Saturday, 25 April 2026

American Protest No Kings 3.0 and Psycholgy of Dissent in India

अमेरिका के लोगों ने 28 मार्च को No Kings 3.0 थीम पर 80 लाख की संख्या में सड़कों में उतर कर ट्रम्प के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन किया है वह कई मायने में ऐतिहासिक है, पहला तो यही कि अमेरिका के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में किसी चुने हुए प्रतिनिधि के ख़िलाफ़ इतने लोग सड़कों पर उतरे हैं, आधिकारिक रूप से यह अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े आंदोलनों में से एक बन गया है। दूसरा यह कि विरोध का स्तर ( जिसमें सभी 50 राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए गए और 3,300 से अधिक शहरों तथा कस्बों में फैले हुए थे ) ऐसा कि ट्रम्प को अमेरिका के लोग कुछ समझते ही नहीं, एक दिन के ही आंदोलन ने इतना ज़्यादा अप्रासंगिक बना दिया है उसे।

अमेरिका के सारे बड़े शहरों में लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर आए, इसमें हम भारतीयों के लिए एक बड़ी चीज़ ध्यान देने योग्य यह है कि हम भारतीयों ने पिछले दस सालों में वर्तमान सरकार से क्षुब्ध होकर जितने मीम पोस्टर बनाये होंगे उससे कहीं ज़्यादा अमेरिका वालों ने एक दिन में ही एक प्रोटेस्ट में कर दिखाया। कोई ट्रम्प के नाम का गद्दा फुलाकर लाया जिसके पिछाड़े में सब जूते मार रहे, कोई उसे निवृत्त होते दिखा रहा और स्वयं के मल को मुख से ग्रहण करते दिखा रहा, कोई ट्रम्प की मूर्ति बनाकर गुदाद्वार से आग निकाल रहा, कोई उसकी मूर्ति बनाकर लाठी डंडे बरसा रहा तो किसी ने ट्रम्प को नेतन्याहू का कुत्ता बना दिया, तो किसी ने उसके नाम का फूल हुआ गुब्बारा बनाकर आसमान पर छोड़ दिया तो किसी ने डंप ट्रम्प थीम पर इसको सैनिटाइज ही कर दिया है। किसी ने ट्रम्प और नेतन्याहू का संसर्ग करा दिया है तो किसी ने ट्रम्प और एपस्टीन का। बड़े कठोर सख्त और वीभत्स लहजे में जवाब दिया गया है लेकिन सब कुछ बड़े लोकतांत्रिक तरीके से चटकारे लेते हुए लोग कर गए हैं। और पंचलाइन तो ऐसे-ऐसे बन पड़े हैं कि उसे पढ़कर ट्रम्प तनाव में आत्महत्या ना कर ले। इतने अलग-अलग लेवल की क्रिएटिविटी के साथ शायद ही दुनिया के इतिहास में किसी को इतने बड़े स्तर पर घसीटा गया हो। मानो ट्रम्प की सारी साख एक दिन में ही मिट्टी में मिला दी हो।

यह इस आंदोलन ( No Kings 3.0 ) का तीसरा चरण था, इसके पहले जून 2025 में लगभग 50 लाख लोगों ने और अक्टूबर 2025 में 70 लाख लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया था। No Kings 3.0 पारंपरिक विरोध प्रदर्शनों की तरह जो एक मुद्दे पर केंद्रित होते हैं वैसा नहीं था। बल्कि इस आंदोलन ने अमरीकियों के सभी जरूरी मुद्दों को एक पटल पर लाया, सबको एकमत किया। यह लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक अधिकारों और सत्ता के दुरुपयोग का व्यापक सामूहिक प्रतिरोध था। और इस आंदोलन के पीछे की यह क्रिएटिविटी सिर्फ गुस्से की नहीं, बल्कि गहरी लोकतांत्रिक समझ की देन है। अमेरिकी नागरिक जानते हैं कि चुना हुआ प्रतिनिधि राजा नहीं होता है। वह जनता का सेवक होता है। और जब वह तानाशाही की राह पर चले, तो जनता उसे “NO Kings” कहकर जवाब देती है।

अब सवाल यह है—भारत में ऐसा आंदोलन संभव क्यों नहीं? पिछले दस बारह सालों में वर्तमान सरकार के खिलाफ जितने मीम्स, पोस्टर्स और व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स बने, उससे कहीं ज्यादा क्रिएटिविटी अमेरिकियों ने एक दिन में ही दिखा दी। लेकिन भारत में सड़कों पर लाखों-करोड़ों की भीड़ इकट्ठा करने, सभी मुद्दों को एक पटल पर लाने और इतनी व्यापक, इतनी रचनात्मक असहमति जताने की कल्पना भी मुश्किल है।

कारण गहरे हैं। भारत आज भी अनेकानेक जाने-अनजाने कारणों से गहरे सामंती समाज में जकड़ा हुआ है। लोकतंत्र यहां परिवार से लेकर देश तक कहीं पनप नहीं सका। हमारी मानसिकता अथॉरिटी बाउंड है। बचपन से हम माता-पिता, गुरु, नेता, सेलेब्रिटी और ईश्वर को सुपर हीरो मानकर बड़े होते हैं। किशोरावस्था में जब माता-पिता की पोल खुलती है कि वे भी आम इंसान हैं, तब मन तुरंत नए “बाप” की तलाश में जुट जाता है—नेता, गुरु, प्रेमी/प्रेमिका या ईश्वर।

इससे डर, भय और असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। हम शक्तिविहीन और विकल्पविहीन हो जाते हैं। मौका मिलते ही स्वार्थ साधने की कोशिश करते हैं। कहते कुछ और, करते कुछ और। बातचीत में गौतम बुद्ध भी हमारे ज्ञान के आगे शरमा जाएंगे, लेकिन जब एक्शन की बारी आती है तो कुंठित व्यक्तित्व सामने आ जाता है। ऐसे समाज से निकलकर नेता बनता है तो उससे लोकतंत्र और ईमानदारी की उम्मीद करना व्यर्थ है। वह वही दोगलापन दोहराएगा जो उसने सीखा है।

मुद्दों की समझ न होना, असहमति को देशद्रोह मानना और मैं ऊपर बाकी सब नीचे वाली मानसिकता, ये सब मिलकर भारत में बड़े पैमाने पर सामूहिक प्रतिरोध को नामुमकिन सा बना देते हैं। हम मीम बनाकर गुस्सा निकाल लेते हैं, लेकिन सड़क पर उतरकर सत्ता से सवाल पूछने की हिम्मत कम ही दिखाते हैं।

अमेरिका का यह आंदोलन हमें आईना दिखाता है। वह बताता है कि लोकतंत्र सिर्फ वोट देने तक सीमित नहीं है बल्कि यह निरंतर सतर्कता, एकजुटता और रचनात्मक तरीके से असहमति जताने का नाम है। भारत अगर वाकई लोकतांत्रिक समाज बनना चाहता है तो हमें अपनी सामंती जड़ों को काटना होगा। मन को अथॉरिटी से मुक्त करना होगा। डर को हटाकर सवाल पूछने की संस्कृति विकसित करनी होगी।

No Kings 3.0 सिर्फ ट्रंप के खिलाफ नहीं था। यह किसी भी व्यक्ति के राजा बनने की हर कोशिश के खिलाफ था। भारत में लेकिन यह सपने जैसा ही लगता है। बदलाव की शुरुआत तब होगी जब हम अपनी असहमति को फ़ोन स्क्रीन से निकालकर सड़क तक ले आएंगे-बिना डरे, बिना स्वार्थ के, सिर्फ और सिर्फ लोकतंत्र के लिए।

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