Tuesday, 17 October 2017

~ बादनी - मदकोट ट्रैकिंग ~

                            हम मुनस्यारी तहसील के गोरीपार क्षेत्र के चिलकोटधार गाँव से शाम को निकलकर रात होते तक पैदल ढलाननुमा रास्ते से बादनी पहुंच चुके थे। हम जिस दोस्त के साथ बादनी आये, उन्हीं के कोई परिचित थे जिनके यहां बादनी में हमने रात्रि विश्राम किया। बादनी में हम जिनके यहाँ रूके हुए थे वहाँ हमने घर के घी से सने हुए पराठे खाए और उनके यहां के गौशाला का गाढ़ा दूध पिया। उस दूध का स्वाद आज भी भुलाया नहीं जाता, वो दूध इतना गाढ़ा था कि मैदान का आदमी नहीं पचा पाएगा, जो रोजाना अपना शारीरिक बल आजमाता हो ऐसे ही लोग इतना गाढ़ा दूध पचा सकते हैं।
                           अब ऐसा हुआ कि सुबह होते ही मैंने पूरा प्लान बदल लिया। जिस दोस्त के साथ हम बादनी पहुंचे थे उन्हें मैंने वहां से अलविदा किया और अपना आगे का रास्ता बदलने का सोचा। इत्तफाक से किस्मत भी ऐसी कि बादनी में हमने जिनके यहां रात्रि विश्राम किया था उन्हें मदकोट जाना था और फिर वहां से वे मुनस्यारी जाने वाले थे। मुझे भी मुनस्यारी वापस लौटना था। तो मैं उन्हीं के साथ सुबह 6 बजे पैदल चिलकोटधार की पहाड़ियों के रास्ते होते हुए मदकोट की ओर निकल गया। बादनी से मदकोट की यह दूरी लगभग 12 से 15 किलोमीटर की थी। हमने जो बादनी से चलना शुरू किया लगातार चलते रहे और लगभग 5 किलोमीटर की दूरी नाप लिए। शुरूआत में रास्ता सीधा-सपाट था, ज्यादा चढ़ाई नहीं थी। हम जब चल रहे थे तो मेरे जूते बार-बार पत्तियों के संपर्क में आकर फिसल रहे थे और मैं खुद को संभालते हुए आगे बढ़ रहा था, असल में मेरे जूतों की तली घिस चुकी थी। महीनों तक पहाड़ों में चल-चलकर मैंने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया।
                           चिलकोट की पहाड़ियों को पार करते हुए हम तेजी से आगे बढ़ रहे थे। सुबह ठीक-ठाक ठंड थी फिर भी लगातार चलते रहने की वजह से हमें पसीना आने लगा था। मैं आगे-आगे चल रहा था और हमारे जो दोस्त थे वे मेरे पीछे चल रहे थे। अचानक से उन्होंने मुझे कहा यार रूकते हैं थोड़ी देर। मैंने कहा - ठीक है। वे थोड़े से थक गये थे। पर मुझे पता नहीं क्या हो गया था, चलने का एक अलग ही धुन सवार था। मुझे उतनी थकान महसूस नहीं हुई जितनी होनी थी। अब हम जब शांत पहाड़ी में बैठे थे तो मैंने उनसे कुछ-कुछ सवाल पूछे कि--
- यार दाज्यू मैं मिलम ग्लेशियर तक चले जाऊंगा न? 70 किलोमीटर की दूरी है तीन दिन का समय लगता है, रास्ता भी काफी दुर्गम है जान का खतरा है, सुना है बहुत पत्थर गिरते हैं वहाँ ऊपर पहाड़ियों से। और पता नहीं मैंने एक सांस में कितने सारे सवाल कर लिए उनसे।
उन्होंने कहा- यार आप तो मुझसे भी अच्छा चल रहे हो। इस तरह से चलोगे तो तीन दिन क्या दो दिन में ही पहुंच जाओगे। बिल्कुल पहाड़ी लोगों की तरह चल रहे, आप मुझे सच में कहीं से भी मैदान के नहीं लग रहे। अब उन्होंने मेरे जूतों को देखकर कहा- आपका जूते का तली देख के तो मुझे डर लग रहा है, मैं ये जूता पहन के अभी चल रहा होता तो कब का खाई में गिर गया होता, पता नहीं आप इन जूतों में कैसे चल ले रहे हो। उनकी ये बातें मेरे लिए किसी पुरुस्कार से कम नहीं थी और फिर मेरा चलने का हौसला दुगुना होता गया।
                            मैं जिनके साथ मदकोट जा रहा था उन्हें चिलकोट की पहाड़ियों में ही बकरी वालों तक भांग/गांजा/माल पहुंचाना था। उन्होंने आवाज लगाई और बकरी वालों को ढूंढकर उन तक सामान पहुंचा दिया। जब वे बकरी वालों से मिलकर वापस आ गये तो उन्होंने एक घटना का जिक्र किया कि बकरी वाले बता रहे थे कि कल चिलकोट की पहाड़ी से पत्थर गिरने की वजह से उनकी दो बकरियां खाई में गिरकर मर गई। अब उन्होंने बताया कि यहाँ से पत्थर गिरते ही रहता था, हर साल ऐसी घटनाएँ आम है। अब मुझे थोड़ी घबराहट होने लगी क्योंकि हम अभी उसी रास्ते से गुजर रहे थे जहाँ एक दिन पहले बकरियों की जान चली गई थी। हमारे दोस्त ने कहा - आगे थोड़ा संभल के चलना, पगडंडियां अब थोड़ी जर्जर हालत में मिलेगी। मैं मन ही मन सोच रहा था कि आगे का रास्ता और दुर्गम होगा फिर मैंने सोचना छोड़ दिया और इस बारे में उनसे ज्यादा कुछ पूछा भी नहीं और हम बस चलते गये।
                            हमारे दोस्त ने बकरी वालों के बारे में यानि गड़रियों के बारे में एक गजब की बात बताई। उन्होंने कहा कि बकरी वाले पैदल ही बकरियों को चराते हुए मुनस्यारी से मैदानों क्षेत्रों तक यानि रामनगर तक ले जाते हैं। चूंकि पहाड़ों में ठंड के समय चारे की समस्या होती है तो वे ठंड शुरू होने से पहले ही मैदानों का रूख कर लेते हैं। लगभग 300 किलोमीटर के इस पहाड़ी रास्ते को वे तीन महीने में पूरा करते हैं और फिर वापसी में तीन महीने। यानि छः महीने के एक लंबे सफर के बाद वापस मुनस्यारी लौटते हैं। तब तक पहाड़ों में भरपूर चारागाह उपलब्ध हो जाता है।
                            मैं उनकी बातें कहानी की तरह सुनते जा रहा था, हमारी दायीं ओर मदकनी(मदकन्या) नदी की कल-कल धारा थी, यह नदी पंचाचूली ग्लेशियर से निकलती है और बायीं ओर गोरीगंगा नदी अपने पूरे प्रवाह में बह रही थी जिसका उद्गम स्थल मिलम ग्लेशियर है। और बीच में हम चल रहे थे। बातें करते-करते  कब 11 बज गये पता ही नहीं चला, हम 5 घंटे की पैदल यात्रा कर मदकोट पहुंच चुके थे। हमने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था, चूंकि इस 5 घंटे की चलाई के दौरान हमने पानी की एक बूंद भी नहीं पी थी, तो अब हमने आखिरकार मदकोट पहुंच कर ही पानी पिया और रोटियां खाई। घंटे भर में मदकोट में तहसील कार्यालय का काम निपटाकर अब हम मुनस्यारी जाने की तैयारी करने लगे।

Chilkotdhar Range


Me and my friend from baadni village


Group of Sheeps


My friend with the shephard

Goriganga River

Sheeps All the way


Madkot- Munsyari road

A Wide view of Khulliya Top from chilkotdhar


TREKKING THROUGH CHILKOTDHAR RANGES

Monday, 16 October 2017

~ 25 रुपए में 1200 किलोमीटर का सफर ~

                                अगस्त 2015 की बात है। मैं दोपहर को दिल्ली हजरत निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन में था। दिल्ली से मेरी ट्रेन रायपुर के लिए थी। मैंने पहले ही गोंडवाना एक्सप्रेस की स्लीपर क्लास की टिकट करा ली थी। ट्रेन आने में अभी एक घंटे का समय बचा था। मैं एटीएम की तलाश में इधर से उधर भटक रहा था। उतने में ही घर से फोन आया कि आज सारे बैंक बंद हैं। अब कल पैसे डाल देंगे तेरे एकाउंट में। मेरे तो पांव तले जमीन खिसक गई। जेब और बैग खंगाला तो पता चला कि अब मेरे पास मात्र पच्चीस रुपए रह गये हैं।
                                घरवालों से भी मुझे उसे दिन पैसे डलवाने थे। मैंने पहले किसी को कहा भी नहीं कि पैसे खत्म होने को है। जो दोस्त मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था, मैंने उससे भी पैसे उधार नहीं लिए। मेरा स्वाभिमान अपने चरम पर था और अब सामने मेरी परीक्षा होनी थी। 22 घंटे का लंबा सफर और हाथ में मात्र पच्चीस रुपए। ट्रेन छूटने में पंद्रह मिनट रह गया था, मैं अब यह सोचने लग गया कि इस पच्चीस रुपए का कैसे सदुपयोग किया जाए। क्योंकि अब पैसे मिलने की लगभग सारी संभावनाएँ समाप्त हो चुकी थी। जिन दोस्तों से नेट-बैंकिग रूपी बची-खुची संभावनाएँ थी उसे भी मेरे स्वाभिमान ने खत्म कर दिया। अब अगले दिन सुबह ग्यारह बजे बैंक खुलने का इंतजार करना ही आखिरी रास्ता था। दोपहर तीन बजे से अगले दिन के सुबह ग्यारह बजे का ये पूरा समय, आखिर कटे तो कटे कैसे। आखिर इन पच्चीस रूपयों का क्या किया जाए। मैंने थोड़ी देर सोचा फिर उस पच्चीस रुपए में से दस रुपए का एक लोकल पानी बोतल खरीदा और उसमें से सारी पानी फेंककर रेल्वे स्टेशन में नल से मिलने वाला पीने योग्य पानी भर लिया। और फिर मैं रास्ते भर यही करता रहा। ठीक-ठाक गर्मी थी। इसलिए पानी की जरुरत भी बढ़ गई थी। जब भी कोई स्टेशन आता मैं दौड़कर उतरता और पानी भरता।
                              शाम के पांच बज चुके थे। ट्रेन को चले अभी बमुश्किल दो घंटा भी नहीं हुआ था कि मुझे भूख लगने लगी। मुसीबत ऐसी कि उस दिन मेरे बैग में खाने का कुछ भी सामान नहीं था, अब जो कुछ भी था उस पच्चीस रुपए के सहारे था। उसमें से भी तो अब पंद्रह रूपये बच गये थे। गोंडवाना में पेंट्रीकार नहीं रहती। पर फिर भी चाय समोसे वाले गुजर रहे थे। मैंने हमेशा की तरह इन चीजों से खुद को दूर रखा। और फिर कुछ देर में एक चने वाला आया मैंने उससे दस रुपए का चने खरीद लिए और पांच रूपये बचा लिए। दस रुपए का जो मैंने चना खरीदा था वो मैंने आधा खाया, पेट में कुछ गया नहीं गया पता ही नहीं चला। अब ये ट्रेन का मेरा सफर एक नया मोड़ लेने जा रहा था। शाम के छ: या सात बजे के बीच का समय रहा होगा। उसी समय मथुरा से एक पूरा परिवार चढ़ा। महिलाएँ, बच्चे और एक दादी। सारी की सारी छः सीट मेरे बर्थ के आसपास। साइड अपर में एक कोई बुजुर्ग थे और मैं अपर बर्थ में। बाकी की छः सीट उन परिवार वालों की थी। मैं अब अपर बर्थ में जाकर लेट गया और बाकी बचे चने भी खा लिया। और पानी पीकर लेट गया।
                              अपर बर्थ में कुछ देर लेटा रहा, फिर नीचे उतरकर ट्रेन के दरवाजे के पास जाकर थोड़ी हवा खाई और फिर नीचे लोवर बर्थ में आकर बैठ गया। मथुरा से जो परिवार चढ़ा था। उनके साथ एक बच्चा था, जो लगभग पांच साल का रहा होगा वो मेरे साथ खेलने लग गया। मैं भी उसके साथ कुछ देर खेल लिया। अब चूंकि उस बर्थ में मैं अकेला ही था तो उस बच्चे की दादी से मेरी हल्की फुल्की बातें शुरु हो गई। उन्होंने बताया कि वे गोंदिया वापस अपने घर लौट रहे हैं। दादी ने बताया कि वे काशी, हरिद्वार, ऋषिकेश, वृंदावन, मथुरा आदि जगहों से घूम कर आ रहे हैं। पंद्रह दिन की यात्रा के बाद वे अपने घर गोंदिया(महाराष्ट्र) लौट रहे थे।
                              जो दादी थीं उनसे मेरी अच्छी खासी बात हो गई, क्योंकि वे भी उत्तराखंड की यात्रा से लौट रहे थे, और मैं भी तो महीने भर पहले वहीं था,इस एक वजह से हमारी काफी बातें मिल गई। और ये पहली बार ऐसा हुआ कि मैंने ट्रेन के सफर में किसी से इतनी बात की हो। अब उन्होंने कुछ खाने-पीने की चीजें निकाली और शायद कुछ मिठाइयाँ खाने लगे। उन्होंने मुझसे भी पूछा तो मैंने मना कर दिया। जब वे जिद करने लगे तो मैं भी सोचा कि ये सब क्या हो रहा है। फिर मैंने उन्हें कहा कि नहीं आंटीजी मेरा उपवास है। तभी उस पांच साल के बच्चे ने जो मेरे साथ खेल रहा था, वो बड़ा तेज बच्चा निकला। उसने तुरंत चिल्लाकर कहा कि मम्मी अभी कुछ देर पहले भैया ऊपर बैठ के चना खा रहे थे। उस बच्चे ने तो मुझे धर्मसंकट में डाल दिया। मेरा झूठ पकड़ा चुका था, उस बच्चे की बात से मैं झेंप सा गया। वो आंटी हंसने लगी और कहा लो बेटा अब तो खा ही लो। लंबा सफर है. मेरे पास अब बोलने के लिए कुछ भी नहीं था, मना करता तो भी कैसे, विवश होकर मैंने उनकी दी हुई मिठाई खा ली और पेट भर पानी पी लिया। मीठा खाने के कारण मेरी भूख थोड़ी शांत हुई। अब मुझे कुछ खाने का मन भी नहीं कर रहा था। लेकिन अब नींद आने की समस्या थी। बड़ी मशक्कत के बाद रात के 11 बजे के आसपास मैं सो गया।
                            अगले दिन सुबह 5 बजे मेरी नींद खुल गई। सुबह ब्रश करने के बाद जो भूख लगी उसकी कोई सीमा न थी। एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो रहा था। जैसे-तैसे तीन घंटे बीत गये। 8 बजे उस परिवार के लोगों ने फिर मिठाई निकाली और फिर मुझे मिठाई खिलाई। दादी ने मुझसे एकदम पूछ ही लिया कि बेटा तुम रात को खाना खाए कि नहीं, मैंने तो अभी तक तुम्हें कुछ खाते देखा नहीं। मैंने उन्हें कहा कि रात को ट्रेन रूकी थी तब बाहर जाकर कुछ-कुछ खा लिया था।कुछ इस तरह गोल-गोल घुमाकर मैंने गेंद फेंक दी और दादी ने लपक ली और मुझे दादी के सवालों से मुक्ति मिली। सुबह के 11 बज चुके थे, मेरे फोन में पैसे आने का मैसेज आ चुका था। अब मैं ट्रेन रुकने के इंतजार में था कि अब कोई स्टेशन आए और मैं पैसे निकालकर कुछ खाऊं।
एक कोई स्टेशन आया मैं खुशी-खुशी उतरा पर वहाँ एक भी एटीएम नहीं था। फिर कुछ देर बाद एक और स्टेशन आया वहाँ एटीएम था। मैं दौड़कर गया, पता चला कि एटीएम से पैसे नहीं निकल नहीं रहे थे। उसके बाद फिर एक स्टेशन आया वहाँ एटीएम से पैसे निकल गये। मेरा ट्रेन के सफर का ये संघर्ष अब अपने आखिरी पड़ाव को पार कर सुकून से बैठ गया।
                            अब मैं सोचने लगा कि चलो अब कुछ खाने-पीने की चीजें खरीद ली जाए। पर मैंने कुछ नहीं खरीदा। मेरी भूख शांत हुई या क्या हुआ पता नहीं पर पैसे आने के पश्चात भी मैंने उस दिन कुछ भी नहीं खरीदा। सफर में अभी तीन घंटे और बचे थे। मैंने पानी की बोतल भर ली और मुस्कराकर अपने बर्थ में आकर सो गया। शायद उपवास या रोजा रखने वालों की तरह मैं भीतर तक शांत हो चुका था।

Saturday, 14 October 2017

रफ कॅापी Part - 3

महीने भर के बाद अनिरुद्ध फिर शालिनी को फोन लगाता है।

अनिरुद्ध - शालिनी प्लीज फोन मत काटना, दो मिनट के लिए मुझे सुन लो कि मैं क्या कहना चाहता हूं फिर तुम्हारी मर्जी। विनती कर रहा हूं बस एक बार के लिए मुझे अपनी बात पूरी करने दो।

शालिनी - ठीक है बोलो।

अनिरुद्ध - तुम मेरे सपने में आई थी। पता है सपने में तुम बहुत खूबसूरत लग रही थी। तुमने गुलाबी और सफेद रंग का कोई ड्रेस पहना हुआ था।  हम दोनों साथ में कहीं घूमने निकले थे, हम किसी बड़े से झरने के आसपास थे, वहाँ हम दोनों बैठकर बातें कर रहे थे, तुम बार-बार पलकें झपकाकर मुस्कुरा रही थी, तुम बहुत खुश थी मुझसे बात करके। अब ऐसा हो रहा था कि तुम बार-बार झरने को देखकर और उसकी आवाज को सुनकर आंखें बंद कर लेती थी और मैं फिर तुम्हें चुपके से देख रहा था, जो सुकून तुम्हें उस झरने से मिल रहा था, वो मुझे तुम्हें देखकर मिला। एक पल के लिए लगा कि कोई तितली किसी फूल पर बैठी हुई है और हिलने का नाम तक नहीं ले रही। मेरा मन कर रहा था कि धीरे से उस तितली को छू लूं और हमेशा के लिए अपने पास रख लूं।
सपने के दरम्यान मैं बार-बार प्रभु से यह प्रार्थना कर रहा था कि काश ये सिर्फ एक सपना मात्र न हो। लेकिन उठा तो समझ आया कि मैं एक दूसरी ही मायावी दुनिया का हिस्सा था।
इस सपने में आकर तुमने मेरे जहन में ऐसे भाव भर दिए हैं कि मुझे अभी तुम्हारे अलावा कुछ भी नहीं सूझ रहा। समस्त रिक्तियों को भरकर मानो तुम्हारे प्रेम ने मुझे अपने अंतर में रोक कर रख लिया है। सारी उर्जा, मन के सारे भाव और संवेदनाएँ हर जगह तुम अपना अधिकार जता रही हो। ऐसा लगता है कि तुमने मुझे एक ठहराव की ओर खींच लिया है, और उस ठहराव में सिर्फ तुम और मैं।
शालिनी तुम अभी भी मेरी आंखों के सामने झूल रही हो। मुझे नहीं पता कि भाग्य को क्या मंजूर है लेकिन मैं तुम्हें अपनाकर ही रहूंगा।

शालिनी - तो अपना लीजिए न मुझे किसने रोक रखा है। और एक बात याद रखिएगा आपके ऐसे सपनों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मैं इन सब मामलों में अब नहीं बहने वाली, इन सब बातों से मेरा ह्रदय नहीं  पिघलने वाला, बल्कि मुझे तो तकलीफ होती है। आप सपनों की ऐसी बातें कर मुझे कमजोर कर देते हैं, मेरा मन छोटा हो जाता है। ऐसे सपनों का जिक्र कर मुझे एक खोखली उम्मीद की ओर ना धकेलें तो इसी में मेरी  भलाई है। आप बिना कुछ कहे मुझे अपना लें मैं सिर्फ इतना ही तो चाहती हूं।

अनिरुद्ध - ठीक है। पर मैंने जो सपने में देखा वही बात तुम्हारे सामने रखी है। मैं खुद को रोक नहीं पाया। मैं अगर तुम्हें बताता नहीं तो मेरे अंदर ये बातें रह-रहकर मुझे परेशान करती, इसलिए मैंने तुम्हें बताना जरूरी समझा। मैं नहीं कहता कि तुमसे अपनापन मिलने की उम्मीद में ये सब कह रहा हूं। जब लगा कि दिल भारी हो गया है नहीं बता पाया तो मन मसोस कर रह जाऊंगा। इसलिए मैंने बता दिया।

शालिनी - बहुत अच्छा किया आपने। आपको तो मानो एक मौका मिल गया और इस सपने के माध्यम से आपने अपनी भावनाएँ मेरे सामने रख दी। आप बड़े हिम्मतवाले जान पड़ते हैं तभी आप इतना कुछ कर लेते हैं पर क्या आप कभी ये सोचते हैं कि मेरे मन में कितने भाव उमड़ते होंगे, कितनी ऐसी बातें हैं जो मुझे तंग करती है, कितने ऐसे मौके आते हैं जहाँ लगता है कि काश आप पल भर के लिए मेरे पास होते तो क्या हो जाता, मैं कितनी परेशान होती हूं, मुझे कितनी पीड़ा होती होगी ये तो मैं आपकी तरह बोलकर बता भी नहीं सकती। स्त्री हूं, सब झेल लूंगी मैं, मेरे प्रभु ने मुझे इतनी ताकत दी है।

अनिरुद्ध - ठीक है मान लिया कि मैं तुम्हारी पीड़ा समझ पाने में असमर्थ हूं। पर रोज तुमसे बात करने की जिद भी तो नहीं करता। और अगर मैं सप्ताह में या महीने में कभी बात कर लेता हूं तो इसमें क्या बुराई है।  माना कि हम दोनों के जीवन में अभी अधूरापन है और हमारे बीच दूरियां हैं। पर इस एक बात को लेकर हम दोनों एक-दूसरे को और कितनी चोट पहुंचाएंगे। इसीलिए मैं बात कर लेता हूं कि हम दोनों को थोड़ी खुशी मिले।

शालिनी - खुशी? क्या अब आप मुझे रूलाना चाहते हैं। मुझे नहीं पता आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। अब सुनिए मुझे आपसे बात करके खुशी नहीं मिलती, उल्टे मेरा मनोबल टूटता है। आप मेरे से दूर हैं, मुझसे बात नहीं करते हैं, ये मेरी ताकत है। मैं उम्मीद करती हूं आप समझेंगे। अब आप फोन रख सकते हैं। मुझे कुछ काम है।

अनिरुद्ध - सुनो, एक आखिरी बात। फिर फोन रख लेना। आज ब्लाक मत करना, प्लीज।
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और फिर हमेशा की तरह शालिनी फोन काट देती है। नंबर ब्लाक कर शालिनी फिर से अपनी दुनिया में वापस लौट जाती है।

क्रमशः .....

Friday, 13 October 2017

अकेले रहने से बचें -

                            अकेले रहना और अकेले चलना दो बहुत अलग चीजें हैं। आप अकेले अपनी राह में चलने के लिए कुछ समय के लिए खुद को अकेला रखते हैं सो ठीक है पर एक समय से ज्यादा अकेले रहना नुकसान ही करता है। हां इस मामले में कुछ एक अपवाद हो सकते हैं जिन्हें सालों तक अकेले रहकर फायदा पहुंचा हो। पर घर परिवार दोस्त यार यानि लोगों के बीच बने रहने में ही सच्चा सुख है।

एक लंबे अरसे से अकेले रहने के बाद अब यही जान पड़ता है कि---

- तकलीफदेह हो जाता है अकेले रहना जब आप अपने ही हाथ के बनाये गये खाने से ऊबने लगते हैं।
- एक कठोर तपस्या के समान हो जाता है अकेले रहना जब आप बीमार पड़ जाते हैं और आपकी खबर लेने वाला कोई नहीं होता।
- जब कभी आप पर दुःखों का पहाड़ आ जाता है तो एक भी व्यक्ति आपको सुनने समझने के लिए पास नहीं होता।
- इन सब के बीच एक तकलीफ ये कि आप खुद को ही भूल जाते हैं और दूसरों को ही भगवान मान लेते हैं और बिना कुछ सोचे-समझे उनकी सारी समस्याएं अपने कांधों पर उठाने लगते हैं।
- आपको जब किसी चीज की आवश्यकता होती है फिर उसके ना होने पर आप खुद को छोटा करने लगते हैं। ऐसा करते हुए आप जीवन के प्रति कुछ हद तक नीरस होते हुए पाए जाते हैं।
- चूंकि आपने लंबे समय तक अकेले रहकर बहुत कुछ हासिल किया होता है लेकिन कई बार वो जमाने के बनाए खांचो के अनुकूल नहीं होता। इसलिए आप बहुत कुछ अच्छा कर रहे होते हैं फिर भी आप को दुत्कारा जाता है।
- अकेले रहने से इस सच को घुट्टी बनाकर पी जाना होता है कि हमने ये रास्ता चुना है अब जो भी समस्या आएगी उसके जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हम होंगे।

आखिरी बात ये कि अकेले रहने के लिए एक अलग ही स्तर की मानसिक कंडिशनिंग और हिमालय सा हौसला चाहिए होता है जो सबमें नहीं होता है।

Monday, 2 October 2017

~ आंकड़े ~

आंकड़े,
आंकड़े जिनसे हो जाता है शहर स्वच्छ,
आंकड़े जिनसे गांव के गांव शौचमुक्त हो जाते हैं,
आंकड़े जो कर देते हैं खेतों की सिंचाई और उन्नत पैदावार,
कुछ यूं आंकड़े ही हमारा पेट भर जाते हैं।
महंगाई, गरीबी को कम करते ये आंकड़े,
शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाते आंकड़े,
रोजगार का सृजन करते ये आंकड़े,
आय की असमानता दूर करते ये आंकड़े,
अमीर-गरीब का फर्क मिटाते ये आंकड़े,
दंगों, हिंसाओं का सच बताते ये आंकड़े,
नदियों की सफाई का ब्यौरा देते आंकड़े,
विकास का लक्ष्य साधते ये आंकड़े,
आंकड़ों से, इन्हीं आंकड़ों से ही तो देश का भविष्य(जीडीपी) तैयार हो जाता है।
सौ बड़े झूठ मिलकर भी जहाँ छोटे पड़ जाते हैं ऐसे बलवान होते हैं ये आंकड़े।

Monday, 25 September 2017

रफ कॅापी Part - 2

महीने भर बाद अनिरुद्ध फिर एक दूसरे नंबर से शालिनी से बात करने का प्रयास करता है। तीन चार बार मनाने बुझाने के बाद शालिनी उसकी बात सुनने को राजी हो जाती है।

अनिरुद्ध - तुम मेरे लिए इतना समर्पित हो। मैं तुम्हारी भावनाओं का सम्मान करता हूं। पर अभी कहीं से भी मैं इसको संभालने की स्थिति में नहीं हूं ये तुम भी समझती हो। मेरे ऐसे समय में तुम्हारा बेमन से मुझसे बातें करना मुझे ठीक नहीं लगता। तुम इतना गुस्सा क्यों करने लग जाती हो। फिर जब मैं बात नहीं करुंगा  तो फिर दुखियारी की तरह आंगन में बैठे मुझे याद करने लगोगी। क्यों बेवजह इतनी तपस्या करती हो। खुशी-खुशी बात कर लिया करो।

शालिनी - आपने इस बीच मेरी खामोशी नहीं समझी है तो फिर बात करने का फायदा ही क्या है। आप किस तरह से मुझसे बात कर रहे हैं आप देख लीजिए। कहीं से भी नहीं लगता कि आप मेरे हालात को समझ भी पा रहे हैं। मेरे मन में जो आपके प्रति भावना बस चुकी है वो अब सांस छीनते तक जायेगी नहीं, आप फैसला कर लीजिए आप मेरा ये प्रेम संभाल पायेंगे या नहीं। मानती हूं आप पर बड़ी जिम्मेवारियां हैं, लेकिन आप ये भी तो देखिए कि आप बड़े-बड़े फैसले ले लिया करते हैं और यूं चुटकियों में सब ठीक भी कर लेते हैं, लेकिन जैसे ही मेरी बात आती है पता नहीं आपको क्या हो जाता है। आप मुझे लेकर इतने ढीले क्यों पड़ जाते हैं मुझे समझ नहीं आता।

अनिरुद्ध - मैं ढीला नहीं पड़ा हूं। पहाड़ का खून आज भी मेरे रगों में उतना ही बहता है जितना पहले था। रूंजू-चंचल की प्रेम कहानी की तरह मैं भी जीवन के उतार-चढ़ाव, सारे बहाव झेल लूंगा। पर समय के खेल को मैं समझ नहीं पाता इसलिए कहता हूं कि तुम किसी को हां कर अपना जीवन बसा लो यानि और कितना इंतजार। तुम्हारा ऐसे खामोशी से इंतजार करना मुझे डराया है। कितनी यातनाओं से, लड़ाईयों से, घटनाओं से मैं आये रोज गुजरता रहता हूं, कितनी अनिश्चितताओं से भरा ये मेरा जीवन हो चला है, तुम इस बात को खूब समझती हो। और शालिनी तुमने जो ये जिद पकड़ ली है कि मैं कितने भी साल इंतजार कर लूंगी ये आज के समय में कहीं से भी मुझे ठीक नहीं लगता और ये रफ कापी को हटा दो हमारे बीच से। बचकानी हरकत के सिवा और कुछ नहीं लगता मुझे ये। ऐसी छिछली भावनाओं से तुम्हें सिवाय तकलीफ के और कुछ नहीं मिलेगा।

शालिनी - मेरी मर्जी मैं जो भी करुं उस रफ कापी के साथ। आप कौन होते हैं मुझे नीति सिखाने वाले। आप सिर्फ बातें बना रहे हैं और मुझे पता है आप मेरे शहर को कभी नहीं लौटेंगे, हां अब तो मैं ऐसे ही कहूंगी, इसे ही आज से आखिरी सच मान कर चलूंगी।
और ये रफ कापी इससे आपको क्या दुश्मनी है। यही तो आपकी एकमात्र निशानी है इसे अगर मैंने अपनी खुशी के लिए रखा हुआ है तो आपको क्या तकलीफ है।सुनिए, अब आप मेरे शहर को लौटेंगे तो भी मैं न मिलूंगी, क्योंकि मैं भी अपना शहर छोड़ चुकी हूं,मर जाऊंगी पर अपना सही पता नहीं बताऊंगी। देख लीजिएगा आप ढूंढते रह जाएंगे फिर भी न मिलूंगी।

अनिरूध्द - मैं क्यों ढूंढने लगा तुम्हें? और तुम्हें अगर उस कापी में मेरी झलक मिलती है तो अकेले संभालो, इससे ज्यादा और कुछ नहीं।

शालिनी - तो फिर आज के बाद कभी मत पूछिएगा कि मैंने वो कापी रखा है या नहीं। ये सोच लीजिएगा कि मैंने वो कापी जला दी है।
अब रखिए फोन, मत कीजिएगा मुझसे बात। मैं नंबर ब्लाक करते-करते थक चुकी हूं।
और फोन फिर से कट जाता है।
और शालिनी के ब्लाक लिस्ट में फिर से एक नया नंबर आ जाता है।

Sunday, 24 September 2017

- दिखाई ना देने वाले रेप -

                   भारत में आये दिन रेप होते हैं। कभी हिंसा की मात्रा अत्यधिक होने पर, कभी कुछ नये तरीके से इस घटना के घटित होने पर या अन्य किसी कारण से जब रेप होता है तो हम देखते हैं कि मामला जन-जन तक अपनी पहुंच बना लेता है। हमें खबरें मिलती है, हम अपने-अपने तरीके से संवेदना जाहिर करते हैं और रेप के कारणों को बिना समझे सख्त कानून की मांग करने लग जाते हैं। जबकि हमने कभी इस समस्या को जड़ से समझने का साहसिक प्रयास नहीं किया होता।

सामान्य समझ के आधार पर हम देखें तो रेप का मतलब हमारे लिए ये होता है कि जैसे--
- एक व्यक्ति ने किसी महिला को अकेले पाकर उसकी अनुमति के बिना, शारीरिक बल या हिंसा के माध्यम से उसकी अस्मत लूटी और भाग निकला,या फिर एक और पहलू ये कि जैसे लोगों की भीड़ ने नशे या आवेश में आकर अपने क्षणिक सुख के लिए किसी महिला को जबरन घेरा और जानवरों की तरह नोच डाला। इस तरह की जो भी घटनाएँ हमारे आसपास घटती है उसे हम रेप कहते हैं। और फिर अमुक व्यक्ति को सजा-ए-मौत दिलाने की मांग करने लग जाते हैं।

लेकिन ये सजा की माँग करने वाले लोग हैं कौन?
आप और हम।
हां आप और हम जिसने कभी ऐसी समस्याओं को जड़ से समझने का न तो कोई भगीरथ प्रयास किया और न ही इसके समाधान की ओर कभी ध्यान दिया। हमारे लिए रेप के मायने सिर्फ उतने ही हैं जितना ऊपर अभी लिखा हुआ है। असल में रेप की जड़ यहाँ ऐसे किसी एक घटना से जुड़े कारणों में है ही नहीं। रेप का जड़ हमारे आसपास गली मोहल्लों में होता है, आपके हमारे घर में इसका बीज तैयार होता है।
हम खुद आए दिन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी न किसी का रेप कर देते हैं इसलिए हमें इसका समाधान दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता या यूं कहें कि असंभव सा लगता है।

अब सवाल ये आता है कि भई हमने तो किसी के साथ जोर जबदस्ती की नहीं तो फिर हमसे कैसे रेप हो गया।
हां तो सुनिए ---

- रेप तब भी होता है जब एक लड़की को उसके मनमौजी अंदाज से, श्रृंगार के तरीकों से, लड़कों के साथ घूमने से, ज्यादा बोलने या कम बोलने से और ऐसे अन्य कई कारणों से संदेह किया जाता है, सवाल किया जाता है या तमाम तरह की अटकलें लगाई जाती है।

- रेप तब भी होता है जब रोड पर खड़ी हुई लड़की को एक इंसान के दर्जे से हटाते हुए हम आंखों से ही उसे खा जाते हैं और उसे इतना असहज कर देते हैं कि वह नजरें छिपाकर भागने लगती है।

- रेप तब भी होता है जब कोई महिला किसी एक अन्य महिला के शारीरिक बनावट को लेकर चर्चा करती है, उसके चाल चरित्र और पहनावे को लेकर विमर्श करती है। और ये महिलाएँ कौन होती हैं?
उत्तर बहुत ही स्पष्ट है- आपकी हमारी माताएँ, बहनें।
पुरुष निर्वस्त्र कर रेप करते हैं और महिलाएँ चरित्र की परतें छीलकर।

- रेप तब भी होता है जब महिलाएँ अपनी आत्मश्लाघा(अहं) और असुरक्षा के तुष्टीकरण के लिए बातों से ही लड़कियों की इज्जत लूट लेती हैं। इन महिलाओं पर दैवीय कृपा बरसती होगी तभी तो ये महिलाएँ इतनी दिमागदार होती हैं कि किसी लड़की या अन्य किसी महिला को बिना देखे भी उसका चरित्र का निर्धारण कर लेती हैं।

                    ऐसे रेप आए रोज होते रहते हैं लेकिन ये सब हमें कभी दिखाई नहीं देता क्योंकि हमने इसे कभी रेप, रेप छोड़िए हमने इन चीजों को कभी एक समस्या के तौर पर देखा ही नहीं। यानि जब कोई पेड़ जहरीले फल देता है तो हमें फल या डालियों को काटने में समय जाया न करते हुए क्यों नहीं सीधे जड़ उखाड़ने का प्रयास करना चाहिए। हां जड़ उखाड़ने में समय लग सकता है लेकिन अगर इससे हमें इस सामाजिक विद्रूपता से निजात मिलती है तो क्यों नहीं हमें इस ओर कदम बढ़ाना चाहिए।

Thursday, 21 September 2017

बड़े भाई को पत्र -

प्रणाम दा,
आशा है घर पर सब ठीक होंगे। अब तो भतीजा आयुष यहाँ से वहाँ दौड़ रहा होगा। भाभी दीदी भी अच्छे होंगे। और शायद आपके कंधे का फ्रेक्चर भी अब ठीक हो गया होगा। तारा, सुरेश, मनोज, भुप्पी, कैलाशदा, जीत्तूदा, हरीशदा, मामू, लालाजी  और आप सभी को नवरात्रि की शुभकामनाएं।

                      मैं बहुत समय से सोच रहा था कि आपको कुछ लिखूं लेकिन मुहूर्त नहीं बन पा रहा था। कल जब आपने अपने दुकान में हुई चोरी के बारे में बताया तो आंखें चौंधिया गई। मैं रात भर खुद से सवाल करता रहा कि
-क्या सच में ये वही मुनस्यारी है?

वो तो अच्छा हुआ कि आपने बदलते समय की मांग को देखते हुए अपने दुकान में कुछ महीने पहले ही सीसीटीवी लगा लिया और आपको आपका सामान वापस मिल गया। खैर इसमें चोरी करने वाले को मैं उतना दोष नहीं देता, मामला सांस्कृतिक हमले का है, चोरी करने वाला अगर मुनस्यारी का होगा भी तो भी मैं उसे मुन्सयारी का नहीं मानता। यानि जिसके रग-रग में मुनस्यारी का खून होगा और जो यहां की संस्कृति में पला बढ़ा है, उसके मन में ऐसे काम करने का ख्याल आ ही नहीं सकता, असंभव है। चोरी करने वाले को तुरंत समझाइश देकर पहाड़ से दूर मैदानों में भेज देना चाहिए, ऐसे लोग पहाड़ में रहने लायक नहीं हैं। इस एक मामले में कोई रहम, कोई दया नहीं ऐसा मुझे लगता है।
               दा, साल 2015 में जब मैं पहली बार मुनस्यारी आया, मैं किसी को जानता तक नहीं था। आपसे भी पहली बार मिला। शायद सप्ताह भर आप लोगों के साथ रहा फिर वापस दिल्ली आ गया था। मुझे आज भी याद है मैं रात को मुन्सयारी पहुंचा था। अगले दिन सुबह जब हम आपके कमरे से फ्रेश होकर शाॅप की ओर निकलने लगे तो मैंने आपसे पूछा कि लाक नहीं लगाओगे क्या, अरे सिटकनी तो लगा लो कम से कम। आपने उस समय कहा था कि " अखिलेश ये मुनस्यारी है "।

दूसरे ही दिन आपकी दुकान पर बैठा था, आपने मुझे काउंटर में बैठा दिया और शायद कुछ काम से चले गये, पैसे रखने वाली तिजोरी भी जस की तस खुली थी। एक मैं अनजान जिसे आपसे मिले सिर्फ एक दिन हुआ है उसे आप काउंटर संभालने के लिए बोलकर घंटे भर के लिए निकल जाते हैं। मुझे उस समय ऐसा लग रहा था कि मैं सपना देख रहा हूं। फिर मैंने देखा आपके चार पांच दोस्त हैं जो बराबर आपका काउंटर संभालते हैं और पैसे के हेरफेर की कोई चिंता ही नहीं। मैं धीरे-धीरे जब चीजों को और ध्यान से देखने लगा तो समझ आया कि यही तो मुनस्यारी की संस्कृति है। इन सब चीजों से मैं इतना प्रभावित हुआ कि दुनिया की सारी चकाचौंध वाली चीजें मुझे मुनस्यारी की इस संस्कृति के सामने फीकी लगने लगी, और मैंने हाथ पांव ढीले कर लिए और एक तपस्वी मन से मुनस्यारी की इस संस्कृति को आत्मसात कर लिया।

और मुनस्यारी ने मुझे जो दिया वो शायद दुनिया की कोई ताकत मुझे नहीं दे सकती। जो प्यार और अपनापन मुझे मुनस्यारी में मिला वो कहीं और मिलना असंभव है। कभी किसी ने छोटे भाई की तरह अपना लिया तो किसी ने बड़े भाई की तरह, तो किसी ने घर के बेटे की तरह लाड़-प्यार दिया।  जब मैदानों में आता हूं तो बहुत कोशिश करता हूं इन सब चीजों को भुलाने की। लेकिन नहीं हो पाता यार दा क्या करें।

लोग मुझसे तरह-तरह के सवाल करते हैं, अटकलें लगाते हैं कि तुम्हें पहाड़ से कैसे इतना लगाव हो गया? मैं शांत हो जाता हूं, मुझे पता है मैं बोलूंगा तो भी वे मुझे पूरी तरह से नहीं समझ पाएंगे इसलिए मैं कुछ नहीं बोलता। लोग समझते हैं कि मुझे हिमालय और इन सुंदर वादियों से लगाव है अब उन्हें कैसे समझाया जाए कि जिस संस्कृति का स्वाद मैंने पाया है उसके सामने दुनिया जहां के रूतबे, अर्थबल, संख्याबल एवं सुविधाएं सब कुछ त्याज्य(त्यागने योग्य) हैं और इस बात को वही समझेगा जिसने पूरे समर्पण भाव से इस संस्कृति का रस चखा है।

दा, मुझे अभी फिर से आपकी बात याद रही है जो आपने आज से दो साल पहले कही थी कि " अखिलेश ये मुनस्यारी है"

- हां ये वही मुनस्यारी है जहां आज भी लोग सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने परिजनों के यहां ककड़ी और दूध की बोतलें पूरे विश्वास के साथ मैक्स की गाड़ियों के माध्यम से पहुंचाते हैं।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ दुनिया के सबसे खुश रहने वाले लोग रहते हैं।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहां के स्कूली बच्चे कितने भी उदंड क्यों न हो, वे माथे में टीका लगाना और अपने से बड़ों को हाथ जोड़कर नमस्ते करना कभी नहीं भूलते।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहां एक पत्थर तोड़ने वाले का भी समाज में उतना ही सम्मान है जितना कि एक किसी अधिकारी या नेता का।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहां आपके पड़ोसी आपको सुबह दोपहर रात हर समय पूछते हैं कि खाना खाया कि नहीं और ऐसा करते हुए वे कभी नहीं थकते।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ का कौतिक (मेला) और देवी-देवता की पूजा आज भी लोगों के लिए किसी एक बड़े त्यार(त्यौहार) से कम नहीं।

- हां ये वही मुनस्यारी है जहाँ आज भी मनुष्यता अपने चरमोत्कर्ष पर है।

- हां ये वही मुनस्यारी है जिसे "सार संसार एक मुनस्यार " कहा जाता है और हमें मुनस्यारी की इस अद्वितीय संस्कृति पर गर्व है, बार-बार गर्व है।

Tuesday, 19 September 2017

- तेरे मेरे शहर की बारिश -



A - क्या तुम्हारे शहर में भी बारिश हो रही है?
B - हां।
A - क्या तुमने भी बारिश की बूंदे देखी आज?
B - हां मैंने देखी। पर जैसे ही मैं उन बूंदों में एक एक बूंद अलग से देखने लगती। मैंने देखा कि वो पत्तियों के ऊपर सड़कों पर गिरकर बिखरने लगे थे।
A - अच्छा जब वो जमीन पर आकर गिर रहे थे क्या तुमने उनकी आवाज सुनी?
B - हां मैंने सुनी न। कितनी अलग-अलग आवाजें हैं। कोई बूंद पत्तियों पर आकर गिरती है तो कोई किसी छतरी पर तो कोई किसी की टीन की छत पर।
A - शायद तुम भी मेरी तरह ये सारी आवाजें सुन रही हो। लेकिन क्या तुमने बालकनी में जाकर उन बूंदों को छुआ?
B - अभी तक तो नहीं। मैं  चाय की चुस्कियों में और मेरे कानों में पड़ती ये बारिश की इस धुन के साथ कहीं खो गई थी।
A - कहाँ खो गई थी। क्या वहीं जहां मैं खो गया हूं इन बूंदों को छूकर।
B - हां वहीं।
A - देखो न इन बूंदों के सहारे मेरी तुमसे आज फिर मुलाकात हो गई।
B - हां।
A - अब फिर मुलाकात कब होगी।
B - पता नहीं।
A - कहो न?
B - शायद अब कुछ महीने बाद जब बर्फबारी होगी तो गिरते हुए snowflakes को इकट्ठा कर आंखें बंद कर हम फिर से एक दूसरे से मिलेंगे।
A - मुझे उस दिन का इंतजार है।
B - मुझे भी।

To be continued .....

Sunday, 17 September 2017

- गुरू माँ को पत्र -

गुरू माँ,
मत दिया कीजिए मुझे सपने,
या कुछ ऐसा उपाय कर दीजिए कि मुझे किसी का सपना ही ना आए,
इतना सारा सच संभालना मुश्किल होता है,
अपने ही आसपास, अपने से ही जुड़े लोगों का आने वाला कल देख लेना,
और फिर कुछ दिन बाद उसी सपने को पूरा होते देखना और उन्हीं के द्वारा सुनना,
ये कहीं से भी सुखद तो नहीं कहा जा सकता,
कितना तकलीफदेह है ये।
हां ये प्रायोजित सच मैं और नहीं देख सकता,
अब और नहीं देखना चाहता सुख-दु:ख, मौत, दुर्घटनाएँ,यात्राएँ, अन्य कोई गतिविधि या इन सब से जुड़ा भविष्य,
छीन लीजिए मुझसे किसी और का प्रारब्ध देख लेने की ये कला,
आपको क्या लगता हूं कि मैं खुद को व्यस्त नहीं रखता हूं, मैं दिन भर अपने काम में व्यस्त रहता हूं लेकिन ये सपने हैं कि फिर भी मेरा पीछा नहीं छोड़ते,
पता है बहुत मुश्किल होता है टूट कर फिर से जुड़ना, ये बार-बार खुद को विखंडित कर संलयित होने का भार मुझ पर ही क्यूं?
आखिर मैं ही क्यों?
आप कहती हैं कि ये पूर्णतया प्राकृतिक है कुछ ही लोगों के साथ ऐसा होता है,
लेकिन इससे न तो मैं अपना भला कर पा रहा हूं न ही किसी और का,
इसलिए मुझे इन सबसे निजात पाना है,
फिलहाल मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है,
जीना है एक सामान्य सी जिन्दगी,
हो सके तो मुझे वो कहीं से लौटा दीजिए,
मुझसे ये सपनों का बोझ नहीं संभाला जाता।

Maa nanda devi mandir, Martoli Village, Munsyari (UK)

Saturday, 16 September 2017

- हवा और पानी -

                                पिछले दो-तीन दशकों की अगर बात करें तो पर्यावरण को हानि पहुंचाने के आंकड़ों में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। आपके-हमारे सामने ये साफ दिख भी रहा है। एक भी ऐसा शहर(छोटा, बड़ा कोई भी) नहीं बचा जहां का पानी बिना फिल्टर किए पिया जा सके। हवा दिन-पर-दिन खराब होती जा रही है। आखिर इंसान होने के नाते हमारे जीने के लिए सबसे बड़ी जरूरत क्या है, सबसे बड़ी चीज हवा, उसके बाद दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज पानी। इन दो चीजों की प्रतिपूर्ति के बाद तीसरा है भोजन। तीसरे घटक की गुणवत्ता पहले और दूसरे घटक पर निर्भर करती है। इतनी सामान्य सी बात हम क्यों नहीं समझ पाते हैं। आज गाड़ी उल्टी चल रही है, आज मनुष्य का सबसे अधिक जोर भोजन और रहन-सहन रूपी घटकों पर दिखाई देता है। क्या ये चिंतायोग्य विषय नहीं है?
                                 हमारी पढ़ाई-लिखाई, उपाधियां, योग्यताएं सब धरी की धरी रह जाती हैं। कुछ भी तो काम नहीं आ रहा। बात करने के लिए हमारे पास ढेर सारा किताबी आदर्शवाद है। रटी-रटाई परिभाषाएं हैं। बुद्धि और चेतना के स्तर पर हम मनुष्यों को पशुओं से कहीं ज्यादा कुशल माना जाता है। लेकिन इस बात को कहने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं कि भोग और लिप्सा से युक्त आज मनुष्य पशुओं से भी बदतर हो चला है। उसकी लगभग हर एक दैनिक गतिविधि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली बन चुकी है। और जब मुख्यधारा में यही ट्रेंड चल रहा है तो सरकारें भी अधिकतर पर्यावरण विरोधी नीतियाँ बनाती चली जा रही है और हमें दिखाई भी नहीं दे रहा।
                                  आज फिल्म निर्देशक सामाजिक समस्याओं चोरी, डकैती, बलात्कार, मारकाट, अपहरण, भूखमरी, शिक्षा सुधार, भष्ट्राचार आदि तरह तरह के विषयों पर फिल्म बनाते हैं। पिछले दो दशकों से ऐसी फिल्में लगातार बन रही हैं, वाह! कितने संवेदनशील डायरेक्टर हैं, वे फिल्म बनाते हैं और हम उतने में ही सीमित,उतने में ही खुश। गाड़ियां ब्लास्ट होकर हवा में उड़ रही हैं, बंदूकें चल रही हैं, गोलाबारूद दागे जा रहे हैं।अपहरण, मारपीट और हत्या के नये-नये तरीके इजात कर लिए गए हैं। ऐसे न जाने कितने अद्भुत शौर्य प्रदर्शन। और हिंसा की मात्रा पहले से कहीं अधिक। ऐसी फिल्में चल रही हैं और हम सीना पीट-पीटकर देख रहे हैं। ऐसी चीज देखकर आज हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं। लोगों को अंदाजा भी नहीं है कि ऐसे हिंसक दृश्य हमारे मनोविज्ञान में कितने गहरे तक असर छोड़ जाते हैं।
                                   सिविक सेंस का भ्रूण ही मार दिया आपने और अब करवाइए आप ऐसे बड़े होते युवाओं से पर्यावरण संरक्षण, करिए रैलियाँ, लगवाइए लाखों पौधे। ये तो वही बात हुई न कि हमें तो बच्चे पैदा करना आता है लेकिन उन बच्चों का लालन-पालन और उनकी परवरिश कैसे करनी है इसका क,ख,ग भी हमें नहीं मालूम।
                                  ध्यान से देखा जाए तो पिछले दशक भर में एक भी ऐसी फिल्म बालीवुड, हालीवुड में, कहीं पर भी नहीं बनी जो इस मूल समस्या पर लोगों का ध्यान खींच सके। बने भी कैसे, ये विषय इतना बड़ा है कि खून पसीना एक कर धरातलीय प्रयास करना पड़ेगा तब जाकर ही कुछ होगा।
                                  हमारी सरकारें या हम(जनता)ये क्यों नहीं समझते कि जहां हवा और पानी का मामला ठीक हो जाए, वहां कृषि और स्वास्थ्य को लेकर कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। आधा काम ऐसे ही हो जाएगा। कितने मुद्दे यूं एक झटके में स्वतः ठीक हो जाएंगे। लेकिन अब तो ये आदर्शवादी बातें भर हैं। क्योंकि हमने, हमारी भूख ने, नाशकारक होड़ ने कुछ ही दशकों में नदियां सूखा दी, तालाब पाट दिए, जंगल के जंगल खा गये हम। तो अब हम ऐसी नीतियाँ बनाएंगे कि लोगों की क्षणिक भूख शांत हो सके। हम जंगलों की कटाई-छंटाई कर लोगों के लिए पार्क, सफारी बनवाएंगे, उनके मनोरंजन के लिए जंगली जानवर इकट्ठे किए जाएंगे। चूंकि हम बहुत ही ज्यादा समझदार, सभ्य और बुध्दिमान हो चुके हैं तो हम नदियों तालाबों और भूमिगत जल के अन्य स्त्रोतों को किनारे कर वाटर पार्क बना देंगे। जगह-जगह फव्वारे लगाएंगे क्योंकि इससे हमारे शहर की रौनक बढ़ेगी, लोग बाहर से आएंगे, देखकर हमारी प्रशंसा करेंगे। भई वाह! क्या सभ्यता की निशानी दे रहे हम हमारी आने वाली पीढ़ी को। आने वाली पीढ़ी तो बस पांव धो-धोकर पीयेगी।
                                 अब क्या यह लिख कर बताना पड़ेगा कि जिन जगहों पर हवा और पानी साफ है वहां के लोगों को किसी प्रकार की कोई गंभीर बीमारी नहीं होती। वहां लोग ज्यादा खुशी से जीवन यापन करते हैं। इतनी छोटी सी बात को आगे बढ़ाने में हम कैसे चूक गये।
                                 अब चूंकि हम इतने महापंडित और ज्ञानी हैं कि हमने शहर बनाए, मेट्रो बनाए, आज डिजिटल कर दी लोगों की जिंदगी, तमाम सुविधाएं मुहैया करा रहे, स्मार्ट सिटी बना रहे। लेकिन क्या कोई ऐसी सरकार है जो ये बता सके कि क्या कोई ऐसा शहर बनाया जो अपने नागरिकों को मुफ्त में साफ पानी मुहैया कराता है, सांस लेने लायक साफ हवा दे पाता है। देखा जाए तो आज इन दो चीजों के अलावा सरकार हमें सब कुछ दे रही हैं, उठाइए हाथों-हाथ। धूम मचा दीजिए। जैसी हमारी भूख, वैसी सरकार की नीतियाँ। करते रहिए देश की ऐसी की तैसी। कौन रोक रहा है।

Thursday, 14 September 2017

- रफ कॉपी - Part 1

                             ये लघु प्रेम कथा अनिरुद्ध और शालिनी की है...दोनों हिमाचल के किन्नौर में रहते हैं। किसी कारणवश दोनों अलग हो चुके हैं। या यूं कहें कि वे एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से कभी मिले ही नहीं। लेकिन एक रफ कॉपी ने इनके मध्य एक रिश्ते को कायम कर दिया है।
...
एक दिन अनिरूध्द शालिनी से कहता है - सच बताना क्या तुमने अभी भी वो रफ कॉपी संभाल कर रखी है?
शालिनी - हां।

अनिरूध्द - पर क्यों?

शालिनी - मुझे पसंद है।

अनिरूध्द - अच्छा! मैंने तुम्हें कुछ दिन इतिहास पढ़ाया था उस कॉपी में, वो सब्जेक्ट भी ऐसा जिससे तुम्हें बिल्कुल भी लगाव न था फिर भी।

शालिनी - हां फिर भी। मुझे पसंद है तो है। मैं हमेशा अपने पास रखती हूं, अभी महीने भर के लिए मामा के घर गई थी तो भी अपने साथ लेकर गई थी। खैर,आप नहीं समझेंगे।

अनिरूध्द - समझाओ।

शालिनी - हर बात बोलकर कही नहीं जाती। ये रफ कॉपी मेरे लिए सिर्फ एक कॉपी नहीं है।

अनिरूध्द(नाराज होकर) - मेरे ख्याल से इस बात को एक साल हो चुके हैं, इस बीच कोई बातचीत नहीं, कोई पता नहीं, सब तरफ से तुमने मुझे ब्लाक कर रखा है। किसी नये नंबर से संपर्क करने की कोशिश करता हूं तो भी ब्लाक। और आज इस रफ कॉपी के सहारे इतनी भावनाएँ क्यों उमड़ रही है?

शालिनी - एक साल, इस एक साल में एक भी दिन ऐसा नहीं था कि मैंने इस कॉपी को अपने से अलग किया हो और आप मुझ पर शक कर रहे हैं। हां किया ब्लाक मेरी मर्जी, पर छुपकर किसी दूसरे की आईडी से हमेशा आपको देखा करती थी, और ये रफ कॉपी, ये साल भर से मेरे तकिए के पास ही रहता था, आज भी है। छोड़िए, मैं आपको कितनी बातें बताऊं, और बोलकर सब कुछ खराब नहीं करना चाहती। आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें तो बेहतर होगा। मुझे और कोई बात नहीं करनी।

अनिरुद्ध - अच्छा ठीक है,पर मेरी एक बात सुन लो।
..
...
.....
और इससे पहले कि अनिरूध्द कुछ कहता, फोन कट जाता है।
स्वाभिमान से परिपूर्ण शालिनी के ब्लाक लिस्ट में आज फिर से एक नया नंबर आ चुका है।

Friday, 1 September 2017

बुलेट चलाने वालों से निवेदन -

                     आजकल बुलेट का ट्रेंड चल रहा है। जिसको उतना नहीं भी पसंद वो भी भेड़चाल में बुलेट की सवारी कर रहा है, जिसका चालीस किलो वजन है जो ढंग से गाड़ी ढुला भी नहीं पाता वो भी बुलेट चला रहा है। खैर सबके अपने-अपने शौक है इसमें सही गलत या आलोचना करने का कोई तुक नहीं। वैसे भी भारत में बेवजह कुछ भी ट्रेंड हो जाता है। और हम प्रतिक्रिया देकर इस पूरी प्रक्रिया में रसपान करते रहते हैं। पागलपन, दिखावा, सनक और बेवकूफी से भरे सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने आए रोज दिखते रहते हैं।
खैर बात बुलेट से होने वाले प्रभावों की होनी थी। तो ऐसा है कि बुलेट से, यानि इसकी आवाज से छोटे बच्चों को बहुत नुकसान होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि शोर शराबा करने वाली और भी चीजें हैं, बुलेट पर ही सवालिया निशान क्यों?
                     अच्छा अभी कुछ दिन पहले की एक घटना बताता हूं। मैं एक इडली सेंटर में नाश्ता कर रहा था। वहाँ एक और कोई लड़का साथ में था जो मेरे से पहले आया था और उस के पास बुलेट थी। हम दोनों नाश्ता कर रहे थे तभी दो लोग और आए एक बाप अपनी छोटी बच्ची को लेकर आया था। बच्ची की उम्र एक साल रही होगी, उस बच्ची के पिता ने बच्ची को गाड़ी में ही बिठाया, और इडली पैक कराने आ गये। पिता ने अपनी बिटिया को दस मीटर दूर गाड़ी में अकेले छोड़ दिया है। अब चूंकि बच्चे बाइक के सामने का हैंडल मजबूती से पकड़ कर रखते हैं इसलिए शायद उसके पिता निश्चिंत हैं।
अब बुलेट वाला लड़का नाश्ता खत्म कर उठता है अपनी बुलेट में किक मारता है जोर से एक्सीलेटर देता है और निकल जाता है। सब कुछ पांच सेकेंड में ही हो जाता है।
                     अब ध्यान रहे कि वो एक साल की बच्ची वहीं पास में एक दूसरी बाइक में बैठी हुई है। अब जैसे ही बुलेट स्टार्ट होता है उसकी आवाज सुनकर वो रोने लगती है, और डर के मारे गाड़ी से गिरने ही वाली रहती है कि उसके पापा आकर उसे संभालते हैं। बुलेट वाला कुछ सेकेंड में ही निकल चुका है, और उसके कुछ सेकेंड बाद बच्चे रोने लगती है। इडली पैक कराने में व्यस्त उस बच्ची के पिता को भी समझ नहीं आता कि बच्ची के रोने की वजह आखिर क्या है। अब सोचिए उस छोटी बच्ची पर एक बुलेट की उस क्षणिक आवाज का कितना बुरा प्रभाव पड़ा होगा। वो अंदर से कितना डर गयी होगी, कितना सहम गयी होगी, इसका आप और हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।
                      एक और घटना ठीक कुछ ऐसी ही हुई थी,एक छोटा बच्चा था, लेकिन वो बुलेट की आवाज से बिल्कुल नहीं रोया। लेकिन फिर भी ये घटना ऊपर लिखी पहली घटना से ज्यादा भयावह है। वो ऐसे कि मैंने उस बच्चे का चेहरा देख लिया, उस मासूम से चेहरे पर खामोशी और खौफ के बादल मंडरा रहे थे, कितना डर बैठ गया था उस बच्चे में वो त्वरित आवाज सुनकर। वो इस डर को रोकर बाहर निकाल भी नहीं पाया। इस छोटी सी घटना ने उसके मनोविज्ञान को कितनी चोट पहुंचाई होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। बहरहाल...
ऐसे कितने उदाहरण दे सकता हूं आपके सामने।

                        ये सब कुछ लिखने का मकसद ये है कि बच्चों के दिमाग में इन सब चीजों से अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, एक बार बचपन में कोई बात हो गई या ऐसी छोटी छोटी चीजें, ये सब जीवनपर्यन्त उनके चेतन अचेतन में जमा होकर उन्हें प्रभावित करती रहती है और हमें फिर समझ नहीं आता कि सब ठीक तो चल रहा था ये अचानक बच्चे का व्यवहार ऐसा कैसे हो गया।
                         इसलिए बुलेट चलाने वालों से और जो नहीं चलाते उनसे भी निवेदन है कि इन छोटी-छोटी चीजों का ख्याल किया जाए। वैसे भी बच्चे सबको प्यारे होते हैं, जिन्हें बच्चों से उतना लगाव नहीं होता वे भी बच्चों के बीच जब रहते हैं तो प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं।
                         मुझे तो लगता है एक 12th पास लड़के में भी इतनी समझ तो होती ही है कि बच्चों के सामने ज्यादा न चिल्लाया जाए, उनके सामने झगड़ा न किया जाए, यानि एक उम्र तक उन्हें हर प्रकार की हिंसा, शोर आदि से थोड़ा दूर रखा जाए। बच्चे हमारे कल के कर्ताधर्ता हैं, उनके व्यक्तित्व के निर्माण के इस चरण को लेकर हमारी इतनी न्यूनतम समझ तो होनी ही चाहिए कि हम इन छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान दें, अगर किताबी ज्ञान ही सब कुछ है, और हम इन सब बातों पर ध्यान नहीं दे पाते तो हमें अपने आसपास किसी नदी के एनीकट में छलांग लगाकर मर जाना चाहिए।