Friday, 12 May 2023

बात चली शराब की --

अपने जान-पहचान के स्कूल कालेज के तमाम दोस्तों को मैंने बार-बार अवगत कराया कि छत्तीसगढ़ में शराब का सेवन संभल कर करें। चूंकि मिलावट वाली शराब का खेल चहुंओर व्याप्त है, ऐसे में शरीर को और अधिक नुकसान‌ पहुंचता है, वैसे भी एक बार का जीवन है, थोड़ा तो अपने जीवन की गुणवत्ता के लिए ध्यान देना ही चाहिए। तेल, प्राकृतिक गैस, खनिज के अलावा शराब किसी भी राज्य या देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। मेक्सिको, कोलंबिया जैसे देशों की बात करें तो वहां की अर्थव्यवस्था ही कोकेन, मारिजुआना से चलती है, वहां की जलवायु ऐसी है कि अच्छी गुणवत्ता की पैदावार होती है, जिसकी खपत पूरी दुनिया में होती है। और उसी पैसे से देश की अर्थव्यवस्था चलती है, लोगों को रोजगार मिलता है, गांवों शहरों का विकास होता है, सरकार लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराती है..आदि आदि।

भारत में अलग-अलग राज्यों में शराब बिक्री का अलग-अलग तरह का नेक्सस है। उदाहरण के लिए शराबबंदी वाले राज्य गुजरात को लीजिए, वहाँ सबसे अधिक एक्साइज ड्यूटी राज्य को शराब से मिलती है। जबकि भ्रम इस बात का, कि शराबबंदी है। लीगल तरीके से सरकार हमेशा नये नये कानून बनाकर दुगुने-तिगुने दाम में शराब बेचती है। जैसे अभी नियम यह है कि मैं दूसरे राज्य से हूं और अगर मुझे शराब चाहिए तो मैं यहाँ कार्ड बनाकर खरीद सकता हूं, लेकिन गुजरात का लोकल आदमी नहीं खरीद सकता है, लेकिन मैं कार्ड बनाकर यहाँ के किसी लोकल को दे दूं तो वह लगातार शराब आनलाइन घर तक मँगवा सकता है, लेकिन दाम दुगुने हैं। शराब वहाँ भी वैसे ही बिकती है जैसे बाकी राज्यों में बिकती है। बाकी राज्यों से कहीं अधिक कमाई होती है क्योंकि रेट दुगुने तिगुने हैं। 

शराबबंदी वाले राज्यों में दूसरा चर्चित नाम बिहार का आता है। बिहार में मामला एकदम अलग है। वहाँ गुणवत्ता को लेकर भयानक समस्या है। जो चुनिंदा ब्रांड वाली शराब है, कहीं से आपको जुगाड़ से मिल जाए, उसमें भी इतनी अधिक मिलावट है कि आप दुगुने दाम में लेकर आएंगे फिर भी आप विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि आपको सही चीज मिल रही है। यही सिलसिला स्थानीय शराब बनाने वालों के साथ भी है। मिलावट कर कुछ भी बेच रहे हैं। इसलिए कई बार बिहार से ऐसी घटनाएं सुनने को भी मिलती हैं कि नकली शराब से बहुत लोगों की जान चली गई। बिहार के मेरे कुछ एक करीबी मित्र बताते हैं कि जो लोग कभी कभार महीने साल में पी लेते थे उन्होंने भी अब डर के‌ मारे पीना छोड़ दिया है, क्योंकि इतनी अधिक मिलावट है, कभी किसी दूसरे राज्य जाना होता है तब पी लेते हैं और गुणवत्ता में जमीन आसमान का अंतर महसूस होता है। 

अब छत्तीसगढ़ पर आते हैं, यहाँ शराब को लेकर कुछ अलग ही तरह का नेक्सस है जो पिछली सरकार के समय से चला आ रहा है। यहाँ शराबबंदी जैसा कोई नियम नहीं है लेकिन आपको ढूंढने पर भगवान मिल जाएगा लेकिन यहाँ शराब का ब्रांड नहीं मिलेगा। छत्तीसगढ़ में शराब के ऐसे-ऐसे ब्रांड इजात हुए हैं, जो नाम‌ आपको पूरे ब्रम्हाण्ड में कहीं नहीं मिलेंगे। शराब का जो ब्रांड पूरे देश में मिलता है, जो एक तय मानक के आधार पर तैयार होता है, उसकी खपत छत्तीसगढ़ में 20% के आसपास है, बाकी 80% मार्केट स्थानीय नेक्सस के आधार पर तैयार हुए शराब का है जो अधिकृत रूप से सभी शराब दुकानों में बकायदा पैकिंग के साथ बिकता है। और लंबे समय से वही बिक रहा है तो लोगों के दिमाग में भी यही फिट हो गया है कि फलां ब्रांड बढ़िया है, यानि स्थानीय स्तर पर बने उस ब्रांड ने असली ब्रांड को पीछे छोड़ दिया है। कुछ एक दोस्त शिकायत करते हैं कि क्या नकली शराब है, चढ़ता ही नहीं है। कोई कहता है कि पीने के अगले दिन सुबह सिरदर्द की समस्या रहती है। वैसे बिहार में नकली शराब से बहुधा लोग स्वर्ग सिधार जाते हैं, शुक्र है यहाँ मामला सिरदर्द तक सीमित है। मेरे एक करीबी शराबी मित्र जो पाक्षिक पी लेते थे, उन्होंने तो पिछले एक साल से शराब पीना ही छोड़ दिया है। हाल ही में इसी 80% लोकल ब्रांड को खपाने वाले मामले को लेकर ही माननीय ईडी ने छापा मारा है। अब भई केन्द्र हो या राज्य, व्यवस्था चलाने के लिए पैसा तो सबको चाहिए। अब इस छापेमारी में हकीकत जो भी हो, जितने भी करोड़ का बंदरबांट हो, हम सभी को इस सच को स्वीकार लेना चाहिए कि शराब अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न अंग है। हम अपने आसपास सड़क निर्माण, भवन निर्माण, स्कूल, काॅलेज, उद्योग या अन्य विकास कार्यों को जो देखकर खुश होते हैं उसके लिए भी पैसा इसी शराब से ही आता है। अब हमें इसमें यह देखना होगा कि इस सच को हम कैसे स्वीकारते हैं।

Friday, 14 April 2023

प्रेरणास्त्रोत बनाम इन्फ्लुएंसर्स

पिछले एक दो दशक में जो एक बड़ा बदलाव हमारे सामने है वह हमारे प्रेरणास्त्रोतों को लेकर है। देखने में आता है कि चाहे वह कला, साहित्य, शिक्षा, किसानी, तकनीकी या अन्य कोई भी क्षेत्र हों, चाहे प्रवचन सुनाने वाला कोई बाबा ही क्यों न हो, इन सभी क्षेत्रों में मौद्रिक रूप से जो मजबूत है, वही आज के समय में सबसे बड़ा प्रेरणास्त्रोत है। हर तरह के विषय विशेषज्ञों, इन सबकी तौल का एक ही आधार है और वह है मुद्रा। हम इस हद तक खोखले और गरीब हो चुके हैं। एक चाय बेचने वाले से लेकर खेत में कुछ प्रयोग कर साल भर में लाखों करोड़ों का मुनाफा कमाने वाला ही आज के समय का हीरो है। हाँ, इसमें हमें इस बात से कोई मतलब नहीं कि वह कैसे कमाता है, क्या तरीके अपनाता है, हमें सिर्फ और सिर्फ संख्याबल से मतलब है। कोई बहुत कम समय में येन केन प्रकारेण मौद्रिक ऊंचाई को हासिल कर ले तो हम गर्व से फूले नहीं समाते हैं। फास्ट फूड और वन टच सर्विस प्रोवाइडर की तर्ज में हमें सब कुछ एक झटके‌‌ में जो चाहिए होता है। 

यह प्रेरणास्त्रोतों का नहीं वरन् इन्फ्लुएंसर्स का युग है। तीस सेकेण्ड के वीडियो और चार लाइन वाक्य से ही वैश्विक ज्ञान परोस लेने की जिम्मेदारी का निर्वहन करने में हम सफल हुए हैं। सामान्यीकरण की समस्त ऊंचाईयाँ हमारी यह पीढ़ी छू लेने में अभी तक सफल रही है। मुद्रा के पीछे की इस भागादौड़ी, इस गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने शिक्षा के क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा है। शिक्षकों में भी जो सबसे अधिक मुद्रा संचित करता है, जिसकी बड़ी फैन फालोइंग है, एक मजबूत संख्या बल है, वही पूजनीय है, सम्मानीय है। इसलिए विवश होकर एक शिक्षक को इस सच्चाई को स्वीकारना पड़ता है। अन्यथा जो इस राह पर नहीं चलता है, हम और हमारा समाज उन्हें हाशिए में ढकेल देते हैं। इन्फ्लुएंसर्स युग का यही नियम हर जगह लागू है, सर्वव्यापी है, बाकी सब व्यर्थ है।

Friday, 31 March 2023

पाप का घड़ा

एक सरकारी बाबू रहे। चूंकि व्यवस्था में लंबे समय तक रहे तो सरकारी काम-काज की पैनी समझ रखते थे। पहुंच ऐसी की बड़े-बड़े नेता तक उनके सामने अदब से पेश आते। जिले में जिलाधीशों का आना-जाना लगा रहता लेकिन बाबू की हनक में कोई कमी नहीं हुई। व्यवस्था को इतने करीब से जो जानते थे। अपनी समझ और सूझ-बूझ का उन्होंने जमकर दुरूपयोग किया। भ्रष्टाचार के नये कीर्तिमान गढ़ दिए, भ्रष्टाचार के ऐसे शीर्ष पर पहुंचे मानो उस पद पर रहते हुए पूर्व में किसी ने भ्रष्टाचार किया होगा तो इससे अधिक नहीं। भविष्य में कोई भ्रष्ट आचरण कर सकता है तो इतना ही इससे अधिक नहीं। आज भी कोई भ्रष्टाचार कर रहा होगा तो इतने पर्यंत ही इससे अधिक नहीं। कुल मिलाकर लोगों का भयानक स्तर पर शोषण किया। शायद ही जीवन में कभी तनख्वाह को हाथ लगाने की नौबत आई हो। दफ्तर के दूसरे लोगों को घबराहट हो जाती कि इतने लोगों की आह लेकर वह व्यक्ति कहाँ जाएगा, आखिर नींद कैसे आती होगी। लोग यह भी कहते कि इतने लोगों को कष्ट देने वाला यह सुखी रहता है और सलीके से जीवनपथ पर चलने वालों के लिए पग-पग पर कांटे हैं। जो ऐसा सोचते थे उनको यह नहीं मालूम था कि उस सरकारी बाबू के संचित कर्म पक कर तैयार हो रहे थे। उसका एक बेटा रहा, बेटे को मोटी फीस देकर उसने मैनेजमेंट कोटे से एक महंगे कालेज में भर्ती करवाया। कुछ समय बाद ही बेटा एक ट्रक दुर्घटना में चल बसा। पत्नी के साथ भी पारिवारिक संबंध कुछ बहुत अच्छे नहीं थे क्योंकि आजीवन भ्रष्टाचार, हेर-फेर से मुद्रा संचय करने में ही जीवन खपा दिया। असल मायनों में जीवन क्या होता है इसकी समझ विकसित ही नहीं हो पाई। और अंत में वह बाबू ऐसी बेकार मौत मरा कि शायद एक आम व्यक्ति के लिए उसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। किसी अज्ञात कारणवश आग की लपटों से धूं-धूं कर जलते हुए उसकी जान चली गई। सवाल करने का मन होता है कि आखिर सिर्फ उसके साथ ही ऐसा क्यों हुआ। शायद उसका पाप का घड़ा भर गया था।

Wednesday, 22 March 2023

India Ranked 126 in World Happiness Index report 2023

जो समृध्द है, सुविधाओं से लैस है, वह सवाल उठा रहा है कि ये रिपोर्ट गलत है, देश की छवि खराब करने वाली बात है। कोई कह रहा है कि हम नाखुश नहीं है, असल में हमारा देश एक बड़ा बाजार है, इसलिए पश्चिमी देश अपने उत्पादों को बेचने के लिए जान बूझकर ऐसे आंकड़े पेश करता है ताकि हम अधिक से अधिक खरीददारी करें, ऐसे महानुभावों से पूछने का मन करता है कि 136 करोड़ भारतीय में से कितने लोग ऐसे आंकड़ों को पढ़ते हैं और इससे प्रभावित होते हैं। कोई यह भी कह रहे कि युध्द के मुहाने पर खड़े यूक्रेन, या अन्य ऐसे देश जहाँ गरीबी, युध्दोन्माद, दिवालियापन चरम पर है, वे कैसे हमसे ज्यादा खुश हो सकते हैं। मुझे लगता है कि या तो ये जबरन इतने मासूम बने फिर रहे हैं या इन्हें भारतीय समाज की रत्ती भर समझ नहीं है। मनोरोग अकेला अपने आप में हैप्पीनेस इंडेक्स खराब करने के लिए काफी होता है। वैश्विक स्तर पर बनाए जाने वाले तमाम रिपोर्ट जिनमें किसी देश का चहुंमुखी विकास दिखाई देता है उनमें खासकर भारत के लिए सबसे जरूरी रिपोर्ट मुझे यही लगता है। विकास का क्या है, चलता रहता है, अधोसंरचनाएं थोक के भाव तैयार होती रहती है, जहाँ के बाशिदों ने कभी सड़क रेल फ्लैट माँगा ही नहीं, वहाँ भी जिद करके पहुंच जाता है विकास। विकास की यही खासियत है कि वह बिना इजाजत के कहीं भी पहुंच जाने की क्षमता रखता है और आंकड़े तैयार हो जाते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट के साथ ऐसा नहीं है।

जिन देशों में गरीबी, युध्द, दिवालियापन वाली स्थिति है उन देशों में भी लोग हमसे ज्यादा खुश क्यों हैं इसका कारण जानने के लिए हमें उनके समाज को उनके सामाजिक ढांचे को देखना समझना होगा, जो कि हम कर नहीं सकते। इसलिए हमें चाहिए कि हम‌ अपने ही सामाजिक ढांचे को ईमानदारीपूर्वक देख लें। किताबी बातों से इतर वास्तविक जमीनी हकीकत को देख लें कि एक इंसान के रूप में हम कैसा जीवन जीते हैं, अपने दैनिक जीवन में किस मानसिकता का पोषण करते हैं। यह भी देखें कि सबसे ज्यादा अमीरी और सबसे ज्यादा गरीबी दोनों चीजें हमारे यहाँ क्यों है, आय की असमानता में चोटी और खाई का‌ अंतर आखिर क्यों है। आखिर कैसे, कैसे हमने इस मुकाम को हासिल किया है। हमारे आसपास समाज में इतनी टूट-फूट, इतना प्रतिरोध, इतना बिखराव, इतनी घुटन, इतनी अस्थिरता आखिर क्यों है। सबसे मजेदार जो कोई नहीं समझ पाता है वो यह है कि इस मनोरोग से हर कोई पीड़ित है, जो सुविधाओं से लैस है वह भी उतना ही दु:खी है जितना कि एक दूसरा व्यक्ति जो हाशिए पर है, विपदा के मारे है। एक को मुद्रा, बाजार और गलाकाट प्रतियोगिता ने जकड़ा हुआ है, तो दूसरे को पहले वाले की हरकतों से पैदा हुए निर्वात ने दबोच रखा है। आपने कितनी भी समृध्दि हासिल कर ली, माने लें आपने अपना घर कितना भी अच्छा बना लिया, आपके घर के बाहर नाली साफ करने वाला तो एक पीड़ित शोषित व्यक्ति है, उसके दुःखों का ताप आप तक चाहे अनचाहे पहुंचता ही रहेगा। किसी भौतिक वस्तु की तरह इसे आप रोक नहीं सकते, आप इससे खुद को अलग नहीं कर सकते हैं, जो ऐसा करते हैं, वे और दुःखी होते हैं, उनके भीतर हिंसा, कटुता, वैमनस्यता चरम पर होती है। और यही बड़ी मात्रा में हो भी रहा है तब कहीं जाकर सैकड़ा पार का यह 126 नंबर हमने हासिल किया है। 

मूल बात यही है कि जहाँ एक किसी को अपने सुख के लिए, अपने आराम के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को चोट पहुंचाना पड़ रहा है, वहाँ दु:ख अपने पूरे विस्तार के साथ विभाजित होकर कोनों-कोनों तक पहुंचता रहता है। भोलापन इतना हावी है कि लोगों को इसकी भनक तक नहीं लगती है कि उनके होने भर से, उनकी जीवनशैली से, उनकी गतिविधियों से, मानसिकता से, आचार-व्यवहार से, तौर-तरीकों से कितने लोगों को किस-किस तरह का नुकसान पहुंच रहा होता है। दुःखों का अनवरत विस्तारण करने वाले ये लोग असल में खुद सबसे अधिक दु:खी होते हैं, और समाज में भी इसी का प्रसार करते रहते हैं। 

भोजन, आवास संबंधी सुविधाएं अर्जित करने से, मौद्रिक स्थिरता पा लेने से या सुंदर काया का धनी हो जाने से ही अगर खुशहाली आ जाती तो हर समृध्द व्यक्ति खुश होता, ऐसा क्यों है कि सबसे भयानक विद्रूपताएं उल्टे इन्हीं के जीवन में होती है। इनके जीवन में समस्याओं का उद्गार ज्वालामुखी के लावे की तरह निरंतर होता रहता है, जो निचले स्तर के हर व्यक्ति तक पहुंचता है। बहुत विरले ही होते हैं जो खुद को अप्रभावित रखते हुए बचा पाते हैं। खुशहाली कुछ अर्जित करने‌ से नहीं आती बल्कि सहज होने से आती है। अगर कुछ अर्जित कर लेने से ही इंसान खुश हो लेता तो एक किसी बड़े नेता, सेलिब्रिटी या अधिकारी को कभी दुनिया जहाँ की शादियाँ या संबंधों में लिप्त न होना पड़ता, अपराध न करने पड़ते या अन्य इस तरह का कोई भी व्यभिचार या कुसंग न करना पड़ता। चाहे वह नेता हो, व्यापारी हो, अधिकारी हो, चपरासी हो या कोई आम इंसान अगर आप व्यक्तिगत जीवन में, अपने निजी रिश्ते में पारिवारिक जीवन में खुश नहीं है, कलह आपके जीवन पर हावी है, तो इसका असर आपके आसपास के लोगों तक पहुंचता ही है। किसी भी सरकारी, गैर-सरकारी आफिस में बैठा चपरासी से लेकर जिलाधीश, किसी दुकान के संचालक या बस कंडक्टर या कोई रेहड़ी चलाने वाला आम आदमी, इन सबमें एक चीज समान है कि ये सब मनुष्य हैं और एक मनुष्य होने के नाते सब उसी मात्रा में भोजन करते हैं, निवृत होते हैं, मानवीय रिश्तों को जीते हैं आदि आदि। इन सबके लिए एक ही नियम लागू होता है कि जिस व्यक्ति के जीवन में मानवीय रिश्तों में समस्याएँ चल रही है, वह अपने व्यवहार से दूसरों को बहुत अधिक मानसिक चोट पहुंचा रहा होता है, और यह उसे आजीवन पता नहीं चलता है, क्योंकि वह खुद बीमार है, मानसिक रूप से पीड़ित है। मानसिक विक्षिप्तता से ग्रसित लोग सिर्फ सड़कों पर नहीं घूमते; वे दफ्तरों, दुकानों, चौबारों में भी बैठते हैं, मंच का भी संचालन करते हैं।  

कुछ समय पहले एक बस कंडक्टर मिला, एक मेरी दोस्त ने उस बस कंडक्टर की बहुत तारीफ की थी कि वह बहुत अच्छा व्यवहारिक लड़का है। बाकी कंडक्टर की तरह किसी को अपनी आंखों से असहज नहीं करता है, सबसे अच्छे से बात करता है, नाममात्र भी हिंसा नहीं है। मैंने अपने दोस्त को बस इतना ही कहा कि गरीबी अमीरी से इतर एक अच्छे तनावमुक्त पारिवारिक माहौल के साथ पला बढ़ा होगा, परिवार में बहुत अधिक समस्याएं होंगी भी तो दृष्टा भाव से झेलते हुए आगे बढ़ा होगा, सहनशक्ति और दुनिवायी समझ दोनों साथ-साथ विकसित हुई होगी। और सबसे जरूरी व्यक्तिगत रिश्तों में अगर वह शादीशुदा होगा तो एक पत्नीव्रता होगा। या शादीशुदा नहीं भी है तो अपने मंगेतर या प्रेमिका के साथ भी रिश्ते की इस खूबसूरती को जी रहा होगा। उसके जीवनसाथी में भी यही गुण होंगे, वह भी कुछ ऐसी ही जीवनयात्रा से होकर आई होगी। इन सब की वजह से उस कंडक्टर में किसी तीसरे व्यक्ति के लिए हमलावर होने की प्रवृति विकसित होने की जगह ही नहीं बचती होगी। अंतत: मेरा आंकलन सही निकला। 

हिंसक होने का, व्यभिचारी हो जाने का आधार अगर दुःख या पीड़ा सहना है। तो इसमें बस यही कहना है कि आप कितना भी सह लें, बुध्द गांधी के इतना तो कभी नहीं सह पाएंगे। वे क्यों हिंसक नहीं हुए इस बात को समझने की आवश्यकता है, उन्होंने भी आजीवन तमाम तरह की अपवंचनाएं झेलीं, लेकिन इससे उन्होंने खुद को विकसित किया, समृध्द किया। दुःख को मृत्यु से भी बड़ा बताकर आजीवन उसके समाधान के लिए बुध्द ने जीवन खपा दिया। बुध्द तमाम पीड़ाएं झेलते सहते हुए आजीवन दुःखहर्ता की भूमिका में रहे। सहना कोई मामूली बात नहीं है। किसी ने सही कहा है - बहते झरने की कलकल आवाज रास्ते में रूकावट बन रहे पत्थरों के बिना संभव नहीं है। और जीवन जीने का यही एकमात्र तरीका होता है। 

हमारे यहाँ एक भाई अपने दूसरे भाई का गला काटने के लिए तैयार रहता है। एक फुट जमीन के लिए मारकाट मच जाती है, कुछ रूपयों के लिए मौत के घाट उतार दिया जाता है। क्षणिक सुख के लिए सारी जीवनी ऊर्जा खत्म की जाती है। रिश्तों के नाम पर एक दूसरे को तमाम तरह की मानसिक शारीरिक क्षति पहुंचाई जाती है। मुद्रा को ही जीवन का अंतिम‌ लक्ष्य मानकर तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है। दिन रात प्रपंच, तीन तिकड़म ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। इस विशाल सांस्कृतिक वैभव के कारण ही आज 137 देशों की सूची में हम 126 नंबर पर आए हैं। आइए निर्विकार भाव से हम सब इस सच को स्वीकारें और एक बेहतर इंसान हो जाने की हरसंभव कोशिश करते चलें। क्योंकि जीवन एक ही बार आता है। 

Saturday, 18 March 2023

धारण क्षमता

उनका बचपन बहुत अधिक गरीबी, मुफलिसी में बिता। मिट्टी का घर रहा। खाने-पीने तक की समस्या रहती, ऐसी नौबत भी आ जाती थी। घर के सभी सदस्य दिहाड़ी से ही घर का खर्च चलाते थे। घोर संघर्ष और लगातार मेहनत से पक्के मकान तक का सफर उन्होंने तय किया। घर के मुखिया समान बेटे की एक सधी हुई सरकारी नौकरी भी लग गई। घर के पास नौकरी मिली, वह और सोने पे सुहागा। सुख समृध्दि का आलम यह कि मुखिया बेटे की सूझ-बूझ से धीरे-धीरे तीन मंजिला घर भी तान लिया, कार वगैरह व अन्य तमाम तरह की दुनियावी सुविधाएं। हर कोई उनका उदाहरण देता कि देखो कितने गरीब थे, कठोर संघर्ष से आज कहाँ तक की दूरी तय कर लिए। फिर एक दिन सुनने में आया कि मुखिया बेटे को ड्रीम11 की ऐसी लत लगी कि लाखों लाखों लुटा रहे हैं। जो लोग उनका उदाहरण देते रहे, आज वे कहते फिरते हैं कि भले इतनी संपत्ति है लेकिन ड्रीम11 तो सब चूस ले जा रहा है, जिन्हें एक समय में प्रेरणास्त्रोत माना जाता, आज जनमानस उनसे किसी भी तरह की प्रेरणा न लेने की अपील कर रहा है। जीवन में कुछ हो न हो धारण करने की क्षमता होना बहुत ही जरूरी हुआ। बाकि समय का फेर तो चलता रहता है।

Friday, 10 March 2023

आत्ममुग्ध लोगों के लक्षण..

Narcissist People symptoms -

1. ये लोग कभी भी अपनी बराबरी ( शारीरिक सुंदरता और मानसिक योग्यता के मामले में ) के लोगों को अपना दोस्त नहीं बनाते हैं, अपने से नीचे या अपने से कम सुंदर दिखने वाले को ही अपना करीबी दोस्त बनाते हैं ताकि वह उनके नीचे दबकर रहे और आजीवन एक गुलाम की भांति उनका सम्मान करे। ( जीवन सहचर वाले मामले में भी यही नियम लागू होता है )
2. आत्ममुग्ध लोगों में बहुधा यह गुण देखने को मिलता है कि वे अपने पति/पत्नी का या फिर अपने माता-पिता का हद से अधिक गुणगान करते हैं, जबकि हकीकत में वे उस लायक होते नहीं हैं। ऐसा करके वे अपने आप को मजबूती से पेश करने की कोशिश कर रहे होते हैं, अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह सबसे दोयम/छिछला तरीका होता है। 
3. आत्ममुग्ध लोगों को हमेशा अपनी तारीफ करने वाला कोई चाहिए होता है, ये हमेशा दूसरों की अटेंशन पाने की चाह रखते हैं और इसके लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।
4. इनमें अपनी मूर्खताओं, जड़ताओं को लेकर धेला भर भी स्वीकार्यता नहीं होती है, उल्टे उसे छिपाने की कोशिश करते फिरते हैं।
5. इन्हें इस बात का भयानक गुरूर होता है कि इनकी हर चीज सर्वोत्तम है, श्रेष्ठ है। 
6. आत्ममुग्ध स्त्री एवं पुरूष दोनों में यह एक गुण पाया जाता है कि विपरित लिंग आकर्षण के मामले में ये बताते फिरते हैं कि दर्जनों लोग उनके आगे पीछे घूमते हैं। असल में यही इनके भीतर की असुरक्षा को दर्शाता है।
7. इनके हर दूसरे वाक्य में आपको बेवजह एक अजीब किस्म का रहस्य मिलेगा। आपको एक पल के लिए महसूस होगा कि सामने वाला कितना खुलकर स्पष्ट होकर मन से दिल से अपनी बात कह रहा, अगले ही क्षण आपको ऐसा महसूस करा देंगे कि लगेगा कि ये आपको जानते ही नहीं।
8. आत्ममुग्ध लोगों में एक यह गुण कूट-कूटकर भरा होता है कि इन्हें अपने आगे-पीछे मूर्ख लोगों की फौज लेकर चलना पसंद होता है, क्योंकि ये खुद भी उसी टोले के होते हैं, तभी टोले का सरदार बनने का स्वांग रचते हैं।
9. आत्ममुग्ध महिला हो या पुरूष इनके बहुत कम दोस्त यार होते हैं, दोस्त यार के नाम पर अमूमन पीठ खुजाने वालों का एक झुण्ड होता है जो कि अस्थायी होता है, परिवर्तित होता रहता है।
10. व्यवहार में ये पल-पल बदलते मौसम की तरह होते हैं, कभी बरस जाएंगे तो कभी ठिठुर जाएंगे तो कभी धूप की तरह खिलने लगेंगे। बस सामने वाला कभी इस बात की थाह न पाए, इसकी पूरी व्यवस्था करते हुए चलते हैं।
11. आजीवन लोगों के दिमाग से खेलते हैं, भ्रम पैदा करते रहते हैं, असल में उन्हें इस काम में अजीब किस्म का आनंद मिलता है।‌
12. आत्ममुग्ध व्यक्ति को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि दुनिया में क्या बेहतर चीजें चल रही है, उन्हें बस अपनी मूर्खताओं का महिमामण्डन होता दिखना चाहिए। 
13. आत्ममुग्ध व्यक्ति आपको एक गिलास पानी भी पिला दिया तो आने वाले एक साल तक उसे गिनाता फिरेगा कि मैं देखो मैं इतना महान हूं तुम्हें पानी पिलाया था। आप इस अहसान के बोझ तले दबते जाते हैं। एक वाक्य में कहूं तो ये जताते बहुत हैं।
14. आत्ममुग्ध व्यक्ति अपेक्षाकृत शारीरिक सुंदरता का धनी होता है, इतना होता ही है जितने में टोली का सरदार बन सके। 
15. इनके लिए रिश्ते सेंसेक्स के आंकड़े होते हैं। आंकड़ा परिवर्तित होता रहता है।
16. स्वयं के लिए फिजूलखर्ची और बाकि दुनिया के लिए मक्खीचूस वाला स्वभाव होता है।
17. आत्ममुग्ध व्यक्ति भयानक विनम्र होता है, अब इसे आप कैसे देखते हैं यह आप पर है। ये हमेशा मीठी छुरी ही चलाते हैं, कभी गुस्सा नहीं जताएंगे, कभी हिंसा नहीं दिखाएंगे, भले भीतर ज्वालामुखी क्यों न फूट रहा हो लेकिन खुद को हमेशा मासूमियत के साथ ही पेश करते हैं। आपका‌ मन लगा रहता है। असल में यही इनके जीने का modus operandi होता है।
18. ऐसा‌ नहीं है कि आत्ममुग्ध व्यक्ति सिर्फ अपने में ही मुग्ध रहते हैं, ये दूसरों की तारीफ भी करते हैं, बस ये है कि इनकी तारीफ किसी जहरीले किंग कोबरा से पप्पी लेने जैसा है, यह आप पर है कि आप कितना विष पचा पाते हैं। 
19. इनका स्वभाव पानी के बुलबुले जैसा होता है। आपको लगेगा कि बहुत कुछ है, एक विशाल, विराट,अद्भुत, अप्रतिम, विलक्षण व्यक्तित्व का अहसास, लेकिन सब कुछ बाॅम्बे मिठाई (काॅटन कैण्डी) की तरह हवा हवाई होता है।
20. रचनात्मक लोगों को चाहिए कि वे आत्ममुग्ध लोगों से एक निश्चित दूरी बना कर चलें, क्योंकि रचनात्मकता के स्तर पर अपूरणीय क्षति होने की भरपूर गारंटी होती है।

इति।

Thursday, 9 March 2023

सहने में जो आनंद है वो भोगने में कहाँ

एक लड़का है। कच्ची उम्र का है, लाखों की तनख्वाह वाली नौकरी है, इसके अलावा आवास, भोजन, परिवहन संबंधी अन्य सुविधाएं प्राप्त हैं। पारिवारिक माहौल, कंडिशनिंग या संगत जो भी कह लें, इन सबकी वजह से उसका व्यक्तित्व कुछ ऐसा तैयार हुआ कि बहुत ही अधिक नफरती और क्रिमिनल माइंडसेट का हो गया। चूंकि उम्र में बहुत छोटा है, तो एक बड़े भाई का दायित्व निभाते हुए अभी कुछ समय पहले मेरी उससे मुलाकात हुई। ये मैं पहली बार उससे मिल रहा था, इससे पहले सोशल मीडिया में ही जान पहचान थी। मैं हाव-भाव से ही समझ गया कि इंसान बहुत ही अधिक बीमार है, सोशल मीडिया से इतर सामने मिलना इसलिए भी जरूरी होता है, बहुत कुछ समझ आता है। हाव-भाव से बहुत ही शांत, सहज, गंभीर, एक आम व्यक्ति भले थाह नहीं पाएगा लेकिन इतनी कम उम्र के व्यक्ति में ऐसी गंभीरता मुझे तो असहज ही करती है। उसमें भी गंभीरता ऐसी जो सिर्फ और सिर्फ आपराधिक प्रवृति के लोगों में ही पाई जाती है। कोर इंजीनियरिंग का छात्र होने के नाते और अलग-अलग राज्यों में रहते हुए मैंने तरह-तरह के हिंसक लोग देखे हैं लेकिन उन सबके भीतर भी अंश मात्र ही सही प्रेम और संवेदना की झलक देखने को मिल गई, लेकिन ये ऐसा पहला व्यक्ति मिला जिसके भीतर इंच मात्र मानवीय संवेदना देखने को नहीं मिली। ऐसे समझिए कि व्यक्ति के भीतर किसी वायरस की तरह पूरे मन मस्तिष्क में नफरत का प्रवेशन हो चुका हो। ऐसे लोग अमूमन भयानक पुरुषवादी मानसिकता के होते हैं और महिलाओं के प्रति बहुत अधिक नफरत का भाव रखते हैं, घोर असंवेदनशील होते हैं, आप शायद वहाँ तक सोच भी न पाएं। मैं समझ सकता हूं कि ऐसा व्यक्ति कैसी जीवन यात्रा से होकर आया होगा। खैर..

ऐसे लोग जहाँ कहीं भी होते हैं, नफरत को ही पोषित करते हैं, ये भी वही कर रहा है। पूरा भरोसा है कि आगे भी आजीवन यही करता रहेगा। ये लोग अपराध भी करते हैं तो बच के निकलने के सारे साधन तैयार रखते हैं, आप कितने भी तेजतर्रार हों, इन्हें आप नहीं पकड़ पाएंगे। एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए एक संवेदनहीन व्यक्ति की थाह पाना इतना आसान नहीं होता है। और आप ऐसे लोगों से उम्मीद नहीं कर सकते कि वे आपकी बात सुन लें। वैचारिक रूप से अडिग ये लोग पूरी दुनिया को अपनी हिंसा और नफरत से ही संचालित करने में विश्वास रखते हैं। इस तरह के लोगों को एक मनोवैज्ञानिक की सबसे अधिक जरूरत होती है। 

एक बार कार सीखने की बात निकली थी तो उस लड़के ने बताया था कि एक कोई उसके रिश्तेदार हैं जो इलीगल सप्लाई का काम करते रहे हैं और गाड़ी चलाने में उन्हें महारत हासिल है। उसने बताया कि उसे कार चलाना उन्होंने ही सिखाया। वह कहता कि पूरे देश में उनके बराबर का कोई ड्राइवर नहीं होगा। आगे उसने बताया कि उसके रिश्तेदार ने एक बार टोल नाके में पुलिस वालों को अपनी गाड़ी से रौंद दिया। और इस घटना के बाद वे कई साल के लिए गायब हो गये। उसने बताया कि इस तरह के बहुत से अपराध उन्होंने अपने‌ समय में किए, लेकिन कभी वे कानून के हाथ नहीं लगे। उसने बताया कि पहले वे ये सब करते थे, अब नहीं करते हैं। यह सब बताते हुए उसके चेहरे के भाव कुछ उसी तरह के थे जैसे भाव एक शिष्य के चेहरे पर होते हैं जब वह अपने गुरू की प्रशंसा करता है।

एक बार कुत्तों को लेकर चर्चा हुई। उसने बताया कि कुत्तों में एक पिटबुल डॉग प्रजाति होती है जो कि बहुत ही अधिक खतरनाक होती है। उसका एक बाइट इतना पीएसआई जनरेट करता है कि सामने वाले की जान चली जाती है। अमेरिका और कुछ कुछ देशों में इसके इसी स्वभाव के कारण इसे बैन कर दिया गया है लेकिन भारत में बैन नहीं है। पिटबुल डॉग इतना हमलवार प्रकृति का होता है कि यह सीधे सामने वाले को जान से मार देता है। इस डाॅग के हमले से बहुत लोगों की जान जा चुकी है। पालतू कुत्ते बकरियां गाय थोक के भाव शिकार होती रहती हैं। उसने अंत में बताया कि भारत में अधिकांशत: महिलाओं को ही पिटबुल डॉग पसंद होता है, ऐसा कहते हुए वह महिलाओं को पुरूषों से अधिक हिंसक प्रायोजित कर रहा था, खैर उसकी इस पुरुषवादी सोच से मैं बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं। मेरे जानने में बहुत से ऐसे डाॅग लवर दोस्त यार हैं, उनसे कुत्तों की ब्रिड को लेकर लंबी चर्चाएं चली होंगी लेकिन उन्होंने कभी ऐसे हाईलाइट करके कुत्तों के इस हमलावर ब्रीड के बारे में इतने विस्तार से जिक्र नहीं किया। फ्राइड सही कह गये हैं कि इंसान जो कहता है, जिस तरह से कहता है, वही उसके बारे में बहुत कुछ बता देता है। 

एक और वाकया इसने बताया कि कैसे उसे वर्कप्लेस में अपने अधीनस्थों से जूते उठवाने या सामान उठाने के लिए आदेश देकर मजा आता है, कैसे वह अपने से नीचे के लोगों के भीतर की नकारात्मताओं को आड़े हाथों लेकर उन्हें घंटों इंतजार करवाकर सुकून पाता है, कैसे वह अपने हिस्से की सुविधा और सुरक्षा पा लेने के लिए पूरे सिस्टम को आड़े हाथों लेता है, ऐसा ही बहुत कुछ अटरम शरटम करता है और इस पूरी प्रक्रिया में असीम आनंद से अनुभूत हो लेता है। खैर, ये अपने से छोटों का शोषण कर आनंद भोगने वाले बहुतेरे देखे हैं लेकिन उसमें भी आपराधिक प्रवृति वाला ये पहला रहा। 

ऐसे विचित्र लोगों के लिए मेरा अंदाजा बहुत कम ही गलत निकलता है, खासकर अनुभवजन्य बातें सही ही साबित होती है, पूरी उम्मीद है कि यह व्यक्ति अपने आने वाले समय में बहुत साफ्ट तरीके से और अधिक मात्रा में अलग-अलग प्रकार के आपराधिक कृत्यों को पूरी क्रूरता से अंजाम तक पहुंचाएगा, और लोगों को इस व्यक्ति का परपीड़ा सुख समझ नहीं आएगा, क्योंकि यह खामोश, गुमसुम, भीरू स्वभाव का हिंसक व्यक्ति है। इस लड़के से मिलना मेरे लिए बहुत अलग तरह का अनुभव था। कैसे धीरे-धीरे एक पूरी प्रक्रिया के तहत एक आपराधिक प्रवृति का व्यक्ति तैयार होता है, यह देखना अपने आप में अभी तक के अनुभवों में से सबसे अलग अनुभव रहा।

मानवीय पहलुओं से उसका साक्षात्कार हो सके, इस हेतु अपने स्तर पर मुझसे जो बन पड़ा, वह मैंने इस बीच किया‌। मैंने अपने स्तर पर छोटे-छोटे जेस्चर से उसके हिंसात्मक स्वरूप में कमी लाने की हर संभव कोशिश की। बुध्द और अंगुलीमाल का समय बहुत अलग था। अभी के समय का चैलेंज अलग ही तरह का है। एक बचपन का दोस्त मुझसे कहा करता है कि मैं क्यों लोगों को इतना बर्दाश्त करता हूं, इस पर मुझे एक ही बात याद आती है - " सहने में जो आनंद है वो भोगने में कहाँ। "

इति।

Friday, 3 March 2023

मासूम चिड़िया

व्यवस्था है एक मासूम चिड़िया,
उसे जो जैसा चाहता है इस्तेमाल कर लेता है,
चाहे सरकारी व्यक्ति हो या गैर सरकारी, 
कोई नेता हो या कोई पत्रकार,
हर कोई अपनी सुविधानुसार,
व्यवस्था रूपी चिड़िया के पंख नोच ले जाता है। 
इसके ठीक उलट एक बड़ी आबादी,
उस व्यवस्था रूपी मासूम चिड़िया के,
पंखों पर लगातार मरहम करती रहती है।
एक तोड़ने का काम करता है,
तो एक जोड़ने का।
तोड़ने वाले इतना तोड़ जाते हैं,
कि पंखों को फलने ही नहीं देते।
तोड़ने वाला झटके में अपना काम कर जाता है,
जोड़ने वाले आजीवन लगे रहते हैं।
कुछ इस तरह व्यवस्था,
अपने होने का अहसास दिलाती है।
जब तक जोड़ने वाले रहेंगे,
जब तक पंखों को सहारा देने वाले रहेंगे,
व्यवस्था सारी पीड़ाएँ झेलते हुए,
सच्चिदानंद की भांति जीवित रहेगी।

Wednesday, 1 March 2023

एक इंसान काफी होता है -

हमारे यहाँ स्त्री पुरुष के बीच रिश्ते बेहद संजीदगी वाले होते हैं, जिनमें तमाम तरह की अपनी जटिलताएं होती हैं। चाहे वह अल्पकालिक रिश्ता हो, लव मैरिज हो या फिर अरैंज मैरिज। रिश्तों में एक दूसरे की खोज करते हुए, एक दूसरे के सोच विचार को विस्तार देते हुए अपनेपन को जीना सबके बूते का नहीं है। 
अधिकतर रिश्तों में यह देखने में आता है कि जहाँ जैसे एक पक्ष आर्थिक रूप से अधिक समृध्द हो, दिखने में ज्यादा अच्छा हो, सोच में मानसिकता में मेधा के स्तर पर एक व्यक्ति दूसरे से कहीं अधिक आगे हो। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति आजीवन उदारता का, दुःखहर्ता का, सहानुभूति का भाव रखता है, जीवनसाथी के रूप में बराबरी में सम्मान नहीं कर पाता है। ऐसे व्यक्ति को रिश्तों में अपनी ओर से बहुत अधिक जोर नहीं लगाना पड़ता है, लापरवाही चरम पर होती है। जैसे कभी बहस होती है तो दूसरे पक्ष को आर्थिक सामाजिक और दैहिक सुंदरता इन मामलों को सामने लाकर बुरा भला कहा जाता है, छोटा दिखाया जाता है। जो ईमानदार होता है वह भड़ास निकाल देता है, जो शातिर होता है, वह खामोश रहकर कुण्ठा परोसते हुए आजीवन दिमाग से खेलता है। ऐसे रिश्तों में वैचारिकी बिलकुल नहीं मिलती है, मिलने का दिखावा जरूर होता है, दुनिया के बेस्ट कपल वाले लतीफे छोड़ कर बस गाड़ी खींच रहे होते हैं, ऐसी स्थिति में दो लोगों के बीच सब कुछ होता है, बस रिश्ता नहीं होता है। एक बहुत बढ़िया पाॅलिश फिल्म है - "थ्री कलर्स व्हाइट", उसमें इस द्वंद को बहुत अच्छे से दिखाया गया है। 
जिन रिश्तों में इंसान को अपने पार्टनर से एक माता-पिता, भाई,बहन या दुनिया में जितने भी रिश्ते हैं, हर तरह की भूमिका निभा जाने का अपनापन महसूस ना हो, इसका सीधा मतलब यही है कि रिश्ते में ढीलापन है, टिकाऊ नहीं है, चाहे वह अविवाहित लोग हों या शादी-शुदा जोड़े। जो लोग रिश्तों में एक दूसरे को पूरी तरह स्वीकारते हैं, समझते हैं, उनमें खासकर शादी के बाद गजब का बदलाव देखने को मिलता है। अलग दृष्टिकोण से जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं, तनावमुक्त हो जाते हैं, जीवन के प्रति पहले से कहीं अधिक सहज हो जाते हैं, क्योंकि उनको एक ऐसा इंसान मिल जाता है, जिससे वह अपने सारे सुख-दुःख साझा कर सकते हैं। हमारे यहाँ विरले ही ऐसी घटनाएँ होती है।

Friday, 24 February 2023

रायपुर बलौदाबाजार रोड - मौत की अंधी गली

मैंने 135 दिनों तक लगातार भारत के अनेक राज्यों में मोटरसाइकिल से यात्राएं की है। इसके अलावा भी पहले और बाद में भारत के अलग-अलग कोनों में मोटरसाइकिल चलाई है। अनजान रास्ते, कब कहाँ ब्रेकर होगा, खड्ढे होंगे किसी बात की जानकारी नहीं, फिर भी सफर बहुत अच्छा रहा। दिल्ली की बेतरतीब ट्रैफिक में भी मैं गाड़ी चलाने में अभ्यस्त हो गया। साढ़े चार महीने तक भारत घूमने के दौरान दो बार ऐसी नौबत आई जहाँ एकदम मौत को करीब से देखने जैसी स्थिति निर्मित हुई। वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बलौदाबाजार जिले की ओर जाने वाली रोड में सप्ताह भर मोटरसाइकिल में आना जाना किया, उतने में ही दो से तीन बार मौत को करीब से देखने जैसी नौबत आ गई। अब आप इसी से अंदाजा लगाइए कि ये रोड कितनी खतरनाक होगी। जब मैं पहली बार इस रोड में दिन में सफर किया, तो कुछ एक साथियों ने कहा कि बहुत सर्पीले मोड़ हैं, संभल के जाना। पहली बार में जल्दबाजी में तेज गति से गया था तो मुझे कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ था, हां जम्मू कश्मीर के नेशनल हाईवे 1A का अनुभव लिया हुआ था, तो कुछ वैसी रेश ड्राइविंग जरूर दिखी थी। इसके बाद एक दिन शाम ढलने के पश्चात जब मैं उस रास्ते गया तो मुझे तब समझ आया कि मेरे दोस्त जिन्होंने भारत घूमने के दौरान कभी सलाह नहीं दी, वे इस सड़क में संभल के चलने‌ की सलाह क्यों दे रहे थे। ईमान से कह रहा हूं उस दिन पहली बार मैंने डर के धीरे गाड़ी चलाई थी।

इस सड़क‌ में आए दिन गंभीर दुर्घटना होती है, मतलब कोई एक दिन ऐसा नहीं छूटता होगा जिस दिन कोई दुर्घटना न होती हो। मैं तो कहता हूं इस सड़क में दुर्घटना से प्रति सप्ताह एक मृत्यु का औसत भी निकल जाना है। कल बीती रात ट्रक और पिकअप की टक्कर में 11 लोगों की मौत हो गई। प्रधानमंत्री जी ने भी इस घटना को लेकर शोक जताया है। इस सड़क में होने वाली दुर्घटनाओं में मालवाहक पिकअप गाड़ियाँ ही अधिकतर देखने को मिली हैं, कभी इनकी टक्कर दुपहिया वाहन से होती है, तो कभी ट्रक से तो कभी कारचालकों से। इसके बाद दूसरी बड़ी संख्या बस वालों की भी है, जिन्हें इन खतरनाक सड़कों में भी जल्दी गंतव्य तक सवारी पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। दुर्घटना में भी दिन की अपेक्षा रात में होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या अधिक है। 

रायपुर से पलारी होते हुए बलौदाबाजार तक की इस सड़क में पूरे रास्ते भर इंसानी बसाहट है, सड़क किनारे छोटे-छोटे कस्बे हैं, सड़क संकरी है और ट्रैफिक का दबाव बहुत ज्यादा है। मैदानी इलाका होने के बावजूद सड़क के अपने मोड़ तो दुर्घटना का एक कारण हैं ही, लेकिन बड़ा कारण सड़क का संकरा होना और इंसानी बसाहट है। दूसरा बड़ा कारण यह कि ये पूरा क्षेत्र इंडस्ट्रियल बेल्ट में आता है जिस कारण से मालवाहक गाड़ियाँ बेखौफ द्रुतगति से चलती हैं। विकल्प के तौर पर एक दूसरा रास्ता भी है, जो 4 लेन है, डिवाईडर भी है, अच्छी सड़क है। लेकिन 15 किलोमीटर अतिरिक्त तय करना पड़ता है और उस सड़क में टोल भी देना पड़ता है, इस कारण से सभी मालवाहक गाड़ियाँ ट्रक आदि आवागमन के लिए उस रास्ते में जाने से बचते हैं। 

समाधान की बात करें तो सड़क मार्ग चौड़ीकरण के अलावा इस समस्या का और कोई दूसरा स्थाई समाधान नजर नहीं आता है, और इंसानी बसाहट में, उसमें भी औद्योगिक क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण का काम करना अपने आप में टेढ़ी खीर है। बाकी देखिए, कुछ चीजें समय ही अपने आप ठीक करता है, इसलिए इस समस्या को भी समय पर छोड़ दिया जाए। तब तक पीड़ितों के लिए ओम शांति। 🙏

हिन्दी साहित्य के टिकटाॅकर -

इस किताब के माध्यम से लेखन के स्तर पर यह सीखने मिला कि भारत में हिन्दी साहित्य में लिखने वालों की एक बड़ी आबादी टेपरिकाॅर्डर और कापी पेन लेकर फुटनोट्स बनाते हुए ही किताब पर काम करती है। ऐसी किताबों की तासीर कुछ पेज पढ़ने के बाद ही समझ आ जाती है, एक दस्तावेज की तरह लिखी गई ऐसी किताबें लेखन के स्तर पर औसत ही होती हैं चाहे उनका दस्तावेजीकरण कितनी भी अच्छी भाषा, व्याकरण या शोध से होकर आया हो‌। विश्वविद्यालय के शोधकार्य वाले तर्ज में एक रिपोर्ट की तरह तैयार की गई इन किताबों की उम्र बहुत अधिक नहीं होती है। ऐसी किताबें खासकर मुझ जैसे पाठक को उतना अधिक प्रभावित नहीं कर पाती है।

दूसरे तरह की किताब ऐसी होती है जिसमें नयापन होता है, एक आग्रह दिखता है, एक भूख दिखती है, लेखन शब्द वाक्य सब कुछ एकदम शुध्द बहते पानी जैसा होता है, आप मन से ग्रहण कर लेते हैं, ऐसी किताबें अमूमन आंचलिकता की सीमाओं को चीरते हुए सबके लिए ग्रहण करने योग्य होती है, यह किताबें लंबे समय तक पाठकों के बीच अपनी जगह बनाती है, क्योंकि ऐसी किताबों के तैयार होने में वास्तव में एक मनुष्य का खून पसीना लगा होता है, एक किसान के लहलहाते खेत की तरह उसकी अपनी अलग तरह की मेहनत झलकती है, आपको महसूस होता है, सिर्फ भाषाई कलाबाजी या दस्तावेजीकरण नहीं होता है। मैंने अभी तक हिन्दी की बहुत सी किताबों की खाक छानने के बाद यह पाया है कि हिन्दी साहित्य में ऐसी किताबों की घोर कमी है। और ऐसी किताबें अगर आती भी हैं तो औसत किताबों का प्रचार करने वाले हिन्दी साहित्य के मूर्धन्य कर्ता-धर्ता श्रीमान आदरणीय सम्मानीय वरिष्ठ सुधीजन इन किताबों को आगे बढ़ने ही नहीं देते हैं।




Friday, 17 February 2023

Mèmoire de Jaisalmer

 जैसलमेर में इस जगह में लगभग एक सप्ताह के आसपास रूकना हुआ। यहाँ प्रतिदिन का किराया खाने की थाली के रेट से भी सस्ता था। खाने की स्वादिष्ट थाली, जिसकी तस्वीर अपलोड की हुई है, उसका मूल्य 300 रूपया था। कमरा यानि बंक बैड जिसमें मेरे अलावा और कोई नहीं था, उसकी भी सुंदरता आप तस्वीरों में देख सकते हैं। 

यह सब इसलिए आज याद आ रहा है क्योंकि अभी कुछ दिन पहले एक दोस्त छत्तीसगढ़ में ही कहीं परिवार के साथ गया था, एक दिन का किराया वही 5000 था, उसने कहा कि रेट सही था, सब बढ़िया था, अच्छी सुविधा थी, मजा आया आदि आदि, मैंने भी हां कह दी और बात वहीं खत्म हो गयी, क्योंकि दोस्त की बात सही भी है, यहाँ मिलने वाली hospitality के लिहाज से रेट सही था। मुझे mémoire de jaisalmer याद आया छत्तीसगढ़ के एकलौते 7 स्टार रेस्तराँ की hospitality, जिसे कभी याद करने का मन नहीं होता, असल में वहाँ हमारा खाना सर्व करने वाले ने एक दूसरे टेबल का आर्डर जिसमें शराब थी, वह साथ में एक ही ट्रे में ला दिया था। कोई और होता बढ़िया से अंग्रेजीदां बनकर नाराज हो जाता। खैर, मुझे तो हंसी ही आ गयी थी, अनुभव और जानने सीखने का भूखा इंसान क्या ही नाराज होता। छत्तीसगढ़ में रेस्तरां से लेकर रिसार्ट या फिर टूरिज्म की बात करें तो Hospitality एक ऐसी चीज है जहाँ आपको निराशा हाथ लग सकती है, खासकर तब और ज्यादा जब आपने वास्तव में Hospitality चीज क्या होती है, इसे देखा जिया हो। बाहर आप जाएंगे, छोटे-छोटे रेस्तरां में भी ये चीज मिल जाती है। आप पर है, आप कितना महसूस करते हैं, एक बड़े परिप्रेक्ष्य में ये बात कह रहा हूं कि यहाँ आपको सुंदर कमरे और कुर्सियाँ वगैरह मिल जाएंगी, खाना भी स्वादिष्ट मिल जाएगा, इन सबके पीछे रेट भी माशाअल्लाह लेकिन इसके बावजूद Hospitality की उम्मीद ना ही करें तो बेहतर। 

जैसलमेर में जहाँ मैं रूका था, उस कमरे की सुंदरता और सफाई लाजवाब थी, बेडिंग भी बहुत ही आरामदायक, बाथरूम भी बड़ा सा था, उसके दरवाजे की खूबसूरती और नक्काशी भी लाजवाब थी, जिसे आप तस्वीरों में देख सकते हैं। रूफटाॅप ( जहाँ खाने के लिए बैठने की भी व्यवस्था थी ) के तो क्या ही कहने, वहाँ से पूरा जैसलमेर दिखता था, क्या ही गजब की मन मोहने वाली सुंदरता। मैंने उनके यहाँ सिर्फ एक दिन ही उनकी 300 रूपये की थाली खाई जो कि बहुत ही ज्यादा स्वादिष्ट थी, एकदम पैसा वसूल। बाकी दिन रोज बाहर घूम-घूमकर मैं अलग-अलग जगह का खाना खाता रहा, पीने के पानी के लिए भी जो वाटर कैन होटल वाले अपने पीने के लिए खरीद लाते, उसी से अपना गुजारा कर लेता, इस सबके बावजूद उनका व्यवहार मेरे लिए बहुत ही मित्रतापूर्ण रहा, घूमने फिरने से लेकर अन्य कोई भी सहयोग की बात हो, वे तत्पर रहे, जबकि उस समय 2020 में कोरोना ने होटल इंडस्ट्री को तबाह कर दिया था, उनकी Hopitality इतनी सही लगी, इतना घर जैसा अपनापन महसूस हुआ था कि मैं उनके यहाँ लंबा रूक गया था। 

"घूमना एक आर्ट है, एक लक्जरी है, सबके बस का नहीं है। वहीं कुछ लोगों के लिए लक्जरी का भोग ही घूमना है, दोनों बहुत अलग बातें हैं।"

बाकी आप तस्वीरें देखकर अपना खून जलाइए, क्योंकि जगह का नाम मैं नहीं बताने वाला हूं। 














Wednesday, 1 February 2023

Basics of Life

 



Red circle is in domination mode and extracting time from both green circles. 

Whenever you feel what is going wrong, do think about your green circles. Because 'We only live once'.