Tuesday, 10 October 2023

हम भारतीयों की भोजन की संस्कृति

पिछले सप्ताह शहर की एक फूड ब्लागर मात्र 23 की उम्र में शांत हो गई। कारण रहा - हाई सुगर लेवल और उसके बाद निमोनिया। मैंने जब उनका प्रोफाइल देखा तो बहुत सारे खाने-पीने के वीडियो से प्रोफाइल भरा पड़ा था, एक भी चीज ऐसी नहीं मिली जिसे कहा जा सके कि यह अच्छा भोजन है, अपनी प्रकृति में लघु है और सुपाच्य है। खाने के लगभग जितने भी विकल्प देखे सब कुछ अपनी प्रकृति में दीर्घ यानि प्रोसेस किया हुआ खाना, फास्ट फूड जंक फूड जैसा आपको समझने में सहूलियत हो। आजकल इस तरह के खाने को लेकर लोगों में गजब की आसक्ति है। किसी नशे की तरह लोग बाहर थोक के भाव में यह सब खा लेते हैं, यह नहीं समझ पाते हैं कि ब्रांड स्पांसरशिप और फ्री में जो यह खाना आपको परोसा जा रहा है, वह आपको मुफ्त के खाने के साथ कुछ समय के लिए शोहरत तो दे देगा, लेकिन बदले में आपकी सेहत छीन लेगा। 

कुछ लोगों का लिवर बहुत कमजोर होता है, वहीं कुछ लोगों का पूरा इम्युन सिस्टम ही कमजोर होता है, ऐसी स्थिति में व्यक्ति को कई बार यह समझने में बहुत देर लग जाती है कि वह लंबे समय से अपने शरीर को आखिर क्या दे रहा है। मुझे लगता है कि इन फूड ब्लागर के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति रही होगी। यह भी समझ आया कि ये उस खाने को पचाने के लिए पसीना बहाने जैसा कोई शारीरिक मेहनत भी न करती होंगी तभी शायद स्थिति इतनी गंभीर हो गई। एक कमजोर शरीर को इतना दीर्घ, इतना भारी खाना देना उसी तरह है कि एक पंक्चर हुई गाड़ी में ओवरलोडिंग की हद तक सामान लाद देना, इतना कि उस गाड़ी का इंजन बैठ जाए। 

फास्ट प्रोसेस फूड की शौकीन पीढ़ी को देखकर यही लगता है कि हमने अपने पेट को कूड़े का ढेर बना दिया है, जो मन में आया वहां बस फेंक आते हैं, वहां वो खाना जब सढ़े गले, हमारी चिंता नहीं है। हम अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हैं, अपनी सामाजिक सांस्कृतिक विरासत को संजोने के लिए प्रयासरत रहते हैं, अपना जीवन फूंक देते हैं लेकिन जहाँ बात भोजन की आती है, वहां हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को क्यों भूल जाते हैं यह समझ से परे है।

मेरे बहुत से दोस्त साथी जो विदेश रहकर आए हैं या दूसरे देशों में रहते हैं, उनमें से लगभग हर किसी ने हमेशा इस एक बात को कहा है कि भारतीय उपमहाद्वीप के खाने का पूरे विश्व में कोई तोड़ नहीं है, ऐसा स्वाद ऐसा फ्लेवर दुनिया के किसी खाने में नहीं है। भले विकसित कहे जाने वाले देशों ने कुछ भी हासिल कर रखा हो, जबरन खुद को बड़ा दिखाने के लिए अपने बेंचमार्क सेट किए हों और उसमें हमें तीसरी दुनिया की श्रेणी में रखा हो, लेकिन भोजन की विविधता के मामले में वे हमेशा पीछे रहेंगे। 

बहुत सोचने विचारने पर यह भी निष्कर्ष निकला कि हम भारतीयों ने अपने भोजन की संस्कृति में कभी अतिवादिता को हावी होने नहीं दिया। चीन जापान कोरिया और कुछ कुछ देशों में जैसे बिना मसालों के उबला हुआ भोजन खाने का रिवाज है, हमने इस संस्कृति को नहीं अपनाया, न ही हमने दीर्घ भोजन को स्वीकारा। हमने बीच का रास्ता चुना, हमने भोजन में तेल मसालों को जमकर जोड़ा और उसका ऐसा बेहतरीन माॅडल पेश किया कि हमे मसालेदार स्वाद भी मिलेगा और उसका नुकसान भी नहीं होगा। उदाहरण के लिए जैसे कभी हमें तेल में तली पूरी और छोले की सब्जी खानी है तो हमने पूरी में अजवाइन डाल दिया और छोले में हींग, काली मिर्च ताकि भोजन का स्वाद भी मिले और ये गुणकारी मसाले आसानी से भोजन को पचा लें और हमारी आंतों पर जोर भी न पड़े। विभिन्न प्रकार के मसाले हमेशा से हमारे भोजन का अभिन्न अंग रहे, जो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते रहे हैं, सदियों से इस संस्कृति का हम‌ पालन करते आए हैं। भारतीय खाने‌ में भोजन को लेकर गजब का साम्य है, हमारे पास अपने स्वादांकुरों को संतुष्ट करने के लिए ढेरों विकल्प हैं, बावजूद इसके हम आज ऐसे भोजन के गुलाम बने बैठे हैं, जिसकी न तो अपनी कोई सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है न ही उससे हमारे शरीर को कुछ पोषकतत्व मिलता है। अगर हमें सचमुच अपनी चिंता है, अपने सेहत की थोड़ी भी चिंता है तो भोजन के अपने परंपरागत तौर तरीकों में रस खोजना होगा वरना दुःखों का पहाड़ हमारे सामने है ही। गुलामी सिर्फ किसी बाहरी व्यक्ति के शासन‌ करने के तौर तरीकों से नहीं आती है, भोजन के गलत तौर तरीकों को अपनाने से भी आती है। 




Thursday, 5 October 2023

रायपुर का ध्वनि प्रदूषण

सन् 2015, ठीक गणेश नवरात्रि का समय था। इत्तफाक से मैं जहाँ रहता था, वो क्षेत्र ध्वनि प्रदूषण वाले जोन में ही आता था, जहां से अधिकतर पाॅवर डीजे वाली रैली निकलती थी। गणेश और खासकर नवरात्र के समय बहुत परेशानी होती थी। पता नही उतने शोर में लोगों को कैसे आनंद मिल सकता है, मुझे तो शादियों का डीजे जो एकदम सीने तक महसूस होता है, उससे भी अजीब बैचेनी होने लगती है। 2015 में ही ठीक यही समय रहा होगा, गणेश पूजा खतम होने को थी। तब दीदी राज्य सिविल सेवा परीक्षाओं की लिखित परीक्षा देने आई थी तो मेरे साथ थी, उस समय दीदी प्रेगनेंट थी, शायद पांचवां या छठा महीना होगा, प्रेगनेंसी में वैसे भी मूड स्विंग होता ही है। एक दिन शाम को मैं कहीं बाहर था, दीदी का रोते हुए फोन आया, कहने लगी कि डीजे की आवाज से बहुत दिक्कत हो रही, इस कदर रो रही थी मानो घर में कोई दैत्य घुस आया हो और वो वहां से जान बचाकर बाहर निकलना चाहती हो, मानो बचाओ-बचाओ की आवाज लगा रही हो। शुरूआत में स्थिति की गंभीरता को समझ ही नहीं पा रहा था, मुझे लगा कि सामान्य है, डीजे ही तो है, लेकिन आप कितना भी खिड़की दरवाजा बंद कर लीजिए, पाॅवर डीजे खिड़की तोड़कर आपके शरीर तक पहुंच जाता है, पूरा झकझोर देता है। और एक गर्भवती स्त्री को तो और अधिक प्रभावित करता है। उस दिन मैंने इस डीजे के प्रकोप को बहुत करीब से महसूस किया। तब आनन फानन में अपना काम छोड़कर तत्काल घर पहुंचा और दीदी को आधे एक घंटे के लिए बाहर एक शांत क्षेत्र में ले गया। जब जब डीजे गुजरता, कई दिनों तक शाम को हम यही करते, पास के एक शांत से इलाके में जहां एक पार्क था, कुछ देर वहां समय बिताने चले जाते। 

डीजे का यह प्रकोप अभी भी बदस्तूर जारी है। पाॅवर डीजे की आवाज (डेसिबल में) हर गुजरते साल पहले से अधिक बढ़ती ही जा रही है, क्योंकि इनकी प्रतियोगिता रहती है कि जिसकी आवाज सबसे कानफोड़ू हिला देने वाली होगी, वही रैली का विजेता घोषित होगा। एक ओर जहाँ इस डीजे से सैकड़ों हजारों लोगों का रोजगार जुड़ा है, वहीं दूसरी ओर हर साल अप्रत्याशित घटनाएं भी सामने आती है, जिसमें लोगों को अस्पताल में भर्ती तक होना पड़ा है, पता नहीं इसका क्या दूरगामी समाधान निकलेगा। वैसे डीजे से इतर रोजमर्रा के दिनों की भी बात करें तो आज के समय में रायपुर में ध्वनि प्रदूषण इतने चरम पर है कि इस शहर का भूस बन चुका है, थोड़ा बाहर निकलते ही मानसिक शारीरिक थकान हावी होने लगती है, भले लोगों को यह सब एक बार में महसूस नहीं होता है। हम कभी अलग से ध्वनि प्रदूषण को एक गंभीर समस्या के तौर पर देखते भी तो नहीं है। हां, इसमें हम यह जरूर कहते हैं कि शहर में समय का पता नहीं चलता, लेकिन इसमें यह नहीं समझ पाते कि यह सब ध्वनि प्रदूषण की वजह से होता है। खासकर गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और बुर्जुगों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है लेकिन कौन इतनी पड़ताल करे। ध्वनि प्रदूषण युक्त शहर में रहने वाला एक व्यक्ति आपको ऐसा नहीं मिलेगा जो गांवों या शांत छोटे कस्बों की तर्ज पर यह कह दे कि समय ही नहीं कट रहा है, क्योंकि मन मस्तिष्क में प्रदूषण इतना हावी होता है कि उसे समझ ही नहीं आता है कि उसके पास समय है भी या नहीं, पूरी दैनिक जीवनचर्या आजीवन अस्त व्यस्त रहती है, कुछ न होके भी एक भागमभाग लगी रहती है, जी मचलता रहता है। और एक दिन किसी दीमक की तरह शहर रूपी दीवार में ही व्यक्ति मिट्टी बनकर खाक हो जाता है।


Friday, 29 September 2023

भोजन के प्रति सहजता

अपने उद्भव के समय से ही मनुष्यों के लिए नियमित भोजन पाना एक चुनौती रहा है। इसलिए उसने एक जगह रहकर व्यवस्थित तरीके से खेती करना शुरू किया ताकि उसे नियमित रूप से भोजन मिल सके। 1970-80 के दशक के लोग जो अभी 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के होंगे, उनमें और उसके बाद की पीढ़ी में एक बहुत बड़ा अंतर भोजन को लेकर दिखता है। पुरानी पीढ़ी के लोग भोजन के समय को लेकर बहुत सजग रहते हैं क्योंकि उन्होंने भोजन पा लेने के पीछे के संघर्ष को इस पीढ़ी से कहीं ज्यादा देखा है। तब के समय में समाज के हर एक वर्ग के लिए इतना आसान नहीं हुआ करता था कि उसे दो वक्त का भोजन भरपूर पोषक तत्वों के साथ मिल सके, अभी की तरह भोजन में दो तीन सब्जियाँ और सलाद, दिन में दो तीन बार नाश्ता, या जो मन किया बाहर हल्का फुल्का कुछ खा लेना होता ही नहीं था, विकल्प ही मौजूद नहीं थे। मितव्ययी समाज रहा, और तब क्रयशक्ति भी सीमित थी, विनिमय जोरों पर था क्योंकि वैसी सामाजिकता थी और उसके अपने बहुत फायदे थे, अगर किसी प्रकार की कोई कमी या गरीबी थी, उसे वह एक समय के बाद साध लेता था, हड़बड़ी नहीं थी, उस स्थिति में भी मनुष्य के पास इतना आत्मबल था कि वह ठीक-ठाक तरीके से जैसे-तैसे जीवन यापन कर लेता था, उसे टूटने बिखरने नहीं दिया जाता था।

साधन सीमित थे और उसी में से ही भोजन पाना होता था और प्रकृति के खिलाफ जाकर कोई क्रूरता नहीं की जाती थी, मशीनें हावी नहीं हुई थी तो भोजन हमेशा से संघर्षों के बाद मिलने वाली चीज रही। तब हाइब्रिड नामक जंजाल शुरू नहीं हुआ था तो जिस मौसम में जो मिल जाता था उसी का सेवन कर लिया जाता था लेकिन 1991 के उदारीकरण के दौर के पश्चात् भारत के कृषि आधारित समाज में आमूलचूल बदलाव देखने को मिले, भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को दुनिया के सामने खोल दिया, जिसका सीधा प्रभाव हमारे भोजन पर, संस्कृति पर, या यूं कहें सीधे हमारी जीवनशैली पर पड़ा। जिस आर्थिक-सामाजिक संस्कृति को हजारों वर्षों से लोग पोषित, संवर्धित कर अगली पीढ़ी को स्थानांतरित कर रहे थे, वह पिछले दो दशकों में ही आज हाशिए पर है। बहुत ही कम समय में अमीरी का दूसरा नाम मुद्रा का अधिक से अधिक संकलन हो गया। रोजमर्रा की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए बाजार पर हमारी निर्भरता आसमान छू रही है, श्रम नेपथ्य में है। 

अभी के समय में भोजन आपको हमको एक क्लिक में उपलब्ध है। आप अपने फोन में एक क्लिक करते हैं और किसी जादू की तरह बाहर से डिब्बा बंद खाना आपके लिए तैयार होकर आ जाता है। इससे पहले कभी मनुष्यों के लिए भोजन इतनी सहज वस्तु नहीं हुई। लोग बाहर का खाना क्या होता है यह जानते तक नहीं थे। शायद कहीं घूमने निकल गए तो महीने में कभी बाहर खा लिया तो बहुत बड़ी बात होती थी, वरना कहीं घूमने भी जाते थे तो अपने भोजन के लिए साजो-समान और उतने दिन का राशन, ये सारी चीज़ें अपनी गाड़ी में लेकर चलते थे। वैसे कुछ लोग, जिसमें पुरानी पीढ़ी के लोग शामिल हों, अभी भी इस परंपरा का निर्वहन करते हैं। अभी कल ही एक भरी हुई बस रास्ते में दिखी, पूछने पर मालूम पड़ा कि वे लोग सप्ताह भर के लिए तीर्थाटन करने निकले हैं। सबसे बढ़िया बात यह कि वे भोजन की पूरी व्यवस्था लेकर चल रहे हैं, बड़े-बड़े डेक में चालीस पचास लोगों के लिए रोड के किनारे ही एक जगह खाना बन रहा था, साथ में दो तीन खानसामा भी थे, खाने की खुशबू भी बिल्कुल वैष्णव पध्दति की तरह ठीक वैसी जैसे आपको किसी मंदिर या भंडारे में मिलती है। और उस बस में सफर करने वालों में हर उम्र के लोग दिखे, अच्छा लगा कि कम से कम बच्चों की स्मृति में यह संस्कृति समाहित हो रही है। देखकर खुशी हुई कि थोड़ा ही सही लोग कहीं भी जाएं, भोजन पकाकर खाने की यह संस्कृति अभी भी अपने स्तर पर निभा रहे हैं।

अभी वर्तमान में जहां बाहर का खाना खाना हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है ऐसी स्थिति में समय पर भोजन कर लेना एक उपलब्धि की तरह हो चुका है। भाग दौड़ और हाइब्रिड रूपी गलाकाट प्रतियोगिता के इस जमाने में जहां हर मौसम में दूसरे मौसम की सब्जियां उपलब्ध है, हर ताजे मौसमी फल का जूस डिब्बों में बंद होकर वर्ष भर उपलब्ध है। ऐसे में नियत समय पर अच्छा भोजन ग्रहण करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इस एक चुनौती ने तो मानो अमीर और गरीब का भेद ही खत्म कर दिया है, लोगों को समझ ही नहीं आता है कि वह भोजन के रूप में क्या ग्रहण करने जा रहे हैं। जब से भोजन मिलना जितना अधिक सर्वसुलभ हुआ है उसके प्रति उतनी अधिक उदासीनता बढ़ी है। आज ऐसी स्थिति है कि लोगों के पास अमीरी तो आई है ( खैर, मेरी नजर में तो गरीबी और गुलामी का तरीका बस बदला है ), क्रयशक्ति बढ़ी है, मुद्रा का प्रवाह बढ़ा है, मशीनों से हम घिर चुके हैं, लेकिन हमारा आत्मबल बेहद कमजोर हुआ है, हमारा धैर्य तुरंत जवाब देने लगता है।

शरीर का अपना मेकेनिज़्म अद्भुत है। जैसे हम शरीर को कोई भोजन देते हैं, शरीर की जैसी व्यवस्था है, वह उस हिसाब से उस भोजन से अपनी काम की चीज उठा लेता है, और बाकी फेंक देता है, जरूरी नहीं कि वह हमेशा काम की चीज संपूर्णता में लेता हो। ये ठीक उसी तरह की व्यवस्था है, जैसे हमारे यहाँ एक तकिया कलाम चलता है कि " सुनो सबकी, करो अपनी "। यानि आपने जैसे विचार के स्तर पर किसी की पूरी बात सुनी, लेकिन आपने अपनी जरूरत के हिसाब से, उस समय आपकी जैसी समझ और क्षमता रही उस लिहाज से अपने काम की चीज उठा ली, बाकी छोड़ दिया। शरीर की पूरी आंतरिक व्यवस्था ऐसे ही चलती है। आप ढेरों पोषकतत्व वाली चीजें शरीर को देते रहिए, अगर मन शरीर और ये पूरी व्यवस्था एक लय में नहीं है तो वह उन पोषकतत्वों को किसी अच्छे विचार को सुन कर अनसुना कर देने की तर्ज में निकाल बाहर करता रहेगा।

कैलोरी कार्ब फैट आदि नापने के लिए मोबाइल में एप्प आ चुका है, मनुष्य खुद अपनी एक-एक गतिविधि की सतत् माॅनिटरिंग करा रहा है। भोजन की सर्वसुलभता इस हद तक अपने चरम पर है कि हम क्या भोजन करते हैं इसकी कैलोरी भी नापने लगे हैं, कितने तरह के विटामिन अपने शरीर को दे रहे हैं इसकी भी गणना करने लगे हैं। तकनीक की इंतहाई कहिए कि वह शरीर की प्राकृतिक व्यवस्था तक को चुनौती दे रहा है। लेकिन क्या सचमुच इस सबसे हमको कोई दूरगामी लाभ हो रहा है, क्या हमें और हमारे शरीर को वास्तव में सही पोषक तत्व मिल पा रहे हैं, क्या हम वास्तव में एक स्वस्थ शरीर को धारण कर रहे हैं, क्या सचमुच हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी है, इतनी तकनीक और सुविधाओं के बावजूद क्या हम समय पर भोजन कर पा रहे हैं, क्या हम जीवन के प्रति सहज हुए हैं, अगर ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है तो यह वाकई चिंता का विषय है जिस पर हमें विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।



Sunday, 24 September 2023

काइयां है जरूरी

एक परिचित हैं। उम्र में मेरे ठीक दुगुने हैं। गजब मेहनती, तंदुरूस्त, भोजन और स्वास्थ्य के प्रति गजब की सजगता। लेकिन शायद मेरे अलावा दुनिया का हर दूसरा आदमी इन्हें जमकर गरियाता है। अगले का स्वभाव ही ऐसा है। कुछ समय तक मैं भी इन्हें गरियाने वालों में से एक था लेकिन अब मैं ऐसा बिलकुल नहीं करता हूं। और ये हमेशा पता नहीं क्यों खासकर मेरे से अच्छे से सहज होकर पेश आते हैं, मैं भी उनका बराबर सम्मान करता हूं।

अब गरियाने की वजह पर आते हैं। एक शब्द होता है "काइयां"। तो आजतक आपने जितने भी काइयां अपने अभी तक के जीवन में देखे होंगे, ये उनके भीष्म पितामह हैं। छोटे-छोटे ठेले वालों को इतना तंग कर देते हैं कि अगला विवश होकर इन्हें छूट दे देता है, जबकि इनकी मासिक पेंशन उस ठेले वाले की कुल वार्षिक आय से अधिक होगी। लेकिन इनसे कौन जीते। अभी हाल ही में शहर में एक जगह दृष्टिबाधित लोगों का शिविर लगा, उन सभी के लिए भंडारा लगा था, इनको पता चल गया, ये उसमें भी भोजन करने चले गये और यह जानकारी उन्होंने खुद मुझे दी कि फलां जगह भोजन करके आया हूं, स्वादिष्ट खाना था। अब यह सुनकर मैं मुस्कुरा ही सकता था। 

हममें से लगभग हर कोई सब्जियां लेने बाजार जाता है। ये महाशय हमेशा शाम को ठीक दिन ढलने के वक्त जाते हैं, कारण आप समझ गये होंगे, उस दौरान हर कोई बाजार समेट रहे होते हैं तो बची खुची सब्जियां मुंह मांगी कीमत पर बहुत सस्ते में मिल जाती है। जब से मुझे यह तथ्य पता चला, मैं इस तथ्य की गहराई पर गया तब मैंने सोचा कि इन जैसे लोगों का भी समाज में होना बेहद जरूरी है, ये अगर नहीं होंगे तो उन सब्जियों का उपयोग आखिर कौन करेगा। उस दिन से मैंने उन्हें गरियाना छोड़ दिया और उनका प्रशंसक बन गया। सनद रहे, एक काइयां कभी भोग नहीं करता, और इसलिए एक काइयां व्यक्ति जब दुनिया छोड़ कर जाता है तो सबसे अधिक पूंजी दूसरों के लिए पीछे छोड़ जाने वाला वही होता है। 

Thursday, 21 September 2023

My take on CGPSC 2022 Controversy

राज्य लोक सेवा आयोग के भूतपूर्व अध्यक्ष साहब ने असल में कुछ नया नहीं किया है। परंपरानुसार ही काम किया है‌‌। हां, ये जरूर है कि अति की है। हर कोई अपने बच्चों के लिए रास्ते बनाता है, यह सर्वविदित है, हर कोई करता है। लेकिन कोशिश ये रहती है कि मामला कम से कम विवादित रहे। जैसे इन्होंने सबको सीधे डिप्टी कलेक्टर का पद दे दिया, ठीक उसी तरह कई लोग अपने बच्चों के लिए किसी विभाग से आजीवन टेंडर का मामला सेट कर देते हैं या व्यापार संबंधी कोई और विकल्प तैयार कर देते हैं। लेकिन उसमें विवाद कम होता है, क्योंकि वहां प्रतियोगिता कम है। ठीक वहीं प्रतियोगी परीक्षाओं में, जिसमें जाने के लिए लाखों लोग अपना पैसा, अपनी जीवनी ऊर्जा फूंक रहे हैं, मारकाट मची हुई है, उसमें भी सबसे हनक वाले मलाईदार पदों को छीन के ले लेना वाकई हिम्मत का काम है, या यूं कहें कि दोयम दर्जे का काम है। पहले भी यह होता रहा है लेकिन इस बार इतना खुल के सामने आने का कारण यह भी है कि साहब सबको पीएससी से चयन करवा दिए, एक दो को ठेका दिलवा देते, एनजीओ वगैरह का मामला सेट कर देते, थोड़ा मामला बैलेंस रहता। लेकिन अब सबका अपना-अपना तरीका है, अपनी-अपनी भूख, कोई किसी की मानसिकता तो नहीं बदल सकता है। असल में जब किसी व्यवस्था में भले वह जुगाड़ की हो या ईमान से काम करने की, जो एक परंपरा बन जाती है, उस परंपरा को तोड़ना इतना आसान नहीं होता है, जो भी आता है, उसी परंपरा के मुताबिक काम करता है। अभी संभवतः चुनाव के बाद जो भी नये वाले अध्यक्ष पद पर आएंगे वे भी कुछ नया नहीं कर देंगे, हो सकता है प्रतिशत में इनसे कम जुगाड़ वाली परंपरा का निर्वहन करें। लेकिन चलेगा वही जो चलता आ रहा है। बाकी देखते हैं पुराने वाले साहब के लिए प्रभु की झोली में क्या है।




हाईकोर्ट ने पीएससी मामले में क्या किया - चयन पर सवाल उठाया और कड़ी टिप्पणी की। अब इस कड़ी टिप्पणी में भी अगर अभ्यर्थियों को न्याय होता दिखता है तो इस पर अब क्या ही कहा जाए। " हाइकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की, शर्म करो पीएससी" यह वाक्य कहकर विपक्षी नेता भी सोशल मीडिया में खानापूर्ति कर छात्रों की भावनाओं का मखौल बना रहे हैं। सब कोई अपनी दुकानदारी में व्यस्त हैं, छात्र हताश निराश परेशान, उसे समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर क्या ही करे। हाईकोर्ट भी मनोरंजन देने में, इस जख्म को नासूर बनाने में कोई कमी नहीं कर रहा है। जज का इस पूरे मामले में भोले मासूम की तरह " अरे! ये तो बहुत गलत बात है " ऐसा कहना न्याय की आस लिए लोगों के मुंह में जोरदार तमाचा है। छात्र तो मानों इनके लिए कीड़ा मकोड़ा है, मतलब एकदम तमाशा बना दिए हैं। गांधी बाबा कोर्ट को ऐसे ही नहीं गरियाता था। इस देश में पीएससी व्यापम सरकारी संस्थाओं से सबसे अधिक भ्रष्ट कोई है तो वो न्यायपालिका है। इस सच को जितनी जल्दी स्वीकार लें, सेहत के लिए उतना ही बेहतर।

अगली सुनवाई - 5 अक्टूबर 
आचार संहिता - 6 अक्टूबर ( संभवतः )

सुनवाई की तारीख भी मजेदार है, ठीक आचार संहिता के एक दिन पहले। इसी से अंदरखाने की हकीकत को देखा समझा जा सकता है, खैर। दो सप्ताह का समय, अंदरखाने में खूब उठापटक होगी, जाँचकर्ता कौन- राज्य शासन, इन्हीं के हाकिम इन्हीं के मुल्ज़िम वाली बात, सो चमत्कार की उम्मीद तो कम है, लेकिन कुछ भी हो सकता है। कुल मिला के अब मामला बहुत दिलचस्प हो गया है, अब देखना यह है कि क्या कोर्ट सुनवाई को किसी ठोस फैसले में तब्दील करेगा या हमेशा की तरह स्वांत: सुखाय की तर्ज पर राज्य शासन की जय करते हुए खुद को किनारे कर लेगा।

नितेश के पिता का नाम राजेश है, वह टामन सोनवानी का पुत्र ही नहीं है, शिक्षाकर्मियों का उध्दार करने वाले अधिवक्ता सिद्दीकी साहब के इस इस्तक्षेप याचिका से jolly llb फिल्म याद आ गई। जिसमें अरसद वारसी बेबस होकर कहता है कि कार ने नहीं ठोकी थी जज साहब, वो तो ट्रक था, जो कि एक साल बाद ट्रेन हो जाएगा। इसी तर्ज पर कल जाकर देश काल परिस्थिति को देखते हुए नितेश भाई को अनाथ भी घोषित किया जा सकता है और प्रज्ञा नायक नारी निकेतन से गोद ली हुई बालिका भी बनाई जा सकती है।




सोनवानी साहब ने जो किया है, उसकी जितनी तारीफ की जाए वह कम है। इस वाक्य को पढ़कर शायद बहुत लोगों को व्यक्तिगत होकर मुझे अपशब्द कहने का खूब मन करेगा, कह भी सकते हैं, आपके विवेक पर, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि जिसे आप अपशब्द कहेंगे उसने पिछले दस साल में आपसे बड़े बड़े भुक्तभोगी देखे हैं जिनका जीवन ही तबाह कर दिया गया, या जो भले आज व्यवस्था में किसी पद पर हैं, लेकिन उन्हें नंबर ही नहीं दिया गया, वरना वे आज किसी और पद पर होते। आज से दस पंद्रह साल पहले भी लोग आवाज उठाते थे कि आखिर इतना अच्छा पेपर लिखने के बावजूद कैसे इतना कम नंबर मिला, इंटरव्यू में इतना कम कैसे दिया, लेकिन उस समय ऐसे लोगों को जमकर अपमानित किया जाता था, उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा किया जाता था, जबकि वे उस समय वही कर रहे थे, जो आज अधिकतर लोग सोशल मीडिया में कर रहे हैं, इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल पिछले बीस साल से उठाए जा रहे हैं, नया नहीं है। इंटरव्यू में इस बार एक जिस अभ्यर्थी को बुलाया ही नहीं गया, ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं, ये कोई नई घटना नहीं है, जो पहली बार देख रहा है, जाहिर है उसे आश्चर्य होगा ही। 2003 से कम अधिक यही चल रहा है लेकिन कभी ऐसे खुलकर इतना उजागर नहीं होता था, और तब तो सोशल मीडिया भी नहीं था तो लोगों को उतना पता ही नहीं चल पाता था। प्री तक पास नहीं किए रहते ऐसे लोगों का भी चयन होता रहा है, एक बार हाईकोर्ट ने दबोचा था तो चयनित छात्र सुप्रीम कोर्ट से मामला सेट करवा लिए। आप क्या ऐसे लोगों से लड़ लेंगे जो सुप्रीम कोर्ट का भी इस्तेमाल कर लेते हैं, आप नहीं लड़ सकते हैं, भाई हमारी हैसियत नहीं कि अपना परिवार, अपना जीवन दांव पर लगाकर इनसे लड़ लें, आपकी पहुंच है तो आप लड़ लें। दूसरी बात ये कि अगर आपकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि कमजोर है, आपकी पहुंच नहीं है, आप भरसक तैयारी कर लें, आपको नीचे किया ही जाएगा, ये विधान है, और यही रहेगा। आप व्यवस्था को नहीं बदल सकते हैं। 

सोनवानी साहब ने इसी व्यवस्था के परंपरानुसार खुल कर ठोक पीट के काम करते हुए व्यवस्था रूपी इस पूरे मवाद को सबके सामने लाने का काम किया है, जो काबिल ए तारीफ है। उन्होंने अपने काम से यह दिखाया है कि भैया ऊपर से लेकर नीचे पूरी व्यवस्था ऐसी ही है और आज नहीं तो कल आपको इस कटु सत्य को स्वीकारना ही पड़ेगा। सोनवानी साहब ने एकदम ठेठ देसी अंदाज में काम किया इसलिए सब कुछ सामने दिख गया, यूपीएससी जैसी संस्थाओं में इनके गॉडफादर बैठे रहते हैं जो इनसे कहीं अधिक शातिर होते हैं, वे पूरी सेटिंग कर स्वर्ग भी सिधार चुके होंगे लेकिन उन्होंने कितनों का जीवन तबाह किया होगा, ये शायद आपको हमको इस जन्म में पता ही नहीं चले, तो उनकी तुलना में तो सोनवानी साहब बहुत ईमानदार हैं, कम से कम इनका किया धरा सब कुछ आपको हमको सामने दिख तो रहा है। 

अस्तु।

Sunday, 17 September 2023

Psychological similarities in approaching cgpsc mains and engineering theory exams -

इंजीनियरिंग के फाइनल सेमेस्टर में मुझे 83% मिला था। कैसे मिला, यह खुद मेरे लिए आजतक जाँच का विषय है। क्योंकि मैंने ऐसे ऐसे उत्तर लिखे थे कि अगर मेरा पेपर आउट किया जाए तो अभी जो राज्य सेवा परीक्षाओं में "आईने दहशाला" का उत्तर वायरल हो रहा है। कुछ एक वैसा मिल जाएगा, स्तर उससे बेहतर होगा, उतना हवा हवाई भी नहीं होगा, खैर। और ऐसा करने वाला मैं अकेला नहीं था, एक बहुत बड़ी आबादी यही करती थी, इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपवाद स्वरूप बहुत लोग वास्तव में मेहनत भी करते थे, लेकिन उसके बदले उन्हें वैसा मिलता नहीं था। पेपर में फेंकने की स्किल की बात करें तो ये एक दिन में डेवलप नहीं हुई, ये कला भी मुझे देर से समझ आई। 

हमारे सीनियर्स कहा करते - देखो बालक, अपराधबोध तो होगा लेकिन पूरा पेपर भर के आना है, जो पढ़ के गये हो, उसे ही मिला जुला के लिख आओ, कहानी गढ़ो, चेक करने वाले को उलझाओ, उसे भी काम निपटाना है और तुम्हें भी। पेपर के शुरूआती पेज में पूरी ईमानदारी से उत्तर लिखो, यहाँ फेंकने का काम थोड़ा भी न हो, यह सुनिश्चित करो। फेंकने का काम वहाँ शुरू करो जहाँ चेक करने वाले की आंखें थकने लगे, वहां उसे छंकाओ। बड़े प्रश्नों में भी शुरूआत और अंत सही रखो, बीच में खेलो। लेकिन अंतिम लक्ष्य यह कि पेपर भरा हुआ दिखना चाहिए, गंभीरता दिखनी चाहिए कि तुम्हें थोड़ा थोड़ा सब आता है, दिखना चाहिए कि तुमने प्रयास तो किया, मैदान छोड़कर भागे तो नहीं, और पेपर बहुत ज्यादा भी नहीं भरना है लेकिन खाली भी नहीं दिखना चाहिए और यह सब काम सुंदर राइटिंग में करो। सीमित समय रहता है, ज्यादा माथापच्ची करोगे, ईमानदारी से लिखूंगा सोचोगे तो कभी पूरा पेपर ढंग से लिख ही नहीं पाओगे, ह्यूमन ब्रेन की वर्किंग केपेसिटी को समझो, पेपर चेक करने वाले भी इस हकीकत को जानते हैं, इसलिए वे भी काम चलाओ वाले मोड में रहते हैं। यही हकीकत है पार्थ, इस हकीकत को स्वीकारो और अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ो। 

यहाँ आप देखेंगे कि राज्य सेवा परीक्षाओं की मेंस की तैयारी में और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में पेपर लिखने के पीछे के इस मनोविज्ञान में काफी समानताएं हैं। पिछले कुछ सालों में इंजीनियरिंग क्षेत्र के बहुत सारे लोगों का सिविल सेवा में चयन होने का कारण गणित नहीं बल्कि ये कला है, जिसमें वे बहुत पहले से निपुण होते हैं, जिस कला को सीखने में एक नाॅन-इंजीनियरिंग छात्र को काफी समय लग जाता है। मैंने भी जब यह कला सीखी तो तब तक काफी देर हो चुकी थी, छठवां सेमेस्टर आ चुका था। तब लाइब्रेरी में बैठकर जहाँ सब कोई इंजीनियरिंग की किताबें पढ़ा करते, मैंने नावेल चाटना शुरू किया, चूंकि हिन्दी मीडियम का छात्र रहा और पेपर अंग्रेजी में लिखना होता, तो भाषा की मजबूती पर, उसकी स्वच्छता पर काम किया। क्योंकि पेपर भरने के लिए भी एक अच्छा कहानीकार होना जरूरी है, और उसके लिए आपके पास एक कसी हुई भाषा का होना बेहद जरूरी है। इसलिए जैसे ही कालेज खत्म होता, लाइब्रेरी में जाकर बैठ जाता, मैंने उस दौरान खूब नावेल पढ़े, हर तरह के नावेल पढ़े, कोर्स बुक पढ़ने वाले कोई दोस्त यार पास से गुजरते तो हंसा करते कि अबे साले सप्ताह भर बाद पेपर है, रात को यहां बैठ के ये क्या पढ़ रहा है। इंजीनियरिंग के आखिरी सेमेस्टर तक मैं इस विद्या में निपुण हो चुका था, और जब मैंने इस विद्या का बढ़िया से उपयोग किया तो इसके परिणाम मेरे सामने थे। वो दिन है और आज का दिन है, तब से मैंने इस कला का उपयोग हमेशा के लिए बंद कर दिया।

Wednesday, 13 September 2023

Mantak Chia wisdom words

Que. If the goal is to build up one's sexual energy, what's the harm of sleeping with a lot of different women (or men) to increase your Life energy? 

Ans : The goal is not to build up one's sexual energy—it is to transform raw sexual energy into a refined subtle energy. Sex is only one means of doing that. Promiscuity can easily lower your energy if you choose partners with moral or physical weakness. If you lie with degenerates, it may hurt you, in that you can temporarily acquire your partner's vileness. By exchanging subtle energy, you actually absorb the other's substance. You become the other person and assume new karmic burdens. This is why old couples resemble each other so closely: they have exchanged so much energy that they are made of the same life-stuff. This practice accelerates this union, but elevates it to a higher level of spiritual experience.  So the best advice I can give is to never compromise your integrity of body, mind and spirit. In choosing a lover you are choosing your destiny, so make sure you love the woman with whom you have sex. Then you will be in harmony with what flows from the exchange and your actions will be proper. If you think you can love two women at once, be ready to spend double the life energy to transform and balance their energy. I doubt if many men can really do that and feel deep serenity. For the sake of simplicity, limit yourself to one woman at a time. It takes a lot of time and energy to cultivate the subtle energies to a deep level. It is impossible to define love precisely. You have to consult your inner voice. But cultivating your life energy sensitizes you to your conscience. What was a distant whisper before may become a very loud voice. For your own sake, do not abandon your integrity for the sake of physical pleasure or the pretense that you are doing deep spiritual exercises. If you sleep with one whom you don't love, your subtle energies will not be in balance and psychic warfare can begin. This will take its toll no matter how far apart you are physically until you sever or heal the psychic connection. It's better to be honest in the beginning. For the same reason make love only when you feel true tenderness within yourself. Your power to love will thus grow stronger. Selfish or manipulative use of sex even with someone with whom you are in love can cause great disharmony. If you feel unable to use your sexual power lovingly, then do not use it at all! Sex is a gleaming, sharp, two-edged sword, a healing tool that can quickly become a weapon. If used for base purposes, it cuts you mercilessly. If you haven't found a partner with whom you can be truly gentle, then simply touch no one. Go back to building your internal energy and when it gets high you will either attract a quality lover or learn a deeper level within yourself.

Monday, 4 September 2023

135 days around india - A Film

 About the Film

Compiling such long journeys in a form of film is indeed a complicated task, but somehow i made it. This film is a tale of a 135-day odyssey that spanned 16,000+ kilometers, touching 11 states across India. It takes u on an extraordinary journey, not merely across geographical landscapes or historical monuments, but into the depths of the human experience.

I witnessed the ever-changing landscapes, from the majestic Himalayas to the sun-kissed dry terrains, remote villages to bustling metro cities. But this film is not just about the picturesque beauty of India; it's about the people i encountered along the way. Each state has its own unique culture, language, food and hospitality. The film captures the essence of these interactions, as strangers become friends and stories intertwine.

This film is a tribute to the indomitable human spirit, the unquenchable thirst for adventure, and the courage to embrace the unknown. It is a metaphor for the relentless pursuit of one's dreams, the willingness to break free from the ordinary, and the discovery of the extraordinary within.

In the end, this cinematic piece leaves u with a profound sense of wonder and inspiration. It will remind u that the world is vast and full of untold stories, waiting for those brave enough to embark on their own epic journeys. The film on my 135-days long, All India solo winter ride is a testament to the human spirit's boundless capacity to explore, to endure, and to find meaning in the adventure called life.

Stay tuned....




Monday, 24 July 2023

एक धूर्त ऐसा भी -

किसान आंदोलन के बाद किसी एक लिखी बात को बेवजह मुद्दा बनाकर मुझे पुलिस की धमकियाँ मिलने लगी थी। मुझे भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है। मैं इतनी सी बात को लेकर स्पष्ट था कि मैंने अपनी तरफ से कोई गलती नहीं की है इसलिए मैं टिका रहा। लेकिन बात वही है, हैं तो हम इंसान। सामान्य जीवन चलता रहता है, पुलिस का जबरन फोन आए तो इंसान के मन मस्तिष्क में उथल पुथल होती ही है, सेल्फ डाउट होता ही है, मुझे भी हुआ। अपने स्वजनों से बातें की। इसी समय एक ऐसे व्यक्ति जिन्हें मैं अपना स्वजन समझता रहा। उनका असल चाल चरित्र समझ आने लगा। मुझे आज भी यकीन नहीं होता है कि दुनिया में इस तरह के हिंसक लोग भी होते हैं। 

जो वास्तव में मेरे अपने करीबी रहे उन्होंने यही कहा कि अपना ख्याल रखो, सब सही होगा, तुम संभाल लोगे। लेकिन ये जो महान व्यक्ति जिन्हें मैं अपना करीबी मानता रहा। उन्होंने‌ मुझे ऐसी-ऐसी सलाहें दी कि मैं और घबरा जाऊं। चीजों को और जटिल कर मुझे और अधिक अवसाद में ढकेलने की पूरी तैयारी करने लगे। तब समझ आया कि ऐसे लोग किसी की समस्या को कैसे अपने फायदे के लिए भुनाते हैं। ऐसा करने के लिए असल में बहुत मोटी चमड़ी चाहिए होती है। उन्होंने कहा था - अगर तुमने कुछ गलत किया ही नहीं है तो बराबर पुलिस से बात करो और उनके सामने और झुक जाओ, खैर मैंने उनकी किसी बात पर अमल नहीं किया। मेरा तर्क यही रहा कि जब मैंने कुछ किया ही नहीं है तो क्यों किसी को जवाब दूं, मेरी गलती है तो आकर मेरे खिलाफ कार्यवाई कर लें, मेरी अंतरात्मा ने आखिर तक यही कहा और इसी ने मुझे संभाला भी। 

जिनको करीबी मानता रहा उन्होंने तो एक दिन यह तक सलाह दे दी कि फलां जेल चले जाओ, हम भी जेल में रहे हैं, तुम्हारे लिए एक बढ़िया जेल की व्यवस्था कर देते हैं, बढ़िया मौज करके आओ, बस रह के आओ, माहौल देख के आना बढ़िया, नया अनुभव रहेगा। मैं उनकी यह बात सुनकर हैरान था। मैंने उस वक्त यही सोचा कि एक तो सामने वाला समस्या में है, भयानक उलझन में है, उसमें भी जो व्यक्ति आपको अलग-अलग अनुभव देने के नाम पर जेल में रहने की सलाह दे रहा है वह सब कुछ हो सकता है, आपका करीबी आपका शुभचिन्तक तो हो ही नहीं सकता। एक बात और समझ आई कि जो आपका अपना है वह कभी आपके निजी जीवन में दखल नहीं देता है, आप पर भरोसा करता है कि आप संभाल लेंगे, अदृश्य रूप से वह आपके साथ रहता है, उसकी दुआएं आपके साथ रहती है।

फिर धीरे-धीरे मैंने इस महान आत्मा से दूरी बना ली, इसको फुटेज देना बंद कर दिया। इसने जबरन एक दो बार और मेरे व्यक्तिगत जीवन में दखल देने की कोशिश की, लेकिन मैंने अपने सारे दरवाजे इस जैसों के लिए हमेशा के लिए बंद कर दिए। वैसे, ये महान आत्मा अभी भी मेरी फेसबुक में जुड़ा हुआ है, लेकिन इसे तूल देना बंद कर दिया है। अगला भी देखता सब है, बस अब मेरी पोस्ट लाइक नहीं करता। क्योंकि इसको ये समझ आ गया कि मैं इसकी सारी करतूतें समझ चुका हूं। अभी की स्थिति यह है कि ये अब बहुत अधिक बीमार हो चुका है, दिवालिएपन की स्थिति में जा चुका है, चेहरे के हाव-भाव से आजकल खुलके दिखता भी है। लेकिन ये आज भी लोगों के जीवन में घुसकर ऐसे ही चरस बोते रहता है, उनको ऐसे ही गलत सलाह देकर फंसाता है, लेकिन वो कहते हैं न, धूर्तता की भी अपनी एक उम्र होती है, उम्र हो चुकी है, उसके दिन लद चुके हैं। ऐसे लोगों की धूर्तता को समाज अपने आप देर सबेर पहचान ही लेता है, और यही हो भी रहा है, लोग इसे किनारे करने लगे हैं। और यही होना भी चाहिए। कचरे को एक समय के बाद डंप कर देने में ही भलाई होती है। 

Sunday, 2 July 2023

गपोड़ी और सोने का पिंजरा - एक लघुकथा

प्राचीन समय में एक बहुत विख्यात गपोड़ी हुआ करता था। थोड़ा बहुत पढ़ा-लिखा था तो हर किसी को अपने गप्प का शिकार बना लेता। लोगों को अपनी बातों से फुसलाकर, उनके सामने झुककर उनका विश्वास जीत लेता और अंत में उन्हें धोखा‌ देकर गायब हो जाता। इसी तरह उस गपोड़ी ने झूठे तरीके से एक दूसरे नगर की राज कन्या से विवाह भी कर लिया। समय के साथ राज कन्या को गपोड़ी की हकीकत पता चलती गई। अब गपोड़ी उस कन्या से पीछा छुड़ाने के तरीके खोजने लगा लेकिन चूंकि उसने पहले ही अलग अलग नगरों में बहुत लोगों को अपने गप्प का शिकार बनाया था तो उसके लिए सारे रास्ते पहले ही बंद हो चुके थे। राजकन्या ने अपने दरबानों को आदेश दिया कि गपोड़ी को नगर से बाहर कहीं भी जाने की इजाजत न दी जाए। बाहर जा नहीं सकता था, और अंदर मिलने वाली राजसी सुविधाएं, उसे छोड़ नहीं सकता था। कुछ इस तरह गपोड़ी सोने के पिंजरे में हमेशा के लिए कैद हो गया।

समाप्त।

Sunday, 25 June 2023

डेवलपमेंट सेक्टर की नंगी हकीकत -

डेवलपमेंट सेक्टर यानि समाज सेवा। इसमें आप छोटा बड़ा एनजीओ चलाने वाले, बिस्कुट बांटने वाले से लेकर सेमिनार कराने वाले सबको जोड़ लीजिए। जो लोग जितने अधिक अपने व्यक्तिगत जीवन में असामाजिक होते हैं, वे उतने ही बड़े सामाजिक कार्यकर्ता होते हैं। अमूमन इस क्षेत्र के लोगों के प्रति भारत के आम लोगों के मन में बहुत अधिक सहानुभूति रहती है और यह प्रथम दृष्टया स्वाभाविक भी है क्योंकि जमीन में यही जाकर अपना चेहरा दिखाते हैं, काम करते हैं। चूंकि आम आदमी सीधा सपाट जीवन जी रहा होता है, उसी में ही तमाम तरह के दायित्व, कर्तव्य, जिम्मेदारियां एवं अनेक तरह की सामाजिकताएं निभा रहा होता है, और जब वह इसी सब में फंसा होता है तो उसे यह अलग से ये सामाजिक कार्य का दिखावा करने वाले लोग बहुत ही अधिक विशिष्ट मालूम होते हैं, जबकि कायदे से देखा जाए तो ये भी मासिक तनख्वाह पर होते हैं और विशुध्द नौकरी काट रहे होते हैं। 

किसी भी व्यवस्था के लिए या सरकार के लिए यह संभव नहीं हो पाता कि वह अपनी योजनाओं या उद्देश्यों को समाज के हर एक व्यक्ति तक पहुंचा दे। कई बार बहुत कुछ छूट ही जाता है, इसी गैप को भरने के लिए, इसी वाल्व को जोड़ने के लिए समाजसेवी संस्थाओं की जरूरत सरकारों को पड़ती रहती है और वे इनका समय-समय पर इस्तेमाल करते रहते हैं या यूं कहे कि सरकार के एक अस्थायी अंग की तरह कार्य करते हैं। चूंकि ये लोगों के दुःख पीड़ा और असंतोष को पाटते हैं, उसे उद्वेलित होने से रोकते हैं, यानि एक सरकार रूपी व्यवस्था की छवि को ही बचाने का काम करते हैं, इसलिए मैं इन्हें सेफ्टी वाल्व भी कहता हूं। और यह कोई मामूली काम नहीं है, पीआर का काम तो इस काम के सामने कुछ भी नहीं। जमीन पर किए गये काम का वजन हमेशा अधिक ही होता है। अब चूंकि इतना बड़ा काम करते हैं तो बदले में इन्हें एक अच्छी धनराशि भी प्राप्त होती है। यूं समझिए कि एक ठीक-ठाक समाजसेवी की तनख्वाह एक जिलाधीश या उपजिलाधीश के समकक्ष ही होती है। और उतनी ही जिम्मेदारियाँ, काम का भयानक दबाव, तनाव और उतनी ही सुविधाएँ भी मिलती है। और हिंसा भी उसी स्तर की करनी पड़ती है, असल में उससे कहीं अधिक करनी पड़ती है, लेकिन विनम्रता और सामाजिक कार्यकर्ता की ओढ़ी हुई छवि के आगे सब कुछ छिप जाता है, ये इस कला में निपुण भी हो जाते हैं।

इस सेक्टर के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ अधिकतर ऐसे लोगों को जोड़ा जाता है जिसे समाज ने हाशिए पर ढकेल दिया हो या किसी कारणवश दारूण जिंदगी जी रहे हों। अधिकतर तलाकशुदा, परित्याक्ता, अनाथ लोग जो थोड़े बहुत पढ़े-लिखे, स्किल्ड होते हैं, वे इस सेक्टर के लिए बहुत आसान शिकार होते हैं। दूसरा बड़ा शिकार ग्रेजुएट बैचलर युवा बनते हैं, खासकर वे बैचलर जिनके घर-परिवार का माहौल कुछ ठीक नहीं रहता है, इन्हीं के भीतर कुछ अलग करने का असंतोष ठीक ठाक उबाल मारता है, जिसका बढ़िया इस्तेमाल किया जाता है। अब इन सभी लोगों के लिए यह सेक्टर एक तरह से संरक्षक भी भूमिका में काम करता है, इससे एक भावनात्मक दबाव पहले ही तैयार हो जाता है कि हमने आप पर बहुत बड़ी कृपा की। आप देखिएगा कि भारत में इस एक सेक्टर में काम करने वाला व्यक्ति आसानी से इस मकड़जाल से नहीं निकल पाता है, क्योंकि आपके दिल दिमाग से खेला जाता है, आपको नौकरी नहीं दी जाती है, आपको तो एक परिवार का हिस्सा बनाया जाता है और उसी एवज में तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है, तभी तो आपसे बंधुआ मजदूर की भांति दिन रात काम लिया जा सकता है। इसलिए आप देखेंगे कि भारत के लगभग सभी एनजीओ मानवीय रिश्ते बनाने पर जोर देते हैं। ये एक तरह का इंवेस्टमेंट होता है, इसी नींव पर तमाम तरह की हिंसाएं की जाती है। 

डेवलपमेंट सेक्टर में शीर्ष पदों पर काम करने वालों की बात करते हैं। इन पदों पर अधिकतर सभ्रांत परिवारों के लोग होते हैं। ऐसे लोग जो आर्थिक सामाजिक रूप से समृद्ध होते हैं, जिन्होंने किसी भी तरह की घरेलू हिंसा नहीं देखी होती है, जीवन में बहुत अधिक किसी भी प्रकार का तनाव या कोई उतार-चढ़ाव नहीं देखा होता है। यह लोग एक कॉरपोरेट या बिजनेस की तरह इस सेक्टर में काम करते हैं। अब चूंकि इस सेक्टर में काम करते हैं तो इस सेक्टर को चलाने के लिए बरती जाने वाली तमाम तरह की हिंसाएं, तीन तिकड़म, मीडियाबाजी और फंडबाजी भी इनके द्वारा की जाती है। इस सेक्टर में काम करते रहने की वजह से इन्हें अपनी वेशभूषा, आचार-व्यवहार और रहन-सहन के तरीकों पर काम करना पड़ता है, बहुत ही सामान्य जीवनशैली अपनाते हैं। वैसे ही अपने आप को दिखाने की कोशिश करते हैं जैसा भारत का आम ग्रामीण मध्यमवर्गीय व्यक्ति दिखता है, यही इनकी दुकान खड़ी करने और इनके पीआर के लिए सबसे जरूरी तत्व होता है, एक बार वैसी छवि तैयार हो जाती है, फिर हमेशा के लिए आराम हो जाता है। और फिर इलीटनेस अगर जीते भी हैं तो उसे एक बंद कमरे तक ही रखते हैं जिसकी कोई थाह नहीं पाता है। 

इस सेक्टर के साथ एक सबसे मजेदार चीज यह है कि इस सेक्टर में काम करते हुए आप पूरा जीवन खपा देंगे तब भी आपको अंत तक समझ ही नहीं आएगा कि आप वास्तव में कर क्या रहे हैं। एक चोरी करने वाले, गांजा शराब बेचने वाले तक को स्पष्टता रहती है कि वो फलां अपराध कर रहा है, लेकिन इस सेक्टर के लोग आजीवन भ्रम में रहते हैं कि वे समाज के लिए काम कर रहे हैं। असल में ये लोग समाज के लिए नहीं वरन् समाज को पीछे धकेलने के लिए काम कर रहे होते हैं। समाज को पश्चगामी दिशा में ले जाने में इनका सर्वाधिक योगदान होता है। एक स्वस्थ समाज के निर्माण में ये सबसे बड़े शत्रु होते हैं।

मेरी एक करीबी हैं। इस क्षेत्र के प्रति सहानुभूति रखती हैं, और मैं उनके इस व्यक्तिगत फैसले का सम्मान भी करता हूं। क्योंकि वैसे भी नौकरीपेशे लोगों के पास इतनी गहराई में जाकर चीजों को देखने समझने आंकलन करने का समय नहीं होता है। अगर कहीं कुछ डोनेशन करना होता है, वे कर देती हैं। मेरी करीबी दीदी विश्वास के साथ हमेशा यह कहती हैं कि ठीक है यार, जाने दो, अंततः कुछ तो लोगों के पास पहुंचेगा ही। इस पर मैं यही कहता हूं कि आप सहयोग करें या ना करें पहुंचेगा उतना ही, जितना पहुंचना चाहिए, आपके योगदान से कुछ कम ज्यादा नहीं हो जाएगा। दूसरा वह कहती हैं कि भारत के युवाओं को एक साल डेवलपमेंट सेक्टर में देना चाहिए। मैं उनको विनम्रता से आज कहना चाहता हूं कि गलती से भी ऐसी गलती न की जाए, इससे बेहतर हो कि युवा खुद से अकेले भीख मांग ले या रेहड़ी चला ले, लेकिन भूल से भी इधर समय न खपाए। क्योंकि यहां बौध्दिक मानसिक क्षति होने की भरपूर गारंटी होती है।

जब मैं इस सेक्टर का नया नया हिस्सा बना था, तब मुझे एक करीबी ने कहा था कि ये समाज कार्य क्या बला है। और हम क्यों इतने खाली हैं कि सामाजिक कार्य करना चाहते हैं, क्या सचमुच हम‌ इतने असामाजिक हो चुके हैं कि हमें अलग से ये सब करने‌ की आवश्यकता आन पड़ी है? उनके इन सवालों ने मुझे कभी दिग्भ्रमित होने नहीं दिया, मुझे हमेशा अपने आप को बचा ले जाने में मदद की। 

एक स्वतंत्र रिपोर्ट के मुताबिक भारत में समाज कार्य के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतर लोगों का शादी शुदा जीवन सफल नहीं हो पाता है, तुलनात्मक रूप से यहाँ आंकड़े चौंकाने वाले हैं। अन्य सेक्टर्स की तुलना में सबसे अधिक तलाक इसी सेक्टर में देखने को मिले। प्रेम वाले रिश्तों के लिए बहुत कम जगह होती है, क्योंकि इस सेक्टर में काम करने वालों के भीतर सबसे पहले प्रेम के नवांकुर को खत्म कर दिया जाता है, आबोहवा ही ऐसी रहती है। इसके अलावा एक बहुत बड़ी आबादी ऐसी रही जिन्होंने आजीवन शादी ही नहीं की, इसके पीछे तुर्रा यह रहा कि समाज कार्य को ही जीने का आधार बना लिया, खैर शादी न करना व्यक्ति का अपना निजी मसला होता है, लेकिन इस सेक्टर की कहानी अलग होती है, जिसने इस सेक्टर को करीब से देखा है, उसे अच्छे से मालूम होता है कि ऐसा क्यों होता है। 

तस्वीर : इस भौकाल तस्वीर में पीठ दिखाता हुआ घृणित व्यक्ति मैं ही हूं जिसने कभी समाजसेवा रूपी पाप किया था और महिलाओं को माहवारी जागरूकता के विषय में प्रवचन दिए थे। 

इति।।



Wednesday, 14 June 2023

मोदी जी और चार घंटे नींद -

2014 में जब आदरणीय नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री बनकर आए तब उनकी एक मजबूत छवि पेश करने के लिए तमाम तरह की चीजें मीडिया में प्रसारित की गई। कॉमिक्स में प्रधानमंत्री जी को बाल नरेंद्र के रूप में दिखाया गया और कहानियां गढ़ी गई। उन कहानियों का मोटा-मोटा सार यही था कि प्रधानमंत्री जी बचपन से जुझारू, संघर्षशील रहे हैं। फिर कुछ समय बाद उनके सात्विक भोजन और निरंतर योग करने को लेकर भी सकारात्मक चीजें सामने लाई गई। इन सब का सार यही रहा कि देश के प्रधानमंत्री शारीरिक रूप से स्वस्थ और सक्रिय व्यक्ति हैं। ऐसा नहीं है कि ये पहले ऐसे नेता या प्रधानमंत्री हैं जो ऐसा कर रहे थे, शक्ति प्रदर्शन हर कोई करता रहा है, एक नेता में यह गुण न हो तो वह टिक भी नहीं पाएगा। शक्ति प्रदर्शन वाले उसी क्रम में काम करने वाली छवि बनाए रखने के लिए यह तक प्रचारित किया गया कि प्रधानमंत्री जी केवल 3-4 घंटे ही सोते हैं। इस पर नहीं जाते हैं कि वे कितना सोते होंगे, असल‌ में ऐसा प्रचारित करने का उद्देश्य यही था कि प्रधानमंत्री भले कैसे भी हों लेकिन वे एक बेहद सक्रिय, ऊर्जावान व्यक्ति हैं। देश के लोगों के मन मस्तिष्क में प्रधानमंत्री की एक मजबूत छवि बनाई गई और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। आज शक्ति प्रदर्शन का युग है। और अपनी सुरक्षा के लिए, स्थायित्व के लिए हर कोई तोड़ मरोड़ के चीजें पेश करता ही है। 

अब नींद की समयावधि की बात करते हैं। साधु बाबा लोग जो तमाम तरह की साधना करते हैं, जिनको घर परिवार नहीं चलाना होता है, जो गृहस्थ की जिम्मेदारियों और दुनियावी दांवपेंच से अलग होकर सिर्फ भजन साधना त्राटक करते हैं। वे कितने भी समय खाएं सोएं किसी को फर्क नहीं पड़ता है, कोई बर्तन धोने के लिए उनके खा‌ना खा लेने का इंतजार नहीं कर रहा होता है। ऐसा व्यक्ति ही घंटों बैठकर साधना कर सकता है, अपनी सांसों को साध सकता है, कम‌ सोते हुए भी सक्रिय रह सकता है, क्योंकि दुनिया जहाँ का और कोई तनाव है ही नहीं तो ऐसे में कम नींद से ही काम चल जाता है। कौन सा सुबह उठकर आफिस जाकर चार लोगों को मैनेज करना है या व्यापार संभालना है। दूसरा यह भी है कि शारीरिक रूप से भी खुद को बहुत खपाता नहीं है तो सारी ऊर्जा ध्यान साधना में लग जाती है, ऊर्जा स्थिर बनी रहती है।

हममें से जो कोई भी फेसबुक पर हैं, हम सभी गृहस्थ जीवन जीते हैं। सुबह का नाश्ता दो वक्त का भोजन, घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ, नौकरी व्यापार कृषि कार्य इन सब में लगे रहते हैं तो पूरा मन शरीर खप रहा होता है। इसलिए समय पर ठीक-ठाक भोजन की भी आवश्यकता होती है और 6-7-8 घंटे की अच्छी नींद भी चाहिए होती है ताकि अनवरत गृहस्थ की जिम्मेदारियों का अच्छे से पालन किया जा सके। गृहस्थ में रहते हुए इन जिम्मेदारियों जा निर्वहन करते हुए कहीं से भी संभव नहीं है कि व्यक्ति 3-4 घंटे सोकर सक्रिय रह सके। अगर कोई ऐसा कहता है तो वह सीधे सीधे बेवकूफ बना रहा है। हां कभी एक दो दिन के लिए समझ आता है, और इतना तो हर भारतीय करता है, कभी अस्पताल का जागरण या कभी शादियों की जिम्मेदारी या अन्य ऐसी किसी आपात स्थिति में पूरे 24 घंटे बिना सोए रह लेता है, लेकिन अगले दिन उसे भी नींद की आवश्यकता होती है। 

अपनी बात कहूं तो शरीर को इन सब अलग-अलग प्रयोगों के नाम पर सिर्फ और सिर्फ यातना ही दी है। क्या ठंडी क्या गर्मी क्या बरसात, माइनस ठंड में बिना कंबल के रहना, भीषण गर्मी में बिना कूलर पंखे के रहना, ठंड में ठंडे पानी से नहाना, बिना नींद के 25-30 घंटे खुद को जागृत रखने की कोशिशें, 70-80 घंटे बिना भोजन के रहना, 22-23 घंटे लगातार अकेले बाइक चलाना। असल में इन सब का हासिल कुछ भी नहीं होता है। आपके हिस्से बैचेनी, अपच, अनिद्रा, अस्थिरता ही आती है। खुद को भीड़ से अलग महसूस करने के लिए ये सब खयाली पुलाव एक समय तक ही ठीक लगता है। खासकर एक गृहस्थ की तरह जीवन जी रहे व्यक्ति को तो इन सब चीजों से दूर ही रहना चाहिए। जो दुनियावी चीजों से विरक्त हो चुका है, उसे ही यह सब प्रयोग शोभा देता है। 

जब भी कोई गृहस्थ कम नींद का महिमामंडन कर अपने आप को महान दिखाता है और लोगों को बरगलाने का प्रयास करता है, तो ऐसे लोगों के लिए हंसी और दया दोनों ही आती है। विशिष्टता और आत्मश्लाघा से ग्रसित ये लोग असल में जीवन जीने को ही बहुत जटिल और भारी काम बना लेते हैं। असल में ये लोग अपने आप को‌ महान सिध्द करने, भीड़ से अपने आप को जुदा दिखाने के लिए ऐसा करते हैं। इसकी पूर्ति के लिए अपने भोजन, दैनिक जीवनशैली और नींद के तरीकों को जान बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते रहते हैं। और यह सब फर्जी तरीका इन्होंने देश के प्रधानमंत्रियों से ही तो सिखा होता है। एक प्रधानमंत्री का एक बार समझ आता है, उसकी तो हर एक गतिविधि खबर है, सनसनी है। अगर वह मशरूम भी खा रहा तो उसकी एक अलग स्टोरी बनेगी। लेकिन इन तथाकथित गृहस्थी जीवन जी रहे गुमनाम सरीखे लोगों को किस बात का गुमान रहता है, समझ नहीं आता है। प्रधानमंत्री का कम सोने का प्रचार करना शक्ति प्रदर्शन ही है, सत्ता बनाए रखने के लिए यह सब प्रपंच एक नेता के लिए जरूरी भी है। और ऐसा करने वाले मोदीजी अकेले नहीं हैं। स्व. इंदिरा गांधी बेलछी नरसंहार के बाद हाथी में चढ़कर उस गांव तक गई थी, इसके पीछे भी शक्ति प्रदर्शन ही था क्योंकि तब आयरन लेडी के रूप में प्रचारित प्रधानमंत्री की उम्र भी ठीक ठाक थी, और जो कांग्रेस उस समय डूब रही थी, उसे इस शक्ति प्रदर्शन के बाद मानो संजीवनी मिल गई थी। तब सोशल मीडिया होता तो आयरन लेडी उतनी ही ट्रोल होती जितना आज प्रधानमंत्री को संसद के सामने शीश झुकाने के लिए किया गया। राजनीति में शक्ति प्रदर्शन के लिए ऐसी चीजें चलती रहती है। 

पुनश्च : कम सोने को लेकर खुद को महिमामंडित करने वालों से बस यही कहना है कि आपसे लाख गुना बेहतर वे कामगार, मजदूर और वे लाखों ट्रक वाले हैं, जिनके पास अपनी संघर्ष गाथा सुनाने के लिए एक अदद भाषा तक नहीं होती है। जो दिन रात चौबीसों घंटे डाब खाते हुए या नशे का सेवन करते हुए अपनी नींद मारकर देश समाज को बेहतर बनाने में अपना सर्वस्व झोंक रहे होते हैं। सनद रहे कि आप कम सोने का प्रचार कर, उपवास कर उस पर रामकथा लिखकर ऐसे तमाम मेहनतकश लोगों का सरासर अपमान कर रहे हैं। 

इति।

Sunday, 11 June 2023

फंसे रहना ही दुनिया की रीत है

A - कहीं घूम नहीं रहे।
B - इस भीषण गर्मी में कौन घूमे।
A - क्या नया कर रहे फिर?
B - कुछ भी नहीं।
A - फिल्में, किताबें?
B - वो भी नहीं। बस थोड़ा बहुत इंटरनेट।
A - पक्के किसान हो गये हो।
B - वो कैसे?
A - कुछ भी नहीं कर रहे।
B - हमेशा क्यों कुछ करना है।
A - कुछ करते रहना भी जरूरी हुआ जीवन में।
B - रूक जाना भी जरूरी हुआ जब नहीं रूकने से कुछ खास अंतर न पड़ता हो।
A - हां, एक किसान गर्मी के कुछ महीने यही करता है।
B - बिल्कुल, ये एक चीज तो हर किसी को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।
A - फिर भी लोग तो लगे रहते हैं।
B - नहीं लगे रहेंगे तो बैचेनी चबा कर उन्हें खा जानी है।
A - बैचेनी दूर करने के लिए क्या क्या जो करते हैं लोग‌।
B - व्यस्त रहते हैं, और व्यस्त रखने के ढेरों विकल्प व्यवस्था ने, बाजार ने तैयार रखे ही हैं।
A - कभी ये सोचा नहीं। कितना जटिल है यह सब। 
B - क्या ही कहें, हम सब फंसे हुए हैं।
A - बाबा, फंसे रहना ही दुनिया की रीत है।
B - ये भी ठीक है।