Friday, 11 April 2025

घर की आर्थिक जिम्मेदारी और महिलाओं की भूमिका

भारत जब डिजिटल हो रहा था तो उसके पहले के समाज और अभी के समाज में खाई जैसा अंतर है। यह तब की बात है जब 2008-09 के आसपास लगभग हर मध्यवर्गीय आम भारतीय घरों में नोकिया मोटोरोला के मोबाइल फ़ोन आने शुरू हुए थे। बहुत तेज स्पीकर वाले चाइनीज़ फ़ोन भी आए थे। भारत का समाज बदलाव की अपनी ऐसी करवटें ले रहा था जहाँ अब पीछे मुड़ कर देखने की मनाही थी। 2012-13 के बाद से सैमसंग के स्मार्टफोन आने शुरू हुए और एक तरह से डिजिटल भारत की दुनिया में यह बड़ा कदम रहा।

आज के समय में हमारे जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा स्मार्टफोन ने ले लिया है। हममें से कोई भी इससे अछूता नहीं है। चाहे शॉपिंग हो, बिल पेमेंट हो, किसी से कोई जरूरी बात कहनी करनी हो, मनोरंजन करना हो, ऑनलाइन व्यापार को ट्रैक करना हो या जुआ आदि हो। समय काटने का सारा इंतज़ाम फ़ोन पर उपलब्ध है। अब न तो मनोरंजन के लिए दोस्तों के साथ बैठने की बहुत अधिक ज़रूरत है ना ही जुआ खेलने जैसे कार्य के लिए चौपाल चाहिए।

स्मार्टफोन ने एक तरह से हमारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा हमसे छीन लिया है। निःसंदेह इससे हमारी ही सुविधा बढ़ी है लेकिन वही बात है जब बैठे-बैठे बहुत अधिक सुविधा मिलने लगे तो उसके दुष्परिणाम भी होते हैं। सोशल मीडिया से संचालित आज के इस युग में बच्चे से लेकर बूढ़ा हर कोई समय दान की इस बीमारी से ग्रसित है। जो जितना अधिक हो पा रहा है स्क्रीन को अपना समय दे रहा है। इसमें वैसे ग्रामीण परिवेश के पुरानी पीढ़ी के लोग कम है, इसका एक कारण उनका तकनीकी रूप से सक्षम नहीं होना है वरना वे भी इस अंधी रेस का हिस्सा जरूर बनते, दूसरा एक कारण यह भी है कि पुराने समय का व्यक्ति शारीरिक श्रम आधारित समाज में पैदा हुआ जहाँ सुबह से शाम कुछ ना कुछ करते रहने का फ़ितूर छाया रहता है। बहुत अधिक सुस्त होकर बैठने सोने की आदत उनकी नहीं रही है इस कारण से भी वे मनोरंजन के इन साधनों का सीमित उपयोग ही करते हैं। जैसे टीवी उनके लिए मनोरंजन हुआ करता है, उसकी जगह अब एक यूट्यूब नाम का विकल्प फ़ोन के माध्यम से उपलब्ध है, बस इतना ही अंतर है।

अब मूल बात यानी शीर्षक पर आते हैं। पहले के समय घर की दादी नानी या जो भी मुखिया हुआ करती। उनके हाथ में कमर में या कपड़े के एक छोटे से रूमाल में हमेशा चाबी का गुच्छा हुआ करता। घर की सभी बड़ी छोटी आर्थिक गतिविधियों का मैनेजमेंट वही देखा करती थी। उस समय की महिलाओं के साथ यह चीज़ हुआ करती कि वे फ़िज़ूलख़र्च ना ख़ुद करते थे, ना ही परिवार के किसी सदस्य को ऐसा करने देते थे। इस एक कारण से पूंजी का संचय हुआ करता था और आर्थिक स्तर पर कोई भी समस्या या आपातकाल वाली स्थिति निर्मित हो जाये, चीज़ें नियंत्रण में ही रहती थी। लेकिन अभी के समय में ऐसी दादियाँ ऐसी माताएं अब देखना दुर्लभ है। बहुत कम ही परिवार होंगे जहाँ अब दादी नानी साथ रहती हो, गाँव में ही यह थोड़ा बहुत बचा है। शहर में अगर साथ रहती भी है तो बिना किसी अधिकार के बेटे या बेटी के साथ उनके बच्चों का मन बहलाने के लिए एक सहयोगी की तरह ही रहती हैं। इस कारण से अब घर की समस्त आर्थिक जिम्मेदारियों का मैनेजमेंट इन नई लड़कियों के हाथों है। इन लड़कियों ने भले पैसे का संघर्ष देखा होगा लेकिन मितव्ययिता नाम की चीज़ क्या होती है, इन्हें इसकी बहुत अधिक समझ नहीं है या शायद यह भी है कि वह समझना ही नहीं चाहती हैं। पहले की महिलायें भले कभी स्कूल कॉलेज नहीं गई होंगी लेकिन पैसे के मैनेजमेंट की समझ उनकी अच्छी थी, सोचने का दायरा सीमित था तो एक ही फ्रेम में जीवन गुजर जाता था लेकिन अभी वह चीज़ बहुत कम हो गई है। इस कारण से पति-पत्नी में बहुत अलग-अलग तरह से झगड़े भी देखने को मिलते हैं क्यूंकि एक घर की अर्थव्यवस्था का संचालन करना इतना भी आसान काम नहीं है।

महिलाओं को चूँकि शुरू से पराये घर का धन माना गया। संपत्ति का अधिकार नहीं रहा इस कारण से कैसे भी करके बचत करते रहना उनके गुणसूत्र में रहता ही है। लेकिन डिजिटल युग आने के बाद के परिवारों को आप उठा के देख लीजिए, उन्हें पैसे की मैनेजमेंट की सही ट्रेनिंग शायद मिल नहीं पायी, साथ में परिवार के साथ दबकर रहने की बाध्यता भी हट गई, इस कारण से अकारण ही महिलायें अंधाधुंध खर्च करने लगी हैं। और घर के सारे सदस्य भी उसी राह पर चलने लगे हैं। पतियों पर भी ग़ज़ब का आर्थिक मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ा है। उन्हें नकारा दिखाया जाता है कि फलाने ने कार ख़रीद ली जमीन ख़रीद ली पत्नी के लिए सोना खरीदा इतने जगह ट्रिप में चले गए, आप तो ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे। जबकि इसके ठीक उलट ऑनलाइन शॉपिंग, कपड़े, घर के सामान आदि हर जगह बेफ़िज़ुल के खर्चे शामिल हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। क्यूंकि डिजिटल युग में आपको हर चीज़ झटके में सोशल मीडिया के माध्यम से दुनिया के सामने दिखाना है। पैसे जोड़कर इंसान जो कार या जमीन 10 साल में खरीदता आज उसे ख़रीद लेने का पागलपन बढ़ा है, तेज़ी बढ़ी है, अब उसे वही चीज़ 1 साल के अंदर चाहिए। इस कारण से व्यक्ति लोन लेता है, गृहिणी ख़ुद ईएमआई के लिए प्रोत्साहित करती है। यहीं सारा कुछ गड़बड़ होना शुरू होता है। मसलन घर के कुल मासिक आय का 40-50% हिस्सा तरह-तरह की ईएमआई में चला जाता है, उसके बाद के हिस्से को खाने के लिए महंगाई डायन है ही, बचा खुचा हिस्सा दिखावे वाला समाज छीन लेता है और आपके पास केवल घंटा बच जाता है। और यही घंटा गृह कलह के रूप में अनवरत बजता रहता है।

पितृसत्तात्मक समाज में घर की अर्थव्यवस्था का संचालन महिलाओं के हाथ में रहा है, क्यूंकि पुरुष इस एक मामले में उस तरह से परिपक्व नहीं रहते हैं, सीधे-सीधे यह भी कह सकते हैं कि पितृसत्तात्मकता के नशे में पुरुषों ने इस ओर कभी ध्यान ही नहीं दिया, इस कारण से महिलाओं के कंधे पर बड़ी जिम्मेदारी रही। लेकिन अभी के समय में जहाँ महिलायें खुल कर बोलना शुरू कर रही हैं, अपनी ख्वाहिशों को प्राथमिकता दे रही हैं, नौकरी से लेकर हर जगह अपना हस्तक्षेप बढ़ा रही हैं ऐसे में अगर वही इस चले रहे आर्थिक उत्पात से नजर हटा लें तो समाज का पतन होना तय है।

एक दूसरा मजबूत पहलू इसमें यह भी है कि इतनी पीढ़ियों से अपने कंधों पर घर की सारी जिम्मेदारियों का बोझ उठा रही महिलाओं ने अब कन्नी काटना शुरू किया है जहाँ वह अब भारमुक्त होना चाहती है, स्वतंत्र होना चाहती है और यह सही भी है, समाज को ख़त्म होना हो, हो जाए। महिलाओं की अपनी स्वतंत्रता उनकी अपनी ख्वाहिशें होम कर बनने वाला समाज कहीं से भी स्वस्थ समाज तो नहीं ही कहा जाएगा। आज महिलायें खुलकर अपने पतियों से कह रहीं हैं कि मैं घर का मैनेजमेंट अकेले नहीं देखूँगी, मेरी भी अपनी जीवन रुपी ख्वाहिशें हैं, तुम भाई रखो मेड/बाई। और ये माँ के हाथ के खाने का महिमामंडन बंद होना चाहिए। बच्चा घर लौटे तो माँ के हाथ के खाने के साथ बाई और बाप के हाथ के खाने को भी लालायित हो, मुझ अकेले पर सारी दुनिया की नैतिक जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। मुझे कहीं से भी सुपर वुमन या त्याग की देवी नहीं बनना है। पति बेचारा ऊहापोह में है, उसे समझ नहीं आ रहा है कि इस नवाचार को स्वीकारे करे भी तो कैसे, इस कारण से भी परेशान होकर आजकल पतियों को लाइव आकर आत्महत्या करना पड़ रहा है, तलाक के मामले बढ़े हैं, और इस सबका मूल यही है की महिलाओं ने खुली हवा में सांस लेना शुरू किया है। अब पूंजी से संचालित आज के समाज में देवतुल्य पुरुषों के पास अपना अहं त्याग कर जल्द से जल्द नौकरी करने और उसके बाद भी पैसे का मैनेजमेंट सीखने के साथ-साथ घर संभालने के अलावा और कोई विकल्प बचा नहीं है।

Saturday, 1 March 2025

अतिरेक करने वालों का बोलबाला

चाहे कुंभ हो या हो केदारनाथ,

काशी हो या वृंदावन,

या हो मनाली या लद्दाख,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

आस्था के पीछे तर्क देने वाले,

और आस्था का मजाक उड़ाने वाले,

दोनों कर रहें हैं धींघामुस्ती,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

नुक्कड़ में चिल्लाने वाले,

टीवी में बकबक करने वाले,

सभी लड़ रहे अपने हिस्से का युद्ध,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

उसने अपने भीतर नहीं झांका कभी,

ना कभी दूसरे के अच्छे पहलू को देखा,

मन मस्तिष्क में लड़ते रहने का छाया है फ़ितूर,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

ख़ुद के पैरों में लगी है बेड़ियाँ,

लेकिन दूसरे की हथकड़ी का उड़ाता है मजाक,

शासित शोषित दोनों खड़े हैं कतार में,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

दिन रात जुबानी तलवार चलाने वाले,

कर देते हैं एक बड़ी आबादी को ख़ामोश,

चुपचाप तमाशा देखिए,

हर जगह अतिरेक वालों का बोलबाला है।

Wednesday, 5 February 2025

बात निकली चॉकलेट की -

सोशल मीडिया में अपने छोटे मोटे सुख-दुख को बांटते हुए हम आम भारतीयों में से लगभग हर किसी को इस फ्रिज के बारे में पता होगा। यह डिब्बेनुमा फ्रिज जो लगभग हर छोटे बड़े परचून/किराने की दुकान में देखने मिल जाता है, इसमें बहुत से अलग-अलग ब्रांड के चॉकलेट रखे जाते हैं, अमूमन 5 रुपए से लेकर 100 रुपए तक के चॉकलेट रहते हैं, इन सारे चॉकलेट्स के विज्ञापन बड़े-बड़े सेलिब्रिटी दशकों से करते आ रहे हैं। इस कारण से इन चॉकलेट्स की बड़ी खेप भारत के आम लोगों तक पहुँचती है, हममें से लगभग हर किसी ने खाया ही होगा। दोस्त यार को तोहफ़े में भी हम दशकों से यही सब देते आ रहे हैं। “ कुछ मीठा हो जाए “ की तर्ज़ पर अमिताभ बच्चन जैसे सेलिब्रिटियों ने एक तरह से चॉकलेट को मीठे का पर्याय बना दिया जबकि चॉकलेट उस तरह से मीठे और सुगर वाली श्रेणी में नहीं आता है।

अब मुद्दे की बात यह है कि ये सारे चॉकलेट निहायती कूड़ा हैं, जिससे शरीर को कुछ भी नहीं मिलता है। निःसंदेह इनके बनने में एकदम घटिया स्तर के कोको और नाना प्रकार के आर्टिफीसियल फ्लेवर का इस्तेमाल किया जाता है, तभी इनमें चॉकलेट के नाम पर केवल एक ख़ास तरह का स्वाद होता है। यही फार्मूला सेलिब्रिटी द्वारा प्रचारित किए जा रहे बहुत से दैनिक जीवन के उत्पादों पर लगाया जा सकता है।

चॉकलेट की असली पहचान क्या है, उसका एहसास क्या होता है, इसे समझने के लिए सन् 2000 में बनी चॉकलेट फ़िल्म को देखना चाहिए। फ़िल्म में एक महिला और उसकी बेटी फ्रांस में एक रूढ़िवादी गाँव में चॉकलेट की दुकान खोलती हैं, जिसे वहाँ के ग्रामीण स्वीकार नहीं करते हैं। लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ वे लोगों का दिल जीतती हैं और उनकी परेशानियों में उनकी आर्थिक मदद भी करती हैं। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ वे अपने घर में हाथ से बनाए चॉकलेट के दम पर करती हैं। जो कोई भी विरोध करते वे सबको मुफ्त में चॉकलेट खिलाया करती हैं, चॉकलेट खाकर ही वे उनके प्रशंसक बन जाते हैं। किसी की तबीयत ठीक नहीं है उसे भी एक ख़ास तरह का चॉकलेट दे देती है जो तुरंत उनकी तबीयत ठीक कर देता है। यह सब कुछ उनके बनाये चॉकलेट के दम पर होता है।

कुछ समय पहले विदेशी ब्रांड की चॉकलेट लगातार खाने के बाद समझ आया की असल मायनों में चॉकलेट होता क्या है। चॉकलेट कम अधिक इनो की तरह होता है, वही 6 सेकंड में काम करने वाला इनो जिसे भारत का समाज एसिडिटी भगाने के लिए कम और इडली बनाने के लिए अधिक इस्तेमाल करता है। असल में चॉकलेट खाते ही आपका मूड बहुत बढ़िया हो जाता है, मिनट भर के अंदर ही एक हल्कापन महसूस होता है क्यूंकि अच्छा चॉकलेट तुरंत अच्छी मात्रा में सेरोटोनिन और एंडोर्फिन स्रावित करता है। लेकिन ख़राब और घटिया क्वालिटी के कोको से बने चॉकलेट में सिर्फ़ आर्टिफीसियल फ्लेवर ही मिलता है जिससे आपको केवल घंटा मिलता है।

Sunday, 2 February 2025

सरकारी कर्मचारी अधिकारी दिखने में अच्छे क्यों नहीं होते हैं ?

एक अधिकारी दोस्त ने कुछ समय पहले घोर निराशा जताते हुए मुझसे पूछा कि ये सरकारी अधिकारी लोग अच्छे क्यों नहीं दिखते हैं? कुछ एक अपवाद छोड़ दें तो एक भी इंसान ढंग का नहीं। ना कोई पर्सनैलिटी, ना ही पहनावे का ढंग, सब एक जैसे ही निष्प्राण से लगते हैं।

इसके बहुत से कारण हैं -

1. आप किसी पद पर हैं, आपको हमेशा इस बात का ध्यान रखना होगा कि दिखने में आप अपने सीनियर अधिकारी से बड़े और बेहतर ना लगें, वरना उसका अहम हावी होने लगेगा। इसलिए एक तहसीलदार स्तर का व्यक्ति कभी एसडीएम और कलेक्टर के स्तर के कपड़े जानबूझकर नहीं पहनता है जबकि पहन सकता है। अगर पहन भी ले तो उसे असहज महसूस कराया जाएगा, व्यवस्था ऐसी है कि वह ख़ुद भी असहज महसूस करेगा। आप यहीं से ख़ुद को छोटा करते हैं, आप क्या करते हैं, व्यवस्था ही कर देती है।

2. भोजन के तौर तरीकों की भी बड़ी भूमिका होती है। लगभग हर सरकारी विभाग और उसके कर्मचारी अधिकारी मीटिंग और छुटपुट पार्टी के नाम पर समोसे और चाय से ऊपर सोच नहीं पाते हैं। चाय समोसे पर ही दोस्ती यारी होती है, चर्चाएं होती है। इस वजह से भी कोई क्लास डेवलप नहीं हो पाता है। दूसरा एक पहलू इसमें यह भी है कि आपके चारों ओर नाना प्रकार के बागड़बिल्ले होते हैं तो आप चाहकर भी ऊँचा नहीं सोच सकते, आपको सामूहिकता का ध्यान रखना होता है। तो आप जैसा खाते हैं, आपकी सोच भी वैसी होने लगती है, आपका ढाँचा भी वैसे ही ढल जाता है, आप अलग नहीं दिखते हैं।

3. चर्चा विमर्श के नाम पर किसने कहाँ जमीन ख़रीदी, कौन सी गाड़ी ख़रीदी, कौन सा लोन लिया, यही चलता है। फ़िल्म मनोरंजन के नाम पर भी वही बॉलीवुड और साउथ की बात चलती है। कभी आप नहीं सुनेंगे कि कोई किताबों पर बात करे या किसी थिएटर या आर्ट फ़िल्म को लेकर कोई चर्चा हो। तो इंसान जैसा देखता है, वैसा होने लगता है।

4. सरकारी विभाग में आदमी समाज के हर तबके से मुखातिब होता है। अमीर ग़रीब हर कोई टकराता है। ऐसी स्तिथि में समाज के हर पहलू, उससे जुड़े लोक व्यवहार के तरीक़ों और विद्रूपताओं से आए दिन दो-चार होने की वजह से आपके भीतर भी थोड़ा सा प्रभाव आ ही जाता है। वैसे भी हर कोई कहीं ना कहीं लूट रहा है, ऐसे में व्यवस्था के साथ रहने की इतनी क़ीमत तो चुकानी ही पड़ती है।

5. सरकारी दफ़्तर में नाम से अधिक सरनेम की पूजा होती है, आपको आपके सरनेम से ही पुकारा जाता है, आपके जॉइनिंग के दिन से आपका जाति गोत्र खंगाला जाता है, आपको ऐसे ही लोगों के बीच खपना होता है। आप भी जुगाड़ के नाम पर अपना जात भाई खोजने लगते हैं। कुल मिलाकर भारतीय समाज के कटु यथार्थ को एकदम निचले स्तर तक सरकारी दफ्तर में आप आए दिन महसूस कर सकते हैं। ये सब संगत में आप रहते हैं तो आपका भी दिमाग भ्रष्ट होता है, आप बहुत दिन तक अप्रभावित नहीं रह सकते हैं, वैसे भी व्यवस्था की एक ताक़त है कि वह बिना पता चले ही लोगों को अपने भीतर अवशोषित कर लेती है, इसलिए थोड़ी बहुत कीचड़ की छींटें आप तक भी आती है।

6. सरकारी तंत्र में आपकी योग्यता और आपके काम की गुणवत्ता से कहीं अधिक बड़ा गुण जी हुजूरी करने को माना जाता है। इस कारण से आपसे बेहतर काम की अपेक्षा ना होकर हमेशा औसत काम की अपेक्षा रहती है। अहम संतुष्ट करना काम को बेहतर ढंग से करने से बड़ा ध्येय माना जाता है। इसलिए ठेके में लिए गए काम की तरह आपको एक काम को पकड़ के धीरे-धीरे अलादीन के चिराग की तरह घिसते रहना होता है। आप जल्दी करके देंगे तो आपका भयानक शोषण होगा, इसलिए जानबूझकर आपको अपनी गति धीमी करनी होती है, इससे आपकी मेधा, क्षमता और उत्पादकता कम होती है। इस कारण से भी लोग निष्क्रिय उबाऊ होने लगते हैं।

7. सरकारी विभाग यानी पॉवर। आपके पास जब पॉवर होता है, खासकर एक इंसान होने के नाते जब आप एक किसी दूसरे इंसान के जीवन के छोटे से पहलू को भी प्रभावित करने की ताक़त रखते हैं, ऐसी स्तिथि में आपके भीतर एक अजीब किस्म का अक्खड़पना हावी होने लगता है। इंच मात्र ही सही मैं ही सर्वे सर्वा हूँ, मैं ही इष्ट हूँ, भगवान हूँ, यह वाला भाव जब आपके भीतर आता है तो आपको ना तो अच्छा दिखने की ज़रूरत महसूस होती है, ना ही आपको अपनी पर्सनैलिटी का ध्यान रखना बहुत बड़ी चीज़ लगती है। क्यूंकि इसके बिना भी आपका खूब डंका बजता है, आपको पूजा जाता है। इसलिए भी अधिकतर लोगों का स्किलसेट सरकारी व्यवस्था में जाते ही खत्म होने लगता है।

ऊपर लिखित बातों में ही इंसान इतने बुरे तरीके से फँसा रहता है कि उसके लिए ख़ासकर अच्छे कपड़े पहना, अच्छा स्मेल करना, अच्छा दिखना यह सब चीज़ें गौण हो जाती है। और पितृसत्तात्मक समाज होने की वजह से यह दरिद्रता पुरुषों में अधिक दिखाई देती है।

कुंभ की भगदड़ के लिए दोषी कौन ?

हर चीज़ को इवेंट और ट्रेंडसेटर के रूप में तब्दील करने के परिणाम भयावह ही होते हैं। और यह सिर्फ़ कुंभ जैसे मेगा इवेंट पर लागू नहीं है।

पिछले 4-5 सालों में मुझे अधिकतर लोगों ने घूमने फिरने वाले मामलों का ज्ञाता समझकर सबसे ज़्यादा एक ही सवाल पूछा कि क्या मैं केदारनाथ गया हूँ? उससे पहले लद्दाख शिमला मनाली का पूछा करते थे। इन सब के पीछे का अपना मनोविज्ञान है। असल में इंसान जो पहली नजर में देखता है, उसका पूर्वग्रह उतने तक ही उसको सीमित कर देता है। उसके आगे भी जहां है यह वो सोच नहीं पाता है।

उदाहरण के लिए 3 इडियट्स जैसी फिल्मों ने लद्दाख का भूसा बनाया, हर किसी को मोटरसाइकिल से लद्दाख जाने का भूत सवार हो गया। ये जवानी है दीवानी फ़िल्म ने हर नए नवेले शादी शुदा जोड़े को मनाली तक पहुँचाकर ही दम लिया। इसी तरह केदारनाथ फ़िल्म ने एक अलग ही विचित्र किस्म के भक्त पैदा किए जिन्हें ख़ुद भी नहीं पता कि वे क्यों ही केदारनाथ जाना चाहते हैं। मैं इनमें से मनाली के अलावा कहीं नहीं गया हूँ, मनाली भी बस गलती से बर्फबारी के नाम से चला गया था, वरना वहाँ भी ना जाता। इन जगहों की आत्मा को मार दिया गया है।

कुम्भ में भी यह हुआ, पागलपन की हद तक जाकर प्रचार किया गया और उसमें भी संख्या बल और सुविधाओं का भोंडा शक्ति प्रदर्शन किया गया। बस लोग बड़ी संख्या में पहुँच गए और हज़ारों की संख्या में भगदड़ में मारे गए। इसमें आप कहीं से भी लोगों को दोष नहीं दे सकते हैं, आप जैसा माहौल बनायेंगे, जो चीज़ें आप परोसेंगे, लोग उसी का उपभोग करेंगे। अगर इसमें कोई दोषी है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रशासन है।

आजकल ये अतिरेक हर जगह हो रहा है। इस कारण से भी बहुत से सुलझे हुए लोग अब घूमना बंद करने लगे हैं। इस वजह से मैं भी भारत घूमकर आने के बाद 1-2 साल कहीं भी नहीं गया, शांत बैठा रहा, इच्छा ही नहीं हुई। अभी पूर्वोतर से आने के बाद भी पिछले 1 साल से कहीं भी नहीं गया हूँ। दोस्त लोग भी अब पूछ-पूछकर थक चुके हैं, अब उन्होंने भी घूमने जाने के लिए पूछना छोड़ दिया है। अभी जैसा समय चल रहा है उसमे तो कहीं ना घूमने में ही सच्चा सुख है। ज़्यादा बैचैनी हो तो दोस्तों से मिलिए, फ़िल्म देख आइए, घर पास के नदी तालाब जंगल झील झरनों आदि में ही सुख ढूँढने की कोशिश कर लीजिए, वरना बाजार आपको ऐसे ही इधर से उधर उठा-उठा के पटकता ही रहेगा।

Tuesday, 28 January 2025

मुकेश सुरेश और बस्तर की राजनीति -

पत्रकार मुकेश चंद्राकर का एक अपराधी आज दुनिया के सामने है, जिसे आप और हम सुरेश चंद्राकर के नाम से जानते हैं। असल में सुरेश चंद्राकर का क़द बहुत बड़ा हो गया था। हर तरफ़ उसकी पकड़ मजबूत होती जा रही थी। कांग्रेस के समय भी मोटी फंडिंग किया था, अब भाजपा के समय भी इसने अपना वर्चस्व बना लिया। पूरे बस्तर अंचल में इसके बराबर का मजबूत नेता कोई नहीं था।

अब इस उभरते नेता को किनारे करना था तो जिस घटना की रिपोर्टिंग एनडीटीवी के माध्यम से हुई, जिसमें मुकेश केवल स्ट्रिंगर था। मुकेश तो इसमें प्रत्यक्ष रूप से था ही नहीं। लेकिन उसे फँसाया गया क्यूंकि जाना पहचाना चेहरा है और साफ़ बेदाग़ छवि का है।

मुकेश को सुरेश की अनुपस्थिति में उसी के एक घर में मारना, मारने के बाद सेप्टिक टैंक में दफ़न करना और पुलिस को मारने के तुरंत बाद पता भी चल जाना। और तो और मुकेश के शरीर में भयानक चोट मिलना, शरीर की हड्डियां तोड़ना, लिवर और गले की हड्डी तक तोड़ना आदि। यह सारी बातें इशारा करती हैं कि इस कहानी की स्क्रिप्ट बहुत अच्छे से तैयारी के साथ लिखी गई है। और इस पूरे घटनाक्रम की ये स्क्रिप्ट भी इतनी कमजोर है कि एक दसवीं पास छात्र भी डिकोड कर लेगा। मुझे लगता है थोड़ा इनको रशियन माफियाओं से क्राइम सीन के शुरुआती दाँव पेंच सीखने चाहिए।

वैसे इसमें टारगेट तो मुकेश को भी किया ही गया है चाहे एक तीर से दो निशाने मारने को किया हो और मुकेश को बेरहमी से मारकर दुनिया के सामने यह कहानी पेश किया गया कि एक बेरहम ठेकेदार ने बुरी तरह से एक ईमानदार पत्रकार को मार दिया। जबकि कहानी कुछ और ही है। और सबसे मजे की बात सुरेश के ख़िलाफ़ केवल एक ही सबूत है कि उसके घर में पत्रकार को मार दिया गया, पूरी कहानी ही फिल्मी है।

असल में सुरेश के बढ़ते क़द को कम करने के लिए, दुनिया के सामने उसे एक कुख्यात अपराधी बनाने के लिए बड़े सुनियोजित तरीक़े से उसी के घर में एक ईमानदार पत्रकार को मारा गया, जो केवल एक अप्रत्यक्ष रिपोर्टिंग के माध्यम से जुड़ गया, उसे ही आधार बनाकर सुरेश को टारगेट किया हुआ है। इस पूरी घटना के केंद्र में सुरेश है, जिसे अपराधी बनाने के लिए मुकेश को चारे की तरह इस्तेमाल कर लिया गया।

एक तीर चला और तीन निशाने हो गए। खोजी पत्रकारिता कर बेईमान लोगों के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला मुकेश हमेशा के लिए शांत हो गया, बस्तर अंचल का स्थानीय व्यक्ति जिसका क़द राजनीति से लेकर पूरी व्यवस्था में बड़ा होता जा रहा था, उसे रातों रात दुर्दांत अपराधी बना दिया गया, तीसरा यह कि बस्तर में बाहरी लोगों के आतंक के लिए रास्ता साफ़ हो गया।

नोट : ये बातें कोई पत्रकार टीवी कभी दिखाएगा भी नहीं, सबको अपना घर परिवार देखना है।

सूली पर चढ़ाओ -

जब भी होता है कोई अपराध

न्याय की देहरी माँगती है सूली।

बताए कोई सुझाए कोई

कि कितने गर्दनों को देंगे सूली।

अगर सूली पर चढ़ाना ही न्याय है

अगर इस तरह से मौत देना न्याय है

अगर इसी से न्याय का होना माना जाता है

तो यह न्याय सबके लिए होना चाहिए।

चढ़ाइये सूली पर उस नेता को,

जिस तक टेंडर के पैसे का मोटा हिस्सा जाता है।

चढ़ाइये सूली पर उस जिलाधीश को,

जिसने सबका प्रतिशत तय किया।

चढ़ाइये सूली पर उस विभागीय अधिकारी को,

जिसने प्रोजेक्ट तैयार कर पूरा बंदरबाँट किया।

चढ़ाइये सूली पर उस सरकारी बाबू को भी,

जिसने भ्रष्टाचार का नोटशीट तैयार किया।

चढ़ा दीजिए सूली पर उन सभी लोगों को,

जो इस समाज में हत्यारे तैयार करते हैं,

जो इस समाज को हिंसक बनाते हैं,

जो देश समाज को रहने लायक़ नहीं छोड़ते।

बस्तर के जंगल आदिवासी समाज और नक्सलवाद

भारत के लगभग हर राज्य में आदिवासी रहते हैं। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो आधे से अधिक आबादी में आदिवासी रहते हैं। लेकिन भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में बस्तर का इलाका ही नक्सलियों ने क्यों चुना। इसके बहुत से कारण सुनने में आते हैं। पहला यह कहा जाता है कि यह जंगल बहुत घना है, ट्रैक ट्रेस करने में मुश्किल होती है इसलिए नक्सलियों ने अपना ठिकाना यहाँ जमाया। जहाँ तक घने जंगल की बात है तो पूर्वोत्तर के जंगल और पश्चिमी घाट के जंगल के सामने बस्तर कुछ भी नहीं है। दूसरा कारण भूगोल का बताया जाता है कि ओडिशा, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र इन तीन राज्यों से सीमा है, तो धरपकड़ में दिक्कत होती है। मुझे इस कारण में भी कोई ख़ास दम नजर नहीं आता है। क्रॉस बॉर्डर फोर्स बनाकर आसानी से इस काम को अंजाम दिया जा सकता है बशर्ते अगर सचमुच करने की इच्छाशक्ति हो तब, और नहीं करना है तो बहुत ख़ूबसूरत बहाने हैं।

बस्तर के आदिवासियों में और यहाँ के जंगल में ऐसा क्या है कि दुनिया जहाँ की सरकारें, एनजीओ, समाजसेवी और पत्रकार ये सभी कोई हाथ धोकर लगा हुआ है बस्तर के जंगलों की रक्षा और बस्तर के आदिवासियों का भला करने के लिए। असल में इनमें से किसी को भी ना बस्तर के जंगलों से मतलब है ना ही यहाँ के आदिवासियों से है। आदिवासी पूरे देश में हैं लेकिन अधिकतर लोगों को बस्तर का ही राग क्यों अलापना होता है इसके पीछे गहरे कारण है जिसके लिए तीन चार दशक पीछे जाकर चीज़ों को देखने की जरूरत है।

असल में 70 के दशक में नक्सलबारी से शुरू हुआ आंदोलन जिसका मकसद था बड़े जमींदारों से जमीन छीनकर किसानों और भूमिहीन मजदूरों में बराबर बांट देना। एक तरह से इसके मूल में कृषि सुधार ही था, वो बात अलग रही कि तरीका बहुत हद तक हिंसक था। लेकिन 80 के दशक में यह आंदोलन तो बस्तर आकर पूरी तरह ही बदल गया। ये कुछ वैसा ही था जैसे अन्ना आंदोलन को अपने हित साधने के लिए केजरीवाल ने पार्टी बनाकर इस्तेमाल कर लिया। ठीक इसी तरह नक्सलवाद नाम का दंश बस्तर को 1980 के दशक में मिला, जिसका मूल उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ अपने हितों को साधना था। लेकिन तब बस्तर जैसे दुर्गम इलाके में नक्सलवाद के इन सिपाहियों को ऐसा क्या दिख गया था।

1980 के दशक तक खनन नीतियाँ बहुत कठोर हुआ करती थी। तब क्या मालूम बस्तर की ओर शासन का उतना ध्यान भी ना गया हो। उसी समय से ही नक्सलियों ने इन इलाकों में अपनी पैठ बना ली। वे दूरदर्शी थे, उन्हें पहले से पता था कि बस्तर गोंडवानालैंड का ऐसा इलाका है जहाँ प्राकृतिक संपदा प्रचुर मात्रा में है, और आज नहीं तो कल इसके लिए बंदरबाँट होना ही है। इन सब चीज़ों को देखते हुए उन्होंने पहले ही अपने पैर जमा लिए, और अभी तक जमाए ही हुए हैं, और बैठ कर बढ़िया मिल-जुलकर केवल हिस्सा खा रहे हैं। इन गुजरते सालों में नक्सलियों ने अपना हिस्सा पक्का करने के नाम पर, अपनी दुकान चलाने के नाम पर बस्तर के आम लोगों को यानी आदिवासियों को सिवाय खून-खराबे और दुख तकलीफ़ के और कुछ भी नहीं दिया है। खैर सरकार का भी कुछ-कुछ यही हाल है।

जैसे-जैसे देश दुनिया के सामने बस्तर का नाम आने लगा। लोगों को दिखने लगा कि यहाँ तो अकूत पैसा है। इतने खनिज, इतने अयस्क, सरकार से लेकर पत्रकार समाजसेवी आदि ये लोग, इन सबकी आँखें चौंधिया गई। सबके बीच इसे लेकर गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो गई, जो आज भी बदस्तूर जारी है और आगे भी जारी रहेगी। जब तक बस्तर की पूरी प्राकृतिक संपदा का दोहन नहीं हो जाता है तब तक खून की नदियाँ बहती रहेंगी और इंसानी लालच की वजह से मानवता शर्मसार होती रहेगी।

आज अगर सरकार बस्तर के सुदूर इलाकों तक सड़क पहुँचा रही है, सुरक्षा के लिए लगातार आर्मी के कैम्प लगा रही है , इसके पीछे सरकार की लोककल्याण की भावना कतई नहीं है, बल्कि इन जंगलों से पहाड़ों से अपने काम की चीज़ें हासिल करना है। और इन सब के लिए आर्मी की मदद लेना बेहद जरूरी है क्यूंकि नक्सली पहले ही हिस्सा लेने के लिए घात लगाए बैठे हैं कि एक हिस्सा हमें भी देते चलो।

देश दुनिया का रुझान बस्तर को लेकर बढ़ रहा है। जो बस्तर प्रकृति पूजा किया करता, देश दुनिया के अजीबोगरीब नियम धरम से दूर रहा, वहाँ चुपके से अलग-अलग भगवान पहुँचाये गए, ढोलकल गणेश उसकी ही एक बानगी है। कभी-कभी सोचता हूँ कि काश बस्तर अंचल में इतने खनिज ना होते, लोगों का जीवन बड़ा सुखमय रहता। आज “ राम नाम की लूट मची है लूट सके तो लूट “ की तर्ज पर हर कोई बस्तर को नोच लेना चाहता है। चाहे पत्रकार और समाजसेवी हों, सरकार हो, नक्सली हों, हर कोई अपने हिस्से के लिए धींगामुस्ती कर रहे हैं। और इन सबमें लगातार बस्तर का आम आदिवासी पीस रहा है। कुछ इस तरह बस्तर का खनिज आज यहाँ के आम लोगों के लिए ही अभिशाप बन चुका है।

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पत्रकार मुकेश चंद्राकर को समर्पित

देश में हर कोई आजकल ऊँचा बोलता रहता है, ख़ासकर पत्रकार तो लाउड ही हो चुके हैं, आवाज से भी और अपने तौर तरीकों से भी, पेशे ने ऐसा ही बना दिया है उनको।

लेकिन मुकेश चंद्राकर जिन्हें विगत दिनों में एक ठेकेदार ने मौत की नींद सुला दिया, वह बहुत ही अलग रहा। एक दिन ऐसे ही गलती से यूट्यूब में उनकी वीडियो देखा और दो चार वीडियो देख गया। उनकी आवाज में पता नहीं कैसे वो शोर वो कोलाहल नहीं था, बंदा बड़े आराम से बात करता था, दूसरा पहलू ये कि आवाज में किसी भी प्रकार की बनावट नहीं थी, कृत्रिमता नहीं थी, आज के समय में ये वाक़ई दुर्लभ है।

छत्तीसगढ़ राज्य में वैसे भी सलीके के पत्रकार हैं नहीं, ऐसे में मुकेश का जाना और खल गया, उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता लेकिन उनकी आवाज हमेशा याद रहेगी। अगर छत्तीसगढ़ के लोगों की आवाज कैसी है, उसकी खनक कैसी होती है, उस आवाज की पवित्रता और कोमलता क्या है उसे महसूस करना हो तो मुकेश को एक बार सुना जाना चाहिए।

मृत्यु के ठीक पहले शायद इंसान बहुत कुछ महसूस कर लेता है, देखिए मुकेश ने 20 दिसंबर को अपने आख़िरी फ़ेसबुक पोस्ट में यह लिखा था -

बस्तर, वो कैनवास जिस पर कुदरत ने अपने सबसे सुंदरतम हिस्से को उकेर दिया है और एक प्रश्न स्वर्ग सी सुंदर इस ज़मीन पर सर उठाए पूछता है ;

"सीधे मौत की सज़ा देते हो, वजह क्या है?

मुझे बताओ तो सही, मेरा गुनाह क्या है?"

बहुत ही निर्भीक, जीवट और जुनूनी व्यक्ति रहा मुकेश। उसकी रिपोर्टिंग देखने पर ही समझ आता है कि खूब जोखिम उठाता था। जब भी कोई रिपोर्टिंग करता तो ऐसा लगता जैसे उसका हिस्सा बन गया हो, जैसे उनके बीच का ही कोई व्यक्ति कहानी सुना रहा। अंतिम छोर तक जाकर लोगों के दर्द को उनकी पीड़ा को गला भरते तक महसूस करता था और उसे ही जस का तस लोगों तक पहुंचाता था। कितना सरल, कितना सहज, इतना निश्चल, निष्कपट और असामान्य। उसके चेहरे की भाव भंगिमा बोलती थी और उसके भीतर के अटूट मानवप्रेम को सहज ही सामने ला देती थी।

जीवन के प्रति अपार प्रेम से भरा भूरा था मुकेश, शायद इसलिए भी वह व्यवस्था की क्रूरता को समझ नहीं पाया और ऐसी घटना का शिकार हो गया और हम सब के कंधों पर हमेशा के लिए एक बोझ दे गया, बोझ इस व्यवस्था के चरम घिनौनेपन का, जिसकी नींव को हम ही आए दिन खामोश रहकर मुंह मोड़कर मजबूती देते रहते हैं।

एक ऐसे समय में जहाँ हमने दुखों को महसूस करना ही छोड़ दिया है, कोई दुर्घटना हो, मृत्यु हो, अपराध हो, हमें महसूस ही नहीं होता है, हम ना जाने किस अंधी दौड़ में लगे हैं कि किसी की मौत भी हमें हिला नहीं पाती है, ऐसे समय में मुकेश जैसे जिंदादिल लोगों के बारे में बताना, उसे दर्ज करना बेहद जरूरी है।

मुकेश हमेशा अपने नाम के अर्थ को चरितार्थ करता था। बतौर स्वतंत्र पत्रकार वंचित पीड़ित लोगों के लिए एक दुःखहर्ता की तरह था, बस्तर के गुमनाम लोगों की आवाज था वो। छत्तीसगढ़ में इस जैसा पत्रकार ना हुआ ना होगा।

मुकेश शायद जानता ही होगा कि व्यवस्था ऊपर से नीचे कैसी है। 120 करोड़ के रोड के ठेके में बरती गई अनियमितता को लेकर रिपोर्टिंग की उसके बाद से उस टेंडर को लेकर जाँच बैठ गई थी। यानी मुकेश यहाँ न्याय का पहरुआ तो बना ही लेकिन सीधे-सीधे ठेकेदार का आर्थिक नुक़सान करने वाला व्यक्ति बन गया। मुकेश चाहता तो बाक़ी और पत्रकारों की तरह कुछ पैसे लेकर शांत बैठ जाता और अपना रूटीन काम करता, लेकिन उसके भीतर पूरी व्यवस्था को ठीक करने की सनक थी।

जिस व्यवस्था के सामने आज रोकर चीखकर हाथ जोड़ते हुए उसका परिवार उसके लिए न्याय माँग रहा है, उसी व्यवस्था ने मुकेश के क़ातिलों को टेंडर जारी किया और मुकेश ने उसकी गड़बड़ी पर रिपोर्टिंग की। जो भी अपराधी हैं, उस जैसे ठेकेदार लोग हर गली मुहल्ले कस्बे जिले में होंगे जिन्हें आप हम आए रोज देखते हैं। जिनकी पहुँच व्यवस्था के सर्वोच्च पायदान तक होती है, आख़िर आप कितनों से लड़ लेंगे, कितनी ही व्यवस्था बदल लेंगे।

120 करोड़ की सड़क का काम 56 करोड़ में होने की बात आई और उसमें भी ख़राब गुणवत्ता रही। बाक़ी 64 करोड़ क्या सिर्फ़ उस क़ातिल ठेकेदार के पास गया होगा, अजी बिल्कुल नहीं। एक हिस्सा सीएम हाउस गया होगा, एक हिस्सा लोक निर्माण विभाग का मंत्री, एक हिस्सा स्थानीय विधायक सांसद आदि, एक हिस्सा जिलाधीश, एक हिस्सा पीडब्ल्यूडी के उच्चाधिकारी, एक हिस्सा ठेकेदार और बाकी बचा खुरचन निचले पायदान के लोग। इसमें आप किस-किस से लड़ लेंगे, इसका फैसला आप ही करिए क्यूंकि ये जालिम व्यवस्था ऐसी ही है और ऐसी ही रहेगी। ठेकेदार को हम सूली पर चढ़ा कर न्याय की इतिश्री कर लेंगे लेकिन जो मोटा हिस्सा ऊपर तक दर्जनों लोगों तक गया, जिस व्यवस्था ने अंतिम पंक्ति के ठेकेदार को इस भ्रष्टाचार का केंद्र बिंदु बना दिया उन पर कभी कोई सामाजिक कार्यकर्ता कोई पत्रकार बात नहीं करता है, क्यूंकि उसके लिए रीढ़ चाहिए होती है जो किसी के पास है नहीं।

मुकेश के आख़िरी फ़ेसबुक पोस्ट जिसमें वह “सीधे मौत की सजा देते हो” ऐसा कह रहा है, वह शायद इस सच को पहले ही देख चुका था कि उसने अपने लिए मृत्यु को चुना है। मुकेश शायद इस सच के सामने टूट चुका होगा कि कोई उम्मीद की किरण दिखती ही नहीं, जो रसूख वाला है, उसी का राज है, वह जैसा चाहे वैसे व्यवस्था को नचा सकता है, ऐसे में इंसान के पास मरने के अलावा और क्या ही विकल्प बचता है। जिद से भरे मुकेश ने भी सोचा होगा कि अब या तो मैं रहूँगा या आप। लेकिन निराश मन से बस यही कहना है कि बलिदान मुकेश दे गया, लेकिन इससे उसके गुनहगारों को कुछ ख़ास नहीं होने वाला है, एक किसी को सजा हो भी गई तो ऐसे लोगों की कमी नहीं है, हर जगह यही भरे पड़े हैं। नुक़सान ख़ुद का ही है, सामने वाले का तो कुछ होना नहीं है। कुछ दिन बाद आप हम भी यह सब भूलकर अपनी चीज़ों में व्यस्त हो जाएँगे।

बहुत साल पहले कुछ लिखा था उसकी वजह से मुझे घर से उठा लेने की धमकी मिली थी। घरवालों ने तब क़सम दिलाया था कि अब से कुछ भी ऐसा नहीं लिखेगा जिससे हमें तकलीफ़ हो। उस समय मेरे एक दोस्त ने मुझे कहा था - कभी भी कुछ ऐसा मत लिखो जिससे सामने वाले का आर्थिक नुकसान हो, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष किसी भी तरीके से किसी के आर्थिक नुकसान का भागी मत बनो। इंसान की आलोचना करो, बुरा भला बोलो, वह सब भूल जाएगा। लेकिन मुद्रा से संचालित आज के युग में इंसान अपना आर्थिक नुकसान कभी नहीं भूलता है और इसमें आपको व्यक्तिगत रूप से सर्वाधिक जोखिम उठाना पड़ सकता है। मैं आज भी पूरी बेशर्मी के साथ जीवन के इस यथार्थ को जी रहा हूँ।

One hundred years of solitude web series and Indian approach to cinema and literature -

मार्केज नाम का एक लेखक हुआ। उसने अपने समय One hundred years of solitude नाम की एक किताब लिखी। जिस पर अभी हाल फ़िलहाल में एक वेब सीरीज बनी है, कल ही बड़ी मुश्किल से वेब सीरीज ख़त्म की, मुझे बहुत ही औसत लगी। लेकिन साहित्यिक बिरादरी में लोग जिन्होंने मार्केज को एकदम हीरो बनाकर रखा हुआ है, वो इस औसत वेब सीरीज का राग अलापने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मजे की बात यह कि इस महान वेब सीरीज के बारे में भी इन मूर्धन्य साहित्यकारों से ही पता चला, वरना इसे देखने की कृपा से तो हम वंचित ही रह जाते।

जहाँ तक जादुई यथार्थवाद की बात है, वह भी ऐसा है कि मार्केज़ ने एक ऐसी स्क्रिप्ट लिख दी किताब में, जिसमें ढेरों किरदार हैं। मैं तो किताब पूरी कभी पढ़ ही नहीं पाया, कौन कॉपी पेन लेकर तीन पीढ़ी के इतने किरदारों का नाम याद रखता चले। कुल मिला के बहुत जटिल बोझिल सी किताब लगी मुझे। किताब का अपना साहित्यिक एप्रोच अच्छा है, कल्ट लिखा है बंदे ने, गहराई में जाकर व्याख्या की है, जादुई यथार्थवाद परोसा है जो हमारी दादी दादा बचपन में सोते समय कहानियों के रूप में परोसा करते थे। इसने सबको जोड़ के गुलदस्ता बनाया है। अब उस समय किताब के रूप में लोगों के लिए ये चीज़ नई थी तो लोगों ने बाहें फैलाकर स्वागत किया और अगले को हीरो बनाया। लेकिन भारत के तथाकथित साहित्यकारों ने तो इसे मानो भगवान का ही दर्जा दे दिया, ऐसा भगवान जिसे सिर्फ़ वही अच्छे से जानते हैं। भारत के और दुनिया के और देशों में बहुत से लोग आज की तारीख़ में मार्केज से कहीं बेहतर कल्ट लिख रहे हैं, लेकिन वही है उस पर कोई चर्चा नहीं होगी क्यूँकि इससे भारत के उन साहित्यकारों की ब्रांड वैल्यू नहीं बनेगी।

भारत के तथाकथित साहित्यकार अपने तिलिस्म को बनाये रखने के लिए एक माहौल बनाकर रखते हैं, उसमें खुद भी डूबकर अपने को सबसे ऊंचा रखने का दिखावा करते हैं। मार्केज बतौर साहित्यकार ठीक आदमी है, अच्छी किताब लिखा है, वहाँ के लोग बड़ी सहजता से उसको स्वीकारते हैं, लेकिन यहाँ हिंदी के कुछ साहित्य के लंबरदारों ने तो ऐसे कुछ लेखकों को भगवान ही बना दिया है। चाहे मार्केज हों, काफ़्का हों, गोर्की हों, कुन्देरा हों या और कोई ऐसा ही बाहर का लेखक। वो उनके अपने देश में बहुत सामान्य चीज़ होगी। प्रेमचंद टाइप हर कोई उनको जानता होगा और थोक के भाव में पढ़ के ख़त्म कर लेता होगा। लेकिन यहाँ के साहित्य बिरादरी के लोग ये दो चार बाहरी लोगों को उठा लेते हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता हो और उसे ही भगवान बना लेते हैं कि इस महान आदमी को आपने नहीं पढ़ा तो आपका जीवन व्यर्थ है, कुछ इसी इसी तरह ये अपनी दुकान चलाते फिरते हैं। वो तो धन्य है कि सोशल मीडिया की वजह से इनका अस्तित्व है, वरना तो इनको कोई पूछता भी नहीं, ये तथाकथित साहित्यकार दफ़न रहते और इस तरह से भौंडा तिलिस्म परोसकर लोगों को दिग्भ्रमित ना करते।

मनोज वाजपेयी की एक फ़िल्म है - गली गुलियाँ। मनोज ने बताया कि वो एक ऐसी फ़िल्म थी, जो मुझे लगता है मेरा अभी तक का सबसे बेहतरीन काम है। उन्होंने बताया कि बहुत सी और अच्छी फ़िल्म की है मैंने, लेकिन सब उसके नीचे है। लेकिन उस फ़िल्म को क्या मिला - घंटा। बुरी तरह से पीट गई, हाँ बाहर दूसरे देश में कुछ अवार्ड मिला लेकिन यहाँ के लोगों ने कूड़े में डाल दिया। उसके बाद मनोज वाजपेयी ने जो कहा वह यहाँ के सिनेमा और साहित्य की धोती खोलता है। उन्होंने कहा - अगर उस फ़िल्म में कोई विदेशी चेहरा होता तो फ़िल्म हिट रहती, बस यही समस्या हुई कि मुझ जैसा देसी शकल का आदमी उस बेहतरीन फ़िल्म का मुख्य किरदार रहा।

बाहर का अच्छा साहित्य पढ़ने में कोई समस्या नहीं है। लोग ख़ुद से पढ़ते हैं, सीखते हैं। टॉलस्टॉय चेखोव की कहानी उपन्यास पढ़ते रहे हैं लोग बिना किसी दिखावे और तिलिस्म के। लेकिन आजकल ये साहित्यिक छपरियों की जो जमात आई है, उसमें भी पुरानी पीढ़ी के बूढ़े लोग ज़्यादा हैं, इनको लगता है कि इनके बनाये भगवान को लोग भगवान कहें। जब देखिए थोपने वाली भाषा लिखते रहते हैं। क्यों, क्यूँकि इन्हें उनके नाम पर अपनी दुकान चलानी है, ठेकेदारी करनी है।

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Tuesday, 24 December 2024

अस्तित्व का खेल

अस्तित्व का खेल

स्कूल के दिनों का समय बच्चों के लिए ग़लतियाँ करते रहने और सीखने का समय होता है। ग़लतियाँ करना और उनसे सीखना ये प्रक्रिया अपने चरम पर होती है। कुछ ऐसी ही एक मामूली सी बात की वजह से एक बार कुछ लड़के जो मेरे से उम्र में और क़द काठी में बड़े थे, वो मेरे घर दोस्त की तरह मिलने आए और मुझे बाहर बुलाया, तब मेरी उम्र क़रीब 10-11 साल रही होगी। उन्होंने कहा कि कुछ बात करनी है और मुझे पास के एक ग्राउंड में ले गए और मुझे और मेरे परिवार को बुरा भला कहते हुए मारपीट किए। उनमें से एक लड़का बाहरी था उसी ने मारपीट की और दूसरे लड़के ने केवल खबरी का काम किया था। मैं उस उम्र में कई-कई दिनों तक तनाव में रहने लगा कि ऐसा भी मैंने क्या किया कि मुझे ऐसे मारा गया, ख़ुद को भी कोसने लग गया कि ऐसा क्या पाप कर दिया कि ऐसे मुझे ज़लील किया गया। भोलापन इतना हावी था, इतना आत्मविश्वास कमजोर हो गया, इतना आघात पहुँचा था। यह भी ख़याल आया कि अपनी इहलीला समाप्त कर दूँ। बालमन था, बहुत गुस्सा भी आ रहा था कि कब क़द काठी से थोड़ा बड़ा हो जाऊँ, इनको जरूर ठिकाने लगाऊँगा।

समय बीत गया, बात आई-गई हो गई। कुछ साल बाद उस खबरी लड़के की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई, लोहे का सरिया उसके शरीर के आर-पार चला गया था। उसकी मौत में जब स्कूल में मौन रखा गया तो मुझे बस बतौर खबरी के रूप में उसका चेहरा याद आ रहा था और मुझे बेहद तकलीफ़ हुई। जिस लड़के ने मारपीट की, उसका बाप कई साल बाद जब मुझसे मिला तो मेरे से उस बेटे के लिए नौकरी के जुगाड़ की बात करने लगा, उस दिन भी मुझे उसकी मारपीट याद आई। अस्तित्व ने शायद उसे जीवन की विद्रूपताएं भोगने के लिए बचा रखा हो। मुझे बहुत समय तक अस्तित्व का खेल समझ नहीं आता था। आगे फिर जीवन में ऐसी और घटनाएँ हुई, जिससे एक चीज़ समझ आई कि पता नहीं कैसे मुझे किसी भी प्रकार से नुक़सान पहुँचाने वालों से अस्तित्व ने उनका सब कुछ छीन लिया। इसलिए अब से हमेशा मैं बार-बार लोगों को नुक़सान पहुँचाने से रोकता हूँ, वो बात अलग है की इस सबसे मुझे ख़ुद बहुत नुक़सान उठाना पड़ जाता है, अस्तित्व ने इसके लिए भले कुछ ना दिया हो, एक मज़बूत रीढ़ तो दी ही है।

मुझे नहीं मालूम

देखता हूँ रोज़ अपने सामने मौत को, 

होते हैं रोज़ आँखों के सामने कत्लेआम, 

लेकिन कहाँ करनी है शिकायत, 

मुझे नहीं मालूम।


सबूत है मेरी आँखें, सबूत है मेरा ये पूरा शरीर, 

जिसने उस कत्लेआम को महसूस किया।

लेकिन कहाँ करना है मुक़दमा, 

मुझे नहीं मालूम।


लोग तड़प-तड़प कर मरते रहते हैं,

और खोजते हैं रास्ते जल्दी से मर जाने के,

आख़िर कहाँ होगी इसकी पैरवी, 

मुझे नहीं मालूम।


शरीर बाद में शून्य होता है, 

पहले मरता है आपका स्वाभिमान,

कहाँ होगी इसकी शिकायत, कौन लेगा अर्जियाँ, 

मुझे नहीं मालूम।


शरीर गल जाने से कहीं पहले, 

मार दी जाती है आपकी सारी कोमल भावनायें,

कौन रखेगा इसका हिसाब, 

मुझे नहीं मालूम।


सबके भीतर होती है अमर हो जाने की लालसा, 

लेकिन उसे एक दूसरा इंसान देता है तनाव और करता है परेशान,

यहाँ तो भीतर से मर चुके इंसान की भी,

किश्तों में मारी जाती हैं कोशिकाएं, 

कहाँ होगा इसका हिसाब, कहाँ करूँ फ़रियाद,

मुझे नहीं मालूम।


साँसों की गति रुक जाने से कहीं पहले, 

साँस चलाने वाले तत्वों पर लगा दिया जाता है लगाम,

दिखाया जाता है आपको नीचा, 

छीन लिया जाता है आत्मविश्वास,

किया जाता है आपका अपमान,

कौन करेगा इसकी सुनवाई,

मुझे नहीं मालूम। 


एक इंसान को झटके से मारने के लिए हैं कुछ सीमित उपाय, 

लटका दो, जला दो या काट दो इस शरीर को,

लेकिन इसी इंसान को किश्तों में मारने के लिए, 

लोग जीवन भर ईजाद करते हैं हिंसा के अनगिनत तरीक़े,

कौन देखेगा यह सब गहराई में जाकर, 

और कैसे तय होगी मृत्यु की परिभाषा,

मुझे नहीं मालूम।


बुद्ध ने निराश होकर दुःख तकलीफ़ को मृत्यु से भी बताया बड़ा,

और ख़ुद ही उससे निपटने के लिए बताए उपाय,

ना कोई दण्ड विधान काम आया, 

न कोई न्याय संहिता सामने आई, 

किश्तों में मिलते दुःखों की पैरवी कहीं कभी होगी भी या नहीं,

उसे भी नहीं मालूम, मुझे भी नहीं मालूम।

Tuesday, 3 December 2024

भ्रष्टाचार - एक तपस्या

भ्रष्टाचार को या एक भ्रष्टाचार करने वाले को हमेशा हिकारत की नजर से देखा जाता है लेकिन वास्तव में देखा जाए तो ये बहुत मेहनत का काम है। अच्छे बड़े स्तर का भ्रष्टाचार करने के लिए कड़ी तपस्या लगती है, बहादुरी लगती है, बड़ा जिगर चाहिए होता है, दिन रात खपना पड़ता है, एक व्यवस्था बनानी पड़ती है, अपना एक इकोसिस्टम बनाना होता है, उसे अनवरत सींचना होता है, इसलिए बहुत कम ही लोग ये काम कर पाते हैं, ये बिल्कुल भी हंसी मजाक की बात नहीं है, बहुत गंभीर होकर ये बात कही जा रही है।

एक सफल भ्रष्टाचारी बेहद स्किल्ड और मेहनती होता है, खूब जोखिम उठाता है, सबसे संपर्क साधकर चलता है, खूब सारे दुनियावी रिश्ते सम्भालता है, लोगों की आर्थिक मदद करने के साथ उनका रुका हुआ काम जल्दी कराने में भी महती भूमिका निभाता है। व्यवस्था की सारी चीज़ों की गहराइयाँ उसे मालूम होती है, उसे जानकारी रखनी पड़ती है क्यूंकि बिना उसके न तो उसका काम बजेगा न ही अपनी सुरक्षा हो पायेगी। हममें से लगभग हर किसी को कभी ना कभी जीवन में कहीं एक सुलझे हुए भ्रष्टाचारी की आवश्यकता पड़ती ही है। क्यूंकि वो हमारी जीवन रूपी दुश्वारियां कम करने में सहयोग करता है।

एक सफल भ्रष्टाचारी चाहे वह किसी भी ओहदे में क्यों ना हो, उसका दायरा बड़ा हो ही जाता है। व्यवस्था का सुचारू रूप से संचालन होता रहे, उसके लिए ऐसे तमाम तपस्वी भ्रष्टाचारियों का होना बेहद जरूरी है।