Thursday, 14 September 2017

- रफ कॉपी - Part 1

                             ये लघु प्रेम कथा अनिरुद्ध और शालिनी की है...दोनों हिमाचल के किन्नौर में रहते हैं। किसी कारणवश दोनों अलग हो चुके हैं। या यूं कहें कि वे एक दूसरे से प्रत्यक्ष रूप से कभी मिले ही नहीं। लेकिन एक रफ कॉपी ने इनके मध्य एक रिश्ते को कायम कर दिया है।
...
एक दिन अनिरूध्द शालिनी से कहता है - सच बताना क्या तुमने अभी भी वो रफ कॉपी संभाल कर रखी है?
शालिनी - हां।

अनिरूध्द - पर क्यों?

शालिनी - मुझे पसंद है।

अनिरूध्द - अच्छा! मैंने तुम्हें कुछ दिन इतिहास पढ़ाया था उस कॉपी में, वो सब्जेक्ट भी ऐसा जिससे तुम्हें बिल्कुल भी लगाव न था फिर भी।

शालिनी - हां फिर भी। मुझे पसंद है तो है। मैं हमेशा अपने पास रखती हूं, अभी महीने भर के लिए मामा के घर गई थी तो भी अपने साथ लेकर गई थी। खैर,आप नहीं समझेंगे।

अनिरूध्द - समझाओ।

शालिनी - हर बात बोलकर कही नहीं जाती। ये रफ कॉपी मेरे लिए सिर्फ एक कॉपी नहीं है।

अनिरूध्द(नाराज होकर) - मेरे ख्याल से इस बात को एक साल हो चुके हैं, इस बीच कोई बातचीत नहीं, कोई पता नहीं, सब तरफ से तुमने मुझे ब्लाक कर रखा है। किसी नये नंबर से संपर्क करने की कोशिश करता हूं तो भी ब्लाक। और आज इस रफ कॉपी के सहारे इतनी भावनाएँ क्यों उमड़ रही है?

शालिनी - एक साल, इस एक साल में एक भी दिन ऐसा नहीं था कि मैंने इस कॉपी को अपने से अलग किया हो और आप मुझ पर शक कर रहे हैं। हां किया ब्लाक मेरी मर्जी, पर छुपकर किसी दूसरे की आईडी से हमेशा आपको देखा करती थी, और ये रफ कॉपी, ये साल भर से मेरे तकिए के पास ही रहता था, आज भी है। छोड़िए, मैं आपको कितनी बातें बताऊं, और बोलकर सब कुछ खराब नहीं करना चाहती। आप मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें तो बेहतर होगा। मुझे और कोई बात नहीं करनी।

अनिरुद्ध - अच्छा ठीक है,पर मेरी एक बात सुन लो।
..
...
.....
और इससे पहले कि अनिरूध्द कुछ कहता, फोन कट जाता है।
स्वाभिमान से परिपूर्ण शालिनी के ब्लाक लिस्ट में आज फिर से एक नया नंबर आ चुका है।

Friday, 1 September 2017

बुलेट चलाने वालों से निवेदन -

                     आजकल बुलेट का ट्रेंड चल रहा है। जिसको उतना नहीं भी पसंद वो भी भेड़चाल में बुलेट की सवारी कर रहा है, जिसका चालीस किलो वजन है जो ढंग से गाड़ी ढुला भी नहीं पाता वो भी बुलेट चला रहा है। खैर सबके अपने-अपने शौक है इसमें सही गलत या आलोचना करने का कोई तुक नहीं। वैसे भी भारत में बेवजह कुछ भी ट्रेंड हो जाता है। और हम प्रतिक्रिया देकर इस पूरी प्रक्रिया में रसपान करते रहते हैं। पागलपन, दिखावा, सनक और बेवकूफी से भरे सैकड़ों उदाहरण हमारे सामने आए रोज दिखते रहते हैं।
खैर बात बुलेट से होने वाले प्रभावों की होनी थी। तो ऐसा है कि बुलेट से, यानि इसकी आवाज से छोटे बच्चों को बहुत नुकसान होता है। अब आप सोच रहे होंगे कि शोर शराबा करने वाली और भी चीजें हैं, बुलेट पर ही सवालिया निशान क्यों?
                     अच्छा अभी कुछ दिन पहले की एक घटना बताता हूं। मैं एक इडली सेंटर में नाश्ता कर रहा था। वहाँ एक और कोई लड़का साथ में था जो मेरे से पहले आया था और उस के पास बुलेट थी। हम दोनों नाश्ता कर रहे थे तभी दो लोग और आए एक बाप अपनी छोटी बच्ची को लेकर आया था। बच्ची की उम्र एक साल रही होगी, उस बच्ची के पिता ने बच्ची को गाड़ी में ही बिठाया, और इडली पैक कराने आ गये। पिता ने अपनी बिटिया को दस मीटर दूर गाड़ी में अकेले छोड़ दिया है। अब चूंकि बच्चे बाइक के सामने का हैंडल मजबूती से पकड़ कर रखते हैं इसलिए शायद उसके पिता निश्चिंत हैं।
अब बुलेट वाला लड़का नाश्ता खत्म कर उठता है अपनी बुलेट में किक मारता है जोर से एक्सीलेटर देता है और निकल जाता है। सब कुछ पांच सेकेंड में ही हो जाता है।
                     अब ध्यान रहे कि वो एक साल की बच्ची वहीं पास में एक दूसरी बाइक में बैठी हुई है। अब जैसे ही बुलेट स्टार्ट होता है उसकी आवाज सुनकर वो रोने लगती है, और डर के मारे गाड़ी से गिरने ही वाली रहती है कि उसके पापा आकर उसे संभालते हैं। बुलेट वाला कुछ सेकेंड में ही निकल चुका है, और उसके कुछ सेकेंड बाद बच्चे रोने लगती है। इडली पैक कराने में व्यस्त उस बच्ची के पिता को भी समझ नहीं आता कि बच्ची के रोने की वजह आखिर क्या है। अब सोचिए उस छोटी बच्ची पर एक बुलेट की उस क्षणिक आवाज का कितना बुरा प्रभाव पड़ा होगा। वो अंदर से कितना डर गयी होगी, कितना सहम गयी होगी, इसका आप और हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।
                      एक और घटना ठीक कुछ ऐसी ही हुई थी,एक छोटा बच्चा था, लेकिन वो बुलेट की आवाज से बिल्कुल नहीं रोया। लेकिन फिर भी ये घटना ऊपर लिखी पहली घटना से ज्यादा भयावह है। वो ऐसे कि मैंने उस बच्चे का चेहरा देख लिया, उस मासूम से चेहरे पर खामोशी और खौफ के बादल मंडरा रहे थे, कितना डर बैठ गया था उस बच्चे में वो त्वरित आवाज सुनकर। वो इस डर को रोकर बाहर निकाल भी नहीं पाया। इस छोटी सी घटना ने उसके मनोविज्ञान को कितनी चोट पहुंचाई होगी इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। बहरहाल...
ऐसे कितने उदाहरण दे सकता हूं आपके सामने।

                        ये सब कुछ लिखने का मकसद ये है कि बच्चों के दिमाग में इन सब चीजों से अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, एक बार बचपन में कोई बात हो गई या ऐसी छोटी छोटी चीजें, ये सब जीवनपर्यन्त उनके चेतन अचेतन में जमा होकर उन्हें प्रभावित करती रहती है और हमें फिर समझ नहीं आता कि सब ठीक तो चल रहा था ये अचानक बच्चे का व्यवहार ऐसा कैसे हो गया।
                         इसलिए बुलेट चलाने वालों से और जो नहीं चलाते उनसे भी निवेदन है कि इन छोटी-छोटी चीजों का ख्याल किया जाए। वैसे भी बच्चे सबको प्यारे होते हैं, जिन्हें बच्चों से उतना लगाव नहीं होता वे भी बच्चों के बीच जब रहते हैं तो प्रेमपूर्वक व्यवहार करते हैं।
                         मुझे तो लगता है एक 12th पास लड़के में भी इतनी समझ तो होती ही है कि बच्चों के सामने ज्यादा न चिल्लाया जाए, उनके सामने झगड़ा न किया जाए, यानि एक उम्र तक उन्हें हर प्रकार की हिंसा, शोर आदि से थोड़ा दूर रखा जाए। बच्चे हमारे कल के कर्ताधर्ता हैं, उनके व्यक्तित्व के निर्माण के इस चरण को लेकर हमारी इतनी न्यूनतम समझ तो होनी ही चाहिए कि हम इन छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान दें, अगर किताबी ज्ञान ही सब कुछ है, और हम इन सब बातों पर ध्यान नहीं दे पाते तो हमें अपने आसपास किसी नदी के एनीकट में छलांग लगाकर मर जाना चाहिए।

Friday, 11 August 2017

- नीम का पेड़ -

                       हमारे घर में पूजा होनी थी। पंडित जी अपनी साइकल से बड़े सबेरे पहुंच चुके थे। बताता चलूं कि पंडित जी हमारे घर लगभग दस साल बाद आए हैं। जैसे ही वे घर पहुंचे उन्होंने कहा - यहाँ एक नीम का पेड़ था क्या?
हमने कहा - हाँ था, पर वो तो कब का उखाड़ दिए।
पंडित जी ने कहा - अच्छा। असल में कहीं भी ऐसे पेड़ रहते हैं तो घर पहचानने में बड़ी आसानी होती है।
                       उनकी बात सुनके लगा कि वाकई ये पेड़ हमारे लिए दशकों से एक लैंडमार्क का काम करते आए हैं। लेकिन बदलते समय के साथ हमारा जो एक रिश्ता पेड़-पौधों के साथ हुआ करता था, उसमें बड़ा बदलाव आया है। जीपीएस ने हमारी स्मरण शक्ति पर रोक लगा दी है। देखा जाए तो हमारी कितनी ढेरों स्मृतियाँ जुड़ी होती है इन पेड़ों से। अब इस एक नीम पेड़ की ही बात की जाए तो बचपन में हम इन पेड़ों से नीम के फल (जिनसे नीम का तेल बनता है) को तोड़कर इकट्ठा करते थे। कभी उन नीम के फलों को इकट्ठा कर कोई नया खेल इजात कर लेते तो कभी उन छोटे-छोटे फलों से एक-दूसरे को मारते। तो कभी पेड़ की छांव में बैठकर वहाँ धूल को साफ कर अपना घर बनाते। तो कभी पेड़ से झड़ते फूलों को इकट्ठा कर उस धूल की क्यारियों से बने घर को सजाते। और फिर पास में कच्चे रेत को एक ग्लास या कटोरे में भरकर नये-नये सांचे बनाते और फिर छोटी-छोटी टहनियों से अपने उस घर को सजाते। हर दिन एक नयापन होता था। सब बच्चे जड़ के आसपास अपना अलग-अलग तरीके से घर बनाते।
हां तो ये धूल और उससे जुड़े खेल खेलना ये सब एक उम्र तक चलता रहा। फिर हम थोड़े बड़े हुए।
                       अब हम थोड़े बड़े हुए तो हमने गुल्ली डंडा, नदी-पहाड़ आदि खेल खेलना शुरू कर दिया। फिर थोड़े बड़े हुए तो क्रिकेट, फुटबाल आदि आदि। लेकिन ये एक श्रृंखला चलती रही सब अपनी उम्र के मुताबिक खेल खेलते रहे।
और इस श्रृंखला का सबसे मजबूत पक्ष क्या था?
यह वो नीम का पेड़ ही था जिसकी छांव में हर उम्र का बच्चा आकर बैठता, खेलते हुए जब थक जाता तो खुद को हमेशा उस पेड़ के नीचे पाता। वो पेड़ हमसे जुड़ा हुआ था, और हम उस पेड़ से जुड़े हुए थे। उस छोटे से खाली मैदान सी जगह में उपस्थित वह पेड़ हमारे जीवन का हिस्सा था, लेकिन एक दिन कुछ कारण से वह पेड़ काट दिया गया। श्रृंखला टूट गयी, अब न उस पेड़ की शीतल छाया थी न ही उसके इर्द-गिर्द खेले जाने वाले खेल और न ही बच्चों की वो पहले जैसी धमाचौकड़ी। उस श्रृंखला में गजब का बिखराव आ चुका था।
                       आपके हमारे आसपास ऐसी न जाने सैकड़ों श्रृंखलाएं टूटती बिखरती रहती हैं, और हम देख भी नहीं पाते हैं। पेड़ CO2 लेकर हमें आक्सीजन देती है, हम आए दिन ऐसी रटी-रटाई चली आ रही बातें करते हुए उसकी महत्ता को सीमित करते रहते हैं। और जब पेड़ कटता है तो हमें लगता है कि बस एक पेड़ ही तो कटा है, लेकिन वो सिर्फ एक पेड़ कहां होता है वो तो हमारी स्मृतियों का एक जीवंत दस्तावेज होता है।
                       अभी कुछ दिन पहले एक अफसर से हमने सुना कि एक-दो पेड़ कट जाता है तो बेवजह कितना हल्ला होता है, दूसरे जगह वृक्षारोपण भी तो रहा है। मतलब बदमाशी की भी एक हद होती है, माने इतना छिछला,धूर्तता से भरा तर्क कोई कैसे दे सकता है, कुछ पेड़ टूटे, एक पूरी श्रृंखला में टूटन हुई , इसकी भरपाई के लिए जो नये पौधे रोपे गये, उन्हें पेड़ बनने में कितने साल लग जाएँगे। और ये जो इतना लंबी खाई बनी ये जो गेप बना, इसकी भरपाई कैसे होगी। इसके लिए क्यों नीतियों की निर्मम समीक्षा नहीं की जाती।
                       हमने देखा कि पेड़ों को बचाने की बात करने वालों को गँवार और पिछड़ा समझा जाता है। सही ही है, आज भी दूरस्थ गांवों में रहने वाला व्यक्ति छोटी टहनियाँ उठाने के लिए दस किलोमीटर तक की पदयात्रा कर लेता है, सचमुच एक गधा और देहाती व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। वो चाहता तो पास के पेड़ों से कुछ टहनियाँ तोड़ लेता, लेकिन दस किलोमीटर दूर जंगल में गिरी हुई टहनियों को उठाकर अपने उपयोग में लाना वो अपनी जिम्मेदारी समझाता है। वास्तव में देखा जाए तो वो पर्यावरण का सबसे बड़े रक्षक होता है। इनकी बुद्धि भी सीमित, तर्कशक्ति और समझ भी सीमित फिर भी इनका सामाजिक विज्ञान, इनका नागरिकशास्त्र हमसे हजार गुना अधिक विकसित। अब चूंकि पर्यावरण को बचाना इनकी जीवनशैली का हिस्सा है तो इन्हें जाहिल गँवार घोषित कर इन्हें हर समस्या के लिए दोषी बनाकर थोपे जाने वाले सारे तर्क एवं प्रतिक्रियाएँ स्वतः ध्वस्त हो जाती हैं।
                      देखा जाए तो आज के समय में जाहिल गँवार देहाती हो जाना या ऐसी उपमाओं से खुद को सुशोभित करना पीएचडीधारी डाक्टरेट की उपाधि ग्रहण करने से लाख गुना बेहतर है।
आखिरी बात ये कि हममें से हर किसी के जीवन में ऐसे नीम के पेड़ रूपी कुछ स्मृति चिन्ह होते हैं, उन्हें हमें हर हाल में बचाना चाहिए, बार-बार बचाना चाहिए।

Wednesday, 26 July 2017

- मुनस्यारी में काँच की समस्या का समाधान -

                             मुनस्यारी में काँच की बढ़ती हुई मात्रा को देखते हुए इसे रिसायकलिंग के लिए यहाँ से बाहर ले जाना अब जरूरी हो गया है।। इससे पहले कि ये छोटा सा काम असंभव सा दिखने लगे, सबको मिल-जुलकर इस समस्या को दूर करना ही होगा। ये काम पेपरबाजी, आर्टिकलबाजी, फोटोबाजी, एनजीओगिरी या नेतागिरी से प्रेरित न होकर आपके हमारे यानि जनसाधारण के धरातलीय प्रयास से होगा।
                            वास्तविक धरातल पर अगर बात की जाए तो मुनस्यारी से काँच इकट्ठा कर हम हल्द्वानी तक किसी ट्रक में लाद कर भेज दें ऐसा सोचना बेवकूफी भरा उपाय होगा इसके अलावा और कुछ नहीं। इसीलिए इस पूरी प्रक्रिया को कई चरणों में तोड़ने की आवश्यकता है।
                            उदाहरण के लिए जैसे मुनस्यारी में सैकड़ों दुकाने हैं इतने घर हैं कमरे हैं कुछ आफिस हैं। माने कहने का अर्थ ये कि लोगों के बीच जाकर, उनसे बात कर, उनका विश्वास अर्जित कर कोई एक ऐसी खाली जगह सुनिश्चित की जाए जहाँ काँच की बोतलों को इकट्ठा किया जा सके। फिर ये बोतलें मुनस्यारी से रिसाइकल होने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया से आगे भेज दी जाएगी।

समाधान जिन चार चरणों में संपन्न होगा वो कुछ इस प्रकार है-

1)मुनस्यारी से थल-
इस बात से शायद ही कोई इंकार करेगा कि मुनस्यारी से थल का रास्ता सबसे अधिक दुर्गम है, और बरसात के समय में लैंडस्लाइड को ध्यान में रखते हुए काँच भेजना मुमकिन नहीं, ये वाकई जोखिम भरा काम होगा। ठीक ऐसा ही जोखिम बर्फबारी के कुछ महीनों में है। कुल मिलाकर अगर मोटा मोटा देखा जाए तो पाँच महीने हटाकर भी सात महीने हमारे पास हैं, इस बीच आसानी से मुनस्यारी से थल को गाड़ियां आ सकती है। मुनस्यारी से काँच भेजने की जिम्मेदारी सिर्फ थल तक ही होगी, वहाँ उनका काम समाप्त हुआ।

2)थल से बागेश्वर-
ठीक मुनस्यारी की तरह थल वालों की जिम्मेदारी भी बागेश्वर तक ही होगी। अब यहां थल वालों की जिम्मेदारी दुगुनी हो जाती है। वो ऐसे कि काँच मुनस्यारी से आया है उसे भी आगे भेजना है और थल में भी जमा हुए काँच को इकट्ठा कर आगे भेजना है। लेकिन अब थल वालों के लिए आगे का रास्ता मुनस्यारी की अपेक्षा थोड़ा सुगम ही होगा इसलिए कोई समस्या वाली बात नहीं है।

3) बागेश्वर से अल्मोड़ा-
ठीक वैसी ही प्रकिया यहां भी दुहरायी जाएगी।

4) अल्मोड़ा से हल्द्वानी-
ये आखरी पड़ाव है यहां से काँच रिसाइकल होने के लिए फैक्ट्री में जाएगा। अच्छा यहां इस एक बात को लेकर संशय है कि अब चूंकि अल्मोड़ा मैदानी इलाके से सबसे पास है तो यहां से हल्द्वानी काँच पहले भी रिसाइकल होने के लिए जाता रहा है या नहीं इस बारे में जिन्हें जानकारी हो वे स्पष्ट करें।


ये तो पूरा रोडमैप तैयार हो गया, अब कैसे इसे धरातल में उतारा जाए, और इसमें क्या क्या समस्याएँ आ सकती है, इस पर ध्यान देने से जो बातें सामने आ रही है वो कुछ इस तरह है -

a) पैसे का लेन-देन -
अब चूंकि इस काम में आमदनी कम और लोक-कल्याण की भावना ज्यादा है तो इसमें पैसे को लेकर ज्यादा समस्या नहीं होगी। फिर भी इस समस्या का एक त्वरित उपाय है। अब जैसे मुनस्यारी से गाड़ी थल तक आएगी। उसका जो भी हिसाब किताब है थल में ही पूरा होगा। मुनस्यारी से काँच भेजने वालों को हल्द्वानी तक कितना काँच पहुंचा इससे कोई मतलब नहीं। ठीक कुछ ऐसा आगे भी होगा।

b) काँच कौन इकट्ठा करे -
काँच इकट्ठा करने का काम आप करेंगे, मैं करूंगा, ये जनता करेगी। समस्या हमने तैयार की है तो नि:संदेह इसे ठीक भी हम ही करेंगे अब चूंकि ये कोई सौदेबाजी या फायदे वाला काम तो है नहीं कि कोई देवदूत या एनजीओ वाला टपक जाए। सो काम हमें करना है। और क्या ये भी कोई काम है, बोतलें एक किसी जगह में इकट्ठी करनी है। मेरा सुझाव है कि सबसे पहले इस काम की शुरूआत एक मुहिम की तरह स्कूली बच्चों के द्वारा हो। इससे शराब और उससे होने वाले दुष्प्रभाव को लेकर गजब का परिवर्तन होगा। जब कोई स्कूली बच्चा अपने ही घर से बोतलें जमा कर आगे भेजेगा तो उसके घर में शराब पीने वालों में शर्मिंदगी आएगी और फिर शराब और उससे होने वाले नुकसान को लेकर चेतना आएगी। कुल मिलाकर ये कदम एक तरह से शराबबंदी का भ्रूण तैयार करने में भी उपयोगी साबित हो सकता है।

c) किसकी गाड़ी में जाएगा काँच -
जहां तक मुझे याद आ रहा है बिल्डिंग मटेरियल वाली गाड़ियां रामनगर से मुनस्यारी तक आती है। हमने देखा कि बहुत सी ऐसी बड़ी गाड़ियां हैं जो मुनस्यारी से खाली निकलती है। खाली गाड़ियां नहीं भी मिली तो भी कौन सा रोज काँच भेजना है। कम से कम एक ट्रक कांच इकट्ठा होने में पंद्रह बीस दिन का समय लग ही जाएगा। लोक-कल्याण की भावना से काँच भी इकट्ठा होगा, लोग खुलकर सामने आएंगे, गाड़ियों की व्यवस्था भी होगी और काँच गाड़ी में लादकर मुनस्यारी से आगे जाएगा भी।

d) जागरूकता की समस्या -
शुरूआत में लोगों को इस मुहिम से जोड़ने में समस्या आ सकती है। फिर भी मुझे नहीं लगता कि पहाड़ में ऐसे छोटे से काम के लिए जागरूकता को लेकर कोई ज्यादा समस्या पैदा होगी। क्योंकि ये वही समाज है जो आज भी सवारी गाड़ियों के माध्यम से चंद खीरे और दूध की बोतलें सौ सौ किलोमीटर दूर अपने रिश्तेदारों के पास भेजते हैं, ये वही समाज है जहाँ आज भी विश्व में सबसे ज्यादा संयुक्त परिवार है, ये वही समाज है जो बिना किसी दिखावे के, बिना किसी सांगठनिक सहयोग के सैकड़ों सालों से पहाड़ों में पत्थर तोड़कर पगडंडियां बनाते आये हैं। ऐसी जिस समाज की बनावट है। ऐसे जीवन मूल्यों को जो समाज आत्मसात किए हुए है, उस समाज से इतनी अपेक्षा तो की जा सकती है कि वह संगठित होकर काँच की इन बोतलों को रिसाइकलिंग के लिए बाहर भेज दे।

Panchachuli Peaks, Munsyari, Uttarakhand

 

Monday, 24 July 2017

पाना भवन - बादनी गांव

                           प्रत्येक किसान अपने खेत का वैज्ञानिक होता है और वो खेत उसकी प्रयोगशाला। किसान की इस प्रयोगशाला से धरती को, पर्यावरण को, व्यक्ति विशेष को कोई खतरा नहीं, कोई नुकसान नहीं। अब चूंकि किसान अपनी जरूरत के अनुसार धरती का पोषण करता है शोषण नहीं ( अगर आज बाजार के दबाव को हटा कर देखा जाए तो), तो उसका यह काम वाकई धरती को बचाने का एक धरातलीय प्रयास है। किसान का यह विज्ञान कार्ल मार्क्स के कथन "गणित विज्ञान की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति है" से भी कहीं आगे है।
मजेदार बात ये भी कि किसान का यह वैज्...ञानिक पहलू एकपक्षीय है क्योंकि उसके विज्ञान में सिर्फ वरदान का पक्ष है अभिशाप का पक्ष नगण्य है।

नोट:- इनके गांव तक जाने के लिए कोई रोड नहीं है, पैदल खड़े पहाड़ चढ़कर ही पहुंचा जा सकता है।


गौशाला


प्रसाधन और स्नानागार की भी सुविधा है


 आंगन


दादी पशुओं के लिए चारा लाद कर ले जाती हुई, यह चारा वो चार-पांच किलोमीटर दूर जंगल से लेकर आती हैं।


पाना जी के घर का एक खूबसूरत सा कमरा- 1


पाना जी के घर का एक खूबसूरत सा कमरा- 2


पाना जी की भतीजी


पाना जी के पिता मुनस्यारी तहसील के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने एयरफोर्स ज्वाइन किया था। साथ ही इन्होंने पैराशूट से गोरीपार से मुनस्यारी पैराग्लाउडिंग की थी जो कि अपने आप में एक कीर्तिमान है।


चिलकोट(मुनस्यारी) की दुर्गम पहाड़ियों में दो पागल किसान। जो हमारे साथ में हैं वे बादनी गांव के हैं जिन्होंने आर्ड्रिनेंस फैक्ट्री की नौकरी छोड़ी, पहाड़ लौटे और किसानी का फैसला लिया।
पाना भवन

Friday, 14 July 2017

~ मुनस्यारी से एक माफीनामा ~

                        आज ये इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा है कि इस जगह के बारे में लोगों को बताकर, यहां की खूबसूरती दिखाकर, भले ही मेरी बात कुछ थोड़े लोगों तक ही पहुंची हो लेकिन फिर भी मैंने यहां का बहुत बड़ा नुकसान कर दिया है।
                        असल में महीने भर पहले हम एक पहाड़ी गांव को गये थे। वहां एक दादी ने मेरे कैमरे को देखते ही नाराजगी जताई और बंद करने को कहा। मुझे उस नाराजगी का मर्म समझने में काफी समय लग गया। मानो वो दादी मुझसे मन ही मन कह रहीं हों कि आपने मशीनों से घिरकर अपनी जिंदगी नर्क बना ली है अब ये सब यहां मत आजमाइए।
                        सोचता हूं अभी तक मैंने मुनस्यारी से जुड़ी जितनी तस्वीरें, वीडियो या अन्य जानकारियां जो भी मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से यहां बांट दी है। उन सबको हमेशा के लिए हटा दूं। लेकिन अब हटाने का क्या फायदा, अब तो आप देख ही चुके हैं।
                         फिर भी आपमें इंसानियत होगी तो कभी मत आइएगा इन जगहों पर। आइएगा तो भी एक सभ्य इंसान की तरह वरना नहीं। भूखे भेड़िए के भेष में आएंगे और नुकसान पहुंचा के चले भी जाएंगे बाकी लोगों की तरह तो भी कोई क्या कर सकता है। अब इस बात का डर रोज सताने लगा है कि टूरिज्म के चक्कर में मुनस्यारी का हाल शिमला, मनाली, नैनीताल, लद्दाख, श्रीनगर जैसा न हो जाए। वहशीपन लिए भीड़ की मानसिकता कब कहाँ अपनी जड़ें जमा ले। कुछ कह नहीं सकते।
                         टूरिज्म का आज जैसा माहौल बनाया जा रहा है उससे कैसे कोई जगह बर्बाद हो जाती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण लद्दाख है। खासकर "थ्री इड्यिट्स" फिल्म के बाद लद्दाख जाने वालों का हुजूम बढ़ता ही गया ठीक ऐसा ही कुछ "ये जवानी है दीवानी" फिल्म के बाद मनाली के साथ हुआ लेकिन सबसे अधिक नुकसान लद्दाख को ही हुआ। वहां का रहन-सहन, खान-पान, वहां की पूरी संस्कृति आज खतरे में है। आज लगभग हर युवा के लिए जिंदगी का सपना सा है कि एक बार लेह-लद्दाख जाकर खुद को संतुष्ट कर ले।
आप सोच रहे होंगे कि भाई हम तो अपनी बाइक, अपनी कार लेकर बस घूमने गये थे। किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया।
                         पर आपको ये कभी नहीं दिखाई देगा कि जिन बंदरों को आप के अंदर का मूर्ख समाजसेवी रास्ते में कहीं रूककर बिस्किट और चिप्स खिला देता है वही बंदर बाद में इन चीजों के लिए लूट मचाते हैं। जो जंगली जानवर बढ़िया फल, कंद-मूल से चलते थे, आपने उनको भी नहीं बख्शा, उनकी आदतें बिगाड़ दी, वो भी चंद तस्वीरों के लिए। अब चूंकि आपकी हवस इतनी ज्यादा है कि आप ये सब कुछ नजरअंदाज कर जाते हैं।
लद्दाख में आफ रोड गाड़ियों को अपने एडवेंचर के लिए आप कहीं भी ले जाते हैं। आपको इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है कि आप छिपकली सांप आदि सरीसृपों के अंडों को, जमीन में घोसलें बनानी वाली छोटे पक्षियों के अंडे और कुछ छोटे स्तनपायी जीवों को अपनी गाड़ी से कुचल रहे होते हैं।
                          आप अपनी एसयूवी कार लेकर लद्दाख के छिछले पानी में, नदी के किनारों में दौड़ाते हैं, यूट्यूब के वीडियो मटेरियल के लिए। लेकिन आप ये नहीं देख पाते कि आपकी इस एक हरकत से पर्यावरण का कितना नुकसान होता है। आपके गाड़ी के चक्के ऊपरी मिट्टी को भारी नुकसान पहुंचाते हैं, उस पानी में उगे जलीय पौधों एवं जलीय जीवों के भ्रूण(अंडे) को कुचल जाते हैं और आपको खबर ही नहीं। आपके गाड़ियों के बार-बार हार्न बजाने से रेसिंग करने तक, ऐसी न जाने कितनी हरकते हैं, इन सबसे पहाड़ों को इन कोमल चट्टानों को कितना दूरगामी नुकसान पहुंचता है, इसे आप कहाँ देख पाएंगे। आजकल जो हाई सस्पेंशन वाली कारें बनती हैं उनका तो विज्ञापन वाला वीडियो भी बिना नदी नालों को नुकसान किए नहीं बन पाता। जैसा देखा वैसा सीखा वाला तर्जुमा है।
                            असल में देखा जाए तो अधिकतर लोग पहाड़ घूमने नहीं आते। वे तो पहाड़ों को, इन नदियों को, इन खूबसूरत वादियों को अपनी रखैल समझते हैं,जी भर के अपने क्षणिक सुख के लिए अमुक जगह को निचोड़ते हैं अपनी हवस रूपी भूख से। शराब पिया और फेक दिया कहीं भी बोतल, पानी की बोतल भी, चिप्स वगैरह की पन्नी भी। और तो और जहां टूरिज्म नामक भूत पहुंचा वहां उस जगह की फूड हैबिट को ही लील लिया, न जाने ऐसे कितने तरीकों से नुकसान पहुंचता है।

 

"हमारी सुविधाएं जितनी बढ़ती जाती है उसी के साथ हमारी जिम्मेदारियां भी उतनी ही बढ़ जाती है।" हम प्रकृति की इस साम्यावस्था को कब समझेंगे?


                             अच्छा स्थानीय फूड हैबिट को नुकसान कुछ इस तरह पहुंचा कि जिन गांवों में सड़कें नहीं पहुंच पाई हैं वहां भी फास्ट फूड की छोटी-छोटी दुकाने खुल गई इसलिए नहीं खुली कि फास्ट फूड उनके शौक की चीज है और उसके बिना वे रह नहीं सकते बल्कि इसलिए कि बाहर से कोई टूरिस्ट अगर आएगा तो वह अवश्य फास्ट फूड खाएगा ही। आज के जमाने के हिसाब से तो यही सबसे बेहतर विकल्प प्रचलन में है। लेकिन टूरिस्ट एक सीजन में ही आएगा, बाकी समय कैसे किया जाए इस फास्ट फूड का। तो इस समस्या का समाधान भी मानसिकता कर देती है और वो ये कि गांव का व्यक्ति शहर के व्यक्ति को अपने से अधिक कुशल, सभ्य और बुध्दिमान समझता है इस चक्कर में वो अपने खान-पान रहन-सहन,तौर-तरीकों को छोटा समझता है। और शहरी खानपान उसे अमृत तुल्य लगने लगता है। और कुछ इस तरह वो भी फास्ट फूड को अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है।
आज आप उत्तर भारत के किसी भी पर्वतीय इलाके में जाएं आपको भले वहां खाने को कुछ मिले न मिले लेकिन नूड्ल्स और मोमो की दुकानें अवश्य मिल जाएंगी।
                             आपने तो सालों तक दिन रात काम किया, नाइट शिफ्ट भी किया है। लाइफ में बहुत कुछ देखा है, काफी संघर्ष किया है, जीतोड़ मेहनत की है तब जाकर सफलता के मुकाम पर पहुंचे हैं। अब जब इतना कुछ किया है तो थोड़ा सुकून भी चाहिए, अपनी मानसिक थकान मिटाने आप पहाड़ आएंगे, ऐश करेंगे। जीवन में आपने इतना त्याग,इतना समर्पण कर दिया कि नंगापन मचाने का तो अब तो मानो आपके पास सर्टिफिकेट है, अब चूंकि आपके पास अनाब-शनाब पैसे हैं और इन पैसों से आपको नाना प्रकार की सुविधाएं भोगनी है तो आपके भूख की चिंता लोगों में इतनी ज्यादा है कि आपके हिसाब से खानपान तैयार होता है, बाहर से चीजें मंगाई जाने लगती है, स्थानीय फूड-हैबिट की ऐसी की तैसी। आलीशान होटल तैयार होते हैं, शराब और शबाब की जुगत लगाई जाती है वगैरह वगैरह।
आप आएंगे नुकसान रूपी बटन दबाकर अपनी आत्मलिप्सा भुनाएंगे और फिर चले जाएंगे। और जाकर कुछ अपने साथियों के साथ जानकारियां साझा करेंगे तब तक एक पूरा का पूरा शहर आपकी भूख के मुताबिक तैयार होने लगेगा।
                            कई लोग स्वयं की खोज में निकला हूं वाली नौटंकी लेकर चलते हैं और वो भी पर्यावरण की खूब ऐसी-तैसी करते हैं। और मन ही मन #peace #serenity की चोचलेबाजी करके घर वापस लौटते हैं। आज मानव मन इतना अधिक संवेदनशील कैसे हो गया है कि जिस हैशटैग से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है बाद में उसी हैशटैग से पर्यावरण को बचाने का रोना रोता है।
खैर कितना लिखा जाए...

आखिरी बात ये कि ...
मुझे कभी नहीं लगा कि हमारे आसपास के वातावरण की ऐसी छोटी-छोटी चीजें जानने-समझने के लिए किसी पढ़ाई या विशेषज्ञता की जरूरत है। बस नेकनीयती हो तो काम बन पड़ता है। जब गांव का अनपढ़ किसान इन चीजों का ख्याल कर सकता है तो आप और हम क्यों नहीं। आप और हम तो वैसे भी पढ़े-लिखे हैं।
और अगर आप मेरे इस माफीनामे को स्वीकार करते हैं तो इन छोटी-छोटी चीजों पर जरूर ध्यान दीजिएगा। क्योंकि ज्वालामुखी एक दिन में तैयार नहीं होता वो तो हमेशा अंधेरे से घिरा होता है और जब फूटता है तो उसी अंधेरे को उजाले में तब्दील कर देता है और हम आश्चर्यचकित हो उठते हैं।

Sunday, 18 June 2017

~ My Family @ Munsyari ~

My big brother Binod Bisht


Bhabhi and Nephew Ayush

Younger brother Tarun singh dhami


Brother Manoj rana

Suresh bhai(Right end) and Rana brothers


Bhuppy rana and Jitin Sayala(middle)


Bachha Party

Massab and gungun


Dadi and Gungun


Nephew Pritesh


Golu


Didi


Baccha Party

Friend from Baadni Village




Judwa brothers


Khem Da


My Students - 1


My Students - 2


My Students - 3


Saturday, 17 June 2017

~ Sex, Marriage and Settlement ~

                                 कोई अगर पूछे कि भारत के युवा पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी समस्या क्या है तो मैं इन तीन शब्दों का नाम लेते हुए कहूंगा कि यही सबसे बड़ी समस्या है और यही सबसे बड़ी बीमारी भी है। असल में ये बीमारी थी नहीं लेकिन इसे कुछ इस तरीके से हमारे सामने परोस दिया गया है कि हम इससे आगे का कुछ सोच ही नहीं पा रहे। हमारी सोच इतनी संकुचित हो चुकी है कि हमारे लिए ये चुनिंदा विषय आज जीवन का अंतिम लक्ष्य तक बन चुके हैं, हम न इसके आगे का कुछ सोचना चाहते हैं न ही कुछ करना चाहते हैं।
हम इन्हीं विषयों के इर्द-गिर्द चर्चा कर खुद को संतुष्ट करने में ही लगे रहते हैं।

                                 अभी कुछ समय से मैं अपने सालों पुराने दोस्तों से मिल रहा हूं। मिलने के बाद ऐसा लगा कि उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य सेक्स, शादी और सैटल होना ही है। एचीवमेंट के नाम पर कोई अपनी होने वाली पत्नी की तस्वीरें, अपने घर, जमीन, गाड़ी वगैरह की बात करता है, तो कोई एचीवमेंट के नाम पर तरह-तरह की लड़कियों की तस्वीरें दिखाने लगता है, जिनसे उसने वर्तमान में संबंध बनाए। इस पूरे पागलपन को देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि नौकरी, शादी, सेक्स, घर, गाड़ी बस यही सब में उनकी जीवनशैली सिमट चुकी है। वे न चाहते हुए भी इस बने बनाये पैटर्न से अलग नहीं हो पा रहे, न ही कुछ नया कर पा रहे। उन्हें लगता होगा कि वे बड़ी अच्छी बातें कर रहे हैं, माॅडर्न हो गये, सभ्य हो गये, लाइफ को जीना सीख गये हैं वगैरह वगैरह। लेकिन वे तो जहां थे, वहीं के वहीं हैं, उनकी सोच में आज भी वही पुराना कचरा/मवाद भरा हुआ है। नया कुछ हुआ ही नहीं, नयेपन के नाम पर अगर कुछ हुआ है तो वो ये कि महंगा सा स्मार्टफोन आ गया है, महंगे ब्रांड वाले जूते,कपड़े और लाखों की बाइक, और तो और घर में महंगी कार भी आ चुकी है। यानि इतनी घटिया कंडिशनिंग हो चुकी है कि ये सब के चलते जो सबसे जरूरी चीज थी, मस्तिष्क का विकास, उसमें तो लगभग जंग लग चुका है, रचनाधर्मिता शून्य हो चुकी है।
फिर लगा कि क्या मेरे कुछ दोस्तों के साथ ही ऐसा है, नहीं। हर जगह यही हाल है, कुछ अपवादों को अलग कर दिया जाए तो मुख्यधारा में यही चल रहा है।
                                 आज के युवा के लिए सेक्स किसी लाइफटाइम एचीवमेंट से कम नहीं है, वो इसे जीने-मरने का सवाल बनाने लगा है, उसके लिए दुनिया बस जो है यही है। संबंध बनाओ, खुश रहो, आज ये कल वो, माइलस्टोन सेट करते जाओ। ये सब भारत जैसे लो-मोराॅलिटी वाले देश में ही संभव है।

                                 हवस, भूख और लालसा इतने चरम स्तर पर पहुंच चुकी है कि आज का युवा कैसे न कैसे करके अपने लिए अपार सुविधाएं हथिया लेना चाहता है, रोजगार की घोर कमी के बीच चंद सरकारी नौकरियों के लिए लगी मारामारी इस बात का संकेत है कि फलां को कैसे भी करके एक ठीक-ठाक सरकारी नौकरी चाहिए, हां नौकरी कैसी भी हो चलेगा। पसंद-नापसंद की बात बाद में, जीवन-मूल्यों की बात बाद में, मोटी कमाई और रुतबा होना चाहिए बस। एक बार लग गये नौकरी में, जीवन भर फुर्सत बैठे रहो। कोई किचकिच नहीं। और फिर इसके बाद क्या, सुंदर और सुशील बीवी भी तो चाहिए। सही मायनों में देखा जाए तो ये भी एक अलग ही प्रकार का बिजनेस बन चुका है। पूरे घर-परिवार समाज का ढांचा ऐसा बन पड़ा है कि पैरेंट्स भी बच्चों पर शादी के लिए दबाव बनाने लगते हैं, पढ़ी-लिखी लड़की, अच्छे घर की खोजबीन चालू, यानि एक ऐसा माहौल बन जाता है कि लगता है हम शादी करने के लिए ही इस धरती पर अवतरित हुए हैं, अब यही हमारे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है।
                               आज के पढ़े-लिखे माॅडर्न युवा को भी अपने लिए जीवनसाथी के रुप में एक ऐसी लड़की चाहिए जो खुद नौकरी में न हो और बढ़िया घर में रहे, हमने अच्छे-अच्छे अधिकारियों को ऐसा करते देखा है। वे असल में अपने लिए एक वस्तु खरीद रहे होते हैं डील कर रहे होते हैं, उन्हें असल में शादी के लिए लड़की नहीं चाहिए, एक सुंदर सी भोग्या वस्तु चाहिए। रिश्ता, प्रेम, भावनाएँ हां ये सब तो शादी के बाद आ ही जाएगा, नौकरी का ठाठ है, सब हो जाएगा। लड़कियां भी कम नहीं हैं, उन्हें इस नव-दासत्व में इतना मजा आता है, वे शादी के अगले दिन से ही अपने नाम और सरनेम के बीच अपने पति का नाम जोड़ लेती हैं।

 अब लड़के भी महान, वे इतने महान होते हैं कि जब उनकी वस्तु रूपी पत्नी जब पेट से होती है तो वे दूसरी औरतों से बात करके अपना मन बहलाने लगते हैं। कम नहीं तो ज्यादा अधिकतर यही होता है, कोई पराई लड़कियों/महिलाओं से बातचीत/चैट करके मन बहलाता है तो कोई संबंध बना लेता है।
और लड़कियां भी अपने में मस्त, वो शाॅपिंग करके, सोना-चांदी खरीद के अपने ईगो का बराबर तुष्टीकरण करती है।

                           अब इन सबसे उलट एक तबका खोखले ब्रम्हचारियों का भी है, अब इनमें एक वो जो अपने कालेज लाइफ में मिली प्रेम की विफलता से क्रुद्ध होकर बीस की उम्र में जीवन भर अकेले रहने का फैसला ले लेते हैं, विपश्यना करने लगते हैं और फिर कुछ दिन बाद पता चलता है कि अगला किसी के साथ फिर से रिश्ते में है। एक तबका तीस के उम्र पार वालों का है, इनकी तो दुनिया ही अलग है, ये सालों तक दुनिया के सामने ब्रम्हचारी बने फिरते हैं, बुद्धम् शरणं गच्छामि का ढोंग करते हैं, हालांकि परदे के पीछे ये भी खूब अफेयर मारते हैं। जब आखिर में इन्हें पता चलता है कि अब इनसे नहीं हो पाएगा, कंट्रोल नहीं हो पा रहा,और अकेले नहीं रह पाएंगे। तो फिर वे सारा ढोंग त्याग कर मजबूरी में शादी कर लेते हैं। सनद रहे कि ऐसी शादियों का पसंद, नापसंद और आपसी प्रेम से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता, ये एक प्रकार का बिजनेस डील ही होता है।

स्वीकार करना नहीं करना आपके ऊपर, पर हकीकत तो यही है कि हम जिस पांच हजार साल पुरातन संस्कृति का गौरवगान करते रहते हैं, आज उसका दिवाला निकल चुका है, आज उस संस्कृति का वर्तमान धूमिल हो चुका है, और वो महान संस्कृति अपनी तमाम विसंगतियों को किनारे कर खुद को महान साबित करने की आंधी में बहने लगी है।

 यानि हम खुद से इतना झूठ कैसे बोल सकते हैं?
हम स्वयं के साथ इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकते हैं?
हम क्यों ऐसी दोहरी जिंदगी जीते हैं??
आखिर क्यों????

Friday, 16 June 2017

~ मुनस्यारी में काँच की समस्या ~

                              मुनस्यारी में ये एक ऐसी समस्या आ खड़ी है जो दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है, और आश्चर्य की बात ये है कि इस ओर किसी का ध्यान भी नहीं जा रहा है। मुनस्यारी में रोज औसतन 20 से 25 हजार रूपए की शराब बिकती है। लोग शराब पीते हैं और बोतलें कहीं एक जगह किसी कमरे में या होटलों में इकट्ठा होती जाती है। कुछ लोग बोतलें कहीं भी फेंक आते हैं, अब जो फेंकी हुई बोतलें हैं वो या तो पहाड़ों में जहां-तहां गिरी मिल जाती है या फिर गदेड़ी(कचरे फेंकने की जगह) में या फिर नालियों में एकत्र हो जाती है। बारिश होती है और सारा कुछ कूड़ा-करकट बह कर नदियों तक चला जाता है। लेकिन इस बहाव से काँच की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो जाती, काँच का प्रतिशत तो जस का तस बना ही हुआ है, या यूं कहें कि बढ़ता ही जा रहा है, लेकिन कोई भी इस समस्या को एक समस्या के तौर पर देख नहीं पा रहा है।
                               काँच की ये बोतलें समस्या इसलिए बन गई है क्योंकि बोतलें मुनस्यारी आ तो रही हैं लेकिन यहां से वापस नहीं जा पा रही, रिसाइकल होने का कोई उपाय नहीं दिख रहा। और आखिर कोई इतना बड़ा जोखिम उठाए तो उठाए कैसे। कोई अगर काँच की बोतलें इकट्ठी कर रिसायकलिंग के लिए मुनस्यारी से बाहर यानि 300 किलोमीटर दूर हल्द्वानी भेजने की तोहमत उठाता भी है तो उसे इस काम का मूलधन भी नहीं मिल पाएगा, उल्टे अपनी तरफ से पैसे लगाने पड़ेंगे। 11 से 12 घंटे का लंबा सफर तय कर खतरनाक पहाड़ी रास्तों से होते हुए काँच की बोतलों से लदी गाड़ी जब मुनस्यारी से हल्द्वानी पहुंचेगी तो आप इस बात का अंदाजा लगाइए कि रास्ते में कितनी बोतलें टूटेगी।

समाधान कैसे हो-
अब कोई साधन-सम्पन्न पुरूषार्थी व्यक्ति या कोई नि:स्वार्थ एनजीओ टाइप का कोई व्यक्ति ही चाहिए जो इस समस्या को गंभीरता से ले। कोई कर्मठ संवेदनशील व्यक्ति ही अब इस समस्या से मुनस्यारी को मुक्ति दिला सकता है। अगर ऐसा कुछ नहीं भी हुआ तो भी आने वाले सालों में आज नहीं तो कल ऐसी नौबत आ ही जाएगी कि मुनस्यारी के नागरिकों को खुद आगे आकर नेतृत्वक्षमता स्थापित करनी पड़ेगी और इस काम को अमलीजामा पहनाना पड़ेगा।


Panchachuli Peak- 1, Munsyari

Thursday, 15 June 2017

~ Himalaya Mysteries ~

हिमालय के ऊपरी इलाकों में कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जो एक खास किस्म की ऊर्जा से संचालित हैं। जब लोग दस-बीस किलोमीटर की चढ़ाई करके जब ऐसी जगहों पर पहुंचते हैं। तो अचानक ही वे महसूस करते हैं कि उनकी सफर की सारी थकान मिट गई। लोग इस भ्रम में रहते हैं कि उस जगह विशेष की खूबसूरती के कारण ऐसा हो रहा है।
लेकिन वजह तो कुछ और ही है।
असल में जब कोई एक लंबी चढ़ाई कर ऐसे ऊपरी क्षेत्रों में जाता है, तो उसकी भूख,प्यास थकान सब झटके में मिट जाती है। और जैसे ही वो उस जगह से नीचे उतरता है यानि उस जगह से दूर होता है,तो फिर से थकान पैर दर्द और बाकी चीजें दिमाग पर हावी होने लगती है। क्या सिर्फ उस जगह की सुंदरता ही एकमात्र वजह है, नहीं ऐसा नहीं है। असल में कारण छुपा है, उस जगह में हजारों सालों से स्थापित पत्थरों में। कहा जाता है कि पत्थरों की स्मरण क्षमता सबसे अधिक होती है, ऐसा इसलिए कि जो वस्तु अपनी प्रकृति में जितनी ठोस होती है, उसकी स्मरण-शक्ति उतनी तीव्र होती है। इसलिए हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में पत्थर की बनी छोटी-छोटी मूर्तियों की पूजा की जाती है, क्योंकि पत्थरों में असीमित ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता होती है।
न जाने हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों में स्थापित पत्थरों में कितनी स्मरण-शक्ति है, क्योंकि इनके पास जाने पर ऐसा प्रतीत होता है कि ये सालों से असीमित मात्रा में ऊर्जा स्पंदित कर रहे हैं। इसलिए तो इतनी चढ़ाई चढ़ने के बाद भी हम इन जगहों में पहुंचने के बाद एक खास किस्म की सकारात्मक ऊर्जा से संचालित होने लगते हैं। सारी थकान किनारे हो जाती है, और हमारे पांव अपने आप चलने दौड़ने लगते हैं, और हमें चाहकर भी वहां रुकने, थमने या आराम करने का मन नहीं करता, हम प्रकृति की गोद में खेलने लगते हैं।


 

~ Swimming Demonstration in the foothills of himalayas ~

पहाड़ों में तालाब नहीं होते, इस एक वजह से अधिकांश लोग स्वीमिंग चीज क्या है, नहीं जानते। जब इन बच्चों को पता चला कि मुझे स्वीमिंग आती है तो वे सिखाने की जिद करने लगे। 10'C में, वो भी इतने ठंडे पानी में नहाना, मैंने तो पानी छूते ही साफ मना कर दिया। बच्चे इस तरह जिद पर उतर आए कि सब एक-एक करके नहाने के लिए उतर गये मानो किसी भी हाल में सीखना ही है। और फिर ऐसे ही पानी में हाथ पांव मारने लगे। स्वीमिंग सीखने के लिए सारे बच्चे पागल हुए जा रहे थे। मैं वहां पास में एक पत्थर में बैठा हुआ था तो वे मुझसे कहने लगे कि भैया वहीं से बता दो, हम फिर ठीक वैसा-वैसा करते हैं। और फिर उनमें से एक बच्चे ने कहा - भैया सीखा दो न यार, आप फिर कल को चले जाओगे तो हमेशा के लिए याद रखेंगे कि आपसे सीखे हैं। और फिर उस बच्चे की बात सुनकर, उन सबके के जुनून को देखकर मैं भी उतर गया कुंड में।
पानी इतना ठंडा था कि शरीर सुन्न हो जाता, साथ ही लाल पड़ जाता, इसलिए हर पांच- दस मिनट में शरीर को गर्म करने के लिए हम सबको पानी से बाहर आना पड़ता। कुछ इस तरह हम घंटों तक इस ठंडे पानी में नहा दिए।
आप पानी को देखिए, बहता हुआ पानी है और ये पानी इतना साफ है कि आसानी से पिया जा सकता है, शहरों में फिल्टर किए पानी से कहीं ज्यादा शुध्द और मीठा।

Location - Bharadi River (tributary of goriganga), Bharadi Mandir, Munsyari



 

कुछ सवाल--

भारत का एक ऐसा गांव कोई बतलाइए..
~ जहां के गांव वालों ने नदियां सूखा दी हों,
~ जहां गांव वालों ने तालाब पाट कर अपने लिए घर बना दिए हों,
~ जहां गांव के लोगों ने कुएं समाप्त कर दिए हों,
~ जहां गांव वालों ने अपनी जरूरतों के लिए जंगल के पेड़ों का सफाया कर दिया हो,
~ जहां गांव वालों ने अपनी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए प्रकृति को किसी भी प्रकार से नुकसान पहुंचाया हो,
~ ऐसे गांवों का भी नाम बताया जाए जहां कचरे-कूड़े का टीला बन गया हो और सफाई न होती हो,
~ ऐसे गांवों का भी नाम बताया जाए जहां बजबजाती नालियां बहती हों और उसकी सफाई के नाम पर कुछ भी न होता हो,

अब दूसरा पहलू, शहरों की बात करते हैं...
भारत का एक ऐसा शहर/महानगर/मेट्रो सिटी
बताया जाए जहां---
~ उफनती गंदी नालियां न हों,
~ जहां कचरे के बड़े-बड़े ढेर न हो,
~ जहां के लोगों ने जुगाड़ लगाकर अपने स्वार्थ हेतु तालाबों/पोखरों को समतल न किया हो,
~ जहां हजारों की संख्या में पेड़ न कटे हों,
~ जहां के लोगों ने नदियों/झीलों/कुओं/अन्य जल स्त्रोतों की ऐसी तैसी न की हो,
~ जहां साफ पानी और साफ हवा ( जीने के लिए सबसे मूलभूत जरूरत) मिलती हो,

तुलना-

1) आदर्श ग्राम तो भारत में सैकड़ों की संख्या में है, एक ऐसा आदर्श शहर का नाम गिनाइए, आदर्श शहर छोड़िए कोई छोटा शहर कस्बा टाइप का ही बता दीजिये,

2) क्यों गांव के लोगों को Go green का T-shirt नहीं पहनना पड़ता? ये चूतियापा शहर के लोगों द्वारा ही क्यों? जबकि उनकी जीवनशैली का हर दूसरा काम प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाला है।

3) गांव के लोग क्यों कभी स्वच्छता के लिए जागरूकता कैंपेन टाइप का ढोंग करते नहीं दिखते?
शहर के लोग ही क्यों,
क्या ऐसा तो नहीं कि शहर के पढ़े-लिखे लोग सच में ज्यादा सभ्य हैं या ज्यादा साफ-सफाई से रहते हैं?

4) गांव में किसी का एक बड़ा सा घर है, मेहनती किसान है, उसकी तुलना में शहर में 1-बीएचके फ्लेट में रहने वाला कैसे ज्यादा सभ्य मान लिया जाता है?
लोग रहने लगे और बिचौलियों ने जमीन का रेट ऊंचा कर दिया, क्या सभ्य होने की वजह ये माने या कुछ और?

5) जागरूकता और कैंपेनिंग से, बड़े पांच सितारा होटलों में सेमिनार करने से, पर्यावरण संरक्षण वाले कपड़े पहनकर ग्रुप फोटोग्राफी से, न्यूज में आने से, सोशल मीडिया के दिखावे से, स्मार्ट सिटी नामक इन सब चोचलेबाजी से क्या ऐसा शहर बन पाएगा, जहां प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली मानसिकता का सर्वनाश हो जाए?

6) गांव-गंवई के लोग अनपढ़ गंवार होने के बाद भी नदियों, जंगलों को बचाने के लिए कभी पेड़ों से चिपक जाते हैं तो कभी पानी के अंदर हफ्ते-भर रह लेते हैं, शरीर तक गल जाता है..
शहरी लोगों ने कब ऐसा प्रयास किया, इसका 1% भी अगर कुछ किया हो तो तथ्य सामने लाए जाएं।

7) आखिर ऐसा क्या कारण है कि गांवों में ये तहस-नहस और नुकसान पहुंचाने वाली मानसिकता नहीं हैं?
पर्यावरण के क्षेत्र में पीएचडी होल्डर विद्वान कब ऐसे वास्तविक तथ्यों से टकरायेंगे? या फिर जीवन भर डींगे हांकते रहेंगे।

8) आखिरी बात ये कि एक Statistics इस पर भी बने कि आखिर पर्यावरण प्रदूषण में सबसे ज्यादा योगदान किसका है, गांव के उन 70% लोगों का या 30% शहरी निवासियों का?

Somewhere in a remote village of uttarakhand



 

~ A little story behind road cutting issue in Silthing Village, Uttarakhand ~

जब सिल्थिंग गांव के पास से रोड कटिंग होने वाली थी, तो गांव के कुछ लोग अड़ गये और कहा, नहीं चाहिए गांव के पास से रोड, हम पैसों के एवज में अपने खेतों का बलिदान नहीं दे सकते। हमारे खेत बीच में आ रहे हैं, आप एक किलोमीटर दूर से ही रोड कटिंग कर लीजिए। हमें नहीं चाहिए गांव के पास से रोड, एक किलोमीटर दूर ही सही, चलेगा। वैसे भी इतने सालों से बिना रोड के थे। अब तो वैसे भी रोड नजर के सामने है, घर से दिख तो रहा है, बहुत बड़ी बात है।
और फिर एक किलोमीटर दूर से रोड कटिंग हुई।
सिल्थिंग के गांव वालों के इस फैसले पर आसपास के गांवों के लोगों ने, खासकर पढ़े-लिखे तबके ने खूब मखौल उड़ाया कि बढ़िया घर तक रोड आ रही थी, ठीक-ठाक पैसे मिल रहे थे, ये गधे के गधे ही रहेंगे,इनका कुछ नहीं हो सकता।
मजाक बनाने वाले उन लोगों को शायद इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं है कि एक किसान (सीमित जमीन वाले छोटे किसान) के लिए उसका खेत कितना मायने रखता है। खेत उसके लिए जमीन का टुकड़ा भर नहीं होता, वो तो उसकी जिंदगी का हिस्सा होता है। खेत उसके आय का स्त्रोत तो होता ही है, जीने की वजह भी होता है। सोचिए कैसा हो अगर कोई आपके जीने की वजह छीन ले और कहे कि लो पैसे और दफा हो जाओ।




step farms, silthing village


Cutted road, Silthing Village


step farms, silthing village