हालीवुड का आफिस अमेरिका में है।अमेरिका एक ऐसा देश, जो देश कम और बिजनेसमैन ज्यादा है। जो पूरी दुनिया को प्रभावित करता है कभी अपनी नीतियों से, कभी अपने संगठनों के माध्यम से, कभी अपने साधनों(फूड चैन) से तो कभी अपने बनाये नैतिकता के पैमानों से। और साथ ही इन हालीवुड फिल्मों से।
अमेरिका एक ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा विकसित है,साइंटिफिक है यानि उसके पास अपनी जरूरत के सारे साधन है जो एक देश के लिए सर्वोपरि होते हैं पर कुछ चीजें जो अमेरिका के पास बिल्कुल भी नहीं है और वो है सामाजिकता, साधन शुचिता, मानवता। इन सब मामलों में अमेरिका शून्य है। इसलिए अगर दुनिया में सबसे वाहियात मुल्क कोई है तो वो अमेरिका है।
अमेरिका के हालीवुड सेंटर से हर साल अच्छी फिल्में आती रहती है। हां अच्छी फिल्में, जिनके मूल में एक ही चीज रहती है वो यह कि दुनिया खतरे में है, दुनिया को बचाना है। इन कबाड़ सी फिल्मों का एक भयावह दौर चल रहा है जहां फिल्म शुरू हुए पांच मिनट भी पूरे नहीं होते कि फिल्म का नायक/खलनायक या आर्मीमैन बंदूक से गोलियां दागते दिख जाता है। असल में मौत को इस तरीके से पेश किया जाता है कि हम जैसे ही देखते हैं, एक अजीबोगरीब साहस से भर जाते हैं। उनके एक्शन से प्रभावित होकर उन्हें हर तरफ फालो करते हैं। पर अमेरिका भी जानता है कि लोग हमेशा मारकाट नहीं देखेंगे इसलिए अपनी छवि ठीक करने के लिए वो साल दो साल में नासा से कुछ खास पकवान यानि Interstellar, Gravity जैसी फिल्में बनाकर हमारे मनोविज्ञान में एक दूसरी दुनिया का चित्रांकन कर देता है और हम ज्ञान विज्ञान की एक अद्भुत झलक पाकर गदगद हो जाते हैं।
अभी पिछले दस साल में ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ गई है जिसमें लगभग हर दूसरे फिल्म में फौजियों की टुकड़ियां हैं जो बंदूक, टैंक और गोलबारूद से लैस हैं, जो एक ऐसी लड़ाई लड़ते हैं जिसका जन्म उन्हीं के द्वारा हुआ है और लड़ाई को खत्म भी वही करते हैं। अंततः लोगों के दिमाग में जो चीज तगड़े से पहुंचती है वो ये कि दुनिया को बचाना है। कभी कभार सवाल करने का मन होता है कि भाई आखिर दुनिया को किससे बचाना है। हमने ज्यादा से ज्यादा गली में हाथ,पांव या डंडे से लोगों को लड़ते देखा है और दूसरा ये कि हमारा एक बदमाश पड़ोसी देश है जिसकी खबर हमें मिलती है कि वो आये रोज सीमा पार से बंदूक तान रहा है, चीजें यहां तक सीमित हैं। लेकिन ये अमेरिका किससे लड़ रहा है ये नामुराद देश जो पूर्णतः सुविधासंपन्न है। ये अपने फिल्मों के माध्यम से हमेशा ये दिखाने की कोशिश करता है कि उसे किसी ने छेड़ा है और वो उसका बदला लेगा और सामने वाले को मार के ही दम लेगा। कभी सरहद पार के किसी दूसरे देश से लड़ता है कभी समुद्री मार्ग तो कभी हवाई मार्ग से तंग करता है, जब ये सब से उब जाता है तो ग्रह, नक्षत्रों और एलियन से लड़ाई करता है।
सोचिए कैसी अजीबोगरीब मस्तक हमारे सामने है। अमेरिका जो विश्व में सबसे ज्यादा "Arms and ammunition" का उत्पादन करता है। अब इसे ऐसे समझें कि अमेरिका के पास हथियार इतनी ज्यादा मात्रा में है कि अब हथियार अमेरिका का एक 'Resource' है यानि किसी एक चीज का उत्पादन इतना हुआ कि वह रिसोर्स में तब्दील हो जाए। और चीज भी ऐसी है जिसका मूल यह कि ये चीज लोगों को मारने के काम में आता है। अब हथियार इतनी मात्रा में बना लिए गए कि फिल्में भी उसी कायाकल्प में बनती है।
एक ऐसा राष्ट्र जहां हथियार और आर्मी का माहौल वहां की हवा में मूलतः विद्यमान है तो वहां की फिल्मों में डंडे से लड़ने वाली लड़ाइयां तो नहीं दिखाई जा सकती, ये असंभव है। और उसी अमेरिका में ये सुनने मिल जाता है कि वहां एक बीस साल का सिरफिरा लड़का स्कूल में घुसकर तीस चालीस बच्चों को गोली मार दिया। हां ये अमेरिका जैसे विकसित देश में ही हो सकता है।
चाहे वो John wick, taken जैसी फिल्म हो या James bond, fast and furious series हर फिल्म में वो दर्शकों की आंखों में धूल झोंक देता है। हां जी वो फिल्म इंडस्ट्री इतनी चालाक है जिसकी शायद आप और हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इतनी चतुराई से वो पूरी फिल्म की भूमिका बांधते हैं कि हम उनके काम को नजर अंदाज कर नहीं पाते, हम देखने को विवश हो जाते हैं। वो हर एक्शन फिल्म को पहले देश, पारिवारिक भावनाओं या रिश्तों से जोड़ता है फिर वहां खलल डालता है नायक के दिमाग में गुस्सा भर देता है और फिर खूब तांडव मचाता है, गोलियां बरसाता है, हिम्मत का परिचय देता है और हम उनके इस अभिनय के कायल हो जाते हैं। हमें मौत का यह प्रस्तुतीकरण खूब पसंद आता है।
Taken series के अभिनेता लियाम नीसन को अपने फिल्म की बंदूकबाजी को लेकर जब वाहवाही मिलनी शुरू हुई तो शायद इन सब से वे खुश नहीं थे। उन्होंने एक बार मीडिया प्रेस कांफ्रेस में यूएस गन ला को कलंक तक कह डाला। उसके बाद taken फिल्म में बंदूक मुहैया कराने वाली अमेरिकी कंपनी ने नीसन को सब तरफ से बैन करवा दिया कि इन्हें यूएस और हालीवुड की कोई भी अथारिटी अपने हथियार या गैजेट नहीं देगी। सनद रहे कि नीसन ने आगे चलकर मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल में भी काम किया है। नीसन का पश्चाताप कुछ ऐसा ही था जैसा वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल का था। अल्फ्रेड नोबेल को डायनामाइट के आविष्कार के बाद जो उपाधियां मिलने लगी, उससे उनकी भी आत्मा जवाब देने लगी। जीवन के अंतिम समय में वे इन उपाधियों से खुद को अलग करने के लिए जूझते दिखे और आखिरकार उन्होंने नोबेल पुरुस्कार देने की परंपरा इजात की और आज दुनियाभर में अधिकांशतः उन्हें इसी वजह से याद किया जाता है।
आप सोच रहे होंगे कि यहां सिर्फ अमेरिका को बोला जा रहा है। नहीं ऐसा नहीं है रूस, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे और भी कुछ विकसित देश हैं जो सभ्यता के इस वीभत्स रूप का पोषण कर रहे हैं।हमारे भारत में भी तो मुंबई अंडरवर्ल्ड को लेकर बहुत सी फिल्में बन जाती है। लेकिन अमेरिका इस मामले में सबसे आगे है। चूंकि अमेरिका द्वारा किए जा रहे अत्याचार और दुष्प्रचार के सामने ये बाकी देश छोटे पड़ जाते हैं इसलिए इस एक देश को ही केन्द्र में रखकर बात कही गई है। और आखिर में ये कहना गलत न होगा कि तमाम खूबियों, समृध्दि के उच्च मानदंडो के बावजूद अमेरिका दुनिया का सबसे असभ्य देश है।
Thursday, 22 December 2016
~ Hollywood Movies ~
Thursday, 15 December 2016
~ Three Colours ~
फिल्मों का नाम भी यही है-
Three colours : Blue
Three colours : Red
Three colours : White
ये तीन रंग ही क्यों?
वो इसलिए कि ये तीन रंग या यूं कहें कि ये तीन बीज फ्रांसिसी क्रांति से निकले हैं। जहां नीला रंग स्वतंत्रता(Liberty) का प्रतीक है, लाल रंग बंधुत्व(Fraternity) का और सफेद रंग समानता(Equality) का प्रतीक है।
फ्रांसिसी क्रांति(French Revolution) के बारे में जानना सिर्फ उनके लिए जरूरी नहीं है जो बी.ए. कर रहे हैं या जो यूपीएससी, पीसीएस, बैंकिंग की तैयारी कर रहे हैं। ये उन सब के लिए है जो अपनी जिंदगी संवारना चाहते है, यहां जिंदगी संवारने के मायने सबके अपने अलग-अलग हो सकते हैं। लेकिन ऐसा महसूस होता है कि इस क्रांति से निकले भाव को जानना, इस फल के स्वाद को ग्रहण करना शायद सबके लिए जरूरी है।ठीक उसी तरह जैसे सबका अपना एक बंधा बंधाया अधिकार है कि भई मैं ये काम आजादी से कर सकता हूं, ये बात मैं लोगों के सामने रख सकता हूं, अपने मन मुताबिक कहीं आना-जाना कर सकता हूं, घूम सकता हूं, कमा सकता हूं, अपने हिसाब से कुछ खरीदी-बिक्री कर सकता हूं , शौक पूरे कर सकता हूं। साफ खान-पान, अच्छे शांत इलाके में घर, एक अच्छी नौकरी, तमाम ऐसे सपनों को एक सांचे में ढाल सकता हूं।
और न जाने ऐसी कितनी ख्वाहिशें जो सिर्फ और सिर्फ हमारी होती है। इन सबके लिए ये खुली हवा आखिर हमें कहां से मिली?
हां ये फ्रांसीसी क्रांति की देन है जिसने पुरानी हवा को साफ किया, नये हवा के लिए जगह बनायी, अधिकारों,मूल्यों को परिभाषित कर उनमें जान डाल दी, इसलिए फ्रांसीसी क्रांति बहुमूल्य है, कालजयी है।
आखिर फ्रांसिसी क्रांति इतनी खास क्यों है?
उसकी कुछ वजहें हैं एक ये कि ईसा मसीह के जन्म के बाद अब तक धरती में मानव-जाति ने जितने कदम उठाए हैं उनमें जो सबसे महत्व का काम हुआ तो वो फ्रांसिसी क्रांति थी..भले क्रांति अपूर्ण रह गई लेकिन चीज तो ऊंची रही। इसने मानवता को पुनीत किया, बेड़ियों से जकड़े लोगों को राहत दी, सभी अनजाने सामाजिक मूल्यों को मुक्ति दी, उमंगों को मधुर बनाया, लोगों को शांत किया, मनाया, प्रबुद्ध बनाया और धरती पर एक सभ्यता का अवतरण कर लहरें उठा दी। कुल मिलाकर चीज बड़ी शानदार रही।
दूसरी महत्व की चीज क्या है ये आपको समझने के लिए पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी।
फिल्म में आपको ऐसा लगेगा कि डायरेक्टर ने मानो रंगों को जी लिया है। ऐसा गजब का Colour Rendition( रंगों की व्याख्या) कि कहीं कहीं लगता है कि अभिनयकर्ता को यहां कुछ बोलने की जरूरत ही नहीं है, ये रंग इतनी बातें कर रहे हैं कि शब्दों की कमी पूरी हो गई है।
जैसे कि फिल्म three colours : blue है। उसमें कोई व्यक्ति सड़क किनारे चलते हुए जा रहा है उसी वक्त एक नीले रंग की कार उसके पास से गुजर रही है, और तो और आसमान और वातावरण में एक नीले रंग का प्रकाश बिखरा हुआ है, आफिस में फाइल सामने रखा जा रहा वो भी नीला। फिल्म देखते हुए आप महसूस करेंगे कि लोगों के पहनावे में नीले रंग का कपड़ा चाहे वो उनका कालर हो या जैकेट वो बाकी रंगों से कुछ हटकर नोटिस हो जाता है। आधी रात में खिड़कियों से चमकती नीली रोशनी, जो चेहरे पर पड़ते ही एक नीलाभ प्रतिछाया के रूप में दिखाई देती है और इन सब परिदृश्यों के बीच पिरोया गया है इस नीले रंग के अर्थ को यानि 'स्वतंत्रता', एक अर्थ जो इस रंग के माध्यम से और अधिक गौरवान्वित हो जाता है, अपने मूल को पा लेता है।
शेष दो फिल्में Red और White में भी ठीक ऐसा ही सिनेमा दिखाया गया है, जैसा Blue में है। एक सिनेमा जो हमें बांधे रखता है और जो कई बार हमारे धैर्य की परीक्षा भी ले लेता है, जब कैमरे की आंख कुछ सेकेंड के लिए एक ही जगह रूक जाती है, जो शायद हमसे एक आग्रह कर रही होती है कि हम इस थोड़े से समय में दर्शित भाव प्रवणता को समझें, विचार करें।
तीनों फिल्मों में तीन अलग-अलग कहानियां हैं जिसके माध्यम से डायरेक्टर ने स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अर्थ को लोगों के सामने रखा है।
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| Three colours : blue |
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Three colours : White |
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| Three colours : Red |
Tuesday, 13 December 2016
ऐसे दिन भी होंगे
जब तुम्हें मुस्कुराते चेहरे नहीं दिखाई देंगे,
छोटे बच्चों की अठखेलियां नहीं सुनाई देगी।
ट्रेन तुम्हारे सामने से गुजरता रहेगा,
पर आवाज कानों तक नहीं पहुंच पायेगी।
जब चाय की चुस्कियां भी काम नहीं आयेगी,
जब भोर का सूरज भी अंधकारमय लगेगा।
जब शांत हवा के झोंके भी महसूस नहीं होंगे,
तब तुम्हारी पूरी क्षमता टुकड़ों में बिखर जायेगी।
नहीं पता कहां रूकना है और कहां जाना है,
सारा मन/ह्रदय फिर से सुन्न पड़ जायेगा।
कुछ समय में ये ठीक हो भी जायेगा,
लेकिन तुम्हारे अंतर में कहीं बचा रहेगा।
जो कभी भी जाग सकता है,
तुम्हें फिर से बिखेरने के लिए।
प्यारे! तुम कीमती हो, यही तुम्हारा सब कुछ है,
इसीलिए तो कहता हूं, तुम्हें पीछे नहीं हटना है।
ये तकलीफें आयेंगी और चली जायेंगी,
पर ऐसे दिनों का तुम्हें डटकर सामना करना है।
ऐसे दिनों के लिए तो तुम्हारे पास कल है,
ये कल जो सारे घाव भरने को तैयार खड़ा है।
सारे अनसुलझे सवालों के जवाब लिए,
उम्मीदों और सपनों की लौ जलाये खड़ा है।
तुम बहुमूल्य हो, इसलिए तुमसे मेरा वादा है,
कल फिर एक नई सुबह होगी,
और तुम अपनी जंग जीतने लगोगे।
Sunday, 11 December 2016
~ देवार डेरा ~
मेरा जो घर है उससे कुछ तीन सौ मीटर की दूरी में एक खाली मैदान था वहां लगभग दस साल पहले देवारों का एक कबीला आकर बस गया। बच्चों को मिलाकर कुल बीस से पच्चीस लोग होंगे, चार या पांच परिवार में बंटे हुए।
वो खाली मैदान अब एक छोटी कालोनी में तब्दील हो चुका है। असल में जिस जमीन में देवार/कबीलों ने आकर डेरा डाला है..उसमें से आधी जमीन घास भूमि है और बाकी आधी जमीन लगानी जमीन है। अब इसे यूं समझें कि जो जमीन है वो इतनी पेंचीदगी से भरा है कि उसका भूमिस्वामी(land-owner) उक्त भूमि को बेचने के उद्देश्य से जितने बार सीमांकन करवाता है हर बार उसे एक नया परिणाम मिलता है, इस एक वजह से जमीन का मामला सुलझ नहीं पाया है।
दूसरी वजह ये है कि जमीन के मालिक ने एक दो बार पुलिस बल और अधिकारियों की सहायता से डेरा वालों को हटाने की कोशिश की पर देवारों के पैंतरे भी क्या कम हैं, पता नहीं उन्होंने जमीन का कोई कागजात बनवा लिया है..उन्हें भी पता है कि घास जमीन लगा हुआ है, वे पहले कागज लहरा के दिखलाते..फिर समस्त परिवारों की महिलाएं सामने आ जाती और ऐसा तांडव मचा देतीं कि सारे पुलिसवाले, अधिकारीगण मुंह छिपा कर भाग जाते।यानि जहां व्यक्ति के अपने अधिकार काम नहीं आते, वहां उसके उपद्रव मूल्यों का स्वतः अभ्युदय हो जाता है, इस मामले में भी यही हुआ।
अब हालत ये है कि जमीन के मालिक ने उस थोड़ी सी लगानी जमीन पर ध्यान देना ही छोड़ दिया है।
शुरूआत में जब देवारों ने अपना डेरा डाला, उनको देख के मानो ऐसा लगता था कि अमेजन के जंगलों से सीधे यहीं आ पहुंचे हैं सभी लड़कों के बाल मिथुन दा की तरह यानि पूरी तरह से एक विक्षिप्त अवस्था के परिचायक जिनके रहन-सहन में रोजमर्रा की लड़ाई होना आम बात है। लड़ाई भी कुछ ऐसी कि पूरा परिवार शामिल हो जाता..लड़ने वाले इतने ज्यादा हो जाते कि बीच-बचाव करने वाले कम पड़ जाते। और इतनी तेज आवाज में लड़ते कि आसपास के लोग देखने को इकट्ठे हो जाते। उनका डंडे लेकर लड़ने का अंदाज भी अलग, भाषा भी थोड़ी विचित्र सी..हर कोई लड़ाई देेखता। हमें यही लगता कि इतना भारी मारपीट किए हैं अब ये लोग आमने-सामने नहीं रह पाएंगे लेकिन अगले दिन फिर साथ-साथ हाथ बंटाते हुए दिख जाते।
देवारों के साथ सबसे बुरी चीज ये थी कि वे कभी नहाते नहीं थे। शुरूआती दिनों में जब वे हमारी गली की तरफ से गुजरते तो हमारी गली के बच्चे भी महान वे लोटे में पानी लेकर खड़े रहते..देवार बच्चे डर के मारे गली पार नहीं कर पाते, घूम के एक दूसरे रास्ते से आना-जाना करते। एक देवार बच्चे को मैंने पूछा था तो उसने बताया कि वो महीने भर से नहीं नहाया..और तो और ये कहने लगा कि नहाने से चमड़ी छिल जाती है। दूसरी खराब आदत ये थी कि वे मरी हुई मुर्गियाँ खा जाते थे।
देवारों का ना अपना पहचान पत्र ना कोई कार्ड..मतलब पहचान का संकट तो था ही साथ ही नाम का भी संकट था।माता-पिता अपने बच्चों के नामकरण में खूब लापरवाही बरतते, मन मुताबिक कुछ भी नाम रख देते,नाम इस तरह होते जिसका कोई अर्थ न निकलता। ऐसे में बच्चे जब थोड़े बड़े होने लगते तो वे खुद ही अपना कोई फिल्मी नाम रख लेते..कई बार तो नाम को लेकर भी लड़ लेते कि मेरा नाम अब से ये है..पुराने नाम से पुकारा तो खैर नहीं।
देवारों का अपना कोई आजीविका का साधन तो था नहीं..कहीं मजदूरी कर लेते..कबीले के कुछ नौजवान लड़के जो थोड़ा साफ-सफाई से रहते वे होटल में काम करते..बाकी जो बच गए वे सांप दिखाते और पेट पालते..कहीं किसी के घर सांप निकलता तो बदले में पैसे लेते और सांप को कभी न मारते बल्कि पकड़ कर अपने साथ ले जाते। जहां कहीं भी सांप निकलता बच्चे से लेकर बड़े हर कोई खुले हाथों से ही दौड़ कर लेने आ जाते। जिस दिन कोई बढ़िया जहरीला सांप उनके पकड़ में आता तो पूरे कबीले में उत्सव सा माहौल हो जाता, सांप पकड़ के आने वाले को बच्चे ऐसे घेर लेते..मानो कोई युध्द भूमि से विजयी होकर लौटा हो।
देवारों का डेरा डंडे और पाल(प्लास्टिक का एक लबादा) से बना होता था। जून-जुलाई के महीने में जब रात में आंधी तूफान और बारिश होती तो अगले दिन बड़े सबेरे जब हम देखने जाते तो वे सभी लोग अपने-अपने डेरे की मरम्मत कर रहे होते। जिस दिन तेज हवा और आंधी होती तो सब तहस-नहस हो जाता, उस दिन उनकी स्थिति को देखकर ऐसा लगता कि बस आज ही सुबह कहीं से ये नये लोग आ पहुंचे हैं जो इस खुली जमीन पर अपना डेरा डाल रहे हैं।
मैं जब कालेज में पहले सेमेस्टर में था तो लगभग साल भर बाद जब अपने घर वापस गया था तो देखा कि सबने मिट्टी का एक एक घर बना लिया है...अब वहां किसी प्रकार के डेरे का नामोनिशान नहीं है। डेरे के सदस्य पहले से थोड़े बेहतर दिखने लगे हैं..लेकिन वही है लड़ाई झगड़ा अभी भी उसी अंदाज में करते हैं। अभी कुछ समय पहले जब मैं घर गया था तो जो मैंने देखा वो विस्मित कर देने वाला था...चार पक्के मकान बन के खड़े हो चुके हैं..जिनके पास अपनी साइकल तक नहीं थी आज उनका अपना घर है और घर के सामने एक सीडी डीलक्स गाड़ी खड़ी है, और तो और नामुरादों ने DTH और टाटा स्काई भी लगवा लिया है। ये एक प्रवृति पूरे भारत भर में आपको देखने मिल जाएगी कि सिनेमा के प्रति इनका गहरा लगाव होता है। जहां देवारों के पास थोड़े पैसे आते हैं वे टीवी उठा ले आते हैं, पेट ठीक से भरा नहीं तो क्या हुआ फिल्मों से मन तो भर जाएगा। आप किसी भी झुग्गी झोपड़ी में जाएं आपको इनके घरों में कुछ मिले न मिले छतरी और टीवी का कनेक्शन जरूर मिल जाएगा।
अब देवारों का अपना अब एक स्थायी निवास स्थल है उन्होंने घर बना के डेरे से मुक्ति पा ली है। आप सोच रहे होंगे कि पक्का मकान है तो अब थोड़े सलीके से तो रहते ही होंगे।
अरे! नहीं जी ऐसा बिल्कुल भी नहीं है वे आज भी मरी हुई मुर्गियों को आग में भूंजकर खा जाते हैं।
Monday, 5 December 2016
~ सोनल ~
कपड़े,गहने और कुछ जरूरी चीजें ये सब बड़ी खरीददारी नोटबदली के पहले ही हो चुकी है। सोनल की शादी को अब कुछ ही दिन रह गए हैं। नोटों में बदलाव के कारण बाजार में पैसे का प्रवाह काफी कम हो चुका है तो इस एक वजह से अभी तैयारी में थोड़ा धीमापन आ गया है।पर सोनल को इन सब से क्या, वो तो सगाई के दिन से ही चिंता में डूबी हुई है।
सोनल जैसी लड़की के लिए किसी और के घर जा के हमेशा के लिए रहना मानो किसी पहाड़ से कम नहीं है भले ही वो पति-पत्नी के रिश्ते की परिपाटी ही क्यों न हो। हर कोई सोनल के हाव-भाव को देखकर उसे समझाते फिर रहे हैं कि शुरूआत में थोड़ा सा रहता है बस,बाद में धीरे-धीरे सब ठीक हो जाता है, बेटा तू इतनी चिंता ना किया कर।
सोनल की मां उसे कहती- देख मेरा भी तो घर बदला है, शुरूआती दिनों में मुझे भी तकलीफ होती थी, मन मानता नहीं था लेकिन समय सब ठीक कर देता है, देख अब ये हमेशा के लिए मेरा घर है।
सोनल रोज अपने भाग्य को कोसती। कोई भी ऐसा नहीं था जो सोनल के मन की गहराई को समझ पाता। उसकी सगाई को आज तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं, शादी कुछ दिनों में होने वाली है, आये दिन शादी को लेकर घर में चर्चा चल रही है, लेकिन सोनल के चेहरे में खुशी का एक भाव नहीं है।
घर वालों,रिश्तेदारों को यही लग रहा है कि लड़की भावुक सी है इसलिए अपना घर छोड़कर जाने में इसे कुछ ज्यादा तकलीफ हो रही है और ये समस्या शायद हर उस लड़की के लिए सामान्य है जिसकी शादी होती है। लेकिन सोनल के साथ ऐसा नहीं है उसकी समस्या आम लड़कियों जैसी है भी नहीं। सोनल इसलिए भी चिंतित है कि उसे कोई समझ ही नहीं पा रहा है।
सोनल के होने वाले पति ग्रेड-2 आफिसर हैं, यानी एक सधी हुई सरकारी नौकरी है, नाम है, पैसा है, रुतबा है। सगाई और शादी के बीच के इन दिनों में कितने बार सोनल की बात अपने होने वाले पति से हुई लेकिन सोनल को अभी तक उस लड़के से विश्वास की एक झलक भी नहीं मिल पाई है, जब जब वो लड़के से बात करती है तो वो भरसक कोशिश करती है कि कहीं से अपनत्व का भाव मिल जाए लेकिन उसके हाथ एक अधिकारी ही लगता है। लड़के ने अभी तक ढंग से कोई बात ही नहीं की, या यूं कहें कि उसे आता ही नहीं कि कैसे रिश्तों को मजबूती प्रदान की जाए। एक अधिकारी की तरह बात करता है, शादी को एक प्रक्रिया समझता है और उसे लगता है कि उसकी नौकरी शायद एक मील का पत्थर है जो एक सुखी जीवन और रिश्तों की मजबूती को यथावत बनाये रखने के लिए पर्याप्त है।लड़के के मनोविज्ञान से ये साफ मालूम होता है कि उसने रिश्ते निभाना सीखा ही नहीं और अभी तक के अपने जीवन में रिश्तों के समीकरणों को समझ पाने में असमर्थ रहा है।
जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, सोनल का मन और भारी होता जा रहा है, चिंता में डूबी लड़की जो अब रात-रात भर जागते रहती है।तरह-तरह के ख्याल उसके चारों ओर मंडराने लगे हैं।कभी-कभी सुधी खो बैठती है और एक नादान बच्चे की तरह खुद से ही बातें करने लग जाती है।
कहती है:-
-> मेरा ही घर बदलेगा न, उनका कुछ नहीं बदलेगा।उनके तो घरवाले उनके पास ही रहेंगे, मेरे मम्मी-पापा मुझसे छीन जायेंगे। मेरे तो मां-बाप ही बदल जा रहे हैं यहां।
-> मेरा ये कमरा मुझसे छीन जायेगा, मेरा ये छत, मेरा ये सब कुछ। मेरे ये सारे कपड़े बेकार हो जायेंगे, इन कपड़ों को; ये सलवार ये जीन्स ये सब मैं अब कैसे पहनूंगी, उन्होंने इतने दिनों से जिस तरह मुझसे बात की है इससे तो यही लगता है कि मेरी बाकी की जिंदगी साड़ी में ही गुजर जाएगी।
-> मुझे अच्छे से पता है, मेरे सारे दोस्त यार भी मुझसे छीन जायेंगे, सब धीरे से खत्म हो जाएगा सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए, आखिर मैं ही कुर्बानी क्यों दूं।
-> एक लड़का जब चिंताओं से घिर जाता है, जिंदगी से उब जाता है तो किसी दूसरे जगह किसी शांत सी पहाड़ी में या किसी दूसरे शहर को चला जाता है अपनी आत्मा को सहेज लेता है या यूं कहें की समस्याओं से कोसों दूर जाता भी है और खुद को इन सब वर्जनाओं से अलग करता है, एक नयी जिंदगी की शुरूआत कर लेता है, लेकिन क्या मैं ऐसा कर सकती हूं?
मेरे लिए तो मानो पग-पग पर एक नया खतरा है, एक लड़की होने के नाते मेरे लिए तो सारे रास्ते ही बंद हैं। मैं तो अब अपने लिए सोच भी नहीं सकती।
-> हां मेरी परिधि अब सीमित है, मेरे साथ अस्तित्व का संकट हो गया है, मेरे अस्तित्व का निर्धारण भी अब मेरे होने वाले जीवनसाथी के हिसाब से तय होना है।
-> सांस लूंगी और जी लूंगी। ये एक जीवन भी ऐसे ही कट जाना लिखा है तो यही सही। अगर ये पति-पत्नी का रिश्ता उनके लिए बस एक मानवीय प्रक्रिया है तो मैं भी इसे इसी तरह मानकर चलती हूं। इतने महीनों से इस रिश्ते को फलित करने की हरसंभव कोशिश तो की है लेकिन सामने वाला व्यक्ति इतना विवेकशून्य है कि अब समझ नहीं आता कि मैं इस रिश्ते की पौध को कैसे सहेजूं, कैसे सवारूं।
-> हर लड़की का एक सपना होता है कि ऐसा लड़का मिले, ऐसा घर मिले वगैरह वगैरह। लेकिन मेरी कभी ऐसी चाह नहीं रही है, कभी किसी से ज्यादा मांगा ही नहीं, ना ही कभी कोई उम्मीद रखी किसी से। फिर मेरे भाग्य में ये परेशानियां क्यों।
-> अभी तक की जिंदगी साधना की तरह बीत गई है भरोसे से कहती हूं कभी किसी के कांधे का बोझ ना बनूंगी।
-> एक सीधा-सादा जीवन चाहिए, थोड़ा सा सामने वाला मुझे समझ ले, मेरी इज्जत कर ले, मैं उसकी इज्जत कर लूं। अब मैं और कितना त्याग करूं।एक शादी के लायक लड़की से अलग कभी तो मुझे वो एक इंसान के रूप में देख लें।औरों की तरह गहने और महंगे कपड़ों का तो मुझे शौक भी नहीं,अपनापन मिल जाए यही जीने के लिए काफी है।
-> अब तो जी चाहता है अपने इस चेहरे की खूबसूरती ही बिगाड़ दूं, किसी धारदार हथियार से इसका नक्श ही बदल दूं।
-> है कोई जो मेरे हालात को समझेगा मुझे कोई रास्ता दिखलायेगा। है कोई जो सब ठीक कर दे, कहीं से कोई राहत दे दे, ये खाली स्थान भर दे। शायद अब सारे रास्ते बंद हैं, इसलिए किसी से अब कोई उम्मीद भी नहीं। ऊपर,नीचे, चारों दिशाओं में खाई है और बीच में मैं हूं।
Saturday, 3 December 2016
~ Obsession ~
तोषी अभी सोकर भी नहीं उठी थी, झगड़े की आवाजें सुनाई देने लगी तो आज उसकी नींद तय समय से पहले ही खुल चुकी है। झगड़े की वजह वही पुरानी थी कपड़ों को लेकर। दरअसल तोषी की मां के साथ एक अजीब सा जुनून है कपड़ों को साफ रखने का, तो उन्हें कहीं भी थोड़े गन्दे कपड़े दिखते हैं वो तुरंत उनको धोकर सुखा देती है।
तोषी का भाई अंशुल आफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था। नहाने के बाद जब उसने कमरे में अपना पेंट खोजा तो उसे अपना कपड़ा मिला नहीं, पता चला कि उसका पेंट छत में सूख रहा है। उस पेंट को पहने हुए तो उसे बस एक ही दिन हुए थे, ज्यादा गंदा भी नहीं हुआ था, ठंड में तो वैसे भी कपड़े ज्यादा गंदे होते नहीं है, कम से कम पेंट को तो रोजाना धोने की जरूरत नहीं है, दो या तीन बार तो पहन ही सकते हैं।
अंशुल नाश्ते की टेबल पर बैठा तो उसने कपड़े धोने की अतिशयता को लेकर मां के सामने जाकर गुस्सा कर दिया कि रोज ऐसे कपड़े धोने की जरूरत क्या थी।
मां ने वही पुराना जवाब दिया- तुम लोग बस मेरे को ही सुनाते हो, तुम ही लोग साफ सफाई से रहोगे, इन्फेक्शन नहीं होगा इसीलिए साफ कर देती हूं।
अंशुल ने कहा- हद होती है किसी चीज की, एक दिन इस पेंट को और पहनूंगा तो कौन सा इन्फेक्शन हो जाएगा।
मां- तुम लोग मेरी बात समझते ही नहीं हो।गंदा है तभी तो धोती हूं।
अंशुल- नहीं यार मम्मी, सुबह से नहा के तैयार हो के इंसान कुछ मिनट के लिए सोचता है कि चलो आज उस कपड़े को पहन के जाऊंगा आप उसी को धोने के लिए डाल देते हो।
मां(मुंह फेरकर)- ठीक है आज के बाद किसी का एक भी कपड़ा नहीं धोऊंगी।
अंशुल(गुस्से में)- यार! सुबह से दिमाग खराब मत किया करो मेरा, बढ़िया अपने मन का कपड़ा भी पहन के नहीं जा सकते आपकी वजह से। हां रहने दो, बिना पूछे मेरा एक भी कपड़ा मत धोना, हद होती है साफ-सफाई की। जब देखो सबको तंग करके रखे हो।
मां कभी अपनी गलती नहीं मानती थी ये सब सुनकर अब वो भी गुस्सा होने लगी, अंशुल और मां के झगड़े के कारण तोषी की नींद टूट चुकी है, अब झगड़ा खत्म होने को है अंशुल अपने आफिस के लिए निकल गया है, और तोषी उठ चुकी है।
तोषी जाकर मां के पास बैठ गयी, उसने मां को बड़े सरल भाव से समझाने की कोशिश की पर मां के अंदर कपड़ों को साफ रखने का जो 'Obsession' है वो कुछ इस तरह गहरे तक हावी है कि उन्हें लगता है कि वही सही हैं। तोषी की एक भी बात का मां पर कोई असर न हुआ। मां के जिद्दीपन को देखते हुए तोषी भी नाराज हो गई, सिर पकड़कर बैठ गई कि मां के इस बर्ताव से आखिर कैसे छुटकारा मिले।
मां जहां कहीं भी थोड़े देर के लिए भी पहने हुए कपड़ों को देख लेती, वहां वो अपनी जिम्मेदारी समझकर किसी से पूछ-परख किए बिना उन कपडों को धो देती। तोषी जब अपने जीन्स और कुछ पसंदीदा कपड़ों को देखती है तो वो भी अपना गुस्सा संभाल नहीं पाती, मां ने बिना बताए कपड़ों को बारंबार धोकर ये हाल कर दिया है कि अब उसके कुछ कपड़े फटने को हैं।
मां के इस जुनूनियत को ऐसे समझें कि जैसे बच्चे या घर का कोई सदस्य जब दिन भर के काम से या बाहर से कहीं घर में प्रवेश करता है तो गेट से घर के अंदर कदम रखने के बीच ही मां उन्हें टोक देती है कि गंदा कपड़ा बिस्तर या कहीं और मत रखना। यानि कि मां के मनोविज्ञान में ये चीज बसी हुई है कि कोई बाहर गया है और अब घर आ रहा है भले समयावधि कितनी भी क्यों न हो लेकिन कपड़े तो गंदे हुए ही हैं। बाहर से आते अपने बच्चों या पति को देखते ही मां का ये एक स्वाभाविक निष्कर्ष उन पर टूट पड़ता है। जो आगे जा के घर के सभी सदस्यों के लिए एक परेशानी का कारण बन जाता है।
और तो और जब घर पर कोई मेहमान आता है तो मेहमान जिस सोफे पर कुछ देर के लिए बैठते हैं मां उस सोफे के कवर को उसी दिन धोने के लिए डाल देती है।
यहां हम बताना चाहते हैं कि मां की इस आदत से छुआछूत या भेदभाव का दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। इस जुनून में जितनी विचित्रता विद्यमान है उससे कहीं ज्यादा अतिशयता भी है, जितना कर्त्तव्यबोध है उतना अहम् भी है।
तोषी की मां एक कर्तव्यपरायण, मनस्वी महिला है जो अपने घर को हमेशा सजा कर रखती है, खूब साफ-सफाई रखती है। सफाई और घर के कुछ काम के लिए कामवाली तो पहले से रखे हुए हैं फिर भी तोषी की मां घर की देखभाल में अपना पूरा दिन बिता देती है।खाली समय में जैसे कहीं बाहर जाना भी है तो बेटी की सहायता लेती है। तोषी की मां ने मोपेड(स्कूटी) चलाने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन सीखने के दौरान कई बार जब वो चोटिल हो गयीं तो उन्होंने स्कूटी चलाने से हाय तौबा कर ली, बार-बार गाड़ी से गिरने के बाद जब उन्हें डर सा हो गया तो फिर उन्होंने कभी सीखने को हाथ नहीं आजमाया। अब उन्हें कुछ काम के लिए बाहर जाना होता तो घर के बाकी लोगों की मदद ले लेती।
चार लोगों के इस हंसीखुशी परिवार में ये एक छोटी सी समस्या कई बार चिंता का विषय बन जाती है। कई बार घर के बाकी तीन सदस्य मां के कपड़े धोने के इस प्रवृत्ति को लेकर हंसी मजाक में कुछ बोलते हैं तो भी मां को कोई खास फर्क नहीं पड़ता वो भी साथ में हंस देती है। कभी शांति से समझाते हैं तो कहने लगती है कि ठीक है अब से कपड़ों को हाथ ना लगाऊंगी, यानि रुष्ट हो जाती है। जब कोई गुस्सा करता है तो बदले में मां भी गुस्सा कर देती है।
सारे उपाय धरे के धरे रह जाते हैं अंत में बच जाता है तो वही मजबूती से टिका हुआ 'Obsession'. और आखिर कोई किसी के obsession को उससे अलग करे भी तो कैसे।
मां को हमेशा ये महसूस होता है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। कुल मिलाकर अंत में हर कोई उनके इस अजीबोगरीब जुनून के सामने परास्त हो जाता है।


