मैं जब यहाँ रूका हुआ था, तो अपनी कुछ चीजों को लेकर थोड़ा परेशान था, इसलिए गाड़ी चलाने का उतना मन भी नहीं कर रहा था, इसलिए कुछ देर यहीं लेटा हुआ था, अकेले घूमने वाले ही इस मनोस्थिति को समझ सकते हैं, जब भी कभी लगता है कि हम देश दुनिया से पूरी तरह कट चुके हैं, अलग-थलग पड़ चुके हैं, जब हम बैचेनी महसूस करने लगते हैं, तो शायद कोई हमारे मनोभावों को देख रहा होता है, सुन रहा होता है, और फिर कुछ लोग ऐसे कुछ सेकेण्ड के लिए अपनी सहज प्रतिक्रिया से मन हल्का कर देते हैं, ऊर्जा दे जाते हैं, यात्रा सुखद बनाने में योगदान दे जाते हैं।
Friday, 31 December 2021
Day 141 of all India solo winter ride
मैं जब यहाँ रूका हुआ था, तो अपनी कुछ चीजों को लेकर थोड़ा परेशान था, इसलिए गाड़ी चलाने का उतना मन भी नहीं कर रहा था, इसलिए कुछ देर यहीं लेटा हुआ था, अकेले घूमने वाले ही इस मनोस्थिति को समझ सकते हैं, जब भी कभी लगता है कि हम देश दुनिया से पूरी तरह कट चुके हैं, अलग-थलग पड़ चुके हैं, जब हम बैचेनी महसूस करने लगते हैं, तो शायद कोई हमारे मनोभावों को देख रहा होता है, सुन रहा होता है, और फिर कुछ लोग ऐसे कुछ सेकेण्ड के लिए अपनी सहज प्रतिक्रिया से मन हल्का कर देते हैं, ऊर्जा दे जाते हैं, यात्रा सुखद बनाने में योगदान दे जाते हैं।
Wednesday, 24 November 2021
One day in Jaipur during all india ride -
Sunday, 7 November 2021
One buddha statue in Sarnath
Tuesday, 26 October 2021
My take on Bike riding -
कल भारत घूमने वाली पुरानी फुटेज देख रहा था, एक्शन कैमरे से बनी सड़कों की फुटेज जो 40-50 घंटों से अधिक की होगी, उसे सरसरी निगाह से देख रहा था, एक चीज मैंने उसमें नोटिस किया कि मेरी गाड़ी खाली सड़क में भी लंबे समय तक एकदम सीधी अपनी लेन में चल रही थी, एक भी जगह कहीं गड्ढे या पत्थर के ऊपर गाड़ी नहीं चली, अब अधिकतर सड़कें तो मेरे लिए अनजान ही थीं, उसमें कभी-कभार ऐसा हुआ कि कहीं पत्थर खड्ढे या ब्रेकर आ जाते, लेकिन देखने में आया कि मैंने एक-एक छोटे पत्थर और गड्ढों से खुद का बचाव किया जो अमूमन लोग नहीं करते हैं, मामूली समझते हैं।
आज बाइक को एक साल से अधिक हो चुके हैं, 22 हजार किलोमीटर से अधिक चल चुकी है, कोई समस्या नहीं आई जिसे समस्या कहा जाए, विश्वास मानिए अभी तक एक भी पंक्चर तक नहीं हुआ है, निस्संदेह इसमें बहुत बड़ा योगदान ट्यूबलेस टायर का है, दूसरा पहलू ये कि ऐसी खराब से खराब, दुर्गम सड़कों को नापकर आई कि मैं सोचता था कि आज मेरी गाड़ी तो गई लेकिन कुछ भी नहीं हुआ।
आखिरी बार जब सर्विसिंग कराई थी तो मैकेनिक ने खुश होकर कहा कि इतने लोग गाड़ी लेकर आते हैं लेकिन आपकी गाड़ी एकदम अलग ही महसूस होती है, गजब मैंटेन करके रखे हो, मैं भी सोचने लग गया कि आखिर मैंने ऐसा क्या खास कर दिया। हाँ ये है कि मैंने अपनी बाइक के साथ किसी प्रकार की हिंसा नहीं की, खुद अपने स्तर पर भी हिंसा करने से परहेज ही किया है शायद वही चीज यहाँ भी आई हो।
भारत घूमकर आने के बाद मैंने एक अपने आटोमोबाइल एक्सपर्ट साथी से कहा कि भाई जापान की इंजीनियरिंग का कोई तोड़ नहीं, वाकई मान गया, तो उसने जवाब में कहा - असल बात वो नहीं है, तू चलाया अच्छे से है, कल इतने सारे फुटेज देखने के बाद यह बात महसूस हुई।
Friday, 10 September 2021
Interview - All India Solo Winter Ride
Hope you like the conversation.
Q.1 अकेले बाइक से भारत घूमने का ये आइडिया कहाँ से आया?
A. ऐसी कोई तैयारी नहीं थी, कोरोना के बाद से सबकी तरह मैं भी घर में था, लाॅकडाउन की वजह से सब कुछ बंद था और कहीं जाना होता तो बस की सुविधा भी नहीं थी, फिर एक दिन अचानक मन में आया कि एक बाइक ले ली जाए। बाइक लेने की कहानी भी अजीब है, एक दिन शाम को एक शो रूम गया, वहाँ जाकर देखा, उसके बाद रात को उस बाइक के बारे में इंटरनेट में देखा और सुबह ही खरीद लिया। मेरे अधिकतर बड़े-बड़े फैसले ऐसे ही होते हैं। बाइक तो आ गई थी, तब तक इतना लंबा भारत घूमना है, ऐसी कोई तैयारी नहीं थी। 17 अक्टूबर 2020 को मैंने बाइक खरीदी और इसके दो सप्ताह बाद यानि 1 नवंबर को ही भारत घूमने निकल गया था। इन दो सप्ताह के अंदर ही मैं आसपास हजार किलोमीटर घूम लिया, क्योंकि पहली सर्विंसिंग करानी थी, और लंबी यात्रा पर निकलना था। जो कुछ हुआ इसी दो सप्ताह के अंदर ही हुआ, यूं कह सकते हैं कि अचानक एक दिन मन बन गया और सोच लिया कि चलो अब ठान लिया है तो कर ही लेते हैं।
Q.2 अकेले निकलने के पहले कोई डर घबराहट चिंता?
A. बिल्कुल नहीं। इससे पहले भी मैं खूब अकेले घूमा हूं। हाँ लेकिन जो पहला दिन होता है, वो बहुत मुश्किल भरा होता है, मन में बहुत से सवाल आते हैं, खुद पर शक होता है, ये सहज प्रतिक्रियाएँ है, क्योंकि हम जिस सामाजिक ढांचे में रहते हैं, जहाँ बँधे रहते हैं, वहाँ इन सब चीजों से हम वैसे भी रोज दो चार होते रहते हैं तो इतना चलता है। कुछ दिन जब हो जाते हैं, जब यह बंधन हटने का अहसास होता है, तब सब कुछ सामान्य लगने लगता है, तब जाकर यात्रा में मौज आनी शुरू होती है।
Q.3 आपने अपने यूट्यूब में खुद को "सोशल राइडर" लिखा हुआ है, ऐसा क्यों?
A. जी, इसका मतलब यह हुआ कि मैं बस सड़कें नापने या किसी खास जगह को देखने नहीं निकला था। जहाँ गया, वहाँ के लोगों से मिलना, बातें करना, और तो और उस स्थान विशेष के खान-पान के तौर तरीके, भाषा, स्थानीय बोली ये मेरे लिए सबसे जरूरी चीज रही। इस बात का कभी मलाल नहीं रहा कि फलां जगह जाकर वहाँ स्थित बहुत पुराने मंदिर या कोई पुरानी ईमारत या किसी प्रसिध्द जगह को नहीं देख पाया। मेरे लिए भारत ईमारतों में नहीं लोगों में बसता है। 135 दिनों में लगभग 80-90 दिन तो लोगों के घरों में ही रूकना हुआ।
Q.4 मुझे अपने घर के अलावा अपने रिश्तेदारों के घर में भी रहने में असहजता महसूस होती है, आप इतने दिन लोगों के घरों में रहे, कोई परेशानी नहीं हुई?
A. असहजता तो होती थी, ये समस्या थोड़ी बहुत मेरे साथ भी है, बहुत जल्दी लोगों से घुलना-मिलना नहीं हो पाता है, कुछ घंटों का समय लग ही जाता है। कुछ लोगों का अंतर्मुखी स्वभाव होता है, वहीं कुछ लोग बहिर्मुखी स्वभाव के होते हैं। मुझमें ये दोनों चीजे हैं, इनके बीच कहीं हूं। इसलिए समय, परिस्थिति के हिसाब से कभी स्वभाव अंतर्मुखी हो जाता है तो कभी बहिर्मुखी। बाकी जो मेरे परिचित रहे, मैं बहुत सोचता था कि कहाँ इनके यहाँ जाऊंगा, क्यों इन्हें परेशान करूं, कैसे रियेक्ट करेंगे, तमाम तरह के सवाल मन में आते। लेकिन मैंने देखा कि वे मुझे लेकर बहुत स्पष्ट रहते, उनकी स्पष्टता की वजह से भी मैं बहुत सहज हो जाता, लोगों का खूब प्यार मिला। मैंने यह भी महसूस किया कि सामने बात करने, साथ रहने से ही बहुत कुछ साफ होता है, चीजें स्पष्ट होती है, दूरी कम होती है, रिश्तों में मजबूती आती है।
Q.5 आप धर्मशालों गुरूद्वारों में भी रूके, मैंने बहुत लोगों को देखा है वे लंबी यात्रा में टेंट लेकर चलते हैं, आपने टेंट का आप्शन क्यों नहीं चुना?
A. टेंट का विकल्प मेरे मन में था लेकिन मैंने नहीं चुना क्योंकि मेरी यात्रा ठंड में हो रही थी, ठंड में टेंट लेकर चलेंगे, कैम्पिंग करेंगे तो फिर साथ में कंबल, चादर और तमाम तरह की अतिरिक्त चीजें भी आपको चाहिए, तो सामान बहुत अधिक हो जाता, असुविधा होती। मुझे बहुत कम सामान लेकर घूमना ज्यादा बेहतर लगा।
Q.6 मैंने देखा कि आप अपने सोशल मीडिया में यात्रा से अलग दलितों पिछड़ो, महिला अधिकारों, किसानों और समसामयिक मुद्दों पर कहीं अधिक मुखर रहते हैं, इस पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया रहती है? एक यात्री के रूप में यह आपको कैसे प्रभावित करता है?
A. मेरे लिए इन मुद्दों पर बात रखना जीने के लिए फ्यूल की तरह है, कहीं कुछ गलत हो रहा हो, उसे गलत न कहकर चुप हो जाना मन को कचोटता है, भीतर कहीं वो चीज परेशान करती है। अब किसी न किसी तो बात रखनी पड़ेगी, मैं इसमें यह भी कोशिश करता हूं कि बस प्रतिक्रियावादी बनकर ही न रह जाऊं। हममें से अधिकांश लोग हिंसा, अन्याय को देखकर अनदेखा कर देते हैं, इसका एक खतरा यह है कि एक समय के बाद हमें कुछ भी महसूस होना ही बंद हो जाता है। ऐसी स्थिति न आए इसका मैं हमेशा ध्यान रखता हूं। एक यात्री के रूप में नुकसान यह होता है कि जो लोग मेरे इस पक्ष से इतर यात्री वाले पक्ष को नहीं देख पाते, उन्हें यह पक्ष परेशान करता है, वो इन दोनों पक्षों को अलग-अलग नहीं देख पाते हैं और इसी पूर्वाग्रह की वजह से दूरी बना लेते हैं। बहुत लोगों को मेरे लिखे से शिकायत भी रहती है, कि यात्रा पर ध्यान केंद्रित करें। अब उन्हें कैसे समझाया जाए कि यह सब जीवन का हिस्सा ही तो है, अलग कुछ भी नहीं है, एक अच्छा यात्री होना क्या तभी माना जाएगा जब वह बस दिन रात यात्रा के बारे में ही बात करे, नहीं बिल्कुल नहीं। ऐसा नहीं होता है। कम से कम मेरे साथ ऐसा नहीं है, लोग खफा रहते हैं कि मैं यात्राओं के बारे में कम और समसामयिक मुद्दों पर ज्यादा बात करना पसंद करता हूं। खैर, उनकी सोच का भी सम्मान है।
Q.7 आप अपनी इस लंबी यात्रा में बहुत समय तक किसान आंदोलन में भी रहे, उसके बारे में बताएँ?
A. किसान आंदोलन को लेकर लोगों के अपने अलग-अलग विचार हैं, कोई इसका समर्थन करता है, कोई इसके विरोध में है, सबने अपनी क्षमतानुसार धारणा बना रखी है। मैं जब तक वहाँ नहीं गया था, मुझे भी यही लगा था कि ये बाकी आंदोलनों की तरह कुछ दिन के लिए सड़कों पर शोर मचा रहे हैं, फिर सब खत्म हो जाएगा। लेकिन वहाँ जाने के बाद समझ आया कि कहानी तो कुछ और ही है, वहाँ की आबोहवा से ही फर्क महसूस होने लगा। एक चीज मुझे समझ आई कि हमारे यहाँ टीवी देखकर या कहीं पढ़कर ही हम राय बनाने लग जाते हैं, जबकि खबरें अधिकांशतः वस्तुस्थिति के साथ उचित न्याय नहीं कर पाती है, यह मैंने किसान आंदोलन में जाकर महसूस किया। खुद वहाँ जाकर मुझे समझ आया कि दूर से किसी चीज को देखने और पास वहीं रहकर देखने में कितना आसमानी अंतर होता है।
वहाँ आंदोलन स्थल में मैंने जगह-जगह अलग-अलग जत्थों के लंगर देखे, स्लम के बच्चों के लिए क्लास देखे, ढेरों अलग-अलग लाइब्रेरी देखी, हर कोई अपनी कला अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर रहा है, कोई केरल से आया व्यक्ति बच्चों को जुम्बा डांस सिखा रहा है, तो कोई आंध्रप्रदेश का युवा कैलीग्राफी के गुर सीखा रहा है तो कोई किसानों को थियेटर दिखा रहा है, तो कहीं वाद-विवाद प्रतियोगिता का मंच है, ऐसा ही बहुत कुछ। इतनी महत्वपूर्ण चीजें आज भी मेनस्ट्रीम मीडिया में खबर का रूप नहीं ले पाई है। सोचिए कितना कुछ हमसे छूट जाता है। वहाँ किसानों के बीच हमेशा घर जैसा ही लगता था।
Q.8 टीवी में जो मैंने देखा, पुलिस और किसानों के बीच की मुठभेड़ भी आए दिन होती थी, आपको कभी वहाँ डर नहीं लगा?
A. बिल्कुल नहीं। उल्टे मुझे वहाँ जाकर बहुत अधिक सुरक्षित महसूस होता था, किसान कोई आतंकवादी तो हैं नहीं, अपने ही देश के लोग हैं, अपने माँगों के लिए सड़कों पर रह रहे हैं, हमारे साथ यही तो समस्या है, हम टीवी मीडिया के हिसाब से सोचने लगते हैं, आंदोलन करने वाले लोग हमारे इसी देश के नागरिक हैं, ये जरूरी बात हम भूल जाते हैं। आप यकीन नहीं करेंगे जब मैं आंदोलन स्थल में जाता था, कई बार तो ऐसा हुआ कि मैं गाड़ी का लाॅक लगाना तक भूल जाता, घंटों बाद लौटता, चाबी वहीं रहती। सोचिए आज आंदोलन को 9 महीने से अधिक हो गये, आंदोलन में अलग-अलग गाँव, ब्लाॅक, राज्यों के लोग हैं, कभी कोई चोरी जैसी घटना नहीं हुई है। सोचिए उनके बीच कैसा मजबूत भाईचारा बन रहा होगा, घर बैठे इसकी कल्पना करना भी संभव नहीं है।
Q.9 मेरे लिए ये सब बातें एकदम नई हैं, यकीन ही नहीं हो रहा। खैर, यात्रा पर वापस लौटते हैं, इस यात्रा के दौरान कभी आपको अकेलापन महसूस हुआ?
A. एक दो बार ऐसा हुआ है। हर दिन एक जैसा नहीं होता है, घूमने के दौरान आपको आए दिन नये-नये लोग मिलते रहते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है जब आप नितांत अकेले पड़ जाते हैं, आपको कुछ भी करने का मन नहीं करता है, न घूमने का मन करता है न किसी से बात करने का मन करता है, ऐसा होता है, इसे स्वीकार करना चाहिए, इसे भी जस का तस पूरी ईमानदारी से जीना चाहिए।
Q.10 यात्रा के दौरान कहीं ऐसा हुआ कि आपको कोई समस्या हुई हो और आपने कैसे उस समस्या का समाधान निकाला?
A. कुछ कुछ ऐसे अनुभव हैं। मैं एक बार एक बिल्कुल नई जगह में ट्रैकिंग के लिए गया था, सुबह के चार बजे ही ट्रैकिंग के लिए निकल गया था, पूरा जंगल था, घुप्प अंधेरा, दूर दूर तक एक भी इंसान नहीं, बहुत घबराहट हुई, वापस अपने कमरे में लौट आया, फिर पता नहीं कहाँ से हिम्मत आई, मैंने फैसला किया कि अब जो भी होगा देखा जाएगा, धड़कन तेज थी, फिर भी हिम्मत करके मैं ट्रैक के लिए निकल गया, हाथ में एक डंडा था, मैंने यहाँ तक सोच लिया था, कि ठीक है जो होगा देख लिया जाएगा, कोई जंगली जानवर भी आएगा तो सामना कर लूंगा। इस स्तर का हौसला पैदा हो गया था।
Q.11 इतनी लंबी ट्रिप, इसमें घरवालों का क्या रिएक्शन था?
A. घरवालों को अभी तक इस बारे में नहीं पता है, मैं बिना बताए ही निकल गया था, लेकिन हर दूसरे दिन घरवालों से बातचीत होती रहती थी, उनसे हमेशा संपर्क में रहा, लेकिन उन्हें मैं कभी अपना सही पता नहीं देता था, कई बार क्या होता है, हमें पूरा सच नहीं बताना होता है, सबके घरवाले पूरा सच समझने लायक होते भी नहीं है, और जब हमें लगता है कि पूरा सच नहीं पचा पाएंगे तो आधे सच के साथ काम चलाना चाहिए। मैं ऐसा करते हुए ही भारत घूमकर आ गया।
Q.12 इतनी हिम्मत कहाँ से आती है?
A. सारा खेल मन का है, एक बार मन बन गया तो सब हो जाता है, कोई समस्या नहीं टिक पाती है।
Q.13 इतना लंबा समय, लगातार बाइक चलाते हुए तकलीफ नहीं हुई?
A. अब मैं उसका जवाब दूंगा तो आपको यकीन नहीं होगा। जब मैंने शुरुआत की थी, कुछ दिन हुआ था तब पूरे शरीर में खूब दर्द होता, कमर और जोड़ों में दर्द हुआ। फिर कुछ दिनों के बाद आदत सी हो गई। तब तो ऐसा होने लगा कि जिस दिन मैं गाड़ी नहीं चलाता था, उस दिन मुझे अजीब सी बैचेनी होने लगती थी, बाइक चलाकर आता तब जाकर ठीक लगता, ऐसी आदत हो गई थी, शरीर और मन कुछ इस तरह से ढल गया था।
Q.14 क्या बात है, तो अगली ट्रिप कब शुरू होगी क्योंकि नार्थ ईस्ट तो शायद बचा हुआ है?
A. अगली ट्रिप इसी ठंड में शुरू हो जाएगी, भारत की जिस तरह की जलवायु है, उसमें मुझे ठंड के मौसम में घूमना ज्यादा सही लगता है, आपको बहुत अधिक भीड़ भी नहीं मिलती है। संभवतः मानसून के खत्म होते ही अक्टूबर में निकल जाऊंगा, इस बार थोड़ा अलग होगा, पिछले बार के बहुत से अनुभव काम आएंगे।
Q.15 अगली ट्रिप के लिए बहुत शुभकामनाएँ, अपडेट्स का इंतजार रहेगा।
A. जरूर, बहुत बहुत धन्यवाद।।
Tuesday, 7 September 2021
One night in sand dunes, Jaisalmer
जैसलमेर के एक गाँव की तस्वीर है। कैमल सफारी के लिए गया था। रात के एक बजे थे, लोमड़ी और हिरण आसपास चहलकदमी कर रहे थे उनकी वजह से नींद खुल गई। यहीं खुले में सोया था, ऊंट वाले भाई 500 मीटर दूर ऊंट के साथ थे। ऊंट वाले दो अलग-अलग जो भाई रहे, खाना पकाने के समय उन्होंने एक गजब की बात कही, मुझे भी एकदम बाहर का टूरिस्ट समझकर अंग्रेजी बोले जा रहे थे, जबकि मैं उनकी हर बात का हिन्दी में ही जवाब दे रहा था। फिर मैंने कहा - यार भाई मुझसे तो तुम लोग हिन्दी में ही बात करो, अंग्रेजी को साइड ही कर लो, फिर उन्होंने हिन्दी में बात की। उसमें से एक लड़के ने दूसरे की ओर इशारा करते हुए कहा - आपको पता है, हम दोनों बचपन से साथ पढ़े हैं, साथ घूमते हैं, मैं राजपूत हूं और ये ST है फिर भी हम साथ रहते हैं, साथ खाते-पीते हैं, कभी भेदभाव नहीं मानते। मैं मन ही मन सोच रहा था कि क्या दूसरा लड़का भी इतने गर्व से ऐसा बोल पाएगा।
मुझे पता नहीं उसने मुझे ये सब क्यों बताया। बताते वक्त वह ऐसा महसूस कर रहा था कि मानो कोई बहुत बड़ी उपलब्धि गिना रहा हो, कोई महान चीज बता रहा हो। और ये सच है उनके लिए ये महान चीज है। ऐसे ईमानदार प्रयासों को सलाम।
श्रीकृष्ण जी की मुद्रा में मैं ही लेटा हुआ हूं, इस तस्वीर के लिए ठीक ऐसे ही टाइमर लगाकर 30-40 सेकेण्ड स्थिर एक मुद्रा में रहना पड़ता है, फोन से तारों वाली फोटोग्राफी तभी संभव हो पाती है। उम्मीद है थोड़े बहुत तारे दिख रहे होंगे।
Saturday, 4 September 2021
Few Updates about my next trip -
एक चीज मैंने नोटिस किया कि बहुत लोगों को इस बात पर यकीन ही नहीं होता है कि घरवालों को बिना बताए मैं इतने दिन घूमकर आया। उनको लगता है कि ऐसा संभव ही नहीं है। बता दूं कि अभी भी मेरे घरवालों को पता नहीं है कि मैं भारत भ्रमण के लिए निकला था, जबकि पिछले छह महीने से माता-पिता के साथ ही हूं। कोई घरवालों को आकर बता देगा तो भी वे नहीं मानेंगे। तो ये पूरा पूरा स्किल का मामला है, बताऊंगा तो भी आपको समझ नहीं आना है, सबके अलग-अलग जीने के तरीके होते हैं। कोई बहुत साहस वाला काम नहीं है, बस खुद को अपनी स्वतंत्रता को वरीयता क्रम में सबसे ऊपर रखने की बात है।
कुछ एक मित्र थे जो मेरे पीछे खूब बातें किया करते क्योंकि सामने से तो कुछ कह नहीं सकते इसलिए पीठ पीछे चुगली करते। बातें भी क्या करते कि - "हाँ भाई उसका सही है कोई टेंशन कोई जिम्मेदारी नहीं, हमारी तो अपनी घर परिवार की जिम्मेदारियाँ होती है, माता-पिता को देखना होता है, उनकी सेवा करनी होती है।" अबे यार भाई इतना क्यों खार खाते हो सीधे कहा करो कि चीजें मैनेज करना नहीं जानते।
छह महीनों से घर पर हूं, बाई की तरह घर पर सारे काम देखता आया हूं, एक महीने तो अस्पतालों के ही चक्कर लगाए हैं, एक दो महीने तो गाँव में खेतों का काम देखा है, इन छह महीनों के अंदर दर्जनों शादियाँ, दशकर्म सबमें शिरकत करना। वह सब कुछ जिया है जैसा एक आम इंसान जीता है। अलग कुछ नहीं है बे, अलग कुछ है तो मेरे लिए आपकी सोच।
अगली ट्रिप में निकलने से पहले बहुत मुश्किलें हैं, हर तरह की मुश्किले हैं, ये समझिए कि ऐसा फँसा हूं कि पिछले छह महीने से घर से निकल नहीं पाया हूं। क्या होगा, कैसे सब मैनेज होगा, कुछ नहीं पता, सब कुछ हमेशा की तरह अस्तित्व के सहारे। अब जब हम कुछ सोच लेते हैं तो फिर कर ही लेने वाले हुए। समय कीमती है, बाद में पैसे आ जाएंगे, सुविधाएँ इकट्ठी हो जाएंगी, लेकिन ऐसा उत्साह नहीं रहेगा, ऐसा जुनून दुबारा पैदा नहीं होगा, इसलिए जो जब मन करे उसी समय कर लेना चाहिए।
Wednesday, 25 August 2021
ब्राउन मुंडे -
उदयपुर में मेरा तीसरा दिन था। जिस हॉस्टल में रूका था, वहाँ एक कर्नाटक का भाई मिला, वो भी मेरी तरह भारत के अलग-अलग कोनों में अकेले घूम रहा था, घूम क्या रहा था, लोकेशन बदल बदल के काम कर रहा था, अधिकतर ये वर्क फ्राॅम डेस्टिनेशन वाले ही मुझे मिले। सप्ताह के पाँच दिन लैपटॉप के सामने और बाकी दो दिन इधर उधर घूमना और इसी में लोकेशन चेंज करने का काम भी करते हैं। मेरा घूमना अलग तरह का था, मैंने जिन्दगी से अपने हिस्से के 135 दिन चुराए थे।। खैर...।
शाम ढलने के बाद कर्नाटक के उस दोस्त के साथ हम गणगौर घाट गये। गणगौर घाट में जा ही रहे थे कि रास्ते में वहीं कुछ लड़के घाट पर बैठे थे वे ब्राउन मुण्डे गाना गा रहे थे, मैंने तो ध्यान नहीं दिया था। कर्नाटक वाले दोस्त ने ही कहा - अखिलेश भाई तुमने नोटिस किया कुछ। मैंने कहा - नहीं। उसने फिर बताया कि वे लड़के उसके रंग को देखकर जान बूझकर ये गाना गाकर बुली कर रहे थे, मैं भी सोचने लगा कि ब्राउन मुंडे गाना गाने से किसी के साथ रंग के आधार पर विभेद कैसे हो। फिर दोस्त ने जवाब में कहा- यार मैं बहुत फेस किया हूं, तुम फेस नहीं किए हो इसलिए नहीं समझ पाओगे कि कौन से शब्दों का इस्तेमाल कर बुली किया जाता है।
वापसी में गणगौर घाट से हम जाने लगे, लड़कों का झुण्ड वहीं था, दोस्त ने कहा कि भाई दूसरे रास्ते से चलते हैं, अगर उस रास्ते गये फिर उन्होंने कुछ कह दिया, मेरा और दिमाग खराब होगा, क्या पता मारपीट झगड़ा भी कर लूं और अभी झगड़ा करने का मन नहीं है, चलो कहीं और सुकून से बैठा जाए। और फिर हम अम्बराई घाट चले गये।
#allindiasolowinterride2020
धर्मशाला गुरूद्वारों की तर्ज पर मुफ्त क्यों नहीं हो सकता -
धर्मशालों में मुफ्त रहने की व्यवस्था करने की बात मैंने एक बार छेड़ी थी। फिर समझ आया कि यह उतना भी आसान नहीं है।
पहले गुरूद्वारे के बारे में बात कर लेते हैं, गुरूद्वारे में रहना खाना मुफ्त होता है, आप मुफ्त में रहिए, लंगर खाइए। स्वेच्छा से लंगर में आप बर्तन धोने या खाना बाँटने की सेवा दे सकते हैं, या फिर आगंतुकों का चप्पल रखने की सेवा भी दे सकते हैं, या फिर गुरूद्वारे में झाडू़ पोछा साफ सफाई वाला काम कर सेवा कर सकते हैं, आप मुफ्त में रहने खाने के बदले कुछ नहीं भी करते हैं तो भी कोई समस्या नहीं। ऐसा करने वाले लोग भरे पड़े हैं। कई बार आपका चप्पल उठाने वाला या आपकी थाली माँजने वाला अरबपति भी हो सकता है।
अब धर्मशाला के बारे में बात करते हैं, अमूमन धर्मशाला अलग-अलग जाति के लोगों ने जिनमें व्यापारी वर्ग बहुत आगे रहा उन्होंने ही बनाया, जो मंदिरों या तीर्थस्थानों से संबध्द धर्मशाले रहे उन्हें वहीं के पुरोहित संचालित करते रहे। हरिद्वार ऋषिकेश जैसी जगहों में तो लगभग हर जाति का अपना धर्मशाला है। धर्मशालों में ऐसा कुछ भी सिस्टम नहीं होता जिससे लोग एक जगह जुड़ते हों, लंगर जैसी व्यवस्था नहीं होती तो साथ खाने, साथ बर्तन माँजने जैसी व्यवस्था भी संभव नहीं है।
रहने की बात पर अब आते हैं, धर्मशालों में बढ़िया कमरे बने होते हैं, कहीं कहीं होटल के बराबर सुविधा होती है जबकि गुरूद्वारों में अमूमन ऐसी सुविधा नहीं होती है, आप कहीं भी पसर जाइए, बेडिंग का सामान जरूर मिल जाएगा। कमरे और होटल जैसी सुविधा कई बार मिलना मुश्किल होता है। लेकिन मजे की बात देखिए, गुरुद्वारों में चूंकि सेवा का भाव सर्वोपरि होता है तो साफ सफाई खूब होती है जबकि धर्मशालों में सेवा का भाव नदारद रहता है इसलिए आप पाएंगे कि वहाँ ज्यादा गंदगी देखने को मिलती है, जिम्मेदारी का भाव रहता ही नहीं है कि साफ सफाई रखनी चाहिए। शराब और नाॅनवेज को लेकर तो सख्ती रहती है, लेकिन ये सख्ती गूड़ाखू, तंबाखू, गुटके वालों पर कभी लागू नहीं होगी, जगह-जगह दीवार भगवा किए जाते हैं।
धर्मशाला भी हिन्दुओं के लिए मुफ्त हो सकता है, अभी के लिए सिर्फ उन्हीं धर्मशालों की बात करते हैं जो मंदिरों से संबध्द हैं। हमने देखा कि अधिकांशत: हिन्दू खूब दान करते हैं, चाहे कारण आस्था का हो या कुछ और लेकिन दान के मामले में हिन्दू सिखों से भी एक कदम आगे हैं। इतना बड़ा देश, हिन्दुओं का इतना बड़ा प्रतिशत, मंदिरों में करोड़ों लोग जाते हैं, इतने लोगों का दान, इतना बड़ा सहयोग, आराम से उनके लिए मुफ्त निवास और मुफ्त भोजन की व्यवस्था की जा सकती है। लोग ऐसे में दिल खोलकर दान भी देते हैं, वैसे भी देते ही हैं, सुविधा मिलेगी तो देंगे ही देंगे। वैष्णो देवी ट्रस्ट इस मामले में सही काम कर रहा है, उसमें भी एक मजे की बात ये कि वैष्णो देवी ट्रस्ट में सिख समुदाय का बड़ा योगदान है।
तस्वीर : धर्मशाले के इस कमरे का एक दिन का किराया 600 रूपए था, पंडिज्जी ने मुझ सोलो ट्रेवलर को 400 रूपए में दे दिया। कमरे में टीवी भी था, साफ सफाई भी बढ़िया, खिड़की खोलते ही बाहर गंगा नदी की कल-कल करती जलधारा। इस कमरे में 2 डबल बेड हैं, यानि बहुत ही आराम से 4 लोग रूक सकते हैं, बिल्कुल किसी होटल की तरह एक बड़ा सा बाथरूम भी था।
कुमाऊं के एक धर्मशाले में
भारत घूमते हुए एक धर्मशाले में रूकना हुआ। धर्मशाला की जैसी प्रक्रिया होती है कि एक पहचान पत्र और कुछ एडवांस जमा करना होता है, वह मैंने किया। आधार कार्ड से मेरा नाम देखने के बाद रजिस्टर में एंट्री करने वाले ने कहा और अप्रत्यक्ष रूप से जाति पर बात छेड़ने लगा - मैंने जान बूझकर सीधे झूठ कह दिया कि ST हूं, कमरा मिलेगा न? वे कुछ सेकेण्ड के लिए चुप हो गये। बड़ी-बड़ी आँखों से देखने लगे।
मैंने इस एक चीज को अपनी आदत में शामिल कर लिया है, कि जब भी कहीं कोई जाति पर बात करता है, मैं भारत का जो सबसे पिछड़ा सबसे नीचे जो होता है, कोशिश करता हूं कि वही बताऊं। कई बार इस वजह से बेवजह बहुत परेशानियाँ झेलनी पड़ती है लेकिन यह सब देखने समझने के लिए ही तो मैं ऐसा करता था, इस बार भी वही किया। देखना चाहता था कि कहाँ किस स्तर तक पिछड़ों के साथ हिंसा होती है। इस एक आदत ने मेरे अंदर के पूर्वाग्रह को बहुत हद तक तोड़ा।
मैं उस धर्मशाले में वैसे तो एक दिन रूकने के लिए गया था, लेकिन एक दिन और रूकने का मन हो गया। अमूमन धर्मशालों में आप अधिकतम तीन दिन ही रूक सकते हैं। बहुत बढ़िया धर्मशाला था, सुबह 6 बजे ही आरती हो जाती थी, बहुत ही कर्णप्रिय, घंटियों की आवाज से नींद खुलती थी। खिड़की के सामने ही हिमालय के दर्शन होते थे।
धर्मशाला में जहाँ काउंटर था, जहाँ रसीद काटा जाता था, उसी कमरे में ही वाटर कूलर था, जहाँ गर्म पानी मिल जाता था, क्योंकि ठंड का समय था, और पहाड़ों में ठंड के मौसम में ज्यादा ठंडा पानी पीना बीमार कर देता है। एक तो मुझे प्यास बहुत लगती है, वाटर कूलर के खूब राउंड लगाना हो जाता। उसी कमरे में कई बार रसीद काटने वाले भाई साहब घूर के देखते लेकिन कुछ ना कहते। जब जाता हमेशा घूरते लेकिन चुप रहते।
जिस दिन मैं चेक आउट कर रहा था, उस दिन जमा पैसे वापस लेने के बाद मैंने कहा - भाईसाहब आपने जाति पूछी थी न, मैं ST नहीं हूं, वो तो बस ऐसे ही कह गया था। यह सुनकर वे हँसने लग गये, फिर वे जो इतने दिन मुझसे कटे कटे से थे, बहुत रूचि दिखाते हुए चर्चा करने लग गये कि मैं कहाँ-कहाँ घूम रहा हूं। मैंने थोड़ी देर बात की उसके बाद कहा - देर हो रही है, चलता हूं। फिर उन्होंने कहा - दुबारा कभी आओ तो यहीं आना। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि कभी कोई धर्मशाला वाला ऐसे न्यौता नहीं देता है, अमूमन यह काम होटल वाले ही करते हैं। 😊
तस्वीर - शाम को खिड़की से हिमालय का दृश्य
#allindiasolowinterride2020
Lets talk about bikes -
To all the people who came up with doubts before purchasing any bike -
1. बजाज की बाइक्स कूड़ा हैं, रद्दी हैं, कबाड़ हैं, सब। सब की सब। लेकिन खूब बिकती हैं क्योंकि भारतीयों को भारतीय कंपनी का कूड़ा पसंद है। और हाँ पल्सर महारद्दी है, इसलिए देखना सबसे ज्यादा बिकती है।
2. राॅयल इनफील्ड इस कूड़ेपने में दूसरे नंबर पर है, भारतीय कंपनी जो है। एक हिमालयन थोड़ी कम खराब है बाकी सब रद्दी। भंगार के भाव वाला मेटल क्वालिटी। लेकिन इसे भी भारतीय खूब पसंद करते हैं क्योंकि भंगार पसंद है। फूहड़ आवाज के दीवाने हैं।
3. टीवीएस, इसको चीटर कहूंगा तो लोगों को बहुत बुरा लग जाएगा लेकिन हकीकत यही है। इसने सुजुकी कंपनी को तो चीट किया ही, अपने कस्टमर को भी बढ़िया चीट करता है, लेकिन जितनी भी भारतीय कंपनियाँ हैं, उनमें ये अभी के समय में सबसे बेहतर काम कर रही है। ध्यान रहे बेहतर शब्द मैं सारी चीजों को ध्यान में रखते हुए कह रहा हूं जिसमें खरीदी बिक्री, मेटल पार्ट गाड़ी की लाइफ सब कुछ आ जाता है।
4. हीरो, गाँव घर में रहते हो तो ले लो भाई। सस्ता और टिकाऊ है। इस एक पक्ष को देखें तो बाकी सारी भारतीय मोटरसाइकिल कंपनियों से बेहतर है। आम लोगों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए सामान देता है। होण्डा को इसने वैसा चीट नहीं किया जैसा टीवीएस ने सुजुकी के साथ किया इसलिए यह टीवीएस की तरह आगे नहीं बढ़ पाया। दोनों हीरो और होण्डा भारत में औंधे मुंह गिरे। एक हिसाब से देखें तो ये चीज भी अच्छी है कि टीवीएस की तरह सामंती चरित्र इस कंपनी का कभी नहीं रहा।
ये भी सोचने वाली बात है कि विदेशी कंपनियाँ भारतीय कंपनियों के साथ करार तो करती हैं, लेकिन सामंती मानसिकता को वे भी कब तक झेलेंगे, इसलिए एक समय के बाद अनुबंध खत्म कर लेते हैं। वो कहते हैं न नकल के लिए भी अकल चाहिए फिर वही होता है। गाड़ी की पूजा करके पूरी दुनिया में दुर्घटना में नंबर वन चलने वाले देश में विज्ञान अभी भी दूर की कौड़ी है।
ऊपर जिन भारतीय कंपनियों का जिक्र है, इनकी गाड़ियाँ भारत में खूब बिकती है, बहुत खराब भी होती है, रिपेयरिंग का खूब खर्चा पड़ता है, अपने कस्टमर को ये लोग खूब मूर्ख बनाते हैं। ध्यान रहे, गाड़ी खरीदने का खर्चा छोटा है, रिपेयरिंग का खर्चा बड़ा है। लेकिन कूड़ा पसंद भारतीयों को क्वालिटी कहाँ चाहिए होती है। हर जगह सस्ते के चक्कर में कबाड़ उठा लाते हैं।
Note : Thoughts expressed in this post is totally subjective, so if it is affecting someone's sentiment, it's your problem, i am not responsible for your dilemma.
Peace Out.
Monday, 12 July 2021
लंबी यात्रा में खान-पान की समस्या -
लंबी यात्रा में खाने की समस्या हर किसी के साथ होती है, सालों से एक ही पैटर्न में खाना खाते हुए आपके जीभ की जैसी कंडिशनिंग बनी हुई होती है, उस हिसाब से खाना घूमते वक्त मिलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन मेरे साथ खाने को लेकर कोई कंडिशनिंग नहीं रही, अगर रही भी तो हमेशा तोड़ा, बदल-बदल कर खाता रहा। इस वजह से भी साढ़े चार महीने लगातार भारत घूमते हुए बहुत सहूलियत हुई।
दूसरा एक सकारात्मक पक्ष यह भी रहा कि 135 दिनों में लगभग 100 से अधिक दिन मैंने रोज फल खाया होगा। जिन मित्रों के यहाँ लंबा रूकना हुआ, वहाँ भी बराबर फल का भोग लगाया गया। बाकी कुछ दिन जो रह गये हैं वह इसलिए क्योंकि जो 20-30 दिन सुदूर ठंडे पहाड़ी इलाकों में रहा, तो उस मौसम में फल की कमी महसूस ही नहीं होती है। मोटा-मोटा देखा जाए तो लगभग रोज मौसमी फल मेरे भोजन का हिस्सा रहा। लोग 5 दिन के लिए घर से निकलते हैं तो जितना सामान लेकर चलते हैं, मेरे पास उतना ही सामान था, लेकिन बैग में मौसमी फल के लिए हमेशा जगह बनाकर चलता रहा।
इन सब के बाद भी जब आप लगातार बाहर का खाना खा रहे होते हैं, तो एक समय आता है जब आपको घर के खाने की याद आती है, घर यानि जरूरी नहीं कि आपका ही घर हो। घर किसी का भी हो सकता है, आपके कोई परिचित भी हो सकते हैं। ढाबा और होटल में लंबे समय तक खाने के बाद जीभ घर में बने खाने की माँग करने लगता है। वह इसलिए क्योंकि एक ढाबा या होटल वाला आपको कितना भी अच्छे से खिलाए, वह बेचने के लिए खिलाता है, लोगों को खाना खिलाना उनका व्यवसाय है। लेकिन आप किसी के घर में खाना खाते हैं, वहाँ यह भाव नहीं रहता है, वहाँ सिर्फ खिलाने का भाव रहता है। इसी भाव का बहुत बड़ा अंतर है।
इसके लिए भी मैंने एक तोड़ निकाला, जहाँ कहीं लंबे समय तक रूकना हुआ वहाँ मैंने टिफिन सेंटर और मेस खोजा, कहीं कोई दीदी कोई परिवार घर में बैठाकर खाना खिला रहा है, रेट होटलों से अपेक्षाकृत कम भी होता है और ऐसे जगह के खाने में घर वाले खाने का भाव मिल भी जाता है।
हाथ में माल्टा (किन्नू) है, और यह एक धर्मशाला की तस्वीर है, तस्वीर में जितना हिस्सा दिख रहा है, इतना बड़े हिस्से में सर्वसुविधायुक्त बाथरूम भी था, गर्म पानी की सुविधा भी थी, दो लोगों के रहने लायक पर्याप्त सुविधाएँ थी, दो बढ़िया सोफे और एक टी-टेबल भी था, बेड और कंबल भी एकदम साफ सुथरा, यानि बिल्कुल एक किसी अच्छे होटल की तरह, अमूमन धर्मशालों में ऐसी सुविधा नहीं होती है। और बाहर बैठने के लिए एक बड़ा सा लाॅन भी था। भारत भ्रमण में जितने भी धर्मशालों में रूका, उनमें सबसे बढ़िया धर्मशाला यही था।
#allindiasolowinterride2020
Friday, 9 July 2021
बैंगन वाली मैगी -
जम्बूद्वीप का राष्ट्रीय भोज मैगी वैसे तो हर जगह अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है, पाँच छ:ह तरीके मुझे खुद आते हैं, लेकिन मैगी में बैंगन भी डालते हैं ये मैंने पहली बार देखा। धनौल्टी में खाई गई मैगी की यह तस्वीर प्रतीकात्मक है, इसका बैंगन वाली मैगी से कोई संबंध नहीं है।
तो हुआ यूं कि उस दिन मैं दिल्ली से आगरा जा रहा था, सिर्फ ताजमहल देखने नहीं, आगरा देखने जा रहा था, बहुत सारा पेठा भी तो खाना था। आगरा पहुंचने के बाद अगली सुबह नाश्ता करने एक जगह रूका। मेरी हमेशा से आदत रही है कि खान-पान को लेकर बहुत ज्यादा नखरे नहीं रहते हैं, जो जैसा मिला चुपचाप खा लिया। शरीर भी बिना नखरा किए हर तरह का खाना पचा लेता है। तो एक जगह कहीं बैठ गया तो जो ठीकठाक मिल गया, खा लेता हूं, कौन फिर दूसरी जगह जाए, समय बर्बाद करे, ऊर्जा बर्बाद करे। तो ऐसे ही एक रेस्टोरेंट में बैठा था, मैन्यू देखा तो मैंने कहा - आलू पराठा बन जाएगा क्या? अब पता नहीं मेरा यह सवाल उस रेस्टोरेंट के मालिक और उसके वर्कर तक अलग-अलग तरीके से पहुंच गया होगा। मेरे इतना कहने पर वर्कर आया, उसने कहा - हाँ बन जाएगा। मैंने कहा - अच्छा ठीक है रूको बताता हूं। फिर मैंने उसे दो मिनट बाद बुलाकर कहा - एक वैज मैगी बना दो। वह चला गया।
कुछ देर बाद मैं क्या देखता हूं कि मेरे टेबल के सामने आलू पराठा है।
मैंने कहा - भाई मैगी कही थी, आलू पराठा का बस पूछा था।
मालिक ने उसे जोर का डांटा और कहने लगा - अबे! ज्यादा सुनता है क्या, चल मैगी बना।
मैंने मालिक को कहा - कोई समस्या नहीं, पराठे भी छोड़ जाओ वो भी खा लूंगा, अगर यह नहीं निकलेगा तो।
मालिक ने कहा - नहीं, ठीक है। मैगी बन जाएगी।
कुछ देर बाद मेरी वैज मैगी बनकर आई। उसकी तस्वीर तो मैं नहीं ले पाया था, लेकिन उसका जो हुलिया था, यहाँ लिखकर बता रहा हूं। थाली के शेप की प्लेट में फैला हुआ था। पीला, हरा, लाल, भूरा, बैंगनी क्या रंग नहीं था उस मैगी में। चम्म्च से कुरेदने पर पता चला कि उसमें सिर्फ बैंगन ही नहीं है बल्कि चुकंदर, हरा मटर, प्याज और पत्तागोभी भी है, इन सब्जियों ने मैगी के साथ उबलते हुए गलते हुए क्या कहर ढाया होगा, कैसा रस छोड़ा होगा, अंदाजा लगाइए। स्वाद का तो अब क्या ही कहूं मैं, आज भी याद करता हूं तो ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे स्वाद कलिकाओं को नोच रहा है, फिर भी मैंने उन रंग बिरंगे असास्वादिक तत्वों को हटाकर थोड़ी बहुत मैगी खा ली, अब भूख भी लगी थी, पराठा भी वापस जा चुका था, दुबारा बोलने का मन भी नहीं किया, खान-पान को लेकर नखरे ना के बराबर ही रहते हैं लेकिन उस दिन तो परीक्षा ही हो गई थी। बाकी उत्तराखण्ड हिमाचल के पहाड़ों में बनने वाली वैज मैगी की बात ही कुछ और है। और रही बात मैगी के प्रकार की तो आप मुझे लैमन मैगी बनाने का कोनॅस्यर कह सकते हैं। ताजी मूली की टापिंग्स वाली मैगी की रेसेपी की चर्चा कभी और।।
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| Veg maggi in Dhanoulti, Uttarakhand |








