Sunday, 25 June 2023

डेवलपमेंट सेक्टर की नंगी हकीकत -

डेवलपमेंट सेक्टर यानि समाज सेवा। इसमें आप छोटा बड़ा एनजीओ चलाने वाले, बिस्कुट बांटने वाले से लेकर सेमिनार कराने वाले सबको जोड़ लीजिए। जो लोग जितने अधिक अपने व्यक्तिगत जीवन में असामाजिक होते हैं, वे उतने ही बड़े सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं। अमूमन इस क्षेत्र के लोगों के प्रति भारत के आम लोगों के मन में बहुत अधिक सहानुभूति रहती है और यह प्रथम दृष्टया स्वाभाविक भी है क्योंकि जमीन में यही जाकर अपना चेहरा दिखाते हैं, काम करते हैं। चूंकि आम आदमी सीधा सपाट जीवन जी रहा होता है, उसी में ही तमाम तरह के दायित्व, कर्तव्य, जिम्मेदारियां एवं अनेक तरह की सामाजिकताएं निभा रहा होता है, और जब वह इसी सब में फंसा होता है तो उसे यह अलग से ये सामाजिक कार्य का दिखावा करने वाले लोग बहुत ही अधिक विशिष्ट मालूम होते हैं, जबकि कायदे से देखा जाए तो ये भी मासिक तनख्वाह पर होते हैं और विशुध्द नौकरी काट रहे होते हैं। 

किसी भी व्यवस्था के लिए या सरकार के लिए यह संभव नहीं हो पाता कि वह अपनी योजनाओं या उद्देश्यों को समाज के हर एक व्यक्ति तक पहुंचा दे। कई बार बहुत कुछ छूट ही जाता है, इसी गैप को भरने के लिए, इसी वाल्व को जोड़ने के लिए समाजसेवी संस्थाओं की जरूरत सरकारों को पड़ती रहती है और वे इनका समय-समय पर इस्तेमाल करते रहते हैं या यूं कहे कि सरकार के एक अस्थायी अंग की तरह कार्य करते हैं। चूंकि ये लोगों के दुःख पीड़ा और असंतोष को पाटते हैं, उसे उद्वेलित होने से रोकते हैं, यानि एक सरकार रूपी व्यवस्था की छवि को ही बचाने का काम करते हैं, इसलिए मैं इन्हें सेफ्टी वाल्व भी कहता हूं। और यह कोई मामूली काम नहीं है, पीआर का काम तो इस काम के सामने कुछ भी नहीं। जमीन पर किए गये काम का वजन हमेशा अधिक ही होता है। अब चूंकि इतना बड़ा काम करते हैं तो बदले में इन्हें एक अच्छी धनराशि भी प्राप्त होती है। यूं समझिए कि एक ठीक-ठाक समाजसेवी की तनख्वाह एक जिलाधीश या उपजिलाधीश के समकक्ष ही होती है। और उतनी ही जिम्मेदारियाँ, काम का भयानक दबाव, तनाव और उतनी ही सुविधाएँ भी मिलती है। और हिंसा भी उसी स्तर की करनी पड़ती है, असल में उससे कहीं अधिक करनी पड़ती है, लेकिन विनम्रता और सामाजिक कार्यकर्ता की ओढ़ी हुई छवि के आगे सब कुछ छिप जाता है, ये इस कला में निपुण भी हो जाते हैं।

इस सेक्टर के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ अधिकतर ऐसे लोगों को जोड़ा जाता है जिसे समाज ने हाशिए पर ढकेल दिया हो या किसी कारणवश दारूण जिंदगी जी रहे हों। अधिकतर तलाकशुदा, परित्याक्ता, अनाथ लोग जो थोड़े बहुत पढ़े-लिखे, स्किल्ड होते हैं, वे इस सेक्टर के लिए बहुत आसान शिकार होते हैं। दूसरा बड़ा शिकार ग्रेजुएट बैचलर युवा बनते हैं, खासकर वे बैचलर जिनके घर-परिवार का माहौल कुछ ठीक नहीं रहता है, इन्हीं के भीतर कुछ अलग करने का असंतोष ठीक ठाक उबाल मारता है, जिसका बढ़िया इस्तेमाल किया जाता है। अब इन सभी लोगों के लिए यह सेक्टर एक तरह से संरक्षक भी भूमिका में काम करता है, इससे एक भावनात्मक दबाव पहले ही तैयार हो जाता है कि हमने आप पर बहुत बड़ी कृपा की। आप देखिएगा कि भारत में इस एक सेक्टर में काम करने वाला व्यक्ति आसानी से इस मकड़जाल से नहीं निकल पाता है, क्योंकि आपके दिल दिमाग से खेला जाता है, आपको नौकरी नहीं दी जाती है, आपको तो एक परिवार का हिस्सा बनाया जाता है और उसी एवज में तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है, तभी तो आपसे बंधुआ मजदूर की भांति दिन रात काम लिया जा सकता है। इसलिए आप देखेंगे कि भारत के लगभग सभी एनजीओ मानवीय रिश्ते बनाने पर जोर देते हैं। ये एक तरह का इंवेस्टमेंट होता है, इसी नींव पर तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है। 

डेवलपमेंट सेक्टर में शीर्ष पदों पर काम करने वालों की बात करते हैं। इन पदों पर अधिकतर सभ्रांत परिवारों के लोग होते हैं। ऐसे लोग जो आर्थिक सामाजिक रूप से समृद्ध होते हैं, जिन्होंने किसी भी तरह की घरेलू हिंसा नहीं देखी होती है, जीवन में बहुत अधिक किसी भी प्रकार का तनाव या कोई उतार-चढ़ाव नहीं देखा होता है। यह लोग एक कॉरपोरेट या बिजनेस की तरह इस सेक्टर में काम करते हैं। अब चूंकि इस सेक्टर में काम करते हैं तो इस सेक्टर को चलाने के लिए बरती जाने वाली तमाम तरह की हिंसाएं, तीन तिकड़म, मीडियाबाजी और फंडबाजी भी इनके द्वारा की जाती है। इस सेक्टर में काम करते रहने की वजह से इन्हें अपनी वेशभूषा, आचार-व्यवहार और रहन-सहन के तरीकों पर काम करना पड़ता है, बहुत ही सामान्य जीवनशैली अपनाते हैं। वैसे ही अपने आप को दिखाने की कोशिश करते हैं जैसा भारत का आम ग्रामीण मध्यमवर्गीय व्यक्ति दिखता है, यही इनकी दुकान खड़ी करने और इनके पीआर के लिए सबसे जरूरी तत्व होता है, एक बार वैसी छवि तैयार हो जाती है, फिर हमेशा के लिए आराम हो जाता है। और फिर इलीटनेस अगर जीते भी हैं तो उसे एक बंद कमरे तक ही रखते हैं जिसकी कोई थाह नहीं पाता है। 

इस सेक्टर के साथ एक सबसे मजेदार चीज यह है कि इस सेक्टर में काम करते हुए आप पूरा जीवन खपा देंगे तब भी आपको अंत तक समझ ही नहीं आएगा कि आप वास्तव में कर क्या रहे हैं। एक चोरी करने वाले, गांजा शराब बेचने वाले तक को स्पष्टता रहती है कि वो फलां अपराध कर रहा है, लेकिन इस सेक्टर के लोग आजीवन भ्रम में रहते हैं कि वे समाज के लिए काम कर रहे हैं। असल में ये लोग समाज के लिए नहीं वरन् समाज को पीछे धकेलने के लिए काम कर रहे होते हैं। समाज को पश्चगामी दिशा में ले जाने में इनका सर्वाधिक योगदान होता है। एक स्वस्थ समाज के निर्माण में ये सबसे बड़े शत्रु होते हैं।

मेरी एक करीबी हैं। इस क्षेत्र के प्रति सहानुभूति रखती हैं, और मैं उनके इस व्यक्तिगत फैसले का सम्मान भी करता हूं। क्योंकि वैसे भी नौकरीपेशे लोगों के पास इतनी गहराई में जाकर चीजों को देखने समझने आंकलन करने का समय नहीं होता है। अगर कहीं कुछ डोनेशन करना होता है, वे कर देती हैं। मेरी करीबी दीदी विश्वास के साथ हमेशा यह कहती हैं कि ठीक है यार, जाने दो, अंततः कुछ तो लोगों के पास पहुंचेगा ही। इस पर मैं यही कहता हूं कि आप सहयोग करें या ना करें पहुंचेगा उतना ही, जितना पहुंचना चाहिए, आपके योगदान से कुछ कम ज्यादा नहीं हो जाएगा। दूसरा वह कहती हैं कि भारत के युवाओं को एक साल डेवलपमेंट सेक्टर में देना चाहिए। मैं उनको विनम्रता से आज कहना चाहता हूं कि गलती से भी ऐसी गलती न की जाए, इससे बेहतर हो कि युवा खुद से अकेले भीख मांग ले या रेहड़ी चला ले, लेकिन भूल से भी इधर समय न खपाए। क्योंकि यहां बौध्दिक मानसिक क्षति होने की भरपूर गारंटी होती है।

जब मैं इस सेक्टर का नया नया हिस्सा बना था, तब मुझे एक करीबी ने कहा था कि ये समाज कार्य क्या बला है। और हम क्यों इतने खाली हैं कि सामाजिक कार्य करना चाहते हैं, क्या सचमुच हम‌ इतने असामाजिक हो चुके हैं कि हमें अलग से ये सब करने‌ की आवश्यकता आन पड़ी है? उनके इन सवालों ने मुझे कभी दिग्भ्रमित होने नहीं दिया, मुझे हमेशा अपने आप को बचा ले जाने में मदद की। 

एक स्वतंत्र रिपोर्ट के मुताबिक भारत में समाज कार्य के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतर लोगों का शादी शुदा जीवन सफल नहीं हो पाता है, तुलनात्मक रूप से यहाँ आंकड़े चौंकाने वाले हैं। अन्य सेक्टर्स की तुलना में सबसे अधिक तलाक इसी सेक्टर में देखने को मिले। प्रेम वाले रिश्तों के लिए बहुत कम जगह होती है, क्योंकि इस सेक्टर में काम करने वालों के भीतर सबसे पहले प्रेम के नवांकुर को खत्म कर दिया जाता है, आबोहवा ही ऐसी रहती है। इसके अलावा एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी रही जिन्होंने आजीवन शादी ही नहीं की, इसके पीछे तुर्रा यह रहा कि समाज कार्य को ही जीने का आधार बना लिया, खैर शादी न करना व्यक्ति का अपना निजी मसला होता है, लेकिन इस सेक्टर की कहानी अलग होती है, जिसने इस सेक्टर को करीब से देखा है, उसे अच्छे से मालूम होता है कि ऐसा क्यों होता है। 

तस्वीर : इस भौकाल तस्वीर में पीठ दिखाता हुआ घृणित व्यक्ति मैं ही हूं जिसने कभी समाजसेवा रूपी पाप किया था और महिलाओं को माहवारी जागरूकता के विषय में प्रवचन दिए थे। 

इति।।



Wednesday, 14 June 2023

मोदी जी और चार घंटे नींद -

2014 में जब आदरणीय नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री बनकर आए तब उनकी एक मजबूत छवि पेश करने के लिए तमाम तरह की चीजें मीडिया में प्रसारित की गई। कॉमिक्स में प्रधानमंत्री जी को बाल नरेंद्र के रूप में दिखाया गया और कहानियां गढ़ी गई। उन कहानियों का मोटा-मोटा सार यही था कि प्रधानमंत्री जी बचपन से जुझारू, संघर्षशील रहे हैं। फिर कुछ समय बाद उनके सात्विक भोजन और निरंतर योग करने को लेकर भी सकारात्मक चीजें सामने लाई गई। इन सब का सार यही रहा कि देश के प्रधानमंत्री शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति हैं। ऐसा नहीं है कि ये पहले ऐसे नेता या प्रधानमंत्री हैं जो ऐसा कर रहे थे, शक्ति प्रदर्शन हर कोई करता रहा है, एक नेता में यह गुण न हो तो वह टिक भी नहीं पाएगा। शक्ति प्रदर्शन वाले उसी क्रम में काम करने वाली छवि बनाए रखने के लिए यह तक प्रचारित किया गया कि प्रधानमंत्री जी केवल 3-4 घंटे ही सोते हैं। इस पर नहीं जाते हैं कि वे कितना सोते होंगे, असल‌ में ऐसा प्रचारित करने का उद्देश्य यही था कि प्रधानमंत्री भले कैसे भी हों लेकिन वे एक बेहद सक्रिय, ऊर्जावान व्यक्ति हैं। देश के लोगों के मन मस्तिष्क में प्रधानमंत्री की एक मजबूत छवि बनाई गई और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। आज शक्ति प्रदर्शन का युग है। और अपनी सुरक्षा के लिए, स्थायित्व के लिए हर कोई तोड़ मरोड़ के चीजें पेश करता ही है। 

अब नींद की समयावधि की बात करते हैं। साधु बाबा लोग जो तमाम तरह की साधना करते हैं, जिनको घर परिवार नहीं चलाना होता है, जो गृहस्थ की जिम्मेदारियों और दुनियावी दांवपेंच से अलग होकर सिर्फ भजन साधना त्राटक करते हैं। वे कितने भी समय खाएं सोएं किसी को फर्क नहीं पड़ता है, कोई बर्तन धोने के लिए उनके खा‌ना खा लेने का इंतजार नहीं कर रहा होता है। ऐसा व्यक्ति ही घंटों बैठकर साधना कर सकता है, अपनी सांसों को साध सकता है, कम‌ सोते हुए भी सक्रिय रह सकता है, क्योंकि दुनिया जहाँ का और कोई तनाव है ही नहीं तो ऐसे में कम नींद से ही काम चल जाता है। कौन सा सुबह उठकर आफिस जाकर चार लोगों को मैनेज करना है या व्यापार संभालना है। दूसरा यह भी है कि शारीरिक रूप से भी खुद को बहुत खपाता नहीं है तो सारी ऊर्जा ध्यान साधना में लग जाती है, ऊर्जा स्थिर बनी रहती है।

हममें से जो कोई भी फेसबुक पर हैं, हम सभी गृहस्थ जीवन जीते हैं। सुबह का नाश्ता दो वक्त का भोजन, घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ, नौकरी व्यापार कृषि कार्य इन सब में लगे रहते हैं तो पूरा मन शरीर खप रहा होता है। इसलिए समय पर ठीक-ठाक भोजन की भी आवश्यकता होती है और 6-7-8 घंटे की अच्छी नींद भी चाहिए होती है ताकि अनवरत गृहस्थ की जिम्मेदारियों का अच्छे से पालन किया जा सके। गृहस्थ में रहते हुए इन जिम्मेदारियों जा निर्वहन करते हुए कहीं से भी संभव नहीं है कि व्यक्ति 3-4 घंटे सोकर सक्रिय रह सके। अगर कोई ऐसा कहता है तो वह सीधे सीधे बेवकूफ बना रहा है। हां कभी एक दो दिन के लिए समझ आता है, और इतना तो हर भारतीय करता है, कभी अस्पताल का जागरण या कभी शादियों की जिम्मेदारी या अन्य ऐसी किसी आपात स्थिति में पूरे 24 घंटे बिना सोए रह लेता है, लेकिन अगले दिन उसे भी नींद की आवश्यकता होती है। 

अपनी बात कहूं तो शरीर को इन सब अलग-अलग प्रयोगों के नाम पर सिर्फ और सिर्फ यातना ही दी है। क्या ठंडी क्या गर्मी क्या बरसात, माइनस ठंड में बिना कंबल के रहना, भीषण गर्मी में बिना कूलर पंखे के रहना, ठंड में ठंडे पानी से नहाना, बिना नींद के 25-30 घंटे खुद को जागृत रखने की कोशिशें, 70-80 घंटे बिना भोजन के रहना, 22-23 घंटे लगातार अकेले बाइक चलाना। असल में इन सब का हासिल कुछ भी नहीं होता है। आपके हिस्से बैचेनी, अपच, अनिद्रा, अस्थिरता ही आती है। खुद को भीड़ से अलग महसूस करने के लिए ये सब खयाली पुलाव एक समय तक ही ठीक लगता है। खासकर एक गृहस्थ की तरह जीवन जी रहे व्यक्ति को तो इन सब चीजों से दूर ही रहना चाहिए। जो दुनियावी चीजों से विरक्त हो चुका है, उसे ही यह सब प्रयोग शोभा देता है। 

जब भी कोई गृहस्थ कम नींद का महिमामंडन कर अपने आप को महान दिखाता है और लोगों को बरगलाने का प्रयास करता है, तो ऐसे लोगों के लिए हंसी और दया दोनों ही आती है। विशिष्टता और आत्मश्लाघा से ग्रसित ये लोग असल में जीवन जीने को ही बहुत जटिल और भारी काम बना लेते हैं। असल में ये लोग अपने आप को‌ महान सिध्द करने, भीड़ से अपने आप को जुदा दिखाने के लिए ऐसा करते हैं। इसकी पूर्ति के लिए अपने भोजन, दैनिक जीवनशैली और नींद के तरीकों को जान बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते रहते हैं। और यह सब फर्जी तरीका इन्होंने देश के प्रधानमंत्रियों से ही तो सिखा होता है। एक प्रधानमंत्री का एक बार समझ आता है, उसकी तो हर एक गतिविधि खबर है, सनसनी है। अगर वह मशरूम भी खा रहा तो उसकी एक अलग स्टोरी बनेगी। लेकिन इन तथाकथित गृहस्थी जीवन जी रहे गुमनाम सरीखे लोगों को किस बात का गुमान रहता है, समझ नहीं आता है। प्रधानमंत्री का कम सोने का प्रचार करना शक्ति प्रदर्शन ही है, सत्ता बनाए रखने के लिए यह सब प्रपंच एक नेता के लिए जरूरी भी है। और ऐसा करने वाले मोदीजी अकेले नहीं हैं। स्व. इंदिरा गांधी बेलछी नरसंहार के बाद हाथी में चढ़कर उस गांव तक गई थी, इसके पीछे भी शक्ति प्रदर्शन ही था क्योंकि तब आयरन लेडी के रूप में प्रचारित प्रधानमंत्री की उम्र भी ठीक ठाक थी, और जो कांग्रेस उस समय डूब रही थी, उसे इस शक्ति प्रदर्शन के बाद मानो संजीवनी मिल गई थी। तब सोशल मीडिया होता तो आयरन लेडी उतनी ही ट्रोल होती जितना आज प्रधानमंत्री को संसद के सामने शीश झुकाने के लिए किया गया। राजनीति में शक्ति प्रदर्शन के लिए ऐसी चीजें चलती रहती है। 

पुनश्च : कम सोने को लेकर खुद को महिमामंडित करने वालों से बस यही कहना है कि आपसे लाख गुना बेहतर वे कामगार, मजदूर और वे लाखों ट्रक वाले हैं, जिनके पास अपनी संघर्ष गाथा सुनाने के लिए एक अदद भाषा तक नहीं होती है। जो दिन रात चौबीसों घंटे डाब खाते हुए या नशे का सेवन करते हुए अपनी नींद मारकर देश समाज को बेहतर बनाने में अपना सर्वस्व झोंक रहे होते हैं। सनद रहे कि आप कम सोने का प्रचार कर, उपवास कर उस पर रामकथा लिखकर ऐसे तमाम मेहनतकश लोगों का सरासर अपमान कर रहे हैं। 

इति।

Sunday, 11 June 2023

फंसे रहना ही दुनिया की रीत है

A - कहीं घूम नहीं रहे।
B - इस भीषण गर्मी में कौन घूमे।
A - क्या नया कर रहे फिर?
B - कुछ भी नहीं।
A - फिल्में, किताबें?
B - वो भी नहीं। बस थोड़ा बहुत इंटरनेट।
A - पक्के किसान हो गये हो।
B - वो कैसे?
A - कुछ भी नहीं कर रहे।
B - हमेशा क्यों कुछ करना है।
A - कुछ करते रहना भी जरूरी हुआ जीवन में।
B - रूक जाना भी जरूरी हुआ जब नहीं रूकने से कुछ खास अंतर न पड़ता हो।
A - हां, एक किसान गर्मी के कुछ महीने यही करता है।
B - बिल्कुल, ये एक चीज तो हर किसी को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।
A - फिर भी लोग तो लगे रहते हैं।
B - नहीं लगे रहेंगे तो बैचेनी चबा कर उन्हें खा जानी है।
A - बैचेनी दूर करने के लिए क्या क्या जो करते हैं लोग‌।
B - व्यस्त रहते हैं, और व्यस्त रखने के ढेरों विकल्प व्यवस्था ने, बाजार ने तैयार रखे ही हैं।
A - कभी ये सोचा नहीं। कितना जटिल है यह सब। 
B - क्या ही कहें, हम सब फंसे हुए हैं।
A - बाबा, फंसे रहना ही दुनिया की रीत है।
B - ये भी ठीक है।

Saturday, 20 May 2023

हिंसा बनाम हिंसा

अभी कुछ समय पहले की एक घटना है। छत्तीसगढ़ में एक नशेड़ी सिरफिरे युवा ने अपने माता-पिता एवं दादी की पीट पीटकर हत्या कर उन्हें आग के हवाले कर दिया। पुलिस की जाँच, पत्रकारों की रिपोर्टिंग से जितनी सूचना लोगों के हिस्से आई उसका मोटा-मोटा सार यही है। लेकिन ऐसी घटनाओं के पीछे गहराई में जाकर घटना के पीछे के कारणों की पड़ताल करना जरूरी नहीं समझा जाता है, ऐसी घटना को आखिरकार क्यों अंजाम दिया, इस पर बात नहीं की जाती है। किसी ने अपराध किया, उसे कानून के माध्यम से सजा मिली, हम इतने में ही खुद को कार्यमुक्त कर लेते हैं, अपनी जिम्मेदारी खतम कर लेते हैं। जबकि ऐसी घटनाओं का गहरे से विवेचन किया जाना चाहिए। जब से यह घटना हुई है। आम जनमानस, अड़ोसी पड़ोसी या यूं कहें कि समाज यह कहता फिर रहा है कि लड़का नशेड़ी है, सिरफिरा है तभी ऐसा कदम उठाया, यह भी कहा जा रहा है कि लड़के ने अपने शिक्षक पिता की नौकरी अनुकम्पा में पाने हेतु उन्हें चुपके से मौत के घाट उतार दिया। यह सब ऊपरी बातें चल रही है लेकिन गहराई में जाकर देखें तो असल मामला कुछ और ही निकलता है, जो न्याय कानून संविधान से कहीं आगे की चीज है। मामला परिवार का है, पारिवारिक माहौल का है, समाज का है, सामाजिक ढांचे का है, मूल गड़बड़‌ वहीं से शुरू होती है। इस पोस्ट का उद्देश्य कहीं से भी किसी भी प्रकार के अपराध या हिंसा की पक्षधरता करना नहीं है। उस लड़के ने निस्संदेह एक भयावह कृत्य को अंजाम दिया है, जिसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम है। ऐसे मामलों में सबसे पहला सवाल जो मेरे मन में आता है वह ये है कि क्या वह लड़का अपनी माता के गर्भ से अपराधी बनकर आया था। जब ऐसा नहीं है तो क्या ऐसा कारण है कि युवावस्था में आते तक वह कुस्संग की राह में बढ़ता चला गया, क्या ऐसा हो गया कि वह अपने ही परिवारजनों से इतना कट गया कि उन्हें एक झटके में हाॅकी के डंडे से मौत के घाट उतार दिया। 

लड़के का एक भाई शायद डाॅक्टर है या डाॅक्टरी की पढ़ाई करता है यानि समाज की नजर में एक सफल व्यक्ति है। पता चला कि बड़े भाई की आड़ में इस लड़के को आए दिन घर परिवार और समाज ने निरंतर पिछले कुछ सालों में खूब लानतें भेजी हैं, निकृष्ट घोषित किया है। और तंग आकर यह लड़का भयानक नकारात्मक होता चला गया, हर कोई ऐसे अपमान झेलकर यह सब नजर अंदाज कर आगे नहीं बढ़ पाता है, कुछ लोग हाथ से छूट ही जाते हैं, सही समय पर इनका हाथ थामकर इन्हें सही दिशा देने वाला भी कोई नहीं होता है। मैंने अधिकतर शिक्षक परिवार के बच्चों की स्थिति देखी है, अपवाद हटा दिया जाए तो बच्चों को एकदम‌ मशीन बनाकर रख देते हैं, भावुकता संवेदनशीलता खत्म कर देते हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति इस परिवार की भी रही होगी। समाज अपने गिरेबां में झांके बिना डंके की चोट पर कह रहा है कि लड़का भयानक हिंसक है, अपराधी है, चलिए मान लिया इसमें कोई दो राय है भी नहीं, लेकिन एक सवाल यह भी पैदा होता है कि इस लड़के को अपराधी आखिर किसने बनाया?

Friday, 19 May 2023

डुबान योग - 2

अभी तक की समझ यही कहती है कि कुछ एक तबके जातियाँ जो भी कह लें, ऐसे हैं जिनके लिए देश समाज व्यवस्था कितना भी भला कर ले, वे अपनी बेहतरी करना ही नहीं चाहते, समय परिस्थिति के अनुसार बदलना ही नहीं चाहते, अपनी पाषाणकालीन सोच से ही जीवन जीना चाहते हैं। व्यवस्था झुककर‌ दरवाजे तक जाती है लेकिन इनके लिए इनका अहं ही सर्वोच्च होता है। ये विवश कर देते हैं कि सामने वाला व्यक्ति इन्हें इनकी बिरादरी से नापे, बार-बार मौका देते हैं। आप इन्हें नजर अंदाज करेंगे तो ये आप पर टूट पड़ेंगे, आप इन्हें आगे करेंगे तो ये समाज को पीछे ले जाएंगे, कुल मिलाकर खाई कुआं वाली स्थिति हो जाती है। इंसानी समाज के लिए भी एक बड़ी चुनौती है कि आखिर वह करे तो करे क्या, इसलिए कई बार समय पर छोड़ देना ही सही विकल्प लगता है। वाकई भारतीय समाज अनेक किस्म की जटिलताओं से अटा पड़ा है जिसका बहुत गहरे से मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने की जरूरत है। गाँधी ने सही नब्ज पकड़ी थी, आजीवन राम नाम जपते हुए कमजोर पिछड़ों के उत्थान के लिए जीवन खपा दिया और उसी समाज ने जो गाँधी को भगवान नहीं बना पाए, एक दूसरा भगवान ढूंढ लिया‌। 

हर तरीके से गुणा भाग करके सोच के देखा कि समाज का प्रतिनिधित्व या जिम्मेदारियों का निर्वहन करने वाले क्षेत्रों में इन खास तबकों के लोग क्यों नहीं होते हैं या अगर होते भी हैं तो समाज को बहुत अधिक पीछे ले जाने का काम आखिर क्यों करते हैं। शायद इसलिए तो नहीं प्रोग्रेसिव समाज ऐसे हाथों में जिम्मेदारी देने से कतराता होगा। बिना पूर्वग्रह के अभी तक यही देखने में आया है कि कुछ खास तबके ऐसे हैं जो कभी किसी का भला या किसी का उत्थान कर ही नहीं सकते हैं, उल्टे बेवजह नुकसान जरूर करते हैं, यह एक तरह का सैडिज्म ही है। पता नहीं क्यों उनमें थोड़ी भी मानवीयता विकसित नहीं हो पाती। खैर, इसमें यह भी एक कारण है कि जो अपना ही भला नहीं कर पाता, वह दूसरों का भला करे भी तो कैसे।

Thursday, 18 May 2023

डुबान योग

इंसानी जीवन की अपनी तमाम तरह की जटिलताएँ हैं। इंसान के व्यवहार की सैकड़ों परतें होती हैं, लेकिन एक उसका मूल व्यवहार इन सभी परतों का आईना होता है, सामने यही रहता है, यही दिखता है। समाज में व्यक्ति हमेशा हर तरह के लोगों से मेलजोल बनाकर चलता है, व्यवहार में बरती जा रही असमानताओं को और छुटपुट अतिवादिताओं को किनारे करते हुए एक दूसरे के साथ समन्वय बनाकर जीवन यापन करता है, समाज हमेशा से ऐसे ही चलता रहा है, आगे भी ऐसे ही चलता रहेगा। ऐसे ही जहाँ मदद करने का मौका आता है, लोग एक-दूसरे की मदद भी करते हैं यह एक सामान्य मानवीय प्रक्रिया है। लेकिन इसमें भी एक विशिष्ट प्रजाति होती है जो डुबान योग से ग्रसित होती है, ऐसे व्यक्ति की मदद आप हमेशा नहीं कर सकते हैं, आपको बाद में पश्चाताप होता है, आप ग्लानि से भर जाते हैं। ये कुछ उसी तरीके की बात है कि कोई डूब रहा है तो आप उसे बचाने के लिए रस्सी फेंकते हैं लेकिन सामर्थ्यवान होने के बावजूद वो रस्सी नहीं लपकता है, वह रस्सी पकड़कर खुद की जान बचाने की बजाय आपको कोसने लगता है। वह अपने तरफ से कोई योगदान नहीं देता है जबकि वह खुद डूब रहा होता है। वो चाहता है कि आप खुद को झोंककर छलांग लगाकर उसे बचाएं। और जब आप ऐसा करते हैं तो अमुक व्यक्ति अपने वजन से आपको पहले डूबा देता है, उसके पागलपन की वजह से आप अपनी जान गंवा बैठते हैं। डुबान योग से ग्रसित व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, अवनति ही इनकी नियति में होता है, ये मूर्ख नहीं होते बल्कि धूर्त होते हैं, क्योंकि एक मूर्ख जान बूझकर उसी गलती को बार-बार नहीं दोहराता है। ये लाख समझाने के बावजूद गलती करते हैं क्योंकि इनके लिए इनका अहं सर्वोपरि होता है। ये अपनी मदद नहीं करते हैं, ऐसे लोगों को कितना भी सतमार्ग का रास्ता दिखा दिया जाए, फिर भी वे किसी की एक नहीं सुनेंगे, उस रास्ते में चलकर नहीं जाएंगे। इसलिए एक समय के बाद डुबान योग वालों से दूरी बना लेनी चाहिए ताकि हम जिंदा रह सकें।‌

Monday, 15 May 2023

आम आदमी व्यवस्था की नजर में कीड़ा मकोड़ा है

अभी पिछले कुछ दिनों से पीएससी के परीक्षा परिणाम के पश्चात माहौल गरमाया हुआ है। कुछ एक सामाजिक कार्यकर्ता जिन्होंने सीट बिक्री और 75 लाख को लेकर सनसनी बटोर ली। उनकी मासूमियत पर भी हंसी आती है और लोगों की भी। लोग इतने भोले हैं उन्हें महान समझकर सर आंखों पर बिठा लेते हैं। और उसमें ये लोग यह तर्क भी दे देते हैं कि भाई व्यवस्था में अयोग्य लोगों का चुनाव हो जाता है। ऐसे लोगों से पूछने का मन होता है की ऐसी व्यवस्था जिसमें सिर्फ इंसान आदेश का पालन करने के लिए बाध्य होता है। जहां इंसान का एक सूत्री कार्यक्रम ही आदेश की पालना करना होता है वहां योग्य या अयोग्य जैसी कोई चीज होती कहां है।

बड़ी मासूमियत से ऐसे लोग आम लोगों की भावनाओं से खेल जाते हैं। ऐसे लोगों की हिम्मत नहीं कि खुलकर कुछ कह सकें इसलिए रटी रटाई बातें दुहराकर ईमानदारी का शिगूफा छोड़ देते हैं, लोग लपक लेते हैं। अब एक आम व्यक्ति भी जो आजीवन अपने आसपास भ्रष्टाचार से दो-चार हो रहा होता है वह भी बहुत आश्चर्य जताता है कि अरे यह तो कमाल हो गया, ये हम ईमानदार लोगों की धरती में ये इतने लाख का खेल चल रहा है, गलत बात है ये, जबकि खुद भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है जो खुद में भ्रष्ट है। हममें से हर कोई भ्रष्टाचार करता है और भ्रष्टाचार सिर्फ पैसे से नहीं होता है आचार व्यवहार से, रिश्तों में, अपने दैनिक जीवन की हर एक गतिविधि में इंसान भ्रष्टाचार कर ही रहा होता है।

रही बात पिछले कुछ समय से आ रही अनेक भर्ती परीक्षाओं की। तो इसमें सिर्फ यही कहना है कि जब राज्य प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं में नेता और अधिकारियों ने अपने बच्चों को सेट कर लिया तो व्यापम स्तर की परीक्षाओं में छुटपुट अधिकारी और ब्लॉक प्रमुख अपने बच्चों को आगे करेंगे ही और इसमें कोई दो राय नहीं है यह सब पहले भी होता आया है, अभी भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा। बस अंतर यह है कि इस बार थोड़ा रेट बढ़ गया है और चीजें खुलकर, अधिक पारदर्शिता के साथ हो रही हैं। पीएससी का जो रिजल्ट आया उसमें बड़े-बड़े पद रसूख वालों ने हथिया लिया, हमेशा की तरह आम आदमी के लिए नायब तहसीलदार, जेल अधीक्षक, लेखा सेवा यही सब छोड़ दिया गया। आपने कमजोर को कमजोर ही रखा। वह प्रमोट होते होते बूढ़ा हो जाएगा लेकिन रहेगा आपका नौकर ही, आपने ऐसी व्यवस्था कर दी। 

अब सवाल यह खड़ा होता है कि आम आदमी करे तो करे क्या। आखिर इतने छात्र क्यों सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। मां-बाप अपना सर्वस्व न्यौछावर कर क्यों अपने बच्चों को एक सरकारी नौकरी मिल जाए इसके लिए एड़ी चोटी का जोर लगाए रहते हैं। असल में भारत के आम, कमजोर, निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के पास जीवन यापन के लिए और कोई स्पेस बचता ही नहीं है। इसमें भी जो आराम में हैं, सुविधाभोगी लोग हैं, वे लोग बड़ी आसानी से मुंह उठाकर कह देते हैं कि आप में योग्यता है तो व्यापार कर लीजिए, खुद का कुछ कीजिए लेकिन क्या भारत के एक आम आदमी के पास यह स्पेस है ? कुछ रूपया जोड़कर कुछ करना भी चाहे तो उसके सामने पहाड़ जैसी मुश्किलें हैं। वहां तो और भी स्पेस नहीं है, एक बहुत बड़े तबके ने पहले ही सब कुछ आरक्षित करके रखा हुआ है, आपको बाजार में टिकने ही नहीं देंगे।

इसीलिए भारत के आम आदमी के पास एक कोई छोटी मोटी सरकारी नौकरी के अलावा कोई दूसरा सुरक्षित स्पेस बचता ही नहीं है, तभी लोग लगे रहते हैं। संघर्ष सिर्फ नौकरी पाने का नहीं होता है, जीवन मरण का प्रश्न होता है, अस्मिता की बात होती है। उसमें भी व्यक्ति नौकरी पाकर क्या ही कर लेता है उसका पूरा जीवन पारिवारिक उलझन, तनाव और जिम्मेदारियों के ईर्द गिर्द ही खत्म हो जाता है और एक दिन‌ वह चुपचाप दुनिया से चला जाता है। जीवन भर की पूंजी के रूप में एक कार और एक कोई घर या थोड़ी सी जमीन पीछे छोड़ जाता है। 

कुछ साल पहले भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी ने देश के युवाओं को बहुत सही सुझाव दिया था। उन्होंने युवाओं से अपील की थी की युवा रोजगार के लिए पकौड़े बेचे। प्रधानमंत्री जी की बात सही है, भारत के आम युवा के पास चाय पकोड़े बेचने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प दिखता ही नहीं है। इससे ज्यादा उसके पास स्पेस ही नहीं है। वह थोड़ा भी अपने सामर्थ्य से आगे बढ़ने की कोशिश करता है तो रसूख वाले पहले ही गिध्द की भांति उसे नोचने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। इस आम आदमी के हिस्से जब असफलता हाथ लगती है, जब उसे छला जाता है, वह बड़ी मासूमियत से या तो अपने भाग्य को कोस लेता है या फिर अपनी योग्यता पर सवाल खड़ा कर खुद को शांत कर लेता है। शायद आम आदमी की इसी पीड़ा को प्रधानमंत्री जी भी समझ ही रहे होंगे तभी उन्होंने असहाय होकर ऐसा विकल्प सुझाया होगा।

Sunday, 14 May 2023

बात चली शराब की - ( भाग - 2 )

शराब अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। भारत के बहुत से ऐसे राज्य हैं जहाँ सरकारें अपने राज्य के आम लोगों के सेहत के साथ बहुत अधिक खिलवाड़ नहीं करती है। शराब हर राज्य में बिकती है, लेकिन जिन राज्यों में शराब पर सरकार पूरी तरह से आश्रित नहीं है या जहाँ शराब को लेकर बहुत अधिक कायदे कानून न लगाकर सरकारों ने लचीलेपन से काम लिया है, वहाँ अपेक्षाकृत प्रति व्यक्ति शराब की खपत बहुत कम है।

जैसे उदाहरण के लिए छत्तीसगढ़ के पड़ोसी राज्य ओड़िशा को ही ले लीजिए। इस राज्य में शराब की खपत तुलनात्मक रूप से बहुत कम होती जा रही है। सन 2000 से पहले की बात है। तब छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में नहीं आया था। ओड़िशा गरीब राज्य की श्रेणी में आता था, लानतें भेजी जाती थी कि गरीबहा राज्य है, लोग लीचड़ होते हैं, शराब के नशे में धुत्त रहते हैं आदि आदि। आज की स्थिति ऐसी है कि कोई कह के दिखा दे कि गरीब और शराबी राज्य है। इसके बहुत से कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है गुड गर्वनेंस। सरकार आम लोगों को राहत दे दे, उनको तनावमुक्त रखे, उनका सामाजिक आर्थिक शोषण न हो पाए, उनको मान-सम्मान मिल जाए। इससे ज्यादा उन्हें कुछ नहीं चाहिए होता है, इस न्यूनतम प्रबंधन को पाकर आम‌ लोग खुश रहते हैं। सरकारें पता नहीं क्यों इतनी मामूली सी बात आखिर कैसे नहीं समझ पाती है। क्योंकि इस एक समझ के विकसित हो जाने से काम का दिखावा नहीं करना पड़ता है। ओड़िशा की सरकार राज्य की अर्थव्यवस्था चलाने के लिए शराब के अलावा दूसरे तरीकों से मैनेजमेंट कर लेती है लेकिन लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ नहीं करती है। 

दूसरा एक राज्य है कर्नाटक। यहाँ सच्चे मायनों में शराब को लेकर लोकतंत्र कायम है। राजधानी बैंगलोर में आपको जगह-जगह छोटे-छोटे ग्राॅसरी स्टोर की तर्ज पर शराब की दुकानें मिल जाएंगी। ऐसा लगेगा कि शापिंग माॅल है। बकायदा टोकरी लेकर अपनी पसंद की शराब की खरीददारी करते हैं, क्या महिला क्या पुरूष सब खुलकर खरीददारी करते हैं, कोई किसी को जज नहीं करता है। कोई धक्का मुक्की नहीं, कोई जल्दबाजी नहीं। बैंगलोर के आसपास वाइन की बहुत सी रिफाइनरी है। बैंगलोर का मौसम वैसे भी वाइन रिफाइनरी के हिसाब से उपयुक्त माना जाता है। ऊपर से यहाँ के जितने पब क्लब रेस्तराँ हैं, वहाँ वे खुद अपना क्राफ्ट बियर बेचते हैं जिसमें वे दुनिया जहाँ के फ्लेवर परोसते हैं, इस मामले में ये शहर भारत के सभी शहरों से आगे है। शराब की गुणवत्ता के मामले में बैंगलोर देश में अव्वल नंबर पर है। अब सवाल यह कि यह राज्य जब नकली शराब नहीं बेच रहा, तीन तिकड़म नहीं कर रहा है तो अर्थव्यवस्था चलाने के लिए बाकी मैनेजमेंट कैसे कर रहा है तो इसका जवाब यह है कि बैंगलोर शहर पूरे देश में करप्शन में नंबर वन है। रोड टैक्स यहाँ सबसे ज्यादा है। और आफिस लेवल पर जो भ्रष्टाचार होता है, वह अलग ही लेवल पर चलता है। सेमी लीगल तरीके से एक बढ़िया व्यवस्था बनी हुई है। पैसे का मजबूत प्रवाह बना रहता है।

देवभूमि नाम से विख्यात राज्य हिमाचल और उत्तराखण्ड की बात करें तो वहाँ भी शराब में ठीक-ठाक मिलावट होती है लेकिन उतनी नहीं होती है जितनी भारत के अन्य राज्यों में होती है। भले देवभूमि कहा जाता है लेकिन वहाँ होने वाली पूजा में देवताओं को भी तो शराब चढ़ाया जाता है, और भगवान तो कण-कण में विद्यमान हैं, उस कण में मनुष्य भी आता है और मनुष्य तो आदिकाल से सोमरस का पान कर रहा है। तो वहाँ के लोगों का भी शराब के प्रति अटूट प्रेम है। अच्छी खासी खपत होती है, राज्य को ठीक-ठाक राजस्व मिल जाता है। बाकी नैसर्गिक सुंदरता से परिपूर्ण होने की वजह से वहाँ का टूरिज्म अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर ही देता है। 

अब उस राज्य पर आते हैं जहाँ बकायदा लोग या तो शराब पीने जाते हैं या फिर वहाँ से शराब की बोतलें लेकर आते हैं। तो इस राज्य का नाम है गोवा। गोवा को वैसे तो राज्य कहना ही अपने आप में बेमानी है क्योंकि 451 साल तक पुर्तगालियों के आधिपत्य में रहा और अभी 62 साल पहले ही हमारे हिस्से आया है तो वहाँ की आबोहवा थोड़ी अलग है। गोवा का आम आदमी शराब छूता तक नहीं है वाली स्थिति है। काजू से बनने वाली शराब भी अधिकतर पर्यटकों के हिस्से ही आती है, वही इसे उदरस्थ करते हैं। बाकी स्थानीय लोगों में शराब का मोह उतना नहीं है। लेकिन गोवा जाने वाले पर्यटकों में शराब के प्रति अजीब तरह का मोह है, चूंकि शराब और पेट्रोल दोनों वहाँ टैक्स फ्री है तो लोग जमकर मौज काटते हैं। और हम भारतीयों की आदत है ही कि थोड़ा भी कुछ सस्ता मिले तो सारी नैतिकता वहीं ताक पर। कोई चीज अगर हमें सस्ती मिल जाए तो "इतना कम कर दोगे तो दो किलो खरीद लूंगा" इसी तर्ज पर अपनी क्षमता से अधिक खरीददारी करते हैं। इसी साइकोलाॅजी से गोवा की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। 

कोरोना जब चल रहा था तो शराब को लेकर गजब की आपाधापी मची हुई थी। हर जगह से वीडियो वायरल हो रहे थे जिसमें लोग कतारबध्द दिखाई दे रहे थे। आज भी आपको इंटरनेट में वीडियो मिल जाएंगे। उसमें भी आपको सर्वाधिक मारामारी और भीड़ वाली वीडियो में अव्वल नंबर पर छत्तीसगढ़ ही दिखाई देगा। ऐसा क्यों है इसके पीछे के कारणों पर कभी और चर्चा की जाएगी। अभी के लिए बस इतना ही कि सारी गलती नामुराद टेथिस सागर की है और ये हमारा दुर्भाग्य है कि हमारा क्षेत्र गोण्वाना लैण्ड में पड़ता है।

Friday, 12 May 2023

बात चली शराब की --

अपने जान-पहचान के स्कूल कालेज के तमाम दोस्तों को मैंने बार-बार अवगत कराया कि छत्तीसगढ़ में शराब का सेवन संभल कर करें। चूंकि मिलावट वाली शराब का खेल चहुंओर व्याप्त है, ऐसे में शरीर को और अधिक नुकसान‌ पहुंचता है, वैसे भी एक बार का जीवन है, थोड़ा तो अपने जीवन की गुणवत्ता के लिए ध्यान देना ही चाहिए। तेल, प्राकृतिक गैस, खनिज के अलावा शराब किसी भी राज्य या देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। मेक्सिको, कोलंबिया जैसे देशों की बात करें तो वहां की अर्थव्यवस्था ही कोकेन, मारिजुआना से चलती है, वहां की जलवायु ऐसी है कि अच्छी गुणवत्ता की पैदावार होती है, जिसकी खपत पूरी दुनिया में होती है। और उसी पैसे से देश की अर्थव्यवस्था चलती है, लोगों को रोजगार मिलता है, गांवों शहरों का विकास होता है, सरकार लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराती है..आदि आदि।

भारत में अलग-अलग राज्यों में शराब बिक्री का अलग-अलग तरह का नेक्सस है। उदाहरण के लिए शराबबंदी वाले राज्य गुजरात को लीजिए, वहाँ सबसे अधिक एक्साइज ड्यूटी राज्य को शराब से मिलती है। जबकि भ्रम इस बात का, कि शराबबंदी है। लीगल तरीके से सरकार हमेशा नये नये कानून बनाकर दुगुने-तिगुने दाम में शराब बेचती है। जैसे अभी नियम यह है कि मैं दूसरे राज्य से हूं और अगर मुझे शराब चाहिए तो मैं यहाँ कार्ड बनाकर खरीद सकता हूं, लेकिन गुजरात का लोकल आदमी नहीं खरीद सकता है, लेकिन मैं कार्ड बनाकर यहाँ के किसी लोकल को दे दूं तो वह लगातार शराब आनलाइन घर तक मँगवा सकता है, लेकिन दाम दुगुने हैं। शराब वहाँ भी वैसे ही बिकती है जैसे बाकी राज्यों में बिकती है। बाकी राज्यों से कहीं अधिक कमाई होती है क्योंकि रेट दुगुने तिगुने हैं। 

शराबबंदी वाले राज्यों में दूसरा चर्चित नाम बिहार का आता है। बिहार में मामला एकदम अलग है। वहाँ गुणवत्ता को लेकर भयानक समस्या है। जो चुनिंदा ब्रांड वाली शराब है, कहीं से आपको जुगाड़ से मिल जाए, उसमें भी इतनी अधिक मिलावट है कि आप दुगुने दाम में लेकर आएंगे फिर भी आप विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि आपको सही चीज मिल रही है। यही सिलसिला स्थानीय शराब बनाने वालों के साथ भी है। मिलावट कर कुछ भी बेच रहे हैं। इसलिए कई बार बिहार से ऐसी घटनाएं सुनने को भी मिलती हैं कि नकली शराब से बहुत लोगों की जान चली गई। बिहार के मेरे कुछ एक करीबी मित्र बताते हैं कि जो लोग कभी कभार महीने साल में पी लेते थे उन्होंने भी अब डर के‌ मारे पीना छोड़ दिया है, क्योंकि इतनी अधिक मिलावट है, कभी किसी दूसरे राज्य जाना होता है तब पी लेते हैं और गुणवत्ता में जमीन आसमान का अंतर महसूस होता है। 

अब छत्तीसगढ़ पर आते हैं, यहाँ शराब को लेकर कुछ अलग ही तरह का नेक्सस है जो पिछली सरकार के समय से चला आ रहा है। यहाँ शराबबंदी जैसा कोई नियम नहीं है लेकिन आपको ढूंढने पर भगवान मिल जाएगा लेकिन यहाँ शराब का ब्रांड नहीं मिलेगा। छत्तीसगढ़ में शराब के ऐसे-ऐसे ब्रांड इजात हुए हैं, जो नाम‌ आपको पूरे ब्रम्हाण्ड में कहीं नहीं मिलेंगे। शराब का जो ब्रांड पूरे देश में मिलता है, जो एक तय मानक के आधार पर तैयार होता है, उसकी खपत छत्तीसगढ़ में 20% के आसपास है, बाकी 80% मार्केट स्थानीय नेक्सस के आधार पर तैयार हुए शराब का है जो अधिकृत रूप से सभी शराब दुकानों में बकायदा पैकिंग के साथ बिकता है। और लंबे समय से वही बिक रहा है तो लोगों के दिमाग में भी यही फिट हो गया है कि फलां ब्रांड बढ़िया है, यानि स्थानीय स्तर पर बने उस ब्रांड ने असली ब्रांड को पीछे छोड़ दिया है। कुछ एक दोस्त शिकायत करते हैं कि क्या नकली शराब है, चढ़ता ही नहीं है। कोई कहता है कि पीने के अगले दिन सुबह सिरदर्द की समस्या रहती है। वैसे बिहार में नकली शराब से बहुधा लोग स्वर्ग सिधार जाते हैं, शुक्र है यहाँ मामला सिरदर्द तक सीमित है। मेरे एक करीबी शराबी मित्र जो पाक्षिक पी लेते थे, उन्होंने तो पिछले एक साल से शराब पीना ही छोड़ दिया है। हाल ही में इसी 80% लोकल ब्रांड को खपाने वाले मामले को लेकर ही माननीय ईडी ने छापा मारा है। अब भई केन्द्र हो या राज्य, व्यवस्था चलाने के लिए पैसा तो सबको चाहिए। अब इस छापेमारी में हकीकत जो भी हो, जितने भी करोड़ का बंदरबांट हो, हम सभी को इस सच को स्वीकार लेना चाहिए कि शराब अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। हम अपने आसपास सड़क निर्माण, भवन निर्माण, स्कूल, काॅलेज, उद्योग या अन्य विकास कार्यों को जो देखकर खुश होते हैं उसके लिए भी पैसा इसी शराब से ही आता है। अब हमें इसमें यह देखना होगा कि इस सच को हम कैसे स्वीकारते हैं।

Friday, 14 April 2023

प्रेरणास्त्रोत बनाम इन्फ्लुएंसर्स

पिछले एक दो दशक में जो एक बड़ा बदलाव हमारे सामने है वह हमारे प्रेरणास्त्रोतों को लेकर है। देखने में आता है कि चाहे वह कला, साहित्य, शिक्षा, किसानी, तकनीकी या अन्य कोई भी क्षेत्र हों, चाहे प्रवचन सुनाने वाला कोई बाबा ही क्यों न हो, इन सभी क्षेत्रों में मौद्रिक रूप से जो मजबूत है, वही आज के समय में सबसे बड़ा प्रेरणास्त्रोत है। हर तरह के विषय विशेषज्ञों, इन सबकी तौल का एक ही आधार है और वह है मुद्रा। हम इस हद तक खोखले और गरीब हो चुके हैं। एक चाय बेचने वाले से लेकर खेत में कुछ प्रयोग कर साल भर में लाखों करोड़ों का मुनाफा कमाने वाला ही आज के समय का हीरो है। हाँ, इसमें हमें इस बात से कोई मतलब नहीं कि वह कैसे कमाता है, क्या तरीके अपनाता है, हमें सिर्फ और सिर्फ संख्याबल से मतलब है। कोई बहुत कम समय में येन केन प्रकारेण मौद्रिक ऊंचाई को हासिल कर ले तो हम गर्व से फूले नहीं समाते हैं। फास्ट फूड और वन टच सर्विस प्रोवाइडर की तर्ज में हमें सब कुछ एक झटके‌‌ में जो चाहिए होता है। 

यह प्रेरणास्त्रोतों का नहीं वरन् इन्फ्लुएंसर्स का युग है। तीस सेकेण्ड के वीडियो और चार लाइन वाक्य से ही वैश्विक ज्ञान परोस लेने की जिम्मेदारी का निर्वहन करने में हम सफल हुए हैं। सामान्यीकरण की समस्त ऊंचाईयाँ हमारी यह पीढ़ी छू लेने में अभी तक सफल रही है। मुद्रा के पीछे की इस भागादौड़ी, इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा है। शिक्षकों में भी जो सबसे अधिक मुद्रा संचित करता है, जिसकी बड़ी फैन फालोइंग है, एक मजबूत संख्या बल है, वही पूजनीय है, सम्मानीय है। इसलिए विवश होकर एक शिक्षक को इस सच्चाई को स्वीकारना पड़ता है। अन्यथा जो इस राह पर नहीं चलता है, हम और हमारा समाज उन्हें हाशिए में ढकेल देते हैं। इन्फ्लुएंसर्स युग का यही नियम हर जगह लागू है, सर्वव्यापी है, बाकी सब व्यर्थ है।

Friday, 31 March 2023

पाप का घड़ा

एक सरकारी बाबू रहे। चूंकि व्यवस्था में लंबे समय तक रहे तो सरकारी काम-काज की पैनी समझ रखते थे। पहुंच ऐसी की बड़े-बड़े नेता तक उनके सामने अदब से पेश आते। जिले में जिलाधीशों का आना-जाना लगा रहता लेकिन बाबू की हनक में कोई कमी नहीं हुई। व्यवस्था को इतने करीब से जो जानते थे। अपनी समझ और सूझ-बूझ का उन्होंने जमकर दुरूपयोग किया। भ्रष्टाचार के नये कीर्तिमान गढ़ दिए, भ्रष्टाचार के ऐसे शीर्ष पर पहुंचे मानो उस पद पर रहते हुए पूर्व में किसी ने भ्रष्टाचार किया होगा तो इससे अधिक नहीं। भविष्य में कोई भ्रष्ट आचरण कर सकता है तो इतना ही इससे अधिक नहीं। आज भी कोई भ्रष्टाचार कर रहा होगा तो इतने पर्यंत ही इससे अधिक नहीं। कुल मिलाकर लोगों का भयानक स्तर पर शोषण किया। शायद ही जीवन में कभी तनख्वाह को हाथ लगाने की नौबत आई हो। दफ्तर के दूसरे लोगों को घबराहट हो जाती कि इतने लोगों की आह लेकर वह व्यक्ति कहाँ जाएगा, आखिर नींद कैसे आती होगी। लोग यह भी कहते कि इतने लोगों को कष्ट देने वाला यह सुखी रहता है और सलीके से जीवनपथ पर चलने वालों के लिए पग-पग पर कांटे हैं। जो ऐसा सोचते थे उनको यह नहीं मालूम था कि उस सरकारी बाबू के संचित कर्म पक कर तैयार हो रहे थे। उसका एक बेटा रहा, बेटे को मोटी फीस देकर उसने मैनेजमेंट कोटे से एक महंगे कालेज में भर्ती करवाया। कुछ समय बाद ही बेटा एक ट्रक दुर्घटना में चल बसा। पत्नी के साथ भी पारिवारिक संबंध कुछ बहुत अच्छे नहीं थे क्योंकि आजीवन भ्रष्टाचार, हेर-फेर से मुद्रा संचय करने में ही जीवन खपा दिया। असल मायनों में जीवन क्या होता है इसकी समझ विकसित ही नहीं हो पाई। और अंत में वह बाबू ऐसी बेकार मौत मरा कि शायद एक आम व्यक्ति के लिए उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। किसी अज्ञात कारणवश आग की लपटों से धूं-धूं कर जलते हुए उसकी जान चली गई। सवाल करने का मन होता है कि आखिर सिर्फ उसके साथ ही ऐसा क्यों हुआ। शायद उसका पाप का घड़ा भर गया था।

Wednesday, 22 March 2023

India Ranked 126 in World Happiness Index report 2023

जो समृध्द है, सुविधाओं से लैस है, वह सवाल उठा रहा है कि ये रिपोर्ट गलत है, देश की छवि खराब करने वाली बात है। कोई कह रहा है कि हम नाखुश नहीं है, असल में हमारा देश एक बड़ा बाजार है, इसलिए पश्चिमी देश अपने उत्पादों को बेचने के लिए जान बूझकर ऐसे आंकड़े पेश करता है ताकि हम अधिक से अधिक खरीददारी करें, ऐसे महानुभावों से पूछने का मन करता है कि 136 करोड़ भारतीय में से कितने लोग ऐसे आंकड़ों को पढ़ते हैं और इससे प्रभावित होते हैं। कोई यह भी कह रहे कि युध्द के मुहाने पर खड़े यूक्रेन, या अन्य ऐसे देश जहाँ गरीबी, युध्दोन्माद, दिवालियापन चरम पर है, वे कैसे हमसे ज्यादा खुश हो सकते हैं। मुझे लगता है कि या तो ये जबरन इतने मासूम बने फिर रहे हैं या इन्हें भारतीय समाज की रत्ती भर समझ नहीं है। मनोरोग अकेला अपने आप में हैप्पीनेस इंडेक्स खराब करने के लिए काफी होता है। वैश्विक स्तर पर बनाए जाने वाले तमाम रिपोर्ट जिनमें किसी देश का चहुंमुखी विकास दिखाई देता है उनमें खासकर भारत के लिए सबसे जरूरी रिपोर्ट मुझे यही लगता है। विकास का क्या है, चलता रहता है, अधोसंरचनाएं थोक के भाव तैयार होती रहती है, जहाँ के बाशिदों ने कभी सड़क रेल फ्लैट माँगा ही नहीं, वहाँ भी जिद करके पहुंच जाता है विकास। विकास की यही खासियत है कि वह बिना इजाजत के कहीं भी पहुंच जाने की क्षमता रखता है और आंकड़े तैयार हो जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट के साथ ऐसा नहीं है।

जिन देशों में गरीबी, युध्द, दिवालियापन वाली स्थिति है उन देशों में भी लोग हमसे ज्यादा खुश क्यों हैं इसका कारण जानने के लिए हमें उनके समाज को उनके सामाजिक ढांचे को देखना समझना होगा, जो कि हम कर नहीं सकते। इसलिए हमें चाहिए कि हम‌ अपने ही सामाजिक ढांचे को ईमानदारीपूर्वक देख लें। किताबी बातों से इतर वास्तविक जमीनी हकीकत को देख लें कि एक इंसान के रूप में हम कैसा जीवन जीते हैं, अपने दैनिक जीवन में किस मानसिकता का पोषण करते हैं। यह भी देखें कि सबसे ज्यादा अमीरी और सबसे ज्यादा गरीबी दोनों चीजें हमारे यहाँ क्यों है, आय की असमानता में चोटी और खाई का‌ अंतर आखिर क्यों है। आखिर कैसे, कैसे हमने इस मुकाम को हासिल किया है। हमारे आसपास समाज में इतनी टूट-फूट, इतना प्रतिरोध, इतना बिखराव, इतनी घुटन, इतनी अस्थिरता आखिर क्यों है। सबसे मजेदार जो कोई नहीं समझ पाता है वो यह है कि इस मनोरोग से हर कोई पीड़ित है, जो सुविधाओं से लैस है वह भी उतना ही दु:खी है जितना कि एक दूसरा व्यक्ति जो हाशिए पर है, विपदा के मारे है। एक को मुद्रा, बाजार और गलाकाट प्रतियोगिता ने जकड़ा हुआ है, तो दूसरे को पहले वाले की हरकतों से पैदा हुए निर्वात ने दबोच रखा है। आपने कितनी भी समृध्दि हासिल कर ली, माने लें आपने अपना घर कितना भी अच्छा बना लिया, आपके घर के बाहर नाली साफ करने वाला तो एक पीड़ित शोषित व्यक्ति है, उसके दुःखों का ताप आप तक चाहे अनचाहे पहुंचता ही रहेगा। किसी भौतिक वस्तु की तरह इसे आप रोक नहीं सकते, आप इससे खुद को अलग नहीं कर सकते हैं, जो ऐसा करते हैं, वे और दुःखी होते हैं, उनके भीतर हिंसा, कटुता, वैमनस्यता चरम पर होती है। और यही बड़ी मात्रा में हो भी रहा है तब कहीं जाकर सैकड़ा पार का यह 126 नंबर हमने हासिल किया है। 

मूल बात यही है कि जहाँ एक किसी को अपने सुख के लिए, अपने आराम के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को चोट पहुंचाना पड़ रहा है, वहाँ दु:ख अपने पूरे विस्तार के साथ विभाजित होकर कोनों-कोनों तक पहुंचता रहता है। भोलापन इतना हावी है कि लोगों को इसकी भनक तक नहीं लगती है कि उनके होने भर से, उनकी जीवनशैली से, उनकी गतिविधियों से, मानसिकता से, आचार-व्यवहार से, तौर-तरीकों से कितने लोगों को किस-किस तरह का नुकसान पहुंच रहा होता है। दुःखों का अनवरत विस्तारण करने वाले ये लोग असल में खुद सबसे अधिक दु:खी होते हैं, और समाज में भी इसी का प्रसार करते रहते हैं। 

भोजन, आवास संबंधी सुविधाएं अर्जित करने से, मौद्रिक स्थिरता पा लेने से या सुंदर काया का धनी हो जाने से ही अगर खुशहाली आ जाती तो हर समृध्द व्यक्ति खुश होता, ऐसा क्यों है कि सबसे भयानक विद्रूपताएं उल्टे इन्हीं के जीवन में होती है। इनके जीवन में समस्याओं का उद्गार ज्वालामुखी के लावे की तरह निरंतर होता रहता है, जो निचले स्तर के हर व्यक्ति तक पहुंचता है। बहुत विरले ही होते हैं जो खुद को अप्रभावित रखते हुए बचा पाते हैं। खुशहाली कुछ अर्जित करने‌ से नहीं आती बल्कि सहज होने से आती है। अगर कुछ अर्जित कर लेने से ही इंसान खुश हो लेता तो एक किसी बड़े नेता, सेलिब्रिटी या अधिकारी को कभी दुनिया जहाँ की शादियाँ या संबंधों में लिप्त न होना पड़ता, अपराध न करने पड़ते या अन्य इस तरह का कोई भी व्यभिचार या कुसंग न करना पड़ता। चाहे वह नेता हो, व्यापारी हो, अधिकारी हो, चपरासी हो या कोई आम इंसान अगर आप व्यक्तिगत जीवन में, अपने निजी रिश्ते में पारिवारिक जीवन में खुश नहीं है, कलह आपके जीवन पर हावी है, तो इसका असर आपके आसपास के लोगों तक पहुंचता ही है। किसी भी सरकारी, गैर-सरकारी आफिस में बैठा चपरासी से लेकर जिलाधीश, किसी दुकान के संचालक या बस कंडक्टर या कोई रेहड़ी चलाने वाला आम आदमी, इन सबमें एक चीज समान है कि ये सब मनुष्य हैं और एक मनुष्य होने के नाते सब उसी मात्रा में भोजन करते हैं, निवृत होते हैं, मानवीय रिश्तों को जीते हैं आदि आदि। इन सबके लिए एक ही नियम लागू होता है कि जिस व्यक्ति के जीवन में मानवीय रिश्तों में समस्याएँ चल रही है, वह अपने व्यवहार से दूसरों को बहुत अधिक मानसिक चोट पहुंचा रहा होता है, और यह उसे आजीवन पता नहीं चलता है, क्योंकि वह खुद बीमार है, मानसिक रूप से पीड़ित है। मानसिक विक्षिप्तता से ग्रसित लोग सिर्फ सड़कों पर नहीं घूमते; वे दफ्तरों, दुकानों, चौबारों में भी बैठते हैं, मंच का भी संचालन करते हैं।  

कुछ समय पहले एक बस कंडक्टर मिला, एक मेरी दोस्त ने उस बस कंडक्टर की बहुत तारीफ की थी कि वह बहुत अच्छा व्यवहारिक लड़का है। बाकी कंडक्टर की तरह किसी को अपनी आंखों से असहज नहीं करता है, सबसे अच्छे से बात करता है, नाममात्र भी हिंसा नहीं है। मैंने अपने दोस्त को बस इतना ही कहा कि गरीबी अमीरी से इतर एक अच्छे तनावमुक्त पारिवारिक माहौल के साथ पला बढ़ा होगा, परिवार में बहुत अधिक समस्याएं होंगी भी तो दृष्टा भाव से झेलते हुए आगे बढ़ा होगा, सहनशक्ति और दुनिवायी समझ दोनों साथ-साथ विकसित हुई होगी। और सबसे जरूरी व्यक्तिगत रिश्तों में अगर वह शादीशुदा होगा तो एक पत्नीव्रता होगा। या शादीशुदा नहीं भी है तो अपने मंगेतर या प्रेमिका के साथ भी रिश्ते की इस खूबसूरती को जी रहा होगा। उसके जीवनसाथी में भी यही गुण होंगे, वह भी कुछ ऐसी ही जीवनयात्रा से होकर आई होगी। इन सब की वजह से उस कंडक्टर में किसी तीसरे व्यक्ति के लिए हमलावर होने की प्रवृति विकसित होने की जगह ही नहीं बचती होगी। अंतत: मेरा आंकलन सही निकला। 

हिंसक होने का, व्यभिचारी हो जाने का आधार अगर दुःख या पीड़ा सहना है। तो इसमें बस यही कहना है कि आप कितना भी सह लें, बुध्द गांधी के इतना तो कभी नहीं सह पाएंगे। वे क्यों हिंसक नहीं हुए इस बात को समझने की आवश्यकता है, उन्होंने भी आजीवन तमाम तरह की अपवंचनाएं झेलीं, लेकिन इससे उन्होंने खुद को विकसित किया, समृध्द किया। दुःख को मृत्यु से भी बड़ा बताकर आजीवन उसके समाधान के लिए बुध्द ने जीवन खपा दिया। बुध्द तमाम पीड़ाएं झेलते सहते हुए आजीवन दुःखहर्ता की भूमिका में रहे। सहना कोई मामूली बात नहीं है। किसी ने सही कहा है - बहते झरने की कलकल आवाज रास्ते में रूकावट बन रहे पत्थरों के बिना संभव नहीं है। और जीवन जीने का यही एकमात्र तरीका होता है। 

हमारे यहाँ एक भाई अपने दूसरे भाई का गला काटने के लिए तैयार रहता है। एक फुट जमीन के लिए मारकाट मच जाती है, कुछ रूपयों के लिए मौत के घाट उतार दिया जाता है। क्षणिक सुख के लिए सारी जीवनी ऊर्जा खत्म की जाती है। रिश्तों के नाम पर एक दूसरे को तमाम तरह की मानसिक शारीरिक क्षति पहुंचाई जाती है। मुद्रा को ही जीवन का अंतिम‌ लक्ष्य मानकर तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है। दिन रात प्रपंच, तीन तिकड़म ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। इस विशाल सांस्कृतिक वैभव के कारण ही आज 137 देशों की सूची में हम 126 नंबर पर आए हैं। आइए निर्विकार भाव से हम सब इस सच को स्वीकारें और एक बेहतर इंसान हो जाने की हरसंभव कोशिश करते चलें। क्योंकि जीवन एक ही बार आता है। 

Saturday, 18 March 2023

धारण क्षमता

उनका बचपन बहुत अधिक गरीबी, मुफलिसी में बिता। मिट्टी का घर रहा। खाने-पीने तक की समस्या रहती, ऐसी नौबत भी आ जाती थी। घर के सभी सदस्य दिहाड़ी से ही घर का खर्च चलाते थे। घोर संघर्ष और लगातार मेहनत से पक्के मकान तक का सफर उन्होंने तय किया। घर के मुखिया समान बेटे की एक सधी हुई सरकारी नौकरी भी लग गई। घर के पास नौकरी मिली, वह और सोने पे सुहागा। सुख समृध्दि का आलम यह कि मुखिया बेटे की सूझ-बूझ से धीरे-धीरे तीन मंजिला घर भी तान लिया, कार वगैरह व अन्य तमाम तरह की दुनियावी सुविधाएं। हर कोई उनका उदाहरण देता कि देखो कितने गरीब थे, कठोर संघर्ष से आज कहाँ तक की दूरी तय कर लिए। फिर एक दिन सुनने में आया कि मुखिया बेटे को ड्रीम11 की ऐसी लत लगी कि लाखों लाखों लुटा रहे हैं। जो लोग उनका उदाहरण देते रहे, आज वे कहते फिरते हैं कि भले इतनी संपत्ति है लेकिन ड्रीम11 तो सब चूस ले जा रहा है, जिन्हें एक समय में प्रेरणास्त्रोत माना जाता, आज जनमानस उनसे किसी भी तरह की प्रेरणा न लेने की अपील कर रहा है। जीवन में कुछ हो न हो धारण करने की क्षमता होना बहुत ही जरूरी हुआ। बाकि समय का फेर तो चलता रहता है।