि ओडिशा की सरकार आलू दम दही वड़ा का प्रचार कर रही हो, बंगाल सरकार छेने की मिठाई का प्रचार कर रही हो, आंध्र वाले इडली डोसा के लिए महोत्सव कर रहे हों, उनकी अपनी सार्वभौमिक स्वतः स्फूर्त पहचान है, उनको उस पहचान को बताने के लिए किसी विशेष आयोजन की आवश्यकता ही नहीं है, क्यूंकि यह उनकी सभ्यता का हिस्सा है, यह सभ्यता तैयार होती है अपनी ख़ुद की पुरातन लिपि से, संस्कृति से, इतिहास से। यह सभ्यता ऐसे नवीन राज्यों के पास नहीं होती है। 


ख़ुद की अपनी संस्कृति सभ्यता ना होने के अनेक दुष्प्रभाव बतौर राज्य साफ़ दिखाई पड़ता है। ऐसे राज्यों में प्रशासनिक ढाँचा आम लोगों पर बहुत हावी होता है, विरोध का स्तर न्यून होता है, सरकार पर नैतिक दबाव ना के बराबर होता है। ऐसी स्थिति में प्रशासन और आम जन के बीच एक दूरी सहज ही दिखती है। जैसे उदाहरण के लिए आम जन अपनी छत्तीसगढ़ बोली में बात करेगा लेकिन यहाँ केंद्र से यहाँ बैठाया गया अफ़सर हिंदी में ही बात करेगा तो एक आत्मिक जुड़ाव होता ही नहीं है। ऐसे राज्यों में बाहरी हिंदी पट्टी के राज्यों का स्वतः ही कब्जा हो जाता है। प्रशासनिक आधार पर देखें तो छत्तीसगढ़ में तो अवसर देख कर बड़ी संख्या में पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार के लोगों ने अपना सिक्का पहले ही जमा लिया। व्यापार वाले एंगल में भी ये हावी रहे। अखिल भारतीय सेवाओं में तो यहाँ हिंदी पट्टी का खासकर हरियाणा दिल्ली यूपी का कैडर हावी रहा है। उसमें भी बनिया और सवर्ण लोगों से पूरे प्रशासनिक ढांचे को भर दिया गया। उन्हीं की बल्ले-बल्ले है। धीरे से कुछ स्थानीय और दक्षिण के लोग आ रहे हैं लेकिन उनकी उपस्थिति/वजूद और उनका हस्तक्षेप ना के बराबर है। 


इन सब सांस्कृतिक सामाजिक पहलुओं को किनारे कर बतौर राज्य छत्तीसगढ़ को फ़ौरी तौर पर देखने से यही लगता है कि अपने पड़ोस के राज्यों ( ओडिशा, झारखंड ) से बेहतर ही कर रहा है। लेकिन गहराई में चीज़ों को देखता हूँ तो इस राज्य का मूल निवासी होने के नाते निराशा से मन दुखी हो जाता है। 


छत्तीसगढ़ के पास प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संपदा है। सरिया का दाम पूरे देश के लिए यहाँ से नियंत्रित होता है। स्टील सीमेंट का भी बहुत सा खेल यहाँ से होता है। बस्तर से खनिज निकालने के लिए रावघाट परियोजना के तहत रेल पहुँचा दी गई है। गोंडवानालैंड का हिस्सा होने की वजह से कोयले की नेमत बरसी है तो बिजली का सरप्लस प्रोडक्शन है ही। अकूत पैसा है। वास्तव में देखा जाए तो झारखंड, ओडिशा और आंध्रप्रदेश से भी कहीं ज़्यादा पैसा यहाँ है लेकिन फिर भी यहाँ एक अजीब तरह की लूट का कल्चर हावी है। शॉपिंग मॉल को छोड़ दें तो कहीं भी आपको तमीज की क्वालिटी नहीं दिखेगी, शॉपिंग मॉल की क्वालिटी के पीछे यहाँ की अपनी बाजारू मानसिकता कारण है, यहाँ के स्थानीय लोगों की दिखावे और बाजारू मानसिकता झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों से कहीं अधिक है। इसलिए यहाँ इन राज्यों से कहीं पहले सबसे पहले बड़े-बड़े मॉल खुले और वे चले भी। शहरों का अपना इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत ख़राब, टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर तो एकदम ही निचले स्तर का। हर जगह लूट कल्चर हावी। आम लोगों को न्यूनतम स्तर की सुविधा भी देने की नहीं सोचते हैं। आप राज्य की राजधानी को ही देख लीजिए और बाक़ी राज्यों की राजधानी से तुलना करिए। इसमें भुवनेश्वर को तो छोड़ ही दीजिए, रांची की सड़कें रायपुर से कहीं बेहतर और साफ़ सुथरी है। सड़कों को साफ़ करने के लिए सफ़ाई मशीन वाली ट्रक बराबर चलती है। अपशिष्ट प्रबंधन भी काफ़ी बेहतर है। अलग से एक लेवल महसूस होता है। 


यहाँ प्रशासनिक ढाँचा हमेशा से सरकारों पर हावी ही रहा। लंबे समय तक भाजपा का शासन रहा तो यह लाज़मी है, भाजपा जहाँ रहती है वहाँ अधिकारी तंत्र और लूट तंत्र तुलनात्मक रूप से अधिक हावी हो जाता है। इन सब कारणों की वजह से कभी भी लोककल्याण वाली चीज़ों को ध्यान में नहीं रखा गया। टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी वाली चीज़ को तो इन्होंने ऐसा बर्बाद किया कि पूछिए ही मत। आप कहीं भी जाइए, आप बस्तर जाइए, आपको तमीज के होटल नहीं मिलेंगे, मिलेंगे तो जबरन महंगे, खान-पान का वैसा व्यवस्थित कल्चर नहीं मिलेगा, जैसा होना चाहिए। पर्यटन स्थलों में भी जितनी सुविधा होनी चाहिए, वैसी नहीं है, दूसरे राज्यों से तुलना करने पर लगता ही नहीं है कि गुणवत्ता वाला काम हुआ है, पैसा लगा है। साफ़ समझ आ जाता है कि एकदम चलताऊ और निचले स्तर का काम हुआ है। यह लूट की संस्कृति तभी पल्लवित होती है जब आपके पास एक सांस्कृतिक आधार नहीं होता है, आपके पास भाषाई मजबूती नहीं होती है, और जब यह नहीं होता है तो लोग एकजुट नहीं हो पाते हैं, सामूहिकता में चीज़ों को नहीं देख पाते हैं और प्रशासन को भी कभी संगठित विरोध नहीं देखना पड़ता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य असल में पड़ोसी सांस्कृतिक सामाजिक ऐतिहासिक आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों के लिए एक तरह से लूट मशीन की तरह होते हैं, ऐसे राज्यों को केवल अपनी जरूरत के मुताबिक़ लूटा जाता है, और दिखावे के लिए उनके लिए थोड़ी बहुत सुविधाएं तैयार कर दी जाती है, और फिर ऐसी स्थिति में अधिसंख्य आबादी के पास बाजारू और दिखावेबाज़ बनने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। 

Sunday, 17 May 2026

हाशिये पर खड़ी भारत की विदेश नीति 

कुछ दिन पहले रशियन डिप्लोमेट Sergey Lavrov ने दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस किया। उसी बीच शायद किसी पत्रकार का बार-बार फ़ोन बज रहा था, उसने इस दौरान सीधे उसे बाहर जाने कह दिया, उसके बाद उसने फ़ोन जमा करने के लिए भी कहा और धमकी भी दे दी कि अगर आप जमा नहीं करेंगे तो मेरे सुरक्षा कर्मियों को बंदूक निकालने के लिए विवश होना पड़ेगा। इस प्रतिक्रिया पर भी पत्रकारों ने खी खी करके अपनी इति श्री किया जो कि बेहद शर्मनाक था, अनप्रोफेशनल था। 


पहली नज़र में ऊपरी तौर पर इस घटनाक्रम को देखें तो बतौर भारतीय यह हमारे लिए कितने शर्म की बात है कि एक प्रेस कांफ्रेंस का जो अनुशासन होता है उसका भी हम पालन नहीं कर पाते हैं और अंततः कुछ इस तरह हमें अपने ही देश में कोई बाहरी विदेश मंत्री आकर जलील कर देता है और हमारा स्तर बता देता है। 


दूसरा एक एंगल ये कि एक बाहरी डिप्लोमेट हमारी ही धरती पर ऐसा बोलने की हिम्मत कैसे कर जाता है। क्यूंकि हमने हमारी छवि इतनी ख़राब बनायी हुई है हमने अपनी हरकतों से। इसलिए बहुत हल्के में लेते हैं लोग हमें। लेकिन यह सब अचानक ऐसा कैसे हो गया। इसके लिए भी हमें थोड़ा इतिहास में जाना होगा और गहराई से चीज़ों को समझना होगा। 


देश आज़ाद होने के बाद से तब के नीति नियंताओं ने इस विविधता से भरे देश के हर एक पहलू को गंभीरता से समझा और उसी विविधता को अपनी नीतियों में परिलक्षित किया। चाहे वो हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था हो या हमारी विदेश नीति। चाहे किसी भी विचार को मानने वाले लोग हों सबके लिए जगह बनी। इस बीच पिछले दशक भर में ऐसा क्या बदल गया कि हमारी वैश्विक छवि इतनी ख़राब हो गई। इसका कारण समझने के लिए हमारी विदेश नीति को समझना होगा। हमारे नीति निर्माताओं ने Soft Power Diplomacy को चुना, यानी हम पहले प्रतिक्रिया देने वाले या हमला करने वाले देश नहीं हैं लेकिन कोई अगर हमें छेड़ेगा तो हम किसी की नहीं सुनेंगे। यानी soft वाला तत्व भी रहा लेकिन power भी रहा। इन्हीं तत्वों की बदौलत पूर्वी देश से भी हमारे मैत्री संबंध रहे और पश्चिमी देशों से भी हमने मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया और यह सब लगातार वर्षों की मेहनत, मेल जोल व्यापार आदि से तैयार हुई पूंजी रही। हमने अमेरिका से भी व्यापार किया तो वहीं रूस और चीन से भी व्यापार जारी रहा, कभी हम अफ्रीकन देशों में निवेश करते रहे तो कभी अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में कॉलेज हमारे निवेश से बना। इसराइल के साथ भी ज़रूरत तक रिश्ता बना कर रखा और फिलिस्तीन के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध रहा। ईरान इराक़ युद्ध हुआ, फिर भी दोनों से हमारे मज़बूत कूटनीतिक संबंध बने रहे जिसकी बानगी आज भी देखने मिलती है। हमने कभी किसी देश की एकतरफ़ा पक्षधरता नहीं की, जी हुजूरी नहीं की, जहाँ कहीं ग़लत देखा, हमने उस ग़लत को ग़लत कहकर अपना कूटनीतिक पक्ष खुलकर रखा। ऐसी ही कुछ मैत्रीपूर्ण कूटनीतिक संबंधों से ये Soft Power Diplomacy तैयार हुई। इसी सब से एक भारत देश की छवि बनी। जिसने भारतीयों को दुनिया के हर कोने में चाहे वो व्यापार पढ़ाई रोजगार कुछ भी हो, हर जगह स्थापित होने के लिए जगह बना दी, भारतीयों के लिए दुनिया के हर देश ने अपने दरवाजे खोल दिए, तब जाकर इतना बड़ा हमारा diaspora बना। आज दुनिया का सबसे बड़ा diaspora हमारा ही है। 


लेकिन अभी हाल के वर्षों में क्या हुआ है। जो हमारी विदेश नीति जिसे Soft Power कहा जाता, उसमें अब Power शब्द की महत्ता शायद ख़त्म हो गई है। अब उस विदेश नीति में बस Soft वाला तत्व रह गया है। और ऐसा तब होता है जब सत्ता देश हित को दरकिनार कर अपने व्यक्तिगत व्यावसायिक या अन्य हितों की प्रतिपूर्ति के लिए बड़े स्तर पर समझौते करती है। ऐसे समझौतों के होने से सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आपको फिर एकतरफा पक्षधर बनना होता है, आपको किसी एक देश की चरण वंदना करनी होती है। जैसा अभी हाल फिलहाल में हमारे देश ने किया है। पूरी दुनिया में हमारी इज्जत उतारी जा रही है। चाहे वो ऑपरेशन सिंदूर में ट्रम्प द्वारा नीचा दिखाना हो या हमारे द्वारा इजराइल को पितृदेश कहना हो। ऐसे और बहुत से उदाहरण हैं। इन सब के भयानक दुष्परिणाम बतौर भारतीय हमें देखने को मिल रहे हैं। और शायद आगे भी देखने को मिलेंगे। 


चलिए बतौर देश, लगभग हर देश की अपनी कुछ खामियाँ चुनौतियाँ होती हैं, हमारी भी हैं। लेकिन कोई हमें इतना कैसे कमजोर समझ लेता है कि हमारे ही देश में आकर हमें धमकी दे जाता है और हमें नीचा दिखा जाता है। वे यही सोचते हैं कि इनका तो कोई स्टैंड ही नहीं है, किसी भी दूसरे देश के आगे लोट जाते हैं, इनकी क्या औक़ात कि हम इनसे तमीज से बात करें। बस यही नज़रिया तैयार होता है और फिर ऐसे वाक़ये सामने आते हैं। बस तुलना करिए कि क्या भारत की जगह किसी दूसरे देश में, उदाहरण के लिए चाइना अमेरिका या वियतनाम ईरान; यहाँ किसी ने ऐसा किया होता तो क्या ये रूस के नेता उन्हें ऐसा लताड़ पाते, उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ती भले सामने वाले की गलती क्यों ना हो, प्यार से मना करते, ऐसे धमकी ना देते। 


ये सारा कुछ हमारी ख़राब वैश्विक छवि की वजह से हुआ है, और इस छवि को बुनने में इन नामुरादों ने पिछले दशक भर में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बहुत दुख होता है देश का ऐसा हाल होता देखकर। आजकल एशियाई देशों जिनकों हमने एक तरफ़ से छोटे भाई की तरह रखा, थाईलैंड इंडोनेशिया मलेशिया आदि वहाँ भी हमें दुत्कार दिया जाता है। कोई इंडियन टूरिस्ट वहाँ जाता है, उसके साथ वहाँ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, क्यूंकि एक कमजोर और ख़राब छवि जो बन चुकी है। बहुत से जगह से NRI की ऐसी वीडियो आती रहती जिसमें वे कुछ गलती करते तो उन्हें सजा दी जाती और यह कहकर एक नैरेटिव बनाया जाता कि ये भारतीय तो ऐसे ही हैं, इनका इलाज करना जरूरी है। ठीक है हमारी अपनी कुछ सामाजिक सांस्कृतिक गड़बड़ियां हैं, लेकिन पूरे देश की आबादी को ऐसा कहना कहीं से भी उचित नहीं है। इससे कई बार हमारी कोई गलती नहीं भी होगी तब भी हमसे रूखा व्यवहार हर जगह किया जाता है। और यह पूरी दुनिया में हो रहा है, एक ख़राब गंदे कमजोर देश का नैरेटिव हमारे लिए मजबूती से बनता जा रहा है जो कि बहुत दुखद है चिंताजनक है दुर्भाग्यपूर्ण है। 

Saturday, 2 May 2026

What is wrong with Indian marriages ?

भारत में शादी सिर्फ दो परिवारों की सहमति तक कभी सीमित नहीं होती है। बल्कि आपको पूरे समाज को लेकर चलना होता है। और हर कोई अलग-अलग तरीके से वही पुराने ढर्रे में ज्ञान देगा। खासकर एक हिंदू परिवार में अगर कोई अपने मन से कम खर्च में एक दिन में मंदिर में अच्छे से शादी करके सब कुछ निबटाना चाहे तो उसके पास ऐसा विकल्प ही नहीं है। पहला तो उसे ग़रीब कमजोर समझा जाता है, सामाजिक प्रतिष्ठा पर बात आती है। दूसरा यह माना जाता कि मंदिर में तो तलाकशुदा और समाज से बहिष्कृत लोग ही शादी करते हैं। एक और विकल्प कोर्ट वालों के लिए चार सौ बीसी का तमगा है ही। यह भी सोचने वाली बात है कि सर्वाधिक हिंदुओं में ही court marriage का विकल्प लोग क्यों चुनते हैं।

फिर एक बड़ा दिखावे वाला सामाजिक दबाव यह है कि एक ही शादी है, इकलौता बेटा/बेटी है। धूमधाम से शादी करेंगे। ये धूमधाम का कॉन्सेप्ट ही आज के समय में कितना फूहड़ कितना अजीब है। हमारी तो जीवनशैली ही धूमधाम वाली हो गई है, रोज़ बाहर खाना, पार्टी मोड में रहना, घूमना, शॉपिंग वाली जगहें जाना, तो उसमें और कितना धूम और धाम चाहिए हमें। अब इसमें भी तर्क ये कि उसने किया तो मुझे भी करना है, मेरी भी सामाजिक जिम्मेदारी है। अरे भाई किसको खुश करना है और खुश करना भी है तो उसी संस्थागत सढ़े हुए खर्चीले ढांचे में क्यों करना है। मुझे लगता है शादी को एक बहुत पर्सनल इवेंट की तरह होना चाहिए जिसमें बहुत करीबी सीमित लोग ही हों। लेकिन नहीं शादी में आपको तो एक बड़ी जनसंख्या का मैनेजमेंट दिखाना होता है। मानो कोई बहुत भारी भरकम युद्ध जितने जैसा काम हो, आपको दस लोग उसी पैटर्न के हिसाब से ज्ञान भी देते हैं कि हम ऐसे किए थे आप भी ये कर लेना।

इसमें आपको उन लोगों को भी लेकर चलना होगा जिनसे आप सालों साल कभी सीधे मुँह बात तक ना करते हों, उनके साथ औपचारिक रिश्ता भी ना हो, लेकिन शादी के दिन के इवेंट के लिए वह अपना भी खास बन जाता है। वह भी दिखावे के उस दिन के लिए खास बनने के ढोंग में शामिल हो जाता है। मैंने तेरा नमक खाया, तू भी मेरा नमक खा।

इतने खतरनाक तरीके से यह सिस्टम बना हुआ है कि आप इसके खिलाफ जा ही नहीं सकते, जैसे अब रिचार्ज में बाध्यता है कि डेटा साथ में मिलेगा ही। वरना फिर आप रिचार्ज ही मत करो या फिर इस दुश्चक्र से बचने के लिए देश ही छोड़ के आपको जाना होगा, आपके पास कोई दूसरा विकल्प ही नहीं है। ठीक उसी तरह आपको उसी खर्चीले और दिखावे वाले पैटर्न में ही शादी करना होगा, भले उसमें भसड़ दिखावे और औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं होगा, लेकिन करना वही है। आपको अमूमन हर जगह एक ही जैसा एहसास मिलता है, मानो आप कोई सिलेबस निपटा रहे हों, एक ऐसा reunion जिसमें बहुत से लोग इधर-उधर के मिलेंगे लेकिन कोई भावनात्मक जुड़ाव वाली चीज़ नहीं, मिल-जुल लिए और फोटो ले लिया और उसके बाद केवल खाना निपटा के भागने वाले मोड में आप होते हैं, आप वहाँ से कुछ नया कुछ बहुत अच्छा एहसास लेकर नहीं लौटते हैं। और अगर आप इस सढ़े हुए सिस्टम के खिलाफ जाएँगे तो आप देशद्रोही से भी बदतर हैं, आपको जीने का हक़ नहीं है। यहाँ सामाजिक स्वतंत्रता या सामाजिक स्वीकार्यता नाम की चीज़ ही नहीं है।

जब भी लगे कि भारत में लोकतंत्र सढ़ गया या ख़त्म हो रहा, तो रुककर पहले यह ध्यान देना चाहिए कि समाज पहले सढ़ रहा है ख़त्म हो रहा है और एक सढ़ा हुआ समाज सढ़े हुए लोकतंत्र का ही निर्माण करता है।

Saturday, 25 April 2026

American Protest No Kings 3.0 and Psycholgy of Dissent in India

अमेरिका के लोगों ने 28 मार्च को No Kings 3.0 थीम पर 80 लाख की संख्या में सड़कों में उतर कर ट्रम्प के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन किया है वह कई मायने में ऐतिहासिक है, पहला तो यही कि अमेरिका के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में किसी चुने हुए प्रतिनिधि के ख़िलाफ़ इतने लोग सड़कों पर उतरे हैं, आधिकारिक रूप से यह अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक बन गया है। दूसरा यह कि विरोध का स्तर ( जिसमें सभी 50 राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए गए और 3,300 से अधिक शहरों तथा कस्बों में फैले हुए थे ) ऐसा कि ट्रम्प को अमेरिका के लोग कुछ समझते ही नहीं, एक दिन के ही आंदोलन ने इतना ज़्यादा अप्रासंगिक बना दिया है उसे।

अमेरिका के सारे बड़े शहरों में लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर आए, इसमें हम भारतीयों के लिए एक बड़ी चीज़ ध्यान देने योग्य यह है कि हम भारतीयों ने पिछले दस सालों में वर्तमान सरकार से क्षुब्ध होकर जितने मीम पोस्टर बनाये होंगे उससे कहीं ज़्यादा अमेरिका वालों ने एक दिन में ही एक प्रोटेस्ट में कर दिखाया। कोई ट्रम्प के नाम का गद्दा फुलाकर लाया जिसके पिछाड़े में सब जूते मार रहे, कोई उसे निवृत्त होते दिखा रहा और स्वयं के मल को मुख से ग्रहण करते दिखा रहा, कोई ट्रम्प की मूर्ति बनाकर गुदाद्वार से आग निकाल रहा, कोई उसकी मूर्ति बनाकर लाठी डंडे बरसा रहा तो किसी ने ट्रम्प को नेतन्याहू का कुत्ता बना दिया, तो किसी ने उसके नाम का फूल हुआ गुब्बारा बनाकर आसमान पर छोड़ दिया तो किसी ने डंप ट्रम्प थीम पर इसको सैनिटाइज ही कर दिया है। किसी ने ट्रम्प और नेतन्याहू का संसर्ग करा दिया है तो किसी ने ट्रम्प और एपस्टीन का। बड़े कठोर सख्त और वीभत्स लहजे में जवाब दिया गया है लेकिन सब कुछ बड़े लोकतांत्रिक तरीके से चटकारे लेते हुए लोग कर गए हैं। और पंचलाइन तो ऐसे-ऐसे बन पड़े हैं कि उसे पढ़कर ट्रम्प तनाव में आत्महत्या ना कर ले। इतने अलग-अलग लेवल की क्रिएटिविटी के साथ शायद ही दुनिया के इतिहास में किसी को इतने बड़े स्तर पर घसीटा गया हो। मानो ट्रम्प की सारी साख एक दिन में ही मिट्टी में मिला दी हो।

यह इस आंदोलन ( No Kings 3.0 ) का तीसरा चरण था, इसके पहले जून 2025 में लगभग 50 लाख लोगों ने और अक्टूबर 2025 में 70 लाख लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। No Kings 3.0 पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों की तरह जो एक मुद्दे पर केंद्रित होते हैं वैसा नहीं था। बल्कि इस आंदोलन ने अमरीकियों के सभी जरूरी मुद्दों को एक पटल पर लाया, सबको एकमत किया। यह लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और सत्ता के दुरुपयोग का व्यापक सामूहिक प्रतिरोध था। और इस आंदोलन के पीछे की यह क्रिएटिविटी सिर्फ गुस्से की नहीं, बल्कि गहरी लोकतांत्रिक समझ की देन है। अमेरिकी नागरिक जानते हैं कि चुना हुआ प्रतिनिधि राजा नहीं होता है। वह जनता का सेवक होता है। और जब वह तानाशाही की राह पर चले, तो जनता उसे “NO Kings” कहकर जवाब देती है।

अब सवाल यह है—भारत में ऐसा आंदोलन संभव क्यों नहीं? पिछले दस बारह सालों में वर्तमान सरकार के खिलाफ जितने मीम्स, पोस्टर्स और व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स बने, उससे कहीं ज्यादा क्रिएटिविटी अमेरिकियों ने एक दिन में ही दिखा दी। लेकिन भारत में सड़कों पर लाखों-करोड़ों की भीड़ इकट्ठा करने, सभी मुद्दों को एक पटल पर लाने और इतनी व्यापक, इतनी रचनात्मक असहमति जताने की कल्पना भी मुश्किल है।

कारण गहरे हैं। भारत आज भी अनेकानेक जाने-अनजाने कारणों से गहरे सामंती समाज में जकड़ा हुआ है। लोकतंत्र यहां परिवार से लेकर देश तक कहीं पनप नहीं सका। हमारी मानसिकता अथॉरिटी बाउंड है। बचपन से हम माता-पिता, गुरु, नेता, सेलेब्रिटी और ईश्वर को सुपर हीरो मानकर बड़े होते हैं। किशोरावस्था में जब माता-पिता की पोल खुलती है कि वे भी आम इंसान हैं, तब मन तुरंत नए “बाप” की तलाश में जुट जाता है—नेता, गुरु, प्रेमी/प्रेमिका या ईश्वर।

इससे डर, भय और असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। हम शक्तिविहीन और विकल्पविहीन हो जाते हैं। मौका मिलते ही स्वार्थ साधने की कोशिश करते हैं। कहते कुछ और, करते कुछ और। बातचीत में गौतम बुद्ध भी हमारे ज्ञान के आगे शरमा जाएंगे, लेकिन जब एक्शन की बारी आती है तो कुंठित व्यक्तित्व सामने आ जाता है। ऐसे समाज से निकलकर नेता बनता है तो उससे लोकतंत्र और ईमानदारी की उम्मीद करना व्यर्थ है। वह वही दोगलापन दोहराएगा जो उसने सीखा है।

मुद्दों की समझ न होना, असहमति को देशद्रोह मानना और मैं ऊपर बाकी सब नीचे वाली मानसिकता, ये सब मिलकर भारत में बड़े पैमाने पर सामूहिक प्रतिरोध को नामुमकिन सा बना देते हैं। हम मीम बनाकर गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन सड़क पर उतरकर सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत कम ही दिखाते हैं।

अमेरिका का यह आंदोलन हमें आईना दिखाता है। वह बताता है कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं है बल्कि यह निरंतर सतर्कता, एकजुटता और रचनात्मक तरीके से असहमति जताने का नाम है। भारत अगर वाकई लोकतांत्रिक समाज बनना चाहता है तो हमें अपनी सामंती जड़ों को काटना होगा। मन को अथॉरिटी से मुक्त करना होगा। डर को हटाकर सवाल पूछने की संस्कृति विकसित करनी होगी।

No Kings 3.0 सिर्फ ट्रंप के खिलाफ नहीं था। यह किसी भी व्यक्ति के राजा बनने की हर कोशिश के खिलाफ था। भारत में लेकिन यह सपने जैसा ही लगता है। बदलाव की शुरुआत तब होगी जब हम अपनी असहमति को फ़ोन स्क्रीन से निकालकर सड़क तक ले आएंगे-बिना डरे, बिना स्वार्थ के, सिर्फ और सिर्फ लोकतंत्र के लिए।

Friday, 30 January 2026

सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव

जिन चीज़ों को हम पढ़ के महसूस करते थे, आज उसे महसूस करने के लिए वीडियो देखना जरूरी हो गया है, ऐसे में वीडियो हमें उस जगह को थोड़ा भी महसूस करा नहीं पाता है। इसके उलट वो हमें अलग ही तरह से बेचैन करता है। एक बर्फबारी होने पर पहाड़ों में पहुँचने वाली हज़ारों की भीड़, या एक वीडियो वायरल होने पर किसी स्थान विशेष में खाने पहुँचने वाले लोग हों। दोनों वहाँ लाइन में लगे होंगे, असुविधा में होंगे लेकिन एक अघोषित ट्रेंड के शिकार बने हैं तो फँसे रहते हैं, इंसानी समाज के व्यवहार में ऐसा बदलाव कभी इतिहास में नहीं दिखा है।

आप किसी स्थान विशेष के लिए कैसे भी वीडियो बना लीजिए, उसमें लिखने वाली चीज़ों जैसी स्थिरता नहीं आयेगी। वीडियो का अपना एक अलग stimulation होता है। उसके अपने अलग खतरे हैं, अगर वीडियो फोटो के मामले में एक संजीदगी एक सादगी नहीं बरती गई तो उसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। इसका उदाहरण इसी से समझें कि हिंसा रूपी चीज़ों को वीडियो फोटो में ब्लर किया जाता रहा है, क्यों किया जाता है ताकि आपकी सोच वहाँ उतने तक स्थिर ना हो जाए, आपका दिमाग़ी विचलन वहाँ उसे देखकर स्थिर ना हो। आप किसी की फोटो वीडियो लेकर उसका पूरा जीवन तबाह करने की क्षमता रखते हैं। लंबे समय तक तंग करते हैं और उसमें सोशल मीडिया का तड़का लग गया तो सोने पे सुहागा। मानो आपके हाथ मशीन गन ही लग गया हो। अमेरिकी लेखिका susan ने कैमरे को बन्दूक से भी ज़्यादा ख़तरनाक ऐसे ही नहीं कहा था। पिछले कुछ एक साल में सोशल मीडिया माध्यमों से ये पागलपन बहुत ज़्यादा बढ़ा है। हर किसी को वीडियो रील देखकर केदारनाथ मनाली जाना है, क्यों जाना है उन्हें ख़ुद नहीं मालूम। ठीक कुछ ऐसा ही किसी रेस्तरां या किसी शॉपिंग वाली जगह के साथ भी है। हम किसके माध्यम से संचालित हो रहे हैं हमें ख़ुद इसका भान नहीं। पिछले कुछ वर्षों में जो लोगों के भीतर ये बेचैनी आई है, ये शोर आया है, इसके पीछे बहुत बड़ा योगदान सोशल मीडिया का है। सरकार या पार्टी ख़ुद इससे अछूती नहीं है। ख़ुद सोशल मीडिया ऐप बनाने वालों के कंट्रोल में भी यह चीज़ नहीं है कि वह लोगों के भीतर पैदा हुए इस पागलपन को कैसे रोके, वे ख़ुद अपने बच्चों को और ख़ुद को इन माध्यमों से दूर रखते हैं। आज अधिकतर scholar, scrollers में तब्दील हो चुके हैं। एक बड़ी आबादी ज़ोम्बी बन चुकी है, जिधर चाहें उधर आप उसे आसानी से ट्रिगर कर सकते हैं, बस एक ट्रेंड बनने की देर है।

कोई इस नशे से अछूता नहीं है। हम सब इसकी गिरफ्त में है। कुछ लोग देख पा रहे हैं, कुछ नहीं देख पा रहे हैं। आपको अब लोगों से मिलकर शांति महसूस नहीं होगी, अधिकतर लोग आपको बेचैन ही दिखेंगे मिलेंगे। इसलिए मैंने तो अब लोगों से मिलना बात करना बहुत कम कर दिया है। ये पिछले दो तीन सालों में मुझे लगता है सबके दोस्त कम हुए होंगे, सबके अपने कम हुए होंगे, एक आत्मीय बातचीत के लिए जो कुछ लोग हमारे जीवन में होते थे, वे लोग कम हुए हैं। सोशल मीडिया ने सबके जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया है, अस्थिर कर दिया है, सबके जीवन में भयानक शोर और उत्तेजना भर दी है। इसमें आप देखेंगे कि जानवरों पर भी इसका असर हो रहा है, उनको देखकर भी अब आपको शांति नहीं मिलती है, आसपास में ही गाय कुत्ते बिल्ली उनकी आँखें देखिएगा, अब वे शक भरी निगाहों से देखते हैं, उनकी भी भाव भंगिमा बदल चुकी है, अजीब तरह से व्यवहार करने लगते हैं। उन तक भी हमारा ये नया रेडिएशन कहीं ना कहीं पहुँच ही रहा है।

आपको अपना ख़ुद का लिटमस टेस्ट करना हो, अपने भीतर के अघोषित शोर और उत्तेजना की सूक्ष्म जाँच करनी हो तो उन लोगों से मिलिए, उन लोगों से बात करिए जो सोशल मीडिया ऐप्स का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। आपको उनकी बातचीत और अपनी बातचीत के तौर तरीकों में जमीन आसमान का फर्क दिखेगा, उनके चेहरे के भाव और आपके चेहरे के भाव भी अलग लगेंगे। पूरी जीवनशैली में ही बड़ा अंतर दिखेगा। तब शायद समझ आए कि हम सबके जीवन को, जीवन के एक एक अंग को एक ऐसी अदृश्य शक्ति बार-बार उत्तेजित कर रही है जिसे सोशल मीडिया कहते हैं।

मैं ख़ुद कहीं घूमने जाता हूँ तो उस जगह की फोटो वीडियो देखने से बचता हूँ। पिछले 7-8 साल से ये काम बंद कर दिया है। जब 3G और डोंगल का जमाना था, अनलिमिटेड इंटरनेट नहीं था तब खूब देखा है, और तब के बन रहे वीडियो फोटो उतने बेचैन भी नहीं करते थे। उतनी फोटो वीडियो मिलती भी नहीं था, सीमित और ठोस जानकारियां ही थी। शायद अनलिमिटेड नाम की चीज़ नहीं थी इसलिए तब सोशल मीडिया माध्यमों की पवित्रता भी कुछ हद तक बनी हुई थी, अब तो ये मार्केटिंग टूल बन चुके हैं।

अभी कुछ दिन पहले यहाँ दोस्तों के साथ गया था, यहाँ भी इसकी पहले कभी फोटो वीडियो नहीं देखी, जाकर बड़ा सुकून मिला। कुछ समय पहले vizag भी गया। भारत का कोना-कोना नाप के आने के बाद ये पास की जगह अब तक नहीं गया था। उसकी पवित्रता मैंने बचाकर रखी थी, कभी अलग से फोटो वीडियो देखने की तड़प ही नहीं हुई, जाने के ठीक पहले भी नहीं हुई। और जब गया तो संपूर्णता में उस जगह को आँखों से महसूस किया। घूमना भी एक लक्ज़री है एक आर्ट है, सबको आती नहीं हमारी जाती नहीं।

Thursday, 29 January 2026

दुख है -

बुद्ध आजीवन दुखों का अनुसंधान करते रहे। दुख को मृत्यु से भी बड़ा बताया और कहा - “दुख है, दुख का कारण है, कारण का निवारण है और निवारण आष्टांगिक मार्ग अपनाकर किया जा सकता है। आष्टांगिक मार्ग के बारे में आप विस्तार से पढ़ सकते हैं। बुद्ध के कहे का मोटा-मोटा सार यही रहा कि शांति से अपना जीवन जिया जाए, और किसी दूसरे को दुख ना दिया जाए, उसके दुख का भागी ना बना जाए।

अभी कल एक भतीजा सड़क दुर्घटना की चपेट में आया, उसके हाथ के ऊपर गाड़ी चल गई, अंततः हाथ पूरा काटना पड़ गया। वैसे तो हर घटना के पीछे कर्म-फल की अवधारणा को नहीं मानता हूँ। लेकिन अधिकतर मामलों में बुद्ध सही ही साबित होते हैं। जैसा कि बुद्ध ने कहा कि दुख है तो दुख का कारण भी होगा। भतीजे साहब का व्यवहार ऐसा कि परिवार के अलावा गाँव के लोग भी दुखी कि इतने व्यवहार कुशल लड़का जो पहली बार शहर कॉलेज की पढ़ाई के लिए गया था उसके साथ ऐसा कैसे हो गया। अब उक्त लड़के के पिताजी और दादाजी पर आते हैं, दोनों उच्च कोटि के धूर्त, लंपट और हिंसक किस्म के व्यक्ति। भतीजे के पिता का स्तर ऐसे समझें कि जवानी के दिनों में उसने अपनी माँ पर हाथ भी उठाया था। बाक़ी दोनों बाप बेटे का चरित्र ऐसा कि अनगिनत लोगों के दुख के भागी बने। आज जैसे ही भतीजे की दुर्घटना की खबर मिली, उसके बाप दादा का सारा कुछ पुराना फ़िल्म की तरह सामने चलने लगा। महीने भर पहले ही उनसे परेशान एक उन्हीं के परिचित ने कहा कि अगले ने जीवन तबाह कर दिया, कुछ उपाय बताओ, मैंने कहा - अपनी तरफ से कोई हिंसा मत करना, अगर ऐसा कुछ सोच भी रहे तो मेरे से बात करने की आवश्यकता नहीं है। आज उसी व्यक्ति ने दुःखी मन से दुर्घटना की सूचना दी है। इस बात की भरपूर गारंटी है कि उस बाप बेटे के चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है, बच्चे का हाथ कट गया तो क्या हुआ, अपना हिंसक चरित्र क्यों छोड़ा जाए। क्यूंकि इससे पहले भी ऐसे मामले देखे जहाँ जवान बच्चों की मृत्यु के बाद भी पिता को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, यहाँ तो बस हाथ कटा है।

इंसान को चाहिए कि ख़राब से ख़राब स्थिति में भी इतनी सी बात का हमेशा ध्यान रखे कि वह किसी सज्जन या कमज़ोर पीड़ित वंचित या किसी भी व्यक्ति के दुख का भागी ना बने। क्यूंकि जब कुदरत न्याय करता है तो फिर आपको किसी को दोष देने लायक़ भी नहीं छोड़ता है।

Monday, 26 January 2026

एक चुप सौ सुख

क़ुदरत ने स्त्रियों को एक शक्ति ऐसी दी है जिसके सामने दुनिया का लगभग हर पुरुष पराजित हो जाता है। असल में अच्छे-अच्छे क़ाबिल धैर्यवान अहिंसक लड़कों का मनोबल और धैर्य तोड़ देने की ताक़त स्त्रियों में होती है। कुदरत से उन्हें यह गुण तो मिला हुआ है। “जहाँ ना पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि” की तर्ज पर “जिसे ना तोड़ पाए कोई मज़दूर मिस्त्री उसे तोड़ देती है स्त्री” प्रासंगिक जान पड़ता है। 


अभी हाल फ़िलहाल में छत्तीसगढ़ के एक स्थानीय फ़िल्मकार मोहित साहू पर एक महिला ने मारपीट का आरोप लगाया और लहूलुहान उसी हालत में थाने गई। मोहित का तो मीडिया ट्रायल मास लेवल पर हो गया कि जिस लड़की के साथ रिश्ते में है उसी लड़की पर ऐसे हाथ उठाया है। प्रथम दृष्ट्या किसी को भी यही लगेगा कि गलती लड़के की है। लेकिन कई बार हिंसा करने वाले के पक्ष को नहीं देखा जाता था। जैसा कि मैंने पहले कहा क़ुदरत ने स्त्रियों को वो शक्ति दी है जिस शक्ति के बल पर वह अच्छे से अच्छे अहिंसक शांतचित्त पुरुष को भी हिंसक बना सकती है। पूरी संभावना है कि इस वाले मामले में भी यही हुआ, आज पता चल रहा है कि मोहित ने तनाव में आकर फिनाइल पी लिया और अस्पताल में भर्ती है। इस घटना पर पत्नी से बाहर देर तक घूमने के एवज में डाँट खाए एक दोस्त ने कहा - “पुरुषों के केवल पैंट में चैन होता है, जीवन मैं चैन नहीं होता है।”


कई ऐसे लड़कों को जानता हूँ जिन्होंने जीवन में किसी को रे बे तक नहीं किया होगा, तमाम तरह के व्यसनों से दूर रहे, परस्त्रीगमन छोड़िए किसी को आँख उठाकर देखा तक नहीं होगा। ऐसे लोग भी एक समय के बाद रिश्तों की समस्याएं बताते हुए कहते मिले कि कई बार ऐसा होता है तनाव इतना हावी होता है कि मन करता है एक थप्पड़ रसीद कर दिया जाए। कई ऐसे लड़के होते हैं तो अपने जीवन का 3-4 दशक बिना किसी प्रकार की हिंसा किए निकाल चुके होते हैं लेकिन एक स्त्री जब हिंसक मानसिकता लिए उसके जीवन में आती है तो उसका जीवन नरक कर देती है। और यह बात स्त्री और पुरुष दोनों पर लागू है। दोनों को एक दूसरे की निजता का बखूबी सम्मान करना चाहिए। एक दूसरे के जीवन में बहुत ज़्यादा नहीं घुसना चाहिए। चाहे वह प्रेमी-प्रेमिका वाला रिश्ता हो या शादी का, अगर उसमें आपको अपने साँस लेने लायक स्पेस नहीं मिल रहा है, जबरन बहुत बेफ़िजुल की छोटी-छोटी बातों पर असुरक्षा का भाव पैदा हो रहा है और उस भय से कब्ज़ा कर लेने वाली प्रवृति पैदा हो रही है इसका अर्थ यह है कि गाड़ी सही नहीं चल रही है। इसीलिए देखने में यह आता है कि अधिकांश रिश्ते कुछ समय बाद दो भिखारियों की छीनाझपटी में बदल जाते हैं। क्यूंकि जो दोनो के पास नहीं है वही एक दूसरे से मांग रहे होते हैं। 


हमारे यहाँ रिश्तों में इतने भयानक स्तर पर असुरक्षा है कि जब-जब इंसान शादी के बंधन में बंधता है या अपने रिश्ते के बारे में लोगों को बताता है तो उसके दोस्त कम होने लगते हैं। इसमें भी कारण वही है कि वे बतौर दोस्त भी वे लोग जो बतौर दोस्त अब तक साथ थे वे भी कुछ हद तक आपको अपनी अथॉरिटी मानने लगते हैं। रिश्तों में अधिकतर यह देखने में आता है कि हमारा अपना जीवन उबाऊ नीरस होता है लेकिन उसे हम अपने पार्टनर के सहारे मनोरंजक बनाने की कोशिश करते हैं और फिर इसके भयावह दुष्परिणाम आते हैं, उन्हीं पर फिर टीवी सीरियल पर भी बनते हैं और जब यही भड़ास हिंसक रूप ले ले तो क्राइम पेट्रोल सावधान इंडिया के एपिसोड बनते हैं। रिश्तों में असुरक्षा संबंधी इन समस्याओं से कोई भी भारतीय अछूता नहीं है लेकिन इन समस्याओं को स्वीकार करते हुए हमेशा असुरक्षा कम करने का प्रयास होना चाहिए। 


चलते चलते : पंजाबी में एक कहावत है - “ एक चुप सौ सुख “, गृहस्थ जीवन जी रहे तमाम स्त्री-पुरुषों को सादर समर्पित।


Friday, 16 January 2026

6 साल बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट बस का सफ़र 

बाइकर बन जाना अकारण नहीं था। बस ट्रेन या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कोई भी माध्यम हो, इनमें बहुत सफ़र किया है, लेकिन अब नहीं हो पाता, अब पब्लिक प्लेटफार्म में जाने से बचता हूँ। इंसानों से जितना कम संपर्क हो, वही ठीक लगता है, पता नहीं एक अजीब सा विरक्ति मोह भंग होने लगा है। इस बीच बस में एक दिन जाना हुआ। हम 6 फुटिये लोगों के लिए इस लोकल पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस में जितना स्पेस है, इंडिगो की फ्लाइट में भी इतना ही स्पेस रहता है। मुझे इस वाले भारत को अब बिल्कुल देखने का मन नहीं करता है। ट्रेन से लेकर इन बसों में बहुत देख लिया है, इतनी कहानियाँ घूमती है की अब बेचैन करता है यह सब देखना।


बस में बड़ी संख्या में कॉलेज जाती लड़कियां दिखी। विडंबना कि लगभग हर लड़की के चेहरे पर स्कार्फ था। स्कार्फ जो एक साथ दो-दो काम कर रहा था, एक पर्यावरणीय प्रदूषण और दूसरा पुरुषों के आंखों के द्वारा होने वाला अनवरत प्रदूषण; इन दोनों से उनको एक स्कार्फ सुरक्षित कर रहा था। सेमेस्टर के परीक्षाओं की चर्चा करते जा रहे थे, जबकि उन्हें यह नहीं पता कि ये एक ऐसी अंधी गली है जहाँ एक गुणवत्ता वाला जीवन पा लेने की प्रायिकता जुए के खेल से भी ख़राब है। 


ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने वर्तमान भविष्य दोनों का नहीं पता। साथ ही बड़ी संख्या में कुपोषित कृषकाय से चेहरे लिए मजदूरी करने वाले भी जा रहे थे, हताश निराश परेशान से चेहरे जिन्हें अपना असल मूल्य भी नहीं पता। पता नहीं आख़िरी बार कब उन्मुक्त होकर मुस्कुराए होंगे। लगातार मोम की तरह अपना जीवन जलाकर घिस रहे हैं और थोड़े-थोड़े मृत होते जा रहे हैं। खाने में क्या खा रहे हैं नहीं मालूम। ना शारीरिक सौष्ठव, शरीर में प्रोटीन-विटामिन की भरपूर कमी जो साफ़ दिखती है, साथ ही चेहरे पर अनवरत शोषण की रेखाएं। यह भारत बड़ा बेचैन करता है।


इस बेचैनी में भी गिद्ध सरीखे लोग इनका और खून निचोड़ लेने के लिए इस दलदल में उतरते हैं, इस भारत को और निचोड़ कर खोखला करते हैं। मुझे इससे दूर रहने में ही अपनी भलाई लगती है, क्यूंकि मैं इस भारत को और खोखला करने में अपना योगदान नहीं दे पाता हूँ तो बेहतर है कि जब तक परिस्थितियाँ अनुकूल ना हों इसकी छत्रछाया से ही दूर रहा जाए और अपने स्तर पर प्रयास करते रहा जाए। 


साँस लेने वाले दो ही तरह के लोग आज बचे हैं। उसमें एक या तो यह सब पीड़ा देखकर झेलकर खामोश मृतप्राय हो चुका है या फिर जो मजबूत टांगे लेकर ज़िंदा होने का दंभ पाल रहा है वह हरामखोरी की हद तक इंसानियत खो चुका है। व्यवस्था ने ज़िंदा रहने लायक और कोई विकल्प इनके पास छोड़ा भी नहीं है। 


एक बड़ी आबादी को हर चीज़ में अच्छा और सकारात्मक देखने की ऐसी बीमारी लग चुकी होती है कि वे एक बड़ी आबादी का दुख आजीवन नहीं देख पाते हैं। वे भूल जाते हैं कि हम सभी एक समाज के रूप में एक इकाई हैं। तालाब में रहने वाले एक जीवधारी के शरीर में भी अगर संक्रमण है, तो उस संक्रमण का विस्तार तालाब में रहने वाले सभी जीवों तक होता है।


इस सीमित जगह में बैठे-बैठे टांगों का दर्द तो मैनेज हो जाता है, लेकिन सीने में दर्द रह जाता है। मुझे अब इस भारत को देखना ही नहीं है, और दुआ करता हूँ कि मेरी तरह किसी और को भी इस भारत को देखना ना पड़े।