Wednesday, 17 April 2019

मुनस्मृति सारांश

प्रथम अध्याय में सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय की विभिन्न अवस्थाओं का, मनुस्मृति के आविर्भाव तथा उसकी परम्परा के प्रवर्तन का, इसके पढ़ने के अधिकारी तथा फल के वर्णन के उपरान्त अध्याय के अन्त में ग्रन्थ की विषयसूची का उल्लेख हुआ है।

द्वितीय अध्याय में आर्यों के निवास-प्रदेश आर्यावर्त की उत्तर, दक्षिण, पूर्व तथा पश्चिम सीमाओं का, वहां की जलवायु का, वहां के निवासियों के उच्च चरित्र का, व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास के लिए अपनाये जाने वाले सोलह संस्कारों का, ज्ञान के महत्त्व का तथा विद्याध्ययन काल में ब्रह्मचारी के लिए गुरुकुल में आचरणीय एवं पालनीय नियमों का उल्लेख हुआ है।

तृतीय अध्याय में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के अन्तर्गत आठ प्रकार के विवाहों का, कन्या की पात्रता का, श्राद्ध के लिए निमन्त्रित किये जाने वाले ब्राह्मण की योग्यता का तथा श्राद्ध में परोसे जाने वाले द्रव्यों की उपयुक्तता-अनुपयुक्तता का वर्णन हुआ है।

चतुर्थ अध्याय में गृहस्थ के लिए अपनायी जाने योग्य आदर्श आचार-संहिता का, निषिद्ध कर्मों से बचने का तथा चरित्र की रक्षा के प्रति सदैव सतर्क रहने का वर्णन हुआ है। इस अध्याय में गृहस्थ को जितेन्द्रिय होने के साथ-साथ दान देने में अत्यन्त उदार होने का सुझाव भी दिया गया है।

पञ्चम अध्याय में अभक्ष्य पदार्थों में मांस को प्रमुख मानते हुए उसके सेवन में दोषों का, वेदविहित हिंसा को अहिंसा मानने का, ज्ञान, तप, अग्नि आदि बारह शुद्धिकारक पदार्थों का, अर्थशुद्धि—ईमानदारी से धन कमाने—को ही सबसे बड़ी शुद्धि मानने का, देह के बारह मलों का तथा स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों के आदर्श रूप का वर्णन हुआ है।

षष्ठ अध्याय में वानप्रस्थ के लिए आचरणीय नियमों—मद्य-मांस आदि का सेवन न करना, संग्रह से बचना, कष्टों को प्रसन्नतापूर्वक सहना, प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखना, सबको अभयदान देना, निन्दा-स्तुति से बंचना, आलस्य का परित्याग, सन्ध्या-वन्दनादि के प्रति सतर्क रहना तथा मोक्ष-प्राप्ति के प्रति सचेष्ट रहने का तथा संन्यास आश्रम की महत्ता का वर्णन हुआ है।

सप्तम अध्याय में राजा के लिए आचरणीय धर्मों का, दण्ड की महत्ता का, मन्त्रियों से परामर्श करने की रीति का, दूतों की ईमानदारी की परख का, दुर्ग-रचना-पद्धति का, राज्य की उपयुक्त व्यवस्था की विधि का, कर-निर्धारण की प्रणाली को न्यायसंगत बनाने का, प्रजा की सुख-समृद्धि के प्रति सतर्क एवं सचेष्ट रहने के अतिरिक्त राजनीति—साम, दाम, भेद तथा दण्ड—के प्रयोग की व्यावहारिकता का वर्णन हुआ है।

अष्टम अध्याय में राजा को प्रजा के विवादों को निपटाने के लिए समुचित विधि को अपनाने का, अपराधियों को दण्ड देने का, धर्मविरुद्ध साक्ष्य देने वाले तथा मिथ्याव्यवहार करने वालों को अनुशासित करने का, दण्ड देते समय व्यक्ति के स्तर तथा अपराध की मात्रा पर विचार करने का और सीमा तथा कोश आदि की सुरक्षा के प्रति सावधान रहने का परामर्श दिया है।

नवम अध्याय में स्त्रियों और पुरुषों के एक-दूसरे के प्रति कर्तव्यों एवं अधिकारों का, आपत्‌काल में स्त्रियों को नियोग द्वारा सन्तान उत्पन्न करने के अधिकार का, पिता की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी का, पुत्र के अभाव में उत्तराधिकारी बनने वालों में वरीयता का, बारह प्रकार के पुत्रों में उत्तरोत्तर वरीयता का तथा दूसरों के अधिकार का हरण करने वालों को दण्डित करने का वर्णन हुआ है।

दशम अध्याय में मानव जाति को चार वर्णों में विभक्त करके चारों वर्णों के कर्तव्यों का, भिन्न वर्ण के पुरुष द्वारा भिन्न वर्ण की स्त्री से उत्पन्न सन्तान (वर्णसंकर) की सामाजिक स्थिति का, चारों वर्णों के आपद्धर्मों का तथा आपत्‌काल में चारों वर्णों के लोगों द्वारा नियत धर्म के पालन की प्रशंसा का वर्णन किया गया है।

एकादश अध्याय में जाने-अनजाने विहित कर्मों का त्याग और निषिद्ध कर्मों का अनुष्ठान करने पर प्रायश्चित्तों का, मांस आदि अभक्ष्य-भक्षण, मदिरा आदि सेवन तथा अगम्यागमन प्रभृति पातकों, गोवध, ब्रह्महत्या प्रभृति और महापातकों के करने पर उनके दण्डस्वरूप प्राजापत्य, अतिकृच्छ्र तथा चान्द्रायण प्रभृति विविध प्रायश्चित्तों का, वेदाभ्यास, तप और ज्ञान की महत्ता आदि का वर्णन हुआ है।

द्वादश अध्याय में शरीरोत्पत्ति का, स्वर्गलाभ और नरक-प्राप्ति कराने वाले कर्मों का, अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करने वाले कर्मों का, तप और विद्या के फल का, शास्त्रों में अप्राप्य का, विद्वान्‌ ब्राह्मण द्वारा निर्णय कराने का, ब्रह्मवेत्ता की पहचान का तथा परमपद की प्राप्ति के उपाय तथा सर्वत्र समदृष्टि का वर्णन हुआ है।

Monday, 15 April 2019

~ सम्बलपुर की एक शाम ~

बस में बैठे उस व्यक्ति से मैंने पूछा - क्या रेल्वे स्टेशन तक जाने के लिए अभी आॅटो मिल जाएगी?
उसने कहा - नहीं यहाँ से शेयरिंग में तो नहीं मिलेगा आपको जाना है तो ज्यादा पैसे देकर आॅटो बुक करना पड़ेगा। हां एक बात और, आपको लिफ्ट जरूर मिल जाएगा इतनी गारंटी है।
उसकी लिफ्ट वाली बात को सच मानते हुए मैं तीन किलोमीटर के उस रास्ते में पैदल चलता गया, 6 घंटे के बस के सफर के बाद भूख भी लग रही थी और थकान भी। शहर को देखता गया, रास्तों पर चलता गया, एक पुराना शहर, छोटी-छोटी गलियां, आंगन पर बैठे खुशमिजाज लोग, ठीक कुछ घर, फिर कुछ दुकानें, फिर कोई एक बड़ा सा घर। शायद इस पुराने शहर को किसी ने ज्यादा नहीं छेड़ा है, बड़े लम्बे अरसे से लोगों को वैसा ही रहने ही दिया है, किसी पुराने सांस्कृतिक नगर से गुजरने पर ऐसा ही अहसास होता है, निस्संदेह इस अहसास के भीतर अपनी एक विसंगति छुपी हुई है, दारूणता भी, जो लंबे समय से इस संस्कृति का हिस्सा रही है।
खैर...
ठीक ऐसा पहले अल्मोड़ा की गलियों में महसूस हुआ था, और उससे भी कहीं ज्यादा इलाहाबाद (वर्तमान नाम - प्रयाग) की उन संकरी गलियों में। सचमुच कुछ शहरों की अपनी एक ऐसी पहचान होती है जो विकास रूपी मानकों यानि सड़कों, वाहनों, ईमारतों और चकाचौंध वाली जीवनशैली से उतना समझौता नहीं कर पाती, वह बार-बार अपनी सांस्कृतिक पहचान को हमेशा सामने लाकर खड़ा कर देती है।

शहर को देखते हुए यह ध्यान ही नहीं रहा कि लिफ्ट भी लिया जा सकता था, कितने दुपहिए वाहन तो गुजर रहे थे, मैप पर नजर डालने से पता चला कि एक किलोमीटर से अधिक की चलाई हो चुकी है, मैंने अभी तक लिफ्ट के लिए किसी को पीछे मुड़कर देखा भी नहीं है क्योंकि उतनी भी थकान और भूख नहीं है कि तीन किलोमीटर पैदल न चल सकूं। ये विचार मन में जैसे ही आया उसके ठीक कुछ क्षण पश्चात् एक मोपेड आकर रूकी, पीछे कुछ सामान बंधा हुआ था। मोपेड पर बैठा गर्मी और सर्दी को बराबर झेलता आया एक हंसमुख सा चेहरा, वास्तव में संघर्ष को परिभाषित करता हुआ उसका चौड़ा स्मृति पटल, आँखों में चश्मा, साधारण से कपड़े, तकरीबन चालीस की उमर और मोपेड पर ग्रिल में बंधी एक‌ पोटली; कोई छोटे से किराने की दुकान लगाने वाला व्यापारी सा लगा मुझे वो।
चलो बैठो, कहाँ जाना है - उसने कहा।
रेल्वे स्टेशन जा रहा हूं - मैंने उत्तर दिया।
चलो बैठो। और मैं जैसे-तैसे उसके सामान के बीच जगह बनाकर उसकी मोपेड में बैठ गया।
अच्छा कितने बजे ट्रेन है,
रात के बारह बजे - मैंने कहा।
बहुत टाइम है अभी, ठीक है चलो फिर रास्ते में एक मंदिर पड़ेगा, दो मिनट माथा टेकूंगा, आपको भी घुमा लेता हूं, देख लेना आप भी, सम्बलपुर का बहुत अच्छा मंदिर है, जो भी इधर से गुजरता है, इस वैष्णो देवी मंदिर में जरूर आता है। मंदिर दर्शन करके फिर रेल्वे स्टेशन चले जाएँगे। ठीक है ना?
अरे नहीं, आप तकलीफ मत कीजिए मैं चला जाऊँगा, मुझे आदत है, पैदल चलने की। जब तक मैं ये बात कह रहा था, उसकी मोपेड वैष्णो देवी मंदिर के द्वार पर पहुंच चुकी थी। हमने मंदिर दर्शन किया, कुछ सेकेंड के लिए उसके हावभाव को देखते हुए आश्चर्य भी हुआ, लेकिन उतना नहीं हुआ क्योंकि इससे पहले न जाने कितने अनजान मुझे मिले थे जो अचानक मिल जाते मदद करते और निकल जाते, मुझे लगता है उनके लिए ऐसे मदद कर देना एक सामान्य सी बात होती है। तो मैं भी इसे एक सामान्य सी घटना मान कर पूरे मन से मंदिर दर्शन करने लगा। वैष्णो देवी के इस छोटे से मंदिर को देखकर अनायास ही जम्मू का मां वैष्णो देवी मंदिर याद आ गया, पूरे चौदह किलोमीटर की चढ़ाई थी, फरवरी के महीने में तो गये थे, रात के दस बजे जो चढ़ाई शुरू की थी, सुबह 4 बजे माता के दर्शन किए थे, कितना सुखद था शरीर को कोण बनाते हुए झुकाकर गुफा के बीच से होकर जाना, एक डिग्री ठंड में सुन्न हो चुके नंगे पाँवों से चलते हुए माता रूपी उन छोटे पत्थरों के दर्शन करना, पहाड़ों में तो ऊंचाईयों में ऐसे प्रतीक रूप में ही मंदिर होते हैं। वहां गये हुए पाँच साल से भी अधिक हो गये। खैर मैं अब पहाड़ों के ख्याल से वापस लौटता हूं।
मैंने उस व्यापारी भाई को कहा कि आप वैष्णो देवी गये हैं, जम्मू में जो है।
उसने कहा - मैं तो भाईसाब हर साल जाता हूं, पूरा हमारा ग्रुप जाता है, बहुत से परिवार मिल कर जाते हैं। सबको‌ लेकर मैं जाता हूं, और ये जो मंदिर है यहाँ शाम को‌ एक बार जरूर आता हूं।
अच्छा सुनिए मैं चलता हूं, स्टेशन पास में ही है, मैं चला‌ जाऊँगा - गूगल मैप पर कुछ चार सौ मीटर की दूरी देखने के बाद मैंने उससे कहा।
उसने कहा - अरे नहीं। मेरा तो रोज का रास्ता है, असल में ये जो पोटली का सामान है, ये मुझे रास्ते में छोड़ना था, इसलिए देरी हो गई नहीं तो मैं आपको बहुत पहले ही मिल जाता, आपको इतना एक‌ किलोमीटर भी नहीं चलना पड़ता, आपने जहाँ से पैदल चलना शुरू किया था, मैं वहीं आपको मिल जाता।
अच्छा, आपका उधर स्टेशन में कुछ काम है क्या, अगर नहीं तो रहने दीजिए,‌ क्यों तकलीफ करते हैं, मैं चला जाऊँगा।
उसने कहा - नहीं आप बैठिए मैं छोड़ देता हूं।
सम्बलपुर रेल्वे स्टेशन सामने था‌।
अच्छा ठीक है इधर ये एक बढ़िया रेस्टोरेंट है, अच्छा खाना मिलता है, उधर स्टेशन के अंदर भी फूड कोर्ट है, वहाँ भी अच्छा खाना मिलता है, खा लीजिएगा‌ - ऐसा कहते हुए वह वापस चला गया।
उस वक्त मेरे मुंह से सिवाय एक शुक्रिया के अलावा और कुछ भी नहीं निकल पाया।

इस शहर में यह मैं पहली बार आया हूं, देखने के नाम पर सिर्फ एक मंदिर और दूर गाँव के किनारे बना एक सुंदर सा रेल्वे स्टेशन ही देख पाया हूं, शायद यह भारत का एकलौता ऐसा रेल्वे स्टेशन होगा जहाँ स्टेशन के अंदर भी छोटे-छोटे गार्डन बने हुए हैं।
हां स्टेशन तक आते आते थोड़ा ही सही इस शहर का मिजाज भी देख लिया, कि कैसे अपनी सांस्कृतिक विरासत के बल‌ पर एक शहर अपने ही राज्य की राजधानी तक को अलग होने की चुनौती देने से भी नहीं घबराता।

सम्बलपुर की इस मजबूत सांस्कृतिक विरासत को स्मृतियों में कैद करने के पश्चात् अपनी यात्रा के पुराने अनुभवों को मैं याद करते हुए यह सोच रहा था कि आखिरी बार कब मुझे ऐसे जिंदादिल लोग मिले थे। फिर मैंने स्टेशन की साफ सफाई और खूबसूरती को देखते हुए खुद से कहा - चलो अब कुछ खा लिया जाए, उसने चाहा तो ऐसे लोग मिलते रहेंगे।

वैष्णो देवी मंदिर, संबलपुर

संबलपुर रेल्वे जंक्शन

संबलपुर रेल्वे स्टेशन


फूड प्लाजा

प्लेटफाॅर्म, संबलपुर जंक्शन

Wednesday, 10 April 2019

- हमें देखना होगा, समझना होगा अपनी क्रूरताओं को -

हमें देखना होगा, समझना होगा कि हम अपने आसपास के लोगों से कैसा बर्ताव करते हैं।
हमें देखना होगा, समझना होगा एक सफाईकर्मी और उसके काम को भी, और यह भी कि हम उससे किस अंदाज में बात कर रहे होते हैं, अगर हम उसे हेय समझते हैं तो इसकी वजह उसका ठीक से सफाई नहीं कर पाना होता है या फिर इसलिए कि Hierarchy में वो हमसे नीचे है, इसलिए तुच्छ है‌। हमें यह फर्क करके देखना होगा।

हमें देखना होगा, समझना होगा, एक आॅटोचालक/रिक्शाचालक को भी जो हमें अपनी सुविधाएँ देता है, और जब वो हमारी जरूरत बनता है तो हम उसे बुलाते हैं तब हमारे द्वारा उसे "ऐ आॅटो/रिक्शा" कहना, इस टोन में शोषण का भाव रहता है या नहीं।

हमें देखना होगा, समझना होगा बाजार में सब्जी बेचने वाले कोंचिए को भी कि उसे हम क्या समझते हैं, किस तरीके से बात करते हैं और वही सामान अगर किसी बड़े माॅल में खरीदने जाते हैं तो हममें किस प्रकार के भाव उमड़ते हैं, इसकी पड़ताल करनी होगी।

हमें देखना होगा, समझना होगा रोडसाइड में काम कर रहे मैकेनिक लोगों को भी जो हमारी शोषण वाली मानसिकता से दो चार होते हैं, और उनके साथ ही कार के एक बड़े शोरूम में ड्रेस पहने हुए कर्मचारियों को भी जिनके सामने हम थोड़ी सी कम गुंडई दिखा पाते हैं। हमें यह फर्क समझना होगा।

हमें देखना होगा, समझना होगा एक भोजनालय या रेस्तराँ में काम करने वाले श्रमिकों को भी जो हमें खाना देकर हमारी भूख मिटाते हैं। जब इन्हें हम पानी मांगने या टेबल की सफाई करने के वास्ते बुलाते हैं तो हमें इसमें यह देखना होगा कि एक सामान्य से भोजनालय और एक बड़े एसी रेस्तराँ में, वहाँ कार्यरत लोगों के प्रति हमारे बर्ताव में कोई अंतर दिखाई पड़ता है या नहीं।

हमें देखना होगा, समझना होगा, एक बस कंडक्टर को भी जो अपनी पूरी दंबगाई के साथ सवारी लादता है, लेकिन तब यहाँ हम‌ खामोश रहते हैं, वह क्षण प्रतिक्षण हमारी मानसिकता को ललकार रहा होता है, लेकिन यहाँ हम कुछ नहीं कह पाते हैं, क्योंकि वह हमसे शोषित होने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं दिखाई पड़ता। इसलिए प्रायः हम ऐसे लोगों पर शाब्दिक हमला करने से परहेज करते हैं।

हमें देखना होगा, समझना होगा, हमारे आसपास मौजूद श्रम के उन सभी आयामों को, जिनका हम आए दिन तिरस्कार कर बहुत बेहतर महसूस कर रहे होते हैं।

हमें देखना होगा, समझना होगा यह भी कि शोषण सिर्फ कोई घोषित नेता या चयनित अधिकारी कर्मचारी ही नहीं करता है। हजारों वर्षों से चली आ रही शोषण की परंपरा जो हमें विरासत में मिलती है, इसका निर्वहन हम सब अपनी अपनी ताकत और जरूरत के हिसाब से बराबर करते हैं, पूरी क्रूरता के साथ करते हैं और ऐसा करने के लिए यह कहीं से भी जरूरी नहीं होता कि हम कोई बड़े नेता, व्यापारी या अधिकारी हों। हम खुद को राजा जैसा महसूस कराने के लिए अपने नीचे कुचलने के लिए चंद लोग खोज ही लेते हैं, और यह भूख हमारे भीतर एक शोषक को, सामंत को हमेशा जिंदा रखती है।

Sunday, 7 April 2019

On Upsc results 2019

#UPSC
अगर दुर्भाग्यवश मेरी संतान ऐसी किसी प्रतियोगिता का हिस्सा बन शीर्ष स्थान को प्राप्त कर भी लेता/लेती तो मैं एक माँ होने के नाते उसे कुछ दिवसीय अज्ञातवास पर जाने को कहती। भले वह सबके आंखों की किरकिरी बन खुद एक सामंत बन जाने के कगार पर क्यों न खड़ा हो लेकिन मेरी दृष्टि में वह मध्यमवर्ग में हो रही लोलुपताओं की ऐसी हाइब्रिड पैदावार बन चुका है, जिसने सामंती दंभ के उच्चतम‌ स्तर को प्राप्त किया है, और इसलिए मुझे ऐसी उपलब्धियों की उपादेयता शून्य प्रतीत होती है।

Sunday, 31 March 2019

- जिस्म का पहाड़ -

                      पहाड़ों में जब अंधेरा ढलने लगता है तो इंसानी बस्तियां धीरे धीरे अपने घरों की ओर सिमटने लगती हैं, फिर खाली होने लगते हैं बुग्याल और घने जंगल और जब घुप्प अंधेरा छा जाता है, चारों ओर सन्नाटा पसर जाता है, तब जाकर मध्यरात्रि को अपनी उपस्थिति दिखाने के‌ लिए ऊंची आवाज लगाते हैं सियार। लेकिन क्या सिर्फ वे जंगली सियार ही होते हैं जो बुग्यालों में और जंगलों में हुंकार मारते फिरते हैं। असल‌ में उनके साथ ही कुछ जंगली निशाचर भी अपने घरों से बाहर निकलते हैं, लेकिन वे बुग्यालों की ओर नहीं आते, बिल्कुल नहीं आते। इन‌ निशाचरों में से आधे लोग रम व्हिस्की पीकर सड़कों पर टहलते हुए पहाड़ी और पंजाबी गीतों पर झूमते, शेरों शायरी करते मध्यरात्रि के पहले ही आहिस्ते अपने घरों को चले जाते हैं। बाकी बचे आधे लोग जो अपने घरों को जाते हैं, अन्य सामान्य लोगों की तरह अगली सुबह वे भी अपने ही घर के दरवाजे से बाहर को आते हैं लेकिन घर के अंदर प्रस्थान करने और सुबह घर से निकलने के बीच का यह समय क्या एक ही घर की चारदीवारी के भीतर खत्म हो जाता है या कोई विस्थापन होता भी है, क्या इस समयावस्था में मनुष्य मात्र की व्याकुलताएँ अपनी सीमा लांघती हैं या एक निश्चित दायरे में सिमटकर रह जाती हैं, यह प्रभु ही बेहतर जानता है। सारी असामान्य घटनाएँ जिसकी हमें जानकारी नहीं होनी चाहिए वह उस समयकाल में शनै: शनै: प्रभु की निगरानी में घटित हो रही होती है।

                        फिर अगली सुबह जब सब कुछ सामान्य हो जाता है, जीवन वही अपने पुराने खुशनुमा रंग में लौटने लगता है, दूर स्थित श्वेत हिमालय की चोटियों से सूरज की किरणें बिखेर देता है, ताकि अंधेरे का दंभ चूर-चूर हो जाए और सियार रूपी मानुषों को वापस एक सभ्य मनुष्य का दायित्व निभाना पड़े। और होता भी यही है, जो अदायगी के रस्म और अभिवादन के तौर तरीके रात्रिकाल में निभाए जाते थे, सुबह होते ही उनका लोप हो जाता है। फिर दिखते लगते हैं वही हँसते खिलते चेहरे, दूर गाँव से पीठ पर लादकर दूध लाती महिलाएँ और उनके साथ मीलों की दूरी तय कर पास के कस्बे में स्कूल की पढ़ाई करने आते बच्चे, हरे भरे घास के मैदानों की ओर अपने पशुधन को ले जाते गड़रिए, कुछ इस तरह देवभूमि की संस्कृति प्रातःकाल मंदिरों में पूजा पाठ करते, माथे में टीका लगाते, अपने से बड़ों को दोनों हाथों से प्रणाम करते संध्याकाल तक जीवंत अवस्था में बनी रहती है और फिर से सियार अंधेरा ढलने का इंतजार करते हैं।


Sunday, 24 March 2019

जात पात हमारे गूणसूत्र में समाया हुआ है -

उसने कभी जात-पात को नहीं माना, उच्च वर्ग कहे जाने वाले परिवार से होते हुए भी कहीं भी बैठकर अपने दोस्तों के साथ एक थाली में खाना खा लेता, जूठा आइसक्रीम तक खा लेता और जातिगत ढकोसलों को रत्ती भर तवज्जो न देता। एक दिन एक सफाईकर्मी का झाडू़ उसके शरीर को स्पर्श कर जाता है, वह उस सफाईकर्मी को झाड़ू के एक सिक को चाटकर थूक के फेंकने को कहता है ताकि अशुभ ना हो। यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने कुछ सेकेंड में हो जाता है।
मैं उससे पूछता हूं कि तुम तो कहते थे कि ऐसी दकियानूसी परंपराएं नहीं मानते, ये क्या था।
उसने कहा - मम्मी मानती है, मम्मी कहती है, इसलिए फाॅलो करना पड़ता है। ये सब के‌ लिए मम्मी बहुत गुस्सा करती है।
मैंने कहा - जब तुम‌ अपनी माताजी की बात का इतना ही सम्मान कर ही रहे हो तो तुम्हें फिर आज उस अछूत कहे जाने वाले अपने उस दोस्त का जूठा आइसक्रीम नहीं खाना चाहिए था।

उसने कहा - अरे नहीं वो बात अलग है, ये अलग है,‌ मेरी मम्मी भी जब झाड़ू लगाती है और मेरे शरीर में लग जाता है तो वह भी ऐसा करती है।

मैंने कहा - अगर सचमुच तुम्हारी माताजी ऐसा करती है तो उन्हें ऐसा करना बंद कर देना चाहिए। एक पल के लिए तुम ही सोचो कि उस झाड़ू को मुंह से लगाना कितना उचित है, जिस झाड़ू से सब तरफ की धूल मिट्टी साफ होती है, पता नहीं क्या क्या जो चिपका होता होगा इसमें, उस झाड़ू के एक टुकड़े को मुंह से लगाते हुए थूककर फेंकना, क्या यह तुमको कहीं से भी अपमान का विषय नहीं लगता है‌। एक झाड़ू के स्पर्श से हमारे शुभ अशुभ का निर्धारण भला कैसे हो सकता है।
देखो मैं तुम्हें गलत नहीं कह रहा हूं, मुझे बस हैरानी इस बात की है कि जब तुम खुद कहते हो तुम जात पात छुआछूत नहीं मानते हो, मिल जुलकर एक थाली में किसी के साथ भी खाना खा लेते हो, इतनी सधी हुई सोच रखते हो फिर भी ये झाडू चटवाने जैसा अमानवीय व्यवहार कैसे तुम्हें परेशान नहीं करता मैं समझ नहीं पा रहा हूं।
लड़का शांत हो गया।
फिर मैंने सोचा कि इससे ज्यादा कहना उचित नहीं है। शायद वह भी अपने जगह सही है, जिस परिवेश में वह बचपन से रहा है (खैर मेरी भी परवरिश ऐसी ही रही है) जो उसने देखा है, वही सीखता आया है, और शायद एक न एक दिन ये झाड़ू वाली बात भी वह समझ ही जाएगा। वह एक अच्छा डांसर है, बचपन से ही सुविधाओं में रहा है, एक मस्तमौला इंसान की तरह रहा है इसलिए गहराई में जाकर इन चीजों से उतना रूबरू नहीं हो पाया होगा। हमें सबकी सोच का सम्मान करना चाहिए, हम जैसा सोचते हैं जरूरी नहीं कि हर किसी की सोच हूबहू वैसी ही हो।

Book Review - Eleven Month By Prakash Jajalya

Book Review - Eleven Month

सैमसंग के फोन से इस किताब की समीक्षा टाइप करते यह जानकर आश्चर्य हुआ कि लेखक ने सैमसंग फोन से ही टाइप करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य सिविल सेवा परीक्षा के अभ्यर्थियों की आपबीती को एक किताब का रूप दिया है। ये वाकई बड़े धैर्य का काम है, इसके लिए लेखक और लेखन दोनों को‌ साधुवाद।

कल जब यह किताब पढ़ने को मिली तो कुछ हद तक निराशा हाथ लगी, तारतम्य बन नहीं पाया और इस वजह से 2-3 पेज से और आगे पढ़ना मुश्किल हो गया, इसके लिए मैं लेखक से क्षमा चाहता हूं। पता नहीं लेखक किताब की इन मात्रात्मक गलतियों को देख पा रहे हैं या नहीं, क्योंकि लगभग हर दूसरे तीसरे वाक्य में मात्रात्मक त्रुटियां हैं, चलिए एक बार मात्रात्मक त्रुटियों को नजर अंदाज कर भी दिया जाए तो पाठक आगे वाक्य विन्यास में हो रही गलतियों में फंस जाता है। अब इसमें छपाई से संबंधित कोई तकनीकी समस्या है या उन्होंने किताब की प्रूफ रीडिंग नहीं कराई है, ये तो वही बेहतर बता पाएंगे।
वैसे भी एक नयी रचना तैयार करना, मानसिक रूप से खुद को रोज उसके लिए तपाना, कथानक तैयार करना, हास्य व्यंग्य का पुट डालना, पात्र बुनना ये सब काम बहुत समय और धैर्य की मांग करती है, वाकई ये बड़ी मेहनत का काम है, ऐसे में एक किताब का मूल श्रृंगार यानि कि भाषा और व्याकरण ही अशक्त प्रतीत हो तो कष्ट होता है।

एक चीज यह भी समझ से परे है कि पाठक वर्ग कैसे इन चीजों को नजरअंदाज कर रहा है, या तो उन्हें स्पष्टत: दिखाई नहीं दे रहा होगा या ऐसा भी हो सकता है कि सिविल सेवा अभ्यर्थी न होने की वजह से इस किताब के असली पाठक वर्ग की मुझे समझ नहीं होगी।

किताब के संदर्भ में एक महती जरूरत यह भी है कि जैसे एक किताब छपती है, भले ही उसके अंदर का कच्चा माल कैसा भी हो लेकिन फेसबुक लेखन और ब्लाॅग लेखन से इतर किताब की अपनी एक नैतिक मांग होती है कि उसमें भाषा और व्याकरण संबंधी त्रुटियां ना के बराबर हों। क्योंकि किताब ऐसी चीज है कि कल को जैसे आप या हम रहें न रहें, हमारे अंश रूप में तो ये किताब रहेगी ही।

चलते चलते : आशा है कि लेखक इन‌ बातों को सकारात्मक रूप में लेंगे और जल्द ही इस किताब के द्वितीय संस्करण की छपाई में व्यस्त हो जाएंगे लेकिन द्वितीय संस्करण की छपाई से पूर्व उनसे मेरा यह आग्रह है कि उन्हें इस किताब को एक‌ दो बार बढ़िया तरीके से प्रूफ रीडिंग की प्रक्रिया से गुजारना चाहिए।





गलतियों की भरमार है।

बुढ़ापा

अधेड़ सी उमर और अमरबेल की तरह झुकी हुई पीठ। एक हाथ से लोहे की ग्रिल का सहारा लेते हुए उन्होंने पहली सीढ़ी चढ़ी ही थी कि सहारे की कमी महसूस करते तुरंत पास से गुजर रहे एक अनजान व्यक्ति के हाथ को अपना दूसरा सहारा बना लिया, उनका बेटा शायद इन दो-तीन दर्जन सीढ़ियों को लांघकर पहले ही ऊपर जा चुका है।
"बहुत बहुत धन्यवाद बेटा तुम्हारा, उम्र के कारण अब सीढ़ी चढ़ने की ताकत नहीं रही" - बूढ़े ने उस अनजान से कहा।
स्टेशन के शोर शराबे में उस बूढ़े की यह धीमी आवाज वह बड़े ध्यान से सुनता हुआ, एक हाथ में अपना लगैज संभालता हुआ और उन्हें दूसरे हाथ से सहारा देता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ यही सोच रहा था कि आखिर इनका बेटा इन्हें ऐसे कैसे अकेले कैसे छोड़ सकता है।
उनका बेटा अब दिखाई देता है, लगभग 12-15 सीढ़ियों के पहले ही वह ऊपर खड़ा दिखाई देता है, अपने पिता को देखने के बावजूद एक खामोश सा चेहरा लिए मूर्तिमान खड़ा है। पहली सीढ़ी, दूसरी सीढ़ी, तीसरी सीढ़ी, हर बढ़ती सीढ़ी लांघते हुए बेटे को उम्मीद की निगाह से देखते वह यही सोच रहा है, कि अब तो आ जाए अपने बाप के एक हाथ का सहारा बनने लेकिन पता नहीं क्यों उनका बेटा देखते हुए भी नहीं आता, खाली हाथ खड़े रहता है। अरे! ये वही तो था जो अभी कुछ समय पहले ही बड़े आहिस्ते से अपने पिताजी को‌ ट्रेन की बोगी से नीचे प्लेटफाॅर्म पर उतार रहा था। अंतिम दो सीढ़ियों पर जैसे वे पहुंचते हैं, दुतकारते हुए उस अनजान का हाथ छुड़ाते वह आज्ञाकारी पुत्र अपने पिता को ऐसे लपककर संभालता है, मानो पिताजी को एवरेस्ट बेस कैम्प से लेकर आया हो।