Wednesday, 25 August 2021

जातिगत जनगणना पर इतना हंगामा क्यों?

2011 की जनगणना में यह तथ्य सरकार के पास है कि आरक्षित और अनारक्षित वर्ग का प्रतिशत कितना है, बस यहीं तक सब सीमित है। अब माँग उठी है कि जब जाति की सच्चाई को हम आए दिन जी रहे हैं तो जातिगत जनगणना हो, आज जातियों में आर्थिक सामाजिक स्थिति कैसी है यह बिना जातिगत जनगणना के बेहतर तरीके से पता करना संभव भी नहीं है। ऐसा तो नहीं है कि यह सिर्फ आरक्षित वर्ग के लिए है, अनारक्षित वर्ग में भी कोई जाति अगर आर्थिक सामाजिक पिछड़ेपन का दंश झेल रहा है, तो वह भी सामने आना है। एकदम सीधी सपाट बात है, इसमें कोई समस्या वाली बात ही नहीं है। और अगर किसी को लगता है कि सब ठीक है, समाज में सामाजिक समता आ चुकी है, तो लिटमस टेस्ट ही हो जाना है, इसमें कौन सा किसी के ताऊ के घर से अतिरिक्त रूपये लगने हैं। 

जब जाति को हम आए दिन जीते हैं। हमारे फेसबुक‌ प्रोफाइल में लाइक कमेंट करने वालों से लेकर हमारे पर्व त्यौहार, शादी, दशकर्म आदि में भी जब हमारी जाति विशेष के लोग ही बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं, जब हम जाति को इतना खुलकर जीते हैं तो जाति के खुलकर सामने आने से क्यों ही कोई समस्या होनी चाहिए।

हिन्दू समाज की अपनी भी इसमें बड़ी समस्याएँ हैं। जैसे संख्याबल की बात आने पर मुस्लिमों को तो दस बच्चे पैदा करने का लांछन लगा दिया जाता था। लेकिन क्या यहाँ ऐसा करना संभव है। एक कोर हिन्दू अपने ही धर्म के लोगों की निष्ठा पर कैसे सवाल उठाए। सोचकर देखिए अगर जाति आधारित जनगणना का विरोध करने‌ वाला वर्ग यह कह दे कि आरक्षित वर्ग के लोगों की प्रजनन क्षमता बेहतर है, इसलिए भी जातीय जनगणना नहीं होनी चाहिए। अब जो भक्ति और आध्यात्म का चौतरफा कारोबार चल रहा है, जो हिन्दुत्व का बिगुल बजाया जा रहा है, उसमें ऐसी दरार पड़ जाएगी कि संभालना मुश्किल है, कोर हिन्दुत्व का झंडा बुलंद करने वाले कभी इतना बड़ा खतरा नहीं उठाएंगे। एक तथ्य यह भी कि अनारक्षितों ने अभी तक आरक्षितों को हिन्दू माना ही नहीं है। अब इसमें उस बात पर नहीं जाते हैं कि कालांतर में हिन्दू और मुस्लिमों की संख्या बराबर ही रही, ये बाकी लोगों को संख्याबल बढ़ाने और हिन्दू राष्ट्र वाले कांसेप्ट के लिए जबरन गिरोहबंदी के लिए जोड़ दिया गया‌।

आरक्षित वर्ग को एक तो हिन्दू मानने से इंकार किया जाता रहा है। एक इसमें सबसे मजेदार बात यह कि जहाँ कर्मकांडों की बात आती है, तो उसमें सबसे अधिक आरक्षित वर्ग ही फंसा हुआ है, क्यों फंसा है ये आप देखिए। कांवड़ वाले, जल चढ़ाने वाले, कारसेवा करने वाले, भक्ति की घुट्टी पीने वाले वे तमाम लोग, इन सबका मोह भंग हो गया तो इन मुद्दों को छेड़कर सत्ता कैसे काबिज होगी, यह भी एक बड़ा सवाल है।

जातिगत जनगणना के लिए रास्ता एकदम साफ है। अगर अभी 2021 में नहीं भी होता है तो भी कोई समस्या नहीं। अगली जनगणना यानि 2031 तक इतना इस मुद्दे पर बवाल होगा कि सरकारों के लिए संभालना मुश्किल हो जाएगा। सबसे पहले तो यही सवाल उठेगा कि हिन्दू आखिर कौन हैं, बहुत टूट-फूट होनी है, होनी भी चाहिए।

#castecensus

ब्राउन मुंडे -

उदयपुर में मेरा तीसरा दिन था। जिस हॉस्टल में रूका था, वहाँ एक कर्नाटक का भाई मिला, वो भी मेरी तरह भारत के अलग-अलग कोनों में अकेले घूम रहा था, घूम‌ क्या रहा था, लोकेशन बदल बदल के काम कर रहा था, अधिकतर ये वर्क फ्राॅम डेस्टिनेशन वाले ही मुझे मिले। सप्ताह के पाँच दिन लैपटॉप के सामने और बाकी दो दिन इधर उधर घूमना और इसी में लोकेशन चेंज करने का काम भी करते हैं। मेरा घूमना अलग तरह का था, मैंने जिन्दगी से अपने हिस्से के 135 दि‌न चुराए थे।। खैर...।

शाम ढलने के बाद कर्नाटक के उस दोस्त के साथ हम गणगौर घाट गये। गणगौर घाट में जा ही रहे थे कि रास्ते में वहीं कुछ लड़के घाट पर बैठे थे वे ब्राउन मुण्डे गाना गा रहे थे, मैंने तो ध्यान नहीं दिया था। कर्नाटक वाले दोस्त ने ही कहा - अखिलेश भाई तुमने नोटिस किया कुछ। मैंने कहा - नहीं। उसने फिर बताया कि वे लड़के उसके रंग को देखकर जान बूझकर ये गाना गाकर बुली कर रहे थे, मैं भी सोचने लगा कि ब्राउन मुंडे गाना गाने से किसी के साथ रंग के आधार पर विभेद कैसे हो। फिर दोस्त ने जवाब में कहा- यार मैं बहुत फेस किया हूं, तुम फेस नहीं किए हो इसलिए नहीं समझ पाओगे कि कौन से शब्दों का इस्तेमाल कर बुली किया जाता है। 

वापसी में गणगौर घाट से हम जाने लगे, लड़कों का झुण्ड वहीं था, दोस्त ने कहा कि भाई दूसरे रास्ते से चलते हैं, अगर उस रास्ते गये फिर उन्होंने कुछ कह दिया, मेरा और दिमाग खराब होगा, क्या पता मारपीट झगड़ा भी कर लूं और अभी झगड़ा करने का मन नहीं है, चलो कहीं और सुकून से बैठा जाए। और फिर हम अम्बराई घाट चले गये।

#allindiasolowinterride2020



छुआछूत जो मैंने देखा -

 दो साल पहले की बात है। हम उस महानगर में जहाँ रहते थे, हमारे कमरे में सफाई करने वाला आया करता, एक दिन सफाई करने वाले का झाड़ू मित्र के पाँव में टच हो गया। मित्र ने सफाईकर्मी से कहा कि झाड़ू की एक सींक चाटो और तोड़कर फेंको, सफाईकर्मी ने घबराते हुए ऐसा किया।

आँखों के सामने ये सब होता देखकर मेरा माथा खराब हो गया, मैंने उस वक्त तुरंत नाराजगी जताई और मित्र को डाँटा भी था। मित्र ने कहा कि घर में यही चलता है, इस परंपरा को नहीं मानूंगा तो मम्मी बुरा मान जाएगी। मैं यह सुनकर कुछ देर के लिए शांत हो गया था।

मुझे अच्छे से याद है इस घटना के कुछ दिन पहले ही हम मित्र के साथ Article 15 नाम की फिल्म देखकर आए थे।


नोट 1 : कुछ लोग कहते हैं कि आजकल जमाना बदल रहा है, अभी का युवा जात पात वाली चीजों से ऊपर उठ चुका है, मैं कहता हूं कहाँ मिलते हैं ऐसे युवा हमें भी बताएँ। अबे भेदभाव का सिस्टम डीएनए में घुसा हुआ है, वो बात अलग है हमको खुद कई बार पता नहीं चल पाता है, कोरोना चला जाएगा, ये नहीं जाएगा, जब तक व्यक्ति पूरी कठोरता के साथ अंदर की ईमानदारी न दिखाए।

नोट 2 : मैं उस सफाईकर्मी के चेहरे में भय की रेखाएँ देख सकता था। उसकी उम्र महज 20 वर्ष के आसपास रही होगी, इसी पीढ़ी का है, फिर भी उसे बचपन से सिलेबस समझा दिया जाता है कि तुम नीच पिछड़े हो, तुम्हें फलां चीज नहीं छूनी है, फलां जगह नहीं जाना है, झाड़ू किसी उच्च वर्ग के व्यक्ति के पैरों में लग जाए, भले उस झाड़ू से दुनिया जहाँ की गंदगी साफ की हो, उस झाड़ू की सींक चाटनी है। शिक्षा की मूलभूत सुविधा भले उसे न मिल पाती हो लेकिन जिंदा रहने के लिए क्या क्या नियम पालन करना है, ये सब वह बड़ी जल्दी सीख जाता है, समाज उसे सीखा देता है।

नोट 3 :  जिस मित्र ने ऐसा किया, वो भी सिलेबस ही फाॅलो कर रहा था, वही सिलेबस जो उसने इतने सालों में घर में ही रहते हुए सीखा है, यह सब जानने सीखने के लिए उसे कहीं बाहर जाना नहीं पड़ा, उसी के परिवार वालों से उसने सीखा। लेकिन व्यक्ति के सामने ये भी एक बड़ी समस्या आ जाती है कि वह अपने ही घर की इस तथाकथित परंपरा का, माता-पिता की उस सोच का, जिसे वे बचपन से ढोते आ रहे हैं, उसका विरोध आखिर कैसे करे। 

नोट 4 : एक चीज मैंने यह भी देखा कि अमुक सफाईकर्मी के साथ जो खुद उसी की सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोग होते, वे अलगाव महसूस किया करते। ज्यादा बात नहीं करते, दूरी बनाकर रखते। जो अपर क्लास था वो तो क्लियर था ही कि सीधे सींक चाटने को कहना है, जो निम्न में आते वे भी उतने ही बीमार थे। खुद को अलग महसूस करते। सफाईकर्मी पता नहीं क्यों मुझसे मिलते ही बड़ा खुश हो जाता, बहुत सहज महसूस करता, ऐसी सहजता वह किसी और के साथ कभी महसूस नहीं करता था। 

नोट 5 : मुझे उस दिन एक बात समझ आई, उच्च मध्य निम्न कैसी भी आपकी सामाजिक पृष्ठभूमि  हो, अमीर मध्यम गरीब कैसी भी आर्थिक पृष्ठभूमि से आप आते हों, अपने आपको प्रोग्रेसिव सोच का मानना और प्रोग्रेसिव हो जाना इन दोनों चीजों में जमीन आसमान का अंतर होता है।

आरक्षण वाला - एक गाली

हमारे एक मित्र हैं, आर्थिक रूप से कमजोर, उच्च वर्ग से आते हैं, लेकिन कभी छोटे बड़े का भेद नहीं करते हैं, बहुत ही व्यवहार कुशल। शहर की एक दुकान में कई वर्षों से एक सहयोगी का काम करते हैं, उसी से जीवन यापन करते हैं, लेकिन दुकान का मालिक जो कि मारवाड़ी है, कभी उनको यह महसूस नहीं कराता है कि वह नौकर के रूप में काम करते हैं। 

हमारे एक और मित्र हैं, वे भी सवर्ण और आर्थिक रूप से कमजोर। एक समय में पिता के पास खूब संपत्ति रही, शराब और जुए में सब बर्बाद। मित्र पहले एक नेता के यहाँ ड्राइवर रहे, बाद में सरकारी ड्राइवर हुए, अधिकारियों के साथ खूब मौज काटते हैं, अधिकारी भी खूब सम्मान करते हैं, एकदम राजा वाली जिंदगी जीते हैं, ठोक के कहते हैं कि पंडिताई का प्रिविलेज है बे। जब भी कभी मिलते हैं, अपने पिता को एक बार जरूर गरियाते हैं।

एक और सवर्ण किसान मित्र हैं, बहुत कम जमीन है, विरासत में ही कम मिली। कभी उसी में सब्जियाँ उगाया करते। आजकल मशरूम का बिजनेस करते हैं, मशरूम के धंधे के बाद थोड़ा पैसे का फ्लो बढ़ा है। लेकिन एक बात है, गाँव का करोड़पति नाॅन-सवर्ण भी उन्हें महाराज पांयलाग जरूर करता है। सम्मान में कोई कमी नहीं।

अब जिस चौथे मित्र की बात बताने जा रहा हूं, वे दलित हैं, बहुत ही भले मानुष, बाकी तीन मित्रों की तरह वे भी गरीब परिवार से रहे। लेकिन खूब मेहनत की, खूब पढ़ाई की और कई सारी सरकारी नौकरियाँ पास की, अगर आरक्षण से अलग भी उनका ग्रेड देखा जाए तो अनारक्षित के बराबर ही हमेशा रहे, टाॅप टेन में जगह बनाते रहे। आरक्षित कोटे से परीक्षा न भी देते तो भी अनारक्षित वर्ग से नौकरी ले लेते। राज्य सिविल सेवा की परीक्षा में तीन बार इंटरव्यू तक गये‌। आजकल शायद क्लास टू या क्लास वन आफिसर हो गये हैं। लेकिन आज भी ये उतना ही जातिगत भेदभाव उतनी ही जलालत झेलते हैं जितना आफिसर होने के पहले झेलते थे, अपने सहकर्मियों और यहाँ तक की अपने अधीन काम कर रहे कर्मचारियों के द्वारा भी भेदभाव झेलते हैं। यह सब प्रत्यक्ष मेरा देखा हुआ है। भले वे प्रशासनिक अधिकारी हैं, चाहते तो टाइट कर देते, लेकिन वही है रामनाथ कोविंद से ज्ञानी जैल सिंह जैसी उम्मीद नहीं रख सकते हैं। मुझे लगता है बस पैटर्न बदल जाता है, मात्रा बदल जाती है। एक फर्क यह है कि अब जब अधिकारी बने हैं तो कुछ सुविधाएँ मिलती है उसमें आराम वाला जीवन यापन कर लेते हैं और कभी कभार अधिकारी के टैग तले मिलने वाला झूठा सम्मान भी कुछ जलालत कम कर देता है। 

इतनी योग्यता के बावजूद "आरक्षण वाला" ये एक वाक्य इन जैसे लोगों के लिए आज भी गाली की तरह क्यों इस्तेमाल किया जाता है? इस पर पाठक स्वयं मंथन करें।

#आरक्षण

#independence

धर्मशाला गुरूद्वारों की तर्ज पर मुफ्त क्यों नहीं हो सकता -

धर्मशालों में मुफ्त रहने की व्यवस्था करने की बात मैंने एक बार छेड़ी थी। फिर समझ आया कि यह उतना भी आसान नहीं है। 

पहले गुरूद्वारे के बारे में बात कर लेते हैं, गुरूद्वारे में रहना खाना मुफ्त होता है, आप मुफ्त में रहिए, लंगर खाइए। स्वेच्छा से लंगर में आप बर्तन धोने या खाना बाँटने की सेवा दे सकते हैं, या फिर आगंतुकों का चप्पल रखने की सेवा भी दे सकते हैं, या फिर गुरूद्वारे में झाडू़ पोछा साफ सफाई वाला काम कर सेवा कर सकते हैं, आप मुफ्त में रहने खाने के बदले कुछ नहीं भी करते हैं तो भी कोई समस्या नहीं। ऐसा करने वाले लोग भरे पड़े हैं। कई बार आपका चप्पल उठाने वाला या आपकी थाली माँजने वाला अरबपति भी हो सकता है। 

अब धर्मशाला के बारे में बात करते हैं, अमूमन धर्मशाला अलग-अलग जाति के लोगों ने जिनमें व्यापारी वर्ग बहुत आगे रहा उन्होंने ही बनाया, जो मंदिरों या तीर्थस्थानों से संबध्द धर्मशाले रहे उन्हें वहीं के पुरोहित संचालित करते रहे। हरिद्वार ऋषिकेश जैसी जगहों में तो लगभग हर जाति का अपना धर्मशाला है। धर्मशालों में ऐसा कुछ भी सिस्टम नहीं होता जिससे लोग एक जगह जुड़ते हों, लंगर जैसी व्यवस्था नहीं होती तो साथ खाने, साथ बर्तन माँजने जैसी व्यवस्था भी संभव नहीं है।

रहने की बात पर अब आते हैं, धर्मशालों में बढ़िया कमरे बने होते हैं, कहीं कहीं होटल के बराबर सुविधा होती है जबकि गुरूद्वारों में अमूमन ऐसी सुविधा नहीं होती है, आप कहीं भी पसर जाइए, बेडिंग का सामान जरूर मिल जाएगा। कमरे और होटल जैसी सुविधा कई बार मिलना मुश्किल होता है। लेकिन मजे की बात देखिए, गुरुद्वारों में चूंकि सेवा का भाव सर्वोपरि होता है तो साफ सफाई खूब होती है जबकि धर्मशालों में सेवा का भाव नदारद रहता है इसलिए आप पाएंगे कि वहाँ ज्यादा गंदगी देखने को मिलती है, जिम्मेदारी का भाव रहता ही नहीं है कि साफ सफाई रखनी चाहिए। शराब और नाॅनवेज को लेकर तो सख्ती रहती है, लेकिन ये सख्ती गूड़ाखू, तंबाखू, गुटके वालों पर कभी लागू नहीं होगी, जगह-जगह दीवार भगवा किए जाते हैं। 

धर्मशाला भी हिन्दुओं के लिए मुफ्त हो सकता है, अभी के लिए सिर्फ उन्हीं धर्मशालों की बात करते हैं जो मंदिरों से संबध्द हैं। हमने देखा कि अधिकांशत: हिन्दू खूब दान करते हैं, चाहे कारण आस्था का हो या कुछ और लेकिन दान के मामले में हिन्दू सिखों से भी एक कदम आगे हैं। इतना बड़ा देश, हिन्दुओं का इतना बड़ा प्रतिशत, मंदिरों में करोड़ों लोग जाते हैं, इतने लोगों का दान, इतना बड़ा सहयोग, आराम से उनके लिए मुफ्त निवास और मुफ्त भोजन की व्यवस्था की जा सकती है। लोग ऐसे में दिल खोलकर दान भी देते हैं, वैसे भी देते ही हैं, सुविधा मिलेगी तो देंगे ही देंगे। वैष्णो देवी ट्रस्ट इस मामले में सही काम कर रहा है, उसमें भी एक मजे की बात ये कि वैष्णो देवी ट्रस्ट में सिख समुदाय का बड़ा योगदान है।

तस्वीर : धर्मशाले के इस कमरे का एक दिन का किराया 600 रूपए था, पंडिज्जी ने मुझ सोलो ट्रेवलर को 400 रूपए में दे दिया। कमरे में टीवी भी था, साफ सफाई भी बढ़िया, खिड़की खोलते ही बाहर गंगा नदी की कल-कल करती जलधारा। इस कमरे में 2 डबल बेड हैं, यानि बहुत ही आराम से 4 लोग रूक सकते हैं, बिल्कुल किसी होटल की तरह एक बड़ा सा बाथरूम भी था।



चप्पल पहनना इतना भी आसान नहीं?

एक मित्र ने कहा कि आजकल हर कोई ठाठ से चप्पल जूता पहनता है, ये सब बीते जमाने की बात हो गई कि किसी के चप्पल जूते पहनने पर आज के समय में कहीं भेदभाव होता हो। मन किया कि मित्र को कूपमंडूक कह दूं फिर सोचा एक वास्तविक घटना से रूबरू करा देता हूं।

साल भर पुरानी बात है‌, एक आदिवासी इलाके में काम के सिलसिले में गया था। जिस होटल में रूका था वहाँ मेरा कमरा पहली मंजिल में था। उस क्षेत्र के मेरे सहयोगी जिनके साथ मुझे काम‌ पर जाना था, वे मुझसे मिलने आए, जब वे मुझसे मिलने आए नंगे पाँव ही चले आए। मैंने कहा - कोई व्रत है क्या? उनका जवाब आया - नहीं। फिर मैंने पूछा - खाली पाँव क्यों? चप्पल, जूते कहाँ हैं? वे मेरे सवाल को टालने लगे। मैं अड़ा रहा। लेकिन वे भी अड़े रहे और आखिर तक उधर से कोई जवाब ही नहीं आया और यह कहकर वे नीचे उतर गये कि आप तैयार होकर आइए, मैं नीचे इंतजार कर रहा हूं। मैं जब नीचे गया तो देखा कि उनके पैरों में चप्पल था। अगले दिन मैंने देखा कि जब वे मुझसे मिलने आते थे तो अपना चप्पल होटल की पहली सीढ़ी में कदम रखने से पहले ही वहीं कोने में रखकर नंगे पाँव ऊपर आते थे। मेरे बार-बार पूछने पर भी, डांटने के बावजूद भी हमेशा उन्होंने इस बात को हँसकर टाल दिया लेकिन आखिर तक जवाब नहीं दिया कि वे ऐसा क्यों करते हैं। जबकि वे दलित समाज के उत्थान के लिए वर्षों से काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता थे, उनकी ऐसी स्थिति देखकर मैं हैरान हो गया।

ये इसी इक्कीसवीं सदी की घटना है, और किसी जंगली इलाके की नहीं बल्कि उस इलाके की घटना है जहाँ से आंध्रप्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री चुनकर आए हैं। आज भी उस इलाके में भूखमरी ऐसी है कि जब छोटे बच्चे माँ के सामने भूख को लेकर बिलबिलाते हैं तो माँ अपने बच्चों को गोंद और लाख का सूप पिलाकर शांत करती है। जिन्हें इस सूप के बारे में जानकारी नहीं है उन्हें बताता चलूं कि गोंद या लाख का गरम सूप पी लेने से भूख पूरी तरह मर जाती है।

कुमाऊं के एक धर्मशाले में

 भारत घूमते हुए एक धर्मशाले में रूकना हुआ। धर्मशाला की जैसी प्रक्रिया होती है कि एक पहचान पत्र और कुछ एडवांस जमा करना होता है, वह मैंने किया। आधार कार्ड से मेरा नाम देखने के बाद रजिस्टर में एंट्री करने वाले ने कहा और अप्रत्यक्ष रूप से जाति पर बात छेड़ने लगा - मैंने जान बूझकर सीधे झूठ कह दिया कि ST हूं, कमरा मिलेगा न? वे कुछ सेकेण्ड के लिए चुप हो गये। बड़ी-बड़ी आँखों से देखने लगे। 


मैंने इस एक चीज को अपनी आदत में शामिल कर लिया है, कि जब भी कहीं कोई जाति पर बात करता है, मैं भारत का जो सबसे पिछड़ा सबसे नीचे जो होता है, कोशिश करता हूं कि वही बताऊं। कई बार इस वजह से बेवजह बहुत परेशानियाँ झेलनी पड़ती है लेकिन यह सब देखने समझने के लिए ही तो मैं ऐसा करता था, इस बार भी वही किया। देखना चाहता था कि कहाँ किस स्तर तक पिछड़ों के साथ हिंसा होती है। इस एक आदत ने मेरे अंदर के पूर्वाग्रह को बहुत हद तक तोड़ा।


मैं उस धर्मशाले में वैसे तो एक दिन रूकने के लिए गया था, लेकिन एक दिन और रूकने का मन हो गया। अमूमन धर्मशालों में आप अधिकतम तीन दिन ही रूक सकते हैं। बहुत बढ़िया धर्मशाला था, सुबह 6 बजे ही आरती हो जाती थी, बहुत ही कर्णप्रिय, घंटियों की आवाज से नींद खुलती थी। खिड़की के सामने ही हिमालय के दर्शन होते थे।


धर्मशाला में जहाँ काउंटर था, जहाँ रसीद काटा जाता था, उसी कमरे में ही वाटर कूलर था, जहाँ गर्म पानी मिल जाता था, क्योंकि ठंड का समय था, और पहाड़ों में ठंड के मौसम में ज्यादा ठंडा पानी पीना बीमार कर देता है। एक तो मुझे प्यास बहुत लगती है, वाटर कूलर के खूब राउंड लगाना हो जाता। उसी कमरे में कई बार रसीद काटने वाले भाई साहब घूर के देखते लेकिन कुछ ना कहते। जब जाता हमेशा घूरते लेकिन चुप रहते। 


जिस दिन मैं चेक आउट कर रहा था, उस दिन जमा पैसे वापस लेने के बाद मैंने कहा -  भाईसाहब आपने जाति पूछी थी न, मैं ST नहीं हूं, वो तो बस ऐसे ही कह गया था। यह सुनकर वे हँसने लग गये, फिर वे जो इतने दिन मुझसे कटे कटे से थे, बहुत रूचि दिखाते हुए चर्चा करने लग गये कि मैं कहाँ-कहाँ घूम रहा हूं। मैंने थोड़ी देर बात की उसके बाद कहा - देर हो रही है, चलता हूं। फिर उन्होंने कहा - दुबारा कभी आओ तो यहीं आना। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि कभी कोई धर्मशाला वाला ऐसे न्यौता नहीं देता है, अमूमन यह काम होटल वाले ही करते हैं। 😊


तस्वीर - शाम को खिड़की से हिमालय का दृश्य



#allindiasolowinterride2020

Lets talk about bikes -

To all the people who came up with doubts before purchasing any bike -

1. बजाज की बाइक्स कूड़ा हैं, रद्दी हैं, कबाड़ हैं, सब। सब की सब। लेकिन खूब बिकती हैं क्योंकि भारतीयों को भारतीय कंपनी का कूड़ा पसंद है। और हाँ पल्सर महारद्दी है, इसलिए देखना सबसे ज्यादा बिकती है।

2. राॅयल इनफील्ड इस कूड़ेपने में दूसरे नंबर पर है, भारतीय कंपनी जो है। एक हिमालयन थोड़ी कम खराब है बाकी सब रद्दी। भंगार के भाव वाला मेटल क्वालिटी। लेकिन इसे भी भारतीय खूब पसंद करते हैं क्योंकि भंगार पसंद है। फूहड़ आवाज के दीवाने हैं।

3. टीवीएस, इसको चीटर कहूंगा तो लोगों को बहुत बुरा लग जाएगा लेकिन हकीकत यही है। इसने सुजुकी कंपनी को तो चीट किया ही, अपने कस्टमर को भी बढ़िया चीट करता है, लेकिन जितनी भी भारतीय कंपनियाँ हैं, उनमें ये अभी के समय में सबसे बेहतर काम कर रही है। ध्यान रहे बेहतर शब्द मैं सारी चीजों को ध्यान में रखते हुए कह रहा हूं जिसमें खरीदी बिक्री, मेटल पार्ट गाड़ी की लाइफ सब कुछ आ जाता है। 

4. हीरो, गाँव घर में रहते हो तो ले लो भाई। सस्ता और टिकाऊ है। इस एक पक्ष को देखें तो बाकी सारी भारतीय मोटरसाइकिल कंपनियों से बेहतर है। आम‌ लोगों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए सामान देता है। होण्डा को इसने वैसा चीट नहीं किया जैसा टीवीएस ने सुजुकी के साथ किया इसलिए यह टीवीएस की तरह आगे नहीं बढ़ पाया। दोनों हीरो और होण्डा भारत में औंधे मुंह गिरे। एक हिसाब से देखें तो ये चीज भी अच्छी है कि टीवीएस की तरह सामंती चरित्र इस कंपनी का कभी नहीं रहा। 

ये भी सोचने वाली बात है कि विदेशी कंपनियाँ भारतीय कंपनियों के साथ करार तो करती हैं, लेकिन सामंती मानसिकता को वे भी कब तक झेलेंगे, इसलिए एक समय के बाद अनुबंध खत्म कर लेते हैं। वो कहते हैं न नकल के लिए भी अकल चाहिए फिर वही होता है। गाड़ी की पूजा करके पूरी दुनिया में दुर्घटना में नंबर वन चलने वाले देश में विज्ञान अभी भी दूर की कौड़ी है।

ऊपर जिन भारतीय कंपनियों का जिक्र है, इनकी गाड़ियाँ भारत में खूब बिकती है, बहुत खराब भी होती है, रिपेयरिंग का खूब खर्चा पड़ता है, अपने कस्टमर को ये लोग खूब मूर्ख बनाते हैं। ध्यान रहे, गाड़ी खरीदने का खर्चा छोटा है, रिपेयरिंग का खर्चा बड़ा है। लेकिन कूड़ा पसंद भारतीयों को क्वालिटी कहाँ चाहिए होती है।‌ हर जगह सस्ते के चक्कर में कबाड़ उठा लाते हैं। 

Note : Thoughts expressed in this post is totally subjective, so if it is affecting someone's sentiment, it's your problem, i am not responsible for your dilemma.

Peace Out.

Thursday, 22 July 2021

Joy quotient and the aftereffect of Covid

 Joy quotient is missing

We can see that nowadays a lot of people are travelling to find joy and a sense of satisfaction, but the fact is that they wont find anything right now no matter how hard they try, how far they reach in search of a beautiful destination. Because, right now, in every nook and corner, there is a Void, a big Void. The void is there to remind you, to obstruct you from peace and solace, it may haunt you like anything, you can feel it while passing through faces around you, the shops, the streets, different cities and so on.

As an ardent traveller from past more then seven years i must say that the aftereffect of covid second wave is still in the air and you can feel it wherever you go.

I have so many travel plans from past one month in my bucket list but I don't know what is wrong with my sensory perception that something inside me is still in hybernation mode and waiting for the arrival of the joy quotient which is still missing from past few months.


Tuesday, 20 July 2021

पुरूष बनाम रसोई

जिन लड़कों ने कई दशकों तक माताओं बहनों को ही किचन में समय खपाते देखा हो, ऐसे लड़के आगे जाकर मास्टरशेफ भी क्यों न हो जाएं, यह एक मानसिकता उसके भीतर रहती ही है कि किचन से जुड़ा काम पुरूषों के हिस्से का काम नहीं है।

जिस तरह जातिवाद नामक जहरीले साँप ने लोहे का काम करने वालों को उसी में ही सीमित कर दिया गया और उनकी जाति लोहार हो गई, तेल बेचने वालों की तेली हो गई, घड़ा बनाने वाले कुम्हार हो गये, मंत्र जाप करने वाले पुरोहित हो गये। ठीक इसी तरह स्त्रियाँ भी रसोईघर का पर्याय हो गई।

एक लड़का घर के सारे काम कर लेगा, लेकिन आज भी पानी का एक गिलास कुर्सी में बैठ के उसे उसकी माता या बहन के हाथों से ही चाहिए, इसमें सही गलत या प्रेम जैसा कुछ नहीं है, बस कडिंशनिंग की बात है, जिसे हमारा मस्तिष्क दशकों से ढोता आ रहा होता है। आप हम सभी इससे पीड़ित हैं, कोई बचा नहीं है।

ऐसे में सैकड़ों हजारों साल से चले आ रहे तरीके से ही भोजन करना, यहाँ तक की मलत्याग करना और सोच विचार का पैटर्न भी वही लेकर चलना। कुल मिलाकर उसी को महान मानते हुए जीना ही हमारी नियति में है।

बाकी पद्मासन में बैठकर ही कुंडलित जागृत कर लेने, मोक्ष प्राप्त करने और काढ़ा से इम्युनिटी अर्जित करने वाले देश में पत्थर के स्वाद के अलावा किसी दूसरे स्वाद का जिक्र करना सिलबट्टे में सिर फोड़ने जैसा है।



Monday, 12 July 2021

लंबी यात्रा में खान-पान की समस्या -

लंबी यात्रा में खाने की समस्या हर किसी के साथ होती है, सालों से एक ही पैटर्न में खाना खाते हुए आपके जीभ की जैसी कंडिशनिंग बनी हुई होती है, उस हिसाब से खाना घूमते वक्त मिलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन मेरे साथ खाने को लेकर कोई कंडिशनिंग नहीं रही, अगर रही भी तो हमेशा तोड़ा, बदल-बदल कर खाता रहा। इस वजह से भी साढ़े चार महीने लगातार भारत घूमते हुए बहुत सहूलियत हुई।

दूसरा एक सकारात्मक पक्ष यह भी रहा कि 135 दिनों में लगभग 100 से अधिक दिन मैंने रोज फल खाया होगा। जिन मित्रों के यहाँ लंबा रूकना हुआ, वहाँ भी बराबर फल का भोग लगाया गया। बाकी कुछ दिन जो रह गये हैं वह इसलिए क्योंकि जो 20-30 दिन सुदूर ठंडे पहाड़ी इलाकों में रहा, तो उस मौसम में फल की कमी महसूस ही नहीं होती है। मोटा-मोटा देखा जाए तो लगभग रोज मौसमी फल मेरे भोजन का हिस्सा रहा। लोग 5 दिन के लिए घर से निकलते हैं तो जितना सामान लेकर चलते हैं, मेरे पास उतना ही सामान था, लेकिन बैग में मौसमी फल के लिए हमेशा जगह बनाकर चलता रहा।

इन सब के बाद भी जब आप लगातार बाहर का खाना खा रहे होते हैं, तो एक समय आता है जब आपको घर के खाने की याद आती है, घर यानि जरूरी नहीं कि आपका ही घर हो। घर किसी का भी हो सकता है, आपके कोई परिचित भी हो सकते हैं। ढाबा और होटल में लंबे समय तक खाने के बाद जीभ घर में बने खाने की माँग करने लगता है। वह इसलिए क्योंकि एक ढाबा या होटल वाला आपको कितना भी अच्छे से खिलाए, वह बेचने के लिए खिलाता है, लोगों को खाना खिलाना उनका व्यवसाय है। लेकिन आप किसी के घर में खाना खाते हैं, वहाँ यह भाव नहीं रहता है, वहाँ सिर्फ खिलाने का भाव रहता है। इसी भाव का बहुत बड़ा अंतर है।
इसके लिए भी मैंने एक तोड़ निकाला, जहाँ कहीं लंबे समय तक रूकना हुआ वहाँ मैंने टिफिन सेंटर और मेस खोजा, कहीं कोई दीदी कोई परिवार घर में बैठाकर खाना खिला रहा है, रेट होटलों से अपेक्षाकृत कम भी होता है और ऐसे जगह के खाने में घर वाले खाने का भाव मिल भी जाता है।



हाथ में माल्टा (किन्नू) है, और यह एक धर्मशाला की तस्वीर है, तस्वीर में जितना हिस्सा दिख रहा है, इतना बड़े हिस्से में सर्वसुविधायुक्त बाथरूम भी था, गर्म पानी की सुविधा भी थी, दो लोगों के रहने लायक पर्याप्त सुविधाएँ थी, दो बढ़िया सोफे और एक टी-टेबल भी था, बेड और कंबल भी एकदम साफ सुथरा, यानि बिल्कुल एक किसी अच्छे होटल की तरह, अमूमन धर्मशालों में ऐसी सुविधा नहीं होती है। और बाहर बैठने के लिए एक बड़ा सा लाॅन भी था। भारत भ्रमण में जितने भी धर्मशालों में रूका, उनमें सबसे बढ़िया धर्मशाला यही था।

#allindiasolowinterride2020

Sunday, 11 July 2021

बात चली हुक्के की -

हरिद्वार में हर की पौड़ी में जो गंगाजी के किनारे हर शाम आरती होती है, यह उस समय की तस्वीर है। तस्वीर कुंभ के बहुत पहले दिसंबर 2020 की है। आरती के समय की यह सामान्य भीड़ है, अमूमन हर की पौड़ी में गंगा आरती के समय इतनी भीड़ रहती ही है। 



अब इस भीड़ से इतर आरती के बाद के समय की बात करते हैं, वही समय जब हरिद्वार के आम‌ लोग घर से निकलकर सुकून के लिए गंगा किनारे शाम को आकर बैठते हैं, जिसमें बच्चे बूढ़े जवान सभी हैं। उनको केन्द्र में रख कर देखा जाए तो जो हुक्के वाली चीज हरियाणा के लोगों द्वारा गंगा के घाट किनारे शुरू की गई, उसी घाट के किनारे जहाँ आम लोग शांति से कुछ समय बिताने आते हैं, कहीं से भी सही नहीं है। हुक्के से गंगा की पवित्रता भंग होने वाली बात बेतुकी है, और इस बात को जो बढ़ा चढ़ाकर जो हरियाणा बनाम हरिद्वार किया जा रहा है, उस पर बात नहीं करते हैं, आम लोग बेवजह परेशान हो रहे हैं वो ज्यादा बड़ा मुद्दा है। आप नशा कर रहे हैं, आप मस्ती कर रहे हैं, आप कुछ भी कर रहे हैं, उसे अगर आप निजी न करते हुए सार्वजनिक करते हैं, और उसमें भी आप स्थानीय लोगों के लिए असुविधा का कारण बनते हैं, तो भाईसाहब आपको पुर्नविचार करने की आवश्यकता है।


जहाँ तक बात हुक्के की है, हरियाणा के लोगों के लिए हुक्का सिर्फ गुड़ और तम्बाकू का मिश्रण भर नहीं है, यह सामाजिकता समरसता का प्रतीक है, हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने की कल्पना बिना हुक्के के नहीं की जा सकती है। यहाँ हुक्का नशा नहीं है, नशे के तौर पर देखा भी नहीं जाता है, आप हरियाणा में कहीं भी जाए, आपको चौपाल, गली, नुक्कड़ हर जगह लोग हुक्के के साथ गोला बनाकर चर्चा करते हुए दिख जाएंगे। लेकिन क्या पूरा देश हरियाणा है, क्या किसी दूसरे राज्य का नदी किनारा हरियाणा है, क्या एक धर्म‌ के नशे में आकंठ डूबे अतिसंवेदनशील आस्थावान देश में हुक्के को लेकर इतनी सहजता संभव है, इस पर भी तो हुक्का पीने वालों को सोचना चाहिए। उसमें भी गंगा के तराई क्षेत्र का ऐसा इलाका जहाँ हजारों लोग आकर परिवार के साथ बैठते हैं, आस्था वाली चीज को अलग करके भी देखा जाए तो ऐसी जगहों में हुक्का लेकर जाने से परहेज किया जाना चाहिए। आप सहज हैं, ठीक है, लेकिन आपके आसपास वाले सहज नहीं है, उनके लिए ये खुलेआम एक नशा ही है, आप उनकी नजर में नशेड़ी हैं। इतना तो अपने आसपास के लोगों का, उस माहौल का सम्मान करना ही चाहिए। 


जो आपके यहाँ सही है, सहजता वाली चीज है। वही चीज किसी दूसरे जगह में, एक दूसरे भूगोल में असहजता का प्रतीक माना जाता है। भारत अजीब किस्म की विविधताओं और जटिलताओं से भरा देश है। जैसे उदाहरण के लिए उत्तराखण्ड की स्थानीय भाषा में दादाजी के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता है, वही शब्द उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में महिलाओं के स्तन के लिए प्रयोग किया जाता है। सोचकर देखिए कोई उत्तराखण्ड का बाशिंदा सार्वजनिक मंच में उड़ीसा आकर अपनी स्थानीय भाषा में चिल्लाकर अपने दादाजी को बुलाए तो कैसी स्थिति निर्मित होगी। जुआ शब्द के लिए जो मेरी बोली में स्थानीय शब्द है, वह कर्नाटक के कुछ इलाकों में पुरुष जननांगों के लिए प्रयोग किया जाता है, मैं तो एक बार महिलाओं के सामने शर्मिंदा होते-होते बचा था। ऐसे वाकये मेरे साथ बहुत बार हुए क्योंकि मेरी तीन अलग-अलग मातृभाषा रही और नई भाषाओं के प्रति गहरा लगाव रहा। 


देश की विविधता की न्यूनतम समझ बनाने के लिए व्यक्ति को चाहिए कि कम से कम वह जिस भाषाई, सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश में पला बढ़ा है, उससे इतर एक बिल्कुल अलग सांस्कृतिक परिवेश में एक बार रहकर देखे। भले व्यक्ति बहुत जगह ना घूमे, लेकिन एक बिल्कुल नये जगह में जहाँ की भाषा, पहनावा, पर्व-त्यौहार, खान-पान और लोक-व्यवहार के तरीके बिल्कुल अलग हैं, ऐसे जगह में वह कुछ समय बिताए, यह अनुभव उसे लेना चाहिए। इससे व्यवहार में लचीलापन आता है, लंबे समय से मन मस्तिष्क जिन धारणाओं को लाद कर चल रहा होता है, वह धारणाएँ टूटती है। बहुत कुछ नया होता है, हम नये होते हैं।


अंत में हुक्के वाले मुद्दे पर बस इतना ही कहना है कि नदी किनारे या जंगल में हुक्का पीना, दारू पीना, चिकन पार्टी करना सबजेक्टिव है, बहुत लोग करते हैं। लेकिन उनके ऐसा करने से आसपास के लोगों को परेशानी न हो, एकांत में स्वांत सुखाय वाली चीज हो तो बेहतर है, इतनी सी बात का तो ध्यान रखा ही जा सकता है। 





Friday, 9 July 2021

बैंगन वाली मैगी -

जम्बूद्वीप का राष्ट्रीय भोज मैगी वैसे तो हर जगह अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है, पाँच छ:ह तरीके मुझे खुद आते हैं, लेकिन मैगी में बैंगन भी डालते हैं ये मैंने पहली बार देखा। धनौल्टी में खाई गई मैगी की यह तस्वीर प्रतीकात्मक है, इसका बैंगन वाली मैगी से कोई संबंध नहीं है।

तो हुआ यूं कि उस दिन मैं दिल्ली से आगरा जा रहा था, सिर्फ ताजमहल देखने नहीं, आगरा देखने जा रहा था, बहुत सारा पेठा भी तो खाना था। आगरा पहुंचने के बाद अगली सुबह नाश्ता करने एक जगह रूका। मेरी हमेशा से आदत रही है कि खान-पान को लेकर बहुत ज्यादा नखरे नहीं रहते हैं, जो जैसा मिला चुपचाप खा लिया। शरीर भी बिना नखरा किए हर तरह का खाना पचा लेता है। तो एक जगह कहीं बैठ गया तो जो‌ ठीकठाक मिल गया, खा लेता हूं, कौन फिर दूसरी जगह जाए, समय बर्बाद करे, ऊर्जा बर्बाद करे। तो ऐसे ही एक रेस्टोरेंट में बैठा था, मैन्यू देखा तो मैंने कहा - आलू पराठा बन जाएगा क्या? अब पता नहीं मेरा यह सवाल उस रेस्टोरेंट के मालिक और उसके वर्कर तक अलग-अलग तरीके से पहुंच गया होगा। मेरे इतना कहने पर वर्कर आया, उसने‌ कहा - हाँ बन जाएगा। मैंने कहा - अच्छा ठीक है रूको बताता हूं। फिर मैंने उसे दो मिनट बाद बुलाकर कहा - एक वैज मैगी बना दो। वह चला गया।

कुछ देर बाद मैं क्या देखता हूं कि मेरे टेबल के सामने आलू पराठा है। 

मैंने कहा - भाई मैगी कही थी, आलू पराठा का बस पूछा था। 

मालिक ने उसे जोर का डांटा और कहने लगा - अबे! ज्यादा सुनता है क्या, चल मैगी बना। 

मैंने मालिक को कहा - कोई समस्या नहीं, पराठे भी छोड़ जाओ वो भी खा लूंगा, अगर यह नहीं निकलेगा तो। 

मालिक ने‌ कहा - नहीं, ठीक है। मैगी बन जाएगी।

कुछ देर बाद मेरी वैज मैगी बनकर आई। उसकी तस्वीर तो मैं नहीं ले पाया था, लेकिन उसका जो हुलिया था, यहाँ लिखकर बता रहा हूं। थाली के शेप की प्लेट में फैला हुआ था। पीला, हरा, लाल, भूरा, बैंगनी क्या रंग नहीं था उस मैगी में। चम्म्च से कुरेदने पर पता चला कि उसमें सिर्फ बैंगन ही नहीं है बल्कि चुकंदर, हरा मटर, प्याज और पत्तागोभी भी है, इन सब्जियों ने मैगी के साथ उबलते हुए गलते हुए क्या कहर ढाया होगा, कैसा रस छोड़ा होगा, अंदाजा लगाइए। स्वाद का तो अब क्या ही कहूं मैं, आज भी याद करता हूं तो ऐसा लगता है जैसे कोई मेरे स्वाद कलिकाओं को नोच रहा है, फिर भी मैंने उन रंग बिरंगे असास्वादिक तत्वों को हटाकर थोड़ी बहुत मैगी खा ली, अब भूख भी लगी थी, पराठा भी वापस जा चुका था, दुबारा बोलने का मन भी नहीं किया, खान-पान को लेकर नखरे ना के बराबर ही रहते हैं लेकिन उस दिन तो परीक्षा ही हो गई थी। बाकी उत्तराखण्ड हिमाचल के पहाड़ों में बनने वाली वैज मैगी की बात ही कुछ और है। और रही बात मैगी के प्रकार की तो आप मुझे लैमन मैगी बनाने का कोनॅस्यर कह सकते हैं। ताजी मूली की टापिंग्स वाली मैगी की रेसेपी की चर्चा कभी और।।


Veg maggi in Dhanoulti, Uttarakhand