बूढ़े अंकल विपश्यना पूरा कर जब घर लौटे तो कुछ दिन बाद कोर्स का असर दिखने लगा। वे अंतर्मुखी से बहिर्मुखी स्वभाव के हो चुके थे, एक बार बात करना शुरू करते तो फिर रूकते नहीं थे, शुरूआत के एक दो सप्ताह बहुत अधिक बात करने लगे, चिढ़चिढ़ाने भी लगे थे, फिर अचानक से एकदम गुमसुम से हो गये। कुल मिलाकर उनका व्यवहार अजीब सा हो गया था। फिर एक दिन हमेशा के लिए चुप हो गये। अगर विपश्यना में वे न जाते तो शायद...खैर।।।
Wednesday, 12 October 2022
विपश्यना का असर -
बूढ़े अंकल विपश्यना पूरा कर जब घर लौटे तो कुछ दिन बाद कोर्स का असर दिखने लगा। वे अंतर्मुखी से बहिर्मुखी स्वभाव के हो चुके थे, एक बार बात करना शुरू करते तो फिर रूकते नहीं थे, शुरूआत के एक दो सप्ताह बहुत अधिक बात करने लगे, चिढ़चिढ़ाने भी लगे थे, फिर अचानक से एकदम गुमसुम से हो गये। कुल मिलाकर उनका व्यवहार अजीब सा हो गया था। फिर एक दिन हमेशा के लिए चुप हो गये। अगर विपश्यना में वे न जाते तो शायद...खैर।।।
Friday, 7 October 2022
गपोड़ी -
दादाजी की पीठ पर चलने का कार्यक्रम जब खत्म हो जाता, तो उनकी कहानियों और दंत कथाओं का दौर चलता था। एक बार उन्होंने बताया (जैसा उन्होंने तब बताया था, वही सब याद करके लिखने की कोशिश कर रहा हूं) कि बतौर टीचर एक बार वे इलाहाबार नेहरू के घर गये थे, बताते कि चाय प्लेट की शकल में घर है, खूब सारे कपड़े जूते रखे हैं आदि, नेहरू अपने बाल में जो तेल लगाते थे वो इटली से आता था, नेहरू और उसके पापा का कपड़ा धुलने के लिए इंग्लैण्ड जाता था आदि आदि। तब हमारा बालमन यह नहीं सोच पाता था कि कपड़ा धुल के कितने दिन में वापस आता होगा।
दादाजी भूत वाली कहानियाँ भी खूब सुनाया करते, एक बार उन्होंने बताया कि रात को शहर से गाँव की ओर आ रहे थे, पीपल के पेड़ में एक औरत हाथ में दिया लिए हुए खड़ी थी और रोते हुए मेरी मदद करो कह रही थी, उसके पैर पीछे की ओर मुंह किए हुए थे, एक मैं और मेरा पुलिसवाला दोस्त, हम दोनों अपनी राजदूत मोटरसाइकिल में थे, पुलिसवाले दोस्त ने कहा आओ भाई जाकर देखते हैं, जैसे ही हम लोग पास में गये, हमने देखा कि वह अपने आसपास इंसानी गूं का भंडार रखी हुई थी, उसने हमें मदद के लिए बुलाया और जैसे ही हम पहुंचे, कुछ मंत्र फूंककर बेहोश कर दिया। अगले दिन घर के आँगन में हमारी नींद खुली। (इस घटना के पीछे का कारण संभवत: सोमरस रहा होगा) तब यह सब कहानी सुनकर हमारे होश उड़ जाया करते।
एक बार दादाजी खेत की ओर जा रहे थे, उन्हें सफेद भूत (ठेंगा) दिखाई दिया, ये एक ऐसा विशिष्ट भूत था जो सिर्फ उन्हें ही दिखता था, वे बताने लगे कि जैसे ही मैंने उसे देखा वो और बड़ा होता गया, इतना बड़ा कि आसमान तक पहुंचने लगा, और धीरे-धीरे मेरे पास भी आने लगा, मैं उसको देखते-देखते धड़ाम से नीचे गिर गया, मेरे गिरते ही वह अदृश्य हो गया।
एक बार वे अपने दोस्त के साथ शहर किसी काम से गये, तब शहरों में मारवाड़ी बासा हुआ करता, जिन्हें मारवाड़ी बासा के बारे में नहीं पता, उन्हें बताता चलूं कि एकदम पुरानी सी कोई जगह होती है, घर जैसा ही होता है, उसी में बैठाकर खाना खिलाते हैं, खाना अनलिमिटेड होता है, दादा ने बताया कि तब उन्होंने मिलकर लगभग 120 रोटियाँ खाई थी। मारवाड़ी बासा वाले रोटी बना बनाकर थक चुके थे, उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की और बिना पैसे लिए इनको जाने को कह दिया था। बस दादा ने कहा और हम मान गये।
जब हम थोड़े बड़े होने लगे तो उनकी दंत कथाओं को ध्यान में रखते हुए दादाजी को हम ठगासुर दादा ऊर्फ गपोड़ी कहा करते, बढ़ा-चढ़ाकर उलूल-जुलूल बात करने के नाम से वैसे ही उनकी फजीहत होते रहती थी लेकिन उन्होंने गप्प हाँकना कभी न छोड़ा, हमें तो मजा आता था, हमेशा नई चीजें पता लगती थी, अब दुनिया कुछ भी कहे, हमारे लिए तो बिना इंटरनेट वाले उस किस्से कहानी के युग में मनोरंजन का केन्द्र हुआ करते दादाजी। जब बुढ़ापा आने लगा तो वे थोड़े सठियाने लगे थे, लेकिन अपने गपोड़ी चरित्र को उन्होंने तब भी नहीं छोड़ा था, तब भी खूब दाँत बिजराकर कहानी सुनाया करते। चार साल पहले ही बचपन में हम सभी बच्चों को प्रिया सुपारी खिलाकर हमारी जीभ नीली कराने वाला गपोड़ी दादा 82 की उम्र में शून्य में विलिन हो गया।
बूढ़े गपोड़ी दादू की स्मृति में...
Monday, 3 October 2022
छत्तीसगढ़ का पारंपरिक खेल - फुगड़ी
छत्तीसगढ़ के परंपरागत खेलों में से फुगड़ी एक ऐसा खेल है जिसे खेलने वाले के पैर से लेकर सिर तक फिट हो सकता है। हालांकि इसे बच्चे ही ज्यादातर खेलते हैं लेकिन यदि इसे बड़े भी खेलें तो इसका लाभ ले सकते हैं।
फुगड़ी को छत्तीसगढ़ का भरपूर मनोरंजन वाला खेल कहा जाता है। फुगड़ी, शब्द छत्तीसगढ़ के फुदकना से बना है। जिसका अर्थ होता है उछलना, कूदना। जिसमें बच्चों द्वारा जमीन में उकड़ू बैठकर तेजी से और एक लय के साथ उछलते हुए हाथ व पांव को बारी-बारी से आगे पीछे चलाया जाता है। बच्चियां इसे घर में घर के बाहर गली में बाग बगीचे नदी किनारे खेत खलियान गली चौबारे कहीं भी पूरे खुशी और मनोरंजन के साथ खेलती हैं।
फुगड़ी छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेलो में से ऐसा खेल है, जिसमें साजो सामान, मैदान, भारीभरकम धन राशि या विशेष किस्म के खिलाडियों की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इस खेल में भरपूर मनोरंजन के साथ एक संपूर्ण शारीरिक व्यायाम भी शामिल होता है।
शरीर के अलग-अलग हिस्सों में इसके प्रभाव और लाभ की बात करें तो इससे पैर की अंगुली से लेकर सिर तक के हर अंगो का सम्पूर्ण व्यायाम होता है। हाथ, पांव, अंगुली, पंजा, घुटना, कोहनी, पेट, पीठ, हड्डी, आँख जैसे सभी अंगों का व्यायाम हो जाता है। तेज सांस चलने की वजह से फेफड़े, मुंह, गले का भी व्यायाम होता है। इसका प्रतिदिन अभ्यास करने से खून की व्याधि, पेट, आँख संबंधी व्याधियाँ दूर होती है।
Sunday, 25 September 2022
कुली नंबर वन -
ये तो रही फिल्म की कहानी जिसमें दर्शक दीर्घा की माँग को ध्यान में रखते हुए हमेशा न्याय दिखाया जाता है और एक सुखद अंत हमारे सामने होता है। लेकिन वास्तविक जीवन में जो राजू सरीखे लोग होते हैं वे आजीवन पकड़ में नहीं आते हैं।
अपने आसपास हम देखें तो पता चलता है कि हममें से हर किसी ने अपने जीवन में राजू जैसे कुछ किरदारों को देखा ही होता है, जो बीवी और बीवी के खानदान की चौबीसों घंटे तारीफ करने के मोड में लगे रहते हैं, ऐसे लोग एक इंसान के रूप में कभी सही होते ही नहीं हैं। इसमें भी जो बहुत बड़े वाले होते है, वो तो जितने जोश में बीवी के खानदान की तारीफ करते हैं, उतने ही जोश में अपने खानदान की ऐसी तैसी भी करते हैं। अंत में यही कि जैसे ही कोई बीवी के घर वालों का गुणगान करे, कुली नंबर 1 फिल्म को याद कर लीजिएगा।
Saturday, 24 September 2022
मानव बम - 3
अब कितना ही लिखा जाए , अब चूंकि हम महान नहीं हैं, सामान्य मनुष्य हैं तो अपनी भूख नींद और बाकी रूटिन की चीजें भी ये सब से प्रभावित होती ही है, (बारूद के ढेर में सफाई के लिए इंसान उतरे तो कपड़ों पर बारूद की परत लगती ही है, झाड़ने से काम नहीं चलता है, बार-बार कपड़े गंदे होते हैं, शरीर गंदा होता है तो बार-बार नहाना पड़ता है यही स्थिति है) क्या है इंसान की अपनी दैनिक दिनचर्या के काम भी होते हैं, परिवार होता है, जिम्मेदारियाँ होती है। और जिनका खुद का जीवन हर प्रकार से सुरक्षित हो जाए तो ऐसे मानव बम रूपी लोग किसी भी प्रकार की क्रांतिकारिता गढ़ सकते हैं।
Friday, 23 September 2022
मानव बम - 2
बम तो बम होता है, बम महान होता है, बम की अपनी व्यापकता होती है। बहुत सोचने विचारने के बाद मानव बम शीर्षक देने का सोचा। मानव बम रूपी इंसान की भी अपनी खूबसूरती होती है, लेकिन एक बम को नकारने के लिए उसके एक विस्फोटक चरित्र का होना ही काफी होता है।
एक संदेश यह भी जाता होगा कि मैं मानव बमों से गहरे प्रभावित हुआ होऊंगा लेकिन पूरी तरह ऐसा नहीं है। कुछ लोग किनारे में बैठकर ऐसे मानव बमों के असर को लगातार देख रहे होते हैं। मैं बहुत हद तक किनारे में रहा, इसलिए भी लिख पा रहा हूं। मेरे मूल स्वभाव के प्रति मेरा भरोसा, थोड़ी बहुत ईमानदारी, अस्तित्व की शक्ति और मेरे शुभचिंतको ने मुझे हमेशा संभाला है। जो लोग मानव बमों से बहुत अधिक प्रभावित होते हैं, ऐसे लोग या तो गुमनाम हो जाते हैं या हिंसा के साथ प्रतिक्रिया देने लगते हैं, खुद को बचा नहीं पाते हैं। उनकी प्रतिक्रिया में भी हिंसा कम और जीवन के प्रति पैदा हो चुकी कठोरता अधिक होती है। वे संतुलित विनम्र होकर अपनी बात कहने की क्षमता खासकर ऐसे मामलों में खो चुके होते हैं। जो कुछ भी झेले होते हैं, उससे पैदा हो रही पीड़ा झटके में फूटकर उन्हें प्रभावित कर ही देती है।
मोटा-मोटा फिलहाल के लिए यही समझ आया कि जितनी सूक्ष्मता से गहराई में जाकर एक-एक चीज को महसूस कर रहा हूं, शायद उसका आधा भी लिखकर बताना संभव नहीं है, शायद ही किसी को अच्छे से समझा पाऊं। इसलिए अभी के लिए थोड़ा विश्रामावस्था में जाना बेहतर समझ रहा हूं।
इति।।
Wednesday, 21 September 2022
मानव बम
1. अपने प्रति और जीवन के प्रति सहज नहीं होते हैं।
2. इनके भीतर आपको न्यूनतम स्तर की विनम्रता भी देखने को नहीं मिलती है।
3. चिढ़चिढ़े स्वभाव के होकर अपने उस स्वभाव को श्रेष्ठताबोध की तरह पेश करते हैं।
4. बहुत ही सामान्य सी बात को, समाधान के उपायों को ये आपके लिए जटिल और पहाड़ सा कठिन बनाकर पेश करते हैं।
5. आप गहराई में जाकर देखेंगे तो पाएंगे कि ये जीवन की छोटी-छोटी चीजों में बहुत अधिक अपरिपक्व अव्यवहारिक होते हैं।
6. मुख्यधारा के समाज, देश, काल, परिस्थिति के प्रति बहुत अधिक नफरत, कुंठा और हीनभावना से ग्रस्त होते हैं या ऐसा पेश करते हैं।
7. इन्हें सबको एक ही चश्मे से देखने और तौलने की गंभीर बीमारी होती है।
8. परिस्थिति अनुसार सलेक्टिव होना इन्हें बखूबी आता है, जहाँ इन्हें अपना स्वार्थ दीखता है, वहाँ ये बिना शर्म के लोट जाते हैं।
9. ये सामाजिकता और क्रांतिकारिता को आधार बनाकर आपका मनचाहे अपमान करने का विशेषाधिकार हासिल कर लेते हैं।
10. आत्मश्लाघा/आत्ममुग्धता/महानता से ग्रसित होते हैं और इसकी पूर्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।
11. ये सिर से लेकर पाँव तक महान होते हैं, इनकी सोच से लेकर दैनिक दिनचर्या की हर चीज महान होती है, बाकि पूरी दुनिया मूर्ख होती है।
12. ये अपने अनुगामियों के समक्ष माहौल ऐसा बना देते हैं कि इनकी महानता के कसीदे पढ़ते हुए वे उम्मीद रख लें, फिर ये उन उम्मीदों को झटके में कुचल देते हैं।
13. अपनी छोटी सी भी चूक/गलती/नासमझी के प्रति इनमें थोड़ा भी स्वीकार्यता का भाव नहीं होता है, क्योंकि ये स्वघोषित महान लोग होते हैं।
14. चूंकि ये महान और हर विधा के विशेषज्ञ होते हैं, इसलिए इनको जैसे कुछ नहीं भी आता है, उस विषय में भी ये सलाह दे जाते हैं, भले ही उस दी गई सलाह से सामने वाले का धीरे-धीरे जीवन बर्बाद हो जाए, तब भी चलेगा।
15. अपनी हर गलती को, निर्दयता और कुण्ठा से जड़ित अपनी अभिव्यक्ति को तर्क से साधकर सही सिध्द करने की कला में ये निपुण होते हैं।
16. खुद हर तरह के प्रिविलेज को जीते हुए दूसरों को खाली पेट सोने की सलाह देने जैसी क्रांतिकारिता कराने में इन्होंने मास्टरी की होती है।
17. किसी समस्या को या अपने साथ हुए शोषण या दुर्गति को एक महान उपलब्धि की तरह पेश करना असल में इनका Modus Operandi होता है।
18. ये भयंकर प्रतिक्रियावादी होते हैं। बहस, वाद-विवाद करना इनका प्रिय शगल होता है क्योंकि इसी तरीके से ही जीवन का सार बाँटते फिरते हैं।
19. क्रांति के नाम पर ये लोगों को जमकर उचकौना देते हैं, और उनको बहुत ही भयानक तरीके से दिग्भ्रमित कर देते हैं।
20. युवापीढ़ी को अपने तथाकथित ज्ञान रूपी डंडे से अपनी कुण्ठा शांत करने के लिए खूब हांकते हैं और अंतत: उनका जीवन बर्बाद कर देते हैं।
21. भाई-भतीजावाद इनके रग-रग में होता है। खुद खूब मलाई खाएं कोई समस्या नहीं। लेकिन कोई सामान्य लड़का हो तो उस पर पूरी क्रांतिवादिता थोप देते हैं। जीवन मूल्यों से उसकी पूरी घेरेबंदी करने लगते हैं।
22. दूसरों के लिए जिन जीवन मूल्यों की ये घेरेबंदी करेंगे उनमें खुद को तो पूरी तरह फ्लेक्सिबल रखते हैं, लेकिन चाहेंगे कि सामने वाला पूरी तरह उन्हें जिए।
23. एक ओर हर तरह के भोग ऐश्वर्य को जीना और वहीं दूसरी ओर खुद को गरीब बेसहारा की तरह दिखाना इन्हें बखूबी आता है।
24. आजीवन खुद को गरीब बेसहारा इसलिए भी दिखाते फिरते हैं ताकि इनका मलाई लूटने वाला हिंसक चरित्र खुल के सामने न दिखे।
25. दूसरों के जीवन की दिशा दशा बदलने का स्वांग पालने वाले ये लोग खुद के जीवन की हर चीज को महान और दूसरों को लगातार कमतर बताते रहते हैं।
26. कुछ लोग होते हैं, आपको सामने खराब कहते हैं, तुरंत पता चल जाता है। लेकिन ये महान लोग जिस विचारशीलता की चासनी में आपको डुबोते हैं, उसका असली रंग लंबे समय बाद दिखता है।
27. इनकी कपोल कल्पनाएं और इनके आसमानी विचार किसी स्वस्थ व्यक्ति के लिए आत्मघाती वायरस से कम नहीं होते हैं।
28. ऐसे लोगों की संगति में जागरूकता के नाम पर आपकी मानसिक/वैचारिक क्षति होने की भरपूर गारंटी होती है।
29. इनके तथाकथित ज्ञानपेलू चरित्र और गुरू चेला बनाने वाली मानसिकता की वजह से इनके द्वारा युवापीढ़ी को सर्वाधिक मानसिक क्षति पहुंचती है।
30. अपने हितों को साधने के लिए ये जमकर आँकड़ों की बाजीगरी करते हैं, आपने कहीं गलती से स्त्रोत पूछ लिया, ये व्यक्तिगत होने लगते हैं।
31. ऐसे लोग हमेशा प्रिविलेज क्लास से ही आते हैं और अपनी प्रिविलेज का जमकर दुरूपयोग करते हैं।
32. हमेशा लोकतंत्र की बात करने वाले ये लोग अपने मूल चरित्र में भयानक अलोकतांत्रिक होते हैं।
34. ईमानदारी इनके लिए महज एक टूल होता है। जिस टूल की सहायता से ये अपने अहंकार को पोषित करते रहते हैं।
35. इनसे संपर्क और रिश्ते बनाए रखना बोर्डिंग स्कूल में भर्ती लेने जैसा होता है, आसानी से एंट्री होती नहीं और एंट्री के बाद बाहर आने में मुश्किलें आती हैं।
36. ये आपको मुख्यधारा के समाज से अलग करते हैं, आपके भीतर उनके प्रति विषवमन कराने के भाव की प्रविष्टि कर अंत में आपको हाशिए पर ढकेल देते हैं।
37. आपको हमेशा इस भाव के साथ चिपकाकर रखते हैं कि मैं अपनी महानता से प्राणी जगत का उध्दार कर दूंगा और हमेशा पल्टी मार जाते हैं। क्योंकि वास्तव में इनमें ढेला भर की रचनाशीलता नहीं होती है। यह सब कुछ इनका गढ़ा गया पीआर ही होता है।
38. मुख्यधारा के आदमी को बेवजह की डाँट-डपट और कुढ़े हुए स्वभाव से नवाजते रहते हैं क्योंकि वह इनके गढ़े गए आभामण्डल का सम्मान करते हुए कभी इनके स्तर पर जाकर पलट के जवाब नहीं देता है।
39. इनके जीवन का एक सूत्री कार्यक्रम या पीआर ही दूसरों को मानसिक क्षति पहुंचाकर मुद्रा और वर्चस्व हासिल करना होता है।
40. ये इतने धूर्त होते हैं कि इनके चरित्र को उजागर करने में लिखते-लिखते ऐसे चालीस प्वाइंट बन जाएंगे लेकिन ये कभी आपके हाथ नहीं आएंगे।
अंत में यही कि जिस गाँधी के नाम पर ये अपनी दुकान चलाते हैं, काम तो उनके बिलकुल उलट करते हैं। जिस उम्र में गाँधी ने सब कुछ छोड़ के देश समाज के लिए खुद को झोंक दिया, उस उम्र तक ये लोग अपना सब कुछ सेट कर गाँधी के विचारों के नाम पर दुकान डाल चुके होते हैं। इनका सब कुछ गाँधी के विपरित ही होता है। गाँधी बाबा सच बोलते-बोलते दुनिया से चले गये, आज यह कहना गलत न होगा कि गोडसे से ज्यादा हत्या गांधी कि इन झूठे फरेबियों ने की है, लगातार कर रहे हैं। आज अगर गाँधी होते तो अपनी अहिंसा को एक दिन के लिए किनारे कर इनको सीधा कर देते...खैर। अपनी विनम्रता को ध्यान में रखते हुए अपनी बात को यहीं विराम देता हूं।
युवाहित में जारी
Tuesday, 20 September 2022
चाह नहीं मैं सूरबाला की...
हर उस युवा का अंतिम लक्ष्य यही होना भी चाहिए खासकर जिनके पास पर्याप्त जोखिम उठाने के साधन न हों, खुद की ठीक-ठाक जमीन न हो, महँगी तकनीकी पढ़ाई कर जाने लायक विकल्प न हों, अलग से कोई विलक्षण प्रतिभा न हो और उसे हल्का फुल्का साधने लायक पहचान/जुगाड़ न हो या व्यवसाय करने लायक न्यूनतम कुशलता न हो। ऐसे लोगों को सीधे सरकारी मोड में ही जाने का प्रयास करना चाहिए।
इति।।
Wednesday, 14 September 2022
किसान आंदोलन के तत्व जो भारत जोड़ो यात्रा में देखने को मिल रहे हैं -
2. आधिकारिक पेज पर दिन भर की गतिविधियों की रिपोर्टिंग हूबहू किसान आंदोलन की तर्ज पर ही हो रही है।
3. लोग नि:स्वार्थ भाव से, मन से इस पदयात्रा से जुड़ रहे हैं।
4. तिरंगा हर तरफ किसान आंदोलन में देखने को मिला, यहां भी है।
5. किसान आंदोलन एक बहुत ही अधिक शांत और व्यवस्थित आंदोलन था, कोई चूक हो भी जाती थी, तो तुरंत व्यवस्था कायम हो जाती थी, यह तत्व यहाँ भी है।
6. किसान आंदोलन के खिलाफ जितने भी तरह के दुष्प्रचार हुए, सारे बैकफायर कर गए, यहाँ भी ऐसा देखने को मिल रहा है।
7. किसान आंदोलन की तरह इस यात्रा की अपनी एक अलग आबोहवा है, जो जाकर महसूस करेगा सिर्फ वही बेहतर तरीके से इसे समझ सकता है।
8. आंदोलन हमारे जिंदा होने के अहसास को और अधिक मजबूत करता है, वह अहसास इस पदयात्रा में भी है।
Friday, 9 September 2022
Basics of Graphic Designing -
पंचायत वेब सीरीज ( सीजन 1 एवं 2 ) समीक्षा -
ग्रामीण परिवेश को करीने से रेखांकित करती पंचायत वेब सीरीज का पहला सीजन 2020 में आया था जिसे दर्शकों का भरपूर प्यार मिला, फिर उसका दूसरा सीजन मई 2022 में आया। यह परिवार के साथ देखे जा सकने वाली एक साफ सुथरी वेब सीरीज है, ओटीटी (OTT) प्लेटफाॅर्म और वेब सीरीज के इस दौर में जहाँ फिल्मों में मारकाट और फूहड़ता हावी है, ऐसे में पंचायत जैसी वेब सीरीज लीग से हटकर अपने को प्रस्तुत करती है।
इस वेब सीरीज के माध्यम से गाँव की सभ्यता, संस्कृति एवं भाषा को बहुत ही सरलता से दिखाने का प्रयास किया गया है। जो कि पहले किसी भी वेब सीरीज में इतने सहज,सरल और इतने वास्तविक ढंग से नहीं दिखाया गया है। पंचायत वेब सीरीज गाँव की छवि को अपनी संपूर्णता में दिखाता है, इसमें स्थानीय ग्रामीण संस्कृति के सारे पहलू/आयाम देखने को मिल जाते हैं, लोगों के बीच अगर यह वेब सीरीज लोकप्रिय हुआ उसका बहुत बड़ा कारण यही रहा कि इसमें गाँव को बेहद सादगी और खूबसूरती से फिल्माया गया है। जहाँ गाँव का अपना सुकोमल हास्य विनोद और सहज अंदाज में एक दूसरे के साथ बरतने वाला ह्यूमर भी है, अपनेपन का पुट भी है, एक-दूसरे के साथ जीवन के हर उतार चढ़ाव में निभाई जाने वाली सामाजिकता भी है।
इस सीरीज के पहले सीजन में यह दिखाया गया कि कैसे एक शहर का लड़का जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई किया है, जिसके सपने कुछ और हैं, उसे आगे CAT की पढ़ाई करनी है, लेकिन उसकी नौकरी बतौर सचिव "फूलेरा" नामक गाँव में लगती है और वह उस गाँव में जाकर वहाँ जद्दोजहद करता है, शुरू में उसका मन नहीं लगता लेकिन धीरे-धीरे उस माहौल के हिसाब से खुद को ढालते हुए वहाँ रम जाता है और धीरे-धीरे उसे वह नौकरी बढ़िया लगने लगती है। पहले सीरीज में फिल्म के मुख्य किरदार सचिव जी जिनका नाम इस सीरीज में अभिषेक है, वे अंत में सरपंच की बिटिया रिंकी से पानी टंकी में बैठकर आँखों आँखों में बात करते हैं, और सस्पेंस की तरह इनकी केमेस्ट्री को अगले सीजन के लिए छोड़ दिया जाता है।
दूसरे सीजन में यह दिखाया गया कि सचिव जी अब गाँव के हिसाब से ढलने लगे हैं, पहले सीजन में दिखाया गया कि कैसे शुरूआत में गाँव में वे छोटी-छोटी चीजों से परेशान हो जाते थे, चिढ़चिढ़ाते थे, दूसरे सीजन में वे सहज होते नजर आते हैं। इस सीजन में सचिव जी और रिंकी, इन दोनों की हल्की फुल्की बात होती है, एक बड़ा सवाल यह रह गया है कि इन दोनों की केमेस्ट्री कब आगे बढ़ेगी?
दूसरे सीजन में सबसे अधिक वायरल हुए किरदार "भूषण" जिसके स्वभाव की वजह से उसे गाँव के लोग बनराकस कहते हैं, जिसके द्वारा कहा गया वाक्य " देख रहा है बिनोद" पूरे देश में वायरल हुआ है। इसे लेकर सबसे बड़ी दिलचस्पी यह रहेगी कि इनका अभिनय इनकी क्रांति आने वाले सीजन में भी देखने को मिलेगी या नहीं।
इस सीजन के आखिरी एपिसोड में दिखाया है कि गाँव के उप-प्रधान प्रहलाद का बेटा जो आर्मी में है वह जम्मू-कश्मीर में शहीद हो जाता है। इसके बाद प्रहलाद बिल्कुल अकेला हो जाता है, अपने बेटे की मौत के बाद वह बुरी तरह से टूट जाता है, और इस भावुक कर देने वाले दृश्य के साथ इस सीजन की समाप्ति होती है।
Thursday, 8 September 2022
हिंदी पखवाड़े पर हिंदी की दुर्दशा में हिंदी भाषियों का योगदान
Thursday, 25 August 2022
NGO vs. IT Sector
अब थोड़ी साफ और सीधी बात कर लेते हैं। भारत के लोगों के अंदर समाजसेवा को लेकर गजब का रोमांस है, खुद के घर के सामने की नाली साफ नहीं होगी लेकिन एनजीओ से जुड़कर झाडू पकड़कर ढोंग करने, फोटो खींचवाने इन सब में इनको कोई समस्या नहीं होती है, महानता का बोध जो होता है। एक औसत भारतीय जिसकी दैनिक मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही है वह नौकरी करते हुए अपने और अपने परिवार का पेट भरने का सोचे या महानता के फर्जी बोध को जीने लग जाए, तो यह काम आप भरे पेट वाले लोगों को करने दीजिए।
अब तनख्वाह पर आते हैं। सबसे मूल और जरूरी बात यह कि भारत की जैसी अस्थिर अर्थव्यवस्था है उसमें इंसान के लिए ठीक-ठाक पैसे अर्जित करना ही जीवन का सबसे बड़ा मोटिवेशन होता है, और यह होना भी चाहिए। अगर पैसे कमाने से आपके जीवन की लगभग सारी दुश्वारियाँ कम हो जाती हों तो बिल्कुल इसमें समय देना चाहिए। अंततः रूपये तो सबको चाहिए। और जब रूपया ही कमाना है, नौकरी ही करना है, और नौकरी में ही कारपोरेट माॅडल की जब नौकरी है, सप्ताह में 6 दिन रोज खपना है, तो जहाँ ज्यादा रूपये मिलें, वहाँ खपना चाहिए। इसीलिए एनजीओ और आईटी सेक्टर में हमेशा आईटी सेक्टर को चुनना चाहिए, क्योंकि आपका समय भी निर्धारित रहता है, एक समय के बाद सप्ताह में पाँच दिन काम करने की सहूलियत भी मिल जाती है, समाजसेवा के फर्जीवाड़े का ढोंग भी नहीं, तनख्वाह भी दुगुनी चौगुनी रहती है। इसीलिए, यह एनजीओ में जाने से कहीं बड़ी समाजसेवा है, आप ज्यादा रूपया कमाएंगे तो आपकी क्रयशक्ति भी ज्यादा होगी, स्वयं को और अपने स्वजनों को ज्यादा आराम दे पाएंगे। अंत में यही कि एनजीओ सेक्टर में आपकी मानसिक शारीरिक दोनों तरह की क्षति होती है, जबकि आईटी में मुख्यत: शारीरिक नुकसान होता है। मैं पहले वाले को ज्यादा खतरनाक मानता हूं क्योंकि शरीर को साधना, मन साधने से ज्यादा आसान होता है। बाकी अपनी-अपनी सोच है।