बाइकर बन जाना अकारण नहीं था। बस ट्रेन या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कोई भी माध्यम हो, इनमें बहुत सफ़र किया है, लेकिन अब नहीं हो पाता, अब पब्लिक प्लेटफार्म में जाने से बचता हूँ। इंसानों से जितना कम संपर्क हो, वही ठीक लगता है, पता नहीं एक अजीब सा विरक्ति मोह भंग होने लगा है। इस बीच बस में एक दिन जाना हुआ। हम 6 फुटिये लोगों के लिए इस लोकल पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस में जितना स्पेस है, इंडिगो की फ्लाइट में भी इतना ही स्पेस रहता है। मुझे इस वाले भारत को अब बिल्कुल देखने का मन नहीं करता है। ट्रेन से लेकर इन बसों में बहुत देख लिया है, इतनी कहानियाँ घूमती है की अब बेचैन करता है यह सब देखना।
बस में बड़ी संख्या में कॉलेज जाती लड़कियां दिखी। विडंबना कि लगभग हर लड़की के चेहरे पर स्कार्फ था। स्कार्फ जो एक साथ दो-दो काम कर रहा था, एक पर्यावरणीय प्रदूषण और दूसरा पुरुषों के आंखों के द्वारा होने वाला अनवरत प्रदूषण; इन दोनों से उनको एक स्कार्फ सुरक्षित कर रहा था। सेमेस्टर के परीक्षाओं की चर्चा करते जा रहे थे, जबकि उन्हें यह नहीं पता कि ये एक ऐसी अंधी गली है जहाँ एक गुणवत्ता वाला जीवन पा लेने की प्रायिकता जुए के खेल से भी ख़राब है।
ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने वर्तमान भविष्य दोनों का नहीं पता। साथ ही बड़ी संख्या में कुपोषित कृषकाय से चेहरे लिए मजदूरी करने वाले भी जा रहे थे, हताश निराश परेशान से चेहरे जिन्हें अपना असल मूल्य भी नहीं पता। पता नहीं आख़िरी बार कब उन्मुक्त होकर मुस्कुराए होंगे। लगातार मोम की तरह अपना जीवन जलाकर घिस रहे हैं और थोड़े-थोड़े मृत होते जा रहे हैं। खाने में क्या खा रहे हैं नहीं मालूम। ना शारीरिक सौष्ठव, शरीर में प्रोटीन-विटामिन की भरपूर कमी जो साफ़ दिखती है, साथ ही चेहरे पर अनवरत शोषण की रेखाएं। यह भारत बड़ा बेचैन करता है।
इस बेचैनी में भी गिद्ध सरीखे लोग इनका और खून निचोड़ लेने के लिए इस दलदल में उतरते हैं, इस भारत को और निचोड़ कर खोखला करते हैं। मुझे इससे दूर रहने में ही अपनी भलाई लगती है, क्यूंकि मैं इस भारत को और खोखला करने में अपना योगदान नहीं दे पाता हूँ तो बेहतर है कि जब तक परिस्थितियाँ अनुकूल ना हों इसकी छत्रछाया से ही दूर रहा जाए और अपने स्तर पर प्रयास करते रहा जाए।
साँस लेने वाले दो ही तरह के लोग आज बचे हैं। उसमें एक या तो यह सब पीड़ा देखकर झेलकर खामोश मृतप्राय हो चुका है या फिर जो मजबूत टांगे लेकर ज़िंदा होने का दंभ पाल रहा है वह हरामखोरी की हद तक इंसानियत खो चुका है। व्यवस्था ने ज़िंदा रहने लायक और कोई विकल्प इनके पास छोड़ा भी नहीं है।
एक बड़ी आबादी को हर चीज़ में अच्छा और सकारात्मक देखने की ऐसी बीमारी लग चुकी होती है कि वे एक बड़ी आबादी का दुख आजीवन नहीं देख पाते हैं। वे भूल जाते हैं कि हम सभी एक समाज के रूप में एक इकाई हैं। तालाब में रहने वाले एक जीवधारी के शरीर में भी अगर संक्रमण है, तो उस संक्रमण का विस्तार तालाब में रहने वाले सभी जीवों तक होता है।
इस सीमित जगह में बैठे-बैठे टांगों का दर्द तो मैनेज हो जाता है, लेकिन सीने में दर्द रह जाता है। मुझे अब इस भारत को देखना ही नहीं है, और दुआ करता हूँ कि मेरी तरह किसी और को भी इस भारत को देखना ना पड़े।
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