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Wednesday, 11 May 2022

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता -

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि अपने लिए उगाऊँ ताजी सब्जियां,
सभी तरह के मसाले और खूब सारे फल,
और बाहरी खान-पान से दूरी बना लूं।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि मैं रहूं धरती के जिस हिस्से में,
वहाँ का जलस्तर मुझे ऊपर तक महसूस होता हो,
पानी से यह नजदीकी इतनी हो कि उसके होने का भाव,
आसपास की मिट्टी और पेड़-पौधों में साफ दिखता हो।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि क्रांक्रीट और टाइल्स मार्बल से अप्रभावित,
मिट्टी और पेड़-पौधों से हमेशा घिरा रहूं।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि खुद को हर तरह के तनाव से मुक्त करूं,
हर तरह की हिंसा से निजात पा लूं,
किसी भी प्रकार की कुण्ठा का प्रवेश अपने भीतर न होने दूं।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि पहले मैं खुद अपने भीतर कुछ बदल लूं, 
कुछ चीजें जोड़ लूं, कुछ चीजें घटा लूं,
कुछ इस तरह खुद को नया करता चलूं।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि संगीत मेरे भीतर बहता रहे, 
हवा के झोंके की तरह,
घने आसमानी बादलों की तरह,
किसी नदी के पानी की तरह।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि दुरूपयोग और सदुपयोग,
फिजूलखर्च और मितव्ययिता,
हमेशा इन तत्वों को मन देख पाता हो।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मेरी चाह है कि हर एक बहाव देख सकूं,
चाहे वह मन का हो या शरीर का, 
चाहे वह तनाव का हो या लहू का,
इस मन रूपी शरीर की हर एक गतिविधि,
मेरी नजर में रहे।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि, 
मेरे जीवंत अनुभव मुझे शिथिल ना करें,
और शाब्दिक ज्ञान मुझे अहंकारी न होने दें।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि स्त्रियों के प्रति सहज हो जाऊं,
उनके मन और शरीर का सम्मान करना सीख जाऊं,
कुण्ठा, लिप्सा, कामुकता और हिंसा से इतर,
उन्हें बेहतर बनते देखने की लालसा मुझमें हो।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं तो चाहता हूं कि मेरे मन शरीर का ताप,
बना रहे साम्यावस्था में,
और किसी को हानि न पहुंचाए।

मैं दुनिया नहीं बदलना चाहता,
मैं चाहता हूं कि मेरी दैनिक जरूरतों की माँग,
जीने लायक मेरी आवश्यकताएँ,
दुनियावी समझ की तमाम ऊंचाईयाँ,
न किसी के लिए बोझ बने,
न मैं किसी पर बोझ बनूं,
मेरी आत्मनिर्भरता सिर्फ प्रकृति से हो,
सब कुछ प्रकृति से शुरू करूं,
और प्रकृति पर खत्म करूं।

Monday, 2 May 2022

इंसान नहीं हो सकता - एक कविता

जिस वजह से हमारी नींद खराब होती हो,
हमें जरूरत से अधिक सोना पड़ता हो,
हमारी भूख प्यास बर्बाद हो जाती हो,
यानि हम खुद कहीं खो जाते हों।

हमें जीना तक मुश्किल लगता हो,
हमारी सारी ख्वाहिशें, जीने की इच्छाएँ,
सब कुछ खत्म हो जाती हों,
मानो किसी ने उनका गला‌ दबा दिया हो,
यानि जो मन पर लगी चोट का कारण हो।

जो हमसे जीने की वजह ही छीन लेता हो,
हमारी खुशियाँ चौपट कर जाता हो,
यानि जो हमारी उम्र तक कम कर देता हो,
हमारे चेहरे से लेकर हमारे जीवन में,
निराशा और उदासियों की लकीर खींच देता हो,
प्रेम की लकीरें कुछ ऐसे मिटा कर जाता हो कि
हमारे भीतर प्रेम को पैदा होने से रोक देता हो,
यानि भीतर से हमारा खून सुखा देता हो,
हमारी पवित्र कोमल भावनाओं को जला देता हो,
हमें हमसे ही छीन लेता हो,
इंसानी संवेदनाएँ ही खत्म कर देता हो,
यानि जिसका एक ख्याल भर ही,
हमें किश्तों में खत्म कर रहा होता हो,
वह सब कुछ हो सकता है,
लेकिन एक इंसान नहीं हो सकता है।

माँ - एक कविता

वह खड़ी रहती है एक दीवार की तरह,
जो हमेशा हमें संभालती रहती है।
बचपन में हमारे शरीर को चोट से बचाती है,
और जवानी में मन को घायल होने से रोकती है,
वह माँ होती है।

उसे पता होता है हम घायल हैं,
हमारे मन के घाव उसे अपने घाव लगते हैं,
वह कोशिश करती है कि,
उन घावों पर दुबारा चोट न लगे।
दुआ सलामती करते हुए कुछ यूं,
वह मरहम पट्टी करती रहती है।

यह काम वह रोज करती है,
क्योंकि उसे पता होता है कि,
मन के घाव ठीक होने में समय लेते हैं।
वह जानती है कि,
शरीर की चोट से तो खून बहता है,
लेकिन मन पर लगी चोट से,
खून बहना तक रूक सकता है।
इसलिए वह एक साथी दोस्त की तरह,
दूर रहकर भी पास ही होती है।

ये अहसास‌, ऐसा विश्वास,
जब तक कहीं और महसूस न हो,
तब तक लोगों से बचना ही चाहिए।

Tuesday, 19 April 2022

मुझमें पूरा भारत बस जाए - एक कविता

मेरे हिस्से आए,
सुदूर हिमालय के चरवाहों जैसी जिजीविषा,
मध्य भारत के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों जैसी फुर्ती,
वीरान रेतीले मरूस्थल में रहने वाले बाशिदों जैसी जीवटता,
समन्दर में नाँव चलाते तमिल मछुआरों जैसा अदम्य साहस,
मैं चाहता हूं‌ मुझमें पूरा भारत बस जाए।

Saturday, 16 April 2022

एक स्त्री जब कहेगी अपने मन की बात - एक कविता

सब कुछ कितना अच्छा लगता है,
चारों ओर दिखती है खुशहाली,
परिवार और समाज के सारे फलक,
नजर आते हैं शुध्द और पवित्र।

लेकिन जब कोई बताता है,
अपने जीवन के कटु अनुभव,
जब कोई कह देता है,
अपने मन के भीतर की बात,
तो सारी स्थापनाएँ ध्वस्त होने लगती है।
समाज परिवार रूपी स्तंभ,
रिश्तों के तमाम रूप,
दरिंदगी और नीचता रूपी गाँठो से अलग होकर,
एकाएक टूटने लगते हैं
बिखरने लगते हैं।
लेकिन क्या कोई कह पाता है,
अपने मन के भीतर की सारी बात?
जिस दिन एक‌ स्त्री अपने मन की बात कहेगी,
नदियों का प्रवाह थम जाएगा,
हवाएँ रूक जाएंगी,
सारे जीव जंतु पशु पक्षी,
शर्म से मौन धारण कर लेंगे,
आसमान का रंग फीका पड़ जाएगा,
चारों ओर खामोशी छा जाएगी,
दुनिया कुछ देर के लिए थम जाएगी।

जब हम कहेंगे अपना पूरा सच - एक कविता

दुनिया अधूरेपन की नींव पर टिकी है, 
यहाँ पूरा कुछ भी नहीं होता, 
हम नहीं कहते अपना पूरा सच, 
हम थोड़ा सच कहते हैं,
या कभी कुछ ज्यादा कह लेते हैं,
ताकि धरती घूमती रहे, 
शांति, स्थिरता कायम रहे,
चीजें जस की तस बनी रहें।

हम‌ जिस दिन उखाड़ने लगेंगे सारे गड़े मुर्दे,
बता देंगे जीवन के सारे कटु और वीभत्स अनुभव,
हम कहने लगेंगे जिस दिन अपना पूरा सच,
तमाम जड़ें हिल जाएंगी,
कितनी स्थापनाएँ ध्वस्त होंगी,
कितने रिश्ते टूट जाएंगे,
हम‌ अकेले पड़ जाएंगे,
धरती थर-थर काँपने लगेगी।

Saturday, 9 April 2022

मेरी बैचेनी - एक कविता

कुछ लोगों में होता है जरूरत से अधिक धैर्य, 
सुन लेने का पूरी तन्मयता से फिजूल बातों को भी,
मैं नहीं कर पाता हूं बर्दाश्त,
सीधे कह जाता हूं मूर्ख,
क्योंकि ऐसी बातें मुझे लगती है,
किसी द्विगुणित होने वाले जहरीले,
विषाणु जीवाणु बैक्टीरिया की तरह,
जो करती है प्रभावित मन मस्तिष्क को,
मेरे पूरे शरीर को,
हाथ पाँव हो जाते हैं शिथिल,
होती है नाभि में बैचेनी,
चला जाता है चेहरे का खिला हुआ रंग,
छिन जाती है मुस्कुराहट,
और घिर जाती है आँखों में बैचेनी,
कान अस्वीकार कर देते हैं कुछ सेकेण्ड के बाद,
और जोर से कराहने लगते हैं।
तमाम धैर्यवान लोग दुनिया के लिए उम्मीद हैं,
जो इस धरा का इतना भारीपन लेकर चलते हैं,
सभी लोगों को सुनते हैं,
उनकी हर एक खराब से खराब,
सतही, छिछली और स्तरहीन,
अतार्किक, बेफिजूल और बेबुनियाद,
हिंसा, नफरत और सामंती मानसिकता से भरपूर,
जड़ से सढ़ चुकी बातों को देते हैं तवज्जो,
ताकि हम‌ जैसे चंद लोग मन भर के,
दीमक की तरह लटके,
जोंक की तरह चिपके,
दीवार बन कर अड़े इन लोगों को,
जी भर के चूतिया कह सकें।

Friday, 11 February 2022

मिट्टी का बुलावा -

जब गुजरी सड़क पर एक बड़ी मशीन,
तब हुआ अहसास अपने छोटेपन का,
जब दूर बैठे पैरों तक झकझोरते पहुंचा कंपन,
तब लगा कि अभी पैरों के नीचे खिसक जाएगी जमीन,
और हम अभी कहीं इस अंधकार में समा जाएंगे,
जब जीवन और मृत्यु को एक दूसरे के सामने देखा,
तो लगा कि जीना भी क्या कमाल चीज है।

इसी हिलती डुलती मिट्टी को,
इस अल्पकालिक जीवन में,
हम अपने नाम अपनी हिस्सेदारी से,
कब्जा लेना चाहते हैं,
अपना लेना चाहते हैं,
लेकिन आखिर कब तक,
असल मायनों में,
हम कुछ भी कभी हासिल नहीं करते हैं,
हम बस जी सकते हैं,
और हमें एक बार मिली इस जिंदगी को,
जीने में ही लगा देना चाहिए,
क्योंकि एक दिन हमारे पास,
इस मिट्टी के कंपन को महसूस कर लेने,
और जीवन के इस छोटेपन को जी लेने लायक साँस नहीं होती,
अंततः हम मिट्टी के पास चले जाते हैं। 

अस्तित्व की शक्ति - 2

जब लगे सब खत्म हो गया,
जब लगे चारों ओर अंधेरा है,
जब खत्म हो जाए जीने की इच्छा,
तब कुछ देर के लिए सही,
लाठी समझ कर पकड़ लेना,
जब लगे वैसे ही छोड़ जाना,
जब जरूरत हो फिर थाम‌ लेना।
ये लाठी अहसान नहीं जताती है,
इसने बस फर्ज निभाना सीखा है,
एक बेहतर इंसान हो जाने का फर्ज,
बिना जाने, बिना किसी उम्मीद के, दूर कहीं से,
किसी के दुःख को उसी की तरह,
महसूस कर लेने और बंद कमरे में रो लेने का फर्ज।
ताकि दुनिया से ये दुःख थोड़ा ही सही, कम हो जाए,
और हम फिर से जीने की एक कोशिश करने लग जाएं।

अस्तित्व की शक्ति - 1

जब चारों ओर निराशा के बादल दिखाई देने लगे,
इतना धुंधलापन कि कहीं कुछ भी साफ न दिखता हो,
क्या वर्तमान क्या भविष्य, सब कुछ अंधेरे की गिरफ्त में हो,
तब हमें आँख मूंदकर खुद को किस्मत के हवाले कर देना चाहिए।
कई बार कुछ चीजें अपने आप होती है,
कोई हमें देख रहा होता है, 
हमारी कड़ी परीक्षा ले रहा होता है,
हमें एक बेहतर कल के लिए मजबूत ही कर रहा होता है।
हमें बस कुछ देर चुप रह जाना चाहिए,
चुप रह जाने से मौसम बदल जाता है।
हमें उस अदृश्य शक्ति के हाथों खुद को सौंप देना चाहिए,
कुछ इस तरह वक्त अपने आप बेहतर होने लगता है। 

Friday, 21 January 2022

जब गिरता है एक बड़ा पेड़ -

जब गिरता है एक बड़ा पेड़,
आस पड़ोस के छोटे-मोटे पेड़,
करते हैं रूदन,
मनाते हैं शोक,
बहाते हैं आँसू।
जब गिरता है बड़ा पेड़,
लगती है भीड़,
सांत्वना देने वालों की,
श्रध्दांजलि देने वालों की।
जब गिरता है बड़ा पेड़,
तब गुण गाए जाते हैं,
पेड़ के उत्कर्ष की,
उसके वैभव की,
उसकी विपुलता की।
जब गिरता है एक बड़ा पेड़,
तो इसके साथ पैदा होता है एक संकट,
संकट पेड़ की शाखाएँ काट लेने की,
उन शाखाओं की खूशबू से इत्र बना,
उसकी हिस्सेदारी सूंघ लेने की।

Sunday, 16 January 2022

उसके भीतर हिमालय बसता है -

हिमालय सी मजबूती है उसमें,
चट्टान सा दृढ़ ह्रदय लेकर चलती है,
जैसी क्षणभंगुरता और भोलापन,
जैसी शीतलता और एकाकीपन हिमालय के पास है, 
वैसा सब उसके पास भी है, 
जैसी सह्रदयता हिमालय में है,
वैसी उसमें भी है,
कठोरता और कोमलता का अद्भुत सम्मिश्रण है वो।
जब टूटती है उसकी चोटियाँ,
जब आता है शीतल हवाओं का प्रकोप,
जब गिरती है मजबूत चट्टानें,
फिर भी वह अडिग खड़ी रहती है,
फिर से एक लंबी साँस लेकर,
अपनी जड़ों को मजबूत करती जाती है।
जब तक जीवन का अस्तित्व है, तब तक,
निराशा रूपी बादल छंटनी करती रहेगी तब तक,
सामने दुःखों का पहाड़ भी क्यों न आ जाए,
वह खिलती रहेगी अनंत काल तक।।