The first Call
Wednesday, 30 March 2022
Friday, 11 March 2022
Highway to the stars - 15
Paradigm Shift -
Chatted for hours. she admire me a lot for many things over chat. She was so gentle.
12 march 2022
Chatted for hours. she admire me a lot for many things over chat. She was so gentle.
12 march 2022
Highway to the stars - 14
Saw her in a black dress, she was doing modelling under one of my friend's company.
21 Feb 2022
21 Feb 2022
Saturday, 5 March 2022
वधू की आवश्यकता - भाग 3
- भूतपूर्व छात्र नेता या काॅलेज के दिनों में किसी तरह की नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभा चुकी हो,
- तीन से अधिक भाषाएँ समझती हों, भाषा विशेष के प्रति नफरत ना हो, आंचलिकता से परे होने की दिशा में अग्रसर हो,
- पंजाब हरियाणा बेल्ट में भले उसका जन्म न हुआ हो, लेकिन लहू के एक एक कतरे में वैसा ही बागीपन हो,
- कुछ एक साल घरवालों के न्यूनतम सामाजिक हस्तक्षेप वाले परिवेश में रही हो, घर से अलग रही हो, यानि खुद के भीतर की संभावनाओं को कुरेदने का प्रयास किया हो,
- अगर आर्मी स्कूल की स्टूडेंट है तो उसके भीतर कट्टर देशभक्ति वाले भाव कम और आम लोगों के प्रति संवेदना अधिक हो, लोगों में देश को और उनसे जुड़ी मूलभूत चीजों में देशभक्ति देख पाती हो,
- जश्न मनाना हर कोई जानता है, वह दुःख को महसूस करना जानती हो, दुःख के साथ खड़े होना उसे आता हो,
- सोशल मीडिया हो या निजी जीवन, जहाँ चीजें दिमाग को सुन्न करती दिखें, तुरंत अपनी असहजता दिखाती हो,
- कैसी भी परिस्थिति आ जाए, चलते रहना चाहिए, ठहरा हुआ पानी तक खराब होने लगता है यह बात उसके संज्ञान में हो,
- इंसान को चाहिए कि वह जीवन में कुछ न कुछ करता रहे, उस काम से पैसे मिले न मिले, वो बाद की चीज है, इतनी बेसिक बात समझती हो,
- यहाँ सब कुछ बदलता रहता है, समय के साथ हम भी। वह अपने भीतर के बदलाव को देख पाती हो। देख पाना बहुत बड़ी बात है,
- कुछ खत्म होता है तब कुछ नया होता है। जीवन में उतार चढ़ाव नहीं बल्कि उतार चढ़ाव के ईर्द गिर्द ही जीवन है, इतनी सामान्य सी बात समझती हो,
- स्त्री पुरूष के अपने कुछ बहुत अलग बिहेवियर पैटर्न होते हैं, इसीलिए एक चुप सौ सुख वाली कहावत की जानकारी हो।
- तीन से अधिक भाषाएँ समझती हों, भाषा विशेष के प्रति नफरत ना हो, आंचलिकता से परे होने की दिशा में अग्रसर हो,
- पंजाब हरियाणा बेल्ट में भले उसका जन्म न हुआ हो, लेकिन लहू के एक एक कतरे में वैसा ही बागीपन हो,
- कुछ एक साल घरवालों के न्यूनतम सामाजिक हस्तक्षेप वाले परिवेश में रही हो, घर से अलग रही हो, यानि खुद के भीतर की संभावनाओं को कुरेदने का प्रयास किया हो,
- अगर आर्मी स्कूल की स्टूडेंट है तो उसके भीतर कट्टर देशभक्ति वाले भाव कम और आम लोगों के प्रति संवेदना अधिक हो, लोगों में देश को और उनसे जुड़ी मूलभूत चीजों में देशभक्ति देख पाती हो,
- जश्न मनाना हर कोई जानता है, वह दुःख को महसूस करना जानती हो, दुःख के साथ खड़े होना उसे आता हो,
- सोशल मीडिया हो या निजी जीवन, जहाँ चीजें दिमाग को सुन्न करती दिखें, तुरंत अपनी असहजता दिखाती हो,
- कैसी भी परिस्थिति आ जाए, चलते रहना चाहिए, ठहरा हुआ पानी तक खराब होने लगता है यह बात उसके संज्ञान में हो,
- इंसान को चाहिए कि वह जीवन में कुछ न कुछ करता रहे, उस काम से पैसे मिले न मिले, वो बाद की चीज है, इतनी बेसिक बात समझती हो,
- यहाँ सब कुछ बदलता रहता है, समय के साथ हम भी। वह अपने भीतर के बदलाव को देख पाती हो। देख पाना बहुत बड़ी बात है,
- कुछ खत्म होता है तब कुछ नया होता है। जीवन में उतार चढ़ाव नहीं बल्कि उतार चढ़ाव के ईर्द गिर्द ही जीवन है, इतनी सामान्य सी बात समझती हो,
- स्त्री पुरूष के अपने कुछ बहुत अलग बिहेवियर पैटर्न होते हैं, इसीलिए एक चुप सौ सुख वाली कहावत की जानकारी हो।
Monday, 28 February 2022
चूल्हे में जाए ऐसी Soft Power वाली Diplomacy -
भारत के अधिसंख्य आबादी से कई बार न्यूनतम संवेदना की उम्मीद करना भी पहाड़ सा लगता है। यूक्रेन में फँसे अलग-अलग देशों के लोगों में से भारत और अफ्रीका के एक दो देशों को छोड़कर लगभग सभी देशों ने अपने लोगों को सुरक्षित बाहर अपने देश ला लिया है। भारत सरकार हजार दो हजार लोगों को लाकर पूरी बेशर्मी के साथ मीडियाबाजी करने में व्यस्त है, वहाँ बहुत सी भारतीय लड़कियों को रशियन आर्मी वाले अगवा करके ले जा रहे हैं, क्यों क्योंकि हमारा तथाकथित साफ्ट पाॅवर हाँ या ना कहने में विश्वास नहीं रखता है, अरे भई राजनयिक संबंधों का सवाल है, जब तक 500-1000 भारतीय लापता नहीं हो जाते, तब तक ढोल नगाड़े बजते रहने चाहिए, विश्वगुरू का जाप चलते रहना चाहिए, यही हो रहा है और यही होगा, मजदूरों के महापलायन, कोरोना की दूसरी लहर, किसान आंदोलन हर जगह यही हुआ, सरकारी भक्ति में कोई कमी देखने को नहीं मिली, एक तरफ लोग मर रहे थे, दूसरी तरफ लोग उस मौत को जस्टिफाई करने में लगे थे। लोग तब भी दुःख को दुःख की तरह देखने महसूस करने की न्यूनतम समझ तक विकसित नहीं कर पाए थे, इसलिए किसी तरह की संवेदना की उम्मीद करना भी बेमानी है।
हमारे यहाँ के लोगों के अपने जीवन में इतना अधिक रायता फैलाया हुआ रहता है कि लोग दूसरों का दर्द महसूस कर ही नहीं पाते है, और समय के साथ इतने अधिक असंवेदनशील होते जाते हैं कि उल्टे आग में नमक छिड़कने का काम करते रहते हैं, हिंसक होते जाते हैं। ऐसी मानसिकता से क्या ही उम्मीद करना कि वे किसी के दुःख को महसूस कर पाएं। अरे भई, उस माँ बाप के जगह खुद को रखकर देखिए कि जिनकी बेटी को रशियन आर्मी अगवा करके ले गई, कहिए भारत सरकार में है हिम्मत तो वापस ला ले, दीजिए उन्हें भारत की कूटनीतिक शक्ति का ज्ञान, मनाइए उन्हें। वहाँ फंसे भारतीय छात्र रो रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं, बैग लिए लावारिस की तरह पैदल दिन रात भटक रहे हैं, बर्फबारी झेल रहे हैं और अलग-अलग आर्मी से मार खा रहे हैं, लगातार जान बचाने की भीख माँग रहे हैं, लेकिन हमारे यहाँ के जाहिल लोग कूटनीति और अंतराष्ट्रीय राजनयिक संबंधों का ज्ञान दे रहे हैं, संख्याबल का ज्ञान दे रहे हैं कि दूसरे देशों के कम लोग थे, हमारे यहाँ के ज्यादा लोग हैं इसलिए समय लगेगा। कुछ ज्ञान दे रहे कि क्यों गये बाहर पढ़ने। ध्यान रहे सिर्फ भारतीय होने के कारण आज वे छात्र अगवा हो रहे हैं क्योंकि अगवा करने वालों को अच्छे से यह बात पता है कि इनके ऊपर किसी का हाथ नहीं है, इन्हें पूछने वाला कोई नहीं है।
छात्रों को आखिर कब वापस लाएगी सरकार, जब वे मानसिक शारीरिक हर तरह का शोषण झेल चुके होंगे तब??
इनके अपने घर के बच्चे, इनकी अपनी बहन बेटियाँ भी फँसी होगी तो भी शायद यही न कह दें कि देश की डिप्लोमेसी पहले बच्चे बाद में, बीस हजार बच्चे ही तो हैं, हमारे विश्वगुरू वाली छवि पर आँच नहीं आनी चाहिए बस।
लानत है, थू है ऐसी मानसिकता के लोगों पर।
हमारे यहाँ के लोगों के अपने जीवन में इतना अधिक रायता फैलाया हुआ रहता है कि लोग दूसरों का दर्द महसूस कर ही नहीं पाते है, और समय के साथ इतने अधिक असंवेदनशील होते जाते हैं कि उल्टे आग में नमक छिड़कने का काम करते रहते हैं, हिंसक होते जाते हैं। ऐसी मानसिकता से क्या ही उम्मीद करना कि वे किसी के दुःख को महसूस कर पाएं। अरे भई, उस माँ बाप के जगह खुद को रखकर देखिए कि जिनकी बेटी को रशियन आर्मी अगवा करके ले गई, कहिए भारत सरकार में है हिम्मत तो वापस ला ले, दीजिए उन्हें भारत की कूटनीतिक शक्ति का ज्ञान, मनाइए उन्हें। वहाँ फंसे भारतीय छात्र रो रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं, बैग लिए लावारिस की तरह पैदल दिन रात भटक रहे हैं, बर्फबारी झेल रहे हैं और अलग-अलग आर्मी से मार खा रहे हैं, लगातार जान बचाने की भीख माँग रहे हैं, लेकिन हमारे यहाँ के जाहिल लोग कूटनीति और अंतराष्ट्रीय राजनयिक संबंधों का ज्ञान दे रहे हैं, संख्याबल का ज्ञान दे रहे हैं कि दूसरे देशों के कम लोग थे, हमारे यहाँ के ज्यादा लोग हैं इसलिए समय लगेगा। कुछ ज्ञान दे रहे कि क्यों गये बाहर पढ़ने। ध्यान रहे सिर्फ भारतीय होने के कारण आज वे छात्र अगवा हो रहे हैं क्योंकि अगवा करने वालों को अच्छे से यह बात पता है कि इनके ऊपर किसी का हाथ नहीं है, इन्हें पूछने वाला कोई नहीं है।
छात्रों को आखिर कब वापस लाएगी सरकार, जब वे मानसिक शारीरिक हर तरह का शोषण झेल चुके होंगे तब??
इनके अपने घर के बच्चे, इनकी अपनी बहन बेटियाँ भी फँसी होगी तो भी शायद यही न कह दें कि देश की डिप्लोमेसी पहले बच्चे बाद में, बीस हजार बच्चे ही तो हैं, हमारे विश्वगुरू वाली छवि पर आँच नहीं आनी चाहिए बस।
लानत है, थू है ऐसी मानसिकता के लोगों पर।
Thursday, 24 February 2022
वधू की आवश्यकता - 2
भाग-2
- अपना उपनाम त्याग ना करे,
- अपनी एक पृथक पहचान को प्राथमिकता दे और अपने साथी की अलग पहचान का भी सम्मान कर ले,
- हमेशा लंबे समय एक साथ रहने की बाध्यता और अति-सामाजिकता में रिश्तों की मजबूती न खोजे,
- साथ रहने से कहीं अधिक अपनी निजता को सर्वोपरि माने, एक ही जीवन है, स्व का विकास रिश्तों की जीवंतता बनाए रखता है,
- समाज, जाति, धर्म, पंथ, विचारधारा वाली जकड़न सबमें कहीं न कहीं छिपी होती है, इसे रिश्तों में हावी न होने दे, पृथक रखे,
- सबकी एक अलग सोच होती है, हर कोई किसी से शत प्रतिशत सहमत नहीं हो सकता है, इसीलिए स्वस्थ असहमति के लिए जगह बनाती चले,
- मानसिक रूप से इतनी स्वस्थ हो कि जीवन में सही को सही और गलत को गलत की समझ उसे हो,
- मनुष्य की अपनी स्वतंत्रता सबसे बहूमूल्य होती है, रूपया पैसा देश समाज इन सब से इतर अपनी स्वतंत्रता की कीमत पहचानने का प्रयास करे,
- मुख्यधारा में चली आ रही ढोंग दिखावे वाली संस्कृति और उसमें व्याप्त खराबियों को आसानी से देख सके,
- निर्जीव वस्तुओं और सजीव रिश्तों में फर्क करना आता हो,
- स्वयं को लेकर संवेदनशील हो, हर तरह से अपना ख्याल रखना जानती हो,
- जीवन के प्रति इतनी न्यूनतम सहजता हो कि इंसान इंसान में भेद न कर पाती हो,
- नहाने खाने-पीने से लेकर सोच विचार में सबकी अपनी कुछ न कुछ कंडीशनिंग होती है, खराब कंडिशनिंग को पहचानने में स्वीकारने में बहुत अधिक संकोच न करे,
- सरकारी दफ्तर में जाकर बाबू टाइप लोगों को फटकार देने लायक न्यूनतम साहस हो और अगर न हो तो विकसित करने का प्रयास कर ले,
- मुद्रा को लेकर सहज हो, मुद्रा एकत्रण से कहीं अधिक मुद्रा के मजबूत प्रवाह में बने रहने में विश्वास रखे,
- अस्थिरता में ही जीवन का आनंद है, खुमारी है। यहाँ सिक्योर कुछ भी नहीं, इस सच को स्वीकारते हुए जीवन की हर अच्छी खराब परिस्थिति के लिए तैयार रहे,
- जीवन के प्रति इतनी सहज हो कि ऐसी भारी भरकम दार्शनिक बातें लिखने वालों के पीछे छिपे धूर्त को आसानी से पकड़ ले और साथ ही एक निरक्षर व्यक्ति जिसे बोलना तक न आता हो, उसके भीतर के बेहतरीन इंसान को पहचान ले।
परिवार समाज से मिली प्रतिष्ठा के दुष्प्रभाव -
परिवार समाज वाली प्रतिष्ठा से बनी पहचान, उससे तैयार हुआ इगो और उसका गुरूर बहुत भयानक होता है, इसमें कई बार व्यक्ति ऐसा समा जाता है कि अपनी मूल नैसर्गिक पहचान खो देता है। कई बार प्रतिष्ठा हाथ से चली जाती है फिर भी उससे पैदा हुआ गुरूर बना रहता है।
आगे जाकर यह भी समझ आता है कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति कैसा भाव रखता है, उसका व्यवहार कैसा है, वह किसी को चोट तो नहीं पहुंचाना चाहता लेकिन अपना इगो भी नहीं छोड़ना चाहता है, खुद को दुनिया से अलग समझता है, खुद को अलग थलग रखता है, और इसका आधार खुद की पहचान नहीं वरन् विरासत में मिला इगो होता है, इस वजह से कई बार वह मानवीय संवेदनाओं को संपूर्णता में आत्मसात नहीं कर पाता है, लगातार अपने आसपास के लोगों को मनोवैज्ञानिक तरीकों से चोट पहुंचाता रहता है। अपने को सबसे ऊंचाई का व्यक्ति समझना, सबसे शुध्द सबसे पवित्र सबसे बेहतर समझ लेने का दंभ इनसे कभी छोड़ा नहीं जाता है, वे आजीवन इस सच को नहीं स्वीकार पाते हैं कि दुनिया में उनसे भी बेहतर लोग हो सकते हैं जो अपने दम पर शून्य से शुरू कर अपनी पहचान बनाते हैं।
आगे जाकर यह भी समझ आता है कि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति कैसा भाव रखता है, उसका व्यवहार कैसा है, वह किसी को चोट तो नहीं पहुंचाना चाहता लेकिन अपना इगो भी नहीं छोड़ना चाहता है, खुद को दुनिया से अलग समझता है, खुद को अलग थलग रखता है, और इसका आधार खुद की पहचान नहीं वरन् विरासत में मिला इगो होता है, इस वजह से कई बार वह मानवीय संवेदनाओं को संपूर्णता में आत्मसात नहीं कर पाता है, लगातार अपने आसपास के लोगों को मनोवैज्ञानिक तरीकों से चोट पहुंचाता रहता है। अपने को सबसे ऊंचाई का व्यक्ति समझना, सबसे शुध्द सबसे पवित्र सबसे बेहतर समझ लेने का दंभ इनसे कभी छोड़ा नहीं जाता है, वे आजीवन इस सच को नहीं स्वीकार पाते हैं कि दुनिया में उनसे भी बेहतर लोग हो सकते हैं जो अपने दम पर शून्य से शुरू कर अपनी पहचान बनाते हैं।
Monday, 14 February 2022
जीने की वजह -
तुम्हारे घर लौटने की खबर पाकर,
वे सिर्फ इंतजार नहीं करते थे,
उतने समय में वे जिंदगी को जी रहे होते थे।
एक समय ऐसा आ जाता है,
जब हम जिंदगी को जीने के लिए वजह खोजने लगते हैं,
तुम उनके लिए जिंदगी जीने का एक बहाना बन गयी थी।
भले वे कहते न होंगे, जाहिर न कर पाते होंगे,
क्योंकि इस्पात सा उनका व्यक्तित्व रहा,
लेकिन मन उतना ही कोमल उतना ही मासूम,
घर के मुखिया जो रहे, इसलिए अडिग बने रहते।
असल में उनके लिए हँसने मुस्कुराने का बहाना थी तुम,
वे तुम्हें सामने पाकर अपने सारे गम भुला देते थे,
तुम्हें देखकर उनका पाव भर खून बढ़ जाता था,
इसलिए शायद तुम्हारे दूर होने से बैचेन से हो जाते थे।
गुमसुम से होकर तुम्हें खोजने लगते थे,
तुम्हारे जीने में ही अपना जीना ढूंढते फिरते थे।
इसलिए सुबह से शाम इतनी फिक्र किया करते थे।
जितना जीवन उन्होंने जिया, उसके बाद
दुनिया जहाँ की उपलब्धियों से बड़ी बन गई थी तुम,
इसलिए व्याकुल हो जाते थे तुम्हें लेकर।
तुम्हारे सुख में ही सुख खोजते,
तुम्हारी खुशी में ही आसमान भर खुशी पा लेते।
उनके लिए तुम साँस की तरह थी,
जीने की वजह बन गई थी तुम।
वे सिर्फ इंतजार नहीं करते थे,
उतने समय में वे जिंदगी को जी रहे होते थे।
एक समय ऐसा आ जाता है,
जब हम जिंदगी को जीने के लिए वजह खोजने लगते हैं,
तुम उनके लिए जिंदगी जीने का एक बहाना बन गयी थी।
भले वे कहते न होंगे, जाहिर न कर पाते होंगे,
क्योंकि इस्पात सा उनका व्यक्तित्व रहा,
लेकिन मन उतना ही कोमल उतना ही मासूम,
घर के मुखिया जो रहे, इसलिए अडिग बने रहते।
असल में उनके लिए हँसने मुस्कुराने का बहाना थी तुम,
वे तुम्हें सामने पाकर अपने सारे गम भुला देते थे,
तुम्हें देखकर उनका पाव भर खून बढ़ जाता था,
इसलिए शायद तुम्हारे दूर होने से बैचेन से हो जाते थे।
गुमसुम से होकर तुम्हें खोजने लगते थे,
तुम्हारे जीने में ही अपना जीना ढूंढते फिरते थे।
इसलिए सुबह से शाम इतनी फिक्र किया करते थे।
जितना जीवन उन्होंने जिया, उसके बाद
दुनिया जहाँ की उपलब्धियों से बड़ी बन गई थी तुम,
इसलिए व्याकुल हो जाते थे तुम्हें लेकर।
तुम्हारे सुख में ही सुख खोजते,
तुम्हारी खुशी में ही आसमान भर खुशी पा लेते।
उनके लिए तुम साँस की तरह थी,
जीने की वजह बन गई थी तुम।
Friday, 11 February 2022
मिट्टी का बुलावा -
जब गुजरी सड़क पर एक बड़ी मशीन,
तब हुआ अहसास अपने छोटेपन का,
जब दूर बैठे पैरों तक झकझोरते पहुंचा कंपन,
तब लगा कि अभी पैरों के नीचे खिसक जाएगी जमीन,
और हम अभी कहीं इस अंधकार में समा जाएंगे,
जब जीवन और मृत्यु को एक दूसरे के सामने देखा,
तो लगा कि जीना भी क्या कमाल चीज है।
तब हुआ अहसास अपने छोटेपन का,
जब दूर बैठे पैरों तक झकझोरते पहुंचा कंपन,
तब लगा कि अभी पैरों के नीचे खिसक जाएगी जमीन,
और हम अभी कहीं इस अंधकार में समा जाएंगे,
जब जीवन और मृत्यु को एक दूसरे के सामने देखा,
तो लगा कि जीना भी क्या कमाल चीज है।
इसी हिलती डुलती मिट्टी को,
इस अल्पकालिक जीवन में,
हम अपने नाम अपनी हिस्सेदारी से,
कब्जा लेना चाहते हैं,
अपना लेना चाहते हैं,
लेकिन आखिर कब तक,
असल मायनों में,
हम कुछ भी कभी हासिल नहीं करते हैं,
हम बस जी सकते हैं,
और हमें एक बार मिली इस जिंदगी को,
जीने में ही लगा देना चाहिए,
क्योंकि एक दिन हमारे पास,
इस मिट्टी के कंपन को महसूस कर लेने,
और जीवन के इस छोटेपन को जी लेने लायक साँस नहीं होती,
अंततः हम मिट्टी के पास चले जाते हैं।
तारा बन जाते होंगे -
जाने वाले चले जाते हैं, खाली जगह छोड़ जाते हैं,
लौटकर फिर कभी नहीं आते, तारा बन जाते होंगे।
अस्तित्व की शक्ति - 2
जब लगे सब खत्म हो गया,
जब लगे चारों ओर अंधेरा है,
जब खत्म हो जाए जीने की इच्छा,
तब कुछ देर के लिए सही,
लाठी समझ कर पकड़ लेना,
जब लगे वैसे ही छोड़ जाना,
जब जरूरत हो फिर थाम लेना।
ये लाठी अहसान नहीं जताती है,
इसने बस फर्ज निभाना सीखा है,
एक बेहतर इंसान हो जाने का फर्ज,
बिना जाने, बिना किसी उम्मीद के, दूर कहीं से,
किसी के दुःख को उसी की तरह,
महसूस कर लेने और बंद कमरे में रो लेने का फर्ज।
ताकि दुनिया से ये दुःख थोड़ा ही सही, कम हो जाए,
और हम फिर से जीने की एक कोशिश करने लग जाएं।
जब लगे चारों ओर अंधेरा है,
जब खत्म हो जाए जीने की इच्छा,
तब कुछ देर के लिए सही,
लाठी समझ कर पकड़ लेना,
जब लगे वैसे ही छोड़ जाना,
जब जरूरत हो फिर थाम लेना।
ये लाठी अहसान नहीं जताती है,
इसने बस फर्ज निभाना सीखा है,
एक बेहतर इंसान हो जाने का फर्ज,
बिना जाने, बिना किसी उम्मीद के, दूर कहीं से,
किसी के दुःख को उसी की तरह,
महसूस कर लेने और बंद कमरे में रो लेने का फर्ज।
ताकि दुनिया से ये दुःख थोड़ा ही सही, कम हो जाए,
और हम फिर से जीने की एक कोशिश करने लग जाएं।
अस्तित्व की शक्ति - 1
जब चारों ओर निराशा के बादल दिखाई देने लगे,
इतना धुंधलापन कि कहीं कुछ भी साफ न दिखता हो,
क्या वर्तमान क्या भविष्य, सब कुछ अंधेरे की गिरफ्त में हो,
तब हमें आँख मूंदकर खुद को किस्मत के हवाले कर देना चाहिए।
कई बार कुछ चीजें अपने आप होती है,
कोई हमें देख रहा होता है,
हमारी कड़ी परीक्षा ले रहा होता है,
हमें एक बेहतर कल के लिए मजबूत ही कर रहा होता है।
हमें बस कुछ देर चुप रह जाना चाहिए,
चुप रह जाने से मौसम बदल जाता है।
हमें उस अदृश्य शक्ति के हाथों खुद को सौंप देना चाहिए,
कुछ इस तरह वक्त अपने आप बेहतर होने लगता है।
इतना धुंधलापन कि कहीं कुछ भी साफ न दिखता हो,
क्या वर्तमान क्या भविष्य, सब कुछ अंधेरे की गिरफ्त में हो,
तब हमें आँख मूंदकर खुद को किस्मत के हवाले कर देना चाहिए।
कई बार कुछ चीजें अपने आप होती है,
कोई हमें देख रहा होता है,
हमारी कड़ी परीक्षा ले रहा होता है,
हमें एक बेहतर कल के लिए मजबूत ही कर रहा होता है।
हमें बस कुछ देर चुप रह जाना चाहिए,
चुप रह जाने से मौसम बदल जाता है।
हमें उस अदृश्य शक्ति के हाथों खुद को सौंप देना चाहिए,
कुछ इस तरह वक्त अपने आप बेहतर होने लगता है।
Tuesday, 8 February 2022
कमजोर होती साख को मजबूत करने के प्रयास -
अभी देश के अलग-अलग हिस्सों में धर्म आधारित मामले बनाए जा रहे हैं और उनको राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जा रहा है। कोरोना वायरस, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, महंगाई यह सब तो धार्मिक मुद्दों के आगे वैसे भी किनारे हो जाते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। असल में हिजाब वाली घटना में मुझे दोनों पक्षों पर हँसी आ रही है। ये वही लोग हैं, जिनको यूट्यूब में भारत को आजादी कब मिली जैसे सवालों का गलत जवाब देते हुए युवाओं का वीडियो सच लगता है, WWE के रेसलर अंडरटेकर की मृत्यु और पुर्नजन्म की घटना भी इन्हें सच लगती है, तो एक प्रधानमंत्री के मगरमच्छ पकड़ने और एनसीसी कैडेट हो जाने की बात को भी सच मान लेने और उस पर बहस कर समय जाया किया ही जा सकता है। ऐसे महान दूरदर्शी नागरिकों को ही हिजाब वाले वीडियो का स्क्रिप्ट समझ नहीं आ रहा है। लड़की के स्कूटी से एंट्री मारने से लेकर नारे लगाने तक इतने प्यार से वीडियो शूटिंग हो रही कि प्री वेडिंग शूट वाला शरमा जाए। क्या इतना पिच्चर वेब सीरीज देखते हो यार, इतना नहीं समझ पा रहे। कोई उसमें हिन्दू मुस्लिम नहीं हैं, सब ससुरे एजेंट पहले हैं जो नेशनल मीडिया को बाइट दे रहे हैं। बाकी आपको तो इतना नजरबंद कर ही दिया गया है, और आपको दिमाग से इतना खाली, इतना नल्ला बना दिया गया है तो आप हिन्दू मुस्लिम एंगल पकड़ के ही खून गरम करते रहिए।
असल में यह धर्म आधारित माहौल सिर्फ यूपी चुनाव जीतने भर के लिए नहीं बनाया जा रहा है, यह तो एक बड़ा कारण है ही, साथ ही अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए धर्म से जुड़े हथकंडे फेंके जा रहे हैं ताकि आने वाले कुछ एक दशक ये टिके रहें। कांग्रेस के एक लंबे समय के शासन के बाद एक दूसरी पार्टी एक दूसरी विचारधारा के रूप में खुद को स्थापित कर 2014 में पूर्ण बहुमत की सत्ता हासिल करने के बाद भाजपा आई और इनका जो मजबूत नेटवर्क पूरे देश में कायम हुआ उसे पिछले एक दो साल में कोरोना और खासकर किसान आंदोलन ने काफी हद तक फीका कर दिया। कोई भी पार्टी इतने दशकों के बाद आती है और बहुमत से आती है तो देश भर में उसका एक सिस्टम बन जाता है जो इतनी आसानी से नहीं टूटता है, भाजपा हारे जीते फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसका एक सिस्टम बन गया है, शायद आने वाले एक दो दशक यही राज करें तो जिन्हें समस्या है वे इनकी आदत डाल लें। भाजपा का अपना सिस्टम, उसकी जड़ें किसान आंदोलन के बाद कमजोर हुई हैं, ये धार्मिक मुद्दे उसी जड़ को मजबूत करने की तैयारी भर है। सोशल मीडिया की वजह से न्यूज फैलाव की वजह से ये हिजाब वाला मुद्दा बहुत बड़ा लग रहा होगा लेकिन पहले की सरकारों के समय इससे भी बड़े बड़े मामले हुआ करते थे, सत्ता लोभी सरकारों ने उस समय भी लोगों को बाँटने के लिए कोई कमी नहीं छोड़ी थी। जहाँ तक दंगे और धार्मिक उन्माद पैदा करने की बात है, आजादी के बाद से सबसे बड़े-बड़े दंगे तो कांग्रेस और वाम संचालित सरकारों के समय ही हुए हैं, आपको हमको पीछे जाकर यह सब देखना होगा। 1984 का दंगा ही याद कर लिया जाए, सोचिए आज भाजपा के शासन में जो किसान आंदोलन हुआ, यही अगर कांग्रेस के शासनकाल में होता तो आंदोलन और कितना बड़ा होता, पूरे देश भर में कांग्रेसियों को कूटा जा रहा होता, छुपने के लिए जगह न मिलती। चौरासी के दंगों के समय एक धर्म विशेष के लोगों के साथ कई-कई दिन तक खून की होली खेली गई थी, रेप हुए थे, लोगों ने अपनी पहचान बदलने के लिए अपने केश कटवा लिए थे, कुछ ऐसे भी रहे कि जान बचाने के लिए रातों रात धर्म ही बदल लिया, पंजाब से देश के अलग-अलग कोनों में बड़ी मात्रा में पलायन हुआ, जो दुबारा वापस ही नहीं लौटे। सोचिए कितना डरावना मंजर होगा, सोचिए आपके हमारे हाथ में तब इंटरनेट और सोशल मीडिया होता तो?? विडम्बना देखिए आज वही कांग्रेस पंजाब के जनमानस के लिए हितैषी बन गई है। भाजपा तो इनके काले कारनामों के सामने अभी कुछ भी नहीं है, इसलिए यह भी धर्म का कार्ड खुलकर खेलते हैं। यह सब करके ये भी देश हित में कुछ नया नहीं कर रहे हैं, देश को समाज को पीछे ही लेकर जा रहे हैं।
अभी शायद यूपी चुनाव तक धर्म से जुड़े कुछ और संवेदनशील मुद्दे राष्ट्रीय पटल पर आएंगे, बस हमें यह ध्यान रखना है कि हमारे भीतर हिंसा और नफरत कम से कम प्रवेश करे और हमें इतनी बेसिक समझ तो हो कि हम ऐसे वीडियो के पीछे की स्क्रिप्ट समझ जाएं।
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