Tuesday, 7 September 2021

सरकार द्वारा किसान आंदोलन को कुचलने के लिए अपनाए गये तरीके -

भौतिक तरीके -
1. बैरिकेटिंग, कंटीले तार बिछाना, रोड खोदना
2. वाटन कैनन की बौछार, वज्र की गाड़ियाँ और सरकारी बसें
3. हजारों की पुलिस फोर्स, आर्म फोर्स द्वारा हिंसा
4. बिजली और पानी की सप्लाई बंद करना
5. आंदोलन स्थल को क्षति पहुंचाना, किसानों के टैंट जलाना

मनोवैज्ञानिक तरीके -
1. इंटरनेट बैन
2. मीडिया द्वारा बदनाम करना ( खलिस्तानी आतंकवादी आदि)
3. किसानों से बातचीत बंद करना
4. जाति धर्म और क्षेत्रीय आधार पर बाँटने की कोशिश करना
5. किसानों को जलील करना, उनकी पीड़ा का, उनकी मौत का मजाक बनाना

जिन लोगों को इस आंदोलन के बारे में अभी तक समझ नहीं बन पाई है, उनको बताता चलूं कि इनमें से एक भी तरीका अभी तक पिछले 9 महीनों में काम नहीं आया है, आगे भी काम नहीं आएगा, हमेशा बैकफायर ही करेगा। फिर भी सरकार रिपीट मोड में इन्हीं तरीकों को अपनाते हुए बार-बार अपनी फजीहत करवा रही है और किसान आंदोलन को और मजबूत बना रही है। 
#farmersprotest

Saturday, 4 September 2021

Few Updates about my next trip -

कल बहुत से लोगों ने पूछा कि कब जा रहे फिर से घूमने। लोग जन्मदिन में अमूमन यह पूछते हैं कि आज क्या खास कर रहे, कहाँ पार्टी कर रहे लेकिन इस बार का मामला एकदम‌ अलग रहा। इसके बदले मुझे बहुत से दोस्तों ने यह पूछा कि - कब जा रहे नार्थ ईस्ट। तो जवाब ये है कि सब कुछ ठीक रहा तो ठंड शुरू होते ही निकल जाना है। पहले की तरह घरवालों को बिना बताए अकेले ही जाऊंगा, इस बार का सफर वैसे काफी अलग होने वाला है, उसके बारे में उसी समय पता चल जाएगा। 
एक चीज मैंने नोटिस किया कि बहुत लोगों को इस बात पर यकीन ही नहीं होता है कि घरवालों को बिना बताए मैं इतने दिन घूमकर आया। उनको लगता है कि ऐसा संभव ही नहीं है। बता दूं कि अभी भी मेरे घरवालों को पता नहीं है कि मैं भारत भ्रमण के लिए निकला था, जबकि पिछले छह महीने से माता-पिता के साथ ही हूं। कोई घरवालों को आकर बता देगा तो भी वे नहीं मानेंगे। तो ये पूरा पूरा स्किल का मामला है, बताऊंगा तो भी आपको समझ नहीं आना है, सबके अलग-अलग जीने के तरीके होते हैं। कोई बहुत साहस वाला काम नहीं है, बस खुद को अपनी स्वतंत्रता को वरीयता क्रम में सबसे ऊपर रखने की बात है। 
कुछ एक‌ मित्र थे जो मेरे पीछे खूब बातें किया करते क्योंकि सामने से तो कुछ कह नहीं सकते इसलिए पीठ पीछे चुगली करते। बातें भी क्या करते कि - "हाँ भाई उसका सही है कोई टेंशन कोई जिम्मेदारी नहीं, हमारी तो अपनी घर परिवार की जिम्मेदारियाँ होती है, माता-पिता को देखना होता है, उनकी सेवा करनी होती है।" अबे यार भाई इतना क्यों खार खाते हो सीधे कहा करो कि चीजें मैनेज करना नहीं जानते। 
छह महीनों से घर पर हूं, बाई की तरह घर पर सारे काम देखता आया हूं, एक‌ महीने तो अस्पतालों के ही चक्कर लगाए हैं, एक दो महीने तो गाँव में खेतों का काम देखा है, इन छह महीनों के अंदर दर्जनों शादियाँ, दशकर्म सबमें शिरकत करना। वह सब कुछ जिया है जैसा एक आम इंसान जीता है। अलग कुछ नहीं है बे, अलग कुछ है तो मेरे लिए आपकी सोच।
अगली ट्रिप में निकलने से पहले बहुत मुश्किलें हैं, हर तरह की मुश्किले हैं, ये समझिए कि ऐसा फँसा हूं‌ कि पिछले छह महीने से घर से निकल नहीं पाया हूं। क्या होगा, कैसे सब मैनेज होगा, कुछ नहीं पता, सब कुछ हमेशा की तरह अस्तित्व के सहारे। अब जब हम कुछ सोच लेते हैं तो फिर कर ही लेने वाले हुए। समय कीमती है, बाद में पैसे आ जाएंगे, सुविधाएँ इकट्ठी हो जाएंगी, लेकिन ऐसा उत्साह नहीं रहेगा, ऐसा जुनून दुबारा पैदा नहीं होगा, इसलिए जो जब मन करे उसी समय कर लेना चाहिए। 

चार जन्मतिथियाँ -

बहुत लोगों के साथ ऐसा होता है कि उनके दो अलग-अलग जन्मदिन होते हैं, अमूमन एक उसमें से स्कूल वाला होता है, जिसमें हमारे भारतीय माता-पिता एक दो साल कम कराकर एंट्री करा देते हैं, और एक होता है असली वाला, जिस दिन वह पैदा हुआ होता है। मेरे साथ भी यही दोनों हैं, लेकिन इसके अलावा भी दो और हैं। असल में मुझे अपनी असली जन्मतिथि पता ही नहीं है। अभी तक सब तुक्के में ही चल रहा है। बहुत छोटी उम्र से ही इसलिए धार्मिक कर्मकांड, ग्रह नक्षत्र दिशा कुंडली आदि सब आड़े हाथों ही लेता हूं। अपनी जरूरत के सारे पूजा मंत्रजाप वाले काम खुद ही निपटा लेता हूं, वाहन‌ पूजा भी खुद ही किया था।

चार जन्मतिथियाँ होने की कहानी भी गजब है। जो बच्चे गाँव में पैदा होते हैं, उनके साथ यह हुआ होता है कि घरों में कोई पेन पकड़कर रजिस्टर में लिख देता है, जैसे किसी उधार लेने वाले का नाम लिख दिया जाता है, बिल्कुल उसी तरह, मतलब कोई गंभीरता नहीं। तब तो समय ऐसा था कि कैलेण्डर भी गिने चुने घरों में होता था। तो जिस रजिस्टर में मेरी जन्मतिथि लिखी गई। उसमें लिखा है कि मेरा जन्म सोमवार को हुआ, शुक्ल पक्ष को हुआ। माताजी कहती हैं कि कृष्ण पक्ष को मैं पैदा हुआ। माताजी से जब यह कहा जाता है कि 4 सितंबर का दिन आपके अनुसार तो बुधवार हुआ, तो उनका तर्क यह रहता है कि मैं तुझे पैदा की हूं, तू मुझसे ज्यादा जानेगा क्या? तो इस तरह से एक शुक्ल पक्ष वाला जन्मदिन अलग, एक कृष्ण पक्ष वाला अलग बन जाता है, और ये दोनों की माध्यिका ये 4 सितंबर जिसे असली जन्मदिन मानकर काम चलाया जा रहा है, अव इसे जिन्होंने एंट्री की थी वे अब दुनिया में नहीं है तो उनके साथ ही सच चला गया और इसके अलावा एक आखिरी स्कूल वाला है। कुछ इस तरह हो गये टोटल चार जन्मदिन। जब-जब चार सितंबर आता है, ये सारा कुछ याद आ जाता है। 😀

Wednesday, 1 September 2021

पूर्वाग्रह से मुठभेड़ -

बहुत साल पुरानी बात है, पढ़ाई के दिनों में एक लड़के के साथ रूम शेयर करना हुआ। दो लोगों के उस शेयरिंग वाले कमरे में कुछ महीनों तक मैं अकेला ही रहा। फिर एक दिन एक लड़का आया। कमरे में अपना सामान रखा फिर मेरे से उसका परिचय हुआ, परिचय क्या हुआ आते ही कहता है - भैया आदिवासी हूं, शराब पीता हूं, लेकिन पीने के बाद मेरा मुंह बंद रहता है तो आप बता दीजिए अगर आपको दिक्कत है तो, कहीं और रह लूंगा। अपना नाम बताने से पहले ही उसकी ये बात सुनकर, उसकी इस साफगोई से मैं हैरान हो गया। मैंने कहा - कोई समस्या नहीं, आजकल हर कोई पीता है, शराब को अपनी पहचान बनाकर तुम्हें अलग से यह बताने की जरूरत नहीं कि तुम आदिवासी हो। 
कई महीनों तक भाई की तरह हम‌ साथ रहे। साथ खाना बनाते, वह जिस दिन शराब पीता, अपने मित्रों के यहाँ खाना खाने सोने चला जाता ताकि मुझे असुविधा ना हो। कई बार मैं मजे लिया करता कि कभी हमारे साथ भी पार्टी कर लिया करो यार प्रभु, लेकिन उसे तो अपने देशी मसाला गैंग से ही फुर्सत नहीं मिलती थी।
धीरे-धीरे क्या हुआ। मेरी अपनी कंडिशनिंग भी हिलोरे मारने लगी। मैं उसकी जीवनशैली से चिढ़ने लगा, परेशान होने लगा। उसका शराब पीना, अपनी बारी में समय से खाना नहीं बनाना आदि छोटे-छोटे कारण रहे जिसे मुझ तथाकथित सभ्य व्यक्ति ने बड़ा मुद्दा बनाया। अब मैं उसे ताने देने लगा, डांटने लगा, सही गलत समझाने लगा, ज्ञान प्रवचन देने लगा, उसने हमेशा नजर अंदाज किया, मैंने बुरा बर्ताव भी किया, गुस्सा किया तो भी उसने कभी नाराजगी नहीं जताई, हमेशा खामोश रहा। 
अचानक से क्या हुआ, वह बहुत चुप रहने लगा, उसने अपने खाने‌-पीने का भी सिस्टम अलग कर लिया, भले मेरे साथ कमरा शेयर करता था लेकिन दिन में भी कमरे में नहीं रहता था, कटा-कटा सा रहने लगा, मेरे से न बातचीत न आँख मिलाना, कुछ भी नहीं। मैं भी सोचने लग गया कि ऐसा क्या हो गया। मैं भी पता नहीं क्यों उससे आगे से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। फिर एक दिन मैंने कहा - भाई मुझसे गलती हुई तो माफी चाहता हूं, लेकिन अब तो खामोशी तोड़ दे, क्यों ऐसे बर्ताव कर रहा है बता भी दे भाई। उसने जो कहा वह सुनकर मैं सोच में पड़ गया। उसने कहा - भैया, मैंने देखा कि मैं आपके लिए परेशानी का सबब बन रहा हूं, इसलिए मैं सोचा मेरे थोड़ा दूर हो जाने से आपकी परेशानी कम हो जाएगी।
असल में मेरी जिद, मेरे भीतर की कुंठा यह कहती थी कि वह लड़का जैसा जीवन जीता है, वह बहुत ही घटिया जीवनशैली है, निकृष्ट है, उसकी मित्र मंडली संगति सब कुछ बेकार है, निचले दर्जे का है आदि आदि। और वहीं उसके ठीक उलट मैं जैसा जीवन जीता हूं, वही आदर्शवादी जीवन है, उसे भी ऐसा जीवन जीना चाहिए और मुझसे सीखना चाहिए, अपनी यही सोच मैं उस पर थोपने का ही काम कर रहा था। मैं उसे अपने बने बनाए सही गलत के खाँचे में फिट करने चला था, लेकिन ऐसी हिमाकत करने वाला मैं होता कौ‌न हूं ये सवाल भी मैंने थोड़ा समय गुजर जाने के बाद खुद से किया।
आज भी उसकी वह बातें याद करता हूं तो सोचता हूं, ऐसे साफ मन के लोग और कितने होंगे। बहुत से अलग-अलग लोगों के साथ काॅलेज के दिनों में भी रहा, लेकिन वैसी साफगोई वैसी सहजता वैसा सौंदर्यबोध कहीं और महसूस नहीं हुआ।
मैंने उसके साथ रहते हुए एक चीज सीखी कि हम भारतीयों को अमूमन अपने आसपास अपने जैसे ही लोग चाहिए होते हैं। हम उनके बीच ही सहज और सुरक्षित महसूस करते हैं। हमें अपने से अलग चरित्र का, सोच-विचार का, बिल्कुल अलग तरीके से जीवन यापन करने वाला कोई मिल जाता है, और उसमें भी जहाँ हमें सामाजिक और जातिगत तरीके से ऊँच नीच वाला एंगल मिल जाता है तो भले ही हम कितने भी सामाजिक न्याय के पुरोधा बनते हों, हमारे भीतर कहीं छुपा हुआ एक हिंसक जातिवादी प्रतिक्रिया देने लग जाता है।

Tuesday, 31 August 2021

किसान आंदोलन पर चर्चा -

A - आज क्लास में किसान आंदोलन पर चर्चा हुई ?
B - अच्छा।
A - तो तुम्हारी याद आ गई।
B - ये बहुत बढ़िया है।
A - इसमें क्या बढ़िया लगा तुमको?
B - किसान आंदोलन के नाम‌ पर मेरी याद आई न।
A - हाँ तो आज हमने भी एक दो बातें कही।
B - अच्छा।
A - फिर उन्होंने कहा कि नोट्स बनाकर लाना।
B - फिर?
A - तो हमने सोचा तुमसे अच्छा इस विषय में और कौन हमें नोट्स दे पाएगा।
B - मैं नोट्स नहीं दे सकता।
A - तुम दोगे, हम नहीं जानते।
B - सरकार ने बिल लाया है, वहीं से तीनों बिल देख लीजिए।
A - वो हमको समझ आता तुमसे क्यों कहते?
B - सिविल सेवा की तैयारी करने वालों को भी अब बिल समझ नहीं आ रहा, वाह।
A - तुम डिटेल तो दे दो, सही गलत हम तैयार कर लेंगे।
B - यही तो समस्या है।
A - क्या?
B - आप आंदोलन स्थल से दूर बैठकर कागज में सही गलत तय करेंगे। 
A - हमको परीक्षा की तैयारी करने नहीं दोगे तुम?
B - नहीं, आप तैयारी करिए, मैं तो बस बता रहा कि आप कैसे तैयारी कर रहे।
A - हाँ तो नोट्स बना देना।
B - मेरे नोट्स से आपको किसान आंदोलन का एक ही पक्ष मिलेगा।
A - और दूसरा पक्ष?
B - मेरी नजर में तो एक ही पक्ष है किसान का पक्ष।
A - अपनी नजर मत लाओ बीच में, हमको नोट्स तैयार करना है।
B - मेरे लिए ये तीन काले कृषि कानून हैं, इनमें सफेद कुछ भी नहीं।
A - पर हमको तो काला सफेद दोनों लेकर चलना है।
B - देखिए, आप अभी से सही को सही और गलत को गलत नहीं कह पा रहे।
A - हमको नहीं कहना बाबा। हमको दोनों साइड लिखना है बस।
B - हाँ वही तो कह रहा, अभी से आपकी ट्रेनिंग चल रही है।
A - वो सब छोड़ो, हमको दोनों पक्ष का बता दो बस।
B - दोनों पक्ष का मैं कैसे बताऊं, जब दूसरा पक्ष है ही नहीं।
A - जिनको दूसरा पक्ष दिखता हो, उनका पता दो हमें।
B - किसी कट्टर किसान विरोधी को पकड़ लीजिए। 
A - बस करो, नेता पत्रकार नहीं बनना, अधिकारी बनने की रेस में हैं हम।
B - अजी हाँ, हम तो भूल ही गये थे।
A - तुम मदद मत करो है न, अब यूट्यूब से देख के नोट्स बना लेंगे।
B - दृष्टि आईएएस वाले बढ़िया चैक एंड बैलेंस किए हैं। उनके वीडियो देख लेना।
A - ठीक है धन्यवाद। एक और डाउट?
B - पूछिए?
A - क्या सच में ये कृषि कानून वापस होंगे?
B - हां जी।
A - और ये आंदोलन कब तक चलेगा?
B - जब तक बिल वापसी नहीं हो जाती, तब तक।

Sunday, 29 August 2021

लाठीबाज आईएएस बनाम भारत के लोग -

हरियाणा कैडर के आईएएस आयुष सिन्हा के खिलाफ जितने भी सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कार्यवाई की माँग की है, उनमें एक भी आईएएस नहीं हैं, सारे के सारे आईपीएस हैं। दोनों लबी के बीच जो तनातनी चलती है, वह भी ऐसे मौकों के बीच खूब देखने को मिलती है। इसमें एक आईएएस के हिम्मत की दाद देना होगी जिन्होंने पद पर रहते हुए इस मामले में अपनी प्रतिक्रिया दी है कि - " सिविल सेवा की परीक्षा पास करने और सिविल होने के बीच कोई संबंध नहीं है। " 
बाकी लोग आईएएस एसोसिएशन से माँग कर रहे कि ऐसे अधिकारियों को वापस बुलाया जाए। अरे भई इस देश के सबसे मजबूत एसोसिएशन से आप यह उम्मीद मत करिए कि वह अपने ही सदस्यों को कमजोर करेगा, उल्टे ऐसे लोगों को एसोसिएशन आगे करता है। क्योंकि जो सबसे बढ़िया लड़ाका होता है वह आईएएस लाॅबी को ही मजबूत कर रहा होता है।
जब भी सरकार को हिंसा करनी होती है और पल्ला झाड़ना होता है वह नवप्रशिक्षित भूखे भेड़ियों को आगे कर देता है। अमूमन शक्ति प्रदर्शन की भूख जिनमें सबसे अधिक होती है, ऐसे भेड़ियों को ही आगे कर दिया जाता है। ऐसे ही एक भेड़िया ये आयुष सिन्हा हैं। इन्होंने प्रोबेशन पीरियड में ही बतौर उपजिलाधिकारी करनाल, हरियाणा में किसानों के ऊपर बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवाकर जिसमें एक‌ किसान की मृत्यु भी हो गई, अपनी वफादारी बखूबी निभाई है। प्रोबेशन पीरियड को हम बचपन के किसी खेल की तरह समझें जिसमें शामिल बच्चों की झुंड में जो एक कोई बहुत छोटा बच्चा होता है और उसका दूध भात कर दिया जाता है क्योंकि कच्ची उम्र व अनुभव की कमी की वजह से वह खेल के नियमों से अनभिज्ञ होता है, लेकिन देखने में यही आता है कि वह छोटा बच्चा अपनी अनभिज्ञता के बावजूद सबसे अधिक आतंक मचाता है। एक प्रोबेशन पीरियड में गया आईएएस कुछ ऐसा ही होता है, ये कितनी भी गलतियाँ करें, इनका सब कुछ दूध भात होता है, कोई कार्यवाई नहीं होती है।
इसमें कोई शक नहीं कि एक आईएएस बतौर एसडीएम भी एक आईपीएस से अधिक हनक रखता है इसलिए तो देश के युवा को आईएएस यानि जिसे पूछिए कलेक्टर ही बनना होता है, रूतबा ही ऐसा है, उपद्रव मूल्य अथाह हैं, इतने हैं कि आपको भी जानने समझने में ही लंबा वक्त लग जाता है। आप अधिकतर आईपीएस को देखिएगा, इन लोगों को इस बात का मलाल रहता ही है कि थोड़ा रैंक बेहतर होता तो आज एक आईएएस की फटकार नहीं सुननी पड़ती। इसलिए बहुत से चयनित आईपीएस दुबारा यूपीएससी की परीक्षा भी देते हैं ताकि रैंक बढ़िया आ जाए तो सबसे ऊंचाई में चले जाएँ जहाँ आपका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता जैसी ताकत होती है। खुद आयुष सिन्हा पहले 100 रैंक लाकर रैवैन्यू सर्विसेस में थे, फिर दुबारा परीक्षा पासकर आईएएस हुए।
विरोध प्रदर्शन पहले भी हुए हैं, लाठियाँ पहले भी चली है, लेकिन इतनी बर्बरता पहले नहीं हुई। इस बार का मामला पहले से भिन्न है। अंतर भी है, पहले आईपीएस को आगे किया जाता था, इस बार एसडीएम को ही आगे कर दिया गया, सोचिए कौन अधिक हनक रखता है। मैं यह नहीं कह रहा कि प्रोबेशन में आया एसडीएम बड़ा है, लेकिन सरकार को भी पता है कि आईपीएस स्तर के अधिकारी के हवाले से ऐसी बर्बरता की गई तो उस पर सीधे सवाल खड़े होंगे, आईपीएस तुरंत कटघरे में आएगा, और आईपीएस घेरे में आया यानि सरकार भी घेरे में, इसलिए जो आसानी से कटघरे में नहीं आ सकता, उसे साधा गया है। आईपीएस को वैसे भी सामंती अधिकार नहीं होते हैं, आईएएस को होते हैं, आप भाषा से ही फर्क कर सकते हैं। इस मामले में आप देखते रहिए, आयुष सिन्हा पर कोई खास कार्यवाही नहीं होगी, हरियाणा वाले मामला टाइट रखें तो बात अलग है, कुछ संभावना दिख भी रही है, क्योंकि लाठीचार्ज से एक किसान की मौत भी हुई है, तो मामला बहुत अधिक तूल पकड़ चुका है, फिलहाल के लिए साहब को ज्यादा से ज्यादा छुट्टी पर भेज देंगे यानि सस्पेंड करेंगे, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हरियाणा का किसान इतने में मानेगा।
#karnal
#farmersprotest

Thursday, 26 August 2021

देवदासी प्रथा -

"देवदासी प्रथा" इतना जैसे ही आप गूगल करेंगे, विकिपीडिया आपको पहली ही लाइन में यही बताएगा कि यह हिन्दू धर्म की प्राचीन प्रथा थी, वर्तमान में बंद हो चुकी है। आगे आप विकिपीडिया के उस लिंक को खोलेंगे, तो मनगढंत बातें ही मिलेंगी। 

जैसे हिन्दू मंदिरों की सेवा के लिए बनाई गई प्रथा थी, वहाँ मंदिर में देवदासियाँ सिर्फ नृत्य संगीत सिखाती थीं, धर्मशास्त्र की शिक्षा देती थी। फिर विदेशी आक्रमणकारी मुगल तुगलक अफगान आदि आए, उन्होंने इन देवदासियों को बुरी नजर से देखा, उनको मंदिरों से उठाकर ले जाते और उनका यौन शोषण करते आदि आदि। 

आगे लिखा गया है हिन्दू समाज ने देवदासी प्रथा को बंद‌ किया, अंग्रेजों के आने से पहले ही यह प्रथा पूरी तरह बंद हो चुकी थी। 

फिर आगे यह भी लिखा है - हालांकि यह प्रथा भारत में पूरी तरह बंद हो चुकी है लेकिन आज भी कुछ लड़कियाँ जिनका शादी का मन नहीं होता वह परमेश्वर को खुद को सौंप देती हैं और परमेश्वर की सेवा करती हैं। 

अंत में लिखा है - कुछ सु-व्यवस्थाएँ समय के साथ और लोगों के पापों के कारण सु-व्यवस्था से कु-व्यवस्था(कुरीति) में बदल जाती है और उन्हीं व्यवस्थाओं में से एक व्यवस्था थी यह देवदासी प्रथा।


मेरे सवाल -


- मुगल क्या अभी भी इस देश में शोषण करने के लिए मौजूद हैं?

- मुगल अब जब नहीं है, लोकतंत्र स्थापित हो चुका है तो आज इनके साथ इस प्रथा के नाम‌ पर यौन शोषण कौन कर रहा है?

- अंग्रेजों के पहले ही जब यह प्रथा बंद हो चुकी है, तो उत्तरी कर्नाटक में जो हजारों की संख्या में देवदासियाँ आज भी नारकीय जीवन जीने को विवश हैं, वे कहाँ से आ गई?

- कहाँ पाई जाती हैं वो लड़कियाँ जो शादी की अनिच्छा से सीधे मंदिरों में जाकर सेवा करने के लिए पहुंच जाती है और खुद को देवदासी बना‌ लेती हैं। और ऐसे बलिदानी स्वभाव की लड़कियाँ सिर्फ एक जाति विशेष तक ही सीमित क्यों हैं?

- देवदासियाँ ईश्वर की आराधना करती थी, आर्थिक रूप से संपन्न होती थी, कला‌ के क्षेत्र में निपुण होती थीं, शास्त्रीय नृत्य संगीत वहीं से होकर आया। इतना गौरवशाली इतिहास रहा, जब सब कुछ इतना ही अच्छा था तो भारत सरकार को 1988 में जाकर इसमें क्यों बैन लगाना पड़ा?

- मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण और कौटिल्य भाईसाब के लिखे अर्थशास्त्र में भी देवदासियों का जिक्र है, कहा गया कि उस समय समाज में बहुत समानता थी तो फिर एक जाति विशेष की स्त्रियाँ तब से लेकर अब तक देवदासी बनने को क्यों विवश हैं? क्या विदेशी आक्रमणकारियों ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को इस काम के लिए चुना था? क्या मुगल तुगलक वर्ण-व्यवस्था लेकर आए थे?

- कहाँ रहते हैं वे परमेश्वर जिनकी सेवा करने के लिए आज भी एक जाति विशेष की लड़कियाँ देवदासी बनने को विवश हैं?

- क्या परमेश्वर मानसिक शारीरिक रूप से इतने अक्षम थे कि उन्हें अपनी सेवा के लिए देवदासी प्रथा जैसी सु-व्यवस्था निर्मित करनी पड़ी। उसमें भी वे सिर्फ अनुसूचित जनजाति की स्त्रियों को ही देवदासी बनाने का प्रिविलेज देकर बाकी जाति की बालिकाओं के साथ इतना बड़ा भेदभाव कैसे कर गये ?


नोट : जिनको देवदासियों का जीवन कैसा होता है यह जानना हो वह चाहे तो एक बार उत्तरी कर्नाटक के कुछ जिलों में घूमने जा सकता है। आपको एक अकेली लड़की के घर से भाग जाने और फिर कभी वापस न लौटने का कारण भी बेहतर समझ आएगा, समझ आएगा कि आज जो कोई घटना होती है, उसके पीछे कितना लंबा इतिहास जुड़ा होता है, सामाजिक विद्रूपताएँ जुड़ी होती हैं। आपको यह भी समझ में आएगा कि भारत में कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहाँ आज भी माता-पिता अपनी बच्चियों को कहीं दूर जाकर इसलिए भी बेच देते हैं ताकि उन बच्चियों को देवदासी ना बनना पड़े। आप छिछले न्यूज पढ़कर देखकर ऐसे माता-पिता को दलाल समझते रहिए।

Wednesday, 25 August 2021

जातिगत जनगणना पर इतना हंगामा क्यों?

2011 की जनगणना में यह तथ्य सरकार के पास है कि आरक्षित और अनारक्षित वर्ग का प्रतिशत कितना है, बस यहीं तक सब सीमित है। अब माँग उठी है कि जब जाति की सच्चाई को हम आए दिन जी रहे हैं तो जातिगत जनगणना हो, आज जातियों में आर्थिक सामाजिक स्थिति कैसी है यह बिना जातिगत जनगणना के बेहतर तरीके से पता करना संभव भी नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि यह सिर्फ आरक्षित वर्ग के लिए है, अनारक्षित वर्ग में भी कोई जाति अगर आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है, तो वह भी सामने आना है। एकदम सीधी सपाट बात है, इसमें कोई समस्या वाली बात ही नहीं है। और अगर किसी को लगता है कि सब ठीक है, समाज में सामाजिक समता आ चुकी है, तो लिटमस टेस्ट ही हो जाना है, इसमें कौन सा किसी के ताऊ के घर से अतिरिक्त रूपये लगने हैं। 

जब जाति को हम आए दिन जीते हैं। हमारे फेसबुक‌ प्रोफाइल में लाइक कमेंट करने वालों से लेकर हमारे पर्व त्यौहार, शादी, दशकर्म आदि में भी जब हमारी जाति विशेष के लोग ही बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं, जब हम जाति को इतना खुलकर जीते हैं तो जाति के खुलकर सामने आने से क्यों ही कोई समस्या होनी चाहिए।

हिन्दू समाज की अपनी भी इसमें बड़ी समस्याएँ हैं। जैसे संख्याबल की बात आने पर मुस्लिमों को तो दस बच्चे पैदा करने का लांछन लगा दिया जाता था। लेकिन क्या यहाँ ऐसा करना संभव है। एक कोर हिन्दू अपने ही धर्म के लोगों की निष्ठा पर कैसे सवाल उठाए। सोचकर देखिए अगर जाति आधारित जनगणना का विरोध करने‌ वाला वर्ग यह कह दे कि आरक्षित वर्ग के लोगों की प्रजनन क्षमता बेहतर है, इसलिए भी जातीय जनगणना नहीं होनी चाहिए। अब जो भक्ति और आध्यात्म का चौतरफा कारोबार चल रहा है, जो हिन्दुत्व का बिगुल बजाया जा रहा है, उसमें ऐसी दरार पड़ जाएगी कि संभालना मुश्किल है, कोर हिन्दुत्व का झंडा बुलंद करने वाले कभी इतना बड़ा खतरा नहीं उठाएंगे। एक तथ्य यह भी कि अनारक्षितों ने अभी तक आरक्षितों को हिन्दू माना ही नहीं है। अब इसमें उस बात पर नहीं जाते हैं कि कालांतर में हिन्दू और मुस्लिमों की संख्या बराबर ही रही, ये बाकी लोगों को संख्याबल बढ़ाने और हिन्दू राष्ट्र वाले कांसेप्ट के लिए जबरन गिरोहबंदी के लिए जोड़ दिया गया‌।

आरक्षित वर्ग को एक तो हिन्दू मानने से इंकार किया जाता रहा है। एक इसमें सबसे मजेदार बात यह कि जहाँ कर्मकांडों की बात आती है, तो उसमें सबसे अधिक आरक्षित वर्ग ही फंसा हुआ है, क्यों फंसा है ये आप देखिए। कांवड़ वाले, जल चढ़ाने वाले, कारसेवा करने वाले, भक्ति की घुट्टी पीने वाले वे तमाम लोग, इन सबका मोह भंग हो गया तो इन मुद्दों को छेड़कर सत्ता कैसे काबिज होगी, यह भी एक बड़ा सवाल है।

जातिगत जनगणना के लिए रास्ता एकदम साफ है। अगर अभी 2021 में नहीं भी होता है तो भी कोई समस्या नहीं। अगली जनगणना यानि 2031 तक इतना इस मुद्दे पर बवाल होगा कि सरकारों के लिए संभालना मुश्किल हो जाएगा। सबसे पहले तो यही सवाल उठेगा कि हिन्दू आखिर कौन हैं, बहुत टूट-फूट होनी है, होनी भी चाहिए।

#castecensus

ब्राउन मुंडे -

उदयपुर में मेरा तीसरा दिन था। जिस हॉस्टल में रूका था, वहाँ एक कर्नाटक का भाई मिला, वो भी मेरी तरह भारत के अलग-अलग कोनों में अकेले घूम रहा था, घूम‌ क्या रहा था, लोकेशन बदल बदल के काम कर रहा था, अधिकतर ये वर्क फ्राॅम डेस्टिनेशन वाले ही मुझे मिले। सप्ताह के पाँच दिन लैपटॉप के सामने और बाकी दो दिन इधर उधर घूमना और इसी में लोकेशन चेंज करने का काम भी करते हैं। मेरा घूमना अलग तरह का था, मैंने जिन्दगी से अपने हिस्से के 135 दि‌न चुराए थे।। खैर...।

शाम ढलने के बाद कर्नाटक के उस दोस्त के साथ हम गणगौर घाट गये। गणगौर घाट में जा ही रहे थे कि रास्ते में वहीं कुछ लड़के घाट पर बैठे थे वे ब्राउन मुण्डे गाना गा रहे थे, मैंने तो ध्यान नहीं दिया था। कर्नाटक वाले दोस्त ने ही कहा - अखिलेश भाई तुमने नोटिस किया कुछ। मैंने कहा - नहीं। उसने फिर बताया कि वे लड़के उसके रंग को देखकर जान बूझकर ये गाना गाकर बुली कर रहे थे, मैं भी सोचने लगा कि ब्राउन मुंडे गाना गाने से किसी के साथ रंग के आधार पर विभेद कैसे हो। फिर दोस्त ने जवाब में कहा- यार मैं बहुत फेस किया हूं, तुम फेस नहीं किए हो इसलिए नहीं समझ पाओगे कि कौन से शब्दों का इस्तेमाल कर बुली किया जाता है। 

वापसी में गणगौर घाट से हम जाने लगे, लड़कों का झुण्ड वहीं था, दोस्त ने कहा कि भाई दूसरे रास्ते से चलते हैं, अगर उस रास्ते गये फिर उन्होंने कुछ कह दिया, मेरा और दिमाग खराब होगा, क्या पता मारपीट झगड़ा भी कर लूं और अभी झगड़ा करने का मन नहीं है, चलो कहीं और सुकून से बैठा जाए। और फिर हम अम्बराई घाट चले गये।

#allindiasolowinterride2020



छुआछूत जो मैंने देखा -

 दो साल पहले की बात है। हम उस महानगर में जहाँ रहते थे, हमारे कमरे में सफाई करने वाला आया करता, एक दिन सफाई करने वाले का झाड़ू मित्र के पाँव में टच हो गया। मित्र ने सफाईकर्मी से कहा कि झाड़ू की एक सींक चाटो और तोड़कर फेंको, सफाईकर्मी ने घबराते हुए ऐसा किया।

आँखों के सामने ये सब होता देखकर मेरा माथा खराब हो गया, मैंने उस वक्त तुरंत नाराजगी जताई और मित्र को डाँटा भी था। मित्र ने कहा कि घर में यही चलता है, इस परंपरा को नहीं मानूंगा तो मम्मी बुरा मान जाएगी। मैं यह सुनकर कुछ देर के लिए शांत हो गया था।

मुझे अच्छे से याद है इस घटना के कुछ दिन पहले ही हम मित्र के साथ Article 15 नाम की फिल्म देखकर आए थे।


नोट 1 : कुछ लोग कहते हैं कि आजकल जमाना बदल रहा है, अभी का युवा जात पात वाली चीजों से ऊपर उठ चुका है, मैं कहता हूं कहाँ मिलते हैं ऐसे युवा हमें भी बताएँ। अबे भेदभाव का सिस्टम डीएनए में घुसा हुआ है, वो बात अलग है हमको खुद कई बार पता नहीं चल पाता है, कोरोना चला जाएगा, ये नहीं जाएगा, जब तक व्यक्ति पूरी कठोरता के साथ अंदर की ईमानदारी न दिखाए।

नोट 2 : मैं उस सफाईकर्मी के चेहरे में भय की रेखाएँ देख सकता था। उसकी उम्र महज 20 वर्ष के आसपास रही होगी, इसी पीढ़ी का है, फिर भी उसे बचपन से सिलेबस समझा दिया जाता है कि तुम नीच पिछड़े हो, तुम्हें फलां चीज नहीं छूनी है, फलां जगह नहीं जाना है, झाड़ू किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति के पैरों में लग जाए, भले उस झाड़ू से दुनिया जहाँ की गंदगी साफ की हो, उस झाड़ू की सींक चाटनी है। शिक्षा की मूलभूत सुविधा भले उसे न मिल पाती हो लेकिन जिंदा रहने के लिए क्या क्या नियम पालन करना है, ये सब वह बड़ी जल्दी सीख जाता है, समाज उसे सीखा देता है।

नोट 3 :  जिस मित्र ने ऐसा किया, वो भी सिलेबस ही फाॅलो कर रहा था, वही सिलेबस जो उसने इतने सालों में घर में ही रहते हुए सीखा है, यह सब जानने सीखने के लिए उसे कहीं बाहर जाना नहीं पड़ा, उसी के परिवार वालों से उसने सीखा। लेकिन व्यक्ति के सामने ये भी एक बड़ी समस्या आ जाती है कि वह अपने ही घर की इस तथाकथित परंपरा का, माता-पिता की उस सोच का, जिसे वे बचपन से ढोते आ रहे हैं, उसका विरोध आखिर कैसे करे। 

नोट 4 : एक चीज मैंने यह भी देखा कि अमुक सफाईकर्मी के साथ जो खुद उसी की सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोग होते, वे अलगाव महसूस किया करते। ज्यादा बात नहीं करते, दूरी बनाकर रखते। जो अपर क्लास था वो तो क्लियर था ही कि सीधे सींक चाटने को कहना है, जो निम्न में आते वे भी उतने ही बीमार थे। खुद को अलग महसूस करते। सफाईकर्मी पता नहीं क्यों मुझसे मिलते ही बड़ा खुश हो जाता, बहुत सहज महसूस करता, ऐसी सहजता वह किसी और के साथ कभी महसूस नहीं करता था। 

नोट 5 : मुझे उस दिन एक बात समझ आई, उच्च मध्य निम्न कैसी भी आपकी सामाजिक पृष्ठभूमि  हो, अमीर मध्यम गरीब कैसी भी आर्थिक पृष्ठभूमि से आप आते हों, अपने आपको प्रोग्रेसिव सोच का मानना और प्रोग्रेसिव हो जाना इन दोनों चीजों में जमीन आसमान का अंतर होता है।

आरक्षण वाला - एक गाली

हमारे एक मित्र हैं, आर्थिक रूप से कमजोर, उच्च वर्ग से आते हैं, लेकिन कभी छोटे बड़े का भेद नहीं करते हैं, बहुत ही व्यवहार कुशल। शहर की एक दुकान में कई वर्षों से एक सहयोगी का काम करते हैं, उसी से जीवन यापन करते हैं, लेकिन दुकान का मालिक जो कि मारवाड़ी है, कभी उनको यह महसूस नहीं कराता है कि वह नौकर के रूप में काम करते हैं। 

हमारे एक और मित्र हैं, वे भी सवर्ण और आर्थिक रूप से कमजोर। एक समय में पिता के पास खूब संपत्ति रही, शराब और जुए में सब बर्बाद। मित्र पहले एक नेता के यहाँ ड्राइवर रहे, बाद में सरकारी ड्राइवर हुए, अधिकारियों के साथ खूब मौज काटते हैं, अधिकारी भी खूब सम्मान करते हैं, एकदम राजा वाली जिंदगी जीते हैं, ठोक के कहते हैं कि पंडिताई का प्रिविलेज है बे। जब भी कभी मिलते हैं, अपने पिता को एक बार जरूर गरियाते हैं।

एक और सवर्ण किसान मित्र हैं, बहुत कम जमीन है, विरासत में ही कम मिली। कभी उसी में सब्जियाँ उगाया करते। आजकल मशरूम का बिजनेस करते हैं, मशरूम के धंधे के बाद थोड़ा पैसे का फ्लो बढ़ा है। लेकिन एक बात है, गाँव का करोड़पति नाॅन-सवर्ण भी उन्हें महाराज पांयलाग जरूर करता है। सम्मान में कोई कमी नहीं।

अब जिस चौथे मित्र की बात बताने जा रहा हूं, वे दलित हैं, बहुत ही भले मानुष, बाकी तीन मित्रों की तरह वे भी गरीब परिवार से रहे। लेकिन खूब मेहनत की, खूब पढ़ाई की और कई सारी सरकारी नौकरियाँ पास की, अगर आरक्षण से अलग भी उनका ग्रेड देखा जाए तो अनारक्षित के बराबर ही हमेशा रहे, टाॅप टेन में जगह बनाते रहे। आरक्षित कोटे से परीक्षा न भी देते तो भी अनारक्षित वर्ग से नौकरी ले लेते। राज्य सिविल सेवा की परीक्षा में तीन बार इंटरव्यू तक गये‌। आजकल शायद क्लास टू या क्लास वन आफिसर हो गये हैं। लेकिन आज भी ये उतना ही जातिगत भेदभाव उतनी ही जलालत झेलते हैं जितना आफिसर होने के पहले झेलते थे, अपने सहकर्मियों और यहाँ तक की अपने अधीन काम कर रहे कर्मचारियों के द्वारा भी भेदभाव झेलते हैं। यह सब प्रत्यक्ष मेरा देखा हुआ है। भले वे प्रशासनिक अधिकारी हैं, चाहते तो टाइट कर देते, लेकिन वही है रामनाथ कोविंद से ज्ञानी जैल सिंह जैसी उम्मीद नहीं रख सकते हैं। मुझे लगता है बस पैटर्न बदल जाता है, मात्रा बदल जाती है। एक फर्क यह है कि अब जब अधिकारी बने हैं तो कुछ सुविधाएँ मिलती है उसमें आराम वाला जीवन यापन कर लेते हैं और कभी कभार अधिकारी के टैग तले मिलने वाला झूठा सम्मान भी कुछ जलालत कम कर देता है। 

इतनी योग्यता के बावजूद "आरक्षण वाला" ये एक वाक्य इन जैसे लोगों के लिए आज भी गाली की तरह क्यों इस्तेमाल किया जाता है? इस पर पाठक स्वयं मंथन करें।

#आरक्षण

#independence

धर्मशाला गुरूद्वारों की तर्ज पर मुफ्त क्यों नहीं हो सकता -

धर्मशालों में मुफ्त रहने की व्यवस्था करने की बात मैंने एक बार छेड़ी थी। फिर समझ आया कि यह उतना भी आसान नहीं है। 

पहले गुरूद्वारे के बारे में बात कर लेते हैं, गुरूद्वारे में रहना खाना मुफ्त होता है, आप मुफ्त में रहिए, लंगर खाइए। स्वेच्छा से लंगर में आप बर्तन धोने या खाना बाँटने की सेवा दे सकते हैं, या फिर आगंतुकों का चप्पल रखने की सेवा भी दे सकते हैं, या फिर गुरूद्वारे में झाडू़ पोछा साफ सफाई वाला काम कर सेवा कर सकते हैं, आप मुफ्त में रहने खाने के बदले कुछ नहीं भी करते हैं तो भी कोई समस्या नहीं। ऐसा करने वाले लोग भरे पड़े हैं। कई बार आपका चप्पल उठाने वाला या आपकी थाली माँजने वाला अरबपति भी हो सकता है। 

अब धर्मशाला के बारे में बात करते हैं, अमूमन धर्मशाला अलग-अलग जाति के लोगों ने जिनमें व्यापारी वर्ग बहुत आगे रहा उन्होंने ही बनाया, जो मंदिरों या तीर्थस्थानों से संबध्द धर्मशाले रहे उन्हें वहीं के पुरोहित संचालित करते रहे। हरिद्वार ऋषिकेश जैसी जगहों में तो लगभग हर जाति का अपना धर्मशाला है। धर्मशालों में ऐसा कुछ भी सिस्टम नहीं होता जिससे लोग एक जगह जुड़ते हों, लंगर जैसी व्यवस्था नहीं होती तो साथ खाने, साथ बर्तन माँजने जैसी व्यवस्था भी संभव नहीं है।

रहने की बात पर अब आते हैं, धर्मशालों में बढ़िया कमरे बने होते हैं, कहीं कहीं होटल के बराबर सुविधा होती है जबकि गुरूद्वारों में अमूमन ऐसी सुविधा नहीं होती है, आप कहीं भी पसर जाइए, बेडिंग का सामान जरूर मिल जाएगा। कमरे और होटल जैसी सुविधा कई बार मिलना मुश्किल होता है। लेकिन मजे की बात देखिए, गुरुद्वारों में चूंकि सेवा का भाव सर्वोपरि होता है तो साफ सफाई खूब होती है जबकि धर्मशालों में सेवा का भाव नदारद रहता है इसलिए आप पाएंगे कि वहाँ ज्यादा गंदगी देखने को मिलती है, जिम्मेदारी का भाव रहता ही नहीं है कि साफ सफाई रखनी चाहिए। शराब और नाॅनवेज को लेकर तो सख्ती रहती है, लेकिन ये सख्ती गूड़ाखू, तंबाखू, गुटके वालों पर कभी लागू नहीं होगी, जगह-जगह दीवार भगवा किए जाते हैं। 

धर्मशाला भी हिन्दुओं के लिए मुफ्त हो सकता है, अभी के लिए सिर्फ उन्हीं धर्मशालों की बात करते हैं जो मंदिरों से संबध्द हैं। हमने देखा कि अधिकांशत: हिन्दू खूब दान करते हैं, चाहे कारण आस्था का हो या कुछ और लेकिन दान के मामले में हिन्दू सिखों से भी एक कदम आगे हैं। इतना बड़ा देश, हिन्दुओं का इतना बड़ा प्रतिशत, मंदिरों में करोड़ों लोग जाते हैं, इतने लोगों का दान, इतना बड़ा सहयोग, आराम से उनके लिए मुफ्त निवास और मुफ्त भोजन की व्यवस्था की जा सकती है। लोग ऐसे में दिल खोलकर दान भी देते हैं, वैसे भी देते ही हैं, सुविधा मिलेगी तो देंगे ही देंगे। वैष्णो देवी ट्रस्ट इस मामले में सही काम कर रहा है, उसमें भी एक मजे की बात ये कि वैष्णो देवी ट्रस्ट में सिख समुदाय का बड़ा योगदान है।

तस्वीर : धर्मशाले के इस कमरे का एक दिन का किराया 600 रूपए था, पंडिज्जी ने मुझ सोलो ट्रेवलर को 400 रूपए में दे दिया। कमरे में टीवी भी था, साफ सफाई भी बढ़िया, खिड़की खोलते ही बाहर गंगा नदी की कल-कल करती जलधारा। इस कमरे में 2 डबल बेड हैं, यानि बहुत ही आराम से 4 लोग रूक सकते हैं, बिल्कुल किसी होटल की तरह एक बड़ा सा बाथरूम भी था।



चप्पल पहनना इतना भी आसान नहीं?

एक मित्र ने कहा कि आजकल हर कोई ठाठ से चप्पल जूता पहनता है, ये सब बीते जमाने की बात हो गई कि किसी के चप्पल जूते पहनने पर आज के समय में कहीं भेदभाव होता हो। मन किया कि मित्र को कूपमंडूक कह दूं फिर सोचा एक वास्तविक घटना से रूबरू करा देता हूं।

साल भर पुरानी बात है‌, एक आदिवासी इलाके में काम के सिलसिले में गया था। जिस होटल में रूका था वहाँ मेरा कमरा पहली मंजिल में था। उस क्षेत्र के मेरे सहयोगी जिनके साथ मुझे काम‌ पर जाना था, वे मुझसे मिलने आए, जब वे मुझसे मिलने आए नंगे पाँव ही चले आए। मैंने कहा - कोई व्रत है क्या? उनका जवाब आया - नहीं। फिर मैंने पूछा - खाली पाँव क्यों? चप्पल, जूते कहाँ हैं? वे मेरे सवाल को टालने लगे। मैं अड़ा रहा। लेकिन वे भी अड़े रहे और आखिर तक उधर से कोई जवाब ही नहीं आया और यह कहकर वे नीचे उतर गये कि आप तैयार होकर आइए, मैं नीचे इंतजार कर रहा हूं। मैं जब नीचे गया तो देखा कि उनके पैरों में चप्पल था। अगले दिन मैंने देखा कि जब वे मुझसे मिलने आते थे तो अपना चप्पल होटल की पहली सीढ़ी में कदम रखने से पहले ही वहीं कोने में रखकर नंगे पाँव ऊपर आते थे। मेरे बार-बार पूछने पर भी, डांटने के बावजूद भी हमेशा उन्होंने इस बात को हँसकर टाल दिया लेकिन आखिर तक जवाब नहीं दिया कि वे ऐसा क्यों करते हैं। जबकि वे दलित समाज के उत्थान के लिए वर्षों से काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता थे, उनकी ऐसी स्थिति देखकर मैं हैरान हो गया।

ये इसी इक्कीसवीं सदी की घटना है, और किसी जंगली इलाके की नहीं बल्कि उस इलाके की घटना है जहाँ से आंध्रप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री चुनकर आए हैं। आज भी उस इलाके में भूखमरी ऐसी है कि जब छोटे बच्चे माँ के सामने भूख को लेकर बिलबिलाते हैं तो माँ अपने बच्चों को गोंद और लाख का सूप पिलाकर शांत करती है। जिन्हें इस सूप के बारे में जानकारी नहीं है उन्हें बताता चलूं कि गोंद या लाख का गरम सूप पी लेने से भूख पूरी तरह मर जाती है।