Showing posts with label My Diary. Show all posts
Showing posts with label My Diary. Show all posts

Friday, 3 November 2017

~ कुकुरमुत्ता ~

             साल भर बाद जब मैंने अखबार पढ़ना शुरू किया तो जिस शब्द पर आकर रूका वो है कुकुरमुत्ता। कुकुरमुत्ता यानि मशरूम। जो पैरा(पुआल) में उगता है। लेकिन कुकुरमुत्ता जो इतना स्वादिष्ट होता है और जो मेरी पसंदीदा सब्जियों में से एक है इस एक शब्द को लेखकों, कवियों, स्तंभकारों, विचारकों, नीति-निर्माताओं द्वारा आए दिन अपमानित किया जाता है। अपमान इसलिए कि कुकुरमुत्ता जो खासकर पुआल में होता है उसके उगने का भी एक खास सीजन होता है बरसात का फिर भी कुकुरमुत्ते को साल भर अपमान सहना पड़ता है। कुकुरमुत्ते से बेहतर ये होता कि बेशरम के पौधे या नागफनी को संदर्भ के तौर पर लिया जाता, वैसे भी ये पौधे कहीं भी कभी भी उग आते हैं, ज्यादा पानी की जरूरत भी नहीं। और तो और साल भर लहलहाते रहते हैं। फिर भी फजीहत कुकुरमुत्ते की ही होती है।

आजकल कुकुरमुत्ते का संज्ञा रूप में कुछ इस तरह उपयोग किया जा रहा है---
जैसे कि -
-  कुकुरमुत्ते की तरह उगे कालेज, विश्वविद्यालय।
-  कुकुरमुत्ते की तरह उगे निजी संस्थान एवं कोचिंग सेंटर।
-  कुकुरमुत्ते की तरह उगते न्यूज चैनल, वेब पोर्टल और अखबार।
- कुकुरमुत्ते की तरह उगते अन्य व्यवसाय।

अच्छा इनमें कहीं भी आपको सरकारी संस्थान नहीं दिखेंगे। पता है क्यों? क्योंकि सरकारी संस्थान न तो कुकुरमुत्ते की तरह उगते हैं, न ही बेशरम के पौधे की तरह अपनी जड़े फैलाते हैं, ये तो रेलपटरियों पर पसरे गूं की तरह होते हैं। अनवरत देश सेवा करते हैं।

Friday, 27 October 2017

~ सभ्यता की निशानी ~

- पहले लोग मिलकर चर्चाएँ करते थे आज आनलाइन ग्रुप चैट होता है ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग दुकानों में जाकर पहले बातचीत करते एक दूसरे का हाल पूछते, फिर खरीददारी करते, आज वे व्यस्त हैं अपने खोखलेपन में, अब वे क्लिक कर अपने पसंद की चीजें मंगाते हैं और थोड़ा सस्ता पाकर एक पूरे समाज से अलग-थलग हो जाते हैं ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग अपने मनोरंजन के लिए मिल-जुलकर इकट्ठे होकर मेलों में जाते, जादू का शो देखते, सर्कस की कलाबाजियां देखते, आज सब अकेले यूट्यूब देखते हैं, ये तो सभ्यता की ऊंचाइयां हैं।

- पहले लोग अगर थोड़ी सी पढ़ाई कर ज्ञान अर्जित करते तो उसका उपयोग देश, परिवार, समाज की भलाई में लगा देते। आज खूब सारी पढ़ाई कर, डिग्री एवं उपाधियां लेकर भी ज्ञान की उपयोगिता शून्य है, ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग वर्तमान अव्यवस्थाओं को ठीक करने के प्रयास हेतु पढ़ाई-लिखाई करने का फैसला लेते, आज किताबों के सहारे व्यक्तिगत बुलंदियां हासिल की जाती है। ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग मिट्टी और पेड़-पौधों के संपर्क में रहते थे,  उनका जीवन सरल हुआ करता था, आज कांच से घिरे चिकने मार्बल के घरों में रहते हैं। शरीर का मिट्टी से कोई संपर्क ही नहीं। ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग महीनों तक पैदल यात्राएं करते थे और अपनों को समय भी देते थे, आज घंटे भर में हजार किलोमीटर की यात्रा कर लेते हैं फिर भी समय का अभाव है, ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोग अधिक से अधिक खुली हवा में रहते, घरों में भी हवा के आने-जाने के लिए खुली जगह होती। आज लोग सीलपैक कमरों में खुद को बंद कर खुश हो लेते हैं। ये तो सभ्यता की निशानी है।

- पहले लोगों में अपने मत को लेकर कोई मनमुटाव होता तो वे एक दूसरे का चेहरा न देखते, बातचीत खत्म कर देते, आज लोगों में मनमुटाव या खींचातानी होती है तो वे एक-दूसरे को आज जगह-जगह से ब्लाक करते हैं। क्योंकि देखना, मिलना, बातें करना, इन सब चीजों की संभावनाएँ ही मर चुकी हैं। ये तो सभ्यता की चोटी मानी गई है।

- पहले लोगों के पास गांव में बड़ा घर होता था, आंगन और चौपाल होता था, लोगों का हूजूम इकट्ठा होता था, आज लोग बंद माचिस के डिब्बे जैसे घरों में रहकर खुद को ज्यादा सभ्य मान लेते हैं। ये तो सभ्यता की ऊंचाइयां हैं।

- पहले लोग अकेलेपन से या अभावग्रस्त जीवन में रहकर भी कुछ नया आविष्कार कर लेते, आज तमाम सुविधाओं के बावजूद तनाव के शिकार हैं। ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले जब लोग कुछ नया सीखते, जानते तो वे प्राप्त मूल्यवान तत्व को लोगों में बांटकर अपने हिस्से का आत्मिक सुख पा लेते और फिर से किसी नयी खोज में लग जाते। आज पहले पैटेंट और कापीराइट किया जाता है ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले जब लोग अपने मनोरंजन के लिए कोई खेल खेलते तो वह खेल मिट्टी, पानी,पेड़-पौधों से जुड़ा हुआ रहता, वे इसी के इर्द-गिर्द बने रहते लेकिन आज खेलने के लिए पैसा चुकाया जाता है, आत्मा का सौदा होता है, ये सभ्यता की निशानी है।

- पहले जब लोग कुछ हासिल करने की जद्दोजहद में खुद को लगाते तो वे अपने मूल को बचाकर संजोकर रखते, आज अपनी आत्मा बेचकर सफलता नामक दीमक का स्वाद लिया जाता है। ये तो सभ्यता की निशानी है।

Friday, 13 October 2017

अकेले रहने से बचें -

                            अकेले रहना और अकेले चलना दो बहुत अलग चीजें हैं। आप अकेले अपनी राह में चलने के लिए कुछ समय के लिए खुद को अकेला रखते हैं सो ठीक है पर एक समय से ज्यादा अकेले रहना नुकसान ही करता है। हां इस मामले में कुछ एक अपवाद हो सकते हैं जिन्हें सालों तक अकेले रहकर फायदा पहुंचा हो। पर घर परिवार दोस्त यार यानि लोगों के बीच बने रहने में ही सच्चा सुख है।

एक लंबे अरसे से अकेले रहने के बाद अब यही जान पड़ता है कि---

- तकलीफदेह हो जाता है अकेले रहना जब आप अपने ही हाथ के बनाये गये खाने से ऊबने लगते हैं।
- एक कठोर तपस्या के समान हो जाता है अकेले रहना जब आप बीमार पड़ जाते हैं और आपकी खबर लेने वाला कोई नहीं होता।
- जब कभी आप पर दुःखों का पहाड़ आ जाता है तो एक भी व्यक्ति आपको सुनने समझने के लिए पास नहीं होता।
- इन सब के बीच एक तकलीफ ये कि आप खुद को ही भूल जाते हैं और दूसरों को ही भगवान मान लेते हैं और बिना कुछ सोचे-समझे उनकी सारी समस्याएं अपने कांधों पर उठाने लगते हैं।
- आपको जब किसी चीज की आवश्यकता होती है फिर उसके ना होने पर आप खुद को छोटा करने लगते हैं। ऐसा करते हुए आप जीवन के प्रति कुछ हद तक नीरस होते हुए पाए जाते हैं।
- चूंकि आपने लंबे समय तक अकेले रहकर बहुत कुछ हासिल किया होता है लेकिन कई बार वो जमाने के बनाए खांचो के अनुकूल नहीं होता। इसलिए आप बहुत कुछ अच्छा कर रहे होते हैं फिर भी आप को दुत्कारा जाता है।
- अकेले रहने से इस सच को घुट्टी बनाकर पी जाना होता है कि हमने ये रास्ता चुना है अब जो भी समस्या आएगी उसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम होंगे।

आखिरी बात ये कि अकेले रहने के लिए एक अलग ही स्तर की मानसिक कंडिशनिंग और हिमालय सा हौसला चाहिए होता है जो सबमें नहीं होता है।

Monday, 2 October 2017

~ आंकड़े ~

आंकड़े,
आंकड़े जिनसे हो जाता है शहर स्वच्छ,
आंकड़े जिनसे गांव के गांव शौचमुक्त हो जाते हैं,
आंकड़े जो कर देते हैं खेतों की सिंचाई और उन्नत पैदावार,
कुछ यूं आंकड़े ही हमारा पेट भर जाते हैं।
महंगाई, गरीबी को कम करते ये आंकड़े,
शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाते आंकड़े,
रोजगार का सृजन करते ये आंकड़े,
आय की असमानता दूर करते ये आंकड़े,
अमीर-गरीब का फर्क मिटाते ये आंकड़े,
दंगों, हिंसाओं का सच बताते ये आंकड़े,
नदियों की सफाई का ब्यौरा देते आंकड़े,
विकास का लक्ष्य साधते ये आंकड़े,
आंकड़ों से, इन्हीं आंकड़ों से ही तो देश का भविष्य(जीडीपी) तैयार हो जाता है।
सौ बड़े झूठ मिलकर भी जहाँ छोटे पड़ जाते हैं ऐसे बलवान होते हैं ये आंकड़े।

Sunday, 24 September 2017

- दिखाई ना देने वाले रेप -

                   भारत में आये दिन रेप होते हैं। कभी हिंसा की मात्रा अत्यधिक होने पर, कभी कुछ नये तरीके से इस घटना के घटित होने पर या अन्य किसी कारण से जब रेप होता है तो हम देखते हैं कि मामला जन-जन तक अपनी पहुंच बना लेता है। हमें खबरें मिलती है, हम अपने-अपने तरीके से संवेदना जाहिर करते हैं और रेप के कारणों को बिना समझे सख्त कानून की मांग करने लग जाते हैं। जबकि हमने कभी इस समस्या को जड़ से समझने का साहसिक प्रयास नहीं किया होता।

सामान्य समझ के आधार पर हम देखें तो रेप का मतलब हमारे लिए ये होता है कि जैसे--
- एक व्यक्ति ने किसी महिला को अकेले पाकर उसकी अनुमति के बिना, शारीरिक बल या हिंसा के माध्यम से उसकी अस्मत लूटी और भाग निकला,या फिर एक और पहलू ये कि जैसे लोगों की भीड़ ने नशे या आवेश में आकर अपने क्षणिक सुख के लिए किसी महिला को जबरन घेरा और जानवरों की तरह नोच डाला। इस तरह की जो भी घटनाएँ हमारे आसपास घटती है उसे हम रेप कहते हैं। और फिर अमुक व्यक्ति को सजा-ए-मौत दिलाने की मांग करने लग जाते हैं।

लेकिन ये सजा की माँग करने वाले लोग हैं कौन?
आप और हम।
हां आप और हम जिसने कभी ऐसी समस्याओं को जड़ से समझने का न तो कोई भगीरथ प्रयास किया और न ही इसके समाधान की ओर कभी ध्यान दिया। हमारे लिए रेप के मायने सिर्फ उतने ही हैं जितना ऊपर अभी लिखा हुआ है। असल में रेप की जड़ यहाँ ऐसे किसी एक घटना से जुड़े कारणों में है ही नहीं। रेप का जड़ हमारे आसपास गली मोहल्लों में होता है, आपके हमारे घर में इसका बीज तैयार होता है।
हम खुद आए दिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी का रेप कर देते हैं इसलिए हमें इसका समाधान दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता या यूं कहें कि असंभव सा लगता है।

अब सवाल ये आता है कि भई हमने तो किसी के साथ जोर जबदस्ती की नहीं तो फिर हमसे कैसे रेप हो गया।
हां तो सुनिए ---

- रेप तब भी होता है जब एक लड़की को उसके मनमौजी अंदाज से, श्रृंगार के तरीकों से, लड़कों के साथ घूमने से, ज्यादा बोलने या कम बोलने से और ऐसे अन्य कई कारणों से संदेह किया जाता है, सवाल किया जाता है या तमाम तरह की अटकलें लगाई जाती है।

- रेप तब भी होता है जब रोड पर खड़ी हुई लड़की को एक इंसान के दर्जे से हटाते हुए हम आंखों से ही उसे खा जाते हैं और उसे इतना असहज कर देते हैं कि वह नजरें छिपाकर भागने लगती है।

- रेप तब भी होता है जब कोई महिला किसी एक अन्य महिला के शारीरिक बनावट को लेकर चर्चा करती है, उसके चाल चरित्र और पहनावे को लेकर विमर्श करती है। और ये महिलाएँ कौन होती हैं?
उत्तर बहुत ही स्पष्ट है- आपकी हमारी माताएँ, बहनें।
पुरुष निर्वस्त्र कर रेप करते हैं और महिलाएँ चरित्र की परतें छीलकर।

- रेप तब भी होता है जब महिलाएँ अपनी आत्मश्लाघा(अहं) और असुरक्षा के तुष्टीकरण के लिए बातों से ही लड़कियों की इज्जत लूट लेती हैं। इन महिलाओं पर दैवीय कृपा बरसती होगी तभी तो ये महिलाएँ इतनी दिमागदार होती हैं कि किसी लड़की या अन्य किसी महिला को बिना देखे भी उसका चरित्र का निर्धारण कर लेती हैं।

                    ऐसे रेप आए रोज होते रहते हैं लेकिन ये सब हमें कभी दिखाई नहीं देता क्योंकि हमने इसे कभी रेप, रेप छोड़िए हमने इन चीजों को कभी एक समस्या के तौर पर देखा ही नहीं। यानि जब कोई पेड़ जहरीले फल देता है तो हमें फल या डालियों को काटने में समय जाया न करते हुए क्यों नहीं सीधे जड़ उखाड़ने का प्रयास करना चाहिए। हां जड़ उखाड़ने में समय लग सकता है लेकिन अगर इससे हमें इस सामाजिक विद्रूपता से निजात मिलती है तो क्यों नहीं हमें इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए।

Tuesday, 19 September 2017

- तेरे मेरे शहर की बारिश -



A - क्या तुम्हारे शहर में भी बारिश हो रही है?
B - हां।
A - क्या तुमने भी बारिश की बूंदे देखी आज?
B - हां मैंने देखी। पर जैसे ही मैं उन बूंदों में एक एक बूंद अलग से देखने लगती। मैंने देखा कि वो पत्तियों के ऊपर सड़कों पर गिरकर बिखरने लगे थे।
A - अच्छा जब वो जमीन पर आकर गिर रहे थे क्या तुमने उनकी आवाज सुनी?
B - हां मैंने सुनी न। कितनी अलग-अलग आवाजें हैं। कोई बूंद पत्तियों पर आकर गिरती है तो कोई किसी छतरी पर तो कोई किसी की टीन की छत पर।
A - शायद तुम भी मेरी तरह ये सारी आवाजें सुन रही हो। लेकिन क्या तुमने बालकनी में जाकर उन बूंदों को छुआ?
B - अभी तक तो नहीं। मैं  चाय की चुस्कियों में और मेरे कानों में पड़ती ये बारिश की इस धुन के साथ कहीं खो गई थी।
A - कहाँ खो गई थी। क्या वहीं जहां मैं खो गया हूं इन बूंदों को छूकर।
B - हां वहीं।
A - देखो न इन बूंदों के सहारे मेरी तुमसे आज फिर मुलाकात हो गई।
B - हां।
A - अब फिर मुलाकात कब होगी।
B - पता नहीं।
A - कहो न?
B - शायद अब कुछ महीने बाद जब बर्फबारी होगी तो गिरते हुए snowflakes को इकट्ठा कर आंखें बंद कर हम फिर से एक दूसरे से मिलेंगे।
A - मुझे उस दिन का इंतजार है।
B - मुझे भी।

To be continued .....

Saturday, 16 September 2017

- हवा और पानी -

                                पिछले दो-तीन दशकों की अगर बात करें तो पर्यावरण को हानि पहुंचाने के आंकड़ों में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। आपके-हमारे सामने ये साफ दिख भी रहा है। एक भी ऐसा शहर(छोटा, बड़ा कोई भी) नहीं बचा जहां का पानी बिना फिल्टर किए पिया जा सके। हवा दिन-पर-दिन खराब होती जा रही है। आखिर इंसान होने के नाते हमारे जीने के लिए सबसे बड़ी जरूरत क्या है, सबसे बड़ी चीज हवा, उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज पानी। इन दो चीजों की प्रतिपूर्ति के बाद तीसरा है भोजन। तीसरे घटक की गुणवत्ता पहले और दूसरे घटक पर निर्भर करती है। इतनी सामान्य सी बात हम क्यों नहीं समझ पाते हैं। आज गाड़ी उल्टी चल रही है, आज मनुष्य का सबसे अधिक जोर भोजन और रहन-सहन रूपी घटकों पर दिखाई देता है। क्या ये चिंतायोग्य विषय नहीं है?
                                 हमारी पढ़ाई-लिखाई, उपाधियां, योग्यताएं सब धरी की धरी रह जाती हैं। कुछ भी तो काम नहीं आ रहा। बात करने के लिए हमारे पास ढेर सारा किताबी आदर्शवाद है। रटी-रटाई परिभाषाएं हैं। बुद्धि और चेतना के स्तर पर हम मनुष्यों को पशुओं से कहीं ज्यादा कुशल माना जाता है। लेकिन इस बात को कहने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं कि भोग और लिप्सा से युक्त आज मनुष्य पशुओं से भी बदतर हो चला है। उसकी लगभग हर एक दैनिक गतिविधि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली बन चुकी है। और जब मुख्यधारा में यही ट्रेंड चल रहा है तो सरकारें भी अधिकतर पर्यावरण विरोधी नीतियाँ बनाती चली जा रही है और हमें दिखाई भी नहीं दे रहा।
                                  आज फिल्म निर्देशक सामाजिक समस्याओं चोरी, डकैती, बलात्कार, मारकाट, अपहरण, भूखमरी, शिक्षा सुधार, भष्ट्राचार आदि तरह तरह के विषयों पर फिल्म बनाते हैं। पिछले दो दशकों से ऐसी फिल्में लगातार बन रही हैं, वाह! कितने संवेदनशील डायरेक्टर हैं, वे फिल्म बनाते हैं और हम उतने में ही सीमित,उतने में ही खुश। गाड़ियां ब्लास्ट होकर हवा में उड़ रही हैं, बंदूकें चल रही हैं, गोलाबारूद दागे जा रहे हैं।अपहरण, मारपीट और हत्या के नये-नये तरीके इजात कर लिए गए हैं। ऐसे न जाने कितने अद्भुत शौर्य प्रदर्शन। और हिंसा की मात्रा पहले से कहीं अधिक। ऐसी फिल्में चल रही हैं और हम सीना पीट-पीटकर देख रहे हैं। ऐसी चीज देखकर आज हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं। लोगों को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसे हिंसक दृश्य हमारे मनोविज्ञान में कितने गहरे तक असर छोड़ जाते हैं।
                                   सिविक सेंस का भ्रूण ही मार दिया आपने और अब करवाइए आप ऐसे बड़े होते युवाओं से पर्यावरण संरक्षण, करिए रैलियाँ, लगवाइए लाखों पौधे। ये तो वही बात हुई न कि हमें तो बच्चे पैदा करना आता है लेकिन उन बच्चों का लालन-पालन और उनकी परवरिश कैसे करनी है इसका क,ख,ग भी हमें नहीं मालूम।
                                  ध्यान से देखा जाए तो पिछले दशक भर में एक भी ऐसी फिल्म बालीवुड, हालीवुड में, कहीं पर भी नहीं बनी जो इस मूल समस्या पर लोगों का ध्यान खींच सके। बने भी कैसे, ये विषय इतना बड़ा है कि खून पसीना एक कर धरातलीय प्रयास करना पड़ेगा तब जाकर ही कुछ होगा।
                                  हमारी सरकारें या हम(जनता)ये क्यों नहीं समझते कि जहां हवा और पानी का मामला ठीक हो जाए, वहां कृषि और स्वास्थ्य को लेकर कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। आधा काम ऐसे ही हो जाएगा। कितने मुद्दे यूं एक झटके में स्वतः ठीक हो जाएंगे। लेकिन अब तो ये आदर्शवादी बातें भर हैं। क्योंकि हमने, हमारी भूख ने, नाशकारक होड़ ने कुछ ही दशकों में नदियां सूखा दी, तालाब पाट दिए, जंगल के जंगल खा गये हम। तो अब हम ऐसी नीतियाँ बनाएंगे कि लोगों की क्षणिक भूख शांत हो सके। हम जंगलों की कटाई-छंटाई कर लोगों के लिए पार्क, सफारी बनवाएंगे, उनके मनोरंजन के लिए जंगली जानवर इकट्ठे किए जाएंगे। चूंकि हम बहुत ही ज्यादा समझदार, सभ्य और बुध्दिमान हो चुके हैं तो हम नदियों तालाबों और भूमिगत जल के अन्य स्त्रोतों को किनारे कर वाटर पार्क बना देंगे। जगह-जगह फव्वारे लगाएंगे क्योंकि इससे हमारे शहर की रौनक बढ़ेगी, लोग बाहर से आएंगे, देखकर हमारी प्रशंसा करेंगे। भई वाह! क्या सभ्यता की निशानी दे रहे हम हमारी आने वाली पीढ़ी को। आने वाली पीढ़ी तो बस पांव धो-धोकर पीयेगी।
                                 अब क्या यह लिख कर बताना पड़ेगा कि जिन जगहों पर हवा और पानी साफ है वहां के लोगों को किसी प्रकार की कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। वहां लोग ज्यादा खुशी से जीवन यापन करते हैं। इतनी छोटी सी बात को आगे बढ़ाने में हम कैसे चूक गये।
                                 अब चूंकि हम इतने महापंडित और ज्ञानी हैं कि हमने शहर बनाए, मेट्रो बनाए, आज डिजिटल कर दी लोगों की जिंदगी, तमाम सुविधाएं मुहैया करा रहे, स्मार्ट सिटी बना रहे। लेकिन क्या कोई ऐसी सरकार है जो ये बता सके कि क्या कोई ऐसा शहर बनाया जो अपने नागरिकों को मुफ्त में साफ पानी मुहैया कराता है, सांस लेने लायक साफ हवा दे पाता है। देखा जाए तो आज इन दो चीजों के अलावा सरकार हमें सब कुछ दे रही हैं, उठाइए हाथों-हाथ। धूम मचा दीजिए। जैसी हमारी भूख, वैसी सरकार की नीतियाँ। करते रहिए देश की ऐसी की तैसी। कौन रोक रहा है।

Friday, 1 September 2017

बुलेट चलाने वालों से निवेदन -

                     आजकल बुलेट का ट्रेंड चल रहा है। जिसको उतना नहीं भी पसंद वो भी भेड़चाल में बुलेट की सवारी कर रहा है, जिसका चालीस किलो वजन है जो ढंग से गाड़ी ढुला भी नहीं पाता वो भी बुलेट चला रहा है। खैर सबके अपने-अपने शौक है इसमें सही गलत या आलोचना करने का कोई तुक नहीं। वैसे भी भारत में बेवजह कुछ भी ट्रेंड हो जाता है। और हम प्रतिक्रिया देकर इस पूरी प्रक्रिया में रसपान करते रहते हैं। पागलपन, दिखावा, सनक और बेवकूफी से भरे सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने आए रोज दिखते रहते हैं।
खैर बात बुलेट से होने वाले प्रभावों की होनी थी। तो ऐसा है कि बुलेट से, यानि इसकी आवाज से छोटे बच्चों को बहुत नुकसान होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि शोर शराबा करने वाली और भी चीजें हैं, बुलेट पर ही सवालिया निशान क्यों?
                     अच्छा अभी कुछ दिन पहले की एक घटना बताता हूं। मैं एक इडली सेंटर में नाश्ता कर रहा था। वहाँ एक और कोई लड़का साथ में था जो मेरे से पहले आया था और उस के पास बुलेट थी। हम दोनों नाश्ता कर रहे थे तभी दो लोग और आए एक बाप अपनी छोटी बच्ची को लेकर आया था। बच्ची की उम्र एक साल रही होगी, उस बच्ची के पिता ने बच्ची को गाड़ी में ही बिठाया, और इडली पैक कराने आ गये। पिता ने अपनी बिटिया को दस मीटर दूर गाड़ी में अकेले छोड़ दिया है। अब चूंकि बच्चे बाइक के सामने का हैंडल मजबूती से पकड़ कर रखते हैं इसलिए शायद उसके पिता निश्चिंत हैं।
अब बुलेट वाला लड़का नाश्ता खत्म कर उठता है अपनी बुलेट में किक मारता है जोर से एक्सीलेटर देता है और निकल जाता है। सब कुछ पांच सेकेंड में ही हो जाता है।
                     अब ध्यान रहे कि वो एक साल की बच्ची वहीं पास में एक दूसरी बाइक में बैठी हुई है। अब जैसे ही बुलेट स्टार्ट होता है उसकी आवाज सुनकर वो रोने लगती है, और डर के मारे गाड़ी से गिरने ही वाली रहती है कि उसके पापा आकर उसे संभालते हैं। बुलेट वाला कुछ सेकेंड में ही निकल चुका है, और उसके कुछ सेकेंड बाद बच्चे रोने लगती है। इडली पैक कराने में व्यस्त उस बच्ची के पिता को भी समझ नहीं आता कि बच्ची के रोने की वजह आखिर क्या है। अब सोचिए उस छोटी बच्ची पर एक बुलेट की उस क्षणिक आवाज का कितना बुरा प्रभाव पड़ा होगा। वो अंदर से कितना डर गयी होगी, कितना सहम गयी होगी, इसका आप और हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।
                      एक और घटना ठीक कुछ ऐसी ही हुई थी,एक छोटा बच्चा था, लेकिन वो बुलेट की आवाज से बिल्कुल नहीं रोया। लेकिन फिर भी ये घटना ऊपर लिखी पहली घटना से ज्यादा भयावह है। वो ऐसे कि मैंने उस बच्चे का चेहरा देख लिया, उस मासूम से चेहरे पर खामोशी और खौफ के बादल मंडरा रहे थे, कितना डर बैठ गया था उस बच्चे में वो त्वरित आवाज सुनकर। वो इस डर को रोकर बाहर निकाल भी नहीं पाया। इस छोटी सी घटना ने उसके मनोविज्ञान को कितनी चोट पहुंचाई होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। बहरहाल...
ऐसे कितने उदाहरण दे सकता हूं आपके सामने।

                        ये सब कुछ लिखने का मकसद ये है कि बच्चों के दिमाग में इन सब चीजों से अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, एक बार बचपन में कोई बात हो गई या ऐसी छोटी छोटी चीजें, ये सब जीवनपर्यन्त उनके चेतन अचेतन में जमा होकर उन्हें प्रभावित करती रहती है और हमें फिर समझ नहीं आता कि सब ठीक तो चल रहा था ये अचानक बच्चे का व्यवहार ऐसा कैसे हो गया।
                         इसलिए बुलेट चलाने वालों से और जो नहीं चलाते उनसे भी निवेदन है कि इन छोटी-छोटी चीजों का ख्याल किया जाए। वैसे भी बच्चे सबको प्यारे होते हैं, जिन्हें बच्चों से उतना लगाव नहीं होता वे भी बच्चों के बीच जब रहते हैं तो प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं।
                         मुझे तो लगता है एक 12th पास लड़के में भी इतनी समझ तो होती ही है कि बच्चों के सामने ज्यादा न चिल्लाया जाए, उनके सामने झगड़ा न किया जाए, यानि एक उम्र तक उन्हें हर प्रकार की हिंसा, शोर आदि से थोड़ा दूर रखा जाए। बच्चे हमारे कल के कर्ताधर्ता हैं, उनके व्यक्तित्व के निर्माण के इस चरण को लेकर हमारी इतनी न्यूनतम समझ तो होनी ही चाहिए कि हम इन छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान दें, अगर किताबी ज्ञान ही सब कुछ है, और हम इन सब बातों पर ध्यान नहीं दे पाते तो हमें अपने आसपास किसी नदी के एनीकट में छलांग लगाकर मर जाना चाहिए।

Friday, 11 August 2017

- नीम का पेड़ -

                       हमारे घर में पूजा होनी थी। पंडित जी अपनी साइकल से बड़े सबेरे पहुंच चुके थे। बताता चलूं कि पंडित जी हमारे घर लगभग दस साल बाद आए हैं। जैसे ही वे घर पहुंचे उन्होंने कहा - यहाँ एक नीम का पेड़ था क्या?
हमने कहा - हाँ था, पर वो तो कब का उखाड़ दिए।
पंडित जी ने कहा - अच्छा। असल में कहीं भी ऐसे पेड़ रहते हैं तो घर पहचानने में बड़ी आसानी होती है।
                       उनकी बात सुनके लगा कि वाकई ये पेड़ हमारे लिए दशकों से एक लैंडमार्क का काम करते आए हैं। लेकिन बदलते समय के साथ हमारा जो एक रिश्ता पेड़-पौधों के साथ हुआ करता था, उसमें बड़ा बदलाव आया है। जीपीएस ने हमारी स्मरण शक्ति पर रोक लगा दी है। देखा जाए तो हमारी कितनी ढेरों स्मृतियाँ जुड़ी होती है इन पेड़ों से। अब इस एक नीम पेड़ की ही बात की जाए तो बचपन में हम इन पेड़ों से नीम के फल (जिनसे नीम का तेल बनता है) को तोड़कर इकट्ठा करते थे। कभी उन नीम के फलों को इकट्ठा कर कोई नया खेल इजात कर लेते तो कभी उन छोटे-छोटे फलों से एक-दूसरे को मारते। तो कभी पेड़ की छांव में बैठकर वहाँ धूल को साफ कर अपना घर बनाते। तो कभी पेड़ से झड़ते फूलों को इकट्ठा कर उस धूल की क्यारियों से बने घर को सजाते। और फिर पास में कच्चे रेत को एक ग्लास या कटोरे में भरकर नये-नये सांचे बनाते और फिर छोटी-छोटी टहनियों से अपने उस घर को सजाते। हर दिन एक नयापन होता था। सब बच्चे जड़ के आसपास अपना अलग-अलग तरीके से घर बनाते।
हां तो ये धूल और उससे जुड़े खेल खेलना ये सब एक उम्र तक चलता रहा। फिर हम थोड़े बड़े हुए।
                       अब हम थोड़े बड़े हुए तो हमने गुल्ली डंडा, नदी-पहाड़ आदि खेल खेलना शुरू कर दिया। फिर थोड़े बड़े हुए तो क्रिकेट, फुटबाल आदि आदि। लेकिन ये एक श्रृंखला चलती रही सब अपनी उम्र के मुताबिक खेल खेलते रहे।
और इस श्रृंखला का सबसे मजबूत पक्ष क्या था?
यह वो नीम का पेड़ ही था जिसकी छांव में हर उम्र का बच्चा आकर बैठता, खेलते हुए जब थक जाता तो खुद को हमेशा उस पेड़ के नीचे पाता। वो पेड़ हमसे जुड़ा हुआ था, और हम उस पेड़ से जुड़े हुए थे। उस छोटे से खाली मैदान सी जगह में उपस्थित वह पेड़ हमारे जीवन का हिस्सा था, लेकिन एक दिन कुछ कारण से वह पेड़ काट दिया गया। श्रृंखला टूट गयी, अब न उस पेड़ की शीतल छाया थी न ही उसके इर्द-गिर्द खेले जाने वाले खेल और न ही बच्चों की वो पहले जैसी धमाचौकड़ी। उस श्रृंखला में गजब का बिखराव आ चुका था।
                       आपके हमारे आसपास ऐसी न जाने सैकड़ों श्रृंखलाएं टूटती बिखरती रहती हैं, और हम देख भी नहीं पाते हैं। पेड़ CO2 लेकर हमें आक्सीजन देती है, हम आए दिन ऐसी रटी-रटाई चली आ रही बातें करते हुए उसकी महत्ता को सीमित करते रहते हैं। और जब पेड़ कटता है तो हमें लगता है कि बस एक पेड़ ही तो कटा है, लेकिन वो सिर्फ एक पेड़ कहां होता है वो तो हमारी स्मृतियों का एक जीवंत दस्तावेज होता है।
                       अभी कुछ दिन पहले एक अफसर से हमने सुना कि एक-दो पेड़ कट जाता है तो बेवजह कितना हल्ला होता है, दूसरे जगह वृक्षारोपण भी तो रहा है। मतलब बदमाशी की भी एक हद होती है, माने इतना छिछला,धूर्तता से भरा तर्क कोई कैसे दे सकता है, कुछ पेड़ टूटे, एक पूरी श्रृंखला में टूटन हुई , इसकी भरपाई के लिए जो नये पौधे रोपे गये, उन्हें पेड़ बनने में कितने साल लग जाएँगे। और ये जो इतना लंबी खाई बनी ये जो गेप बना, इसकी भरपाई कैसे होगी। इसके लिए क्यों नीतियों की निर्मम समीक्षा नहीं की जाती।
                       हमने देखा कि पेड़ों को बचाने की बात करने वालों को गँवार और पिछड़ा समझा जाता है। सही ही है, आज भी दूरस्थ गांवों में रहने वाला व्यक्ति छोटी टहनियाँ उठाने के लिए दस किलोमीटर तक की पदयात्रा कर लेता है, सचमुच एक गधा और देहाती व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। वो चाहता तो पास के पेड़ों से कुछ टहनियाँ तोड़ लेता, लेकिन दस किलोमीटर दूर जंगल में गिरी हुई टहनियों को उठाकर अपने उपयोग में लाना वो अपनी जिम्मेदारी समझाता है। वास्तव में देखा जाए तो वो पर्यावरण का सबसे बड़े रक्षक होता है। इनकी बुद्धि भी सीमित, तर्कशक्ति और समझ भी सीमित फिर भी इनका सामाजिक विज्ञान, इनका नागरिकशास्त्र हमसे हजार गुना अधिक विकसित। अब चूंकि पर्यावरण को बचाना इनकी जीवनशैली का हिस्सा है तो इन्हें जाहिल गँवार घोषित कर इन्हें हर समस्या के लिए दोषी बनाकर थोपे जाने वाले सारे तर्क एवं प्रतिक्रियाएँ स्वतः ध्वस्त हो जाती हैं।
                      देखा जाए तो आज के समय में जाहिल गँवार देहाती हो जाना या ऐसी उपमाओं से खुद को सुशोभित करना पीएचडीधारी डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने से लाख गुना बेहतर है।
आखिरी बात ये कि हममें से हर किसी के जीवन में ऐसे नीम के पेड़ रूपी कुछ स्मृति चिन्ह होते हैं, उन्हें हमें हर हाल में बचाना चाहिए, बार-बार बचाना चाहिए।

Saturday, 17 June 2017

~ Sex, Marriage and Settlement ~

                                 कोई अगर पूछे कि भारत के युवा पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी समस्या क्या है तो मैं इन तीन शब्दों का नाम लेते हुए कहूंगा कि यही सबसे बड़ी समस्या है और यही सबसे बड़ी बीमारी भी है। असल में ये बीमारी थी नहीं लेकिन इसे कुछ इस तरीके से हमारे सामने परोस दिया गया है कि हम इससे आगे का कुछ सोच ही नहीं पा रहे। हमारी सोच इतनी संकुचित हो चुकी है कि हमारे लिए ये चुनिंदा विषय आज जीवन का अंतिम लक्ष्य तक बन चुके हैं, हम न इसके आगे का कुछ सोचना चाहते हैं न ही कुछ करना चाहते हैं।
हम इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द चर्चा कर खुद को संतुष्ट करने में ही लगे रहते हैं।

                                 अभी कुछ समय से मैं अपने सालों पुराने दोस्तों से मिल रहा हूं। मिलने के बाद ऐसा लगा कि उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य सेक्स, शादी और सैटल होना ही है। एचीवमेंट के नाम पर कोई अपनी होने वाली पत्नी की तस्वीरें, अपने घर, जमीन, गाड़ी वगैरह की बात करता है, तो कोई एचीवमेंट के नाम पर तरह-तरह की लड़कियों की तस्वीरें दिखाने लगता है, जिनसे उसने वर्तमान में संबंध बनाए। इस पूरे पागलपन को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि नौकरी, शादी, सेक्स, घर, गाड़ी बस यही सब में उनकी जीवनशैली सिमट चुकी है। वे न चाहते हुए भी इस बने बनाये पैटर्न से अलग नहीं हो पा रहे, न ही कुछ नया कर पा रहे। उन्हें लगता होगा कि वे बड़ी अच्छी बातें कर रहे हैं, माॅडर्न हो गये, सभ्य हो गये, लाइफ को जीना सीख गये हैं वगैरह वगैरह। लेकिन वे तो जहां थे, वहीं के वहीं हैं, उनकी सोच में आज भी वही पुराना कचरा/मवाद भरा हुआ है। नया कुछ हुआ ही नहीं, नयेपन के नाम पर अगर कुछ हुआ है तो वो ये कि महंगा सा स्मार्टफोन आ गया है, महंगे ब्रांड वाले जूते,कपड़े और लाखों की बाइक, और तो और घर में महंगी कार भी आ चुकी है। यानि इतनी घटिया कंडिशनिंग हो चुकी है कि ये सब के चलते जो सबसे जरूरी चीज थी, मस्तिष्क का विकास, उसमें तो लगभग जंग लग चुका है, रचनाधर्मिता शून्य हो चुकी है।
फिर लगा कि क्या मेरे कुछ दोस्तों के साथ ही ऐसा है, नहीं। हर जगह यही हाल है, कुछ अपवादों को अलग कर दिया जाए तो मुख्यधारा में यही चल रहा है।
                                 आज के युवा के लिए सेक्स किसी लाइफटाइम एचीवमेंट से कम नहीं है, वो इसे जीने-मरने का सवाल बनाने लगा है, उसके लिए दुनिया बस जो है यही है। संबंध बनाओ, खुश रहो, आज ये कल वो, माइलस्टोन सेट करते जाओ। ये सब भारत जैसे लो-मोराॅलिटी वाले देश में ही संभव है।

                                 हवस, भूख और लालसा इतने चरम स्तर पर पहुंच चुकी है कि आज का युवा कैसे न कैसे करके अपने लिए अपार सुविधाएं हथिया लेना चाहता है, रोजगार की घोर कमी के बीच चंद सरकारी नौकरियों के लिए लगी मारामारी इस बात का संकेत है कि फलां को कैसे भी करके एक ठीक-ठाक सरकारी नौकरी चाहिए, हां नौकरी कैसी भी हो चलेगा। पसंद-नापसंद की बात बाद में, जीवन-मूल्यों की बात बाद में, मोटी कमाई और रुतबा होना चाहिए बस। एक बार लग गये नौकरी में, जीवन भर फुर्सत बैठे रहो। कोई किचकिच नहीं। और फिर इसके बाद क्या, सुंदर और सुशील बीवी भी तो चाहिए। सही मायनों में देखा जाए तो ये भी एक अलग ही प्रकार का बिजनेस बन चुका है। पूरे घर-परिवार समाज का ढांचा ऐसा बन पड़ा है कि पैरेंट्स भी बच्चों पर शादी के लिए दबाव बनाने लगते हैं, पढ़ी-लिखी लड़की, अच्छे घर की खोजबीन चालू, यानि एक ऐसा माहौल बन जाता है कि लगता है हम शादी करने के लिए ही इस धरती पर अवतरित हुए हैं, अब यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।
                               आज के पढ़े-लिखे माॅडर्न युवा को भी अपने लिए जीवनसाथी के रुप में एक ऐसी लड़की चाहिए जो खुद नौकरी में न हो और बढ़िया घर में रहे, हमने अच्छे-अच्छे अधिकारियों को ऐसा करते देखा है। वे असल में अपने लिए एक वस्तु खरीद रहे होते हैं डील कर रहे होते हैं, उन्हें असल में शादी के लिए लड़की नहीं चाहिए, एक सुंदर सी भोग्या वस्तु चाहिए। रिश्ता, प्रेम, भावनाएँ हां ये सब तो शादी के बाद आ ही जाएगा, नौकरी का ठाठ है, सब हो जाएगा। लड़कियां भी कम नहीं हैं, उन्हें इस नव-दासत्व में इतना मजा आता है, वे शादी के अगले दिन से ही अपने नाम और सरनेम के बीच अपने पति का नाम जोड़ लेती हैं।

 अब लड़के भी महान, वे इतने महान होते हैं कि जब उनकी वस्तु रूपी पत्नी जब पेट से होती है तो वे दूसरी औरतों से बात करके अपना मन बहलाने लगते हैं। कम नहीं तो ज्यादा अधिकतर यही होता है, कोई पराई लड़कियों/महिलाओं से बातचीत/चैट करके मन बहलाता है तो कोई संबंध बना लेता है।
और लड़कियां भी अपने में मस्त, वो शाॅपिंग करके, सोना-चांदी खरीद के अपने ईगो का बराबर तुष्टीकरण करती है।

                           अब इन सबसे उलट एक तबका खोखले ब्रम्हचारियों का भी है, अब इनमें एक वो जो अपने कालेज लाइफ में मिली प्रेम की विफलता से क्रुद्ध होकर बीस की उम्र में जीवन भर अकेले रहने का फैसला ले लेते हैं, विपश्यना करने लगते हैं और फिर कुछ दिन बाद पता चलता है कि अगला किसी के साथ फिर से रिश्ते में है। एक तबका तीस के उम्र पार वालों का है, इनकी तो दुनिया ही अलग है, ये सालों तक दुनिया के सामने ब्रम्हचारी बने फिरते हैं, बुद्धम् शरणं गच्छामि का ढोंग करते हैं, हालांकि परदे के पीछे ये भी खूब अफेयर मारते हैं। जब आखिर में इन्हें पता चलता है कि अब इनसे नहीं हो पाएगा, कंट्रोल नहीं हो पा रहा,और अकेले नहीं रह पाएंगे। तो फिर वे सारा ढोंग त्याग कर मजबूरी में शादी कर लेते हैं। सनद रहे कि ऐसी शादियों का पसंद, नापसंद और आपसी प्रेम से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता, ये एक प्रकार का बिजनेस डील ही होता है।

स्वीकार करना नहीं करना आपके ऊपर, पर हकीकत तो यही है कि हम जिस पांच हजार साल पुरातन संस्कृति का गौरवगान करते रहते हैं, आज उसका दिवाला निकल चुका है, आज उस संस्कृति का वर्तमान धूमिल हो चुका है, और वो महान संस्कृति अपनी तमाम विसंगतियों को किनारे कर खुद को महान साबित करने की आंधी में बहने लगी है।

 यानि हम खुद से इतना झूठ कैसे बोल सकते हैं?
हम स्वयं के साथ इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं?
हम क्यों ऐसी दोहरी जिंदगी जीते हैं??
आखिर क्यों????

Thursday, 15 June 2017

कुछ सवाल--

भारत का एक ऐसा गांव कोई बतलाइए..
~ जहां के गांव वालों ने नदियां सूखा दी हों,
~ जहां गांव वालों ने तालाब पाट कर अपने लिए घर बना दिए हों,
~ जहां गांव के लोगों ने कुएं समाप्त कर दिए हों,
~ जहां गांव वालों ने अपनी जरूरतों के लिए जंगल के पेड़ों का सफाया कर दिया हो,
~ जहां गांव वालों ने अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए प्रकृति को किसी भी प्रकार से नुकसान पहुंचाया हो,
~ ऐसे गांवों का भी नाम बताया जाए जहां कचरे-कूड़े का टीला बन गया हो और सफाई न होती हो,
~ ऐसे गांवों का भी नाम बताया जाए जहां बजबजाती नालियां बहती हों और उसकी सफाई के नाम पर कुछ भी न होता हो,

अब दूसरा पहलू, शहरों की बात करते हैं...
भारत का एक ऐसा शहर/महानगर/मेट्रो सिटी
बताया जाए जहां---
~ उफनती गंदी नालियां न हों,
~ जहां कचरे के बड़े-बड़े ढेर न हो,
~ जहां के लोगों ने जुगाड़ लगाकर अपने स्वार्थ हेतु तालाबों/पोखरों को समतल न किया हो,
~ जहां हजारों की संख्या में पेड़ न कटे हों,
~ जहां के लोगों ने नदियों/झीलों/कुओं/अन्य जल स्त्रोतों की ऐसी तैसी न की हो,
~ जहां साफ पानी और साफ हवा ( जीने के लिए सबसे मूलभूत जरूरत) मिलती हो,

तुलना-

1) आदर्श ग्राम तो भारत में सैकड़ों की संख्या में है, एक ऐसा आदर्श शहर का नाम गिनाइए, आदर्श शहर छोड़िए कोई छोटा शहर कस्बा टाइप का ही बता दीजिये,

2) क्यों गांव के लोगों को Go green का T-shirt नहीं पहनना पड़ता? ये चूतियापा शहर के लोगों द्वारा ही क्यों? जबकि उनकी जीवनशैली का हर दूसरा काम प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाला है।

3) गांव के लोग क्यों कभी स्वच्छता के लिए जागरूकता कैंपेन टाइप का ढोंग करते नहीं दिखते?
शहर के लोग ही क्यों,
क्या ऐसा तो नहीं कि शहर के पढ़े-लिखे लोग सच में ज्यादा सभ्य हैं या ज्यादा साफ-सफाई से रहते हैं?

4) गांव में किसी का एक बड़ा सा घर है, मेहनती किसान है, उसकी तुलना में शहर में 1-बीएचके फ्लेट में रहने वाला कैसे ज्यादा सभ्य मान लिया जाता है?
लोग रहने लगे और बिचौलियों ने जमीन का रेट ऊंचा कर दिया, क्या सभ्य होने की वजह ये माने या कुछ और?

5) जागरूकता और कैंपेनिंग से, बड़े पांच सितारा होटलों में सेमिनार करने से, पर्यावरण संरक्षण वाले कपड़े पहनकर ग्रुप फोटोग्राफी से, न्यूज में आने से, सोशल मीडिया के दिखावे से, स्मार्ट सिटी नामक इन सब चोचलेबाजी से क्या ऐसा शहर बन पाएगा, जहां प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली मानसिकता का सर्वनाश हो जाए?

6) गांव-गंवई के लोग अनपढ़ गंवार होने के बाद भी नदियों, जंगलों को बचाने के लिए कभी पेड़ों से चिपक जाते हैं तो कभी पानी के अंदर हफ्ते-भर रह लेते हैं, शरीर तक गल जाता है..
शहरी लोगों ने कब ऐसा प्रयास किया, इसका 1% भी अगर कुछ किया हो तो तथ्य सामने लाए जाएं।

7) आखिर ऐसा क्या कारण है कि गांवों में ये तहस-नहस और नुकसान पहुंचाने वाली मानसिकता नहीं हैं?
पर्यावरण के क्षेत्र में पीएचडी होल्डर विद्वान कब ऐसे वास्तविक तथ्यों से टकरायेंगे? या फिर जीवन भर डींगे हांकते रहेंगे।

8) आखिरी बात ये कि एक Statistics इस पर भी बने कि आखिर पर्यावरण प्रदूषण में सबसे ज्यादा योगदान किसका है, गांव के उन 70% लोगों का या 30% शहरी निवासियों का?

Somewhere in a remote village of uttarakhand



 

Wednesday, 22 February 2017

~ मितव्ययिता ~

               उस समय 3rd या 4rth क्लास में था। पड़ोस के एक लड़के ने मुझे पत्थर देकर चैलेंज किया कि चल देखता हूं तेरा निशाना कितना अच्छा है, चल इस रिक्शावाले के सिर में मार के बता, मैं ठहरा भोला भंडारी, साथ ही उतना ही सिरफिरा, मैंने उस रिक्शेवाले के सिर में पत्थर दे मारा, मेरा निशाना सटीक था, रिक्शेवाले के माथे पर सूजन आ गई, उसने मुझे पकड़ने को दौड़ाया, मैं दौड़ते घर आया और खाट के नीचे छुप गया। रिक्शेवाले ने मां से शिकायत की। मां बोलती रही, आने दे तेरे पापा को वगैरह। उतने ही समय पापा आफिस से घर आ गए, रिक्शावाला घर के बाहर खड़ा था, वो पापा को बोलने लग गया कि संभालो साहब अपने बेटे को, हम गरीब हैं, कोई भी अपने मजे के लिए मार के चला जाता है,हम सहन कर लेंगे, कोई और नहीं सहेगा, रिक्शावाला कुछ इस तरह सुनाता रहा, पापा सुनते रहे, फिर पापा ने पास की झाड़ी से एक बेशरम का डंडा तोड़ा और मुझे घर से बाहर निकालकर उस रिक्शेवाले के सामने डंडे से पीटना शुरू कर दिया। लेकिन मैं भी निर्लज्ज की तरह मार खाता रहा, क्योंकि मैंने तो बस एक निशाना लगाया था। अब उस उम्र में  क्या सही क्या गलत, किसी को थोड़े न पता रहता है। लगभग 20-30 डंडे पड़ चुके थे, मैं रोने लगा तब जाकर रिक्शेवाले को चैन आया, वो बोला- रहने दो साहब कितना मारोगे, बच्चा है। और फिर पापा शांत हो गये, डंडा टूट चुका था, मेरे दोनों पैर नीले पड़ चुके थे।
उसी दिन शाम को पापा मुझे गाड़ी में बिठाकर घुमाने ले गये। शायद उन्हें दु:ख पहुंचा होगा। मैं चुपचाप गाड़ी में बैठा रहा, कंधे/कमर में हाथ पकड़कर बैठने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी। हल्की-हल्की ठंड थी, हाफ-पैंट पहना हुआ था तो जब भी पास से कोई ट्रक गुजरता, उससे निकलती गर्म हवा से पैर से लेकर जांघ तक गजब का सुकून मिलता।एक पल को लगता कि ये ट्रक कुछ देर हमारे साथ-साथ क्यों नहीं चलता। पापा ने मुझे उस दिन शाम को आइसक्रीम खिलाई, मैं तो आइसक्रीम खाने के बाद एक झटके में सारी मार भूल गया।
                  इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद मैंने एक लड़के के कंधे पर दांतों से काट लिया, और फिर से मेरे लिए डंडा टूटा। खैर ये सिलसिला चलता रहा।
                 मूल बात ये कि उस शाम मैं आइसक्रीम पाकर सब कुछ भूल गया था। वो इसलिए भी क्योंकि उस उम्र में बाहर से कोई चीज खरीद कर खाना बहुत बड़ी बात होती थी। हमारे मन में यही होता था कि सुबह नाश्ता, दोपहर खाना और रात का खाना, यही सब कुछ है। इसके अलावा बाहर कुछ भी खाते हैं तो वो हमें बीमार कर देगा। हम अगर कभी शाम को चोरी-छिपे तेल से तली हुई चीजें खाकर घर पहुंचते तो भी मन में ये रहता कि जैसे हमने कोई गलती की है, कायदा तोड़ा है।
                   शाम को जब पापा आफिस से लौटते तो हमेशा मन में ये रहता कि कुछ लाएं होंगे क्या, मम्मी की साड़ी से लिपटकर कहते कि पूछो तो जरा कि कुछ लाएं हैं कि नहीं। हमारी तो पूछने की हिम्मत कभी न होती। मुझे आज भी समझ नहीं आता कि पापा के आने की  भनक पाते ही खाट, पलंग और दरवाजे के किनारों में आखिर हम क्यों छिपते थे, जबकि कुछ सेकेंड बाद निकलना होता ही था।
                  कभी मामा घर जाते तो मामा-मामी हमें पांच दस रुपए हाथ में थमा देते और कहते कि रखे रहना, फालतू खर्च मत करना। मुझे आज उस पैसे का महत्व समझ आता है, वो पांच दस रुपए जो हमें दिया जाता है,  उससे हमें मितव्ययिता का पाठ पढ़ा दिया जाता था। कि अभी तुम्हारी उम्र और समझ विकसित नहीं हुई इन पैसों को खर्च करने की। और हम उन पैसों को महीनों तक अपने पास रखते भी थे। अगर खर्च करते भी थे तो कुछ जरूरत की ही चीज लेते थे। और अगर उन पैसों से बाहर किसी दुकान से कुछ खरीदकर खा लेते तो थोड़ा गलत सा लगता कि जो दस रुपए अभी हमने खर्च कर दिया वो बहुत कीमती था। हां हम ऐसा करके खर्चीले कहलाते लेकिन हमारी दीदी बहने कितने महीनों तक उन पैसों को संभाल के रख लेती, उनके जमा पैसों को देखकर हमें ऐसा लगता कि हमारे हाथ खाली हैं, हमारे पास कुछ भी तो नहीं है। जब बहुत ज्यादा बुरा लग जाता तो फिर हम मां से पांच रुपए जबरन मांग लेते कि देना तो मैं इसे रखूंगा अपने पास।कभी खर्च नहीं करने की कसम खा लेते।
                  लेकिन आज, आज जमाना बदल गया है। पता नहीं आजकल के मां-बाप एवं बच्चों को मितव्ययिता का अर्थ पता भी है या नहीं। आज के बड़े होते बच्चे क्या अपने मां-बाप के घर आने पर इंतजार करते हैं कि वे कुछ लेकर आए होंगे। अरे उन्हें तो पाकेट मनी ही इतनी मिल जाती है कि बस क्या कहने। हमारे मां-बाप हमेशा हमें छोटी-छोटी चीजों से खुश रखते, जिस चीज की जरूरत जिस उम्र में है, उसी उम्र में ही हमें मुहैया कराया जाता। मैं जब समय से पहले घरवालों से छिप-छिपकर दोस्त के साथ उसकी गाड़ी से ड्राइविंग सीखने लगा, तो हमारी बहनों ने पापा से शिकायत कर दी कि देखो लड़का बिगड़ रहा है, संगति देखो इसकी। लेकिन आज, एक दसवीं पास बच्चा पचास हजार का फोन लेकर चलता है, कार चलाना सीख जाता है और लाख रुपए की बाइक में घूमता है, उस दसवीं के बच्चे की जरूरत इतनी है ही नहीं, फिर भी मां-बाप अपनी औलाद को चढ़ा कर रखते हैं, बेटा कहां जा रहा है क्या कर रहा है कैसे लोगो के साथ उठना-बैठना कर रहा है, किसी को नहीं मालूम, फिर एक दिन कोई अनहोनी हो जाती है और मां-बाप सर पकड़ के बैठ जाते हैं।
आज लोगों के पास हर चीज जरूरत से ज्यादा है। और इस आपाधापी में जिंदगी का जो आनंद होता है, वो पूरी तरह से खत्म हो रहा है।
बच्चों को कैसे मूल्य दिये जाएं, कैसे आज के इस बदलते परिदृश्य में उनकी परवरिश की जाए, आज के अधिकतर मां-बाप को इसकी समझ ही नहीं, घूम-घूमकर सेमिनार में भागीदारी निभाते हैं कि बच्चों का विकास कैसे किया जाए, और बच्चों को ढंग से समय ही नहीं दे पाते, समय देते भी हैं तो एक दूसरे के फोन में एप्लीकेशन्ज और बाकी जानकारी मां-बाप अपने बच्चों से ले रहे होते हैं। और ये सोशल मीडिया बच्चों को जितना तबाह कर रहा है उसके कहीं ज्यादा आज के माडर्न मां-बाप को चपेट में ले रहा है, वे इस चक्कर में रोबोट बनते जा रहे हैं और तो और बच्चे अब उन्हें किसी बोझ की तरह भी लगने लगते हैं, वे अब हर नई जिम्मेदारी को बस कैसे भी करके निपटाना चाहते हैं। अरे एक बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व का जो एक शुरुआती काउंसलिंग होता है, वो एक मां-बाप से बेहतर और कोई नहीं कर सकता, अगर इतनी सी बात नहीं समझ आती तो भेजिए ट्यूशन क्लासेस, फलां क्लासेस आदि आदि।                  
                     शौक तो सबके होते हैं, हम बचपन में किसी चीज की जिद करते, तो हमें हफ्ते महीने बाद वो चीज मिलती, आपने कभी सोचा कि ऐसा क्यों होता था, ऐसा नहीं है कि पैसे का अभाव होता था, बल्कि बात ये थी कि इस पूरी प्रक्रिया से वे हमें धैर्य का पाठ पढ़ा देते थे। और हमें इतने महीनों बाद जब वो चीज मिलती थी तो हम खुशी से झूम उठते थे। लेकिन आज लाखों की गाड़ी खरीदने के बाद भी वो आनंद नहीं है, क्योंकि आप मूल्यहीन हो चुके हैं। आपने धैर्य का पाठ पढ़ा ही नहीं। महंगे गैजेट्स, गाड़ी या और कोई दूसरी चीज हो, आप उसकी खरीददारी इसलिए नहीं कर रहे कि आप रोज उस चीज को पाने का सपना देखते थे या आपको उसका सालों से इंतजार था बल्कि इसलिए करते हैं ताकि आपके ईगो का तुष्टीकरण हो सके।
                   आज के समय में जैसे बच्चा किसी चीज की जिद कर रहा है तो तुरंत उसे पैसे पकड़ा दिया, उम्र से पहले ही एटीएम दे दिया, हां मार्केट सजा हुआ है, हर चीज तैयार है आपकी सुविधा के लिए, जी भर के खर्च करो, सोच के गये थे कि एक हजार की खरीददारी करेंगे, कर आते हैं पांच हजार खर्च। अपार सुविधाएं मिल रही है इस जनरेशन को, जो मांगा तुरंत हाजिर। स्वाइप करो ऐश करो। बिस्तर में लेटे-लेटे खाना आर्डर करो, मनमाने आनलाइन शापिंग करो। लेकिन भाई साहब हर जनरेशन की अपनी कुछ जिम्मेदारियां होती है, अगर आपको ये नहीं दिख रहा कि कल जाके आपके बच्चे मूल्यहीन हो जाएंगे तो इसमें पूरी गलती आपकी है। आपने एकदम टेक्नोलॉजी को गर्दन से चिपका लिया है, अब हिल भी नहीं पा रहे, नया कुछ सोच नहीं पा रहे।  बस एक धुन में बहे जा रहे हैं, बेहिसाब फिजूलखर्च कर रहे हैं, और बच्चों को भी यही सीखा रहे हैं। कंजूसी और मितव्ययिता में थोड़ा सा फर्क होता है, इसे आप इतनी पढ़ाई करने के बाद भी समझ नहीं पा रहे, जीवन में उतार नहीं पा रहे हैं। कम से कम एक पांव रख भी लीजिए जमीन पर। थोड़ा प्रकृति से जुड़िए। प्रकृति में धैर्य है । तकनीकी में अधैर्य । जीवन धैर्य में है। साँस क्या जल्दीबाजी में ले सकते हैं क्या ,बेसब्री के कारण ,हमारे जीवन का आनंद ही गायब हो रहा है ,हमें खबर ही नहीं।
 

Monday, 20 February 2017

~ स्वाभिमान की लड़ाई ~

                   देखो न इतनी लड़ाइयों के बाद कितनी थकान महसूस कर रहा हूं मैं, उठ चुका हूं नींद से, फिर भी  थकान बनी हुई है। जिस संस्कृत के मंत्र को सुनते हुए आज मैं सो गया था। तुम सपने में वही संस्कृत का मंत्र दोहरा रही थी। नदी किनारे उस मंदिर के पास, वही तो एक मंदिर था जहां तुम रोज जाती थी अपनी मां के साथ। मैंने सपने में तुम्हें मंत्र का उच्चारण करते सुना, अभी फिर से वही मंत्र सुन रहा हूं तो ये आवाज फीकी लग रही है उस आवाज के सामने जो तुमसे मैंने सपने में सुना था।
पता नहीं तुम सच में मंत्रों का जाप करती हो या नहीं, लेकिन अगर तुम ये पढ़ रही होगी तो इस पर तुम्हारा ध्यान जरूर जाएगा।

मंत्र कुछ इस तरह है--
कराग्रे वसते लक्ष्मि:, करमध्ये सरस्वति।
करमुले तु गोविन्द:, प्रभाते करदर्शनम्।
समुद्रवसने देवि:, पर्वतस्तनमंडलेः,
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं ,पादस्पर्शं क्षमस्वमे।

                क्षमा करना कि मैंने तुम्हें सपने में देखा। सपने में हम दोनों साथ में घूम रहे थे, याद है तुम्हारे शहर से एक नदी होकर जाती है, नदी पर घाट बने हुए हैं, उस नदी के एक ओर मंदिर बना हुआ है, और ठीक उसी नदी के दूसरी ओर एक पुरानी हवेली है, उसके पीछे की गली में आज भी दुकानें सजती है। हम उन गलियारों में महीने में एक या दो बार छुप-छुपाकर घूमने जाया करते थे, मैंने तुम्हारे लिए शायद कुछ खरीदा भी था। याद है तुम अपने भाई के साथ मेले में झूला झूलने गयी थी, तुम्हें शायद झूले से डर नहीं लगता था, एक मैं था जो झूले से दूर भागता था इसलिए तुम अपने भाई के साथ झूला झूलने जाती थी। याद है तुम कितनी चुलबुली हुआ करती थी, एक बार तुमने और मैंने एक तांगे वाले से जिद कर ली और उसी को पीछे बिठाकर उसका तांगा चलाया था और फिर हम तीनों धड़ाम से पास के एक खेत में जा गिरे थे। तुम्हें संस्कृत बहुत पसंद था, तुमने शायद अपने पापा से सीखा था, तुम हमेशा संस्कृत के बारे में मुझे सिखाती और मैं हंसने लगता, क्योंकि मुझे तुम्हारी बात समझ न आती। तुम ये कहती कि संस्कृत लिखा-पढ़ी वाली कोई भाषा नहीं, इसे हमेशा एक कंठ की जरूरत होती है जो इसका सटीक उच्चारण करे और आने वाली पीढ़ी को सौंप दे।
                   पता है सबसे डरावना क्या था, वो ये कि मैंने तुम्हारे बचपन से लेकर आज को उस सपने के शुरुआती क्षणों  में देख लिया, हां मैंने सब देख लिया और अभी मैं इसे संभाल नहीं पा रहा हूं, किसी को उसकी अनुमति के बगैर ऐसे पूरा जान लेना मुझे अंदर से खाये जा रहा है। मैं कुछ भी नहीं जानना चाहता तुम्हारे बारे में, मिटा देना चाहता हूं तुमसे जुड़ी ये स्मृतियां। मैं अब नहीं चाहता कि तुम मेरे चेतन अचेतन में कहीं भी रहो, नहीं अब तुम्हें मेरी स्मृतियों में रहने की इजाजत नहीं है। तुम्हें हमेशा के लिए दूर हो जाना चाहिए। तुम इस तरह से मेरे सपने में क्यों आई, ऐसे गहरे तक झकझोर चुकी हो कि मैं कभी जिंदगी भर तुम्हें इसके बारे में बता नहीं पाऊंगा, मैं ये कभी नहीं बतलाऊंगा कि वो तुम ही थी जिसे मैंने हूबहू सपने में देखा।
                      सपना जब अपने आखिरी पड़ाव में था तो कुछ ऐसी स्थिति थी। उस समय ऐसा लगा कि सिर्फ तुम ही हो जो मेरे सपने में आई थी, तुम ही तो हो जिसके लिए मैंने इतनी मारकाट मचा दी। फिर मुझे ये लगने लगता है कि सिर्फ तुम नहीं हो, तुम्हारे जैसे पता नहीं कितने और हैं जो अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं, अब मेरे सामने चेहरे झूल रहे हैं, ऐसा लग रहा है जैसे मैंने इन सबके लिए तलवार उठा ली। हां मैं उनका नाम तुम्हें नहीं बता सकता,  मैं तो तुम्हें ये भी नहीं बता सकता कि मैंने सिर्फ तुम्हें देखा था और सिर्फ तुम्हें देखने के एवज में मुझे न जाने कितने लोग याद आने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे तुम उन लड़कियों का प्रतिनिधित्व कर रही हो। तुम अपने अस्तित्व को मिटाने के लिए हमेशा तैयार रहती हो, खुद अस्तित्वविहिन होकर दूसरों के अस्तित्व की रक्षा के लिए दुआएं करना कोई तुमसे सीखे।
                    देखो न तुम्हें नुकसान पहुंचाने वाले आज इस दुनिया में नहीं हैं।जो थोड़े बहुत रह गये थे तुम्हें बदनाम करने के लिए मैंने उन्हें भी तुमसे हमेशा के लिए दूर कर दिया, उन्हें मौत की नींद सुला दी।अब उनका साया का भी तुम तक नहीं आ पाएगा। तुम जब लिखोगी तो मेरे नाम सजाएं लिखना। लिख देना कि तुम्हें तुम्हारा सम्मान दिलाने के लिए मैंने हथियार उठाये। लिख देना कि मैंने खून की होलियां खेली।
मैं तुम्हें कभी नहीं बता पाऊंगा कि मैंने तुम्हें सपने में देखा।नहीं बताऊंगा तुम्हें कि मैंने चाकुओं का वार झेला, ये भी नहीं बताऊंगा कि मैंने कितनों को मौत के मुंह में ढकेल दिया।
                हंडियां चपटी हो गई हैं, बर्तन और बाकी सारे सामान बिखरे पड़े हैं, टूटी लकड़ियां बिखरी हुई हैं, धारदार चाकू खून से सने पड़े हुए हैं जमीन पर, उसी जमीन पर जहां आज तुम्हारा अहित चाहने वालों को मैंने अपने तलवार से लहूलूहान कर दिया। पता है सब तरफ मुझे लाल रंग दिखाई दे रहा है। उसी वक्त मुझे पकड़ने के लिए वहां कुछ सैनिक आ जाते हैं,  मेरे एक हाथ में चाकू और दूसरे हाथ में तलवार और कुछ इस तरह मेरा रौद्र रूप  देखकर वे वहां से चले जाते हैं। मैं फिर वहीं खड़ा रहता हूं, शांत पड़ जाता हूं, और फिर घुटनों के बल गिर जाता हूं और फिर कुछ देर बाद मैं अपने खून से सने कपड़ों को वहीं फेंक देता हूं और नये कपड़े पहनकर उस जगह से कहीं दूर चला जाता हूं।रास्ते भर यही सोचते रहता हूं कि तुम्हें तुम्हारा स्वाभिमान लौटाने के लिए मैंने ये क्या कर दिया। करीब दो दिन और दो रात लगातार जंगल के रास्ते चलते चलते मैं एक दूसरे गांव में पहुंच जाता हूं।
                मैं तुम्हें ये कभी नहीं बताऊंगा कि जब तुम्हें किसी ने बदनाम करने की कोशिश की तो मैंने हथियार उठा लिए, मैं लड़ने लग गया, घायल हुआ और लोगों को घायल भी किया। सब कुछ कितनी जल्दी हो रहा था। मैं बिना कुछ सोचे, बिना कुछ समझे बस मारे जा रहा था, मेरे सामने सिर्फ एक ही चीज थी, तुम्हारा स्वाभिमान से जड़ा चेहरा। मैं तुम्हें इस भयावह सपने के बारे में और बताकर डराना नहीं चाहता। मैं तुम्हें अगर अपने सपने के बारे में और बताने लगूंगा तो तुम्हें मेरे विचार सुन समाज के खिलाफ जाना पड़ेगा, अकेलेपन का जीवन जीना पड़ेगा, लड़ाईयां लड़नी पड़ेगी, इसलिए तुम ऐसा कभी मत करना।    
                   पता नहीं तुम्हारा मेरा रिश्ता कितना पुराना है। लेकिन तुम मेरे लिए एक सपना या कल्पना हो ही नहीं सकती, तुम तो एक चेहरा एक व्यक्तित्व लिए इसी जीवन में मौजूद हो मेरे साथ, हां भले तुम मुझसे दूर हो, अपना एक अलग जीवन जी रही हो। लेकिन मुझे ये महसूस होता है कि तुम बराबर मेरे हिस्से का जीवन बांट रही हो।


Friday, 17 February 2017

~ I Travel ~

I travel,
Because soft music/dj songs, coffee etc doesn't work in my case,

I travel,
Because sometimes books can't heal my wounds,

I travel,
Because it's like a process of understand you, and out of that understanding comes love.

I travel,
Because this is the only way i can discover my innerself,

I travel,
Because I really care about myself and I can't digitalize every portion of my life.

I travel,
Because i cant live in a highly infective place(society) for a long time.

I travel,
Because i cant push myself in between those rotten knowledge patterns and sick ideologues.

I travel alone,
Because i cant let my real emotions unfold.

I travel alone,
And by doing this way i dont need hotel rooms and luxury,
I eat according to availability,
I sleep wherever i want, yes My source of relaxation is waiting rooms, treeshades and railway/bus stations.

I travel,
because I thought sources must be preserved, both cultural diversity and biodiversity.

I travel,
i travel a lot, specifically to mountains for fresh air and water, because nowadays technology owes ecology.

I travel,
and i face difficulties, for days like these i have tomorrows,
tomorrow where the promises live,
where the heart get whole and wounds get healed.

I travel,
Because i realize that i am a man of character and i dont let myself down infront of those tamasik people.

I travel,
Because this is how civlizations flourishes.


Tuesday, 14 February 2017

~ मैं लड़की नहीं ~

                  रोज की तरह मैं कालेज जाने के लिए सुबह से तैयार हो गई। कल मेरे सर पर चोट लग गई थी अब इस वजह से मुझे यही लग रहा है कि मैं सब भूल रही हूं। गली से पैदल चलते मैं अपने चौराहे की तरफ जा रही थी। अचानक से मुझे महसूस हुआ कि मुझे चुपके से कोई देख रहा है, शायद वो कोई दुकान वाले अंकल थे, क्या वे लड़कों को भी देखते होंगे या सिर्फ मुझे ही देख रहे हैं, खैर मैंने उन्हें नजरअंदाज किया और मैं आगे बढ़ने लगी। फिर थोड़ी देर बाद मुझे ये लगने लगा कि कोई है जो फिर से देख रहा है, टेढ़ी नजरों से देखा तो ये पाया कि कोई लड़का है जिसकी हल्की सी निगाह मुझ पर पड़ रही है। फिर मैं आगे बढ़ी, मैंने देखा एक बुढ़िया मुझे ऊपर से नीचे ताक रही थी। न जाने कितनों ने मुझे देखा, मैं गिनती न कर पायी, कोई आंखे फाड़कर देखता तो कोई चोरी-छिपे। मुझे नहीं पता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। एक बार को लगा कि मैंने कपड़े ढंग से पहने हैं कि नहीं, कहीं कुछ ढीला पड़ गया हो शायद, इसलिए भी तो लोग देख रहे होंगे, फिर मैं खुद को जांचने लगी और ये पाया कि सब ठीक तो है।
मैं भला आज इतना क्यों सोच रही हूं, सामान्य सी बात तो है।
हां ये तो मेरे लिए रोजमर्रा की बात थी, रोज इसी रास्ते होकर कालेज के लिए बस पकड़ती हूं, लेकिन आज मुझे ये क्या हो गया है, शायद आज मैं देख पा रही हूं कि एक लड़की होने के नाते मुझे कितनों के द्वारा देखा जा रहा है, ये आज इतना लड़कीपन मुझमें क्यों आ गया है, मेरी खूबसूरती सामान्य सी है, कपड़े भी ज्यादा भड़कीले नहीं हैं, फिर भी मुझे ये पता नहीं कि कौन किस नजरिए से देख रहा है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि आज मैं इन सब देखने वालों की गिनती कर रही हूं तो मुझे घबराहट सी हो रही है, डर सा लग रहा है।
                  मेरे घर से चौराहे तक की दूरी लगभग पांच सौ मीटर है, मैं ये दूरी नापकर रोज की तरह अपने कालेज की बस का इंतजार करने लगी। कुछ एक मिनट तक वहां खड़ी रही तो मुझे लगा कि फिर से कुछ लोग मुझे देख रहे हैं, मैं अब पीछे चली जाती हूं, उन लोगों के चेहरों को याद करने लगती हूं जो पहले ही रास्ते में मुझे देख चुके हैं और फिर से घबराने लगती हूं। शायद मेरे मम्मी-पापा को भी कुछ इसी तरह बैचेनी होती होगी मेरे लिए, जब मुझे कभी घर लौटने में देरी हो जाती है।
                   मैं वहां चौराहे में खड़ी मन ही मन सोचती हूं कि जल्दी से मेरी बस आ जाए, अपनी उंगलियाँ मरोड़ने लगती हूं, पैरों को धीमे से जमीन पर पटकने लगती हूं। लेकिन आज मेरी बस का कोई पता नहीं, रोज इस टाइम पर तो आ जाती थी, आज इस बस को क्या हुआ। उतने में ही एक कोई अंकल आते हैं और मुझसे टाइम पूछने लगते हैं, इस भीड़ में मैं ही उन्हें मिली क्या? मैं अचानक से उन्हें अपने सामने देखकर कुछ समझ नहीं पाती कि क्या जवाब दूं, मेरी जुबान सिल जाती है, मैं डर के मारे कांपने लगती हूं, और फिर इसी दौरान घबराहट के मारे मेरी नींद खुल जाती है, उठने के बाद पता चलता है कि 'मैं लड़की नहीं'।

Saturday, 14 January 2017

~ चार दोस्त ~

'हवा मिट्टी पानी और अखिलेश'
लेकिन ये चारों कितने साल बाद मिल रहे हैं। शायद इन्हें भी अच्छे से नहीं पता। कितने दशक बीत गए होंगे और आज जब चारों व्यास नदी के तट पर मिल रहे हैं तो उत्सव सा माहौल है। सबके पास बताने के लिए कितना कुछ है। सब एक-दूसरे को देखते हैं, हाल-चाल पूछते हैं और फिर चारों की बातें शुरू हो जाती है।

हवा- तुम इतने साल कहां थे अखिलेश, इतनी देर कैसे लगा दी आने में। और ये क्या हाल बना रखा है, तुम्हारे चेहरे का रंग गायब है।

अखिलेश- एक स्कूल करके जगह होती है, तेरह साल मैं वहां रहा, फिर चार साल कालेज। और उसके बाद फिर कुछ साल एक विशेष पढ़ाई पढ़ ली,दो-तीन साल उसमें लग गए। इसलिए आने में इतनी देर हो गई। और तुम कहां थे, तुम क्या मुझे बुला नहीं सकते थे। इतने साल अकेला रहा मैं, मेरे दोस्त यार छूटते गए, कोई भी नहीं बचा। अब जबकि सब पीछे छूट गए तो तुमने मुझे बुलाया है। मेरे लिए ये कितने दुःख की बात है कि तुम तीनों के अलावा मेरे पास और कुछ नहीं बचा है। मन को सुकून पहुंचाने के लिए तरह-तरह की बातें हैं और तरह-तरह के लोग, लेकिन कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे मैं अपना कह सकूं।

मिट्टी- तुम अपनी पढ़ाई, अपने भविष्य और अपने दोस्तों के बीच मस्त थे इसलिए हमने तुम्हारी जिंदगी में दखल नहीं दिया। हमें विश्वास तो था कि देर-सबेर तुम आओगे जरूर। खैर इसे देखो, हवा कितनी नाराज है तुमसे, यही तुम्हें सबसे ज्यादा याद करती थी।

हवा- मैं न याद करूं इसे। ये तो इतने साल मेरे जहरीले रूप को ही ग्रहण करके खुश था। मेरे लिए कुछ किया भी है इसने वहां रहकर, मुझे तो इसने कहीं का नहीं छोड़ा, मुझे लोगों का दुश्मन बना दिया, और अब यहां थोड़ी साफ-सुथरी बची हुई हूं तो बुलाते ही यहां दौड़ा चला आया है।

अखिलेश- देखो मैंने कोशिश की थी कि मैं अपने बिरादरी में जाकर तुम्हारे महत्व को समझाऊँ। लेकिन तुम्हें क्या पता कि बदले में लोगों ने मुझे कितना जलील किया है। हर जगह ठोकर ही खाया हूं। हां मैं हार गया, मैं नहीं रख पाया तुम्हारा ख्याल, अब ये मेरे बस की बात नहीं है, मुझसे न होगा ये, हो सके तो मुझे माफ कर देना।

पानी- किसने जलील किया तुम्हें। कुछ बातें सुनाई होंगी ज्यादा से ज्यादा। तुम किस्मत वाले हो कि बस जलील होकर आए,  यहां तो मेरा पूरा शरीर, अणु अणु नोच-नोच कर गंदा किया जा रहा है। रोज कहीं न कहीं मेरी मौत होती है। मेरे हर रूप को या तो छोटा किया जा रहा है। या तो जान से मार दिया जा रहा है। तुम मुझे जीवनदायिनी पुकारते थे न, मैं पानी भी नहीं रही, अब तो मैं एक व्यापार हूं। प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों में बिकने लगी हूं।

मिट्टी- क्या कहा अखिलेश तुमने। नहीं रख पाओगे ख्याल। बोल कैसे दिया तुमने ऐसा। अब की बार ऐसा कहा तो कसम लेती हूं तुम्हें यहीं कहीं दफना कर ही दम लूंगी। तुम क्या जानो लोग जब मेरे देह पर तरह तरह के जहरीले रसायन डालते हैं तो मुझे कितनी तकलीफ होती है। मेरी त्वचा देखो, परत दर परत पूरी छिल चुकी है, आये दिन कितनी जलन होती है ये मैं ही जानती हूं। अब उन्हें मैं कैसे समझाऊं कि उनका पालन-पोषण मैं करती हूं, खाद्यान्नों से उनकी झोली भरती हूं और वही आज मुझसे दुश्मन की तरह बर्ताव कर रहे हैं।

अखिलेश- पानी! तुम हमेशा जीवनदायिनी हो, मैं तुम्हें जीवनदायिनी ही पुकारूंगा। तुम्हारी मौत के जिम्मेदार जो भी लोग हैं उन्हें आज नहीं तो कल होश आएगा, वे फिर से तुम्हें सीचेंगे। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो इसकी सजा उन्हें एक दिन जरूर मिलेगी।
मिट्टी! अब मैं पूरी कोशिश करूंगा कि तुम पर कोई जहर न डाला जाए। मुझे थोड़ा तो दो ताकि सब ठीक करने के लिए कुछ पहल हो सके।

हवा- अखिलेश, तुम मिट्टी और पानी की बातों का बुरा मत मानना। मैं तो बस नाराज थी लेकिन ये दोनों गुस्से में हैं। इनका गुस्सा जायज है। अब तुम हमारे सुख-दुख के साथी हो। तुम्हारे सामने हाथ फैलाने के अलावा और हमारा पास रास्ता ही क्या है। और मैं क्या बोलूं, क्या मैं अपनी अहमियत गिनाने लगूं कि मेरे बिना तुम एक मिनट भी जिंदा नहीं रह सकते। और तुम वहां जो पुस्तकें पढ़ते हो क्या वो भी हमारे बारे में नहीं बताती। नहीं बताती होगी तभी तुम प्रदूषित हवा में सांस लेकर भी मदमस्त थे। और तुम्हारे उस शहर में ऐसे कितने लोग बचे हैं जो मुझे प्राणवायु पुकारते हैं। शायद कोई भी नहीं।

अखिलेश- ऐसा नहीं है, पुस्तकों में तुम सब का महत्व दिया गया है। लेकिन समय के साथ सब फीका हो गया है। अब उस रास्ते किसी का ध्यान नहीं जाता इसलिए धीरे-धीरे सारी काम की चीजें महत्वहीन होती जा रही हैं। इंसान अपने महत्व की चीजों का फैसला खुद करने लगा है, उनके पास न तो अब कोई नैतिक जिम्मेदारी है न ही उन्हें तुम तीनों से कोई मतलब है, वे हर दिन तुम तीनों को नुकसान पहुंचाकर किसी चौथी समस्या का शोक मना रहे होते हैं। व्याकुल होते हैं क्योंकि अमुक समस्या भी उनके स्वार्थ का एक हिस्सा है। मैं ऐसी बस्ती में जाकर कैसे तुम्हारा दर्शन कराऊं, बताओ। अरे मुझे तो खुद इतने सालों बाद तुम्हारे दर्शन हुए हैं।

हवा, मिट्टी और पानी साथ मिलकर कहते हुए -
लेकिन इतने साल क्या तुम्हें हमारी थोड़ी भी याद न आई। हमने तुम्हें क्या नहीं दिया। तुम्हारे जीने के लिए हर जरूरी चीज मुहैया कराई। हमने मौसम दिए, फल दिए, सब्जियाँ दी,  पहाड़ खड़े कर दिए, जगह-जगह नदियां निकाल दी, हमारी ही खुदाई कर तुमने तरह-तरह की धातुएं खोज ली, मुलम्मे को सोना बना दिया।
                 हमने तो हर उस चीज से तुम्हें लाद दिया जिसके तुमने सपने देखे। तुमने तो खूब जिंदगी जी होगी, तरह-तरह के लजीज खाने खाये होगें, विज्ञान और तकनीक के आविष्कारों और नये बदलते आयामों ने तुम्हारी जिंदगी में तमाम रंग भर दिए होंगे। क्या इस बीच एक बार भी ख्याल नहीं आया कि हम तीनों का शुक्रिया अदा कर दिया जाए। क्या हम आज इतने खराब हो गए कि हमारी जगह किसी और ही चीज को प्राथमिकता दी जा रही है। और हममें आज इतनी खराबी आई है तो इसका जिम्मेदार कौन है।
               क्या तुम सच में ऐसा कर सकते हो, हमसे ज्यादा कीमती कौन सी चीज आ गई दुनिया में। हमने तो कभी बदले में किसी से कुछ नहीं चाहा। सनद रहे कि हम ही तीनों ने मिलकर अणुओं का समुच्चय बिठाया है और ये दुनियां बनाई है। और आज ये देखने मिल रहा है कि हमसे ही जन्मा प्राणी मात्र हमें ही मारने पे उतारू हो चला है।

अखिलेश- मैं हर रोज तुम्हें याद करता था। हमेशा से मैंने तुम्हारी दी हुई हर एक चीज का सम्मान किया है। लेकिन मैं जैसे ही तुम्हारे करीब होने की कोशिश करता, तुमसे जुड़ने के लिए आगे बढ़ता, ये बनी बनाई व्यवस्था मेरे बीच आ जाती और फिर से रहस्यमयी प्रश्नों की किसी भुलभुलैया में उलझा देती। मैं इन्हीं प्रश्नों की उधेड़बुन में लग जाता लेकिन अब और नहीं। मैं अब इन रहस्यों की पड़ताल नहीं करूंगा केवल बाह्य पक्ष पर ध्यान देकर अपने अंदर पूरे आदर भाव से छिपा लूंगा। और तो और मैंने अब इस पूरी व्यवस्था से, इससे जुड़े लोगों से हमेशा-हमेशा के लिए दूरी बना ली है।
                तुम तीनों के अलावा यहां अब ऐसा कोई भी नहीं जिस पर मैं हक जता कर अपना कह सकूं, उनसे जी भर के बात कर सकूं। हां कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने खूब ज्ञान अर्जित किया है, जी तोड़ मेहनत की है और आज उनके पास एक नाम है, पद है, भले लोग हैं वे, लेकिन मैं उनसे बात नहीं कर पाता, मजबूर होकर मुझे उनके भारी शब्दों से खुद को अलग करना पड़ता है। और मेरे पास रास्ता भी क्या है, वे अपना दिमाग लेकर आते हैं, और मैं हूं जो यहां अपना ह्रदय लिए बैठा रहता हूं। अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि मैंने किताबें ज्यादा नहीं पढ़ी है, जो कुछ थोड़ा बहुत है सब तुम तीनों साथियों का दिया हुआ है।
                इतना कह लेने के बाद अब उसने अपने तीनों साथियों को दिखाते हुए बिस्किट का एक टुकड़ा हाथ में लिया। फिर उस बिस्किट को पहले मिट्टी में रगड़ दिया, थोड़ी देर बाद उस टुकड़े को वहीं नदी के पानी में हल्का सा धो दिया, और उस गीले बिस्किट को हथेली में रखकर हवा की सहायता से सुखाते हुए कहने लगा-
आज मेरी तुमसे विनती है, मुझे अपने से अलग मत करना। अब इतने सालों बाद जब मैं तुम तक आ गया हूं तो मैं अब तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। तुम्हारे ही बीच रहूंगा, तुम्हारे लिए ही काम करूंगा। आज से, अभी से तुम मुझे अपना अंगरक्षक स्वीकार कर लेना। तुम्हारे नुकसान का कारण कभी नहीं बनूंगा, वादा।