Wednesday, 4 January 2017

~ The theory of Happening ~

कल रात मेरे एक दोस्त ने फोन किया, रूआंसे अंदाज में कहने लगा कि उसकी जिंदगी में एक लड़की थी, लेकिन अब वो उसके साथ नहीं है। सीधे सरल लहजे में कहें तो इतने बड़े संसार में जहां ढेर सारे रंग हैं वहां एक स्थान विशेष में रिश्तों का ब्रेक अप हुआ है और मन टूटने लगा है और इसी टूटन की वजह से वो तमाम नासमझी की हरकतें करने लगा है। दोस्त ने मुझसे कहा कि ये प्यार वगैरह क्यों होता है यार, बड़ी परेशानी हो रखी है। तुम ही कुछ बता सकते हो, मुझे भरोसा है। और मैंने अपने दोस्त से एक दिन का समय मांगा।
               कभी-कभी लगता है कि अगर हम एक प्रेमी की बातों को तर्क से कूटने लगे तो हर दिन हंसने लायक सामग्री मिल जाएगी लेकिन होना ये चाहिए कि इन्हें गले से लगाकर कांधे में सुला लिया जाए और फिर कहा जाए कि आप दिन रात खुद को व्यस्त रखें और अगर फिर भी ये बात उसकी समझ से दूर जाती हुई दिखाई देती है तो उस व्यक्ति को कुछ समय के लिए उसकी स्थिति में छोड़ देना ही बेहतर है।
               अब मेरे दोस्त ने मुझसे ये सीधा सा सवाल पूछा कि प्यार क्यों होता है/दर्द क्यों होता है? सुनते ही मुझे लगा कि ये कैसा सवाल हुआ, अब मैं इसका क्या जवाब दूं। अब ऐसा है कि उसने महीने, साल भर या एक समय तक रिश्ता निभाया, शुरूआत दिनों में वो उस लड़की के साथ बहुत ज्यादा खुश भी होगा लेकिन आगे क्या होगा इसके बारे में उन दोनों में से किसी ने सोचा ही नहीं। उस लड़की और लड़के दोनों को इस बात का थोड़ा बहुत अहसास तो है कि कल जाकर तूफान उठेगा और तकलीफ दे जाएगा लेकिन वो अपने आज के एवज में सब कुछ नजर अंदाज कर जाते हैं। आखिर में फिर रोने लगते हैं और उनका ये नवोदित प्रेम उनको कभी-कभी हंसी का पात्र बना देता है। शायद उन्होंने कभी प्रेम को समझने की कोशिश ही नहीं की, ये तो बात करने, मिलने-जुलने,सुख-दुख बांटने में ही सिमटकर रह गये।
                 अब ये जो प्रेम रूपी समस्या है वो है कमाल की चीज, आप इसमें सामने वाले को ऐसे-ऐसे सपने दिखा देते हैं जो शायद आप कभी पूरा ही न कर पाएं। फिर भी आप दिखाते हैं क्योंकि ये आज के प्रेम का गुण है कि हमें खुद को ही धोखा देना है, झूठ बोलना है और वो सब कुछ करना है जो निकट भविष्य में लौटकर हमारे ही पास आएगा और तंग करेगा। बिस्तर में लेटे-लेटे भरी दुपहरी में सपने देखते, कविताएँ रचते लोगों के आसपास ऐसी कौन सी ताकत, कौन सा भगवान मंडराते रहता है ये मुझे भी नहीं पता।
                 ऐ मेरे दोस्त मैं तुम्हें ये कभी नहीं कहूंगा कि "होनी को कौन टाल सकता है" हां ये बहुत पुराना हो चुका है।
मैं इसके आगे की बात कह रहा हूं,
होनी को अनहोनी मत होने दो, होनी के हो जाने के इस दरम्यान तुम्हें हजारों संकेत मिलेंगे कि प्यारे रूक जाओ संभल के पांव रखो यहां, अब बार-बार गलती किए तो सीधे नीचे गड्ढे में गिर जाओगे। तुम कमर में रस्सी बांधना ही भूल गए, और आज तुम उल्टे मुंह गिरे। याद करो तुम मिल रहे होगे, बात कर रहे होगे, कहीं साथ में जा रहे होगे, तुम्हें आसपास की बहुत सी चीजों ने तंग किया होगा, हां ये सामान्य नहीं है। उन प्रतीकों ने कहा होगा कि रुको, रूक जाओ, मत बढ़ो आगे।
कहने का अर्थ ये कि होनी को देखा तो जा ही सकता है।
इंसान प्रेम में क्या पड़ता है वो देखना ही भूल जाता है, वो तो आंखे मूंद लेता है, हां वो आंखें बंद नहीं करता वो आंखें मूंद लेता है दोनों में फर्क है, भावनाओं का फर्क, क्रिया का फर्क और तभी ये दो अलग शब्द हैं। अगर उसने सच्चे मन से आंखें बंद की होती तो उसे वास्तविकता का ज्ञान हो जाता, लेकिन वो तो आंखें मूंदकर सपनों की एक अजीबोगरीब दुनिया में चला जाता है।
                मेरे दादाजी हमेशा एक बात कहा करते कि न तो कभी ज्यादा खुश होना न ही दुःखी। स्कूल टाइम में मुझे ये बात नहीं समझ आती थी। इस एक लाइन की बात को समझने में, अपनाने में मुझे लगभग दशक भर का समय लग गया। और जब खुद अपनाने लगा तो पता चला कि इस एक लाइन में जो एक सरल सी भावना बसी हुई है, दादाजी को उसमें महारत हासिल थी। उन्होंने पूरी तरह से इस एक वाक्य को अपने जीवन में उतार लिया था। अब मैं जब प्यार में संताप झेल रहे लोगों को देखता हूं तो सोचता हूं कि लोग आखिर इतनी बड़ी-बड़ी बातें कैसे कर सकते हैं या वे कैसे लिख देते हैं। इतनी सी उम्र में क्या सच में उन्होंने उस बात को जिया है सहा है या फिर वे गहराई में उतरे बिना ऐसे ही कह जाते हैं, बह जाते हैं क्यों, क्योंकि दुनिया भी ऐसी ही बहती है, इसी प्रारूप में प्रेम और रिश्तों का एक पुलिंदा तैयार कर देती है।

                  फिल्म Three Colors : Red में जो दिखाया गया है वो मैं यहां लिख रहा हूं। फिल्म में एक लड़का है जो अभी अभी वकील बना है, उसकी एक प्रेयसी है वो भी वकील है। दोनों अभी प्यार में पड़े हैं, वे रोज बात करते हैं। वो लड़की आए दिन लड़के से मिलती है कभी कोर्ट में तो कभी लड़के के घर पर। लड़के के घर के पास एक रिटायर्ड जज रहते हैं, जिनके पास एक रडार युक्त फोन टैपिंग मशीन है। उस मशीन की सहायता से वे रोज आसपास के लोगों की बातें सुनते हैं, जजसाहब अकेले रहते हैं और दिनभर यही करते हैं।                    एक दिन जज अपने कुत्ते को रोड पर छोड़ देते हैं, एक लड़की जो मॉडलिंग करती है वो अचानक अपनी कार से उस कुत्ते को ठोकर मारती है। और उसका इलाज कर वापस बूढ़े जज के घर पर देने आती है। आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा संयोग है, असल में बूढ़े ने कुत्ते के गले पर लगी पट्टी में इतनी जानकारी रखी होती है कि वो कुत्ता किसी सज्जन के हाथों वापस उन तक पहुंच ही जाएगा।
मॉडलिंग करने वाली लड़की दयालु सी है, वो जब कुत्ते को लौटाने पहुंचती है तो जज मना कर देते हैं,
और कहते हैं- मुझे ये नहीं चाहिए।
लड़की कहती है- तो क्या चाहिए।
जज- कुछ भी नहीं।
लड़की- सांस मत लीजिए फिर।
जज- अच्छा आइडिया है।
ऐसा कहकर जज साहब घर के अंदर चले जाते हैं। लड़की जज की बातें सुनकर चौंक जाती है। वो कहती है, क्या आपने सच में सांस लेना बंद किया, ऐसा पूछते हुए वो जज के घर में प्रवेश करती है, फिर जज उसे अपने घर पर बिठाते हैं और बताते हैं कि वो रिटायर्ड हैं और ये फोन टैपिंग करते हैं। लड़की कहती है कि ये तो गैरकानूनी है। जज कहते हैं- हां वो तो है। फिर वो उस लड़की को रिकार्डिंग सुनाते हैं, सनद रहे ये उस वकालत कर रहे लड़के और लड़की की रिकार्डिंग है जिनके बारे में ऊपर बताया गया है।

             जज टेप सुनाने के बाद कहते हैं - वो देखो सामने ये वही लड़का है जो अभी बात कर रहा था, लेकिन अब ये और ज्यादा दिन बात उस लड़की से बात नहीं कर पाएगा, तुम जाकर कह दो कि उस लड़की को वो हमेशा के लिए छोड़ दे।
वो लड़की कहती है - पर अभी तो मैंने इन्हें सुना, ये दोनों कितने प्यार से बात कर रहे थे, शाम को कहीं घूमने जाने की तैयारी भी कर रहे हैं।
जज- ये लड़का अभी जिस लड़की से बात कर रहा है वो लड़की उसके लायक नहीं है वो एक न एक दिन इस लड़के को धोखा देगी, किसी और के साथ चली जाएगी और फिर इस लड़के को बहुत तकलीफ होगी।
लड़की- आप किसी के लिए इतना बुरा क्यों कहते हैं? क्यों आप ये सब कर रहे हैं?
फिर जज कहते हैं - मैं महीने भर से इनकी बातें सुन रहा हूं।
तुम आज उस लड़के को इत्तला करो या न करो, मैं उनकी फोन टैपिंग करूं या ना करूं ,ये तय है कि आज नहीं तो कल उनकी जिंदगी नर्क बन ही जाएगी। अब तुम ही बताओ हम इसमें क्या कर सकते हैं, कुछ भी नहीं।हम कुछ नहीं कर सकते।

                  आखिरकार वही होता है लड़का लड़की को एक दिन फोन पर फोन लगाता है, लड़की फोन नहीं उठाती। लड़का तुरंत उस लड़की के घर चला जाता है, चुपके से खिड़की के सहारे चढ़ के लड़की के कमरे तक पहुंचता है, वहां लड़की किसी और लड़के के साथ समय बिता रही होती है। लड़का यह देखकर कांप उठता है, वो रोते हुए वहां से चुपचाप वापस चला आता है।

इस फिल्म की कहानी को एक उदाहरण के तौर पर ही देखिएगा कि आखिर वो कौन सी चीज थी कि लड़की के फोन न उठाने पर उस लड़के को ऐसा संदेह हुआ कि वो उसके घर तक चला गया। जब उसे ये महसूस हो रहा है कि उसका लड़की के प्रति विश्वास इतना मजबूत नहीं है फिर वो उस लड़की से दूर क्यों नहीं हुआ। उसे ये लग रहा है कि आगे खाई है फिर भी वो उस रास्ते चल निकला। न जाने कितनों ने उसे कितने अलग-अलग तरीके से रोकने की कोशिश की होगी पर वो नहीं रूका, वो नहीं समझ पाया। बस चलता गया, बहता गया।

शायद यही आज के जमाने का प्रेम रोग है और शायद यही मेरे उस दोस्त की समस्या भी है।

~ A Mystic Girl-3 ~

आज वो छत पर नहीं थी। शायद मैंने ही देरी कर दी। अब इसे संयोग कहें या कुछ और, जब मैं रोड पर टहलते हुए कुछ काम से जा रहा था तो वो मुझे आज फिर दिख गई। लेकिन आज वो मुझे देख न पाई।मेरे ठीक सामने वो साइकल पर थी। जब वो साइकल चला रही थी मेरा ध्यान सीधे उसके पांव पर गया, उसके पांव खाली थे। पैरों में उसने कुछ भी नहीं पहना था। जैसे ही मैंने उसे देखा, उसके थोड़ी ही देर बाद उसके साइकल की चेन उतर गई। एक पल को लगा कि कोई चीज मेरे नजर के सामने स्थायी क्यों नहीं है। इस चैन को भी क्या अभी उतरना था, इतना अच्छा मैं पैडल पर उसके छोटे-छोटे पैरों को गोल घूमते देख रहा था, साथ ही सेकेंड सेकेंड के अंतराल में मिट्टी की एक परत लिए उसकी वो सुंदर ऐंड़ियां देख रहा था। लेकिन ये किसकी नजर लग गई। शायद मैंने ही नजर लगा दी होगी।
                        मुझे लगा कि लो बच्ची अब तो तुम्हारे साइकल का चैन उतर गया अब तो तुम उदास होगी, निराश हो जाओगी, अब मैं छुपकर देखना चाहता हूं तुम्हारे चेहरे के ये भाव। लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा,  वो तो जस का तस मुस्कुरा रही थी। कुछ ऐसे जैसे कुछ हुआ ही न हो , जैसे उसे इस बात से फर्क ही न पड़ा हो। झूमते हुए साइकल दोनों हाथों में पकड़कर वो अपने घर के सामने आई और उसने साइकल वहीं रख दिया, और फिर दौड़कर छत की ओर चली गई।
                     आज छत पर तीन बच्चे पहले से हैं जो वहां कुछ-कुछ खेल रहे हैं। हां पत्थर के टुकड़ों का कोई खेल है, जहां तक मुझे लगता है, इस खेल का शायद ही कोई भाषायी नाम है, हां पर बोलियों में अनेकों नाम हो जाते हैं। इसमें पैर से पत्थर या खपरैल के एक छोटे टुकड़े को मारते हुए एक खाने से दूसरे खाने में ले जाते हैं। अब वो लड़की छत पहुंच चुकी है, मुझे लगा कि वो भी उनके साथ खेलने लग जाएगी। लेकिन वो मेरी सोच पर पानी फेर देती है। वो वहीं पर पड़े चाक के टुकड़े को उठाती है, और छत पर अपने लिए अलग से एक सुंदर सा चौखाना बनाने लगती है। और जब वो आयताकार चौखाना बन जाता है तब वो पत्थर से अकेले खेलने लगती है। वहां उसके ठीक पास में जो तीन बच्चे खेल रहे होते हैं। उनमें से एक बच्ची जो छ: या सात साल की होगी, वो इस नये चौखाने और इस पर अपनी इस दीदी के खेल से ऐसा प्रभावित होती है कि वो बच्ची अपना पुराना चौखाना छोड़कर इस नये चौखाने के पास आकर कहती है कि दीदी, दीदी मैं आपके साथ खेलूंगी। लड़की उसे हां कर देती है। और फिर दोनों खेलने लग जाते हैं।
                 उस रहस्यमयी लड़की का हर दिन ये नया रंग देखकर मैं ये भूल जाता हूं कि मैंने इससे पहले इसका कौन सा रूप देखा था। आज फिर उसे देखकर ऐसा लगा जैसे मैं पहली बार किसी नयी सी लड़की को देख रहा हूं। हर दिन एक नयापन, एक नया रहस्य।
               आज जिस तरह से उसने दूसरे बच्चों से अनुरोध किए बिना ही खुद अपने लिए एक नया चौखाना बनाया, और जब एक बच्चा अपना खेल छोड़ खुद ही उसके पास आ गया इससे ये साफ मालूम होता है कि उसकी अपनी गति है, अपने रास्ते वो खुद बनाती है वो भी बिना किसी अड़चन के। लेकिन ये गति उसे कहां से मिलती है, शायद वहीं से मिलती होगी जहां से उसने पेड़ों को महसूस करना सीखा है, आसमान को देखना सीखा है, उस दिन उस गाय से बात करना सीखा और तो और आज साइकल चैन के खुल जाने के बाद कुछ समय के लिए उसे नजर अंदाज करना सीखा।
            वो जब कुछ करने लगती है तो वो अपने आप में नया हो जाता है, आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। आखिर दस साल की इस छोटी सी उम्र में वो इतना सब कुछ कैसे कर लेती है। वो ये सब कर पाती है शायद इसीलिए वो रहस्यमयी है।

Tuesday, 3 January 2017

~ A Mystic Girl-॥ ~

                      आज वो गमले में पानी डाल रही थी। अचानक से वो ठहर गई, एक गाय को वो देखने लग गई, हां एक गाय के द्वारा वो रोक दी गई। इतनी जिज्ञासा भरी आंखें वो भी एक पालतू पशु के लिए। फिर मैंने जब उस गाय को देखा तो पता चला कि वो कचरे के ढेर में पड़ा बासी खाना खा रही थी। लेकिन उस दस साल की लड़की ने उस गाय की इस छोटी से हरकत में ऐसा क्या देख लिया कि वो ऐसे स्थिर हो गई। शायद वो ये तो नहीं सोच रही कि उस गाय को यहां से दूर चले जाना चाहिए, शायद वो चिल्ला कर कहना चाहती है कि मत खाओ ...ये खाना, और रुको, थोड़ा संभल के, वहां पास में प्लास्टिक की थैलियां भी है, तुम उनसे दूर रहना। अगर वहां कहीं स्टेनलेस स्टील के ब्लेड के टुकड़े होंगे तो कैसे करोगी, पता है तुम्हारे लिए ये कितना तकलीफ भरा होगा। तुम दर्द से रोने लगोगी और कोई यहां तुम्हारी नहीं सुनेगा। इसलिए अब मैं और तुम्हें नहीं देखना चाहती। काश मैं तुम्हें अपने इस छोटे से घर में रख पाती, लेकिन ये संभव नहीं है। मेरी विवशता अब यही चाहती है कि तुम इस कचरे के ढेर से हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाओ और मुझे इस जन्म में फिर कभी न दिखो।
                      लेकिन वो जब इतना सोच रही थी तो उसने कोलाहल का सहारा क्यों नहीं लिया। क्यों वो एकटक उस गाय को निहार रही थी। क्या सच में उसने एक पशु की पीड़ा को अपना लिया था। उसे देखने पर ऐसा मालूम हुआ जैसे एक गाय का दर्द उसके लिए अटूट करूणा का बहाना बन गया हो, उसने एक बड़ी अजीब सी खामोशी को अपने अंदर संभाल के रख लिया हो, हां कुछ है जिसे मापना असंभव सा है, इसी मौन रूपी खामोशी के दर्शन शायद आंख वालों को ही होते हैं।
                       उस लड़की ने थोड़ी देर बाद फिर से गमले में पानी देना शुरू कर दिया, इसी दौरान आज उसने फिर से मुझे देखा। उसके घर के छत की ऊंचाई मेरे कमरे की छत की ऊंचाई से काफी कम है और मेरे कमरे से पश्चिम दिशा में उसका घर होने की वजह से वो मुझे सिर उठाकर देख रही थी। सुबह की धूप सीधे उसके आंखों में पड़ रही थी अब उसने अपने दोनों आंखों को एक हाथ से छाया देते हुए सायबान जैसा बना लिया। उसने कुछ देर मुझे देखा फिर वो गमलों में पानी देकर चली गई। उसने आज जिस तरह से मुझे देखा, ऐसा लगा जैसे वो मुझसे आग्रह कर रही हो कि आप कृपा करके इस गाय को या तो यहां से कहीं और ले जाइए या किसी साफ सी जगह में ही बासी खाना परोस दीजिए। शायद वो हमें एक संदेश देकर छुप जाना चाहती है कि ये जो भी सब हमारे आसपास हो रहा है, इससे मैं संतुष्ट नहीं है। मैं बार-बार अपनी खामोशी से विरोध करूंगी, नाराजगी जताऊंगी। आपको अगर कुछ लगता है, आपके ह्रदय तक अगर सूचना पहुंचती है तो आप इसे ठीक करने को प्रयत्नशील हों। मैं चुपचाप मुस्कुराकर आपका अभिवादन करूंगी।

Monday, 2 January 2017

~ A Mystic Girl ~


आज सुबह जब मैंने उसे अपने छत से देखा तो रूक सा गया,  लगा कि मेरे सामने सिर्फ वही एक थी जो चलायमान थी, मानो सिर्फ उसी ने गति को धारण कर लिया हो, और उसकी गति की वजह से बाकी सब कुछ स्थिर सा हो गया हो।
                  असल में मेरे सामने एक दस साल की लड़की थी। शायद वो 5th या 6th क्लास में होगी। मेरे कमरे की छत से लगभग दो घरों की दूरी पर उसका छत था। इससे पहले उस पर कभी मेरा ध्यान नहीं गया लेकिन आज उसने मेरा ध्यान खींच लिया। दस साल की वो लड़की श्र, उसके वो छोटे-छोटे पैर, सांचे में ढला उसका गोल सा चेहरा, और उस चेहरे में सपनों से डूबा उल्लास लिए वो लड़की उस समय एक किताब हाथों में लिए कुछ सोच रही थी। आखिर वो कौन सा सब्जेक्ट पढ़ रही होगी, क्या वो सचमुच अपने सबजेक्ट के बारे में ही सोच रही थी क्योंकि आज जब मैंने उसे देखा तो वो खुली हवा में आकृतियां बना रही थी, और फिर थोड़ी देर बाद या तो मुस्कुराती या फिर हंसने लगती हां किसी झूमती तितली की तरह कभी यहां कभी वहां। कभी वो पास में खड़े पीपल के पेड़ को देखती तो कभी खुले आसमान की ओर गर्दन उठाकर देखने लग जाती। फिर वो किताब खोलती, थोड़ी देर के लिए कुछ पढ़ती और चहकते हुए फिर यही प्रक्रिया दुहराती।
                  मेरी नजर तो उसे देखते ही रूक सी गई थी, ये ठीक उसी तरह था जैसे सिनेमा देखते-देखते हम एक विशुद्ध अवस्था के द्वारा रोक लिए जाते हैं। अब जब मैं उसे एकटक देख रहा था, इसी बीच ऐसा हुआ कि अचानक उसने मुझे देख लिया। वो कुछ सेकेण्ड भर के लिए वहां रूकी और फिर कदमों की एक विशेष लयबद्धता का अनुगमन करते हुए वहां से तुरंत चली गई।उसने अपने हाथ ढीले कर लिए, हवा में लहराते हुए वो पहले सामने की ओर एक कदम रखती और पीछे दो कदम, कुछ इस तरह धीरे से वो मेरी आंखों से ओझल हो गई। शायद उसे मेरा देखना पसंद नहीं आया या शायद वो खुद को ऐसे देखा जाना पसंद ही नहीं करती। वो नहीं चाहती कि उसकी इस छोटी सी दुनिया पर किसी का ध्यान केंद्रित हो।
                      उसकी इस छवि ने मुझे आज आश्चर्य में डाल दिया है। क्या मैं उसके सोच की परिधि माप सकता हूं, शायद ये मेरे बस की बात नहीं है। लेकिन आज उसकी इस रहस्यमयता का मैं कायल हो गया। लेकिन यह दृश्य मैं और कब तक देख पाऊंगा,बमुश्किल एक साल। उसके बाद तो वो बड़ी हो जाएगी। पीछे छोड़ जाएगी अपनी कुछ झलकियां। अब वो ऐसे खोये हुए अंदाज में शायद ही पहले जैसे बात कर पाए।ये पेड़, ये खुले आसमान धीरे से उसकी स्मृतियों से मिटते जाएंगे। शायद उसे इस बात का अंदाजा भी न होगा कि कब वो बड़ी हो गई और उसकी ये रहस्यमयी दुनिया कहीं पीछे रह गई। अब चूंकि वो बड़ी होने वाली है तो उसकी मां के द्वारा उसे समझाया भी जाएगा कि बेटा अब तुम बड़ी हो रही हो, तुम्हें अब खुद अपना ख्याल रखना पड़ेगा, तुम्हें ये सीखना पड़ेगा, अपने दोस्तों खासकर अपने आसपास के लड़कों को समझना होगा। साथ ही अपनी सीमाओं का विशेष ख्याल रखना होगा।
                  और धीरे-धीरे उस लड़की की रहस्यमयी दुनिया सिकुड़ती जाएगी। उसे अब अपने उन ख्यालों की दुनिया से बाहर आकर भीड़ का हिस्सा बनना होगा। अब वो सब के बीच हंसना सीखेगी। घूमना, बातें करना सीखेगी। घर, परिवार ,समाज की प्रतिष्ठा बढ़ाये, सबको गौरवान्वित करे इसके लिए उसकी प्रतिभा को और अधिक परिष्कृत करने हेतु सारे उपाय किए जाएंगे और कुछ इस तरह वो इस नई दुनिया का हिस्सा बन जाएगी।

Sunday, 1 January 2017

जुबान का फर्क -॥

कल रात स्टेशन रोड पर मुझे मेरे कालेज के एक प्रोफेसर दिखे। हां जिन्हें हम Faculty पुकारते थे। पांच मिनट तक वे वहां खड़े रहे, शायद कहीं से आ रहे होंगे, मैं छिपकर उन्हें देखता रहा, लेकिन मिल नहीं पाया, थोड़ी देर के बाद उन्हें कोई लेने आ गया और वे वहां से चले गए। पता है मैं उनसे क्यों नहीं मिला, क्योंकि मेरे को उनका नाम याद नहीं आया, मैंने बहुत कोशिश की लेकिन आखिर में सिर पकड़ के बैठ गया, दूर से छिप के बस उन्हें देखता रह गया। 
कल जो हुआ ये कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी।
                       आप सोच रहे होंगे कि कोई अपने टीचर का नाम कैसे भूल सकता है। वो भी मेरे जैसा इंसान जिसे अपने KG-1 की मिस के पहनावे और कान के झुमके से लेकर चूड़ियों के रंग तक याद होते हैं। जिसे ये याद है कि जब वो चार साल का था तो अचानक से एक कोई साधु बाबा आये थे और हाथ में ताबीज देकर तुरंत कहीं चले गये थे। जिसे ये भी याद है कि जब वो छः साल का हुआ तो सबसे पहली बार चेतना के स्तर पर जाकर इसलिए रोया था क्योंकि उसने गलती से बहकावे में आकर स्कूल से एक चाक चुरा ली थी।लेकिन कल क्या मेरी मति मारी गई थी। आखिर क्यों मुझे अपने ही सर का नाम याद नहीं आया। इसे जानने के लिए चार साल पीछे चलते हैं।
                      वे जब हमें क्लास में पढ़ाते थे, तो हमारे मैकेनिकल डिपार्टमेंट में सिर्फ एक ही लड़की थी।वो अच्छा पढ़ाते थे, लेकिन यहां बात उनके विषय विशेषज्ञता को लेकर बिल्कुल भी नहीं है। अगर वो अच्छा नहीं भी पढ़ाते तो भी कोई मलाल न होता। असल में जब किसी स्टुडेंट से कोई लापरवाही होती तो उस समय उनकी भाषा कुछ ज्यादा ही खराब हो जाती। चूंकि हमारे क्लास में एक ही लड़की थी। वे उस लड़की को कैंटीन या बाहर पानी पीने भेज देते। और फिर पूरे क्लास के ऊपर अपशब्दों की बौछार कर देते। कुछ सामने बैठे लड़के बेवजह डरने जैसा चेहरा बनाते, कुछ लोग उनके बर्ताव को नोटिस करते तो कुछ लोग उन्हें बाद में बराबर गाली देते।
                       हमारे उन कुछ प्रोफेसर्स का लहजा कुछ ऐसा होता जैसे कि वे कोई ठेकेदार हैं और हम छात्र उनके कामगार और ये पांच-छह महीने तक हम उन्हीं के भीतर काम करेंगे। गालियां भी सुनेंगे और उनके साथ चाय-नाश्ता भी करेंगे, सेशनल नंबर ऐसे लेंगे मानो उन्होंने अपने घर से लाकर हमें दिया है। कभी-कभी लगता है एक ठेकेदार भी तय समय में काम लेने के लिए अपने कर्मियों से कभी ऐसे बर्ताव नहीं करता होगा।
                      जब जब टीचर्स अपशब्दों की बौछार करते। मैं उसी समय क्लास से बाहर हो जाता। मेरे दोस्त सोच रहे होंगे कि ये कब बाहर गया, ये तो हमारे साथ ही बैठा रहता था। हां मैं अपना शरीर वहीं छोड़ देता और बड़े भारी मन से कहीं और ही कुछ देर के लिए घूमने चला जाता, अब समझ आता है कि मैं पूरे चार साल उस कैम्पस में होकर भी नहीं था। हां ये तकलीफ़देह है, और ये तकलीफ किसी प्रेमी को उसके प्रेम में मिली विफलता से कहीं ज्यादा बड़ी है।
                     जब हमारे टीचर्स ऐसे सुनाते तो लगता कि इनके पास टेढ़े बच्चों को समझाने का कोई और तरीका क्यों नहीं है। कभी लगता कि जाकर घुटने टेक दूं और कहूं कि हमें माफ करें आप, हम ऐसी भाषा और नहीं सुन पायेंगे, ऐसे में आप हमें एस्ट्रोनामी भी पढ़ायेंगे तो भी सुनने का मन नहीं लगेगा। मेरी स्मृतियों को इससे पहले इतना नुकसान कभी न हुआ था। आगे चलके ऐसा हुआ, समझ लीजिए कि मैंने तार ही काट दी, टोटल बायकाट। मतलब नहीं चाहिए आपकी दी हुई पढ़ाई। कुछ इस तरह ऐसे सारे टीचर्स मेरी स्मृतियों से मिटते गए, मैंने ऐसे सभी लोगों को संजोने की कोशिश भी की, लेकिन सब कहीं पीछे छूटते गए।
                     मैंने उन सीनियर्स को भी संजोने की कोशिश की जो हमें इंजीनियरिंग का पहला मंत्र यही सिखाते की बिना अपशब्दों के, बिना किसी नशे के आपकी यहां दाल नहीं गलेगी। जो उम्र में हमारे बराबर के ही होते वो हमें इतनी तल्लीनता से बेटा पुकारते कि लगता यही हमारे माई बाप हैं। सच कहूं मेरे मां-बाप ने आज तक मुझे इतनी बार बेटा नहीं पुकारा होगा जितना हमसे एक साल बड़े इन सीनियर्स ने पूरे तीन-चार साल में पुकारा।
                     मुझे कभी-कभी लगता, अरे! नहीं मुझे रोज ऐसा लगता कि पढ़ाई के लिए घर से बाहर क्या निकला, किसी दूसरी दुनिया में ही आ गया। हां पूरे चार साल, आठ सेमेस्टर यही लगता रहा। किसी से कह न पाया कि मुझे ऐसी ऐसी समस्या है, मुझे बड़ी घुटन सी होती है, कोई तार दीजिए, इस उलझन से मुझे बाहर निकालिए, कुछ जादू सा कर दीजिए भाई, कर दीजिए समाधान। मैं इस आबोहवा में कहीं पागल न हो जाऊं, संभाल लीजिए। एक बार तो मैंने एक ज्योतिषी से भी संपर्क किया, उन्होंने भी कुछ साफ-साफ नहीं कहा तो खाली हाथ वापस आ गया। अब जब मेरे पास और कोई रास्ता शेष न था तो किसी प्रकार का कोई विरोध न करते हुए मैंने अपने हाथ-पाँव ढीले कर लिए, खुद को हमेशा-हमेशा के लिए अनजान से हाथों में सौंप दिया और फिर चारों तरफ की अंधेरी गहराइयां मुझे उछालती रहीं, उछालती रहीं।

Saturday, 31 December 2016

~• Happy New Year 2017 •~

कुछ एक लोगों ने हमें ये तीन शब्द कह दिए..हमने बदले में " घर में सब कैसे हैं?" ऐसा भेज दिया है।
सामने वाले को लग रहा है कि हमने ये भूलवश भेजा होगा, हमें भी यही लग रहा है कि उन्होंने भूलवश हमें हैप्पी न्यू ईयर भेज दिया।

खैर अतुल को इन सब से क्या वो तो शराब पहले से खरीद चुका है। अतुल अभी कालेज में है, साउंड सिस्टम तो कापी किताब खरीदने से पहले ही उसने खरीद लिया था, इस बार अतुल की लड़ाई नवीन से है। आखिर किस चीज की लड़ाई, दरअसल ये लड़ाई है शराब पीने की। दोनों ने एक दूसरे को चैलेंज किया है कि कौन ज्यादा शराब पियेगा। रात के 11 बज चुके हैं, कांच के ग्लास और शराब की बोतलें सज चुकी है। दोनों पीना शुरू करते हैं, इतना पी लेते हैं कि चिल्लाने लगते हैं, अतुल प्रेम में मिली किसी वर्षों पुरानी विफलता को याद कर एक लड़की के नाम खूब फब्तियां कसने लग जाता है। वहीं नवीन अपनी मां को याद करते हुए भावुक हो जाता है। उनके आसपास बैठे उचक्कु दोस्त उनको या तो सांत्वना दे रहे हैं या उत्साहवर्धन कर रहे हैं। एक लड़का जो उठकर फोन पर बात करने लगता है उसने आज एक ही दिन में अपनी प्रेयसी से जीवन भर के वादे कर दिए हैं। लड़की को भी पता है कि लड़के की बातें खोखली है लेकिन फिर भी वो इस झूठे दिलासे से खुश हो लेती है ताकि बात न बिगड़े। इसी बीच अतुल होश खो बैठता है और शराब की एक बोतल वहीं पटक देता है, कांच के छोटे-छोटे टुकड़े फर्श पर बिखर चुके हैं। तभी उसी गोल घेरे में बैठा एक लड़का चटाई में उल्टी कर देता है। जिन्हें होश है, उनमें से एक उल्टी और बिखरे कांच की सफाई कर रहा है। दूसरा नशे में चूर लोगों को कांधे पर पकड़कर बिस्तर में सुलाने ले जा रहा है। इन सब के बीच किसी ने इस बात की खबर नहीं ली कि शराब पीने का ये चैलेंज किसने जीता।

                 खैर जिसने भी जीता हो रामसिंग को इससे क्या, वो आज जल्दी से घर जाना चाहता है। उसका एक बच्चा और उसकी बीवी दोनों उसके इंतजार में है। आज उसका छ: साल का बच्चा जागा हुआ है कि पापा कुछ लेकर आयेंगे इस एक उम्मीद से उसने भी खाना नहीं खाया। रामसिंग काम खत्म कर देशी शराब की दुकान पर जाता है एक बोतल देशी शराब की अपने झोले में डालकर जल्दी से घर की ओर निकलता है। रास्ते में उसने बच्चे के लिए चाकलेट ले लिया है। बारह किलोमीटर की दूरी को अब वो जल्दी से खत्म कर देना चाहता है, साइकल चलाते-चलाते जब थकान रामसिंग के सिर तक प्रवेश कर जाती है तो वो रास्ते में रूकता है और आधी शराब पी लेता है, फिर वापस घर की ओर जाने के लिए वो साइकल में बैठता है अचानक ही वो साइकल से उतरता है और बची शराब भी पी लेता है। घर पहुंचकर देखता है कि बेटे को नींद आने लगी है, रामसिंग बेटे को उठाता है और चाकलेट उसके हाथ में देता है। बेटा खुश हो जाता है, पर जैसे ही वो चाकलेट दांत से फाड़ने लगता है, जोर से चिल्लाकर कहता है कि बदबू मार रहा है। रामसिंग को इस बात का पता ही न चला कि शराब पीते वक्त कब ऊपर जेब में रखे इस चाकलेट की झिल्ली पर कुछ बूंदे गिर गई होगी। मां तुरंत अपने बच्चे के पास जाती है और हाथ से फाड़कर बेटे को चाकलेट खिलाती है।

              लेकिन शाहिन की उत्सुकता आज चरम पर है। उस छोटी बच्ची को तो आज बारह बजने का इंतजार है। स्कूल में उसकी सहेली जो उसके ठीक पड़ोस में रहती है, उसने शाहिन को चाइनिज बलून(लैम्प) दिखाया और कहा कि 31 की रात को इसे हम आसमान में छोड़ेंगे। तुम देखने छत पर आना। शाहिन ने भी अब अपने पापा से जिद की और पापा ने शाहिन के लिए चाइनिज लैम्प ला दिया है। उसने अपनी सहेली को नहीं बताया है कि उसने भी मंगवा लिया है। शाहिन चाहती हैं कि वो अपनी सहेली को आश्चर्यचकित कर देंगी। रात के नौ बज चुके हैं,  शाहिन के पापा ने सबको कहा कि आज बाहर खाना खाने जायेंगे। शाहिन बार-बार पापा से पूछ रही है कि जल्दी आ जायेंगे न। रेस्तराँ में खाना खाते ग्यारह बज चुके हैं। शाहिन ने ढंग से कुछ खाया भी नहीं है। वो बार-बार इतने देर से सबको टाइम पूछ रही है। रेस्तरां से घर पहुंचने के बीच रास्ते में कहीं पटाखे फूटने लगते हैं, शाहिन को लगता है कि बारह बज गये होंगे, वो फूट-फूट कर रोने लगती है। शाहिन की अम्मी उसके आंसू पोछती है और टाइम दिखाते हुए बार-बार कहती है कि बेटा अभी 11:45 हुआ है देखो, देखो इधर। बड़ी मुश्किल से शाहिन शांत होती है और अम्मी को गले से लगा लेती है।

                    इधर सूरज और बंटी दोनों अलग ही दुनिया में मस्त हैं। दोनों अभी 7th क्लास में है। एक क्लास कप्तान है तो समझो दूसरा छोटा कप्तान। दोनों जो अब तक स्कूल के ब्लैकबोर्ड के एक किनारे में उपस्थिति और अनुपस्थिति संख्या लिखा करते थे आज वे चूने का घोल तैयार कर रहे हैं। ये दोनों भी बारह बजने के इंतजार में है, आज तो दोनों ने कसम ली है कि शुभकामनाओं और मंगलकामनाओं से कालोनी के इस रोड की पुताई कर देंगे। दोनों ने एक कागज में अपना लिखा नोट कर लिया है साथ ही ब्रश का भी बंदोबस्त कर लिया है।

                सुजीत आज पेट्रोलिंग पर है। नये साल में उपद्रवी तत्वों पर लगाम लगाई जा सके इसलिए प्रशासन ने अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर रखी है उसमें सुजीत भी है सुजीत की ये पहली नाइट ड्यूटी है। अभी-अभी तो वो सब-इन्स्पेक्टर बना है। उसने तो अभी तक किसी पर हाथ उठाना भी नहीं सीखा है। वो जिस काम में है वहां तो टेढ़ापन जरूरी है। लेकिन सुजीत अभी तक इस नये माहौल में नहीं ढल पाया है। नये साल की मध्यरात्रि में कार से गुजरते लड़के-लड़कियों को देखता है और अपने कालेज के दिन याद करने लग जाता है। एक समय वो जिन पुलिसजनों को देखते हुए अपशब्द बोला करता था, आज वो परीक्षा पास कर उसी विभाग में आया है तो कहता है कि मुझे लगता है मैंने दुनिया का सबसे बड़ा काम हाथ में लिया है।

              दस बज चुके हैं और जितेंद्र आफिस के लिए निकल रहा है हां आज उसकी रात की शिफ्ट है। आज आफिस में ज्यादा काम नहीं है तो बोरियत मिटाने वो सोशल मीडिया पर आ जाता है। केक से सनी हुई नये साल की तस्वीरें देखता है, प्रतिक्रिया देता है और बाहर आ जाता है। जब वो मैसेज और नये साल की ये तस्वीरें देख कर ऊब जाता है तो अपने कुछ पुराने दोस्तों को फोन लगाता है। इत्तफाक से कोई फोन नहीं उठाता। कुछ देर बाद उसका फोन बजता है, चहकती हुई चिड़िया की तरह वो फोन की ओर लपकता है। उठाते ही आवाज आती है- सर जी नये साल की बधाई। जितेंद्र कहता है- यार पहचाना नहीं। कौन बोल रहे हैं?
उधर से आवाज आती है- अरे! क्या सर, परसों ही आपका नंबर लिया था, भूल गये आप, आपके पड़ोस में अभी-अभी शिफ्ट हुआ हूं।

                    रात के 8 बज चुके हैं, पुड़ी-सब्जी और खीर तैयार हो चुकी है। सन्नी हर साल की  तरह गुरूद्वारे की परंपरा का निर्वहन करते हुए अपने दोस्तों के साथ इस बार भी तय समय पर रेल्वे स्टेशन के सामने पहुंच चुके हैं। स्टेशन में ही गुजर-बसर करने वालों को उन्होंने एकत्र करना शुरू किया और लाइन से बिठा दिया है। इस बार उनके इस ग्रुप में दो नये लोग शामिल हुए हैं। सन्नी ने अपने साथियों के साथ खाना परोसना शुरू किया ही था कि उन दो नये लड़कों में से एक ने अपने फोन से कुछ एक तस्वीरें ली, सन्नी उस वक्त खीर बांट रहे थे, खीर की बाल्टी उन्होंने वहीं छोड़ी और वे तेजी से चलते हुए उस फोटो खींचने वाले लड़के के पास गए और उसे जोर का एक थप्पड़ जड़ दिया।

                     पर आज वसुंधरा सबसे ज्यादा खुश नजर आ रही है। वो दीवाली की छुट्टी के इतने दिनों बाद आज अपने घर जा रही है। ये तो सामान्य बात हुई, असल में खुशी की वजह कुछ और है। चंडीगढ़ से काजा तक जाने के लिए वो जिस नाइट बस में बैठी है। उसे चलाने वाले कोई और नहीं उसके पिता हैं। उन्होंने वसुंधरा के लिए सामने वाली सीट बुक कर दी है। एक तारीख की सुबह 6 बजे दोनों बाप-बेटी साथ घर पहुंचेंगे और वसुंधरा की मां कुल्हड़ की चाय के साथ दोनों का इंतजार कर रही होगी।