Thursday, 8 March 2018

Directive principles of states policy (DPSP)

भाग-4

अनुच्छेद (36-51)

राज्य के नीति-निदेशक तत्व


संवैधानिक दर्जा :-
- यह आयरलैण्ड के संविधान से लिए गए हैं।
- अंबेडकर जी ने इन तत्वों को विशेषता वाला बताया है।
- विशिष्ट निर्देश हैं जिनका स्वरूप सिध्दान्त और आदर्श जैसा है।
- यह राज्य के द्वारा शासन में मार्गदर्शी सिध्दान्त के रूप में है।
- ये राज्य के शासन में मौलिक हैं।
- इसमें राज्य का वही अर्थ बताया गया है जो मौलिक अधिकारों के लिए प्रयुक्त है, अर्थात् 'राज्य' में केन्द्र एवं राज्य सरकारों के अलावा स्थानीय प्राधिकारी भी शामिल हैं। (अनुच्छेद-36)
- नीति-निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। (अनुच्छेद-37)

विशेषता:-
- राज्य नीतियों और कानूनों को प्रभावी बनाते समय इन तत्वों को ध्यान में रखेगा।
- नीति-निदेशक तत्व भारत शासन अधिनियम 1935 में उल्लिखित अनुदेशों के शासन हैं। ये अनुदेश ही निदेशक तत्व हैं।
- नीति-निदेशक तत्व के उद्देश्य न्याय में उच्च आदर्श, स्वतंत्रता और समानता को बनाये रखना है अर्थात् लोक कल्याणकारी राज्य का निर्माण है।
- नीति-निदेशक तत्व की प्रकृति गैर न्यायिक है अर्थात् न्यायालय द्वारा इन्हें लागू नहीं किया जा सकता।
- विधि की संवैधानिकता के अंतर्गत न्यायालय इनको देख सकता है।
श्रेणियां :-
नीति-निदेशक तत्व पर गांधीजी, अंबेडकर, नेहरू और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के विचारों का प्रभाव दृष्टव्य है।

नीति-निदेशक तत्वों की तीन व्यापक श्रेणियां हैं-
1/ समाजवादी सिद्धांत :-
लक्ष्य सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करना।

अनुच्छेद- 38
लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय द्वारा सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करना।

अनुच्छेद- 39
राज्य अपनी नीतियां इस प्रकार संचालित करेगा कि -
a)सभी नागरिकों (पुरुष और स्त्री) को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों।
b)सामूहिक हित के लिए भौतिक संसाधनों का समान वितरण।
c)धन और उत्पादन के साधनों का केन्द्रीकरण ना हो।
d)पुरुष और स्त्रियों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन।
e)पुरुष और स्त्री कर्मकारों के स्वास्थ्य और बच्चों के सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग ना हो।
f)बालकों को स्वास्थ्य विकास के अवसर।
g)अनुच्छेद-39 अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि उच्चतम न्यायालय का निर्णय है कि मूल अधिकारों के निर्वहन में इस अनुच्छेद की सहायता ली जा सकती है।
h)अनुच्छेद 39-A 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा जोड़ा गया। {समान न्याय और निशुल्क विधिक सहायता}।

अनुच्छेद- 41
काम पाने की, शिक्षा पाने की, बेगारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता की दशाओं में लोक सहायता पाने का अधिकार।

अनुच्छेद- 42
कार्य की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं तथा प्रसूति सहायता प्राप्त करने का उपबंध।

अनुच्छेद- 43
कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी, अच्छा जीवन स्तर तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्रदान करना।
अनुच्छेद- 43(a)
उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

अनुच्छेद- 47
पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करना तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करना।

2/ गांधीवादी सिध्दान्त :-
ये सिद्धांत राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान गांधीजी के द्वारा स्थापित योजनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

अनुच्छेद- 40
ग्राम पंचायतों का गठन और इन्हें आवश्यक शक्तियां प्रदान कर स्वशासन की ईकाई के रूप में कार्य करने की शक्ति देना।

अनुच्छेद- 43
ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों, व्यक्तिगत या सहकारिता के आधार पर इनका विकास करना।

अनुच्छेद- 46
अनुसूचित जातियाँ, जनजातियां और अन्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा, आर्थिक हित की वृध्दि शोषण से रक्षा का प्रयास करना।

अनुच्छेद- 47
पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार का प्रयास करना और मादक पेय और हानिकारक औषधियों के औषधीय प्रयोजन को छोड़कर अन्य प्रयोगों पर प्रतिबंध लगाना।

अनुच्छेद- 48
कृषि एवं पशुपालन की वैज्ञानिक प्रणालियों का विकास, दुधारू पशुओं की नस्ल में सुधार और गौ-वध का प्रतिषेध करना।
अनुच्छेद- 48(a)
पर्यावरण का संरक्षण, उसका संवर्धन और उसकी रक्षा।

उदार बौध्दिक सिद्धांत :-
उदारवादी विचारधारा से प्रेरित विचार जो राज्य को निर्देशित किए गए हैं-

•अनुच्छेद 44 - एकसमान नागरिक संहिता।
भारत में सिर्फ गोवा राज्य में लागू है।

•अनुच्छेद 45 - सभी बच्चों को 14 वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना।
(76वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के द्वारा आयु के प्रावधान को बदला)

•अनुच्छेद 48 कृषि और पशुपालन की आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों का विकास।
•अनुच्छेद 48(a) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1972 (42वें संविधान संशोधन के द्वारा)

•अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्व वाले विषयों, घोषित कलात्मक और ऐतिहासिक स्मारकों, स्थान और वस्तुओं का संरक्षण करना।

•अनुच्छेद 50 राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना।

•अनुच्छेद 51 अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मान के संबंधों को बनाये रखना।
            अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाना तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थ द्वारा निपटाने को प्रोत्साहन करना।




नीति-निदेशक तत्वों का महत्व :-
1)जन शिक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।ये सिध्दान्त राज्य के उद्देश्यों और लक्ष्यों की जानकारी देते हैं अर्थात् यह स्पष्ट होता है कि राज्य एक लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए कृत संकल्पित है।
2)इन सिध्दान्तों के पीछे जनमत की शक्ति होती है अतः इस एक कारण कोई भी सरकार इनकी अवहेलना नहीं कर सकती।
3)नीति-निदेशक तत्वों का महत्व इस बात में है कि ये नागरिकों के प्रति सकारात्मक उत्तरदायित्व है।
4)राजनीतिक अस्थिरता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
5)संविधान की व्याख्या में सहायक।
संविधान के अनुसार नीति-निदेशक तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं अर्थात् देश के प्रशासन में उत्तरदायी सभी सत्ताएं नीति-निदेशक तत्वों द्वारा ही निर्देशित होंगी।
6)न्यायलयों के लिए मार्गदर्शक का कार्य या मार्गदर्शी आदर्श के रूप में हैं।
7)शासन के मूल्यांकन का आधार हैं।
8)कार्यपालिका पर अंकुश लगाती है।

Tuesday, 6 March 2018

पानी का खेल

                              आज एक रेस्टोरेंट जाकर समझ आया कि पानी भी कई तरह के होते हैं जैसे कि नार्मल वाटर, चिल्ड वाटर और रेगुलर वाटर। तो जैसे आप किसी भी रेस्टोरेंट में जाइएगा तो आपको इसी क्रम में पानी के लिए पूछा जाता है और आखिरकार आपकी टेबल में एक प्लास्टिक वाली पानी की बोतल होती है वो ऐसे कि नार्मल वाटर और चिल्ड वाटर का अर्थ है बोतल बंद पानी और रेगुलर वाटर माने जग का पानी। पूछने वाला भी मानवीय मनोविज्ञान को उलझाने की इस प्रक्रिया में नार्मल वाटर और चिल्ड वाटर को पहले बोलता है क्योंकि वो तो यही चाहता है कि आपकी टेबल पर एक बीस रुपए वाली पानी की बोतल ही हो। हम भी सोचते हैं यार कि चलो कभी कभार तो बाहर खाना खाने आते हैं क्या दस बीस के लिए सोचना, आने दो पानी बोतल। और जब हम इस खेल में उलझे बिना थोड़ा सोच लेते हैं और रेगुलर वाटर यानी जग वाले पानी को चुनते हैं जो कि RO का ही स्वच्छ पानी होता है तो खाना परोसने वाले के मनसूबों पर मानो पानी फिर जाता है, उनका मिजाज ही बदल जाता है। वो इतनी सी बात के लिए हमें कुछ इस निगाह से देखने लगते हैं मानो हम इस दुनिया के सबसे बड़े कइयां हैं। उनका खाना परोसने का अंदाज ही बदल जाता है, गिलास में पानी खत्म हुआ देखकर भी पानी देर से लाना ताकि हम बोतल मंगवा लें,,खैर कितना लिखा जाए...
इन रेस्टोरेंट वालों को एक बात दिमाग में बिठा लेनी चाहिए कि चाहे वे अपने कामगारों को ये कितना भी क्रीम पाउडर लगवा लें, ब्लेजर पहनवा के तैयार कर लें, कितना भी थैंक्यू, प्लीज, सर, वेलकम वगैरह रटवा लें या ऐसे नाना प्रकार के घटिया मैनेजमेंट के गुर सिखाएं,हम जैसे देशी घुमक्कड़ जो बिना बोतल वाले पानी के सहारे आधा भारत नाप लेते हों, ऐसे लोगों को आप पानी की बोतलें नहीं टिका सकते, आपको हमारे आत्मबल का सम्मान करना ही चाहिए।

मैंने तो बचपन से यही सीखा है कि जहाँ आपको कोई प्रेम से खाना खिला रहा है तो खाना कैसा भी हो चलता है। लेकिन यहाँ तो पानी के नाम पर ही इतनी बेरूखी। वैसे बीस रुपए का पानी बोतल. लेने में कोई समस्या नहीं, समस्या तो सौ रुपए वाले थाली में भी नहीं न ही सौ रुपए के बिरयानी प्लेट में, बात सिर्फ और सिर्फ हमारे च्वाइस की है और हमारे उस च्वाइस के यथासंभव सम्मान की है। और जहाँ पैसे देकर भी हमारे च्वाइस का ऐसा अपमान हो वहाँ दुबारा जाने में अगर हमें घुटन न होती हो तो वाकई ये सचमुच हमारे इंसान होने पर एक प्रश्न चिन्ह की तरह है।

Tuesday, 13 February 2018

~ कोल्डड्रिंक और कोलेस्ट्राल ~

                                  90% भारतीय ना‌नवेज खाने के साथ कोल्डड्रिंक पीते हैं। मानसिकता बनी हुई है कि खाना अच्छा से पचेगा, गैस नहीं बनेगा वगैरह वगैरह, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता, सिर्फ और सिर्फ कोलेस्ट्राल बढ़ता है।
आज का समय ऐसा है कि यूथ में अधिकतर लोग नानवेज पसंद करते हैं, नानवेज की उपलब्धता और इसका ट्रेंड भी ऐसा है कि कई लोग सप्ताह में तीन से चार दिन नानवेज ही खाते हैं।
                                 वैसे भी प्रतिदिन बाहर का कुछ खाना खाने वालों की संख्या में इतना जबरदस्त इजाफा हुआ है कि जो नानवेज नहीं खाते उनमें से भी अधिकांश लोग वेज फूड के नाम पर चायनिज, सैंडविच, पिज्जा, बर्गर आदि खाते हैं और इसमें भी वे कोल्डड्रिंक, साफ्टड्रिंक, कोल्ड काॅफी का कोम्बो घुसेड़ देते हैं। जबकि इसमें भी ठीक वैसा ही नुकसान होता है जैसे कोल्डड्रिंक और नानवेज साथ में लेने से होता है।
देखा जाए तो अभी के समय में 15-25 आयु वर्ग के अधिकतर युवाओं के मोटापे की एक बड़ी वजह यही है।

Monday, 5 February 2018

- The Munsyari Song ~

                            पहाड़ों की सबसे खास बात जो है वो ये कि अधिकतर पहाड़ी गांवों एवं शहरों के नाम पर बहुत से गाने बने हुए हैं जो उस शहर या गांव का प्रतिबिम्ब होते हैं। इन गानों की एक और अच्छी बात ये है कि आपको थोड़ा भी फूहड़पन देखने को नहीं मिलेगा। यूं कहें कि अगर आप पहाड़ आए और आपने पहाड़ी गाने नहीं सुने तो समझिए आपका पहाड़ आना व्यर्थ ही हुआ, बस आए और चले गए वाली बात होगी बल।
                           हिमनगरी मुनस्यारी के नाम पर तो दर्जनों गाने बने हैं लेकिन ये एक गाना ऐसा है कि मुनस्यारी में जब भी कहीं शादी या कोई उत्सव होता है तो ये गाना बजता ही है, इस कुमाउंनी गाने की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें मुनस्यारी की सड़कें, पेड़-पौधे, रंग-बिरंगे फूल, हरे-भरे बुग्याल, झरने, नदियाँ, सुंदर खेत, पत्थरों से बने मंदिर, घरों की वास्तुकला, और यहां के त्यौहार, यहां का खान-पान, रहन-सहन, रीति-रिवाज और और सामने महान हिमालय,
इस गाने में मुनस्यारी की पूरी संस्कृति समाहित है।



Saturday, 3 February 2018

~ छोटे भाई की इंटरनेट सक्रियता ~

                           कल मैं तीन साल बाद अपने एक छोटे भाई से मिला। वो 11th क्लास में है। क्लास 1 से लगातार टापर रहा है। स्पोर्ट्स और कल्चरल एक्टिविटी में भी बढ़िया। अभी वो एक अच्छे इंग्लिश स्कूल में पढ़ता है, इंग्लिश स्कूल में पढ़ने के बावजूद हिन्दी में भी गजब की पकड़ है। कल जब मैं उससे मिला तो वो कोई साउथ इंडियन मूवी देख रहा था, मैंने पहले उसका हालचाल पूछा और फिर वही पढ़ाई कैसी चल रही है जैसे एक दो सवाल। फिर कुछ सेकेंड के लिए मैं सोचने लग गया कि अपने से दस साल छोटे भाई से अब मैं क्या बात करूं। मेरी इस उलझन को उसी ने दूर कर दिया, उसने मूवी देखना बंद कर दिया और फिर उसने मुझसे पूछा कि भैया आपने पद्मावत मूवी देखी क्या?

मैंने कहा - नहीं मैं controversial मूवीज कभी नहीं देखता।
फिर उसने मुस्कुराते हुए पूछा - भैया आपने इस पर भी कुछ लिखा है क्या?

छोटे भाई के इस सवाल को सुनकर मैं हैरान रह गया। हैरानी इसलिए भी है कि कुछ निजी कारणों से फेसबुक में मैंने अपने लगभग सभी रिश्तेदारों को या तो ब्लाक करके रखा है या अनफ्रेंड करके रखा है।
मैंने कभी सोचा ही नहीं कि मेरा छोटा भाई ऐसे चोरी छिपे मेरी लिखी दो चार बातें बिना मुझे फ्रेंड रिक्वैस्ट भेजे पढ़ लेता है और मुझे पता भी नहीं चलने देता। कितना सुखद है ये।
मुझे अभी तक यही लगता था कि जब मेरे अपनी उम्र के अधिकतर दोस्त मेरी लिखी कुछ बातें ऐसे हव्वे में लेते हैं तो एक स्कूल का बच्चा कहाँ से ये देश दुनिया की बातें पढ़ेगा।असंभव सा है।
लेकिन वो पढ़ता है। वो चीजों को समझने का प्रयास करता है कि आखिर नुक्ता क्या है, पेंच कहाँ फंसा है।
फेसबुक की एक चीज तो गजब है, वो ये कि आप दो चार लाइन भी कुछ अच्छा लिखते हैं, ईमानदारी और मेहनत से लिखते हैं, बिना किसी पूर्वाग्रह के लिखते हैं और सबसे जरूरी चीज कि क्लिष्ट शब्दों से बचते हुए सरल भाषा में लिखते हैं तो हर कोई पढ़ता है।
इंटरनेट की इस दुनिया में हमारी एक एक गतिविधि बहुत मायने रखती है। देखा जाए तो आने वाली पीढ़ी हमारी एक-एक गतिविधि पर नजर रख रही है, वो हमें देख रही है, हमसे सीख रही है, हमारे सही और गलत का बराबर मूल्यांकन कर रही है। कल जाकर जब उनके बातों में वजन होगा, जब वे बोलकर हमें सुनने को विवश करेंगे तो वे हमें चैलेंज भी करेंगे कि बस भी करिए इतना रायता मत फैलाइए, बहुत हुआ।
वैसे इतनी बड़ी बात कहने के पीछे एक वजह है।

जब अपने भाई से मेरी बात हो रही थी तो मैंने ऐसे ही उसे बताया कि तुझे पता है दुनिया का जो दूसरा सबसे अमीर आदमी है न वो 1400 वर्ड्स/मिनट पढ़ लेता है।
उसने कहा - अच्छा वारेन बफेट।
फिर उसने मुझसे ही सवाल कर लिया कि वारेन बफेट और बिल गेट्स का इंटरव्यू देखा है क्या आपने?
मैंने कहा - नहीं। वैसे क्या है उसमें? अमीर बनने के टिप्स दिए हैं क्या उन्होंने?
उसने बताया - नहीं, वे अपनी सारी संपत्ति को अपने ट्रस्ट में देने जा रहे हैं। इस बारे में है।
बताइए एक 11th क्लास का बच्चा इंटरनेट में ये सब देखता है।
सोचिए एक 11th क्लास का स्टूडेंट जब इंटरनेट का इस्तेमाल करता है तब वो क्या खोजता होगा, आप और हम क्या वहां तक सोच सकते हैं?
चलिए इस बात को एक दूसरे तरीके से लेते हैं एक 11th क्लास के बच्चे को आप इंटरनेट में क्या खोजने को कहेंगे या इंटरनेट से क्या कुछ सीखने को प्रेरित करेंगे?
"वेल! एक्चुवली वी डोंट इवन नो हाऊ टू यूस दि ब्लडी इंटरनेट"

मेरे छोटे भाई के पास उसका अपना स्मार्टफोन है, अनलिमिटेड नेट है, लेकिन वो उस 4G फोन को अपने पैरों की धूल समझता है, ध्यान ही नहीं देता। दोस्तों के साथ कहीं खेलने जाता है, घूमने जाता है या उनके घर पढ़ने जाता है तो उसका फोन घर में ही पड़ा रहता है।
अब अपने छोटे भाई के बारे में मेरे मन में जो थोड़ी बहुत शंका थी वो भी दूर हो गई, चूंकि मेरे पास अपना 4g फोन नहीं है (वैसे कभी जरूरत भी महसूस नहीं हुई) तो मैं उसके फोन में यूट्यूब में ऐसे ही कुछ सर्च कर रहा था कि मेरी नजर Search History पर पड़ी, उसमें education, cricket, football और कुछ एक keywords थे, लेकिन कोई भी फालतू या भड़कीली चीज देखने को नहीं मिली।
सचमुच हमें इन बच्चों से सीखना चाहिए। हम सबको अपने अपने फोन के Search history में जाकर देखना चाहिए कि क्या सच में हम इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं या इंटरनेट हमारा इस्तेमाल करता है।

छोटे भाई!
मुझे तुम पर गर्व है और मुझे उम्मीद है कि कभी न कभी तुम मुझे सर्च करके मेरी लिखी ये बातें जरूर पढ़ रहे होगे।
मंगलकामनाओं के साथ...
- तुम्हारा बड़ा भाई।

Friday, 19 January 2018

रफ कॅापी Part - 5

अनिरुद्ध - कैसी हो तुम?
शालिनी - ठीक हूं आप कैसे हो?

अनिरुद्ध - मैं भी बढ़िया।
शालिनी - एक बात बोलनी थी, बोल लूं?
अनिरुद्ध - हां।
शालिनी - आप थोड़ी कुछ दुआ कर दो प्लीज! मेरे लिए।
अनिरुद्ध - ठीक है लेकिन किसलिए।
शालिनी - बस कर दो मेरे अच्छे के लिए, ऐसा सोचकर।
अनिरुद्ध - अच्छा जी। कर दूंगा। पर मैं ही क्यों?
शालिनी - देखो दुनिया में दो ही चीजें होती हैं एक सही और दूसरा गलत। मैं सही हूं, सही की जरूरत महसूस हुई है और मुझे आप सही लगते हैं इसलिए कह रही हूं। आप कर दोगे ना?
अनिरुद्ध - हां जी पक्का। अच्छा मिंजो एक बात बतानी थी।
शालिनी - बताओ।
अनिरुद्ध - मुझे तुम्हारे गाँव का सपना आया था, मम्मी और बड़का जी साथ थे, चौमास लगा हुआ था, मौसम काफी बिगड़ रखा था, हम शायद पूजा के लिए तुम्हारे गाँव जा रहे थे। मैंने जाने को मना किया तो बड़का जी ने जिद करके मुझे अपने साथ ले लिया।
शालिनी - चल झूठ्ठे। आपको जरूर किसी ने बताया होगा हमारे गाँव के पूजा के बारे में, अभी सप्ताह भर पहले हुई थी पूजा।
अनिरुद्ध - सच कहता हूं, सपने में आया गाँव। मुझे क्या मस्ती चढ़ी है कि तुम्हारी मम्मी के साथ पहाड़ चढूं। हद है।
शालिनी - हां तो अच्छी बात है। अगली बार यहां आओ तो मम्मी जी के साथ चले ही जाना गाँव। रास्ते भर भूत और देवी-देवताओं की पूजा की कहानियां सुनाएंगी। हेहे।
अनिरुद्ध - अच्छा ये बताओ इस बार रोहड़ू के मेले में जाना हो रहा कि नहीं?
शालिनी - मैं नहीं जाऊंगी इस बार। पिछली बार बहुत भीड़ हो रखी थी। मुझे ठीक नहीं लगता अब जाना।
अनिरुद्ध - मैं जाने की सोच रहा था। कुछ यहां दिल्ली के दोस्त भी जाने का मन बना रहे थे उन्होंने कभी देखा नहीं है वहां का मेला, शायद उन्हीं के साथ आऊंगा।
शालिनी - तो घर नहीं आओगे?
अनिरुद्ध - पता नहीं।
शालिनी - मुझे मिलना था।
अनिरुद्ध - क्यों?
शालिनी - बस एक बार मिलना है। बहुत कुछ बातें बतानी है। जो इतने लंबे समय से छुपी हुई हैं।
अनिरुद्ध - जो शालिनी पिछले छ: महीनों से मेरा फोन तक नहीं उठाती थी उसे अब मुझसे क्यों मिलना है।
शालिनी - उस समय चीजें अलग थी। अभी हालात बदल गये हैं। मिलकर ही सब बता पाउंगी। अभी ऐसे फोन पर कहूंगी तो आप संभाल नहीं पाएंगे। इसलिए खुद को रोकती हूं।
अनिरुद्ध - पर ऐसा क्या है बोल भी दो। कुछ तो बताओ।
शालिनी - अभी नहीं। आप रोहड़ू के मेले से रिकांग पियो लौट आना न। फिर बताऊंगी।
अनिरुद्ध - ठीक है मैं देखता हूं, कोशिश करूंगा कि इस बार ज्यादा छुट्टियां मिल जाए।
शालिनी - तो, आप आ रहे हैं।
अनिरुद्ध - हां, मैं आ रहा हूं।
शालिनी - मिलेंगे, मिलेंगे।
अनिरुद्ध - मिलेंगे, मिलेंगे।
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To be continued..

Monday, 8 January 2018

~ भारतीय समाज में आरक्षण ~

                          आरक्षण के बारे में बहुत बातचीत चलती रहती है, कोई आरक्षण का विरोध करता है, कोई आरक्षण का समर्थन करता है। आरक्षण की बात को सामाजिक न्याय से बिना जोड़े प्रस्तुत करना आज एक फैशन हो गया है। भारतीय समाज में आरक्षण क्यों अत्यधिक आवश्यक है इस बारे में जनमानस को कोई समझ नहीं रही न ही जागरूकता फैलाई गई और संविधान में झटके भर में आरक्षण प्रस्तुत कर दिया गया और वो जरूरी भी था। यदि ऐसा नहीं किया गया होता तो आजतक आरक्षण होता ही नहीं, स्थितियां और अधिक भयावह होती, बहुत ज्यादा दर्दनाक होती, बहुत नारकीय स्थिति में करोड़ों लोग जी रहे होते।

भारतीय समाज में आरक्षण दो प्रकार का है- पहला सामाजिक आरक्षण और दूसरा संवैधानिक आरक्षण।
संवैधानिक आरक्षण का संबंध सरकारी नौकरियों से हैं। क्योंकि सरकारी नौकरियों का संबंध पैसे से होता है, बाजार से चीजें खरीदकर उपयोग करने से होता है, उपभोग करने से होता है, शक्ति का होता है। सरकारी नौकरियों में वैसे भी बहुत ताकत होती है, समाज में परिवर्तन लायक शक्ति होती है तो इस वजह से संवैधानिक आरक्षण का विरोध बहुत ज्यादा होता है। क्योंकि जिन वर्गों के हाथ में लगातार भारतीय समाज का सारा कुछ नियंत्रित रहा है उनको अजीब लगता है या हजम नहीं होता है कि जो उनसे दबे कुचले लोग रहे हैं या जो उनके आगे हाथ जोड़ के खड़े रहे हैं। वे उनसे तालमेल नहीं बिठा पाते हैं क्योंकि सामाजिक न्याय के प्रति समझ नहीं होती। सामाजिक समता नाम की कोई वस्तु होती है या मूल्य होता है इसका पता नहीं होता।
संवैधानिक आरक्षण का संबंध आर्थिक विकास से नहीं है, सामाजिक समता व सामाजिक न्याय से है और बिना आर्थिक विकास के सामाजिक समता और सामाजिक न्याय संभव नहीं है ये भी उसका एक प्रमुख कारक है।
अब जब भी सामाजिक आरक्षण का विरोध किया जाता है तो कैसे किया जाता है, अयोग्यता,कुशलता इन सब चीजों पर किया जाता है।
हमारे भारत के विश्वविद्यालयों में बीए, बीटेक, मास्टर्स या पीएचडी आदि में वर्ष या सेमेस्टर की परीक्षा होती है। उसमें माडल/गेस पेपर मिल जाता है और पास हो जाते हैं और फिर कुछ किताबें तटकर सरकारी नौकरी हासिल कर लेते हैं। अधिकांश जगह तो पेपर लीक हो जाता है या किसी प्रोफेसर से सेटिंग हो तो सवाल मिल जाते हैं ये व्यवहारिक बात है इसमें बुरा मानने लायक कुछ भी नहीं। ये मैं कह रहा हूं, बहुत लोग नहीं कह पाते क्योंकि इससे उन्हीं की योग्यता पर सवाल खड़ा हो सकता है, आखिर कैसे स्वीकारेंगे, भले ही अच्छे परसेंट से पास हुए होंगे, प्रोफेसर बने होंगे या किसी सरकारी नौकरी में होंगे, बढ़िया गाड़ी, नौकर होंगे, लेकिन विषय के बारे में जानकारी नहीं है। अब चूंकि पद पर हैं तो ये मान लिया जाता है कि आपको सब आता है, नहीं भी पता होगा तो कौन कहेगा कि आपको नहीं आता। आप कैसे साबित करेंगे कि इनको नहीं आता है। नहीं आता होता तो भला नौकरी कैसे कर रहे होते।
तो हमें आज नहीं तो कल इन सब से बाहर आना ही होगा। हमें सवाल करना होगा कि वास्तव में हमारे जो ढांचे कसौटियाँ हैं वे योग्यता का मापन करती हैं या नहीं करती हैं। हमें इसे समझना पड़ेगा, देखना पड़ेगा वो भी पूरी कठोरता के साथ, अगर हम समाज को तोड़ना नहीं चाहते और यदि हम वास्तव में संवेदनशील हैं।
आज की परीक्षा का हाल यह है कि 10, 20% पढ़कर ही सौ प्रतिशत अंक प्राप्त किया जा सकता है।
हमारे इंजीनियरिंग को ही लीजिए, पेपर के दो दिन पहले किताब रटिए और अच्छे नंबर से पास हो जाइए। रटना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि परंपरा में हो विद्वान वर्ग माना गया वो ब्राम्हण माना गया। अब ब्राह्मण की योग्यता क्या रही? अब ध्यान से देखें, ऐसा भी नहीं है कि भारत के सारे ब्राह्मणों, उनके बच्चों को विज्ञान की बातें, यांत्रिकी या शोध सिखाया जाता था, ऐसा कुछ भी नहीं था। यानि जो सामान्य ब्राम्हण है जो अधिकतर ब्राह्मण है वो क्या करता है पोथी रटता है, कोई किसी माता या देवी-देवता की पोथी रट लेगा। पोथी यानि कहानियां या मंत्र। और अधिकतर पुरोहितों को तो मंत्र उच्चारण भी नहीं आता। इनको मंत्र पता ही नहीं रहता, बस कह जाते हैं और अगर सामने वाला कोई अन्य दूसरी जाति का अधिक विद्वान है और ब्राह्मण नहीं है तो उसे विद्वान नहीं माना जाता। ये कैसे योग्यता रही है, ये कैसी कुशलता रही है। एक छोटा बच्चा ब्राह्मण का है, दो महीने का है और एक ओर एक योग्य विद्वान दलित प्रोफेसर है वो उसके पैर छुएगा, आशीर्वाद लेगा, क्योंकि ये मान लिया जाता है कि बच्चा योग्य है। अब जब योग्यता की बात हो रही है तो योग्यता के मानदंडों की भी बात करनी पड़ेगी। रटने को हम योग्यता की कसौटी कैसे मान सकते हैं।

दूसरी बात ये कि दलित हजारों वर्षों से दास की तरह गुलाम की तरह रखा गया। किसी भी गाँव में जो सबसे सढ़ी, बदबूदार जगह होगी जहाँ आप और हम चल नहीं सकते हैं, उल्टी हो जाएगी। वैसे जगहों पर वे रहते आए हैं, हजारों सालों तक लगातार दबाए गए हैं।
सोचिए, मैं तो सोचता हूं उनके जीन्स में कितना परिवर्तन आ गया होगा। आज अचानक आप उनसे कहते हैं कि आइए हमसे भिड़िए, आज आप हमसे ज्यादा याद कर ले रहे हैं क्या? ज्यादा रट ले रहे हैं क्या?
कल्पना करिए इस चीज की। हम उपहास उड़ाते हैं उनका। स्थिति तो ये है कि जो आरक्षित वर्ग का व्यक्ति है वो अपने आप को योग्य साबित करने के लिए आरक्षण का विरोध करता है। वो किसी तरह से यह सिद्ध करना चाहता है कि मैं योग्य हूं, उसका अपना आत्मसम्मान कुचलता हुआ महसूस होता है क्योंकि न आरक्षित वर्ग समझता है कि आरक्षण का मतलब क्या है और न ही आरक्षण का विरोध करने वाला समझता है कि सामाजिक न्याय क्या है।
समता की बात कोई नहीं करता है, कोई शोषण की बात नहीं करता है, मन को कोई समझता ही नहीं है और मनोविज्ञान पर पीएचडी कर बैठे हैं। भई मनोविज्ञान पर ये भी तो समझें आप कि हजारों वर्षों से परंपरागत तरीके से लगातार जिनको दबाया गया हो, जिनको सुनने तक का अधिकार न हो।
कोई श्लोक सुन रहा है तो कानों में पिघला सीसा डाल दिया, किसी बच्चे ने श्लोक बोला तो जीभ काट ली। इतना बुरी तरह से दबाया गया हो शिक्षा को, अगर इसे भी शिक्षा कहा जाए तो, अगर पोथी रटना भी योग्यता कहा जाए, क्योंकि यही योग्यता रही है। शास्त्रार्थ होते रहे हैं दो लोगों में तो कैसे कि किसने कितना पोथी रट लिया है।
अभी जो तकनीकी संस्थान हैं, उनकी पढ़ाई का स्तर ऐसा ही है, किसने कितनी किताबें रट ली और परीक्षा में नंबर हासिल कर लिया। यही कारण है कि भारत में इतने तकनीकी संस्थान होने के बावजूद अगर हम विकसित देशों की नकल ना करें, चोरी या खरीद करके ना लाएं तो हम कहीं नहीं ठहरते। इसका अर्थ यह नहीं है कि हममें आप में बुध्दि, क्षमता नहीं है। नहीं ऐसा नहीं है। बचपन से हमारी जो ट्रेनिंग है शिक्षा के नाम पर वो याद करना, रटना और परीक्षा में उत्तर लिखकर अंक लाना इसी पर निर्भर करता है, जो ये कर लेता है वो एम्स, आईआईटी पहुंच गया।
अब इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई अयोग्य अंदर और योग्य बाहर रह गया। वो तो छंटनी के तौर तरीके हैं। बहुत ऐसे बच्चे हैं जिनको अगर आईआईटी में चार साल पढ़ने का मौका मिल जाए तो वो जो पढ़ रहे हैं आईआईटी के अंदर उनसे कई गुना बेहतर परफार्मेंस दे सकते हैं, ये योग्यता है, अरे ये तो चांस की बात है। प्रवेश परीक्षाओं का आधार केवल रटने पर है, रटना योग्यता नहीं होती है, क्षमता हो सकती है, आपके मस्तिष्क के ऊपर है। और दूसरा ये भी है कि आप सुविधापूर्ण तनावमुक्त माहौल में रहे हैं तो आप चीजें जल्दी याद कर लेते हैं। अब दलित का बच्चा छोटे से ही अपमान झेलता है, संस्थानों में पढ़ते हुए अपमान खेलता है,नौकरी करते हुए अपमान खेलता है, सेवा में रहते हुए भी अपमान खेलता है, सेवानिवृत्ति तक अपमान खेलता है। तो इन सब चीजों को हमें मिला जुला के देखना पड़ेगा तब हमें समझ में आएगा सामाजिक आरक्षण बनाम संवैधानिक आरक्षण।
सामाजिक आरक्षण वो है कि ब्राह्मण के बेटे को आपने योग्य, विद्वान मान लिया, क्षत्रिय के बेटे को आपने बहादुर मान लिया भले डरपोक हो, ब्राह्मण का बच्चा भले मानसिक विकलांग हो लेकिन फिर भी उसे योग्य माना जाता है क्योंकि ब्राह्मण की संतान है। ऐसे ही क्षत्रिय का बच्चा, वैश्य का बच्चा, व्यापारी का बच्चा। व्यापारी का बच्चा व्यापार में कुशल मान लिया जाता है, कोई नहीं होता एक्सपर्ट। बहुत लोग कहते हैं न कि व्यापारी का बच्चा व्यापार जानता है, कुछ नहीं जानता। वो बच्चा जो पैदा होने से घर में सब देखता है, वो अपने से सीखता जाता है। अब व्यापार के नाम पर होता क्या है, झूठ बोलता है, धोखा देता है, तीन का पांच करता है आदि। इसी प्रकार का ही व्यापार ही तो बहुत से बच्चे सीखते हैं ना, वो कौन से मैनजमेंट के एकदम एक्सपर्ट हो जाते हैं। और उन्हें तो पिता का बना बनाया ढांचा मिल जाता है और अगर पिता से ज्यादा कमाए तो ज्यादा योग्य मान लिया जाता है। ऐसा ही परंपरा में चलता रहता है, तरीका वही सोच वही होती है, रटना वही होता है। अब फर्क ये है कि व्यापारी के यहाँ पैदा हुआ तो कम परिश्रम में अधिक कमाई हुई तो ये कहा जाता है कि योग्य है क्योंकि ढांचा ऐसा है। अब बढ़ई, लुहार इनको ले लिया जाए, वे ज्यादा योग्य, कुशल, परिश्रमी और तकनीकी विशेषज्ञ होते हैं लेकिन चूंकि उनके ऊपर ढांचे के कारण बहुत ज्यादा लाभ कमाने का नुक्ता मौजूद नहीं होता है।
भारतीय समाज में परिश्रम करने वालों को यदि उनके परिश्रम के मुताबिक मुनाफा कमाने का ढांचा दे दिया जाए तो जाति व्यवस्था ढह जाएगी, शोषण ढह जाएगा, सारी चीजें उथल-पुथल हो जाएगी, उथल-पुथल का मतलब चीजें व्यवस्था की ओर बढ़ेगी। लेकिन ऐसा कौन चाहता है, बनी-बनाई संपत्तियां हैं, परंपरा में आदमी भोग कर रहा है, वो क्यों चाहेगा कि कोई बदलाव हो, नहीं चाहेगा, बिल्कुल नहीं चाहेगा।
तो आरक्षण के विरोध के पीछे ये भोग करने की, विरोध करने की मानसिकता है, और ये योग्यता वगैरह मुद्दे छेड़ दिए जाते हैं ताकि ये लगे कि हम वाजिब बात कर रहे हैं, अच्छी तार्किक, सार्थक, तर्कसंगत बात कर रहे हैं जबकि ऐसा कुछ नहीं होता है।

आरक्षण का विरोध का मतलब आप सामाजिक न्याय का विरोध करते हैं, सामाजिक समता का विरोध करते हैं, योग्यता का विरोध करते हैं, कुशलता का विरोध करते हैं। आरक्षण जो प्राप्त करते हैं वे अयोग्य होते हैं, कम बुद्धि के होते हैं ऐसा बिल्कुल नहीं है। किसी समाज का विकास उसके लोगों की सोच, ये देखने समझने के लिए आपको हजारों सालों से कैसा जीवन यापन कर रहे हैं, उनकी सोच व कंडिशनिंग कैसी है, ये समझना होता है।

- विवेक उमराव सामाजिक यायावर

Sunday, 7 January 2018

Wall Decoration with Posters, 2018







~ हिमनगरी मुनस्यारी में मेरा छोटा सा आशियाना ~

                       मुनस्यारी में मेरा ये छोटा सा एक कमरा है। हजार रूपया किराया है इस कमरे का। मैं जब यहाँ आया तो मैंने बाल्टी, साबुन की डिबिया आदि दैनिक जरूरत के कुछ कुछ सामान खरीदे, लेकिन एक चीज खरीदने की मुझे कभी जरूरत महसूस नहीं हुई और वो है ताला चाबी। मेरा कमरा ऐसे ही रहता, कभी-कभी तो सिटकनी भी नहीं लगाता और दिनभर बाहर रहता जबकि मेरे कमरे में मेरा लैपटाप कैमरा कुछ पैसे आदि सामान रहता लेकिन सब कुछ जस का तस। कुछ बच्चों का मेरे कमरे में आना-जाना लगा रहता, मेरी अनुपस्थिति में वे मेरा कैमरा लैपटाप इस्तेमाल भी करते लेकिन सारी चीजें अपनी जगह पर। मैं वापस लौटता तो कई बार पाता कि मेरे कैमरे में जो कुछ नयी तस्वीरें हैं ये आखिर किसने ली। ये कोई आश्चर्य की बात नहीं है, ये यहाँ सामान्य है। यहाँ लोगों में विश्वास है, आगे कब तक रहेगा नहीं मालूम।
अब ठीक ऐसा ही आपको भारत के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों और मैदानी इलाकों में भी सुदूर गांवों में देखने को मिल जाएगा, खैर ये सब संस्कृति तो अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। निश्चय ही आने वाले सालों में ये चीजें अब शायद ही देखने को मिले।
अब दूसरी ओर हमारे शहरों में देखिए, हम सुविधाओं से लैस हैं फिर भी कितना अविश्वास है, यहां तक कि सालों तक पड़ोस में कौन रहता है हम ये भी नहीं जान पाते। हम सुरक्षा के नाम पर कुत्ते पालते हैं, कंटीले तार लगाते हैं, मोटी-मोटी चैन और बड़े-बड़े ताले लगाते हैं और खुद को बड़ा विचारवान और जागरूक समझते हैं। हम विकास की बात करते हैं, जागरूकता की बात करते हैं, जीवन मूल्यों की बात करते हैं, क्वालिटी आफ लाइफ पर चर्चा करते हैं, सभ्य और सुसंस्कृत होने का दंभ भरते हैं। लेकिन इन सब चीजों के सही मायने क्या हैं ये जीवनपर्यन्त समझ नहीं पाते।



Saturday, 2 December 2017

On Teachers Issue in Chhattisgarh -

                     कल हमारे एक मामाजी(शिक्षक) का फोन आया,उन्होंने पूरी कहानी कह सुनाई कि छत्तीसगढ़ में ऐसा-ऐसा हो रहा है शिक्षाकर्मियों के साथ, अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर उतर आए हैं।
फिर पता चला कि हमें स्कूल में जिन मास्टरजी लोगों ने पढ़ाया था, चूंकि वे वर्तमान में शिक्षाकर्मी हैं तो वे भी इस आंदोलन का हिस्सा हैं।

                     तो आज मैं आपको अपने एक टीचर के बारे में बताता हूं। वे हमें हिन्दी पढ़ाते थे, ऐसा पढ़ाते थे कि बस एक बार कोई सुने तो याद हो जाए। मतलब छत्तीसगढ़ में अगर हिन्दी के शीर्ष के पांच शिक्षकों की अगर बात की जाए तो निस्संदेह हमारे उस टीचर का नाम उसमें जरूर आएगा।
ये वही हिन्दी पढ़ाने वाले शिक्षक हैं --
- जिन्हें आज भी बाइक चलानी नहीं आती, दहेज में एक 100cc की गाड़ी मिली थी वो पिछले दस साल से पड़ी हुई है। सर ने कभी बाइक सीखने की ओर ध्यान ही नहीं दिया।
- सर को साइकल पसंद है वे आज भी साइकल से ही स्कूल जाते हैं. कहीं शादी समारोह में भी जैसे पंद्रह बीस किलोमीटर जाना है, अपने साइकल में ही निकल लेते हैं।
- आज वे जहाँ पर शिक्षाकर्मी के रूप में कार्यरत हैं, उनके घर से स्कूल सौ किलोमीटर दूर है पर वे आज के समय में भी रोज सुबह अपनी साइकल से निकलते हैं। समय को ध्यान में रखते हुए एक तय दूरी साइकल में ही तय करते हैं फिर बस ले लेते हैं या फिर साइकल वहीं छोड़कर किसी बाइक वाले से लिफ्ट ले लेते हैं।
- इतने संपन्न तो हैं कि चाहते तो शहर में घर बना लेते, पर आज भी गांव में ही रहते हैं। खेती-बाड़ी भी संभालते हैं।

 ~ इसके बाद याद आए मुझे अपने संस्कृत के एक टीचर। इस बार मैं दीवाली में घर गया था, मैं बाइक से जा रहा था वे साइकल में सामने से आ रहे थे।पता चला कि वे आज भी साइकल से ही स्कूल जाते हैं।
 ~  फिर याद आए गणित के एक टीचर, वे शहर में रहते हैं। वे 100cc की गाड़ी में आना-जाना करते हैं।
 ~ फिर याद आए केमेस्ट्री के टीचर, उन्हें भी गाड़ी से डर लगता था वे आज भी हीरोपुक टाइप का कुछ चलाते हैं।


और ये टीचर्स आज शिक्षाकर्मी हैं जो अपनी मांगों को लेकर आंदोलन पर हैं। ये सारे टीचर्स लगभग पैंतीस चालीस की उम्र के आसपास के होंगे, पर यकीन मानिए आज भी उनमें से एक के पास भी कार, बंगला या कोई बड़ी संपत्ति नहीं है। असल में इन चीजों को उन्होंने कभी अपनी जरूरत समझी भी नहीं। बच्चों को पढ़ाना ही उनका एकमात्र धर्म रहा और वे आज भी विकट परिस्थितियों में अपना गुरुधर्म निभा रहे हैं।

ऐसे टीचर्स सिर्फ मेरे जीवन में नहीं है आप सबके जीवन में भी है। हमारे शिखर तक पहुंचने में, सफलता नामक जूस पीने में, सुविधाएँ हासिल करने में इनका योगदान रहेगा ही रहेगा। दुनिया की कोई ताकत इस सच को नहीं झुठला सकती।

सच को और करीब से देखने के प्रयास में फिर मुझे याद आया अपना पीएससी क्वालीफाइड एक दोस्त, लगे हाथ मैंने उससे पूछा कि यार ये क्या मसला है? उसने कहा- ये शिक्षाकर्मी लोग पागल हो गये हैं, भारी जन आंदोलन, स्टेशन में ड्यूटी लगा हुआ है इन्हीं को रोकने के लिए। और भी उसने कुछ-कुछ शिक्षाकर्मियों के बारे में कहा जो मुझे असंगत लगा इसलिए यहां नहीं लिख रहा। क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि हमारा कोई हक नहीं कि हम अपने गुरूओं के फैसले पर टीका करने लग जाएं। सही-गलत क्या है मुझे नहीं पता पर फिर भी मैं इतना जानता हूं कि जो शिक्षा मुझे अपने टीचर्स से मिली है वो इस बात की इजाजत नहीं देता कि हम उन पर कोई टिप्पणी करें, असल में हम अभी उस लायक हैं ही नहीं। हमें अपने गुरूओं जैसा इंसान बन जाने के लिए अभी बहुत कुछ सीखना है।

"चूंकि दशकों से जिनका जीवन ही एक आदर्श रहा हो उन्हें खुद को साबित करने के लिए अच्छी साहित्यिक भाषा, सुंदर तर्क, सफलता और संघर्ष से जुड़ी कहानियां आदि का सहारा नहीं लेना पड़ता, इन सब की जरूरत रीढ़शून्य कोचिंगछाप मास्टर लोगों को होती है।"


चलते-चलते...
इन शिक्षकों को न तो मैं मौन समर्थन दे पा रहा हूं, न ही उनके फैसले के विरुद्ध कुछ सोच पा रहा हूं। बस उनकी पीड़ा को खुली आंखों से समझने का प्रयास कर रहा हूं। और ये समझने का प्रयास ही इनकी सबसे बड़ी आवश्यकता है और ये आवश्यकता बिना एक चीज के अधूरी ही रहेगी और उस अधूरेपन का नाम है "सम्मान"। और ये सम्मान हमारे टीचर्स को किसी भी हाल में मिलना ही चाहिए।