Sunday, 19 April 2020

केटीयू पुराण

इस काॅलेज या यूं कहें कि इस यूनिवर्सिटी की सबसे बढ़िया जो चीज थी, वो थी यहाँ की लाइब्रेरी। इतनी बढ़िया लाइब्रेरी मध्य भारत में शायद ही किसी काॅलेज में होगी, किताबों का भी ठीक-ठाक कलेक्शन था। लेकिन मसला यह था कि स्टूडेंट आते ही नहीं थे, किताबें थी, सुंदर इंफ्रास्ट्रक्चर था, लेकिन पढ़ने वाले ही नदारद। माहौल ऐसा बन चला था कि लाइब्रेरी में भी लोग किताबें निकालकर बैठ तो जाते लेकिन पाँच मिनट बाद इयरफोन निकाल के फिल्में वीडियो मनोरंजन शुरू। इतनी आजादी तो जेएनयू में भी नहीं होगी, जितनी केटीयू में थी। लाइब्रेरी में एक हरे रंग का सोफा हुआ करता, सबको उसी में बैठना होता, बैल की तरह खींच खींचकर उस आरामदायक भारी सोफे को छात्र इस कोने से उस कोने ढकेलने में ही मशगूल रहते।

सामान्यतः हम जब किसी भी काॅलेज में एडमिशन लेते हैं, तो लाइब्रेरी कार्ड अनिवार्य रूप से सबका बन जाता है, लेकिन ये केटीयू था, ऐसा नहीं है कि यहाँ नहीं बनता था, बन के सढ़ भी जाता था, लोग पास-आउट हो जाते, लेकिन कार्ड लेने नहीं जाते थे। बिना लाइब्रेरी कार्ड के भी कई लोग काम चला लेते थे। मैं खुद एक दो लोगों का लाइब्रेरी कार्ड इस्तेमाल करता था, अब चूंकि एक कार्ड में सिर्फ दो किताबें इशू होती थी, तो मैं सोचता था कि बढ़िया नाॅवेल कहानी वगैरह का कलेक्शन है तो दो कार्ड से चार किताबें ले लेता। एक बार ऐसे ही मैंने चार किताबें ली, लाइब्रेरी वाली मैडम ने एंट्री करते वक्त मुझे ऐसे घूरा जैसे मैं चरस का व्यापार करता हूं, क्योंकि किताबें इशू कराना मतलब बहुत बड़ी चीज होती थी, क्योंकि बहुत विरले ही लोग ये कांड यहाँ करते थे। और मजे की बात ये कि जिन किताबों को मैं इशू कराया, उनका पिछला इशू डेट किसी का तीन साल पुराना तो किसी का पाँच साल पुराना हुआ करता जबकि विश्वस्तरीय किताबें थी। एक तो वो महापंडित राहुल की वोल्गा से गंगा किताब थी, जो कि मुझे महाकूड़ा लगी, मैक्सिम गोर्की की मां, एक प्रेमचंद का कथासार और एक दोस्तोवोस्की की कोई किताब थी। असली हादसा तो तब हुआ जब मैं कुछ दिनों के बाद इन किताबों को वापस लौटाने के लिए लाइब्रेरी गया। भालू के मार्फत सुस्त उस मैडम ने कहा - अभी-अभी तो लिए थे, मैंने कहा हो गया जितना पढ़ना था, पढ़ लिया। उन्होंने कहा- सब पढ़ लिए। मैंने कहा- हाँ एक छोड़के सब पढ़ लिया। अब वो अड़ गई, आखिर तक मानने को तैयार ही नहीं हुई। फिर मैंने कहा- बस आप कृपा करके ये बुक रिटर्न ले लो, मैं तो मजाक कर रहा था, इतना कोई कैसे पढ़ सकता है और फिर उन्होंने किताबें वापस ले ली।

यूनिवर्सिटी में एक छोटा सा कैंटीन था, जो कि असल में कैंटीन के नाम पर सरासर एक धोखा था, वहाँ सिर्फ चाय और मैगी के अलावा कुछ खास नहीं मिलता था। लोग रहेंगे ही नहीं तो कैंटीन बढ़ेगा कैसे।इस काॅलेज में आकर तो मानो जुगाड़ शब्द भी पानी माँगता था ऐसी स्थिति थी क्योंकि यहाँ Zero percent attendance में भी रेगुलर स्टूडेंट पेपर दिला सकता था, वो भी पचास सौ रूपए फाइन के साथ। वह फाइन भी थोड़ा सा प्रोटेस्ट करने से माफ हो जाता था, बताओ इतनी आजादी और कहाँ मिलेगी। मेरा खुद का 0.00% attendance था।

काॅलेज के ठीक पास में छात्र-छात्राओं का एक फेमस अड्डा हुआ करता था ऐनीकट। जहाँ वे एक दूसरे के ऊपर पानी की बौछार करने जाते। जीवन यहीं तक सीमित था, कुछ लोग एनीकट में जाकर घंटों बैठे रहते और जीवन का अधकचरा सा लक्ष्य बुनते रहते और जिनकी सेटिंग होती उनके लिए तो लाइब्रेरी का भीमकाय हरा सोफा था ही। बाकी जो थोड़ा बहुत पढ़ भी लेते थे, या कहीं छोटी-मोटी नौकरी कर रहे होते वे छालीवुड के सेलिब्रिटी की तरह कभी कभार काॅलेज शक्ल दिखाने आ जाते थे।

अटल साहब की एक कविता यूनिवर्सिटी का कुलगीत हुआ करती था। लेकिन सही मायनों में कुलगीत से कहीं अधिक कुछ सूक्तियों ( वन-लाइनर) और कुछ एक नयी-नयी शब्दावलियों का प्रचलन जोरों पर था, या यूं कहें कि कुछ अलग ही किस्म के तकिया-कलाम थे जिसे समय-समय पर खाली ठलहा बैठे यहाँ के ही होनहार छात्रों ने बना रखा था। जैसे कि - " सम्मान में कमी ", " हल्का टच " , " रगड़-घंस " , " फग्गिडा " आदि-आदि।

किसी भी काॅलेज की वस्तुस्थिति या दुर्गति का अंदाजा लगाना हो तो वहाँ के बाबू का रोल देखना चाहिए। क्योंकि जिस काॅलेज की भद्द पीट चुकी होती है, वहाँ के बाबू के ऊपर स्वत: ही जिम्मेदारियाँ बढ़ने लग जाती हैं। तो हमारे यहाँ भी ऐसा एक पटेल नाम का बाबू हुआ करता, छात्र से लेकर प्रोफेसर हर किसी की जुबान में उसी का नाम होता, क्योंकि झाड़ू पोछा करने वालों के बाद एक यही व्यक्ति बच जाता था जो अपना काम सही ढंग से करता था।

एग्जाम के एक दो दिन पहले गूगल से पढ़कर हम पाइंटर्स बना लेते और पास हो जाते। कई बार तो टेस्ट पेपर में छात्र एक दूसरे से यह तक पूछते कि सब्जेक्ट का नाम क्या है। टीचर भी सुनकर मुस्कुरा देते क्योंकि वो भी यहीं इसी मिट्टी के बाय प्रोडक्ट थे, कभी-कभी फाइनल एग्जाम में भी लोग सब्जेक्ट का पूरा नाम स्पेलिंग सहित पूछ लेते। बात यहां तक खत्म नहीं हुई, हमारे यहाँ इसका भी नेक्सट लेवल था। फाइनल एग्जाम में जब कुलपति, विभागाध्यक्ष चक्कर लगाने आते तो परीक्षार्थियों से पूछते - और बढ़िया न है न पेपर, दिलाओ बढ़िया मजे से दिलाओ यार, एक दो सवाल थोड़ा इधर उधर हो सकता है। ऐसा लगता मानो किसी रेस्तरां में बैठे हों और रेस्तरां का मालिक ही आकर खाने के स्वाद के बारे में पूछ रहा हो। कभी-कभी ऐसा लगता कि बस अभी चरण धोकर इनकी पूजा की जाए, ऐसा लगता मानो किसी ने पचास नारियल का चढ़ावा लगाया होगा, तपस्या की होगी, तभी ऐसे क्यूट दिव्यपुरूष अवतरित हुए होंगे, जो कि हमारा इतना ख्याल रखते हैं। कुल मिला के बहुत निराला काॅलेज था।

KTU Campus


Thursday, 9 April 2020

Why Corona?

इतने दिनों से घर में बैठकर हमने धरती पर थोड़ा बहुत उपकार तो किया ही है, साथ ही साथ अब हम सबको इस एक बात पर भी आम सहमति बना ही लेनी चाहिए कि इस कोरोना नाम के वायरस को हमने ही धरती पर लाया है, हम मनुष्यों के सम्मिलित प्रयासों से ही यह अस्तित्व में आया है।

पहले जिस धरती को बचाने के लिए करोड़ों अरबों रूपयों लगते थे, मानव संसाधन लगते थे, पढ़े-लिखे प्रकाण्ड विद्वानों की एक पूरी फौज की आवश्यकता होती थी, इतना कुछ प्रचंच होता था, अब उस धरती को मुफ्त में ही बचाया जा सकता है। वह चाहे अनपढ़ अनगढ़ कोई भी हो, हर कोई बचा सकता है, किसी भी प्रकार के विशेष योग्यता महानता की आवश्यकता नहीं रह गई है। प्रकृति कभी भी भेदभाव नहीं करती है और उसने किया भी नहीं है, सबको तो बराबर मौका दिया है, हर कोई घर बैठे ही धरती बचाने में योगदान दे सकता है। ऐसा सुयोग फिर कभी इस जनम में दुबारा मिले न मिले। इसलिए जितना अधिक हो सके घर बैठे ही धरती बचाने में महती भूमिका निभाते चलिए।

जब यह सब कुछ ठीक हो जाएगा, तो कुछ महीने साल बाद जब कभी हमारे पास कुछ जमा पैसे आ जाएं तो मन कहेगा कि एक दो घर अलग-अलग शहरों में और बना लिया जाए, किराया मिलने का शौक पूरा होगा या फिर सुविधाओं की बढ़ोत्तरी के नाम पर कुछ एक गाड़ियां और ले ली जाए या फिर ऐसा ही बहुत कुछ। जब कभी लगे कि सुविधाएँ बढ़ाने की इस जद्दोजहद में हम असुविधाओं बैचेनियों को खुला आमंत्रण दे रहे हैं, तो हमें समय रहते पुनर्विचार कर ही लेना चाहिए।

अगली बार जब हर घर से निकलेंगे, कुछ खरीददारी करने भी जाएंगे तो अगर हमारे मन में यह ध्यान आए कि हमारे बहुत कुछ चीजें ना खरीदने से भी धरती पर उपकार हो सकता है, तो इसे हमें सहजता से स्वीकारने की जरूरत है। जब हम प्रकृति को बचाने के नाम पर ही कुंठा शांत करने हेतु हजारों किलोमीटर की यात्रा करेंगे, संसाधन खर्चते हुए अगर बीच में हमें यह आभास हो जाए कि यह सब ना करके भी तो हम धरती को बचाने में योगदान दे सकते हैं तो हमें चाहिए की हम तुरंत अपने कदम वापस खींच लें।

अगर हम अपने ही जीवन में कुछ छोटे-छोटे बदलाव कर लें, खुद से ही प्रयास करना शुरू कर दें तो हमें अलग से धरती को बचाने के लिए मौके तलाशने की जरूरत नहीं पड़ेगी, हमारी धड़कन खुद ही हमसे द्वंद पैदा करवाएगी, हमें रूककर पहचानने की जरूरत है कि क्या यह सचमुच हमारे लिए जरूरी है, अगर नहीं तो हमें लौटना होगा, हमें अपने अस्तित्व की रक्षा करनी होगी।

आज समय ऐसा है कि हममें से अधिकांश लोगों को कुछ न कुछ करना ही होता है, यानि रेस में आकंठ डूबकर साबित करने की यह होड़ चाहे वह समाज के लिए हो, देश के लिए हो या धरती के लिए हो, कुछ कर गुजरने के इस नशे में, इस अतिवादिता में इस बात का भी ध्यान रहे कि हम इतना भी आगे ना निकल जाए कि हमें बार-बार अपनी सत्यता साबित करनी पड़े, अपना चरित्रचित्रण करना पड़े, ढकोसलों का सहारा लेना पड़े, खोखला जीवन जीने को विवश होना पड़े।

वायरस अलग-अलग रूप लिए थोड़ा-थोड़ा हम सबके भीतर विद्यमान है, हमें उसे देखने की जरूरत है, पहचानने की जरूरत है, उसके पैदा होने से लेकर, बनने, फैलने, द्विगुणित होने की प्रक्रिया को शिथिल करने की जरूरत है, उससे खुद को पृथक करने की जरूरत है। अगर हम खुद से यह पहल नहीं करते हैं तो यह एक समय के बाद हमें लीलने के लिए फिर से नया अवतार लेकर आ जाएगा।

हमें आखिर में समझना होगा कि अगर हम धीरे-धीरे सुधार की ओर नहीं बढ़ेंगे तो प्रकृति फिर से हमें महीनों क्या, वर्षों घरों में बंद रहने के लिए विवश कर देगी, हमारे अस्तित्व को चुनौती देते हुए फिर से हमें घुटनों के बल खड़ा कर देगी और तब हमें वह गूगल से लाशों की गिनती करने लायक भी नहीं छोड़ेगी।‌

Monday, 16 March 2020

One Long Drive

She - ठीक है हम चलते हैं, आपको कहीं छोड़ना है?
He - नहीं, कहीं नहीं।
She - बोलो हम छोड़ दें, कहाँ जाना हैै?
He - पास में ही है।
She - नहीं बताइए छोड़ देते हैं, कहीं जाना है तो।
He - नहीं, यही पास में ही है।
She - नहीं बोलिए, छोड़ देते।
He - यहीं पास में ही तो है, थोड़ा सा पैदल चलना है।
She - ठीक है फिर, हम चलते हैं।
He - ठीक है।
She - Bye take care
He - Bye take care.

-- बच्चे हिंसा करना माता-पिता से ही सीखते हैं --

आज सुबह एक लड़ाई देखने को मिली। दोनों पक्षों ने‌ पहले खूब जमकर बहस की, चूंकि महिलाएँ थी वह भी उम्र 50 के करीब इसलिए उम्मीद नहीं थी कि बात मारपीट तक चली जाएगी। तो हुआ यूं कि एक बंगाली आंटी जो पचास पार की होंगी, उन्हें उनकी प्रतिद्वंद्वी बिहारी आंटी जो चालीस पार की होंगी उन्होंने जमकर कूट दिया, कुहनी से पीठ पर लगातार इतना मार दिया कि बंगाली आंटी हाँफते हुए जमीन पर लेट गईं, मारपीट के दौरान जब बिहारी आंटी उनकी धुलाई कर रही थी, तो उनका लगभग 10 साल का बेटा उन्हें रोकने की कोशिश कर रहा था, लेकिन माँ कुटाई के मोड में थी, कुछ देर बाद जब दोनों आंटी थक गये तो अपने-अपने घर को चले गये। सब कुछ हम देहरी से देख रहे थे, सही गलत क्या है वही जानें? चलो ये तो हुई मारपीट की सामान्य सी बात जो आए दिन भारत में कहीं न कहीं देखने को‌ मिल ही जाती है।

अब हुआ यूं कि आधे घंटे बाद हम किसी काम से बाहर निकले थे, वापस घर की ओर लौटते वक्त जब हम उस बिहारी आंटी के घर से गुजर रहे थे तो मैं उस बच्चे को देखकर एक पल के लिए हैरान रह गया। वो अपने घर के आँगन में ही खेल रहा था और कुहनी को हवा में ही मारने जैसा अभ्यास कर रहा था, उसका ये एक्शन ठीक वैसा ही था जैसा उसकी माताजी का मारपीट करते वक्त था। ध्यान रहे कि ये वही बच्चा था जिसने कुछ देर पहले अपनी उसी माँ को हिंसा करने से रोकने का असफल प्रयास किया था। बच्चों का सबसे बड़ा स्कूल उनका अपना घर और आसपास का परिवेश होता है, वहाँ बच्चे जैसा देखते हैं, जिस तरीके से देखते हैं, वैसा ही सीखते हैं।


Friday, 13 March 2020

Decoding languages in india

How to say "Where are you" in different north and central indian languages -

हिन्दी - तुम कहाँ हो?
छत्तीसगढ़ी - कांहां हस तैं?
उड़िया - तमे कउठी?
बंगाली - तुमि कोथाया?
पंजाबी - कित्थे हो तुस्सी?
मराठी - तू कुठे आहेस?
राजस्थानी - कठे हों सा?
गढ़वाली/कुमाऊँनी - तीमी/तुम कख/कन छौ/छ

कन्नड़ - इलिदरा

एक दक्षिण भारत की भाषा, शब्द तो छोड़िए, वर्ण ही पूरा अलग, ऊपर की आठ भाषाओं से दूर-दूर तक कोई मेल नहीं, उत्तर और मध्य भारत के व्यक्ति के लिए दक्षिण भारत की भाषाओं को सीखना समझना अपेक्षाकृत कठिन क्यों हो जाता है वर्णों से ही स्पष्ट है। 😜

Thursday, 5 March 2020

Tribals of Eastern Odisha -

                                देहुरी यानी खड़िया जनजाति के लोग कोल जनजाति और संथाली जनजाति की तुलना में कहीं अधिक विनम्र लोग मालूम हुए। संथाली समुदाय तो हर जगह ठीक-ठाक वायरल भी हुआ है, जनजातियों में आर्थिक सामाजिक रूप से सबसे अधिक मजबूत हैं, संख्याबल भी बाकी समुदायों से कहीं अधिक है, कला साहित्य गीत संगीत सब में आगे हैं, संथाली गानों में यूट्यूब में लाखों व्यू देखने को मिल जाएंगे। इनकी अपनी अलग किस्म की हठधर्मिता है जो बाकी और जनजातियों में देखने को नहीं मिली। संथालियों की अपनी एक भाषा है जिसे 'ओलचिकि' कहते हैं, ठीक इसी तरह कोल जनजाति की 'ओरांगचिति' नाम की अपनी भाषा है लेकिन इन सबसे अलग देहुरी(खड़िया) जनजाति की अपनी कोई भाषा नहीं है, ये जहाँ भी रहते हैं, उस स्थान विशेष की भाषा को अपना लेते हैं, और यह इस बात का प्रमाण है कि खड़िया जनजाति के लोग घुमन्तु सरीखे होते हैं, बदलते समय के साथ अब यह भी एक जगह स्थायी रूप से रहने लगे हैं, इसलिए इनके समुदाय में सर्वाधिक आर्थिक पिछड़ापन है, विशिष्टता के मामले में पीछे रह जाने की वजह से भी ये लोकमानस में वायरल नहीं हो पाते, कोई इन पर कहानी लेख लिखने या डाक्यूमेंट्री बनाने उतना नहीं आता है, खड़िया जनजाति संख्याबल में धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। इन सब कारणों के बाद भी सबसे अधिक आत्मीयता इन्हीं के साथ महसूस होती है। एक चीज जो इन तीनों समुदायों में समान रूप से विद्यमान है वो यह कि ये तीनों अपने बच्चों को फुटबाल की तरह मारते हैं। खैर, मारपीट की यह परंपरा तो हमारे भारत के लगभग सभी समाजों में है।

Women from Kol Tribe

Santhali tribe women

Santhali tribe boy


planning

Friday, 28 February 2020

Tribal Fest BACA 2020 | Brahman village | Mayurbhanj | Odisha

Tribal culture is something from which we can learn and assimilate a lot of things. Here it comes, The ongoing tribal fest in a small beautiful village called brahman surrounded by full of sal tree hills in the Mayurbhanj district of odidha. This annual tribal fest is a amalgamation of various cultural activities like; quiz competition of school kids, sports activities, archery by tribal men and women and cockfight. A part from this the major attraction of these whole event is the cultural dance performed by various dance groups of different tribal communities. Such kind of event helps promoting the rich deep rooted culture of tribal community.












Glimpse of Rich tribal culture

मुझे बार-बार ये महसूस होता है कि आदिवासी समाज मुख्यधारा के सभ्य कहे जाने वाले समाज से कहीं अधिक आगे है।

उदाहरण 1 -
एक गाँव में मासिक धर्म संबंधी चर्चा चल रही थी। उसी दौरान एक महिला ने ऊंची आवाज में बिना किसी संकोच के मुझसे पूछा - ये सूती कपड़ों का पैड जो आप बता रहे हैं, इसे हमें चड्डी के अंदर फँसा के पहनना है ना?
उनका सवाल सुनकर थोड़ी सी हैरानी के साथ मुझे बेहद खुशी भी हुई, मासिक धर्म पर और खुलकर बात करने के लिए मुझे उस महिला से सबल मिला। 

उदाहरण 2 -
आदिवासी गाँव में भ्रमण के दौरान एक महिला से बातचीत हुई, वह मेरे सामने अपने स्तनों को खोलकर निस्संकोच अपने बच्चे को दूध पिला रही थी, उनकी सहजता ने मुझे आश्चर्यचकित कर दिया। मैं उस समय जानबूझकर थोड़ा असहज हुआ फिर उन्होंने अपने स्तनों को कपड़ों से थोड़ा सा ढंक लिया।
मन‌ में एक सवाल आ रहा था कि क्या मुख्यधारा के माॅर्डन कहे जाने समाज में इतना खुलापन है, इतनी सहजता है?

वास्तव में देखा जाए तो आज भी आदिवासी समाज शहरी समाज से कहीं आगे है चाहे बात जीवन मूल्यों की हो, लिंगानुपात की हो, समानता, बंधुता आदि मानवीय मूल्यों की हो, स्त्रियों के सम्मान की बात हो, इन सब में आदिवासी समाज कहीं अधिक समृध्द और परिष्कृत समाज मालूम होता है।







Wednesday, 26 February 2020

पत्थरकारिता

A - रोड चाहिए रोड?
B - नहीं।
A - बिजली चाहिए बिजली?
B - पता नहीं।
A - पक्का मकान चाहिए?
B - घर तो है वैसे..
A - टाॅवर, टाॅवर चाहिए क्या?
B - ना हो तो भी चलेगा।
A - अरे ऐसे कैसे, कुछ तो चाहिए होगा..
B - नहीं काम चल जा रहा, सब ठीक ही है।
A - लेकिन कुछ तो कमियाँ, कुछ जरूरतें तो होंगी ही।
B - सबकी होती हैं।
A - जाहिर है, फिर आपकी भी होंगी..
B - वो तो है, वैसे एक चीज की बड़ी जरूरत है हमें..
A - जी बताइए..
B - आप दे पाएंगे न?
A - पहले आप बताइए तो सही..
B - एक मच्छरदानी की जरूरत है, रात को न इधर मच्छर बहुत काटते हैं।
A - ....



Saturday, 22 February 2020

हम‌ देहुरी लोग हैं

मैं - आपके पैर को क्या हुआ है?
मौसी - ये पैर टूटा हुआ है मेरा।
मैं - कैसे टूट गया?
मौसी - दारू पीकर गिर गई थी और क्या?
मैं - क्यों पीते हो दारू ?
मौसी - क्यों क्या, बूढ़ी हूं, क्यों नहीं पियूंगी।
मैं - अच्छा बूढ़ी हो तो ऐसे दारू पियोगी क्या?
मौसी - हां , तो, हम देहुरी लोग(जनजाति) हैं, क्यों नहीं पियेंगे दारू।
मैं - बच्चे भी यही सीखेंगे फिर तो।
मौसी - ये लोग तो सोना हैं मेरे सोना, बड़े होकर ही पियेंगे।
मैं - अच्छा
मौसी( हंसते हुए) - हां तो इतनी दूर से आए हो, दस रूपए देकर जाना, ठीक है
मैं - क्या करोगे दस रूपए का?
मौसी - थोड़ा दारू पियूंगी।
मैं - अरे, नहीं दूंगा मैं, दारू के लिए बिल्कुल नहीं दूंगा
मौसी ( हंसते हुए) - दारू पीके बढ़िया मरूंगी रे।
मैं - अरे क्यों मरोगे दारू पीके?
मौसी - हम देहुरी लोग हैं, कितना ही और जियेंगे, ऐसे ही तो जाना है,
दस रूपए दे के जाना, हां....
मैं - खाने के लिए दूंगा, दारू के लिए नहीं दूंगा,
मौसी(मुस्कुराते हुए) - दारू थोड़ा सा पियूंगी, बढ़िया लगेगा, दे देना दस रूपए , देकर ही जाना, ठीक है।
मैं - इसी दारू की वजह से पैर टूटा है।
मौसी - नहीं वो तो फिसल गई थी।
मैं - अभी कहा था, दारू पीकर गिरी थी।
मौसी - नहीं फिसल गई थी, आओ पखाल(पेज) खा लेना हमारे यहाँ, हम देहुरी लोग हैं, दस रूपए देकर ही जाना बेटा।
मैं - ठीक है लेकिन कुछ खा लेना।
मौसी ( बार-बार दुहराते हुए) - हम देहुरी लोग हैं।

और फिर मैंने जाते-जाते उन्हें कुछ रूपए दे दिए। देने में शर्मिंदगी महसूस हो रही थी, लेकिन क्या ही करें, हम भी तो इसी समाज के हैं। उनमें सबसे अलग चीज यह रही कि उन्होंने इतने प्रेमभाव से मुझसे रूपए मांगा कि उनके बोलने में लेशमात्र भी माँगने का भाव न था। इसलिए मैं बारंबार उनसे उनके बारे में पूछता रहा, लम्बी बातचीत की, तब पता चला कि देहुरी जनजाति जिन्हें खड़िया जनजाति भी कहा जाता, उनकी आर्थिक स्थिति की बात करें तो वे संथाली जनजाति से भी और नीचे है।



Tuesday, 18 February 2020

Bangalore to Bhubaneswar via Hamsafar Express


Day 1 -

हमसफर एक्सप्रेस में हूं। जब से चढ़ा हूं तब से खामोश हूं और यही हाल ट्रेन का भी है, मैं इसलिए भी खामोश हूं क्योंकि इस ट्रेन का रूट ऐसा है कि दक्षिण भारत की तीन अलग-अलग भाषाओं के लोगों से ये ट्रेन समान रूप से भरा हुआ है, समझ नहीं बन पा रही कि किस भाषा पर फोकस किया जाए, खैर, राहत की बात यह है कि आसपास कोई बच्चा नहीं है। मेरी प्रार्थना कितने सालों बाद सफल हुई है, अन्यथा नींद तोड़ने के लिए हमेशा स्लीपर से लेकर एसी हर जगह कुछ बच्चे आसपास के बर्थ में मिल ही जाते हैं। 

ट्रेन में एक लड़का सामने की बर्थ में है, जो हिन्दी बोल रहा है, जब से चढ़ा है, परेशान सा है, इधर उधर फोन कर रहा है, कोई भी उसका चेहरा देखकर यह बता सकता है कि बहुत ज्यादा चिढ़ा हुआ है, किससे? यह पता नहीं, लेकिन चिढ़ा हुआ है। अभी खाना खाने के लिए जैसे ही मैंने ब्लू लाइट आॅन की तो उसकी "कौन है बे" सुनकर यह बात और प्रबल हुई कि बंदा परेशान है। वो तो अच्छा हुआ कि किसी और ने लाइट आॅन कर के खाना खाओ कह दिया वरना उस लड़के का "बे" सुनकर मेरे भीतर का इंजीनियर जाग ही गया था। असल में यह लड़का जब से ट्रेन में चढ़ा है तब से कुछ परेशान सा है, उसकी शायद बड़ी बहन इसे छोड़ने आई थी, और जाते हुए उसने अपने भाई से कहा था - कोई परेशानी नहीं है, अच्छे से जाना, ख्याल रखना। लड़के ने फोन पर जितनी बातें की, उसे सुनकर यह समझ आया कि लड़के ने पंद्रह हजार रूपए की नौकरी छोड़ दी है, और बिना औपचारिकता निभाए ही दबंग बहादुर की तरह लात मार के भाग आया है और अभी सब छोड़छाड़ के अपने घर को जा रहा है। वह अपने कुछ दोस्तों से बार-बार फोन कर यह कह रहा था कि भक साला, नहीं जमा अपने को, कुछ होगा तो नहीं। उसने एक बात कही कि मेरा अकाउंट का पैसा तो नहीं कटेगा न, अकाउंट हैक तो नहीं कर लेंगे आदि?? मैं यह सोच रहा था जिस पैसे को, मोह को, इस चकाचौंध को, इस अंधाधुंध भागते शहर के जीवन को एक झटके में जिसने त्यागकर इतना बड़ा काम कर दिया है वह अब अकाउंट की चिंता क्यों ही कर रहा है। भारत का समाज जैसा है, उस लिहाज से लड़के की पैसे वाली चिंता भी वाजिब हुई बल।

सामने की बर्थ में एक दादी है, इन्होंने ही मुझसे टूटी फूटी अंग्रेजी में जिद करते हुए कहा कि बड़ी वाली लाइट आॅन करके खाना खाओ, कम लाइट में खाना नहीं खाना, मैंने उनकी बात नजर अंदाज करते हुए खाना निपटा लिया है। दादी अकेली सफर कर रही हैं, मेरी तरह वो भी अभी फोन में टुकुर-टुकुर कर रही हैं, लेकिन फर्क इतना है कि वह अपने बच्चों को फोन करके लाउडस्पीकर में एक‌ दो मिनट बात करके खुश हो रही हैं और मैं यहाँ फेसबुक पोस्ट लिख रहा हूं। दादी को शायद उनका नाती छोड़ने आया था, वह जब छोड़कर जा रहा था, तो दादी उसके हाथ को जोर से पकड़कर उसके जेब को खोलते हुए दो हजार का नोट डालने लगी, लेकिन नाती की पकड़ मजबूत थी, उसने हाथ छुड़ा लिया और पैसे लेने से मना कर दिया। दादी से जब मैंने पूछा कि खाना खाया कि नहीं तो उन्होंने कहा कि खाना रखा हुआ है, पर भूख नहीं है।



Day - 2

वह मेरे उठने का इंतजार कर रही थी, वैसे मैं उठ गया था लेकिन अभी भी अपनी सीट पर लेटा हुआ था। दादी ने कहा - बेटा, साथ में रोटी खा लेना। मैंने कह दिया कि मैंने अभी तक ब्रश नहीं किया है, दादी ने रोटी साइड में रख दिया मतलब अब वह तब रोटी खाएँगी जब मैं ब्रश करके आऊंगा। दादी ने मुझे दो रोटियाँ खाने को दी, और अपने लिए दो रोटियाँ रख ली। आगे उन्होंने कहा - चावल भी है, अगर खाना है तो। असल में ये रात का बचा हुआ खाना ही था, दादी इसका अधिक से अधिक सदुपयोग करना चाहती थी ताकि फेंकना ना पड़े। 

दादी तेलुगु है, विशाखापट्टनम जा रही हैं, उनकी मुस्कुराहट ऐसी मानो देखकर ऐसा लगे जैसे सामने एक शांत समुद्र है, और कोई तट पर बैठकर उन्हें देख रहा हो और वे मुस्कुरा रही हों। इतनी करूणा, इतनी विनम्रता, इतनी निश्छलता, जीवनरूपी विस्तार को विभाजित करती उनकी चेहरे की रेखाएँ। ऐसा नहीं है कि वह खाने के लिए सिर्फ मुझे पूछ रही थी, आसपास के लोगों को भी उन्होंने प्रेमभाव से पूछा लेकिन भारत में जातिवाद अविश्वास लोगों के दिमाग में इतना घर कर गया है कि किसी अनजान के खाने के प्रस्ताव में प्रेम और अपनत्व खोजना अब सबके बूते की बात नहीं रह गई है। दादी ने मुझे दो रोटियां देकर कहा कि पहले तुम खा लो, फिर मैं खाऊँगी, मैं खाता रहा, वह देखती रही। और मेरे खाने के बाद उन्होंने भी खा लिया। ट्रेन में सब लोगों के बीच भोजन करना हमेशा से बड़ा मुश्किल होता है, इस मामले में मेरा स्वभाव कुछ हद तक नेपोलियन जैसा रहा है, कहा जाता है कि नेपोलियन हमेशा अकेले खाना खाता था, वह इसलिए क्योंकि उसे ढंग से खाना खाने नहीं आता था। मेरी समस्या दूसरी है, कोई देखता रहे तो निवाला अंदर नहीं जा पाता है। 

हम जैसी सोच रखते हैं, जैसा जीवन जीते हैं, शनै: शनै: हमारे चेहरे की भाव-भंगिमा भी उसी अनुरूप ढलने लगती है। वह लड़का जो नौकरी छोड़ अपने घर को जा रहा था, अभी तक सोया हुआ है, विश्रामावस्था में भी उसके चेहरे के भाव जस के तस हैं। शायद उसे ऐसी और लंबी नींद चाहिए ताकि उसका आत्मविश्वास दुबारा लौट आए और वह जीवन रूपी सागर में फिर से डुबकियाँ लगाने के लिए तैयार हो जाए। 

कर्नाटक के अलग-अलग इलाकों में जाकर लगभग सब तरीके का स्वाद चख लिया है, शायद ही कुछ छूटा हो और इस बात में कोई शक नहीं कि आंध्रप्रदेश का खाना, स्पाइस इसके सामने कर्नाटक कहीं नहीं ठहरता है। आंध्र प्रांत की बात ही कुछ और है। दादी की दी हुई स्वादिष्ट सब्जी और रोटी खाकर ट्रेन का वो सफर याद आ गया जब 25 रूपए में 1200 किलोमीटर का लंबा सफर किया था, तब जो दादी मिलीं थी उन्होंने जमकर मिठाईयाँ खिलाई थी। कुछ लोग सवाल करते हैं कि ऐसे लोग मुझे ही क्यों मिलते हैं, अब इस पर क्या ही कहा जाए, ऐसे लोग सबको मिलते हैं, देखने-देखने का फर्क है।






Sunday, 2 February 2020

भारत में शादियाँ

                     आज के सुविधाभोगी जीवनशैली वाले समय में कोई भी युवा यह नहीं चाहता है कि वह धूमधाम से शादी करे, जबरन दिखावे के लिए, बस लोगों को और समाज को दिखाने के लिए लाखों रूपए उड़ाए। क्योंकि वह भी इस कड़वी सच्चाई को महसूस कर रहा होता है कि आजकल शादियाँ सिर्फ दोपहर/रात का भोजन फलाँ के घर जाना है, इसी मुख्य बात पर आकर रूक गई है। जबकि पहले शादियों में एक सामाजिक मेलजोल की प्रक्रिया प्रमुखता से विद्यमान थी, रिश्तेदार कई-कई दिन पहले आकर साथ रहते, मिल-जुलकर पकवान बनाते, सुख:दुख तो बाँटते ही साथ ही अपने-अपने हिस्से का काम बाँट लेते थे, संवाद के लिए जगह होती थी, सप्‍ताह क्या लगभग आधे महीने तक उत्सव जैसा माहौल रहता था।

                   वर्तमान समय में युवा खर्चीली शादी की चाह न रखते हुए भी आखिरकार घूम फिरके वह उसी फाॅर्मूले में शादी करता है, जिस फाॅर्मूले पर पूरा समाज चल रहा है। असल में वह जो चाहता है, वह चाह कर भी कर नहीं पाता है, समाज से लड़ नहीं पाता है, कभी उसके सामने समाज और सामाजिक प्रथाओं, परंपराओं आदि का डर सामने आता है, तो कभी माता-पिता और परिजनों का चेहरा सामने आ जाता है। वह इन सबके खिलाफ अपने भीतर एक जिद पैदा नहीं कर पाता है, वह अपने भीतर जन्मे नवाचार रूपी अंकुर को जीवित नहीं रख पाता है, वह बस सोचता रह जाता है, वह यह भी सोचता है आखिर क्यों अपना बवाल काटा जाए, जैसा लंबे समय से चला आ रहा है, आखिर कुछ तो उसमें अच्छाइयाँ होंगी ही इसलिए चलने देते हैं, कुछ इस तरह वह आँखें मूंद लेता है, तमाम वर्जनाओं, अप्रासंगिक हो चुकी प्रथाओं से मुँह मोड़ लेता है। वैसे भी जहाँ तक बनी बनाई सामाजिक प्रथाओं के विपरित जाकर कुछ कर गुजरने की बात आती है, वहाँ एक अलग ही किस्म के आंतरिक आंदोलन की दरकार होती है, जो सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर से शुरू करनी होती है, फिर कहीं जाकर यह हमारे घर के चौखट तक पहुंचती है, वहाँ यह हलचल पैदा करती है, उसके बाद कहीं जाकर समाज आता है, सामाजिक नियम कानून आदि आते हैं, और जब यह प्रक्रिया पूरी होती है, तब कहीं जाकर अपनी मर्जी के मुताबिक उन्मुक्त होकर जीवन जीना आसान हो पाता है।

तुम्हारे लिए - एक कविता

तुम जिस रास्ते निकले हो,
वहाँ ढेरों लोग मिलेंगे,
लेकिन कुछ लोग ऐसे होंगे,
जिन्हें तुम्हें संभालने की जरूरत है।

जो देते रहेंगे अहसास,
एक अगल किस्म के अपनेपन का,
लेकिन विरले ही होंगे,
जिन्हें तुम‌ अपना कह सकोगे।

तुम्हें फर्क करना होगा,
तरह-तरह के लोगों के बीच,
अपनी तरह के लोगों में,
जो वास्तव में तुम्हें सुन सकें,
और मुस्कुराते हुए जिन्हें तुम सुन सको।

ऐसे लोग आसानी से नहीं मिलेंगे,
न ही पहचान में आएंगे,
तुम्हें गहरे उतरकर देखना होगा,
और खोज निकालना होगा इन्हें।

जो हमेशा तुम्हारा साथ देंगे,
जो तुम्हारे जीवन में प्रकाश की तरह होंगे,
जिनके साथ तुम घंटों व्यतीत कर पाओगे,
जिन पर निरंतर भरोसा कर पाओगे।

ऐसे कुछ ही लोग होंगे,
जो लंबी पारी के साथी होंगे,
जो आखिरी समय तक टिकेंगे,
जिनके लिए सुख-दुख से बढ़कर भी,
जीवन मजे से जीना बड़ी चीज होगी।

जो महीनों खामोश रहकर भी,
तुम्हारी खबर लेते रहेंगे,
ऐसे लोग गिनती के होंगे,
यही तुम्हारी असली कमाई होंगे,
तुम्हें इन्हें संभालने की जरूरत है‌।