Thursday, 29 January 2026

दुख है -

बुद्ध आजीवन दुखों का अनुसंधान करते रहे। दुख को मृत्यु से भी बड़ा बताया और कहा - “दुख है, दुख का कारण है, कारण का निवारण है और निवारण आष्टांगिक मार्ग अपनाकर किया जा सकता है। आष्टांगिक मार्ग के बारे में आप विस्तार से पढ़ सकते हैं। बुद्ध के कहे का मोटा-मोटा सार यही रहा कि शांति से अपना जीवन जिया जाए, और किसी दूसरे को दुख ना दिया जाए, उसके दुख का भागी ना बना जाए।

अभी कल एक भतीजा सड़क दुर्घटना की चपेट में आया, उसके हाथ के ऊपर गाड़ी चल गई, अंततः हाथ पूरा काटना पड़ गया। वैसे तो हर घटना के पीछे कर्म-फल की अवधारणा को नहीं मानता हूँ। लेकिन अधिकतर मामलों में बुद्ध सही ही साबित होते हैं। जैसा कि बुद्ध ने कहा कि दुख है तो दुख का कारण भी होगा। भतीजे साहब का व्यवहार ऐसा कि परिवार के अलावा गाँव के लोग भी दुखी कि इतने व्यवहार कुशल लड़का जो पहली बार शहर कॉलेज की पढ़ाई के लिए गया था उसके साथ ऐसा कैसे हो गया। अब उक्त लड़के के पिताजी और दादाजी पर आते हैं, दोनों उच्च कोटि के धूर्त, लंपट और हिंसक किस्म के व्यक्ति। भतीजे के पिता का स्तर ऐसे समझें कि जवानी के दिनों में उसने अपनी माँ पर हाथ भी उठाया था। बाक़ी दोनों बाप बेटे का चरित्र ऐसा कि अनगिनत लोगों के दुख के भागी बने। आज जैसे ही भतीजे की दुर्घटना की खबर मिली, उसके बाप दादा का सारा कुछ पुराना फ़िल्म की तरह सामने चलने लगा। महीने भर पहले ही उनसे परेशान एक उन्हीं के परिचित ने कहा कि अगले ने जीवन तबाह कर दिया, कुछ उपाय बताओ, मैंने कहा - अपनी तरफ से कोई हिंसा मत करना, अगर ऐसा कुछ सोच भी रहे तो मेरे से बात करने की आवश्यकता नहीं है। आज उसी व्यक्ति ने दुःखी मन से दुर्घटना की सूचना दी है। इस बात की भरपूर गारंटी है कि उस बाप बेटे के चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है, बच्चे का हाथ कट गया तो क्या हुआ, अपना हिंसक चरित्र क्यों छोड़ा जाए। क्यूंकि इससे पहले भी ऐसे मामले देखे जहाँ जवान बच्चों की मृत्यु के बाद भी पिता को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, यहाँ तो बस हाथ कटा है।

इंसान को चाहिए कि ख़राब से ख़राब स्थिति में भी इतनी सी बात का हमेशा ध्यान रखे कि वह किसी सज्जन या कमज़ोर पीड़ित वंचित या किसी भी व्यक्ति के दुख का भागी ना बने। क्यूंकि जब कुदरत न्याय करता है तो फिर आपको किसी को दोष देने लायक़ भी नहीं छोड़ता है।

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