Saturday, 12 May 2018

Day- 3 with Prince



मैं - चलता हूं, पानी का क्या है, कभी भी पी लूंगा।
प्रिंस - आप कल भी ऐसे ही बोले थे‌ और चले गये थे, आज तो चलो।
मैं - अच्छा मैं यहीं नीचे हूं, जाओ ऊपर से मेरे लिए पानी लेकर आओ।
प्रिंस - गिलास यहाँ नहीं आएगा चलकर, उसके लिए ऊपर जाना पड़ेगा।
ठीक कुछ ऐसा ही उसने कहा और फिर मैं और उसकी मम्मी हंसने लग गये। दीदी ने भी कहा कि चलो आओ पानी पी लेना फिर जाना। और इसके बाद प्रिंस मेरे पेंट की जेब पकड़ कर मुझे खींचते हुए अपने घर ले गया। और उनके घर के बाहर बालकनी में जैसे ही मैं बैठा, वो अपनी मम्मी को चिल्लाकर आॅर्डर देने लगा कि भैया के लिए पानी लाओ। अब वो मेरी दी हुई डेरी मिल्क चाकलेट जो गर्मी की वजह से पिघल चुकी थी, उसे वह उतने ही समय खाने लग गया। ऊंगलियों में सानकर, चेहरे में यहाँ-वहां लेपते हुए वह बुरी तरीके से चाकलेट खाने लगा। मैं, आराध्या और उसकी मम्मी हम सबने मिलकर बारी बारी से उसका खूब मजाक बनाया कि अभी गार्डन से आया है तू, हाथ नहीं धोया है गंदे, रेत का फ्लेवर खा रहा, घास का फ्लेवर खा रहा, धूल मिट्टी का फ्लेवर खा रहा आदि आदि। प्रिंस हंसने लग जाता, और बेफिक्र होकर फिर से ऊंगली चाट चाटकर खाने लग जाता। चाकलेट खाने के बाद जब वो घर के अंदर हाथ धोने गया तो उसने अपनी मम्मी को कहा- मम्मी मैं अभी आया, भैया का ख्याल रखना। जाना मत भैया, अभी आया। ये सब सुनकर आराध्या ने झुंझलाते हुए कहा - भैया, ये मुझसे इतना प्यार क्यों नहीं करता, मेरे से तो बस लड़ता रहता है हमेशा।
फिर मैंने आज प्रिंस को कहा - मैं कुछ दिन बाद चला जाऊंगा, मेरी ट्रेन है, तुम फिर कैसे करोगे।
प्रिंस - मैं भी आपके साथ उस ट्रेन में जाऊंगा।
मैं - उस ट्रेन में बच्चों को नहीं ले जाते।
प्रिंस - फिर मैं मम्मी पापा को साथ ले जाऊंगा न।
मैं - इसकी हाजिरजवाबी देखकर तो मैं पहले दिन से ही हैरान हूं। फिर मैंने उसे कहा कि ये जो तुम्हारे लंबे घुंघरालु बाल हैं ना, इसके कारण तुम्हें नहीं जाने देंगे।
प्रिंस - सच में नहीं जाने देंगे।
मैं - हां सच में‌।
प्रिंस - तो फिर मैं बाल कटवा लूंगा।
ऐसा बोलते ही वो खिलखिलाकर हंसने लग गया। 

Friday, 11 May 2018

Day -2 with prince



                                इसके घर का नाम प्रिंस है। ये आज फिर खींच के मुझे अपने घर ले जा रहा था। मैंने मना कर दिया। आज गार्डन में इसकी दादी नहीं आई थी लेकिन इसकी बड़ी बहन आराध्या साथ आई थी। आराध्या अभी 5th क्लास में है, बहुत ही तेज है। वो बोली कि भैया आपके बारे में न दादी मुझे बताई। जिस दिन आप दादी से, प्रिंस से, मम्मी से सब से मिले थे न उसी दिन घर में बात हुई। मैंने कहा अच्छा क्या बताई। दादी ने बताया कि एक भैया हैं कोई, यहाँ अभी कुछ दिन के लिए ही हैं, फिर चले जाएंगे। और आप अभी जहाँ रहते हो, पता नहीं क्या नाम बताई वहाँ गर्मी में भी कंबल ओढ़ना पड़ता है, बहुत ठंडा ठंडा होता है। और दादी बताई कि प्रिंस आपको अचानक ही देखकर आपके साथ खेलने लग गया था, और भी बहुत कुछ बता रही थी कि एक अच्छे अच्छे वाले ही भैया हुए आप, दादी वैसा ही कुछ कह रही थी पता नहीं, अभी आप मिले तो लग रहा जैसा दादी ने बताया बिल्कुल वैसे ही हो आप। आराध्या हंसते मुस्कुराते हुए एक कहानीकार की तरह ये बातें मेरे सामने मुझसे कह रही थी। मुझे ये जानकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि उस दस साल की लड़की को दादी ने जो भी बताया होगा मेरे बारे में, वो सब कुछ उसे मुंह जुबानी याद था, मुझे देखते ही वो लगातार बोलने लग गई।

गार्डन में आधा घंटा खेलने के बाद जब हम लौटे तो फिर से प्रिंस गार्डन से अपने घर के गेट तक मुझे खींचते ले गया। फिर वही रट लगाने लगा, घर चलो, घर चलो।
मैंने उससे आज कहा - क्यों। वजह बताओ।
उसने बड़े सरल भाव से कहा - ऐसी बैठना थोड़ी देर हम लोग के साथ।
मैंने कहा - लेट हो रहा है, कल आता हूं।
प्रिंस ने कहा - पानी ही पी लेना साथ में एक गिलास।
मैंने कहा - चलो कल आता हूं, दो गिलास एक साथ पी लूंगा, ठीक है।
इसके बाद वो मान गया।
मैं गार्डन के पास अपनी गाड़ी लेने गया, तब तक वे ऊपर अपने घर को जा चुके थे। बाइक आॅन करके जब मैं उनके घर से गुजरा तो आराध्या प्रिंस और उनकी मम्मी तीनों बाल्कनी में खड़े होकर हाथ हिलाकर अलविदा कर रहे थे, हां चिल्ला कर बाॅय बोलने वाला एक ही था; "प्रिंस"।

Friday, 4 May 2018

~ दो अजनबी ~


अभी कुछ देर पहले एक गार्डन में टहलने गया था, गार्डन में बहुत से बच्चे थे, उस गार्डन के गेट में जैसे ही घुसा वहीं मुझे एक बच्चा मिल गया जो पता नहीं क्यों मुझे देखते ही खुद ही मेरा हाथ पकड़ कर टहलने लग गया, अपना नाम खुद ही बताने लग गया। अपनी मां और दादी के साथ आया था लेकिन उनको पीछे छोड़ मेरे साथ तेजी से चलने लग गया। वो बच्चा चार साल का था, उस अनजान बच्चे को और मुझे मिले अभी तीस सेकेंड भी नहीं हुए थे और वो मुझे ये कहने लगा कि बोलो आप क्या खाओगे, आपके लिए घर में क्या बनवाऊं, चलो आप चलना मेरे साथ घर, हम दोनों साथ में खाएंगे। उसकी बातें सुनके मैं तो सोच पड़ गया कि ये क्या हो रहा है। वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया, मैं जैसा करता वो भी वैसे ही देखकर करने लग जाता। मेरे साथ पुश अप्स करने लगा, दौड़ने लगा, दंड बैठक करने लगा, योगासन करने लगा। एक बार तो उछल कूद करते जोर से गिर भी गया, हाथ पांव छिल गये, लेकिन जैसे ही मैं दौड़कर उसके पास गया और उसकी आंखों में देखकर मुस्कुराया तो वो जो फूट-फूट के बस रोने ही वाला था, अब हंसने लग गया और अपना सारा दर्द भूल गया और फिर से मेरे साथ खेलने लग गया, गार्डन में यहाँ से वहाँ पकड़ पकड़ के मुझे ले गया‌‌। उसकी मम्मी और दादी भी बस एकटक देखते ही रह गये कि कैसे एक अनजान के साथ इतना घुल मिल गया है, मुझे भी बराबर हैरानी हो रही थी। एक बार वो एक मशीन को पकड़ के एक्सरसाइज कर रहा था फिर उसी समय मेरा एक फोन आया तो मैं जैसे ही थोड़ी दूर चलकर गया, उतने में ही उसने चिल्लाकर कहा कि मैं जब तक ये कर रहा हूं आप यहीं रहना पास, जबकि उसकी दादी वहीं पास में थी।
पूरे एक घंटे तक मैं उसके साथ रहा, चाह के भी उससे खुद को अलग नहीं कर पाया, उसने ऐसा होने ही नहीं दिया, उसकी सारी हरकतें देखकर ऐसा लग रहा था कि शायद मैं भी तो बचपन में ऐसा ही रहा होऊंगा।
जब हम गार्डन से जा रहे थे तो उसने अपनी मम्मी का हाथ पकड़ने के बदले मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने कहा कि चलो अब मैं जाता हूं, फिर भी वो नहीं नहीं करने लग गया, आखिर में वो मुझे अपने घर लेकर ही माना। उन्होंने मुझे चाय के लिए पूछा, चाय पीता नहीं इसलिए मैंने मना कर दिया, फिर पानी पी लिया, और कुछ देर बातें हुई। एक कहानी की तरह ये सब कुछ अपने आप हो रहा था। उस चार साल के बच्चे के हिसाब से ही तो हो रहा था ये सब, शायद हम उसी के इशारों में नाच रहे थे।
अब उसकी मम्मी ने मुझसे कहा कि पता नहीं आजतक किसी अनजान से इतना घुला मिला नहीं है, आज ऐसा क्या हुआ है इसे पता नहीं आपमें ऐसा क्या देख लिया इसने कि घर तक खींच लाया। वो बच्चा वहीं था, मैंने भी उससे पूछा कि कैसे मैं ही क्यों दिखा तुमको गार्डन में, और भी तो लोग थे, मेरा ही हाथ क्यों पकड़ लिये, मैं तुम्हें नुकसान पहुंचा देता तो, तुम तो मुझे जानते भी नहीं हो न, पहली बार मिले हो, उसने प्रतिक्रिया में बड़ी गंभीर मुस्कुराहट फेर दी, जिसे सिर्फ मैं ही देख पा रहा था, समझ पा रहा था‌। फिर उसकी दादी ने कहा कि बोल भैया अच्छे हैं क्यों इसलिए? तो उस बच्चे ने सर हिलाते हुए हां किया।
फिर मैंने थोड़ी देर बाद वहां से विदा लिया।
हमेशा की तरह मैं उन सभी लोगों के बारे में कुछ भी नहीं पूछा, उस बच्चे की तस्वीर तक नहीं ली, बस उसने अपना जो नाम शुरूआत में बताया था सम्राट वही याद है। कई बार हालात ऐसे होते हैं कि आप उसमें ऐसे खो‌ जाते हैं कि फिर आपको ये ख्याल ही नहीं आता कि आपको तस्वीर भी लेनी थी।
खैर....

अधिकतर ऐसा हुआ है कि जब मैं कुछ परेशान सा रहता हूं। जब मन में तरह-तरह के सवाल घूमने लग जाते हैं कि अब समय के मुताबिक तुम्हें भी ढल जाना चाहिए। ढोंग, स्वार्थ, लिप्सा, बाजारवाद आदि आदि गुणों का समावेश कुछ मात्रा में ही सही, कर लेना चाहिए, नहीं तो जीना दूभर हो जाएगा। जब-जब टूटने को होता हूं ढेरो सवाल मन में चलते रहते हैं और तब तब पता नहीं क्यों उसी वक्त ऐसे वाकये अनायास ही होते जाते हैं। मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा कैसे होता है, क्यों होता है, किसलिए होता है, और मेरे साथ ही अधिकतर ऐसा कैसे हो जाता है। वैसे ये सब होने के बाद एक अच्छी चीज ये होती है कि मैं काफी हल्का महसूस करता हूं। ऐसा लगता है कि किसी ने मेरे अंदर तक पहुंचकर मुझे शांत करने की कोशिश की हो।

Thursday, 3 May 2018

क्या स्वच्छता को जीवन में उतारना सचमुच इतना आसान है?


                          इस झोले में सिर्फ प्लास्टिक की थैलियाँ हैं, कितनी थैलियाँ होंगी क्या मालूम लेकिन आज अचानक उठाकर देखा तो पता चला कि वजन 5 किलो से भी अधिक होगा। ये थैलियां मेरे द्वारा पिछले लगभग दस महीने में इकट्ठी की गई है। मैंने ऐसे ही‌ एक दिन सोचा कि अब से एक भी प्लास्टिक की थैली कहीं बाहर नहीं फेकूंगा, न ही कूड़ेदान में डालूंगा। शुरूआती कुछ दिनों में तो बहुत आसान लगा, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि स्वच्छता को जीवन में उतारना वाकई बड़ी सजगता का काम है। यानि आप दिन भर से थक कर घर लौट रहे हैं तो भी आपको प्लास्टिक की थैली को अपने जगह रखना है, आपका मन ठीक है, शरीर ठीक नहीं है, फिर भी आलसीपन में प्लास्टिक की थैली इधर-उधर नहीं कहीं भी नहीं फेंक देना है‌, चाहे कैसी भी परिस्थिति आए आपको हमेशा अपना ये एक काम छोटा सा काम करते रहना है। कभी-कभी तो ऐसा हुआ कि जैसे अमूमन कपड़े धोते वक्त लोगों की जेब से कोई कागज का टुकड़ा या नोट निकलता है, मेरी जेब से अधिकतर प्लास्टिक की थैलियां निकल ही जाती। मैं जहाँ जाता, प्लास्टिक की थैली अगर मेरे इस्तेमाल में आती तो उसे अपने जेब में ही रख लेता और इस वजह से मुझे हंसी का पात्र बनना पड़ता, ऐसा कई बार हुआ लेकिन प्लास्टिक की थैलियां इकट्ठी होती रही। उन प्लास्टिक थैलियों में जो बहुत साफ सुथरी और अच्छी स्थिति में थी, मैंने उन्हें फोल्ड करके कुछ एक सब्जी बेचने वालों को देना शुरू किया, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि कुछ लोगों ने लेने से मना कर दिया, फिर कुछ लोगों ने भरोसा किया और ले लिया। महीनों गुजर गए, अब ये थैलियां इकट्ठा करना धीरे-धीरे मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया या यूं कहें कि आदत में ही शामिल हो गया है। मेरी देखादेखी में मेरे आसपड़ोस के भाई दोस्त यार भी कुछ हद तक ये काम करने लगे। कुछ एक दोस्त लोग सप्ताह भर तक थैली इकट्ठा करने के बाद कहते कि इससे कौन सा क्या हो जाएगा, और इसको इकट्ठा करके क्या कर लेंगे। मेरे पास ऐसे सवालों का एक ही जवाब है कि हमें अपने हिस्से के काम को करने के लिए बहाने तलाशना छोड़ देना चाहिए। हर चीज में क्या क्यूं कैसे की आदत छोड़ कुछ ऐसे काम इसलिए भी कर देने चाहिए ताकि हमें अपने इंसान होने का बोध होता रहे।

Wednesday, 25 April 2018

Panchachuli peak-3 Unclimbed

Panchachuli-3

Panchachuli - 3
6312 metre
Picture Clicked from chulkotdhar range.

This peak is still not climbed, there have been a few expeditions and attempts. The first attempt was in 1996 via the Dakshini Balati Glacier on the Munsyari side, this attempt ended after an accident and avalanche. The second attempt was in 1998, by a large Army expedition via the Duktu Glacier on the Dhauli Ganga river side, this too was not successful as the team summiting had an accident on the final approach ridge.
Other reports of a successful climb have not been independently verified.

Data source - Wikipedia

Khuliya Top, Munsyari


                          इस तस्वीर को जब आप ध्यान से देखेंगे तो आप पाएंगे कि घास के इन मैदानों में दो आयताकर गड्ढे दिखाई दे रहे हैं। अब जो पहाड़ में रहते हैं उन्हें तो इसके उपयोग और बनाए जाने के कारणों के बारे में अच्छे से पता होगा ही। लेकिन जो पहाड़ बस एक बतौर टूरिस्ट घूमने आते हैं, उन्हें भी हम बताना चाहते हैं कि ये आयताकार खांचे असल में एक तरह के जल‌ स्त्रोत हैं, जो ढलान वाले पहाड़ों में आपात स्थिति के लिए तैयार किए जाते हैं। क्या पता कब किसी को जरूरत पड़ जाए, चाहे वे इंसान‌ हो या मवेशी। पानी की जरूरत तो अभी जीवधारियों को है।
अब पहाड़ में ऐसा है कि कुओं या तालाबों का निर्माण तो नहीं किया जा सकता तो इन‌ तरीकों से, इन छोटे-छोटे जल स्त्रोतों के निर्माण से पहाड़ों में जल एकत्र किया जाता है।
हमारे पूर्वजों की दूरदृष्टि को‌ नमन।

If you clearly watch this picture, you will observe that there are few horizontal holes in the meadows..these hollow blocks are actually small water reseviors which are made just to maintain water availability during any emergency.
It is not possible to create any pond or well in the hills so as a resultant these hollow blocks are made for water storage.
Hats off to our visionary ancestors.

नंदा देवी मंदिर, मुनस्यारी



                   डानाधार के इस मंदिर परिसर में जो यह एक छोटा सा मकान‌ है, वहाँ एक सुंदर सा कैंटीन है, जिसे देवेंद्र सिंह जी संभालते हैं, वे आर्मी से रिटायर्ड हैं, इस पूरे मंदिर परिसर की देखरेख करने का जिम्मा भी उन्हीं के हाथ में है। उनका गांव यहीं डानाधार के नीचे पापड़ी-पैकुती है। वे मंदिर परिसर को अपने घर की तरह समझते हैं, रोज आते हैं और मंदिर परिसर का जायजा लेते हैं और तो और पूरे मंदिर परिसर में दिखने वाली तरह तरह की फूलों की क्यारियां, छोटे-छोटे पौधे और तरह-तरह के पेड़ सब इन्हीं की देन है, इन्होंने ही अपने परिश्रम से इस मंदिर परिसर को पर्यटकों के लिए एक आकर्षण का केन्द्र बना दिया है। जो कोई भी मुनस्यारी आता है, भले ही एक दिन के लिए क्यों न आया हो, वह एक बार डानाधार के इस नंदा देवी मंदिर परिसर में जरुर प्रस्थान करता है।

Friday, 20 April 2018

~ कुमाऊं में रहना है, तू-तड़ाक करना है ~

                     ये साढ़े तीन साल का लड़का प्रीतेश, जब इसने मुझसे पहली बार बात की तो इसने कुछ यूं कहा - तू कहां से आया है? तू क्या करता है? मुझे शुरूआत में बड़ा अटपटा लगा कि कैसे ये मुझे तू पे तू बोले जा रहा है। पर वो तो मुझे "तू" ही बोलने वाला हुआ। प्रीतेश की आमा(मां) ने एक बार जब उसे ऐसा बोलते सुना तो उन्होंने प्रीतेश को डांट लगाई कि ऐ! भैया बोला कर। फिर भी प्रीतेश ठहरा ठेठ पहाड़ी वो तो मुझे तू ही कहता, वो जब भी मेरे पास आता, मुझसे बातें करता तो हमेशा मुझे "तू" करके ही संबोधित करता। प्रीतेश मेरे पास सिर्फ दो चीजों के लिए आता एक मैं और मेरा लैपटाॅप, उसे लैपटाॅप से उतना लगाव था ही नहीं जितना कि मुझसे था, मुझसे इसलिए क्योंकि‌ एक बार मैंने उसे पकड़कर ऊंचाई में गेंद जैसा उछाल दिया था, मेरे ख्याल में तो उसे ये भी समझ आ गया था कि मैं लंबा हूं तो सबसे ज्यादा ऊंचाई तक उसे मैं ही उछालूंगा, तभी तो वो मुझे ही इस मामले में वरीयता देने वाला हुआ। अब वो एक चीज उसे इतनी पसंद आई कि रोज उसको गेंद की तरह ऊपर उछलने का शौक हो गया, वो खाल्ली ठहरा मुझ छै फुटिए को ही तंग करने वाला हुआ। जब आता, दरवाजा खटखटाता और हमेशा आकर यही कहता - ऐ! तू मुझे ऊपर उ़छाल दे एक बार।
लेकिन इसके ठीक उलट जो किताब पढ़ने वाले यानि जो स्कूल जाने वाले बच्चे थे वे मुझे आप कहते। फिर भी कुमाऊंनी हिन्दी में तो तू का चलन है‌ ही। बाद में ध्यान दिया तो समझ आया कि संबोधन में "तू" कहना तो कुमाऊंनी हिन्दी का एक जरूरी हिस्सा हुआ, मिठास है बल इसमें भी। तभी तो दीदी, बोज्यू(भाभी) लोग भी मुझे तू ही बोलने वाले हुए। यहां यूपी बिहार टाइप तुम या आप नहीं चलता, यहां की हिन्दी को "तू-तड़ाक" में ही विश्वास है। यहाँ का "तुम" भी "तू" और यहाँ का "आप" भी "तू" है। यहाँ के "तू" में बड़ा अपनापन है रे।


Thursday, 12 April 2018

Trip to Munsyari

                        आखिरकार हमने यह फैसला लिया है कि हम अपने साथियों को मुनस्यारी की ही सैर कराएंगे, कराएंगे तो हिमालय दर्शन ही कराएंगे। समय भी तय है जून का पहला सप्ताह।‌ आने वाले कुछ दिनों में यह भी स्पष्ट कर दिया जाएगा कि आपको किस दिन का रिजर्वेशन कराना है और कब मुनस्यारी आना है। बस अभी मोटा मोटा यह समझिए कि जून का पहला सप्ताह तय है।

तो मुनस्यारी आने के लिए आपको ये करना है -
1. आपको ट्रेन से काठगोदाम या हल्द्वानी रेल्वे स्टेशन तक पहुंचना है। इसमें ट्रेन के बारे में और अधिक जानकारी आप मुझसे ले सकते हैं।
2. काठगोदाम और हल्द्वानी रेल्वे स्टेशन आगे-पीछे ही हैं। काठगोदाम इस रूट का सबसे आखिरी रेल्वे स्टेशन है और हल्द्वानी उसके ठीक पहले का स्टेशन है, बस पंद्रह मिनट का फर्क है। तो दोनों‌ से किसी एक जगह जहां भी आप पहुंचे वहां से आपको हम गाड़ी से मुनस्यारी ले जाएंगे। यहाँ से हमारी जिम्मेदारी शुरू होती है।
3. काठगोदाम आपको कैसे भी करके सुबह पहुंचना है। क्योंकि काठगोदाम से सुबह 6-7 बजे मुनस्यारी के लिए आपकी गाड़ी निकलेगी। जो कि शाम 6-7 बजे तक आपको मुनस्यारी पहुंचाएगी।
4. अगर आपकी ट्रेन की टाइमिंग थोड़ी अलग हो रही है और आप सुबह काठगोदाम पहुंचने की स्थिति में नहीं है तो आपको एक दिन पहले यानि शाम‌ को काठगोदाम या हल्द्वानी पहुंचकर एक रात स्टे कर अगली सुबह मुनस्यारी जाने के लिए तैयार रहना होगा। आप सोच रहे होंगे इतनी मेहनत, यार अब हिमालय दर्शन करना है तो इतना तो करना पड़ेगा न। बाकी हमारी तो पूरी कोशिश रहेगी कि आपको‌ किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो‌।
5. हां तो काठगोदाम से मुनस्यारी का सफर काफी लंबा और थका देने वाला है, पूरे 12 घंटे का घुमावदार पहाड़ी रास्ता, तो सबसे निवेदन है कि आप अपने साथ उल्टी की गोलियाँ जरूर रखें। गाड़ी भी आपको बता दे रहा हूं, फोर्स की ट्रेवलर में आप‌ मुनस्यारी आएंगे, जिसमें उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्तों में भी आपको बहुत कम‌ जर्क महसूस होगा फिर भी आप उल्टी की गोलियाँ जरूर लेकर चलें।
6. जूते तो आप पहनकर आएंगे ही, साथ ही आवश्यकतानुसार गर्म कपड़े भी रख लीजिएगा, अब मुनस्यारी के जून के महीने की ठंड को यूं समझिए कि मैदानी‌ इलाकों‌ का दिसंबर का महीना, यानि उतना भी नहीं होगा, कहने का अर्थ यह है कि अगर बारिश हुई तो अधिकतम तापमान उतना जा सकता है, नहीं तो दिन में मौसम सामान्य और शाम ढलते गुलाबी ठंड।
7. अगर कोई ऐसा व्यक्ति जो शराब का सेवन करता हो उनके लिए विशेष सूचना है कि आप इस ट्रिप में‌ किसी प्रकार का नशा नहीं कर पाएंगे, हम आपको ऐसा करने ही नहीं देंगे, क्योंकि हो सकता है कि कुछ फैमली वाले भी आएंगे तो हम अपनी इस एक बात को लेकर प्रतिबध्द हैं, तो अगर आप इस यात्रा का हिस्सा बनना चाहते हैं तो इस एक बात का विशेष ध्यान रखना पड़ेगा।
8. आपके ट्रेवलिंग के दिनों को अलग रखें तो मुनस्यारी में आपका ट्रिप दो से तीन दिन का होगा, इससे ज्यादा नहीं। इसमें आपको परंपरागत पहाड़ी व्यंजन खिलाया जाएगा, यहां की संस्कृति से रूबरू कराया जाएगा, रात के वक्त बोन फायर का आनंद भी मिलेगा, साथ ही आपको ट्रैकिंग कराया जाएगा। पहाड़ में 10-15 किलोमीटर की ट्रैकिंग करने के लिए अभी से खुद को तैयार कर लीजिए। क्योंकि इस पूरे ट्रिप की सबसे असली चीज यही है।
9. अब आप सोच रहे होंगे कि ये सब बता दिया वो ठीक, कितना खर्च लगेगा वो बताओ, तो ऐसा है नोमिनल रेट्स ही होगा, आपको एक बार कम लग सकता है पर ज्यादा तो लगेगा ही नहीं। आने वाले कुछ दिनों में जब रिजर्वेशन की तारीख आपको बताएंगे तो उसी के साथ इस ट्रिप के खर्च के बारे में स्थिति स्पष्ट कर दी जाएगी।
10. अब पहाड़ों में बारे में एक बेसिक जानकारी वो ये कि पहाड़ों में भी क्या है, दो तरह के पहाड़ होते हैं, एक गर्म पहाड़ और दूसरा ठंडा पहाड़, तो रास्ते भर आपको यह विरोधाभास देखने को मिल सकता है कि शुरूआत में कम ऊंचाई में ही आपको ठंडी का अहसास होगा और अचानक ऊंचाई में जाने के बाद भी तेज गर्मी का अहसास हो जाए, तो विचलित न होइएगा क्योंकि भाई अपना हिमनगरी मुनस्यारी तो सबसे ठंडा पहाड़ हुआ।
11. एक और जरूरी बात कहना चाहूंगा कि जैसे आप ट्रेन से लंबा सफर करके आएंगे और फिर काठगोदाम से ट्रेवलर की गाड़ी में बैठकर मुनस्यारी के लिए रवाना होंगे तो आपको इस बीच बार-बार ऐसा लगेगा कि क्यों‌ इतनी दूर जा रहे हैं, क्यों इतनी तकलीफ उठा रहे हैं, बस अब नहीं हो पाएगा, भाड़ में जाए ये ट्रिप, मैं यहीं से वापस चला जाता हूं, ऐसा आपको मुनस्यारी आते तक लग सकता है। मैं तो‌ हमेशा अकेले आता हूं तो मैंने इस चीज को गहरे तक‌ महसूस किया है। लेकिन एक बात कहूं जैसे ही आप मुनस्यारी पहुंचने वाले होंगे न, आप सब कुछ एक झटके में भूल जाएंगे, मैं दावे के साथ कहना चाहता हूं कि जब आप ढलती शाम में मुनस्यारी की वादियां देखेंगे, जब आप अपनी आंखों‌ के सामने हिमालय देखेंगे और जब मुनस्यारी की ठंडी हवा आपके शरीर को छुएगी तो देखिएगा आप सफर की सारी थकान एक झटके में भूल जाएंगे। फिर आप सोचेंगे, यार कितना अच्छा हुआ मैं आ गया, न जाने क्यों बेवजह घबरा रहा था।
12. आखिरी बात ये कि मुनस्यारी में पूरे समय मैं आपके साथ रहूंगा, मेरा वादा है कि आपको पहाड़ों की एक अलग ही दुनिया से रूबरू होने का मौका मिलेगा। तो फिलहाल जो भी साथी इच्छुक हैं, आना चाहते हैं, या अपने साथियों को‌ भी लाना‌ चाहते हैं, वे कृपया एक बार मैसेज में, व्हाट्स एप्प में, या कमेंट में सूचित करें।

आप चाहें तो मेरा यह पोस्ट अपने दोस्तों के साथ शेयर भी कर सकते हैं...
धन्यवाद।

Monday, 2 April 2018

My fist visit to Munsyari

साल 2015,
मुनस्यारी से गोरीपार जिस झूलापुल की सहायता से जाते हैं, उस पुल के निर्माण से संबंधित एक फेसबुक पोस्ट मुझे अचानक किसी एक पेज में दिखाई दिया, वहाँ एक भाईजी ने बड़ी सरल‌ भाषा में अपनी समस्या को सीमित शब्दों में पिरोया था, उस वक्त उन दो-तीन लाइनों को पढ़कर लगा कि कितने सही तरीके से इन्होंने अपनी बात रखी है‌। मेरी उस समय उनसे फेसबुक पेज पर ही कमेंट के माध्यम से बात हुई, फिर हमारी दोस्ती हुई और फिर कुछ यूं मैं सितम्बर 2015 में पहली बार अकेले दिल्ली से मुनस्यारी पहुंचा। मुझे कुछ नहीं पता था कि‌ मैं कहां जा रहा हूं, कब लौटूंगा, क्या करूंगा वहाँ, कैसे लोग होंगे। काठगोदाम से मैक्स की गाड़ी में बैठने के बाद बस मुझे एक ही बात याद आ रही थी जो साल 2014 में हमें एक ड्राइवर ने कहा था जब हम रानीखेत घूमने आए थे,
उस ड्राइवर ने कहा था- भाईजी एक बार मुनस्यारी हो के आओ, वो जगह सपने में आएगा‌। बस यही बात याद करके, वहाँ की तस्वीरें देखके मैं मुनस्यारी पहुँचा। मैं सिर्फ घूमने के लिए ही गया था, वहां जाकर अपने उस फेसबुक के दोस्त से मिला, उनके साथ रहा, और फिर तीन दिन के पश्चात वापस दिल्ली लौट आया।

अब वापसी के समय जो सबसे आश्चर्य की बात थी वो ये कि मैं जब मुनस्यारी से काठगोदाम वापस मैक्स की गाड़ी में लौट रहा था, मेरे आंसू बहने लगे, वैसे तो मैं कभी रोता नहीं हूं, बद से बदतर हालात में भी मेरे आंसू नहीं निकलते, खुद को संभाल लेता हूं। लेकिन उस दिन मैं‌ अपने आंसू रोक नहीं पा रहा था। मैं‌ पीछे किनारे की सीट पर बैठा हुआ था, हल्की बारिश भी हो रही थी, मेरे बाजू में बैठने वाले लोग मुझे छुपी हुई नजरों से बार-बार देख रहे थे, लेकिन वे लोग भी मुझे कोई कुछ बोल नहीं पा रहे थे, उनकी स्थिति ऐसी हो गई थी मानो किसी ने उनकी जुबान सिल दी हो, मुझे भी अटपटा लग रहा था क्योंकि मैं बिना किसी वजह के फूट-फूटकर रो रहा था, मेरे आंसू रूक‌ ही नहीं रहे थे, कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये मेरे साथ क्या हो रहा है। आप यकीन नहीं‌ करेंगे मैं लगभग घंटे भर रोया, मुझे याद है गाड़ी उस वक्त बेरीनाग और अल्मोड़ा के बीच थी। वो एक विशिष्ट अनुभव था, ऐसा लगा मानो मैं कहीं और ही हूं, ऐसा लगा जैसे शरीर के भीतर सब कुछ पिघलता जा रहा हो, एक‌ अलग ही अनुभूति, अजीब तरह का हल्कापन। वो हल्कापन ऐसा था कि जब अल्मोड़ा पहुंचने के बाद मेरा रोना शांत हुआ तो मैं उस चीज को फिर से पाने के लिए ऐसा तड़पा कि मुझे कुछ घंटे और रोने का मन होने लगा, ऐसा लगा कि बस आज ये पूरा दिन‌ रोता रहूं। मुझे बहुत गुस्सा आई कि मैं फिर से क्यों नहीं रो पा रहा हूं, मैं आंखें बंद करके फिर से सोने की कोशिश करता कि फिर से वो मजबूत सा अहसास वापस लौट आए और मुझे और कुछ घंटों के लिए रूला दे। पर फिर ऐसा कभी नहीं हुआ। वो जो भी था, आखिरी था।

कुछ घंटों के पश्चात ये घटना मेरे दिमाग से हट गई, मुझे याद रहा तो सिर्फ अपना रोना। एक ऐसा रोना जिसकी कोई वजह ही नहीं थी, बस मैं रोया। उस दिन के बाद से पता नहीं क्यों मेरा पहाड़ों के प्रति एक अलग ही तरह का ज्यादा लगाव स्थापित हो चुका है।


Tuesday, 20 March 2018

~ क्या रखा है इन पहाड़ों में ~

सितम्बर 2015,
मैं मुनस्यारी से काठगोदाम वापस लौट रहा था। मैक्स की जिस गाड़ी में मैं आ रहा था, उसमें चार लोगों का एक परिवार भी था, पति-पत्नी और दो बच्चे। वे जो भाईसाहब थे, उनकी पत्नी और उनके वे दोनों बच्चे रास्ते भर भयंकर उल्टी करने लगे।
वे मुनस्यारी के ही थे, उन्होंने बताया कि छुट्टी में आए हुए थे मुनस्यारी और अब वे वापस जा रहे हैं दिल्ली, फिलहाल दिल्ली ही रहते हैं, वहीं कोई प्राइवेट नौकरी करते हैं। ऐसे साल में कभी मौका देखकर मुनस्यारी आ जाते हैं।
मैंने उनके बच्चों को उल्टी करते देखा तो मेरे पास जो भी उल्टी की गोली और कुछ मिंट वाली टाॅफी थी, मैंने उन्हें सब दे दिया। अल्मोड़ा आते तक उनका उल्टी करना पूरी तरह से बंद हो गया।

गाड़ी अभी अल्मोड़ा के एक बैंड(मोड़) में बाल मिठाई वाले की दुकान के पास रूकी हुई है, वे मुझसे आगे आकर बात करते हैं और शुक्रिया कहते हैं, और फिर हमारे बीच रोजगार वगैरह को लेकर कुछ हल्की फुल्की बातें होती है।
इसी बीच वे सामने एक खड़े पहाड़ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं - " क्या रखा है इन पहाड़ों में, कुछ भी तो नहीं है".
मुझे आज भी याद है हूबहू उन्होंने ऐसा ही कहा था। उस वक्त उनकी वो बात सुनकर मैं एकदम चुप सा हो गया था,कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पाया। सच कहूं तो रंज हुआ उनकी बात सुनकर। मैं सोचने लगा कि जिन पहाड़ों से मैंने इतना गहरा लगाव महसूस किया है, वहाँ वे ऐसा क्यों कह रहे हैं कि कुछ भी नहीं है, इतना कुछ तो है यहाँ, फिर भी वे इन पहाड़ों को छोड़कर आखिर क्यों चले गये?
फिर लगा कि ऐसी सोच रखना ठीक नहीं, उनकी भी अपनी कुछ जिम्मेवारियां होंगी, रोटी,कपड़ा,मकान रूपी उनकी भी कुछ समस्याएं रही होंगी। इसलिए उन्होंने पलायन किया होगा और वैसे भी एक दो बार घूमकर तो इन खूबसूरत पहाड़ों से तो कोई भी लगाव महसूस करेगा लेकिन वो एक भावनात्मक जुड़ाव के अलावा और कुछ भी नहीं होगा।
तो उस दिन उनकी कही गई उस बात से मेरा पहाड़ों के प्रति लगाव कम होने के बजाय और बढ़ गया। और फिर मैंने कुछ महीने पहाड़ में ही पहाड़ियों की तरह रहने का फैसला किया साथ ही एक पहाड़ी की तरह खान-पान, रहन-सहन और आचार-व्यवहार के तरीकों को भी अपनाया।
तो कुछ महीने यूं पहाड़ों में रहने के बाद मन में ढेरों सवाल आए, उनमें से कुछ सवाल जो उन भाईसाहब(जो गाड़ी में मिले थे) को केंद्र में रखकर मैं करना चाहूंगा वो इस तरह हैं-
मैं उन्हें कहूंगा---
- जिन Basic needs( मूलभूत जरूरतों) के लिए आपने पलायन को चुना है वे आखिर होती क्या हैं?
- क्या महंगे स्कूल में बच्चों की पढ़ाई, मार्बल टाइल्स वाले घर, गाड़ी, शापिंग माॅल की खरीददारियां क्या मूलभूत जरूरतें यही होती है?
- अगर मूलभूत जरूरतें यही है तो ये भी जरा बताइए कि क्या दिल्ली जैसे शहर में आपके बच्चों का सर्वांगीण विकास हो रहा है, क्या उनको वहां इन पहाड़ों की तरह शुध्द हवा मिलती है, क्या यहाँ की तरह साफ मीठा पानी मिलता है?
- स्वच्छ हवा और पीने लायक शुध्द पानी मूलभूत जरूरतें नहीं है क्या दाज्यू?
- चलिए इन्हें भी छोड़िए खान-पान पर आते हैं, जहाँ हवा और पानी शुध्द नहीं है वहाँ आपको क्या इन पहाड़ों की तरह ताजे फल और सब्जियाँ मिल सकती है? क्या पहाड़ों जैसा स्वाद मिल सकता है?
- क्या वहाँ आपके बच्चों को यहाँ की तरह दूध,घी,मट्ठा, बुरांस का जूस मिल पाएगा, क्या मिल पाएगा माल्टा, काफल, हिसालु, घिंघारू का स्वाद। पतूर, भट्ट की दाल, मड़ुवे की रोटी, गहद, जम्बु की छौंक से बना रायता, कढ़ी, भांग की चटनी और न जाने कितना कुछ।
- आप ही बताएं कि आपके बच्चे पहाड़ों में ज्यादा स्वस्थ रहेंगे या मैदानी महानगरों में?
- क्या वहां रहकर आप अपने बच्चों को दादा-दादी, नाना-नानी का प्यार दिला पाएंगे?
- जिन पहाड़ों में सबसे ज्यादा संयुक्त परिवार हैं, लोग इतने मेलजोल के साथ रहते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा साथ निभाते हैं, इस कठिन जीवनशैली में भी हर महीने कोई न कोई पर्व त्यौहार मना लेते हैं। आपने इन सभी चीजों को नौकरी और रोजगार के चक्कर में छोड़ दिया, आप ही बताएं कि क्या करोड़ों रुपए लुटाकर भी आपको यह अपनापन उस बनावटी दुनिया में कहीं मिल पाएगा?
न जाने ऐसे कितने सवाल हैं, शायद इनमें से कुछ एक सवाल समय के हिसाब से अप्रासंगिक लग सकते हैं वैसे भी कुछ महीनों के अनुभव से जो देखा,वही लिखा है।
और इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पहाड़ों में पलायन के दर्द को समझते हुए आपको भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझते हुए स्वावलम्बन के विभिन्न तरीकों की ओर ध्यान देकर पहाड़ लौटना चाहिए। नहीं, ऐसा करना संभव नहीं दिखता। लेकिन जब तक ऐसा संभव ना दिखे, हम जैसे सिरफिरे पहाड़ों की खाक छानते रहेंगे, आपको आप ही के मूल्यों, रीति-रिवाजों, त्यौहारों, खान-पान, आचार-व्यवहार के तरीकों के बारे में समय समय पर बताते रहेंगे।

चौना-मटैना गाँव, तहसील- मुनस्यारी, उत्तराखंड





Sunday, 18 March 2018

~ पहाड़ों का सफर ~

जब कभी उत्तराखंड जाना होता है या वापस लौटना होता है तो सफर के दौरान हमेशा कुछ न कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिस पर यकीन करना भी मुश्किल सा लगता है...

एक बार मैं मुनस्यारी से काठगोदाम लौट रहा था, ट्रेवलर की उस गाड़ी में मेरे बाजू में एक लड़की बैठी थी, वो जब से मुनस्यारी से बैठी थी, काठगोदाम आते तक किसी लड़के से फोन पर धीमी आवाज में बतियाती रही। बेरीनाग से खाना खाकर जब हम आगे बढ़े तो उसने कोलड्रिंक की एक बोतल ले ली, और ऊपर मुंह करके पीने लगी, फिर उसके बाद उसने मेरी ओर थमाते हुए कहा - लो आप भी पियो। उसका आग्रह सुनते ही मुझे एक पल के लिए इतनी शर्म महसूस हुई, वो इसलिए कि अभी कुछ घंटे पहले ही मैं उसके सामने मुट्ठी मुट्ठी भर चिप्स एक बार में भुक्खड़ की तरह खा रहा था। क्या करता लड़का होकर उसे पूछता तो पूछता कैसे। उसके आग्रह ने मुझे दुविधा में डाल दिया, मन का एक कोना आखिरकार बोलने लग गया कि कहाँ गये तेरे पहाड़ी संस्कार, बाजू में कोई बैठा हुआ है फिर भी तुने अकेले खा कैसे लिया। लड़का होकर तुझे आगे से बात करने में अटपटा लगा सो ठीक पर भूख को तो स्थगित किया जा सकता था। 
फिर मैंने उस लड़की को मना किया कि मैं नहीं पीता कोलड्रिंक, आप पीयो। उसने फिर ऊपर मुंह करके पीया और कोलड्रिंक की बोतल को हम दोनों की सीट के बीच की खाली जगह में रख दिया। फिर मैंने कुछ देर सोचा और उसे चिप्स का पैकेट दिया और कहा कि लो आप भी खाओ, मैं कोलड्रिंक नहीं पीता तो क्या हुआ, आप तो ये खा ही सकते हो, फिर उसने चिप्स खाया और खिड़की खोलकर किनारे अपना सर टिकाकर उंगलियों से अपने बालों को कंघी करते हुए फिर से बात करने लग गई। बीच में उसने मुझसे कहा भी कि यार मैं बात कर रही,डिस्टर्ब होगा तो बता देना न।
शाम के 6 बज चुके हैं,
गाड़ी काठगोदाम पहुंच चुकी है। मैं काठगोदाम रेल्वे स्टेशन की ओर जाते हुए यही सोच रहा हूं कि भारत में ऐसी और कितनी जगहें बची होंगी जहाँ ऐसी संस्कृति मिलेगी। फिर हमेशा की तरह बात वहीं पर आकर रूक गई कि यार कुछ चीजें न पहाड़ों में ही संभव है।

Tuesday, 13 March 2018

- ऐसा लगा मानो किसी गाँव का प्रधान(सरपंच) आया हो -

                             ये तस्वीर अगस्त 2016 की है। मुनस्यारी,उत्तराखंड के दरकोट गाँव में पत्थर से निर्मित माँ भगवती मंदिर का उद्घाटन मुख्यमंत्री जी के द्वारा होना था, साथ ही आज दरकोट में मेला लगा था। मुख्यमंत्री जी अपने एक मंत्री के साथ दरकोट पहुंच चुके थे। मुझे भी हमारे दोस्त ने कहा कि चलो यार दरकोट होकर आते हैं, उधर एक जगह खाने का न्यौता भी है, आपको पतूर खिलाते हैं। "पतूर" एक प्रकार का पहाड़ी व्यंजन है। तो ये जो खाने के लिए निमंत्रण मिलता है, यह भी एक विशेष तरह की परंपरा है, इसका एक कोई नाम भी है, नाम भूल रहा हूं। तो इसमें होता यह है जहाँ जिस गाँव में मेला लगता है, वहाँ अगर आपके कोई रिश्तेदार हैं, उनके यहाँ आपके और आपके साथ जितने भी साथी आ रहे हों, चाहे दस, बीस, तीस लोग। सबके लिए भोजन की व्यवस्था रहती है।
उसी दिन मैंने पहली बार "तिमूर" भी खाया, तिमूर काली मिर्च की तरह दिखता है, उसका स्वाद कुछ ऐसा था जैसे किसी ने मुट्ठी भर लौंग मेरे मुंह में ठूंस दिया हो। यानि तिमूर खाने के बाद जो पूरा मुंह सुन्न हुआ वो अगले एक दो घंटे तक बना रहा, इस बीच अगर मैं कुछ खाता भी तो मुझे उसका स्वाद न मिल पाता।
                             दरकोट में आसपास के सभी गांवों से लोग इकट्ठे हो चुके थे। मंत्री जी के लिए एक छोटा सा स्टेज बना हुआ था, वहीं से उन्होंने जनता को संबोधित किया। संबोधन से पहले जब वे ढोल बजाते हुए जनता के बीच आए तो लोगों की प्रतिक्रिया कुछ ऐसी थी कि मानो अपने ही घर का व्यक्ति हो, सब अपने-अपने जगह से हाथ जोड़कर नमस्ते कर रहे थे, न तो सेल्फी लेने की होड़ दिखी न ही कैमरों की भीड़।
                             यूं लगा कि वाकई हिमनगरी मुनस्यारी में ही यह संभव है। और तो और मुख्यमंत्री जी के आसपास कोई खास सिक्योरिटी भी नहीं थी, ऐसा था कि कोई भी पास जाकर मिल ले, गले लगा ले। जब वे वापस भी गये तो एक पुरानी सी तवेरा में बैठकर गये, उस गाड़ी की खिड़कियां भी खुली थी।
उनका वो छोटा सा काफिला जब लोगों के बीच से गुजर रहा था तो लोगों की प्रतिक्रिया ऐसी थी मानो कोई साधारण सा व्यक्ति जा रहा हो।
मैं ये सब देखकर हैरान हो गया, मैंने अपने दोस्त से पूछा- ये क्या था?
उन्होंने बताया - यार यहाँ तो ऐसा ही है, यही यहां की संस्कृति हुई और क्या। मंत्री जी का बस चले तो वे यहीं रह जाएं, उन्हें मुनस्यारी और जोहार से इतना लगाव है कि यहाँ के हर त्यौहार,मेले में पहुंच ही जाते हैं।
                             दरकोट के इस मेले में अधिकतर लोग 10-10 किलोमीटर दूर से अपने सीएम को सुनने आए थे,कोई पैदल तो कोई गाड़ी में, असल में ये खुद से आने वाली भीड़ थी। उस दिन मौसम भी साफ था, पर अचानक हल्की बारिश शुरू हो गई, मुनस्यारी का मौसम भी अजीब है, कभी-कभी तो Accuweather वगैरह भी काम नहीं करता है, कभी भी कुछ भी हो जाता है। इसलिए इस फोटो को आप देखिए, अधिकतर लोगों के पास अपना छाता है। सीएम को सुनने की दिलचस्पी लोगों में कुछ ऐसी थी कि बारिश में भी अधिकतर लोग रूके रहे। और फिर जब भिगते हुए मैंने इस पूरे दृश्य को देखा तो तस्वीर लेने से खुद को रोक नहीं पाया।