Sunday, 24 June 2018

- भाई एसडीएम स्तर का अधिकारी है और बहन मुनस्यारी की सड़कों में पागलों की तरह घूमती है -


                         कुछ दिन पहले ये दीदी मेरे सामने से गुजरी, इस धुंधली तस्वीर को आपके सामने अपलोड करने के लिए माफी चाहता हूं, लेकिन मुझे ये जरूरी लगा सो कर रहा हूं। तो जब वो दीदी मेरे सामने से गुजरीं तो मेरे हाथ में चिप्स का पैकेट था, उन्होंने मुझे देखते ही चिप्स के पैकेट की ओर ईशारा किया, अपने हाथों से और चेहरे के हावभाव से बार-बार ईशारा किया, आप चाहें तो सुविधा के लिहाज से इन लक्षणों के आधार पर उन्हें पागल/मेंटल कह सकते हैं। जब मैं उनको चिप्स देने के लिए हाथ बढ़ाने जैसा किया, वो चिप्स को पैकेट को अपने साथ ले गई और तेजी से भाग गई‌। एक पल के लिए कुछ समझ नहीं आया क्योंकि मुझे वो हावभाव से कहीं से भी पागल जैसी तो नहीं लगी। सच कहूं‌ मुझे तो पहली‌ नजर में दया, करूणा, हताशा, उपेक्षा, विवशता आदि भाव दिखाई‌ दिए।
                        मैंने फिर अपने स्थानीय साथियों से उस महिला के बारे में पूछा, उन्होंने बताया कि ये लड़की पागल है, पास के गाँव में रहती है, अभी साल भर पहले तो इसकी शादी भी हुई है, लड़का भी सीधा साधा हुआ, अभी यहीं संविदा में काम करता है, ले देकर आठ-दस हजार रूपया महीना कमाता है,‌ साथ ही बाजा बजाने का काम भी करता है, अब वो कहां से इलाज के पैसे लाए, वो भी परेशान सा रहता है। और सबसे बड़े कमीने तो इसके दो बड़े भाई हैं, एक तो एसडीएम स्तर का अधिकारी है और जो दूसरा है वो भी ठीक-ठाक‌ सरकारी नौकरी में है, दोनों देहरादून या शायद हल्द्वानी में जाकर बस गये हैं, और आगे सुनिए उन्होंने आज तक अपने माता पिता और बहन को एक रूपये की आर्थिक सहायता नहीं की है बल। और तो और पिछले दशक भर से उन्होंने मुनस्यारी में कदम नहीं रखा हैं, अब वो किस मुंह से कदम रखेंगे।
                         दूसरे स्थानीय साथी ने बीच में बात काटते हुए कहा - यार! ये लड़की अभी एक डेढ़ महीने बहुत सही थी, बीच-बीच में फिर ऐसी हो जाती है, घूमते रहती है, किसी से भी मांगकर खा लेती है। इलाज के पैसे नहीं हैं वरना ये कब का ठीक हो जाती, इसके भाई लोग थोड़ी सी मदद कर देते तो इसका इलाज हो जाता, लेकिन वे लोग तो अपना नाम‌, अपनी प्रतिष्ठा देखने वाले हुए, इसलिए यहाँ तो आते ही नहीं। वे सोच रहे होंगे कि इसको लेकर जाएंगे तो हमारी बदनामी होगी, हमारी औकात कम हो जाएगी फिर। वे दोनों भाई यहीं इसी विवेकानंद विद्या मंदिर से पढ़ के ऊपर उठे हैं लेकिन अब तो उनके पांव जमीन में नहीं है, क्या कहा जाए।
                        मैंने फिर पूछा कि इनकी उम्र क्या होगी अभी और इनके साथ ये स्थिति कैसे निर्मित हुई तो साथियों ने बताया-
अभी तो 32-35 साल की होंगी। यार ये लड़की इंटर के दिनों में बहुत ज्यादा होनहार थीं, पढ़ाई से लेकर खेलकूद सब में अव्वल नंबर। लेकिन फिर पता नहीं 12th पास करने के बाद या शायद ग्रेजुएशन के दौरान क्या जो ऐसा हुआ, थोड़ी पगली सी हो गई। कुछ गलत हुआ होगा, हुई होगी कोई घटना। यार पहाड़ के लोगों का यही तो हुआ, कुछ अप्रत्याशित सा हो भी जाता है तो मन में लेकर वर्षों तक बैठे रहते हैं, किसी को बताते भी तो नहीं हैं, और धीरे-धीरे पागल से हो जाते हैं, गाँवों में इधर-उधर भटकते रहते हैं। कितने ऐसे लोग हैं यार भाई, हर गाँव में आपको एक‌‌ दो ऐसे लोग मिल ही जाएंगे।

                        मेरे साथियों की बात मुझे शत प्रतिशत सही लगी। क्योंकि मैंने खुद बहुत से ऐसे लोगों को देखा है, उनसे बात की है, अधिकतर लड़के भी ऐसे हैं जो थोड़े मेंटल से हैं, मेंटल क्या मैं तो उन्हें ऐसा नहीं मानता, आपकी समझ और सुविधा के लिए ऐसा लिखना जो पड़ रहा है। तो ऐसे लोगों को देखकर यही लगता है कि ये तो बहुत अच्छी स्थिति में है, ये तो बस कुछ महीनों के इलाज से ठीक हो जाएंगे। पूरे भरोसे से कहता हूं, वे ठीक हो जाएंगे। इतने भरोसे से इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि मैंने खुद अपने परिवार में ऐसा होते देखा है।
कुछ वर्ष पहले की बात है, मेरी मां घर में अकेली पड़ गई, यानि कुछ महीनों के लिए ऐसी स्थिति निर्मित हो गई कि सब अपने काम के सिलसिले में बाहर। मां लगभग एक डेढ़ महीने घर में अकेली रहीं। मुझे तो इस पूरी स्थिति के बारे में पता ही नहीं चलने दिया गया। तो हुआ यूं कि ऐसे महीनों घर में अकेले रह के मां को psychiatric समस्या आ गई। रोने लगती, बाइक की आवाज तक से डर जाती, रात रात भर बुरे सपने और नींद का नाम नहीं। फिर दवाईयों का सिलसिला चला, उससे तो कुछ खास हुआ नहीं, फिर जब घर में थोड़ी चहल-पहल हुई तो फिर धीरे-धीरे मैंने माता जी के हावभाव में थोड़ा बदलाव देखा, बहुत छोटे-छोटे बदलाव जो शायद मैं ही देख पा रहा था, मैंने सोचा कि सबसे असली दवाई तो यही है फिर हमने इस बीच माताजी को अपने माइके भेज दिया। वहां वो कुछ दिन रहकर आई, जब वो लौटकर आईं तो आप यकीन नहीं करेंगे वो पूरी तरह से ठीक हो चुकी थीं।
मुझे लगता है कि मेरी माता के ठीक होने में दवाईयों का योगदान तो है ही साथ ही हमारे अपनत्व का भी बहुत बड़ा योगदान है, दोनों चीजें बराबर चलती रहीं इसलिए वो बहुत जल्द ठीक हो गईं।

इन पहाड़ी गाँवों के उन सभी लोगों को भी इन दोनों प्रकार के दवाइयों की जरूरत है, अगर ऐसा हुआ तो वे बहुत जल्द ही ठीक हो जाएंगे, और ये दीदी भी पूरी तरह से ठीक हो जाएंगी जिन्होंने राह चलते मुझसे चिप्स का पैकेट मांगा था।

Friday, 15 June 2018

~ ऐसा लगा जैसे मैंने पहाड़ को थोड़ा भी नहीं समझा है ~

रोज की तरह कल नंदा देवी मंदिर परिसर जाना हुआ, वहाँ से जब मैं नीचे उतर रहा था तो मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर एक पोस्टर लगा हुआ था, वह पोस्टर सप्ताह भर पहले हुए किसी एवेंट से संबंधित था। उस पोस्टर को वहाँ चिपका देखकर मेरे मन में दो ख्याल आए, पहला यह कि ये कार्यक्रम तो कब का समाप्त हो चुका है, तो इसे यहाँ से निकाला जा सकता है, दूसरा यह कि मंदिर परिसर के मुख्य द्वार पर यह कहीं से भी सही नहीं लग रहा है, यूं कहें कि अशोभनीय सा लगा।
अब जैसे ही मैं उस पोस्टर को वहाँ से निकाल‌ रहा था, उतने ही समय वहाँ से दो महिलाएँ गुजर रही थी, उन्होंने मुझे आश्चर्य भाव से कहा - भैया आप पोस्टर को क्यों निकाल रहे हैं। वैसे पहाड़ के लोग आश्चर्य के भाव से ही पूछते हैं, गुस्से या धमकाने का भाव आपको मिलेगा ही नहीं। मैंने उन्हें जवाब में कहा - दीदी ये प्रोग्राम तो हो चुका है।
फिर उन्होंने कहा - फिर भी क्यों निकाला भैया।
मैं उनके इस सवाल‌ से चुप सा हो गया, मैंने आंखे फेर ली और वहीं हमारे एक दोस्त की गाड़ी में बैठकर वहाँ से निकल गया। गाड़ी एक किलोमीटर से अधिक चल चुकी थी, मुझे अचानक महसूस हुआ कि ये मैंने क्या कर दिया। मुझे उनका बोलने का तरीका,उनके चेहरे के भाव याद आने लगे। फिर मैंने अपने दोस्त को बहाना मारकर गाड़ी रोकने को कहा और उसे आगे जाने को‌ कह दिया। अब वहाँ से मैं पैदल वापस उन दो महिलाओं के पास गया। मुझे पता नहीं क्यों ऐसा महसूस हो रहा था कि शायद मेरे द्वारा उन्हें चोट पहुंची है। मैं जब उनके पास पहुंचा तो मैंने उन्हें पहाड़ी परंपरा के अनुसार दोनों हाथों से नमस्ते करते हुए कहा - दीदी, मैं कोई बाहर से आने वाला टूरिस्ट जैसा नहीं हूं। पिछले चार साल से यहां आ रहा हूं, यहाँ बच्चों को मुफ्त में पढ़ाता भी हूं, यहाँ के लोगों के जीवनस्तर को सुधारने के लिए प्रयास भी कर रहा हूं, मुझे टूरिस्ट मत समझना दीदी, मैं तो अब यहीं का‌ हो गया हूं। शायद मेरे पोस्टर निकालने से आपको अच्छा नहीं लगा होगा, मुझे माफ कर दीजिएगा। मैं उसे वापस फिर से वहीं चिपका देता हूं, इसलिए मैं वापस लौटकर आया हूं।
दीदी ने मुस्कुराते हुए जवाब में कहा - अरे! नहीं भैया, वो तो पुराना हो चुका है, उसको और क्या चिपकाना हुआ, रहने दो। फिर उन्होंने चिंता जाहिर करने के भाव से कहा - लोग तो इन पहाड़ों का पता नहीं क्या क्या कर जाते हैं भैया। बाहर से लोग आकर फूल, पौधे तहस नहस करते हैं, तोड़कर ले जाते हैं। पता नहीं क्या क्या उल्टा पुल्टा जो करते हैं लोग, कैसा जो मजा आता होगा उनको ऐसा करके।
ऐसा कहते हुए उन्होंने एक‌ विस्मयकारी मुस्कुराहट फेरी और उतने ही समय वहाँ सामान जोहने वाली मैक्स की एक गाड़ी आ रही थी, उन्होंने हाथ फेरते हुए उस गाड़ी को रोका और दौड़ते हंसते उसमें लिफ्ट लेकर वो चली गईं। उस मैक्स की गाड़ी के ठीक पीछे से जो एक टूरिस्ट गाड़ी आ रही थी, उसमें बैठे कुछ लोग इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद कर रहे थे, मुझे पता नहीं क्यों उन टूरिस्ट लोगों के इस तरीके को देखकर हंसी आ गई।
आपको लग रहा होगा कि एक पुराने पोस्टर फाड़ने को लेकर, यानि इतनी छोटी सी बात के लिए कौन इतनी मेहनत करे। ये भी कोई बात हुई क्या। लेकिन आप पहाड़ को समझने की कोशिश करेंगे तो लगेगा कि ये ध्यान देने योग्य बात है। मैंने पहाड़ी लोगों के मन को देखा है, वे अपने में मस्त रहते हैं, वे आपसे कभी नाराज नहीं होंगे, वे आपको बस प्रेमभाव से बोल देंगे, अब वो हम पर होता है कि हम सही गलत समझ पाते हैं या नहीं। काश, काश मुझमें ये क्षमता होती कि दीदी के उस अपनेपन और सरलता से परिपूर्ण भाषायी अंदाज, उस बोलने के तरीके को आपके सामने लिख कर बता पाता, काश मैं भाषायी विस्तार दे पाता उनके चेहरे की उस मासूमियत को। आप भी कहते कि दुनिया में आज भी ऐसी चीजें बची हुई हैं क्या?
खैर..।
उस दीदी ने जब मुझसे कहा कि पोस्टर का डेट जा चुका है, फिर भी आपने क्यों फाड़ा भैया? इसका सीधा सा अर्थ यह था कि मुझे कोई हक नहीं बनता है कि मैं उस पोस्टर को‌ वहाँ से हटाऊं। यानि उन्होंने तो मुझे अन्य लोगों की तरह एक बाहरी असभ्य टूरिस्ट ही समझा होगा। उनके ऐसा सवाल करने का सिर्फ और सिर्फ यही अर्थ हुआ कि उस पोस्टर को निकालना कम‌ से कम मेरे अधिकार क्षेत्र में तो नहीं था। यानि मैं कौन हुआ उनके सही गलत का निर्धारण करने वाला।
असल में बात सिर्फ उस टुच्चे से पोस्टर को हटाने की नहीं है, पिछले कुछ सालों से जो बाहर से यहाँ टूरिस्ट आते थे, उन्होंने खूब उत्पात मचाया हुआ है, कोई खेतों में राजमा, जड़ी बूटी आदि की पौध को उखाड़ कर ले जाते, फल हुआ नहीं रहता था और तोड़ देते। बाहरी लोगों के स्वार्थ और लिप्सा की वजह से ऐसी चीजें लगातार होती आई है तो लोगों के मन में भी यही बैठ गया है कि अधिकतर बाहर मैदानों से आने वाले टूरिस्ट तो ऐसे ही होते हैं। मैं पूरे भरोसे से कहता हूं कि अगर इतिहास में ऐसी बदमाशियां नहीं हुई होती तो उस दीदी को मेरे पोस्टर फाड़ने पर सवाल नहीं करना पड़ता।
उनका मुझे सवाल करना इस बात का संकेत था कि -
- आप कैसे से जो हो गये हैं,
- पहाड़ को भी अपने शहरों की तरह समझने लगते हैं,
- आपके बस का नहीं हुआ हम‌ पहाड़ी लोगों के मन को समझना।

Monday, 11 June 2018

Life @ Munsyari

Life @ Munsyari

मुनस्यारी फिर से अंधकारमय। 5 घंटे से अधिक हो चुके हैं। अब कल सुबह तक लाइट आने से रही। कल‌‌ भी कितने टाइम तक लाइट आएगी कोई भरोसा नहीं है। पहाड़ों का जीवन बहुत दुखमय है र, अपार कठिनाइयों से भरा है। कभी भी बारिश कभख भी ओले, कपड़े तक नहीं सूख पाते, आखिर कितना लिखा जाए। बस ये हिमालय की खूबसूरती को देख के ही मन संतुष्ट कर लेने वाली बात है।

Life @ Munsyari

मुनस्यारी में मेरे ठंड झेलने की कैपेसिटी का‌ अंदाजा आप इसी से लगाइए कि मैं इस बार जैकेट तक लेकर नहीं आया हूं। अभी तापमान 8'c न्यूनतम और अधिकतम 25'c है। आने वाले दिनों में तापमान में बढ़ोतरी तो होगी नहीं, गिरावट ही होगी। अब यहाँ दो ही तरह का मौसम होता है एक ठंड दूसरा बरसात।

सचमुच जुदा है हिमालय को सामने से देखने का ये एहसास।
एक कवि द्वारा रची गई सुंदर कविता या लाख रूपये के कैमरे से खींची गई तस्वीर भी हिमालय की इस खूबसूरती को बयां नहीं कर सकती। हिमालय के इस एहसास को महसूस करने के लिए तुम्हें इसे सामने अपनी आंखों से ही देखना होगा।

मुनस्यारी में सामान्य वर्ग के लोगों का हाल‌ वही है, जो बस्तर में आदिवासियों का है। यहाँ सामान्य वर्ग के लोगों का दशकों से हो रहे शोषण का आप इसी से अंदाजा लगाइए कि अधिकतर होटल में काम करने वाले, गाड़ी चालक, पत्थर फोड़ने वाले, मजदूरी करने वाले अधिकांशतः सामान्य वर्ग के लोग ही हैं।

मुनस्यारी में समाज सेवा के नाम पर गजब का विरोधाभास है। यहाँ समाजसेवा का ऐसा पैटर्न चलता है जो आपको पूरे भारत में कहीं नहीं मिलेगा। यहाँ तो सेवा शब्द की एक अलग ही परिभाषा गढ़ दी गई है।
एक ऐसी सेवा जिसका अपना एक दायरा है, कुछ तय सीमित लोग हैं। उसके अलावे बाकी लोग दर दर की ठोकरें खाते रहें, इन्हें कोई सरोकार नहीं।
समाजसेवियों का भी एजेंडा निर्धारित है कि ये फलां फलां लोग हैं, हमें इन्हें ही आसमान की ऊंचाइयों तक ले जाना है, बाकी इसके अलावे कोई मरता भी रहे हमें क्या। और तो और शहर गंदा होता रहे, हमें क्या।
अजी हां, देश समाज ऐसे ही बनता है, अरे ऐसे में सिर्फ और सिर्फ खाई बनती है, जिसमें एक न एक दिन हमें और आपको ही गिरना है।
सीधे एक लाइन में कहा जाए तो ये समाजसेवी समसजसेवक न होकर जातिसेवक हैं। और जातिसेवक भी इतने प्रतिबध्द और ईमानदार ठहरे कि इनको मुनस्यारी के लोगों और यहाँ की समस्याओं से कोई मतलब नहीं।
इन तथाकथित जातिसेवियों के पास हिमनगरी मुनस्यारी का महिमा मंडन करने के‌ लिए वही दशकों से चली आ रही दो चार सूक्तियां हैं,
जैसे कि , स्वर्ग जैसा मुनस्यारी, सार संसार एक मुनस्यार, रंगीलो जोहार मेरो मुनस्यार, आदि आदि। बस इसी से खानापूर्ति हो जाती है।
इन्हीं वाक्यों से मुनस्यारी की ऐसी सैकड़ों नालियाँ भी साफ हो जाएंगी, सच तो ये है कि ऐसी नाली रूपी गंदगी जोंक की तरह हमारे मन मस्तिष्क में भी जगह बना चुकी है।
बाकी स्वर्ग तो है ही बल अपना मुनस्यारी। कितना भी उत्पात मचा लो स्वर्ग ही रहने वाला हुआ।



पता नहीं चंद पैसों और सुविधाओं के लिए, अधिकतर दिखावे और भेड़चाल में आकर लोग कैसे इन खूबसूरत वादियों से यानि अपनी जड़ों से पलायन कर जाते हैं। कैसे छोड़ जाते हैं संयुक्त परिवार, दादी-नानी का लाड़ प्यार, पर्व, त्यौहार, कौतिक(मेले), ये हवा, पानी। कैसे त्याग कर चले जाते हैं इस संस्कृति को, कहां से लाते होंगे ऐसा करने का हौसला, कैसे जुटाते होंगे इतनी हिम्मत। मेरा बस चले तो मैं एक‌ वक्त का खाना खाकर इस संस्कृति का लालन‌‌ पालन‌ कर दूं।
‌‌‌‌‌‌‌ अगस्त 2017 में मैंने यहाँ के‌ लोगों की जीवनशैली और यहाँ की संस्कृति को करीब से जानने के लिए, यहाँ की समस्याओं की बेहतर समझ बनाने के लिए लगातार 9 दिन तक एक‌ ही‌ वक्त का खाना खाया था‌। नौ दिनों के दरम्यान शारीरिक तपस्या से ज्यादा मेरे पड़ोसियों के अपनेपन से जूझना, उनके लगातार चाय नाश्ते खाने के लिए पूछना ये सबसे बड़ी चुनौती थी, हर दिन सुबह शाम झूठ बोलना यानि 15-20 झूठ तो मैंने बोले ही होंगे कि हां मैंने नाश्ता कर लिया है, मैंने खाना खा लिया है।

In picture - फाइनली, चार दिनों के बाद पानी आना शुरू हो गया है। हमने कपड़े भी धो लिए हैं साथ ही ठंडे पानी से खुद को भी धो लिया है। स्नोफाल के वक्त नहाते थे तो ये ठंड क्या चीज है, "इट्स जस्ट ए स्टेट आॅफ माइंड"।


जब मैं पहली बार मुनस्यारी आया था तो एक बार रात को अपनी ही सांस लेने की साफ आवाज सुनकर घबरा गया था, यानि रात को यहां इतनी ज्यादा शांति रहती है। एक चूं की भी आवाज नहीं। 

"सबसे शक्तिवान ही सबसे बुध्दिमान"

मुनस्यारी में ये कहावत कहीं कहीं सटीक बैठती है। असल में यहां एक छोटे से व्यापारी हैं, उन्हें यहां आए ज्यादा समय नहीं हुआ है, बहुत ही मेहनती व्यक्ति हैं, मैं उनका नाम बदलकर उन्हें रोशन नाम से संबोधित करता हूं। रोशन जी बाहर से आए हैं, मतलब यहीं उत्तराखण्ड के ही किसी दूसरे जिले से हैं। उनकी मेहनत को देखकर कुछ लोग यानि कुछ व्यापारी वर्ग के सदस्य इतने आहत हुए कि उनको दुकान बंद कर सामान समेटने तक की धमकी दे डाली, क्योंकि उनके द्वारा की गई मेहनत से, नवाचार से क्षेत्रवासियों का तो भला हो ही रहा है, साथ ही उन गिने चुने दुकानदारों पर आने वाले ग्राहक कम हुए हैं जो ठीक उसी व्यापार में हैं जिस व्यापार में रोशन जी हैं। तो वे दुकानदार अपने बाहुबल का इस्तेमाल करते हुए दबाव बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।
रोशन जी भले और नेक आदमी हैं, किसी से ज्यादा कुछ बोलते नहीं हैं, कहीं इधर-उधर जाते भी नहीं, चुपचाप अपना काम करते रहते हैं, पब्लिक डोमेन में इस तरह रोशन जी के बारे में लिखने से उनके सामने और कोई विपदा न आए, इसलिए मैं उनके पेशे को लेकर भी गोपनीयता बरत रहा हूं।
बस रोशन जी के बारे में इतना ही कहूंगा कि पूरे मुनस्यारी में मैंने इतना मेहनती, इतना लगनशील व्यक्ति आजतक नहीं देखा। ये बात सिर्फ मैं नहीं कहता, मुनस्यारी के और भी बहुत से लोग कहते हैं।

जब से उनको कुछ लोग बोलकर गये हैं कि यहाँ से चले जाओ, तब से वे दिन रात काम कर रहे हैं। एक दिन तो सुबह 5 बजे उनके दुकान की लाइट जल रही थी, मैं मार्निंग वाक‌ के लिए जा रहा था, मैंने देखा फिर बाद में लौटकर जब उनसे पूछा तो पता चला कि आज वे सोने के लिए अपने कमरे में गए ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कई कई दिन तो बस सुबह 6 बजे से 9 बजे तक सोने के लिए चले जाते हैं, सचमुच उनके चेहरे की लकीरों को देखकर कोई भी बता सकता है कि ये व्यक्ति दिन रात खुद को तपा रहा है। मैंने जब उनसे इतना अधिक काम‌ करने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा - सर जी काम थोड़ा ज्यादा था, अब यहाँ तो देखो कितने दिन के लिए जो हैं, जब तक हैं जम‌ के काम कर लेना हुआ, फिर हम चलें वापिस अपने गांव घर और क्या।
आखिर उन्हें ऐसा क्यों बोलना पड़ा, कहां सोया है मुनस्यारी का नागरिक समाज।
स्थानीय लोगों को सोचना चाहिए, ऐसे मेहनतकश लोगों से ईर्ष्या भाव न रखकर इनसे तो सीख लेनी चाहिए। लेकिन मुनस्यारी के कुछ जो छटे किस्म के बदमाश हैं उनकी तो आदत हुई कि खुद तो कुछ करना है नहीं और जो कुछ बेहतरी का काम कर रहे हैं उनके‌ लिए सिर्फ और सिर्फ परेशानियाँ खड़ी करनी है।

हमारे लिए ये कितनी शर्म‌ की बात है कि पहाड़ के आदमी को ही पहाड़ में ऐसी चीजें झेलनी पड़ रही है, फिर कोई क्यों न‌ करे पलायन। और लोग फिर सोशल मीडिया में, सभा, सम्मेलन, सेमिनार में रोना रोते हैं कि गाँव खाली हो रहे, पलायन हो रहा वगैरह वगैरह।
बात सिर्फ मुनस्यारी की नहीं है, ऐसी छोटी बड़ी जो भी समस्याएं जिस भी क्षेत्र में हैं, ये हर उस क्षेत्र के नागरिक समाज की जिम्मेदारी है कि‌ ऐसे लोगों को‌ वे पहचानें, उनसे बात करें और फिर कहें कि भाई जी आप अपना काम करें, हम‌ आपके साथ खड़े हैं।

Wednesday, 6 June 2018

~ ये मंदिर परिसर तो मेरे लिए मां समान है ~

साल भर के अंतराल के बाद मेरी मुलाकात देव सिंह पापड़ा (रिटायर्ड आर्मीमैन) जी से हुई जो मुनस्यारी के पापड़ी-पैकुती गाँव के मूल निवासी हैं, वे अकेले ही पिछले कई सालों से डानाधार स्थित माँ नंदा देवी मंदिर की देखरेख करते आ रहे हैं।

मैं - यार दा, पहचाना?

देव सिंह जी - हां आप हर साल तो आते ही हो यहाँ।

मैं - जी और अभी मंदिर परिसर में सब ठीक?

देव सिंह जी - हां, सब ठीक ही हुआ।

मैं - ये बताइए वहाँ जो किनारे में पानी के स्टोरेज के लिए जो आयताकार गड्ढा बनवाया है आपने, उस पर लोगों ने दारू की बोतलें फोड़ रखी है? कुछ करवा दो यार उसका। वही एक जगह बड़ी खराब हो रखी है।

देव सिंह - अब मैं कितनों को समझाऊं, जिसे शराब पीकर बोतल‌ फोड़नी ही है, उसे कोई कैसे रोके। मैंने तो यहाँ के रखरखाव के‌ लिए, यहां की समस्याओं को लेकर कितने मंत्रियों को खत लिखा, पर कुछ नहीं होने वाला हुआ। तब मुझे लगा कि जो करना है, मुझे ही करना है।

मैं - अच्छा। ठीक है, ये बताइए, अभी जो मंदिर परिसर की ये सुंदरता है, आपके भगीरथ प्रयास के कारण ही आज ये मुनस्यारी का सबसे फेमस टूरिस्ट स्पाॅट बन चुका है, तो ये पहले से ऐसा था क्या?

देव सिंह जी - अरे नहीं तो। पहले यहां जानवर,घोड़े, खच्चर आया करते थे, जहाँ आज जो आपको ये फूल दिख रहे हैं उसके जगह कांटे ही कांटे थे, कांच ही कांच था। लोहे के ये जो बाड़े थे, इसको भी सब उखाड़ कर ले गये, चुराकर बेच दिया, पता नहीं क्या किया, ये टंकी को ढंकने का जो लोहे का ढक्कन था, वो भी लोग ले गये। वो वहाँ मंदिर के गेट का पल्ला भी ले गये, इसे तो मैंने दुबारा बनवाया।

मैं - तो इन सबके लिए आपको गाँव के लोगों ने सहयोग दिया होगा?

देव सिंह जी - नहीं। गाँव वालों ने कोई सहयोग नहीं दिया।

मैं - अच्छा, बाहर के कुछ लोगों ने सहयोग किया होगा फिर?

देव सिंह जी - बाहर वालों ने भी नहीं किया। मैंने तो इसे मां की कृपा समझकर अपने बलबूते खुद ही काम करता रहा। जब उन्होंने मेरे सिर में पटक‌ दिया कि आपने आवाज उठाया तो आप ही झेल लो, तो मैंने उसे झेल लिया। लोग ये कहते थे कि ये फौजी बुड्ढू भाग जाएगा, ये कुछ नहीं कर सकता है। मैंने जो है अपने दिल से लगाकर, अपने लगन से करके दिखाया उनको।‌ मैंने कहा कि पांच साल से रहूंगा और करके दिखाया।

मैं - तो आप यहाँ इस मंदिर परिसर को कब से संभाल‌ रहे हैं?

देव सिंह जी - मैं यहाँ 2013-14 से हूं।

मैं - जी, अच्छा।

देव सिंह जी - लाइट के‌ लिए भी कुछ नहीं किया तो फिर मैंने गांव वालों से लड़ाई करके दो लाइट यहाँ पर लाया, एक वहाँ गेट पर लगाया और दूसरा यहाँ लगाया।

मैं - यार दाज्यू, लोगों तक मैं आपकी बात पहचाऊंगा।

देव सिंह जी - यहाँ तो मेरा ऐसा है न कि जो चढा़वे का पैसा है, दानपेटी का, वो सारा इकट्ठा करके जो भी कुछ होता है, उसी से मैं ये हर साल होने वाले मेले का पूरा आयोजन ये जितना भी चूना, गेरू, पेंट सब उसी से कराता हूं, मैं इसके लिए किसी को‌ मांगता नहीं हूं, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता हूं।

मैं - यहाँ के प्रशासन से किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिलता?

देव सिंह जी - कोई कुछ नहीं। ये सब ऐसी हैं, सढ़े हुए आदमी हैं। आते हैं, जाते हैं।

मैं - पिछले बार जो एसडीएम थे उनसे आपने तो सहयोग के लिए बात की थी क्या?

देव सिंह जी - हां, एक बार क्या हुआ कि वो इन्क्वायरी करने जैसा यहाँ आए थे, मैं इधर गार्डन की कुराई कर रहा था। उन्होंने मुझे कहा - आप मडुवे की रोटी बनाओ, यहाँ का लोकल सब्जी बनाओ, टेंट लगाने की व्यवस्था बनाओ।

मैं - यानि ज्ञान देकर चले गये।

देव सिंह जी - हां और बोले कि उसमें से जो भी फायदा होगा, उसमें से चार भाग करके उसका एक भाग ब्लाक को देंगे, एक भाग गांव को‌ देंगे, एक भाग हम लेंगे और एक भाग आपको देंगे।

मैं - हद है।

देव सिंह जी - मैंने तो सर पकड़ किया। उस समय बस हां‌ हां करते गया, दूसरा मैंने उन्हें एक शब्द नहीं बोला। वो अपना बोलकर चले गये फिर दुबारा न तो कभी मिले न ही इस बारे में कोई बात हुई।

मैं - तो फिर अभी और क्या सोचा?

देव सिंह जी - ऐसा है कि ये मंदिर परिसर तो मेरे लिए मां समान है, अब मां की सेवा करने में क्या सोचना।


Maa Nanda devi temple, Munsyari

Dev Singh Papra ji inspecting the temple premise

Wednesday, 30 May 2018

Day - 5 with Prince

Last Day

आज पूरे पंद्रह दिन बाद मैं प्रिंस से मिला। निजी व्यस्तताओं के कारण मैं उससे मिल नहीं पा रहा था। बीच में एक दिन समय मिला भी था तो यही सोच के टाल दिया कि दो घंटे तो मेरे ऐसे ही चले जाएंगे। तो आज हुआ यूं कि प्रिंस मुझे देखते ही मुझसे लिपट गया वो भी 40'c की इस भीषण गर्मी में। कहने लगा - कहां थे भैया, नहीं आते हो, फिर वो मेरा हाथ पकड़कर मुझे खींचते हुए अपने किसी डांस क्लास वाली मैडम से मिलवाने ले गया। उसके बाद वह झूला झूलने में मस्त हो गया। प्रिंस की‌ मम्मी यानि दीदी ने बताया कि इस बीच जब मैं गार्डन नहीं आता था तो प्रिंस रोज कुछ समय तक गार्डन में खेलकर वापस चला जाता और जब मम्मी घर वापस आती तो हर रोज मम्मी से यह पूछता कि आज भैया गार्डन आए थे कि नहीं। दीदी ने और बताया कि एक दिन तो ऐसा हुआ कि एक कोई भैया उसे बड़े प्रेमभाव खेलने के लिए अपने पास बुला रहे थे, प्रिंस ठहरा अपनी मर्जी का‌ मालिक, कहां किसी के पास जाने वाला ठहरा, नहीं गया।

मैं - प्रिंस मैं कल जा रहा उत्तराखण्ड। अब और नहीं आऊंगा गार्डन।
प्रिंस - झूठ बोलते हो भैया।
मैं - सच कह रहा हूं।
प्रिंस - फिर मुझे भी ले चलो।
मैं - अगली बार ले चलूंगा फिर।
प्रिंस - नहीं। छुपा के ले जाओ चलो मुझे।
मैं - अभी नहीं अगली बार।

रात के 9 बज चुके थे। गार्डन बंद होने वाला था, अब वह हमेशा की तरह गार्डन से मुझे अपने घर को ले गया। प्रिंस की‌ मम्मी और मैं बैठकर यही चर्चा कर रहे थे कि प्रिंस को आखिर मुझसे इतना लगाव कैसे हो गया। अब जब धीरे-धीरे उस चार साल के बच्चे प्रिंस को ये अहसास होने लगा कि मैं सच में जा रहा हूं, और अब मैं उससे मिलने नहीं आ पाऊंगा तो उसने मेरा हाथ जोर से पकड़ लिया, और फिर छोड़ने का नाम नहीं। वह अकेला नीचे तक मुझे छोड़ने आ गया। मैंने कहा चलो मैं चलता हूं अब मुझे जाने दो। वो बार बार नहीं नहीं नहीं, बस यही बोलता रहा। कभी धीरे बोलता कभी जोर से चिल्लाता, लेकिन मेरा हाथ न‌ छोड़ता। फिर जब मैंने उससे अपना हाथ छुड़ाया, और अपनी बाइक के पास गया, बाइक आॅन कर जब मैं जाने लगा तो वो वह दौड़कर मेरे पास आ गया और बाइक में चढ़ने लग गया। लेकिन मैंने उसे ऐसा करने से रोक लिया तब वो मेरे पास आकर बड़े भोलेपन से कहने लगा, चलो न भैया हम दोनों साथ में कुछ खाएंगे। मैं उसकी बात सुनकर सोचने में मजबूर हो गया। 9:30 बज चुके थे, मैंने कहा, चलो मैं चलता हूं, फिए आऊंगा ठीक है। पता नहीं वो क्या सोच रहा था। एकदम भरी हुई आवाज में उसने मुझसे कहा - "अब आप आओगे तो भी मैं नहीं मिलूंगा देखना" ऐसा कुछ कुछ कहने लगा और फिर फूट-फूटकर रोने लग गया। इतने बुरी तरीके से रोया कि उसकी जुल्फें उसके चेहरे पर चिपकने लगी थी। लगभग 15-20 मिनट तक उसने आंसू बहाया होगा, मैं आराध्या उसकी मम्मी उसे मनाने लग गये, लेकिन उसका रोना बंद ही नहीं हो रहा था, मुझे लगा कि इसका रोना अगर कोई शांत करा सकता है तो वो मैं ही करा सकता हूं, तो जैसे ही मैंने इस जिम्मेदारी को समझा, मुझे एक बढ़िया तरकीब सूझी और उसके बाद वह मान गया और उसका रोना शांत हो गया। और उसने हंसते हुए मुझसे वादा किया कि वह और नहीं रोएगा।

Monday, 21 May 2018

नवरात्र पूजा, भराड़ी मंदिर, मुनस्यारी

नवरात्र की पूजा के लिए हम भराड़ी मंदिर गये थे, यह मंदिर मुनस्यारी से लगभग दस से बारह किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ तक जाने के लिए कोई सड़क नहीं है। आधी दूरी तक यानि पापड़ी-पैकुती गांव तक जाने के लिए गाड़ी से जा सकते हैं, यह सड़क कुछ बहुत अच्छी नहीं है, काफी पथरीली सड़क है। यहाँ से आधे घंटे पैदल चलकर भराड़ी मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
दोपहर को बलि प्रथा शुरू हुई। भराड़ी मंदिर में आंखों के सामने बीस पच्चीस सुंदर सुंदर बकरियों की बलि देखने के बाद मन मसोस कर रह गया था‌, सही गलत कुछ समझ नहीं आ रहा था। इस बारे में कुछ ज्यादा लिखने की इच्छा भी नहीं हो रही है, असमंजस में हूं।
शाम के पांच बज चुके थे। पूजा समाप्त हो चुकी थी। मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ भराड़ी मंदिर से खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए मुनस्यारी की ओर लौट रहा था। यह रास्ता ठीक नंदा देवी मंदिर, डानाधार के पास जाकर खत्म होता है। हमें ये खड़ी चढ़ाई पूरा करने में दो घंटे से अधिक का समय लग गया। मुनस्यारी पहुंचते तक अंधेरा होना शुरू हो गया था, मेरे दोस्त चढ़ाई चढ़ते मुझसे कुछ आगे निकल गये, इस बीच रास्ते में मुझे एक दीदी मिली,
उन्होंने खुद आगे से मुझसे पूछा - भैया आप यहाँ घूमने आए हो?
मैंने कहा - नहीं बस ऐसे ही कुछ महीनों के लिए आया हूं।
दीदी - आप कहां से हो?
मैं - जी मैं छत्तीसगढ़ से हूं।
दीदी - ये कहां हुआ भैया।
मैं - काफी दूर हुआ। तीन दिन लग जाता है यहाँ से जाने में।
दीदी - यहाँ कैसे?
मैं - बस ऐसे ही पहुंच गया। एक कमरा यहाँ किराए पे ले रखा है। समय समय पर बच्चों को पढ़ाता भी हूं। बाकी समय आसपास के गाँवों की सैर करने चला जाता हूं।
दीदी - चलो ठीक ही हुआ। हमको तो अभी जाकर बच्चों के लिए खाना भी बनाना है। घर में दोनों को छोड़कर आई हूं।
मैं - अच्छा, दीदी आपके पति बाहर रहते होंगे फिर?
दीदी - हां दिल्ली रहते हैं, वहीं प्राइवेट में काम करना हुआ। साल में कभी-कभी आ जाते हैं।
मैं - अच्छा‌।
दीदी - आपका बढ़िया हुआ भैया, आप तो जाकर खाना खा के सो जाएंगे‌। हमको तो अभी बच्चों को देखना भी हुआ।
मैं - आप ऐसा क्यों कहती हैं।
दीदी - यहाँ पहाड़ों में तो ऐसा ही हुआ।
मैं - चलिए दीदी जी आप मुझे अपने घर ले चलिए, आपको एतराज न हो तो मैं आप लोगों के लिए खाना बनाना चाहता हूं।
दीदी - नहीं भैया, ऐसी कोई बात नहीं है, मैंने ऐसे ही बता दिया।
मैं - आपने मुझ अनजान को अपना समझकर अपने मन की बात की‌। आपके लिए थोड़ी मेहनत कर लूंगा तो कौन सा थक जाऊंगा।
दीदी - आपने इतना कह दिया भैया। मैं इसे याद रख लूंगी।
मैं - चलिए ठीक है।

और फिर ढाई घंटे की चलाई के बाद हम मुनस्यारी पहुंच चुके थे।





Tuesday, 15 May 2018

A Poem by Kriti Bhargav

ज़ख्म कितने जमाने ने इस दिल को‌ दिए,
आज कोई देखे तो दिखा दूं उसको।

जिंदगी ने करवटें कितनी बदली,
आज कोई पूछे तो बता दूं उसको।

पथरीली राहों पर ठोकरें खाना कोई शिकस्त नहीं,
कोई हारता कहे तो समझा दूं उसको।

मेरे गम की नींद न चुरा पाए,
कोई ग़र है जगा तो बता मैं सुला दूं उसको।

हर शख्स कुछ खोजता है और खो जाता है,
न खोजता कोई मिले तो मैं खुदा दूं उसको।

तपती जमीं को सावन ने महका दिया मगर,
सावन से कोई जले तो मैं टूटा अरमान दूं उसको।

सुनाए जब दर्द कोई, दामन छीन लेने का अपने,
मैं कफन न देने वाले का शुक्र सीखा दूं उसको।

गिरते गिरते उठ पाने का, साहस खो चुका जब कोई,
थाम बांह उसकी, दे मेरे हाथ मैं, किसी का साथ दूं उसको।

एक तू ही नहीं, खफा और भी हैं जमाने से,
जो दे दर्द तुझे, तू न दे आंसुओं के समंदर उसको।

Sunday, 13 May 2018

Day - 4 with prince


प्रिंस - ऐ! मोटा भाई मैं खाना खा खा के बर्बाद हो गया।
मैं - बागबान‌ देख के आए हो क्या प्रिंस? और ये खाना खाकर कैसे बर्बाद होते हैं?
प्रिंस ( एक्सरसाइज के दौरान हंस हंस के अपना पेट दिखाते हुए) - ये देखो ये, मोटा हो गया मैं, आपके जैसे फिट नहीं हूं, मेरे पापा भी आपकी तरह फिट नहीं है। पापा तो पानी पी पी के बर्बाद हो गए , मोटे हो गए। हाहाहा।
ये सब सुनकर बाजू में खड़े एक अंकल अपनी हंसी‌ नहीं रोक पाए। आज ये लड़का कुछ भी कुछ कहे जा रहा था।

अब गार्डन से वापस घर जाने का समय हो गया था।
प्रिंस कहता है - भैया आप चले जाते हो, फिर मैं आपके बारे में ही सोचते रहता हूं, नींद नहीं आती।
मैं - चल झूट्ठे।
प्रिंस - सच में नींद नहीं आती‌।
मैं - क्यों नहीं आती।
प्रिंस - आप साथ में रहते हो तो अच्छा लगता है न इसीलिए।


In Picture - Left to Right (Me, Prince, Aradhya, Ananya)

Saturday, 12 May 2018

Day- 3 with Prince



मैं - चलता हूं, पानी का क्या है, कभी भी पी लूंगा।
प्रिंस - आप कल भी ऐसे ही बोले थे‌ और चले गये थे, आज तो चलो।
मैं - अच्छा मैं यहीं नीचे हूं, जाओ ऊपर से मेरे लिए पानी लेकर आओ।
प्रिंस - गिलास यहाँ नहीं आएगा चलकर, उसके लिए ऊपर जाना पड़ेगा।
ठीक कुछ ऐसा ही उसने कहा और फिर मैं और उसकी मम्मी हंसने लग गये। दीदी ने भी कहा कि चलो आओ पानी पी लेना फिर जाना। और इसके बाद प्रिंस मेरे पेंट की जेब पकड़ कर मुझे खींचते हुए अपने घर ले गया। और उनके घर के बाहर बालकनी में जैसे ही मैं बैठा, वो अपनी मम्मी को चिल्लाकर आॅर्डर देने लगा कि भैया के लिए पानी लाओ। अब वो मेरी दी हुई डेरी मिल्क चाकलेट जो गर्मी की वजह से पिघल चुकी थी, उसे वह उतने ही समय खाने लग गया। ऊंगलियों में सानकर, चेहरे में यहाँ-वहां लेपते हुए वह बुरी तरीके से चाकलेट खाने लगा। मैं, आराध्या और उसकी मम्मी हम सबने मिलकर बारी बारी से उसका खूब मजाक बनाया कि अभी गार्डन से आया है तू, हाथ नहीं धोया है गंदे, रेत का फ्लेवर खा रहा, घास का फ्लेवर खा रहा, धूल मिट्टी का फ्लेवर खा रहा आदि आदि। प्रिंस हंसने लग जाता, और बेफिक्र होकर फिर से ऊंगली चाट चाटकर खाने लग जाता। चाकलेट खाने के बाद जब वो घर के अंदर हाथ धोने गया तो उसने अपनी मम्मी को कहा- मम्मी मैं अभी आया, भैया का ख्याल रखना। जाना मत भैया, अभी आया। ये सब सुनकर आराध्या ने झुंझलाते हुए कहा - भैया, ये मुझसे इतना प्यार क्यों नहीं करता, मेरे से तो बस लड़ता रहता है हमेशा।
फिर मैंने आज प्रिंस को कहा - मैं कुछ दिन बाद चला जाऊंगा, मेरी ट्रेन है, तुम फिर कैसे करोगे।
प्रिंस - मैं भी आपके साथ उस ट्रेन में जाऊंगा।
मैं - उस ट्रेन में बच्चों को नहीं ले जाते।
प्रिंस - फिर मैं मम्मी पापा को साथ ले जाऊंगा न।
मैं - इसकी हाजिरजवाबी देखकर तो मैं पहले दिन से ही हैरान हूं। फिर मैंने उसे कहा कि ये जो तुम्हारे लंबे घुंघरालु बाल हैं ना, इसके कारण तुम्हें नहीं जाने देंगे।
प्रिंस - सच में नहीं जाने देंगे।
मैं - हां सच में‌।
प्रिंस - तो फिर मैं बाल कटवा लूंगा।
ऐसा बोलते ही वो खिलखिलाकर हंसने लग गया। 

Friday, 11 May 2018

Day -2 with prince



                                इसके घर का नाम प्रिंस है। ये आज फिर खींच के मुझे अपने घर ले जा रहा था। मैंने मना कर दिया। आज गार्डन में इसकी दादी नहीं आई थी लेकिन इसकी बड़ी बहन आराध्या साथ आई थी। आराध्या अभी 5th क्लास में है, बहुत ही तेज है। वो बोली कि भैया आपके बारे में न दादी मुझे बताई। जिस दिन आप दादी से, प्रिंस से, मम्मी से सब से मिले थे न उसी दिन घर में बात हुई। मैंने कहा अच्छा क्या बताई। दादी ने बताया कि एक भैया हैं कोई, यहाँ अभी कुछ दिन के लिए ही हैं, फिर चले जाएंगे। और आप अभी जहाँ रहते हो, पता नहीं क्या नाम बताई वहाँ गर्मी में भी कंबल ओढ़ना पड़ता है, बहुत ठंडा ठंडा होता है। और दादी बताई कि प्रिंस आपको अचानक ही देखकर आपके साथ खेलने लग गया था, और भी बहुत कुछ बता रही थी कि एक अच्छे अच्छे वाले ही भैया हुए आप, दादी वैसा ही कुछ कह रही थी पता नहीं, अभी आप मिले तो लग रहा जैसा दादी ने बताया बिल्कुल वैसे ही हो आप। आराध्या हंसते मुस्कुराते हुए एक कहानीकार की तरह ये बातें मेरे सामने मुझसे कह रही थी। मुझे ये जानकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि उस दस साल की लड़की को दादी ने जो भी बताया होगा मेरे बारे में, वो सब कुछ उसे मुंह जुबानी याद था, मुझे देखते ही वो लगातार बोलने लग गई।

गार्डन में आधा घंटा खेलने के बाद जब हम लौटे तो फिर से प्रिंस गार्डन से अपने घर के गेट तक मुझे खींचते ले गया। फिर वही रट लगाने लगा, घर चलो, घर चलो।
मैंने उससे आज कहा - क्यों। वजह बताओ।
उसने बड़े सरल भाव से कहा - ऐसी बैठना थोड़ी देर हम लोग के साथ।
मैंने कहा - लेट हो रहा है, कल आता हूं।
प्रिंस ने कहा - पानी ही पी लेना साथ में एक गिलास।
मैंने कहा - चलो कल आता हूं, दो गिलास एक साथ पी लूंगा, ठीक है।
इसके बाद वो मान गया।
मैं गार्डन के पास अपनी गाड़ी लेने गया, तब तक वे ऊपर अपने घर को जा चुके थे। बाइक आॅन करके जब मैं उनके घर से गुजरा तो आराध्या प्रिंस और उनकी मम्मी तीनों बाल्कनी में खड़े होकर हाथ हिलाकर अलविदा कर रहे थे, हां चिल्ला कर बाॅय बोलने वाला एक ही था; "प्रिंस"।

Friday, 4 May 2018

~ दो अजनबी ~


अभी कुछ देर पहले एक गार्डन में टहलने गया था, गार्डन में बहुत से बच्चे थे, उस गार्डन के गेट में जैसे ही घुसा वहीं मुझे एक बच्चा मिल गया जो पता नहीं क्यों मुझे देखते ही खुद ही मेरा हाथ पकड़ कर टहलने लग गया, अपना नाम खुद ही बताने लग गया। अपनी मां और दादी के साथ आया था लेकिन उनको पीछे छोड़ मेरे साथ तेजी से चलने लग गया। वो बच्चा चार साल का था, उस अनजान बच्चे को और मुझे मिले अभी तीस सेकेंड भी नहीं हुए थे और वो मुझे ये कहने लगा कि बोलो आप क्या खाओगे, आपके लिए घर में क्या बनवाऊं, चलो आप चलना मेरे साथ घर, हम दोनों साथ में खाएंगे। उसकी बातें सुनके मैं तो सोच पड़ गया कि ये क्या हो रहा है। वो बच्चा मेरे साथ खेलने लग गया, मैं जैसा करता वो भी वैसे ही देखकर करने लग जाता। मेरे साथ पुश अप्स करने लगा, दौड़ने लगा, दंड बैठक करने लगा, योगासन करने लगा। एक बार तो उछल कूद करते जोर से गिर भी गया, हाथ पांव छिल गये, लेकिन जैसे ही मैं दौड़कर उसके पास गया और उसकी आंखों में देखकर मुस्कुराया तो वो जो फूट-फूट के बस रोने ही वाला था, अब हंसने लग गया और अपना सारा दर्द भूल गया और फिर से मेरे साथ खेलने लग गया, गार्डन में यहाँ से वहाँ पकड़ पकड़ के मुझे ले गया‌‌। उसकी मम्मी और दादी भी बस एकटक देखते ही रह गये कि कैसे एक अनजान के साथ इतना घुल मिल गया है, मुझे भी बराबर हैरानी हो रही थी। एक बार वो एक मशीन को पकड़ के एक्सरसाइज कर रहा था फिर उसी समय मेरा एक फोन आया तो मैं जैसे ही थोड़ी दूर चलकर गया, उतने में ही उसने चिल्लाकर कहा कि मैं जब तक ये कर रहा हूं आप यहीं रहना पास, जबकि उसकी दादी वहीं पास में थी।
पूरे एक घंटे तक मैं उसके साथ रहा, चाह के भी उससे खुद को अलग नहीं कर पाया, उसने ऐसा होने ही नहीं दिया, उसकी सारी हरकतें देखकर ऐसा लग रहा था कि शायद मैं भी तो बचपन में ऐसा ही रहा होऊंगा।
जब हम गार्डन से जा रहे थे तो उसने अपनी मम्मी का हाथ पकड़ने के बदले मेरा हाथ पकड़ लिया, मैंने कहा कि चलो अब मैं जाता हूं, फिर भी वो नहीं नहीं करने लग गया, आखिर में वो मुझे अपने घर लेकर ही माना। उन्होंने मुझे चाय के लिए पूछा, चाय पीता नहीं इसलिए मैंने मना कर दिया, फिर पानी पी लिया, और कुछ देर बातें हुई। एक कहानी की तरह ये सब कुछ अपने आप हो रहा था। उस चार साल के बच्चे के हिसाब से ही तो हो रहा था ये सब, शायद हम उसी के इशारों में नाच रहे थे।
अब उसकी मम्मी ने मुझसे कहा कि पता नहीं आजतक किसी अनजान से इतना घुला मिला नहीं है, आज ऐसा क्या हुआ है इसे पता नहीं आपमें ऐसा क्या देख लिया इसने कि घर तक खींच लाया। वो बच्चा वहीं था, मैंने भी उससे पूछा कि कैसे मैं ही क्यों दिखा तुमको गार्डन में, और भी तो लोग थे, मेरा ही हाथ क्यों पकड़ लिये, मैं तुम्हें नुकसान पहुंचा देता तो, तुम तो मुझे जानते भी नहीं हो न, पहली बार मिले हो, उसने प्रतिक्रिया में बड़ी गंभीर मुस्कुराहट फेर दी, जिसे सिर्फ मैं ही देख पा रहा था, समझ पा रहा था‌। फिर उसकी दादी ने कहा कि बोल भैया अच्छे हैं क्यों इसलिए? तो उस बच्चे ने सर हिलाते हुए हां किया।
फिर मैंने थोड़ी देर बाद वहां से विदा लिया।
हमेशा की तरह मैं उन सभी लोगों के बारे में कुछ भी नहीं पूछा, उस बच्चे की तस्वीर तक नहीं ली, बस उसने अपना जो नाम शुरूआत में बताया था सम्राट वही याद है। कई बार हालात ऐसे होते हैं कि आप उसमें ऐसे खो‌ जाते हैं कि फिर आपको ये ख्याल ही नहीं आता कि आपको तस्वीर भी लेनी थी।
खैर....

अधिकतर ऐसा हुआ है कि जब मैं कुछ परेशान सा रहता हूं। जब मन में तरह-तरह के सवाल घूमने लग जाते हैं कि अब समय के मुताबिक तुम्हें भी ढल जाना चाहिए। ढोंग, स्वार्थ, लिप्सा, बाजारवाद आदि आदि गुणों का समावेश कुछ मात्रा में ही सही, कर लेना चाहिए, नहीं तो जीना दूभर हो जाएगा। जब-जब टूटने को होता हूं ढेरो सवाल मन में चलते रहते हैं और तब तब पता नहीं क्यों उसी वक्त ऐसे वाकये अनायास ही होते जाते हैं। मैं समझ नहीं पाता कि ऐसा कैसे होता है, क्यों होता है, किसलिए होता है, और मेरे साथ ही अधिकतर ऐसा कैसे हो जाता है। वैसे ये सब होने के बाद एक अच्छी चीज ये होती है कि मैं काफी हल्का महसूस करता हूं। ऐसा लगता है कि किसी ने मेरे अंदर तक पहुंचकर मुझे शांत करने की कोशिश की हो।

Thursday, 3 May 2018

क्या स्वच्छता को जीवन में उतारना सचमुच इतना आसान है?


                          इस झोले में सिर्फ प्लास्टिक की थैलियाँ हैं, कितनी थैलियाँ होंगी क्या मालूम लेकिन आज अचानक उठाकर देखा तो पता चला कि वजन 5 किलो से भी अधिक होगा। ये थैलियां मेरे द्वारा पिछले लगभग दस महीने में इकट्ठी की गई है। मैंने ऐसे ही‌ एक दिन सोचा कि अब से एक भी प्लास्टिक की थैली कहीं बाहर नहीं फेकूंगा, न ही कूड़ेदान में डालूंगा। शुरूआती कुछ दिनों में तो बहुत आसान लगा, लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि स्वच्छता को जीवन में उतारना वाकई बड़ी सजगता का काम है। यानि आप दिन भर से थक कर घर लौट रहे हैं तो भी आपको प्लास्टिक की थैली को अपने जगह रखना है, आपका मन ठीक है, शरीर ठीक नहीं है, फिर भी आलसीपन में प्लास्टिक की थैली इधर-उधर नहीं कहीं भी नहीं फेंक देना है‌, चाहे कैसी भी परिस्थिति आए आपको हमेशा अपना ये एक काम छोटा सा काम करते रहना है। कभी-कभी तो ऐसा हुआ कि जैसे अमूमन कपड़े धोते वक्त लोगों की जेब से कोई कागज का टुकड़ा या नोट निकलता है, मेरी जेब से अधिकतर प्लास्टिक की थैलियां निकल ही जाती। मैं जहाँ जाता, प्लास्टिक की थैली अगर मेरे इस्तेमाल में आती तो उसे अपने जेब में ही रख लेता और इस वजह से मुझे हंसी का पात्र बनना पड़ता, ऐसा कई बार हुआ लेकिन प्लास्टिक की थैलियां इकट्ठी होती रही। उन प्लास्टिक थैलियों में जो बहुत साफ सुथरी और अच्छी स्थिति में थी, मैंने उन्हें फोल्ड करके कुछ एक सब्जी बेचने वालों को देना शुरू किया, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि कुछ लोगों ने लेने से मना कर दिया, फिर कुछ लोगों ने भरोसा किया और ले लिया। महीनों गुजर गए, अब ये थैलियां इकट्ठा करना धीरे-धीरे मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया या यूं कहें कि आदत में ही शामिल हो गया है। मेरी देखादेखी में मेरे आसपड़ोस के भाई दोस्त यार भी कुछ हद तक ये काम करने लगे। कुछ एक दोस्त लोग सप्ताह भर तक थैली इकट्ठा करने के बाद कहते कि इससे कौन सा क्या हो जाएगा, और इसको इकट्ठा करके क्या कर लेंगे। मेरे पास ऐसे सवालों का एक ही जवाब है कि हमें अपने हिस्से के काम को करने के लिए बहाने तलाशना छोड़ देना चाहिए। हर चीज में क्या क्यूं कैसे की आदत छोड़ कुछ ऐसे काम इसलिए भी कर देने चाहिए ताकि हमें अपने इंसान होने का बोध होता रहे।