Tuesday, 3 December 2024

भ्रष्टाचार - एक तपस्या

भ्रष्टाचार को या एक भ्रष्टाचार करने वाले को हमेशा हिकारत की नजर से देखा जाता है लेकिन वास्तव में देखा जाए तो ये बहुत मेहनत का काम है। अच्छे बड़े स्तर का भ्रष्टाचार करने के लिए कड़ी तपस्या लगती है, बहादुरी लगती है, बड़ा जिगर चाहिए होता है, दिन रात खपना पड़ता है, एक व्यवस्था बनानी पड़ती है, अपना एक इकोसिस्टम बनाना होता है, उसे अनवरत सींचना होता है, इसलिए बहुत कम ही लोग ये काम कर पाते हैं, ये बिल्कुल भी हंसी मजाक की बात नहीं है, बहुत गंभीर होकर ये बात कही जा रही है।

एक सफल भ्रष्टाचारी बेहद स्किल्ड और मेहनती होता है, खूब जोखिम उठाता है, सबसे संपर्क साधकर चलता है, खूब सारे दुनियावी रिश्ते सम्भालता है, लोगों की आर्थिक मदद करने के साथ उनका रुका हुआ काम जल्दी कराने में भी महती भूमिका निभाता है। व्यवस्था की सारी चीज़ों की गहराइयाँ उसे मालूम होती है, उसे जानकारी रखनी पड़ती है क्यूंकि बिना उसके न तो उसका काम बजेगा न ही अपनी सुरक्षा हो पायेगी। हममें से लगभग हर किसी को कभी ना कभी जीवन में कहीं एक सुलझे हुए भ्रष्टाचारी की आवश्यकता पड़ती ही है। क्यूंकि वो हमारी जीवन रूपी दुश्वारियां कम करने में सहयोग करता है।

एक सफल भ्रष्टाचारी चाहे वह किसी भी ओहदे में क्यों ना हो, उसका दायरा बड़ा हो ही जाता है। व्यवस्था का सुचारू रूप से संचालन होता रहे, उसके लिए ऐसे तमाम तपस्वी भ्रष्टाचारियों का होना बेहद जरूरी है।

लोकतंत्र क्या है ?

A - सरकार को कम से कम बच्चों को बख्श देना चाहिए।

B - बच्चों के साथ ऐसा क्या हुआ ?

A - केंद्रीय शासकीय स्कूलों को अपने इवेंट का हिस्सा बना रही।

B - जैसे ?

A - कोई भी शासकीय आयोजन होता है, शासकीय कर्मचारी तो भोगते हैं, स्कूलों को भी उक्त विषय में कार्यक्रम करने कहा जाता है और बच्चों पर खूब दबाव बनाया जाता है।

B - क्या ऐसा पहले नहीं होता था ?

A - मुझे नहीं पता लेकिन बच्चों को इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा।

B - एक बात बताओ, क्या पहले आम लोगों को इतना परेशान कभी देखा है?

A - सरकारी प्राइवेट व्यापारी हर कोई परेशान हैं, मुद्रा से संचालित युग है तो हस्तक्षेप बढ़ना है, यह समझता हूँ, लेकिन बच्चों को इससे कम से कम दूर रखना चाहिए ?

B - कैसे दूर रखेंगे, लगेगी आग तो आँच सब तक पहुंचेगी।

A - ये भी ठीक है।

B - यही लोकतंत्र है।

जीवन के प्रति पागलपन

हर किसी के जीवन में एक दो कोई चीज़ ऐसी होती है, जो वह बड़ी शिद्दत से करना पसंद करता है, यूँ कहें कि जिसे वह जान निकलते तक कर सकता है, उस एक चीज़ के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, उसका वह एक शौक़ जीने के लिए साँस की तरह ज़रूरी हो जाता है। लेकिन ये वाली साँसें तपकर हासिल करनी पड़ती है, इसलिए इसमें भी एक अपवाद यह कि ज़रूरी नहीं कि जीवन को हर कोई इतनी शिद्दत से जिए।

अभी कुछ दिन पहले कॉलेज का जूनियर अभिनव, जो दोस्त अधिक है वो मैराथन दौड़ने राजधानी आया। इसी बीच हमें साथ में कुछ समय बिताने का मौका मिल गया। अभिनव जो हाल फ़िलहाल में सरकारी अफ़सर बना है, उसने जीवन में ये पहली बार 42 किलोमीटर मैराथन 4 घंटे से कम समय में ही पूरा कर लिया, वह भी बिना सोए रात के 3 बजे गाड़ी चलाकर पहुँचा और बिना किसी ख़ास ट्रेनिंग के यह कर दिखाया।

मैराथन पूरा करने के बाद उसने अपने अनुभव बताए और एक बात कही जो अभी तक मेरे कानों में गूंज रही है। उसने कहा - “ मैंने शारीरिक रूप से अपने आप को पूरी तरह तोड़ लिया, इससे अधिक मैंने कभी अपने आपको इतना इस स्तर तक नहीं थकाया, इससे ज़्यादा मैं कर भी नहीं सकता था। मेरे शरीर में थकान तो है, लेकिन मैं मानसिक रुप से एक ग़ज़ब की अनुभूति अपने भीतर महसूस कर रहा हूँ, मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है, ऐसा लगा जैसे मेरे भीतर अभी तक जीवन को लेकर जितना अपराधबोध भरा हुआ था, वह आज ख़त्म हुआ है।”

लोग नौकरी लगने के बाद पार्टी करते हैं, अलग-अलग तरीक़े से ख़ुशी मनाते हैं। लेकिन कुछ विरले ही सिरफिरे लोग होते हैं, जो अपने जुनून को हर पल पागलपन की हद तक जीते हैं, जीवन के प्रति ऐसी सनक जिसके सामने देस काल परिस्थिति कभी बाधा नहीं बनती है। बात सिर्फ़ 42 किलोमीटर दौड़ लगाने की नहीं है, वह तो महज़ एक माध्यम है। बात है उस बहाने ख़ुद के भीतर तक गहरे झाँक लेने की, ख़ुद को उस हद तक तपा ले जाने की जितना कभी किसी और माध्यम में संभव नहीं हो सकता है, बात है पूरे मन शरीर को उस अवस्था में ले जाने की, जहाँ भीतर सब कुछ शांत हो जाता है, आँखें बंद हो जाती है, इंसान अपने अस्तित्व के सबसे क़रीब होता है।

अभिनव ने जो मन हल्का हो जाने की अनुभूति को लेकर बात कही उससे मुझे अपना अकेले मोटरसाइकिल से ठंड में सीमित साधन में भारत घूमना याद आ गया। साथ ही वो दिन भी याद आया जब दिल्ली से रायपुर 1100 किलोमीटर का सफ़र 22 घंटे में ही 150 cc की मोटरसाइकिल में दिसम्बर की कड़कड़ाती ठंड में पूरा किया था। इतनी यातना सही, ख़ुद को इतना तपाया, जितना किसी और माध्यम से नहीं तपा सकता था। इन सबसे ख़ुद की चीज़ों को लेकर मेरी अपनी आस्था दृढ़ हुई।

मैराथन के बाद से हम दोनों थके हुए थे। मैंने कहा कि भाई मुझसे अब एक किलोमीटर भी चला नहीं जाएगा, लेकिन अभी अगर मुझे कोई सुबह से शाम बाइक चलाने को कहे तो वो मैं ख़ुशी-ख़ुशी सब दर्द भूल के कर जाऊँगा। अभिनव ने कहा कि वह भी इस थकान में दौड़ लगा सकता है, आपका माध्यम बाइक है, मेरा माध्यम ये जूते हैं। ठीक इसी तरह शायद किसी का कुछ और भी हो सकता है, कोई पागलपन की हद तक किताबें पढ़ता है, कोई कुछ और करता है। लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी होती है, जिसके पास जीवन के प्रति अपने भीतर के पागलपन को परिभाषित करने के लिए कोई माध्यम नहीं होता है, कोई रास्ता नहीं होता है। वैसे जिनके पास जीने के लिए अपने हिस्से का पागलपन होता है, उन्हें किसी और के बुने रास्ते पर चलने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

संवेदनशील प्रजाति के मनुष्यों का जीवन और उनकी समस्याएँ-

जो बहुत अधिक संवेदनशील लोग होते हैं, उन पर हमेशा नैतिक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दबाव तुरंत असर करता है। उनकी संवेदनशीलता पर ये तीनों दबाव बड़ी आसानी से हावी हो जाते हैं। ऐसे लोगों को अमूमन इनकी उम्र से बड़ा व्यक्ति चाहे वह रिश्ते में इनका कुछ भी लगता हो, वह इन्हें अपना बाप बना लेता है और ख़ुद बेटा बन जाता है, अमुक व्यक्ति पर बाप जैसा मनोवैज्ञानिक दबाव तत्काल बन जाता है।

भारतीय समाज में यह एक ऐसी समस्या है जिसे अगर समय रहते आपने नहीं समझा तो आप शोषित होते रहेंगे और इस चक्कर में अपनी संवेदनशीलता गिरवीं रख जाएँगे।

बहुत अधिक संवेदनशील बच्चों को इस शोषण से बचाने के लिए माता-पिता को चाहिए कि इससे पहले कोई दूसरा आपके बच्चे को बाप के संबोधन का इस्तेमाल कर उसे दिग्भ्रमित करे, उसके कंधों पर बोझ लादे, इससे बेहतर माता-पिता स्वयं अपने बच्चे को माता/पिता बना लें ताकि उसकी नैतिक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक सुरक्षा हो सके।

अपने आसपास ही परिवार में भी आप देखेंगे तो पाएंगे कि हमेशा एक व्यक्ति ऐसा होता है, जिस पर हर कोई हक से दुनिया जहाँ की जिम्मेदारियों को लाद देता है। किसी का स्कूल कॉलेज आदि में एडमिशन कराना हो, किसी को अस्पताल में भर्ती कराना हो, पैसे उधार देना हो, पारिवारिक कलह का निबटारा करना हो, मौसा फूफा मामा या ऐसे तमाम तरह के दूर के रिश्तेदारों के हर तरह के काम की जिम्मेदारी लेना हो या अन्य इस तरह के ढेरों काम हों, सामाजिक दायित्व हों। यह सब कुछ अमूमन एक किसी महा संवेदनशील टाइप के सिरफिरे व्यक्ति के ऊपर थोप दिया जाता है। अधिकांशतः आप पाएंगे कि ऐसे लोगों में पाचन और नींद की समस्या आजीवन बनी रहती है और यह स्वाभाविक भी है क्यूंकि जब आप एक सीमा और अपनी क्षमता से अधिक जिम्मेवारियों का वहन करते हैं, एक समय के बाद आपके साथ यह समस्या होती ही है।

ईश्वरीय अवधारणा के आधार पर देखें तो इस तरह के लोग ईश्वर को अपनी जेब में लेकर घूमते हैं, क्यूंकि पूरी दुनिया इनका इस्तेमाल कर रही होती है, फिर भी ये किसी को कभी महसूस नहीं करा पाते हैं कि उनके साथ ग़लत हुआ। ये भोगता भाव से ईश्वर की लीला मानते हुए सब कुछ सह जाते हैं।

वहीं तार्किकता के धरातल पर देखें तो वे लोग जो अपने ही व्यक्तित्व की सुरक्षा नहीं करते हैं, घेराबंदी नहीं करते हैं, दुनिया ऐसे लोगों का अपने हित साधने के लिए जमकर इस्तेमाल करती है और महानता का चोगा पहनाकर इन्हें हमेशा नज़रबंद करके रखती है ताकि शोषण की प्रक्रिया अनवरत जारी रहे।

इति।

टाटा कंपनी और हमारी फैंटेसी

टाटा कंपनी की जब भी बात आती है, सबके मन के भीतर से एक सम्मान का भाव उद्वेलित हो जाता है। या यूँ कहें की एक भरोसा कायम हो चुका है, मान्यता स्थापित हो चुकी है यह भाव विस्फोटित होता है। इस एक भरोसे को अमलीजामा पहनाने के लिए, इस मान्यता को इस छवि को स्थापित करने के लिए कंपनी ने खूब निवेश किया है। साथ ही सरकार से हमेशा समय पर फंडिंग और रियायत मिली है जिसने टाटा को एक श्रीमान भरोसेमंद कंपनी की तरह लोगों के बीच स्थापित कर दिया। जब भी इस कंपनी का नाम ज़हन में आता है, आम लोग इसे एक प्राइवेट कंपनी के रूप में नहीं देखते है बल्कि लगातार मिल रहे शासकीय समर्थन से टाटा ने विगत दशकों से ख़ुद को जिस एक लोककल्याणकारी सहकारी संस्था वाली छवि से अंगीकृत किया, वही लोगों को पहले दिखता है। भले वह अपने मूल में एक प्राइवेट कंपनी है लेकिन भावना के स्तर पर वह सहकारिता का तिलिस्म लिए दिखाई पड़ता है। टाटा ने इस तिलिस्म को बनाए रखने के लिए निःसंदेह खूब मेहनत की है।

बतौर कंपनी टाटा के काम का विश्लेषण किया जाए तो पहली नज़र में ही यह दिखाई पड़ता है कि यह एक तरह से सरकार और लोगों के बीच एक सेफ्टी वाल्व का काम करता है। तभी कंपनी बहुत घाटे में भी रही तब भी उसे बड़े-बड़े प्रोजेक्ट मिलते रहे। एक ओर कोई प्राइवेट कंपनी होती है जो खूब मेहनत कर आगे बढ़ती है, लगातार नवाचार करते हुए अपने लिए संसाधन जुटाती है, लेकिन टाटा की कार्यशैली बहुत अलग रही, यहाँ आपको वैसी मेहनत वैसा नवाचार कम ही दिखता है जिस पर विस्तार से आगे इस लेख पर बात करते हैं।

1.सबसे पहले टाटा की अपनी आई टी फर्म टीसीएस की बात करते हैं, इंजीनियरिंग बैकग्राउंड का होने के नाते अभी तक जितने भी दोस्तों को देखा है, उनमें से शायद ही कोई होगा जिनकी प्राथमिकता में ये कंपनी रही है, क्यूंकि इनका वर्क कल्चर बाकी कंपनियों की तुलना में बहुत अच्छा नहीं है, तनख़्वाह भी तुलनात्मक रूप से कम ही देते हैं।

2.टाटा की बहुचर्चित कार नैनो के बारे में हम सब जानते हैं। कार के नाम पर अगर “क्या बवासीर बना कर दिया है” हम कह दें तो यह बिल्कुल भी ग़लत नहीं होगा, आज की तारीख़ में शायद ही कोई होगा जो नैनो जैसी कार में बैठना चाहेगा। इस कार का प्रोजेक्ट ही बुरी तरह से फेल रहा लेकिन चूँकि सरकारी समर्थन प्राप्त है, पीआर मजबूत है, इसलिए घाटे के बावजूद छवि जस की तस बनी रही। यह कार तो रोड में देखने तक को नहीं मिलती है।

3.टाटा की ट्रक और बाकी कार के बारे में संयुक्त रूप से बात कर लेते हैं। सबसे पहली बात यह की इनकी गाड़ियों में कम्फर्ट नाम की चीज़ होती ही नहीं है, दूसरा आवाज़ बहुत करता है, कूड़ा है तो शोर करेगा ही। इसके अलावा इनकी बाक़ी कार में भी हैंडलिंग बहुत ही ज़्यादा ख़राब है, लोग मूर्खता की हद पार कर मजबूती के नाम पर ख़रीदते रहते हैं। इसमें एक सबसे मजेदार बात यह की ख़राब हैंडलिंग के कारण इसके एक्सिडेंट के मामले सर्वाधिक हैं। टाटा की गाड़ियों की आफ्टर सर्विस का हाल सबको मालूम है। सेल्स डिपार्टमेंट की झूठी रिपोर्ट्स भी अब तो सामने ही है।

4.अब अस्पताल पर आते हैं। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल सरकारी जमीनों पर बने होते है। अस्पताल को ग्रांट भारत सरकार के Department of Atomic Energy द्वारा मिलती है। इसके बाद भी यहां इलाज का खर्च किसी दूसरे प्राइवेट हॉस्पिटल से कम नहीं है। ऐसा क्यों है कि एम्स पीजीआई जैसे हॉस्पिटल की जगह प्राइवेट हॉस्पिटल्स सरकारी जमीन और अनुदान पर खोले जाए।

5.हम सबके घरों में रसोई में सबसे जरूरी चीज़ होती है - नमक।वहाँ भी टाटा का एकाधिकार है। ऐसा क्यों किया गया कि नमक जैसी मूलभूत जरूरत जैसी चीज को एक कंपनी का एकाधिकार बना दिया गया और जो चीज लगभग फ्री में उपलब्ध होनी चाहिए थी उसके दाम निरंतर बढ़ते रहे। इसके साथ ही किसी और को बढ़ने भी नहीं दिया गया।

6.अडानी अंबानी सरकार से मिलीभगत करके अपने बिजनेस में कमाई करते है, कानूनों को अपने हिसाब से उलटते पलटते है तो सबको बुरा लगता है लेकिन यही काम टाटा कंपनी ने किया तो क्यों नहीं यहां पर कोई कार्यवाही हुई या क्यों नहीं किसी को खटका।

7.कोई व्यक्ति छोटा भी बिजनेस शुरू करना चाहता हो उसे लोन आदि के लिए इतने पापड़ बेलने पड़ जाते है कि वह अपना आइडिया ड्रॉप करना बेहतर समझता है लेकिन दूसरी और यही सब लाखों करोड़ों के फंड जमीनें तरह तरह के रास्ते निकाल कर इन सब को उपलब्ध कराए जाते है। इस बिनाह पर न कि देश में छोटे बिजनेस का कल्चर पनप ही न पाए।

8.फिर भी मेरी समझ से बाहर है कि टाटा कंपनी को पब्लिक में इतनी मान्यता किस बात की वजह से है। जबकि अधिकतर लोग टाटा का कोई सामान जल्दी से खरीदते भी नहीं है। और मान्यता भी ऐसी की जैसे टाटा प्राइवेट कंपनी न हो कर सरकारी कंपनी हो। पारसी लोगो का पहनावा सादगी भरा होता है। लेकिन क्या केवल कोई ढीली शर्ट पेंट पहनता हो केवल इसलिए देश का भला करने वाला हो जाता है?

9.यह बात मान लेते है कि उद्योग वाला विकास हमें पसंद है तो बाकी उद्योग कि जैसे घड़ी बनाना, सरिया, स्टील बनाना तो यह सब काम तो और बहुत लोग भी बहुत बढ़िया से करते आ रहे। वैसे ही जैसे टाटा मोटर्स के सामने और कई कंपनियां है जो टाटा से बहुत बेहतर कार आदि बनाती है और लोगों को भी ज्यादा पसंद है। फिर भी देश का भगवान टाटा ही है, आखिर हमें भगवान पालने का इतना शौक क्यों ?

फिर भी कोई बताना चाहे तो बता सकता है कि उसके मन में टाटा को लेकर क्या मान्यता है और उस मान्यता का क्या कारण है। मान्यता का कोई कारण न भी हो तब भी चलेगा।

समय ही भगवान है

135 दिन लगातार भारत घूमने को जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि वह सिर्फ घूमना मात्र नहीं था, बल्कि जिंदगी से मैंने वो 135 दिन अपने लिए चुराए थे, छीन के लिए थे उतने दिन खुद के साथ बिताने के लिए, अपने मन की चीजें करने के लिए, अपनी स्वतंत्रता को जीने के लिए। यह भी समझ आया कि समय का क्या महत्व होता है। उस दौरान बहुत से लोग मिले जो महीनों से घूम रहे थे लेकिन साथ में कुछ काम भी करते रहते थे, लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था, मैं नौकरी छोड़ के सिर्फ और सिर्फ घूम रहा था, उस एक काम के अलावा मैं कोई भी दूसरा काम नहीं कर रहा था। मुझे अपने जैसा स्वतंत्र तरीके से घूमने वाला एक भी इंसान नहीं मिला, हर कोई कुछ न कुछ अपने साथ लादकर ही घूम रहा था।

एक चीज यह भी समझ आई कि अच्छे से अच्छे दिमागदार और दौलतमंद इंसान के पास भी दुनियावी सुविधाओं और वस्तुओं के नाम पर सब कुछ है लेकिन जीने लायक पर्याप्त समय नहीं है।

उस लंबे सफर ने यही सिखाया कि समय ही भगवान है‌।

गुटखा और लोकतंत्र

लोकतंत्र को चलायमान रखने के लिए बहुत से कामकाजी तत्व होते हैं उनमें गुटखा महत्वपूर्ण अवयवों में से एक है। जिस तरह नदी में पानी के बहाव को रोकने के लिए बांध की आवश्यकता होती है, उसी तरह गुटखा लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक चेक डेम की भांति कार्य करता है। एक ओर जहां पनबिजली का काम हो जाता है, यहां फाइलें निराकृत होती हैं। गुटखा का इस्तेमाल अधिकतर वही व्यक्ति करता है जिसे खामोश रहना होता है, जो यह समझ जाता है कि जुबान खोलने के अपने जोखिम अधिक हैं, वह व्यक्ति गुटखे को अपने व्यक्तित्व में शामिल कर लेता है।

इसके ठीक उलट एक बिरादरी ऐसी भी होती है जो गुटखे से दूर रहती है या यूं कह सकते हैं कि उन्हें इसकी जरुरत नहीं पड़ती है, यह जरुर है कि उनकी वजह से नीचे पायदान का व्यक्ति गुटखा खाता है। अमूमन होता यह है कि तनाव देने वाले को हमेशा जुबान नामक छुरी चलानी होती है, इसलिए वे गुटखा चबा ही नहीं सकते। गुटखा वही चबाता है जिन्हें निरंतर मिल रहे तनाव को सुपारी की तरह चबा कर पचाना होता है।

What is more dangerous then antigen ?

एक बार मेडिकल छात्रों की कोचिंग में एक अध्यापक antigen antibody की कार्यशैली के बारे में पढ़ा रहे थे। उन्होंने antigen को समझाने के लिए तुलना करते हुए कहा कि परित्यक्त, विधवा और एकल महिलाएं antigen से अधिक खतरनाक हो जाती हैं। इस पर कोचिंग में बैठी बहुत सी लड़कियों ने घोर आपत्ति जताई। उन्होंने जवाब में कहा कि आप इसे अन्यथा न लें, वस्तुस्थिति समझने का प्रयास करें। फिर वे कहने लगे कि उनकी इस परिस्थिति के पीछे अन्यान्य कारण निहित हो सकते हैं लेकिन अमूमन इस तरह की अधिकांश महिलाएं चिढ़चिढ़ेपन और अवसाद की भेंट चढ़ जाती हैं और अपने आसपास के लोगों को इसका शिकार बनाती हैं, प्रेमपूर्वक व्यवहार नहीं कर पाती हैं, जीवन के प्रति सहज नहीं होती हैं। इस पर छात्राएं फिर से विरोध करने लगीं। उन्होंने छात्राओं को समझाते हुए कहा कि भले आप इस यथार्थ को मत स्वीकारिए लेकिन हकीकत यही है।

Monday, 26 August 2024

हमें दिलीप मंडल होने से खुद को बचाना होगा -

दिलीप मंडल पेशे से एक मीडियापर्सन रहे हैं। जहां तक जानकारी मिली शायद काॅलेज में पढ़ाया भी है। राष्ट्रीय स्तर पर खासकर हिन्दी पट्टी के सभी बड़े चैनल पोर्टल आदि में तो एक जाना माना चेहरा है ही। लेकिन यह पहचान कैसे मिली। यह पहचान मिली सोशल मीडिया से। यहीं से उन्होंने अपने आपको मजबूती से स्थापित किया। जिन्होंने उनको इतना बड़ा बनाया। उन्होंने भी उनका पत्रकार और प्रोफेसर वाला बैकग्राउंड ही देखकर उन्हें एक चिंतक एक सामाज के पहरुआ के रूप में ऊपर किया। 

दिलीप मंडल विगत एक दशक से एक पेशेवर सोशल मीडिया एक्सपर्ट की भूमिका में सक्रिय रहे हैं। बहुत से अलग-अलग मुद्दों पर अपनी बात रखते रहे हैं, जिस पर सहमति असहमति हो सकती है। लेकिन जिस तरह की सोशल मीडिया की एक फौज दिलीप मंडल लेकर चले, जैसी उनकी फालोइंग रही, वैसा कोई दूसरा उस स्तर तक नहीं रहा। ट्विटर फेसबुक में एक तरह से एक उनके कहने पर लाखों पोस्ट ट्विट के साथ ट्रेंड होते रहे हैं, राष्ट्रीय स्तर पर भूचाल मचाने का काम किया है। ट्रोल आर्मी नहीं थी, आम लोगों की आवाज की तरह एक उनकी अदृश्य फौज थी। एक बार तो सोशल मीडिया के आव्हान से ही भारत बंद जैसा भी कुछ किया था, सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया की अपनी मजबूत फालोइंग के दम पर। संक्षेप में यह कि दिलीप मंडल मुद्दों को अपने हिसाब से जनमानस में भुनाने की ताकत रखते थे। 

कुछ लोगों का इस पर यह कहना है कि सवर्ण नहीं हैं इसलिए उनका चौतरफा विरोध हो रहा, यह भी इसमें देखने लायक है कि कोई ऐसा सवर्ण हुआ ही नहीं जिसने दिलीप मंडल के स्तर को छुआ हो, बतौर मीडियापर्सन अपनी पीछे ऐसी समर्थन करने वालों का संख्याबल विकसित की हो, और इतने कम समय में इतने सारे ज्वलंत मुद्दों को मजबूती से डिस्कोर्स बनाने में सफल हुआ हो। इसलिए भी लोग लपेट रहे हैं। बंदे का अस्तित्व था इसलिए रेल बनाई जा रही है। 

एक बार एक पाॅडकास्ट में दिलीप मंडल कहते हैं - सोशल मीडिया आपको ऐसा अहसास कराता है कि सब तुम ही चला रहे, तुम ही भगवान हो। लगता है वे इस खतरे को भांपते भांपते भी भाप नहीं पाए। इसका उदाहरण अभी उनके हाल के ही कुछ पोस्ट में देखने को मिल जाता है। एक समय था जब दिलीप मंडल ट्रोल्स को भाव तक नहीं देते थे, लोगों ने उनसे ट्रोल को मैनेज करना, नजर अंदाज करना सीखा। दिलीप खुद कहा करते - ट्रोल होने जरूरी है, वे आपके असली शुभचिंतक हैं, उन्हें पालकर रखिए, उन पर गुस्सा मत करिए। वे कहते - अगर आपके पास ट्रोल हों तो मेरे पास भेज दीजिए। 1000 से ज़्यादा फ़ॉलोवर्स वाले और धमकी देने वाले ट्रोल को मैं विशेष सम्मान से रखूँगा। ब्लॉक न किए जाने की लिखित गारंटी। गारंटी कार्ड लेना न भूलें। ट्रोल बहुत ज़रूरी होते हैं। ट्रोल के बिना सोशल मीडिया चल ही नहीं सकता।

लेकिन आज देखिए कैसे चीजें बदल गई। जो दिलीप मंडल लोगों को ट्रोल मैनेजमेंट सीखाया करते। आज वही ट्रोल के हाथों खुद आसान शिकार बन रहे हैं। अजीत भारती और जुबैर जैसे लोगों को फुल टाॅस देकर हर गेंद पर चौके छक्के खा रहे हैं जबकि स्किप कर सकते थे। दिलीप मंडल चाहते तो इतना कुछ होने के बाद भी चुप रहकर नजरअंदाज कर लेते, इससे उनकी थोड़ी बहुत इज्जत बनी रहती। लेकिन ये अपनी ही कही गई बात को अपने ही ऊपर लागू नहीं कर पाए। उल्टे ट्रोल्स को जवाब देते फिर रहे हैं, जिसकी जरुरत ही नहीं थी। इसके साथ ही उन्होंने बहुत सारे पुराने ट्विट पोस्ट डिलीट कर दिए, लेकिन सोशल मीडिया का जमाना है, लोगों ने पहले ही सबूत के तौर पर चीजें इकट्ठी कर ली और उनका यह दांव भी विनाशकाले विपरित बुध्दि की तर्ज पर बहुत भारी पड़ गया। लोगों को आश्चर्य हो रहा है कि दिलीप इतनी बड़ी गलती कैसे कर गया, इस पर यही कहना है कि ऐसे लोग अपने ही छद्म अहंकार में आकंठ इस कदर डूब चुके होते हैं कि इन्हें एक समय के बाद खुद का सही गलत पता नहीं चलता है। 

कुछ लोगों का इस पर यह भी कहना है कि सवर्ण नहीं हैं इसलिए उनका चौतरफा विरोध हो रहा, इसमें यह भी देखने लायक है कि कोई ऐसा सवर्ण हुआ ही नहीं जिसने दिलीप मंडल के स्तर को छुआ हो, बतौर मीडियापर्सन अपनी पीछे ऐसे समर्थन करने वालों का संख्याबल विकसित किया हो, और इतने कम समय में इतने सारे ज्वलंत मुद्दों को मजबूती से डिस्कोर्स बनाने में सफल हुआ हो। इसलिए भी लोग लपेट रहे हैं। बंदे का अस्तित्व था इसलिए रेल बनाई जा रही है। 

अंत में यही कि दिलीप मंडल की भाषा में हमेशा एक बैचेनी, एक दुराग्रह, एक आवेशित आक्रोशित करने वाला, जबरन उन्मादी बनाने वाला भाव अधिक महसूस हुआ चाहे वे जिधर से भी बैटिंग करते रहे। ठहराव नहीं दिखा, सुकून जैसी चीज नहीं दिखी चाहे जितने सुकोमल विषय पर बात कर लें। अधिकतर इस तरह के लोगों के भाषा में यह एक चीज आपको एकसमान मिलती है कि ये हमेशा उकसाने वाली ही भाषा बोलते हैं, इसी एक चीज से इस तरह के तमाम लोगों को फिल्टर कर सकते हैं। वे व्यक्तिगत जीवन में जैसे भी हों लेकिन 99% आबादी जो सोशल मीडिया में उन्हें देखती है उनके लिए दिलीप मंडल का होना एक डंडा लेकर हांकने वाले से ज्यादा कुछ नहीं रहा। विडंबना देखिए कि वही लोग आज खुद डंडा लेकर दौड़ा रहे हैं। और ये तथाकथित वाम प्रगतिशील इस पूरे घटनाक्रम का मजा ले रहे हैं। हिन्दी पट्टी के सोशल मीडिया के इस पूरे एक दशक के इतिहास में यह अपने आप में एकलौती घटना है, जिसमें हर कोई मजबूती से एक सधी हुई भाषा में एक व्यक्ति को सीधे अस्वीकार कर रहा कि जाओ हमें नहीं चाहिए आपका ज्ञान, अपनी दुकान बंद करो। हमें चाहिए कि ऐसी घटनाओं से सीख ली जाए और कभी भी जीवन में अतिवादिता को न चुना जाए, खराब भाषा न बोली जाए। वरना जिस डंडे से आप लोगों को मजे से हांक रहे हैं, एक दिन लोग खुद उसी डंडे से आपको भी हांककर आपका किला ध्वस्त कर सकते हैं।

Saturday, 24 August 2024

खान-पान के तरीके

इंसान सभ्यता के विकास में जब जंगल से समाज की दूरी तय हुई। जब इंसान घर बनाकर रहने लगा, खेती पशुपालन करने लगा। इसी क्रम में भोजन करने के तौर-तरीके विकसित हुए। शाकाहारी और मांसाहारी खाने का वर्गीकरण हुआ। इन दोनों प्रकार के भोजन के तरीकों के प्रभाव को देखा गया। पुराने समय से ही लोगों ने सोने की वजह, खाना बनाने की जगह और निवृत होने की जगह में अच्छी खासी दूरी रखी। गांवों में आज भी घरों में अगर कहीं नाॅनवेज बनाते भी हैं तो घर अंदर के किचन में नहीं बनता है, बाहर बनता है, और इतनी दूरी रहती ही है कि उसकी आंच आबोहवा घर तक, घर के कमरों तक न आए। इन सब का फर्क पड़ता ही है। मैं खुद कभी कभार खा लेता हूं, आजकल तो वैसे बहुत कम‌ हो गया है। लेकिन इस बीच पिछले लगभग दो साल से यह एक प्रयोग करके देखा कि जहां रहते हैं, वहां आमिष भोजन न पकाया जाए। इसका बड़ा फायदा हुआ, सोच विचार के स्तर पर होता ही है। शायद पुराने लोगों ने यह सब करके देखा होगा तभी वे एक दूरी रखते थे। 

अपराध के मायने

अनिल अंबानी जो एक तरह से घोषित फ्राॅड की कैटेगरी में रहा है। जिस पर 8800 करोड़ के हेरफेर के आरोप लगे। हाल फिलहाल में सेबी ने अनिल अंबानी पर सिक्योरिटीज मार्केट से 5 साल का बैन लगाया और 25 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। यानि जितना बड़े स्केल का अपराध उतनी ही कम सजा। सजा भी केवल ऊपरी दिखावे के लिए ताकि बहुसंख्य लोगों के भीतर न्याय को लेकर आस्था बनी रहे। वैसे आजकल ऐसी खबरें देखकर खुद पर हंसी आती है। ऐसा लगता है कि न्याय कानून जैसी चीजें इन जैसे लोगों के लिए बनी ही नहीं है। हम लोग भी कहां उलझे रहते हैं। सरे बाजार में कोई किसी का पर्स या चेन चुरा लेता है, या कुछ पैसे चुराकर कोई भागता है, उसकी सरे आम कुटाई होती है और फिर उसे महीनों जेल में सढ़ाया जाता है। ऐसे व्यक्ति के लिए कानून है, हवालात है। लेकिन हम सब की गाढ़ी कमाई से जाने वाले टैक्स का ही 8800 करोड़ गबन करने वाला सूटबूट पहना अमुक व्यक्ति हमें कभी अपराधी नहीं लगता है। क्योंकि वो सामूहिक लूट मचाता है, उसका लूट अदृश्य है, उसके द्वारा की गई लूट हमें किश्तों में मारती है, पूरी हमारी एक पीढ़ी को सामाजिक आर्थिक रूप से तोड़ देती है, हमारे पारिवारिक कलह का हमारे व्यक्तिगत मानसिक अवसाद का कारण बनती है। और ऐसे बड़े अपराधी द्वारा की जा रही लूट से पैदा हुआ निर्वात और उस निर्वात से जन्म लेती अस्थिरता ही तो ऐसे राह चलते छोटे अपराधियों को जन्म देती है। जिस दिन हम ऐसी बातों को समझ जाएंगे उस दिन हमें यह भी समझ आएगा कि नोटबंदी जीएसटी जैसे कदम भारत के आम नागरिकों के साथ किया जाने वाला सबसे भयावह रेप था जिसकी सुनवाई कभी नहीं होगी।

Friday, 2 August 2024

वायनाड भू-स्खलन और गृहमंत्री के दावे

वायनाड में भारी बारिश और बादल फटने से चौतरफा लैण्डस्लाइड हुआ है। दो तीन गांव पूरी तरह से चपेट में आकर मलबे में तब्दील होकर बह चुके हैं। 300 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। हिमाचल के रामपुर में भी लैण्डस्लाइड की वजह से 50 से अधिक लोग लापता हैं, इसी क्रम में उत्तराखण्ड में 11 से अधिक मौते हो चुकी हैं।

आपदा अनेक प्रकार से आती है। पिछले एक दशक में बादल फटने और बाढ़ की घटनाएं बढ़ी है। जिन राज्यों ने कभी यह सब देखा भी नहीं था, वहां भी आपदा वाली स्थिति निर्मित हुई है। कारण प्राकृतिक असंतुलन कहें या कुछ और, यह सब कुछ हो रहा है।  मैं खुद अलग-अलग तरह की आपदा का साक्षी रहा हूं, इसलिए जमीनी यथार्थ की थोड़ी बहुत समझ है। कुर्ग वायनाड क्षेत्र की बाढ़ देखी है, उत्तर कर्नाटक में आई बाढ़ को भी करीब से देखा है, वहां तो बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में काम करते हुए टायफायड भी हो गया था। उत्तराखण्ड में बादल फटने को सामने से देखा है, नल फटने के कारण दो दिन तक पीने का पानी नसीब नहीं हुआ था, बारिश का पानी बाल्टी में लगाकर गर्म कर पीना पड़ा था। इसके अलावा उड़ीसा में साइक्लोन फनी का भुक्तभोगी रहा हूं, जहां 32 घंटे तक सिर्फ पानी पर जीवित था।

वायनाड की त्रासदी अभी हालिया घटनाओं में सबसे भयानक है। वायनाड की आपदा को लेकर कुछ दिन पहले गृह मंत्री अमित शाह का बयान आया - हमने सप्ताह भर पहले ही अलर्ट की सूचना राज्य सरकार को दे दी थी, अगर वे समय रहते कदम उठाते और लोगों को सुरक्षित जगह में पहले ही रेस्क्यू करते तो स्थिति बेहतर होती। इसके अलावा गृह मंत्री जी ने उड़ीसा और गुजरात के साइक्लोन के समय का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय उन्होंने पहले ही अलर्ट जारी किया था जिस कारण से जान माल का किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ। गृहमंत्री जी की चतुराई देखिए कि उन्होंने कभी पूर्वोत्तर के बाढ़ भूस्खलन या हिमाचल उत्तराखण्ड के भूस्खलन का उदाहरण नहीं दिया क्योंकि हकीकत वे भी जानते हैं। गृह मंत्री जी ने जिन राज्यों का उदाहरण दिया उनकी उस बात से पूरी सहमति है कि उसका यथोचित पालन हुआ। क्योंकि उड़ीसा के साइक्लोन में खुद मैंने यह चीज देखी है। कुछ दिन पहले हमें खुद नोटिस मिल‌ गया था कि जो उड़ीसा के स्थानीय लोग नहीं हैं वे अपने घर चले जाएं।

लेकिन पेंच यहां‌ फंसता है कि क्या आप साइक्लोन की तुलना लैण्डस्लाइड से कर सकते हैं? क्या आप हवा की गति की तुलना अतिवृष्टि से कर सकते हैं। दोनों अपनी प्रकृति में बहुत अलग चीजें हैं। जिनको जानकारी नहीं है उन्हें बताया चलूं कि साइक्लोन जब आता है, बहुत पहले ही अलर्ट कर दिया जाता है, यह भी पता रहता है कि एक सीमित अनुमानित क्षेत्र में तेज हवाएं चलेंगी। साइक्लोन फनी जब आया था, कुल जमा एक घंटे तक तेज हवाएं चली थी, कई बार यह 15 मिनट भी होता है। उस एक घंटे के दौरान 150 से 220 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से हवा चली। उसी में सब तहस नहस हो गया, 70% पेड़ ध्वस्त हो गये। सरकार राहत कार्य में लग गयी थी। राजधानी भुवनेश्वर में ही बिजली बहाल होने में 10 दिन लगे थे। साइक्लोन की पूर्व तैयारी बहुत अलग तरह की होती है, इसमें आप जान माल की सुरक्षा बहुत हद तक कर सकते हैं। आपको बस उस एक दो घंटे तक अपनी सुरक्षा करनी होती है।

लेकिन लैण्डस्लाइड और बाढ़ के साथ मामला बहुत अलग है। बाढ़ का पानी एक बार चढ़ता है, कई-कई दिन तक उसका प्रकोप बना रहता है, चौतरफा नुकसान करता है, द्विगुणित हो जाता है। गंदे पानी से बीमारियों का प्रकोप अलग। बाढ़ को पहले से मिले अलर्ट से भी ट्रैक नहीं किया जा सकता। कितना नुकसान करेगा, कहां तक जाएगा, कुछ नहीं कह सकते। हवा और पानी में इतना अंतर तो होता है, हवा का क्या है, कुछ घंटे बहकर शांत हो जाती है, पानी को तो जमीन में ही रहना है, नुकसान करती जाती है। ये सब एकदम कामनसेंस वाली बात है।

लैण्डस्लाइड का मामला तो और खतरनाक है, एक बार बादल फटा उसके बाद कितना पहाड़ गीला हुआ है, कहां तक की मिट्टी दरकते हुए आगे नुकसान करेगी, इसका ठीक-ठीक अनुमान एक अलर्ट से हो ही नहीं सकता है, इसके लिए संयुक्त रुप से काम करने की जरुरत होती है। एक अलर्ट भर दे देने से और मुंह मोड़ लेने से नहीं होता है।

क्या गृहमंत्री इस बात का जवाब दे पाएंगे कि उन्होंने क्या इस बात का अलर्ट दिया था कि कब भारी वर्षा होगी?
क्या वे यह बता पाएंगे कि कब किस दिन किस घंटे बादल फटेगा?
क्या वे यह बता पाएंगे कि ठीक किस पहाड़ी के ऊपर बादल फटेगा और कितने गांव प्रभावित होंगे?
क्या उन्होंने इसकी सूचना दी कि कौन सी मिट्टी नरम है और कहां से लैण्डस्लाइड होगा?

सच बात तो यह है कि ऐसी घटनाओं का पूर्वानुमान लगा लेने से काम नहीं बजता है। इसके लिए संयुक्त प्रयास करने होते हैं। भारी बारिश का पूर्वानुमान देने वाले मिट्टी के बारे में जानकारी नहीं दे सकते, इसके लिए भू-विज्ञान विभाग बताएगा, अकेले मौसम विभाग क्या करेगा। इसीलिए लैण्डस्लाइड जैसी आपदा के लिए बिना संयुक्त प्रयास के आप सिर्फ अलर्ट पाकर कुछ नहीं कर सकते है। मुझे समझ नहीं आता है गृहमंत्री स्तर का व्यक्ति साइक्लोन के अलर्ट को लैण्डस्लाइड के अलर्ट से कैसे तुलना कर सकता है। ये सरासर असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। जिसने 300 से अधिक लोगों की जान ले ली।

#standwithwayanad



Tuesday, 23 July 2024

पिल वेब सीरीज और हमारा सुप्रीमकोर्ट - आश्चर्यजनक किन्तु सत्य

आजकल वेब सीरीज की बाढ़ आई हुई है। लिखो-फेंको की तर्ज‌ पर आपको अपने पसंद की ढेरों वेब सीरीज मिल जानी है। इसी तर्ज पर एक दोस्त की सलाह पर हाल फिलहाल में फार्मा इंडस्ट्री के काले सच को बेनकाब करती रितेश देशमुख की वेब सीरीज पिल देखी। वेब सीरीज का कथानक अच्छा है, रितेश देशमुख ने अच्छी एक्टिंग की है, विलेन के रूप में पवन मल्होत्रा का अभिनय भी शानदार है। 

मोटा-मोटा वेब सीरीज की कहानी यह है कि बड़े व्यापारियों द्वारा डाइबिटिज की दवा  का फेक ट्राइल लोगों की जान जोखिम‌ में डालकर किया जाता है और सरकारी महकमे में जुगाड़ लगाकर दवा लांच कर दी जाती है। फिर रितेश देशमुख नामक ड्रग अधिकारी फरिश्ता बन कर आता है, फाइलें खंगालता है, व्यवस्था से लड़ता है और अंत में सुप्रीम कोर्ट से केस जीत जाता है और व्यापारी का लाइसेंस रद्द हो जाता है और वह सलाखों के पीछे होता है। 

जाॅली एलएलबी और इस तरह की कहानियों पर बनने वाली बहुत सी फिल्में वेब सीरीज देख चुका हूं। हर फिल्म में अंत में सुप्रीम कोर्ट को महान बना दिया जाता है जो कि समझ से परे है जबकि सब कुछ सामने ही दिख रहा होता है कि आम आदमी का जीवन कैसे कोर्ट कचहरी के चक्कर में नर्क हुआ पड़ा है। पिल वेब सीरीज को ही ले लीजिए। हकीकत में क्या ऐसा कहीं से भी संभव है? उल्टे अगर रितेश देशमुख को उस व्यापारी द्वारा कार से कुचल दिया जाता और सुप्रीमकोर्ट के जज को बिकाऊ घोषित किया जाता तो कहानी और वास्तविक होती। फिर अंत में सुप्रीमकोर्ट और तमाम हाईकोर्ट में लाखों लंबित मामलों और अन्यायपूर्ण फैसलों का बस अनुमानित डेटा प्रस्तुत कर दिया जाता। लेकिन कहानी को इतनी वास्तविकता के साथ अगर बना दिया जाता तो वेब सीरीज पर ही बैन लग जाता।

हमारी फिल्मों में जिस सुप्रीम कोर्ट के हाथों बारंबार न्याय दिलवाया जाता है, वहां न्याय पाना कितना कठिन उबाऊ और तनावभरा काम है, इसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती है। जो कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते हैं उन्हें बेहतर मालूम‌ है, आप कितने भी पैसे वाले हों आपको परेशान होना ही पड़ेगा। पैसे के साथ-साथ आपके पास रसूख नहीं है तो आपके यहां पूरी पीढ़ी बर्बाद हो जाती है। बहुत अलग-अलग तरह के काम करने वालों के चेहरे की भाव-भंगिमा देखी है, पता नहीं क्यों ये वाले मुझे सबसे अधिक शुष्क मालूम हुए। 

इस बात में कोई शक नहीं कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई ईकाई अगर सबसे अधिक भ्रष्ट है तो वह न्यायपालिका है, एक बार कोढ़ का इलाज है, लेकिन कोर्ट का नहीं है‌। यह इंस्टिट्यूट ही अपने आप में एक लाइलाज समस्या है। आदमी अस्पताल हवालात का एक बार तोड़ निकाल लेता है, आर्थिक रूप से अगर सक्षम है तो वहां उसे कुछ राहत मिल भी जाती है लेकिन एक बार कोई कोर्ट के हाथ लगता है तो उसकी ऐसी पिसाई होती है कि आजीवन उसे हिसाब चुकता करना पड़ता है। कहने का अर्थ यह है कि फलां चीज ठीक है या गलत है, जो कि हमें पता होता है, उसी बात को अगर सुप्रीमकोर्ट सिध्द कर दे तो हम उसे महान घोषित क्यों कर देते हैं? हमें इस पर गहराई से सोचने की आवश्यकता है।