Sunday, 20 November 2022

जैसी करनी वैसी भरनी -

कई साल पुरानी बात है। पढ़ाई के दिनों में एक शाम एक किराने की दुकान पर जाना हुआ था, कुछ सामान लेने गया था, सामान ले चुका था तब आखिर में याद आया कि दूध भी लेना है, तब अमूल दूध का पैकेट 20 रूपए का हुआ करता था। दुकान वाले को मुझे 10 रूपए लौटाने थे, मैंने कहा रूकिए एक दूध का पैकेट दे दीजिए, मैं 10 रूपए आपको दे रहा हूं। इसी बीच उस दुकान में भयानक भीड़ हो गई, उसने तब तक मुझे दूध का पैकेट दे दिया था लेकिन 10 रूपए देने के लिए मुझे बहुत इंतजार करना पड़ा। तब तक मेरे मन में चोर पैदा हो चुका था, जिस स्तर का चोर पैदा हुआ था, उसकी व्याख्या करने की कोशिश कर रहा हूं, मैंने सोचा, हटा जाने दे, इसे 10 रूपए नहीं दूंगा तो कौन सा इसका नुकसान हो जाएगा, ईमान से कह रहा हूं, मेरे मन में तब रंच मात्र भी यह ख्याल नहीं आया कि आज भीड़ है, कल दे जाऊंगा या बाद में दे जाऊंगा। मैं इस ख्याल के साथ अपने कमरे वापस लौटा कि अब नहीं देना है। 

कमरे में आया, पतीले में दूध गर्म किया, एक फोन आया या कहीं शायद मेरे ध्यान गया होगा, दूध उबलने लगा था, मैं जब तक पहुंचा, लगभग 50% दूध गिर चुका था। आधे बचे दूध को देखकर‌ मैं मुस्कुरा रहा था। वह मेरे लिए जीवन की बहुत बड़ी सीख थी, मैंने फिर दुबारा अपने अंदर कभी चोर पैदा नहीं किया, जब-जब पैदा हुआ तुरंत उसको लाइन में लाने की कोशिश की, क्योंकि समझ आ गया था कि सारा लेखा-जोखा यहीं होना है। अस्तित्व की उस अदृश्य शक्ति को शुक्रिया अदा किया कि तुरंत ही मेरी फाइल क्लियर हुई। कभी-कभी सोचता हूं कि क्यों 135 दिन की लंबी यात्रा में मेरे साथ एक अनहोनी नहीं हुई, न गाड़ी पंक्चर हुआ न कुछ। कुछ भी नहीं हुआ। बहुत खूबसूरत चीजें घटित हुई, यकीन नहीं होता है, एकदम पीछे मुड़ के देखता हूं तो जादू सा लगता है। 

वहीं मैं अपने आसपास देखता हूं, लोग अनहोनियों से घिरे रहते हैं, उनको दिखता नहीं है, वे समझ नहीं पाते हैं, उनका लेखा-जोखा अस्तित्व समय-समय पर करते रहती है, लेकिन उनको होश नहीं रहता है। एक करीबी हैं, अच्छे पद पर हैं, खूब बाहरी कमाई करते हैं, पूरा चौबीसों घंटे वही दो नंबरी काम वाले मोड में ही रहते हैं, जीवन में पारिवारिक सुख या किसी प्रकार का जीवन का सुख क्या होता है, मुझे नहीं लगता उन्होंने देखा भी होगा, अस्तित्व ने उनसे एक जवान बेटा दुर्घटना में छीन लिया, और एक बेटी दी, वह भी मानसिक रूप से विक्षिप्त। इतना कुछ देखने के बावजूद जीने के तरीके में कोई अंतर नहीं, उसी ढर्रे में आज भी और अधिक हिंसा से जीते हैं। एक और परिचित रहे, अपने आर्थिक लाभ के लिए खूब लोगों का अहित किया, एक बीमारी ने ऐसा जकड़ा कि सब बैलेंस हो गया‌। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। खैर, ऐसे अनेक उदाहरणों की लंबी लिस्ट बनाई जा सकती है।

मैं पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ, स्वर्ग-नर्क, भ्रष्ट-ईमानदार जैसी किसी भी अवधारणा का हिमायती नहीं हूं। मैंने बस यह देखा है कि जिस किसी ने भी अपने व्यवहार में चोर को पैदा किया है, जिस किसी ने तीन-तिकड़म किया है, उसका तो मैंने बढ़िया से हिसाब होते देखा है। सब एकदम उस बीस रूपए के दूध पैकेट की तरह बराबर से हिसाब हो जाता है।

अंत में यही कि जीवन अनमोल है, एक ही बार मिलता है, अच्छे से जीकर अपने हिस्से का ठीक तरीके से काम कर चले जाने में ही भलाई है। बाकी तो क्या ही है, अस्तित्व घात लगाए बैठा रहता है, आप कितना भी तीन-पाँच कर लें, साम्यावस्था में आ ही जाएंगे। 

Monday, 7 November 2022

Twitter Controversy - Part 3


तस्वीर में दिख रही प्रोफाइल जिसकी है, यह बहुत ऊँचे दर्जे का Satirist है, हिन्दी अंग्रेजी दोनों भाषाओं में गजब की पकड़ रखता है, ह्यूमर भी ऐसा कि भारत में इस लेवल के चुनिंदा लोग ही हैं। ट्विटर में इसके साढ़े सात लाख से अधिक फाॅलोवर हैं, और करोड़ों तक की रीच है, फिर भी इसके पास ब्लूटिक नहीं है, पता है क्यों? क्योंकि इसके पास पहचान वाला, रसूख वाला प्रिविलेज नहीं है। वहीं जिसके पास ब्लूटिक है, वह अपने आप में ब्रांड होता है, तमाम तरह की प्रिविलेज उसे मिल जाती है। कई ऐसे हजार दो हजार फाॅलोवर वाले अयोग्य, कुपढ़, मड़गिल्ले, भाषाई दरिद्रता से लबरेज लोग आपको मिल जाएंगे, जिन्हें ब्लूटिक मिला हुआ है, क्योंकि वे प्रिविलेज क्लास से आते हैं। एलाॅन मस्क ने इसी सामंती व्यवस्था को ध्वस्त किया है और सबको एक पटल पर लाकर रख दिया है। दुनिया भर की सरकारें कागज में समानता के अधिकार को परिभाषित पुर्नपरिभाषित करती रहती हैं, एलाॅन मस्क ने धरातल पर झटके में काम करके दिखा दिया है कि समानता कैसे लाई जाती है, लोकतंत्र को सही मायनों में कैसे जिया जाता है।

Twitter Takeover by Elon Musk - (डिजिटल युग की अभी तक की सबसे बड़ी परिघटना)

ट्विटर वाला जो भी मामला चल रहा है, वह इतना भी मामूली नहीं है, इसे अभी तक की डिजिटल युग की सबसे बड़ी परिघटना के रूप में देखे जाने की जरूरत है, इस घटना से बहुत कुछ अब बदलेगा। वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े और सबसे प्रभावशाली सोशल मीडिया प्लेटफाॅर्म, उसका कुछ ही दिनों में लोकतांत्रिकरण हो जाना, यह अपने आपमें बहुत ही सुखद है। इतिहास में इतने कम‌ समय में इतना बड़ा बदलाव कभी नहीं हुआ, यह डिजिटल युग में ही संभव हो सकता था, और मस्क ने यह करके दिखा दिया है।

एक बार सोच कर देखिए एक कंपनी के आधे से ज्यादा वर्कफोर्स को यूं चुटकी में लात मारकर भगा देना। उसमें भी जो उच्च पदों पर बैठे लोग थे, जो भारतीय भी थे, उनको सबको झटके में हटा देना। वैश्विक स्तर पर इतना बड़ा कदम एलाॅन मस्क ही उठा सकते थे। पहले ट्विटर का एक बहुत बड़ा वर्कफोर्स लोगों को ब्लूटिक बांटने के गोरखधंधे में शामिल था, सामंती मानसिकता को पोषित कर रहा था, एक से एक फर्जी चिंटू सरीखे लोगों को ब्लूटिक के माध्यम से विशिष्ट बनाया जा रहा था,  टाॅप लेवल भी इस पू्रे काम में शामिल था, मस्क ने सारे मवादियों को एक झटके में बाहर फेंक दिया। वे बार-बार सारी कंपनियों को दो टूक कह रहे, जितना चिल्लाना है, रोना धोना है, कर लो, जितना गाली देना है दे जाओ, लेकिन ब्लू टिक चाहिए तो इतना डाॅलर देना पड़ेगा। बात खत्म।

एलाॅन मस्क के ट्विट्स पढ़े जाने चाहिए, वे बार-बार Power to the people कह रहे हैं। पहले के ट्विट्स में यह भी साफ कह दिया है कि जमींदारी और सामंती मानसिकता वालों की दुकानदारी अब नहीं चलेगी, ऐसे सभी लोगों का सफाया उन्होंने नौकरी से निकाल बाहर करके कर ही दिया है। ट्विटर की पूरी की पूरी इंडिया टीम को परसों मस्क ने नौकरी से निकाल दिया, मजाक बात नहीं है‌। एलाॅन मस्क ने‌ जो ये आपरेशन किया है, इस दर्द से उबरने में संभ्रातों को लंबा समय लगना है। यानि सोचिए ये सारे कौन लोग होंगे, कैसा काम कर रहे होंगे जो उनका ये हश्र हुआ है, एलाॅन मस्क भारत के जातिवाद और पोंगापंथ को बहुत बढ़िया से समझते हैं, तभी उन्होंने सबको एक बार में साफ कर दिया है।

More power to Elon Musk 👏



Saturday, 5 November 2022

Technology and Innovations in India -

1. Indians can’t make anything like twitter or for that matter Amazon, Google or Meta . India and Indian companies have no presence in the top technology innovations of the world.

2. That India is an IT superpower is a misnomer. India is ranked a lowly 46 among 64 countries in global IT business in terms of competitiveness. We are producing a large number of poorly paid IT professionals who are fluent in English, but this will not make India an IT powerhouse.

3. The mystery of not inventing or developing any public utility in India is not unique to the present era and so the inquiry has to transcend the matrix of a particular government or party. Indians have not invented anything worthwhile in the entire epoch of modern history.

4. If we just look at the items in our homes — bulb, fan, cooler, air conditioner, air purifier, OTG, microwave, pen, watch, phone, TV, radio, etc. We can’t attach a single invention to an Indian name. This proves that India being a no invention nation is not limited to IT.

5. Historically Indians have segregated work from knowledge. The dominant Indian belief considers manual labour a ‘lowly’ job to be done by ‘lowly people’. This also means that there is little technological brainstorming towards making manual labour easier.

6. Moreover, large swaths of the population engaged in manual labour have been historically kept out of the knowledge domain. This disconnect is detrimental to the advancement of technology, which only prospers at a workshop. 

7. James watt invented the steam engine in a workshop. Modern watch was invented by a locksmith. So was the printing press.

8. In India, however, these works have been done not by individuals but by castes, whose members have no access to knowledge. We had (and still have) a caste to wash clothes. The knowledgeable rishis in gurukuls never felt the need to make a machine to make their work easier.

9. The Indian idea of knowledge is grossly mistaken. We do not accept that the artisans, farmers, persons associated with animal husbandry or the tribes have produced any knowledge. The Indian idea of knowledge has religious connotations and puts a premium on memorising texts.

10. China has a tradition of writing texts, whereas in India, “mechanical rote learning of orally transmitted Vedas, Shrutis and Smritis” is considered the highest form of knowledge.

11. Professor Kancha Illaiah Shepherd, in his book Post-Hindu India argues that all knowledge produced in India belonged to the subaltern classes and tribes.

12. Traditionalism has killed the spirit of capitalism. The Hindu dogma of samsara (world) and karma (deed) has put shackles on the Indian mindset, making us believe that all individuals are born into a caste because of their deed in the previous life.

13. Sociologist Max Weber explains that, “So long as the Karma doctrine was unshaken, revolutionary ideas or progressiveness were inconceivable. The lowest castes, furthermore, had the most to win through ritual correctness and were least tempted to innovations.”

14. Weber goes on to argue that “it is extremely unlikely that the modern organization of industrial capitalism would ever have originated on the basis of caste system.”

15. He explains that since Hinduism holds any change in occupation as ritual degradation and bad karma, it is not capable of giving birth to industrial and technical revolutions.

16. Despite constitutional provisions of reservation, all centres of higher learning in India are mostly manned by members of the upper castes. Most professors at universities belong to this small caste group.

17. Journalist @RTIExpress of The Indian Express has reported that 95.2 per cent of professors, 92.9 per cent of associate professors and 66.27 per cent of assistant professors at India’s central universities belong to the general category.

18. Renny Thomas, while studying the upper caste domination in India’s scientific research institutions, undertook an ethnographic fieldwork at the Bengaluru-based Indian Institute of Science (IISc) and found that there is “a Brahminical identity to science in India”.

19. “They (Brahmin and upper caste scientists) have been perceived to be the natural inheritors of scientific practice.” This hegemony of the upper castes limits the catchment area for talent, and makes these places of learning incompetent and uncompetitive.

20. Unless these factors are acknowledged and efforts made to counter their prevalence, we can only dream about that day when the US or China will threaten to ban Indian apps. The Indian idea of merit and knowledge needs a catharsis.

21. Until we achieve it, we can be happy being a self-proclaimed IT guru and keep on supplying cheap coders to the world.

22. What’s a machine? Machines are things to make life easier, to make processes fast. Why will you invent if you have castes to do your works? If you have Washerman caste, why will you invent Washing Machine?

Friday, 4 November 2022

Hats off to Elon Musk for Democratization of Twitter -

पहले के समय में जो राजे रजवाड़े होते थे उसमें जो भी राजा के खास लोग होते थे या उस समय की व्यवस्था के खास लोग हुआ करते थे, जिसमें कुछ एक खास वर्ग के‌ लोगों का ही दबदबा था। उन्हें उपाधियाँ मिलती थी, ताकि मुख्यधारा की भीड़ से अलग उनका एक वर्चस्व कायम रहे, और लोग उनसे घबराएं या उनका ज्यादा सम्मान करें, पीढ़ी दर पीढ़ी बिना किसी योग्यता के घूम रहे इन लोगों को महान विशिष्ट मानते हुए चलें। देखने में आता है कि राजा भी अपने नाम‌ के साथ राजबहादुर, बाजबहादुर आदि आदि पदवी लेकर चलता था और अपने मंत्रियों, सेनापतियों और अपने विश्वस्त भाट चारणों को पदवी देकर उन्हें हमेशा के लिए भरपूर पाॅवर और प्रिविलेज से लाद देता था।

आज के डिजिटल युग में चूंकि लोकतंत्र की अवधारणा है, लेकिन फिर भी कुछ एक देशों में और हमारे देश में भी इस डिजिटलीकरण के युग में भी राजा-प्रजा वाली सामंती व्यवस्था आज भी कायम है। ट्विटर जैसे डिजिटल प्लेटफाॅर्म में ब्लू टिक लेकर घूमना एक तरह से एक पदवी एक टैग लेकर घूमना ही था, जिनके पास ब्लू टिक न हो उनकी नजर में ब्लू टिक वाला महान विशिष्ट प्रबुध्द माना ही जाता है। यहाँ भी राजे रजवाड़े वाले समय की तरह अब तक कुछ एक खास तबके के लोगों का यानि अपर कास्ट का ही दबदबा था।

आप ट्विटर में देखिएगा कई ऐसे लोग आपको मिल जाएंगे जिनके बमुश्किल हजार दो हजार फाॅलोवर होंगे, उनके ट्विट्स की कोई खास रीच नहीं होगी, ढेला भर योग्यता नहीं होगी लेकिन फिर भी उन्होंने ब्लू टिक ले रखा है। क्योंकि ब्लू टिक का अब तक का पैमाना चाटुकारिता ही था, जिसकी पहुंच जिसका रसूख, जो जितना अधिक भाटगिरी कर सकता है, उसे ब्लू टिक मिल जाता था, और वह झटके भर में विशिष्ट बन जाता था, एलन मस्क ने इस घटिया सामंती व्यवस्था को बुरे तरीके से तोड़ दिया है। इसलिए यह तबका एलन मस्क से बेहद नाराज है क्योंकि मस्क ने एक झटके में ट्विटर को सामंती से लोकतांत्रिक बना दिया है। अब कोई भी योग्य व्यक्ति 8 डाॅलर/प्रतिमाह देकर ब्लू टिक ले सकता है, तथाकथित एलीट क्लास को ये बात बहुत ज्यादा चुभ रही है, भारत के लिए तो यह बड़ा सुखद बदलाव है।

अपने आसपास आप देखिएगा जो भी आपको एलन मस्क का विरोधी मिलेगा, मुद्रा कमाने का विरोधी मिलेगा, आर्थिक सशक्तीकरण का विरोधी मिलेगा, उसे आप सीधे-सीधे इस राजे-रजवाड़े सामंती व्यवस्था का समर्थक ही मानिए।



Wednesday, 12 October 2022

विपश्यना का असर -

एक हमारे परिचित रहे। लंबे समय से गृह कलह से परेशान से रहे, जैसा कि अमूमन बहुत से घरों में होता है। बूढ़े की उम्र 65 के आसपास थी। अंतर्मुखी स्वभाव के थे। जिस उम्र में इंसान सामाजिकता खोजता है, उस उम्र में एकदम खामोश हो गये। उनकी खामोशी मानो घर वालों के लिए समस्या ही बन गई। उनकी खामोशी को पागल जैसी बीमारी समझ अलग-अलग इलाज खोजने लगे। बतौर इलाज घर के सदस्यों को किसी ने विपश्यना का आईडिया दे दिया। घरवाले खुशी खुशी दस दिन के लिए किसी एक विपश्यना सेंटर में छोड़कर आ गये। विपश्यना में वैसे भी मन साधने के लिए जबरन दस दिन बातें न करना, बहुत ही कम भोजन करना, और एकदम जेल की तरह दस दिन का कोर्स पूरा करने‌ की बाध्यता होती है। जेल कहने का कारण यह भी है, कि विपश्यना सेंटर में जाने के बाद बिना कोर्स किए बाहर आना बहुत मुश्किल होता है, जो भी लोग बीच में छोड़कर आते हैं, उनका अनुभव बहुत खराब होता है। 

बूढ़े अंकल विपश्यना पूरा कर जब घर लौटे तो कुछ दिन‌ बाद कोर्स का असर दिखने लगा। वे अंतर्मुखी से बहिर्मुखी स्वभाव के हो चुके थे, एक बार बात करना शुरू करते तो फिर रूकते नहीं थे, शुरूआत के एक दो सप्ताह बहुत अधिक बात करने‌ लगे, चिढ़चिढ़ाने भी लगे थे, फिर अचानक से एकदम गुमसुम से हो गये। कुल मिलाकर उनका व्यवहार अजीब सा हो गया था। फिर एक दिन हमेशा के लिए चुप हो गये। अगर विपश्यना में वे न जाते तो शायद...खैर।।।

Friday, 7 October 2022

गपोड़ी -

गाँव में एक पड़ोस के दादाजी थे, बचपन में जब कभी गर्मी की छुट्टियों में गाँव जाना होता तो वे हम बच्चों से अपनी पीठ पर चलने को कहते जैसा कि अमूमन गाँवों में होता है और उस 15-20 मिनट के काम के बदले में हमें 50 पैसे या 1 रूपये का मेहनताना मिल जाता था। रूपए तो कम ही मिलते थे, कई बार वे हमें प्रिया सुपारी खिला देते थे, तब प्रिया सुपारी खूब चलता था, उस सुपारी का स्वाद गजब ही था, 90's वाले जिसने भी खाया है, उसे याद होगा। 

दादाजी की पीठ पर चलने का कार्यक्रम जब खत्म हो जाता, तो उनकी कहानियों और दंत कथाओं का दौर चलता था। एक बार उन्होंने बताया (जैसा उन्होंने तब बताया था, वही सब याद करके लिखने‌ की कोशिश कर रहा हूं) कि बतौर टीचर एक बार वे इलाहाबार नेहरू के घर गये थे, बताते कि चाय प्लेट की शकल में घर है, खूब सारे कपड़े जूते रखे हैं आदि, नेहरू अपने बाल में जो तेल लगाते थे वो इटली से आता था, नेहरू और उसके पापा का कपड़ा धुलने के लिए इंग्लैण्ड जाता था आदि आदि। तब हमारा बालमन यह नहीं सोच पाता था कि कपड़ा धुल के कितने दिन में वापस आता होगा। 
दादाजी भूत वाली कहानियाँ भी खूब सुनाया करते, एक बार उन्होंने बताया कि रात को शहर से गाँव की ओर आ रहे थे, पीपल के पेड़ में एक औरत हाथ में दिया लिए हुए खड़ी थी और रोते हुए मेरी मदद करो कह रही थी, उसके‌ पैर पीछे की ओर मुंह किए हुए थे, एक मैं और मेरा पुलिसवाला दोस्त, हम दोनों अपनी राजदूत मोटरसाइकिल में थे, पुलिसवाले दोस्त ने कहा आओ भाई जाकर देखते हैं, जैसे ही हम लोग पास में गये, हमने देखा कि वह अपने आसपास इंसानी गूं का भंडार रखी हुई थी, उसने हमें मदद के लिए बुलाया और जैसे ही हम‌ पहुंचे, कुछ मंत्र फूंककर बेहोश कर दिया। अगले दिन घर के आँगन में हमारी नींद खुली। (इस घटना के पीछे का कारण संभवत: सोमरस रहा होगा) तब यह सब कहानी सुनकर हमारे होश उड़ जाया करते। 

एक बार दादाजी खेत की ओर जा रहे थे, उन्हें सफेद भूत (ठेंगा) दिखाई दिया, ये एक ऐसा विशिष्ट भूत था जो सिर्फ उन्हें ही दिखता था, वे बताने लगे कि जैसे ही मैंने उसे देखा वो और बड़ा होता गया, इतना बड़ा कि आसमान तक पहुंचने लगा, और धीरे-धीरे मेरे पास भी आने लगा, मैं उसको देखते-देखते धड़ाम से नीचे गिर गया, मेरे गिरते ही वह अदृश्य हो गया। 

एक बार‌ वे अपने दोस्त के साथ शहर किसी काम से गये, तब शहरों में मारवाड़ी बासा हुआ करता, जिन्हें मारवाड़ी बासा के बारे में नहीं पता, उन्हें बताता चलूं कि एकदम पुरानी सी कोई जगह होती है, घर जैसा ही होता है, उसी में बैठाकर खाना खिलाते हैं, खाना अनलिमिटेड होता है, दादा ने बताया कि तब उन्होंने मिलकर लगभग 120 रोटियाँ खाई थी। मारवाड़ी बासा वाले रोटी बना बनाकर थक चुके थे, उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की और बिना पैसे लिए इनको जाने को कह दिया था। बस दादा ने कहा और हम मान गये। 

जब हम थोड़े बड़े होने लगे तो उनकी दंत कथाओं को ध्यान में रखते हुए दादाजी को हम ठगासुर दादा ऊर्फ गपोड़ी कहा करते, बढ़ा-चढ़ाकर उलूल-जुलूल बात करने के नाम से वैसे ही उनकी फजीहत होते रहती थी लेकिन उन्होंने गप्प हाँकना कभी न छोड़ा, हमें तो मजा आता था, हमेशा नई चीजें पता लगती थी, अब दुनिया कुछ भी कहे, हमारे लिए तो बिना इंटरनेट वाले उस किस्से कहानी के युग में मनोरंजन का केन्द्र हुआ करते दादाजी। जब बुढ़ापा आने लगा तो वे थोड़े सठियाने लगे थे, लेकिन अपने गपोड़ी चरित्र को उन्होंने तब भी नहीं छोड़ा था, तब भी खूब दाँत बिजराकर कहानी सुनाया करते। चार साल पहले ही बचपन में हम सभी बच्चों को प्रिया सुपारी खिलाकर हमारी जीभ नीली कराने वाला गपोड़ी दादा 82 की उम्र में शून्य में विलिन हो गया। 
बूढ़े गपोड़ी दादू की स्मृति में...

Monday, 3 October 2022

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक खेल - फुगड़ी

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेल फुगड़ी के लाभ-

छत्तीसगढ़ के परंपरागत खेलों में से फुगड़ी एक ऐसा खेल है जिसे खेलने वाले के पैर से लेकर सिर तक फिट हो सकता है। हालांकि इसे बच्चे ही ज्यादातर खेलते हैं लेकिन यदि इसे बड़े भी खेलें तो इसका लाभ ले सकते हैं।

फुगड़ी को छत्तीसगढ़ का भरपूर मनोरंजन वाला खेल कहा जाता है। फुगड़ी, शब्द छत्तीसगढ़ के फुदकना से बना है। जिसका अर्थ होता है उछलना, कूदना। जिसमें बच्चों द्वारा जमीन में उकड़ू बैठकर तेजी से और एक लय के साथ उछलते हुए हाथ व पांव को बारी-बारी से आगे पीछे चलाया जाता है। बच्चियां इसे घर में घर के बाहर गली में बाग बगीचे नदी किनारे खेत खलियान गली चौबारे कहीं भी पूरे खुशी और मनोरंजन के साथ खेलती हैं।

फुगड़ी छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेलो में से ऐसा खेल है, जिसमें साजो सामान, मैदान, भारीभरकम धन राशि या विशेष किस्म के खिलाडियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस खेल में भरपूर मनोरंजन के साथ एक संपूर्ण शारीरिक व्यायाम भी शामिल होता है।
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में इसके प्रभाव और लाभ की बात करें तो इससे पैर की अंगुली से लेकर सिर तक के हर अंगो का सम्पूर्ण व्यायाम होता है। हाथ, पांव, अंगुली, पंजा, घुटना, कोहनी, पेट, पीठ, हड्डी, आँख जैसे सभी अंगों का व्यायाम हो जाता है। तेज सांस चलने की वजह से फेफड़े, मुंह, गले का भी व्यायाम होता है। इसका प्रतिदिन अभ्यास करने से खून की व्याधि, पेट, आँख संबंधी व्याधियाँ दूर होती है।

Sunday, 25 September 2022

कुली नंबर वन -

फिल्में वही दिखाती हैं जो समाज में घटित हो रहा होता है। साल 1995 में फिल्म आई थी - कुली नंबर 1. जिसे फिल्म की कहानी के बारे में नहीं पता उन्हें बताता चलूं कि एक करोड़पति बाप होता है, उसकी दो बेटियाँ रहती है, उस करोड़पति बाप की इच्छा रहती है कि अच्छे लड़कों से उन बेटियों की शादी हो जाए। फिल्म का किरदार राजू यानि गोविंदा जो कि कुली रहता है, फर्जी तरीके से करोड़पति के भेष में शादी रचा लेता है। उसके लिए तो चाँदी ही चाँदी हो जाती है, दामाद बनकर रातों रात करोड़पति जो हो जाता है, इसलिए अपनी साख बनाए रखने के लिए जमकर अपनी बीवी और अपने ससुर की तारीफ करता है। लेकिन अपनी असल हकीकत छुपाने के लिए वह लगातार प्रयासरत रहता है। मामला खराब न हो इसके लिए जुड़वा भाई की कहानी भी रचता है। खूब सारे तीन तिकड़म करता है, जमकर फील्डिंग बिछाता है। उस शादी को बचाए रखने के लिए तमाम तरह के झूठ प्रपंच गढ़ता है, लेकिन धीरे-धीरे वो और फंसता जाता है और एक दिन उसका पर्दाफा़श हो जाता है।

ये तो रही फिल्म की कहानी जिसमें दर्शक दीर्घा की माँग को ध्यान में रखते हुए हमेशा न्याय दिखाया जाता है और एक सुखद अंत हमारे सामने होता है। लेकिन वास्तविक जीवन में जो राजू सरीखे लोग होते हैं वे आजीवन पकड़ में नहीं आते हैं।

अपने आसपास हम देखें तो पता चलता है कि हममें से हर किसी ने अपने जीवन में राजू जैसे कुछ किरदारों को देखा ही होता है, जो बीवी और बीवी के खानदान की चौबीसों घंटे तारीफ करने के मोड में लगे रहते हैं, ऐसे लोग एक इंसान के रूप में कभी सही होते ही नहीं हैं। इसमें भी जो बहुत बड़े वाले होते है, वो तो जितने जोश में बीवी के खानदान की तारीफ करते हैं, उतने ही जोश में अपने खानदान की ऐसी तैसी भी करते हैं। अंत में यही कि जैसे ही कोई बीवी के घर वालों का गुणगान करे, कुली नंबर 1 फिल्म को याद कर लीजिएगा।

Saturday, 24 September 2022

मानव बम - 3

41. पब्लिक डोमेन में कभी कोई आर्थिक सामाजिक रूप से मजबूत व्यक्ति इनको खुलकर तवज्जो नहीं देता है, वो बात अलग है कि ये लोग उनके नाम का डंका जरूर पीटते हैं ताकि दुनिया के सामने अपना सीना चौड़ा कर सकें।

42. विडम्बना देखिए कि इनके लिए प्रेम बरसाने वाले हमेशा दबे कुचले या इनसे नीचे के लोग ही होते हैं।

43. ये जिस जीवन मूल्य को अपने जीवन का आधार मानते हैं, उस जीवन मूल्य के बारे में हमेशा बातें करते रहते हैं, आप देखिएगा कि उसी जीवन मूल्य के प्रति ये सबसे ज्यादा गैर-जिम्मेदार होते हैं। 

44. इतनी बड़ी साख वाले ये महान आदमी। जाहिर है उस महानता वाली शख्सियत की अपनी व्यस्तता भी होगी। लेकिन फिर भी अपने चेले चपाटों को ज्ञान देने के लिए इनके पास भरपूर समय होता है।

45. मुख्यधारा के समाज में इन्हें कोई उस तरह से नहीं जानता, इनकी पहचान एक तरह से जीरो ही होती है, लेकिन जिन रसूख/पाॅवर वालों को ये टार्गेट किए होते हैं, उनके साथ अपनी पहचान गिनाकर खुद को महान बताते हैं। 

46. चूंकि भारी भरकम रसूख वालों के साथ अपने संपर्क को गिनाते हैं तो भारत का अदना सा व्यक्ति कभी इनसे सीधे कुछ पूछने या आराम से बात करने लायक स्पेस नहीं बना पाता है। इन्होंने पहले ही खुद सारा स्पेस ब्लाक करके रखा होता है।

47. जैसे एक चपरासी एक अधिकारी को उनके पद अनुरूप उसका सम्मान करता है, इनके साथ आम लोगों के रिश्ते कुछ वैसे ही होते हैं। वे डर के मारे कभी सामान्य सी बात भी नहीं कह पाते हैं क्योंकि ये इतनी मजबूत आभा बनकर चलते हैं।

48. जिस डर/भय के तत्व को किसी धर्म या विचारधारा से जुड़ा व्यक्ति अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है। ये भी उसी तलवार का प्रयोग कहीं अधिक हिंसा से अपने हित साधने के लिए करते हैं।

49. राम रहीम दवा के मदद से भक्तों को नपुंसक बनाता था, ऐसे लोग अपनी बातों से मानसिक रूप से नपुंसक बनाते हैं।

50. कोई साफ मन से भलाई सोचकर भी कुछ कहे वह गलत नियत वाला हो जाता है। लेकिन चूंकि इन लोगों के पास नियत को नापने की भी मशीन होती है तो ये अपनी नियत को सही नियत का तमगा देकर आपको जलील भी कर सकते हैं, अपशब्द भी कह सकते हैं, आपका जीवन भी बर्बाद कर सकते हैं।

51. इनके जीवन का आधार-स्तंभ ही विरोधाभास होता है। इनका विरोधाभाषी चरित्र इनके लहू के एक एक कतरे में आजीवन बहता रहता है। अहिंसा की बात करते हैं और जमकर हर तरह की शाब्दिक वैचारिक हिंसा करते हैं, न्याय की बात करते हैं और जमकर धोखेबाजी करते हैं, प्रेम की बात करते हैं और खूब नफरत को जीते हैं, वस्तुनिष्ठता की बात कर जमकर व्यक्तिगत होते हैं, योग्यता मेधा की बात करते हैं और धूर्त लोगों की टोली के सरदार बने फिरते हैं, एक ओर मानवीय संबंधों रिश्तों की महत्ता गिनाते हैं वहीं दूसरी ओर अपने ही करीबी लोगों को मानसिक चोट पहुंचाते रहते हैं, बात-बात पर विनम्रता की दुहाई तो देते हैं लेकिन जब मौका पड़ा जमकर गुंडई दिखाते हैं, नियत को आधार बनाते हैं और नियतखोरी का पहाड़ खड़ा कर देते हैं, सामाजिकता की बात करते हैं जबकि खुद भयानक असामाजिक प्रवृति के होते हैं।

52. मुख्यधारा का आम आदमी इन जैसे लोगों से संपर्क को सोशल कैपिटल मानता है। और अपनी उस कैपिटल को चोट नहीं पहुंचाता है। कहीं गलती से आर्थिक वाला मामला सेट हो जाए तो ऐसी कैपिटल का भ्रम भी खत्म होता जाता है। मानव बम का असल रूप कभी नहीं दिख पाता।

अब कितना ही लिखा जाए , अब चूंकि हम महान नहीं हैं, सामान्य मनुष्य हैं तो अपनी भूख नींद और बाकी रूटिन की चीजें भी ये सब से प्रभावित होती ही है, (बारूद के ढेर में सफाई के लिए इंसान उतरे तो कपड़ों पर बारूद की परत लगती ही है, झाड़ने से काम नहीं चलता है, बार-बार कपड़े गंदे होते हैं, शरीर गंदा होता है तो बार-बार नहाना पड़ता है यही स्थिति है) क्या है इंसान की अपनी दैनिक दिनचर्या के काम भी होते हैं, परिवार होता है, जिम्मेदारियाँ होती है। और जिनका खुद का जीवन हर प्रकार से सुरक्षित हो जाए तो ऐसे मानव बम रूपी लोग किसी भी प्रकार की क्रांतिकारिता गढ़ सकते हैं।

Friday, 23 September 2022

मानव बम - 2

"मानव बम" रूपी चरित्र के बारे में लिखते हुए 50 प्वाइंट हो चुके हैं, ( मानव बम असल में पिछली पोस्ट का शीर्षक ही है) सोच रहा हूं कि आखिर कितनी व्याख्या कर पाया, अपनी बात के साथ कितना न्याय कर पाया। लगातार खुद का आंकलन भी करता चल रहा हूं कि कहीं हिंसा, प्रतिशोध जैसे भाव तो नहीं उमड़ रहे और क्या ऐसे भाव मेरे भीतर के मूल स्वभाव पर हावी तो नहीं हो रहे। जब हम ऐसे पड़ताल करते हैं बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि बहुत से आयाम होते हैं, आप इनके फैलाए रायते के पीछे पड़ताल करते रह जाएंगे लेकिन कभी खत्म नहीं होगा। यह भी ध्यान रखना पड़ रहा है कि मैं अपने लिखे के प्रति कितना सहज हूं। कहीं मेरे लिखे किसी एक वाक्य में भी महानता का तत्व तो नहीं है। जितना समय इस पूरी पड़ताल में लग रहा है, उससे दुगुना समय खुद के लिए भी दे रहा हूं और पूरी कठोरता के साथ खुद का आंकलन करता चल रहा हूं कि इस पूरी प्रक्रिया में मेरे भीतर कैसे भाव उमड़ रहे हैं। बाकी एक बात तो पूरे अधिकार से कहना चाहता हूं कि अपने लिखे एक-एक वाक्य को लेकर हद से ज्यादा स्पष्ट हूं, हिमालय सा अडिग हूं। मुझे अपने बारे में कोई भी संदेह नहीं है। 

बम तो बम होता है, बम महान होता है, बम की अपनी व्यापकता होती है। बहुत सोचने विचारने के बाद मानव बम शीर्षक देने का सोचा। मानव बम रूपी इंसान की भी अपनी खूबसूरती होती है, लेकिन एक बम को नकारने के लिए उसके एक विस्फोटक चरित्र का होना ही काफी होता है।

एक संदेश यह भी जाता होगा कि मैं मानव बमों से गहरे प्रभावित हुआ होऊंगा लेकिन पूरी तरह ऐसा नहीं है। कुछ लोग किनारे में बैठकर ऐसे मानव बमों के असर को लगातार देख रहे होते हैं। मैं बहुत हद तक किनारे में रहा, इसलिए भी लिख पा रहा हूं। मेरे मूल स्वभाव के प्रति मेरा भरोसा, थोड़ी बहुत ईमानदारी, अस्तित्व की शक्ति और मेरे शुभचिंतको ने मुझे हमेशा संभाला है। जो लोग मानव बमों से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं, ऐसे लोग या तो गुमनाम हो जाते हैं या हिंसा के साथ प्रतिक्रिया देने लगते हैं, खुद को बचा नहीं पाते हैं। उनकी प्रतिक्रिया में भी हिंसा कम और जीवन के प्रति पैदा हो चुकी कठोरता अधिक होती है। वे संतुलित विनम्र होकर अपनी बात कहने की क्षमता खासकर ऐसे मामलों में खो चुके होते हैं। जो कुछ भी झेले होते हैं, उससे पैदा हो रही पीड़ा झटके में फूटकर उन्हें प्रभावित कर ही देती है। 
मोटा-मोटा फिलहाल के लिए यही समझ आया कि जितनी सूक्ष्मता से गहराई में जाकर एक-एक चीज को महसूस कर रहा हूं, शायद उसका आधा भी लिखकर बताना संभव नहीं है‌, शायद ही किसी को अच्छे से समझा पाऊं। इसलिए अभी के लिए थोड़ा विश्रामावस्था में जाना बेहतर समझ रहा हूं।

इति।।

Wednesday, 21 September 2022

मानव बम

अभी तक के जीवन में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तरीके से जितने भी सामाजिक कार्यकर्ता सेलिब्रिटी क्रांतिकारी सरीखे लोग मिले, आज उनको लेकर एक बात बड़ी विनम्रता से कहना चाहता हूं कि उनमें से सब के सब बहुत अधिक परेशान/कुण्ठित से लोग लगे। इनके साथ मैंने बहुत सी गंभीर समस्याएँ देखी हैं जिनका जिक्र करना जरूरी समझ रहा हूं -

1. अपने प्रति और जीवन के प्रति सहज नहीं होते हैं।
2. इनके भीतर आपको न्यूनतम स्तर की विनम्रता भी देखने को नहीं मिलती है। 
3. चिढ़चिढ़े स्वभाव के होकर अपने उस स्वभाव को श्रेष्ठताबोध की तरह पेश करते हैं।
4. बहुत ही सामान्य सी बात को, समाधान के उपायों को ये आपके लिए जटिल और पहाड़ सा कठिन बनाकर पेश करते हैं।
5. आप गहराई में जाकर देखेंगे तो पाएंगे कि ये जीवन की छोटी-छोटी चीजों में बहुत अधिक अपरिपक्व अव्यवहारिक होते हैं।
6. मुख्यधारा के समाज, देश, काल, परिस्थिति के प्रति बहुत अधिक नफरत, कुंठा और हीनभावना से ग्रस्त होते हैं या ऐसा पेश करते हैं।
7. इन्हें सबको एक ही चश्मे से देखने और तौलने की गंभीर बीमारी होती है।
8. परिस्थिति अनुसार सलेक्टिव होना इन्हें बखूबी आता है, जहाँ इन्हें अपना स्वार्थ दीखता है, वहाँ ये बिना शर्म के लोट जाते हैं।
9. ये सामाजिकता और क्रांतिकारिता को आधार बनाकर आपका मनचाहे अपमान करने का विशेषाधिकार हासिल कर लेते हैं।
10. आत्मश्लाघा/आत्ममुग्धता/महानता से ग्रसित होते हैं और इसकी पूर्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।
11. ये सिर से लेकर पाँव तक महान होते हैं, इनकी सोच से लेकर दैनिक दिनचर्या की हर चीज महान होती है, बाकि पूरी दुनिया मूर्ख होती है। 
12. ये अपने अनुगामियों के समक्ष माहौल ऐसा बना देते हैं कि इनकी महानता के कसीदे पढ़ते हुए वे उम्मीद रख लें, फिर ये उन उम्मीदों को झटके में कुचल देते हैं। 
13. अपनी छोटी सी भी चूक/गलती/नासमझी के प्रति इनमें थोड़ा भी स्वीकार्यता का भाव नहीं होता है, क्योंकि ये स्वघोषित महान लोग होते हैं।
14. चूंकि ये महान और हर विधा के विशेषज्ञ होते हैं, इसलिए इनको जैसे कुछ नहीं भी आता है, उस विषय में भी ये सलाह दे जाते हैं, भले ही उस दी गई सलाह से सामने वाले का धीरे-धीरे जीवन बर्बाद हो जाए, तब भी चलेगा‌।
15. अपनी हर गलती को, निर्दयता और कुण्ठा से जड़ित अपनी अभिव्यक्ति को तर्क से साधकर सही सिध्द करने की कला में ये निपुण होते हैं।
16. खुद हर तरह के प्रिविलेज को जीते हुए दूसरों को खाली पेट सोने की सलाह देने जैसी क्रांतिकारिता कराने में इन्होंने मास्टरी की होती है।
17. किसी समस्या को या अपने साथ हुए शोषण या दुर्गति को एक महान उपलब्धि की तरह पेश करना असल‌ में इनका Modus Operandi होता है।
18. ये भयंकर प्रतिक्रियावादी होते हैं। बहस, वाद-विवाद करना इनका प्रिय शगल होता है क्योंकि इसी तरीके से ही जीवन का सार बाँटते फिरते हैं। 
19. क्रांति के नाम पर ये लोगों को जमकर उचकौना देते हैं, और उनको बहुत ही भयानक तरीके से दिग्भ्रमित कर देते हैं। 
20. युवापीढ़ी को अपने तथाकथित ज्ञान रूपी डंडे से अपनी कुण्ठा शांत करने के लिए खूब हांकते हैं और अंतत: उनका जीवन बर्बाद कर देते हैं।
21. भाई-भतीजावाद इनके रग-रग में होता है। खुद खूब मलाई खाएं कोई समस्या नहीं। लेकिन कोई सामान्य लड़का हो तो उस पर पूरी क्रांतिवादिता थोप देते हैं। जीवन मूल्यों से उसकी पूरी घेरेबंदी करने लगते हैं।
22. दूसरों के लिए जिन जीवन मूल्यों की ये घेरेबंदी करेंगे उनमें खुद को तो पूरी तरह फ्लेक्सिबल रखते हैं, लेकिन चाहेंगे कि सामने वाला पूरी तरह उन्हें जिए।
23. एक ओर हर तरह के भोग ऐश्वर्य को जीना और वहीं दूसरी ओर खुद को गरीब बेसहारा की तरह दिखाना इन्हें बखूबी आता है। 
24. आजीवन खुद को गरीब बेसहारा इसलिए भी दिखाते फिरते हैं ताकि इनका मलाई लूटने वाला हिंसक चरित्र खुल के सामने न दिखे।
25. दूसरों के जीवन की दिशा दशा बदलने का स्वांग पालने वाले ये लोग खुद के जीवन की हर चीज को महान और दूसरों को लगातार कमतर बताते रहते हैं।
26. कुछ लोग होते हैं, आपको सामने खराब कहते हैं, तुरंत पता चल जाता है।‌ लेकिन ये महान लोग जिस विचारशीलता की चासनी में आपको डुबोते हैं, उसका असली रंग लंबे समय बाद दिखता है। 
27. इनकी कपोल कल्पनाएं और इनके आसमानी विचार किसी स्वस्थ व्यक्ति के लिए आत्मघाती वायरस से कम नहीं होते हैं। 
28. ऐसे लोगों की संगति में जागरूकता के नाम पर आपकी मानसिक/वैचारिक क्षति होने की भरपूर गारंटी होती है।
29. इनके तथाकथित ज्ञानपेलू चरित्र और गुरू चेला बनाने वाली मानसिकता की वजह से इनके द्वारा युवापीढ़ी को सर्वाधिक मानसिक क्षति पहुंचती है।
30. अपने हितों को साधने के लिए ये जमकर आँकड़ों की बाजीगरी करते हैं, आपने कहीं गलती से स्त्रोत पूछ लिया, ये व्यक्तिगत होने लगते हैं।
31. ऐसे लोग हमेशा प्रिविलेज क्लास से ही आते हैं और अपनी प्रिविलेज का जमकर दुरूपयोग करते हैं।
32. हमेशा लोकतंत्र की बात करने वाले ये लोग अपने मूल चरित्र में भयानक अलोकतांत्रिक होते हैं।
33. विडम्बना देखिएगा कि नाना प्रकार के धूर्त बदमाश और तमाम ढीले लोग इनके गहरे करीबी मित्र ही होते हैं।
34. ईमानदारी इनके‌ लिए महज एक टूल होता है। जिस टूल की सहायता से ये अपने अहंकार को पोषित करते रहते हैं।
35. इनसे संपर्क और रिश्ते बनाए रखना बोर्डिंग स्कूल में भर्ती लेने जैसा होता है, आसानी से एंट्री होती नहीं और एंट्री के बाद बाहर आने में मुश्किलें आती हैं।
36. ये आपको मुख्यधारा के समाज से अलग करते हैं, आपके भीतर उनके प्रति विषवमन कराने के भाव की प्रविष्टि कर अंत में आपको हाशिए पर ढकेल देते हैं। 
37. आपको हमेशा इस भाव के साथ चिपकाकर रखते हैं कि मैं अपनी महानता से प्राणी जगत का उध्दार कर दूंगा और हमेशा पल्टी मार जाते हैं। क्योंकि वास्तव में इनमें ढेला भर की रचनाशीलता नहीं होती है। यह सब कुछ इनका गढ़ा गया पीआर ही होता है।
38. मुख्यधारा के आदमी को बेवजह की डाँट-डपट और कुढ़े हुए स्वभाव से नवाजते रहते हैं क्योंकि वह इनके गढ़े गए आभामण्डल का सम्मान करते हुए कभी इनके स्तर पर जाकर पलट के जवाब नहीं देता है। 
39. इनके जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम या पीआर ही दूसरों को मानसिक क्षति पहुंचाकर मुद्रा और वर्चस्व हासिल करना होता है। 
40. ये इतने धूर्त होते हैं कि इनके चरित्र को उजागर करने में लिखते-लिखते ऐसे चालीस प्वाइंट बन जाएंगे लेकिन ये कभी आपके हाथ नहीं आएंगे।

अंत में यही कि जिस गाँधी के नाम पर ये अपनी दुकान चलाते हैं, काम तो उनके बिलकुल उलट करते हैं। जिस उम्र में गाँधी ने सब कुछ छोड़ के देश समाज के लिए खुद को झोंक दिया, उस उम्र तक ये लोग अपना सब कुछ सेट कर गाँधी के विचारों के नाम पर दुकान डाल चुके होते हैं। इनका सब कुछ गाँधी के विपरित ही होता है। गाँधी बाबा सच बोलते-बोलते दुनिया से चले गये, आज यह कहना गलत न होगा कि गोडसे से ज्यादा हत्या गांधी कि इन झूठे फरेबियों ने की है, लगातार कर रहे हैं। आज अगर गाँधी होते तो अपनी अहिंसा को एक दिन के लिए किनारे कर इनको सीधा कर देते...खैर। अपनी विनम्रता को ध्यान में रखते हुए अपनी बात को यहीं विराम देता हूं।
युवाहित में जारी

Tuesday, 20 September 2022

चाह नहीं मैं सूरबाला की...

हर माता-पिता की चाह होती है कि उनका बेटा/बेटी एक बेहतर जीवन जीने के रास्ते बढ़े। दुनिया के कोई भी माता-पिता यह नहीं चाहते कि उनके बच्चों को जीवन की मूलभूत जरूरतों के लिए परेशान होना पड़े। उनकी यही चाह रहती है कि भले वे कैसा भी जीवन जीते आए हों लेकिन उनके बच्चे स्वस्थ तनावमुक्त और एक बेहतर जीवनशैली की ओर अग्रसर हों। जैसा तनाव जैसा संघर्ष वे झेलकर आए होते हैं वे चाहते हैं कि उसका 1% भी आने वाली पीढ़ी न झेले, उस एक वजह से चीजों को माइनस से प्लस में लाते हुए अगली पीढ़ी को सौंपने की कोशिश में लगे रहते हैं। इसीलिए हमारे यहाँ अधिकांश माता-पिता यही चाहते हैं कि बच्चा सबसे पहले आर्थिक मजबूती की ओर अग्रसर हो। क्योंकि भारत जैसे तीसरी दुनिया श्रेणी के देश में जहाँ की अर्थव्यवस्था का प्रतिमान ही अस्थिरता है, वहाँ आर्थिक रूप से सशक्त हो जाना, उस एक पहलू को साधते हुए स्थिरता हासिल करने की ओर बढ़ना सौ दुःखों की एक दवा की तरह हो जाती है। उसमें भी अधिकतर माता-पिता की यह चाह रहती है खासकर कि जिनके यहाँ आर्थिक स्तर पर जोखिम उठाने के उतने विकल्प नहीं होते या वैसी सामाजिक मजबूती नहीं होती वे बच्चों को सरकारी नौकरी की ओर ही जाने को कहते हैं और यही होना भी चाहिए। जब इस देश में कोरोना जैसी विकराल महामारी में जहाँ पूरा देश पटरी पर था, लाखों लोगों का रोजगार झटके में छिन गया, इतना कुछ गड्ड मड्ड हो गया, लेकिन क्या सरकारी नौकरी करने वालों पर थोड़ी भी आंच आई, बिलकुल नहीं। कुछ इक्का दुक्का विभागों को छोड़ दिया जाए तो चीजें उनके साथ बेहतर ही हुई। तो कोई क्यों न चाहे सरकारी नौकरी?

हर उस युवा का अंतिम लक्ष्य यही होना भी चाहिए खासकर जिनके पास पर्याप्त जोखिम उठाने के साधन न हों, खुद की ठीक-ठाक जमीन न हो, महँगी तकनीकी पढ़ाई कर जाने लायक विकल्प न हों, अलग से कोई विलक्षण प्रतिभा न हो और उसे हल्का‌ फुल्का साधने लायक पहचान/जुगाड़ न हो या व्यवसाय करने लायक न्यूनतम कुशलता न हो। ऐसे लोगों को सीधे सरकारी मोड में ही जाने का प्रयास करना चाहिए। 
इति।।