Monday, 15 June 2026

Chhattisgarh what I have seen



सन् 2000 में उत्तराखंड और झारखंड के साथ इस राज्य की नींव रखी गई थी। इन तीनों राज्यों के बनने में सबसे बड़ा कारक प्रशासनिक सहूलियत थी। राज्य बनने का कोई बहुत बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक आधार इन राज्यों के पास कभी नहीं रहा, जिस तरह से तेलंगाना के पास था। अलग भाषा, अलग संस्कृति, अलग भाषाई लिपि-व्याकरण इन सब की मजबूती नहीं रही। ये तत्व किसी भी राज्य के लंबे अस्तित्व के लिए, उसकी आंचलिकता बनाये रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं। यह सब आधार ना होने के बावजूद इन राज्यों को राज्य बनने का सौभाग्य पहले मिल गया। उत्तराखंड को तो एक तरह से सवर्ण राज्य बना दिया गया, कालांतर में उसके दुष्प्रभाव खुलकर देखने को भी मिले, जमकर पलायन हुआ। झारखंड और छत्तीसगढ़ की कहानी लगभग एक ही रही। दोनों जगह प्रशासनिक कारण ही रहे, इनकी अपनी कोई ख़ास ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहचान नहीं रही, भोजन खानपान और स्थानीय भाषा का ऐसा कोई राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला नैसर्गिक तत्व नहीं रहा, संस्कृति के नाम पर जो भी बनाया गया उसके पीछे जबरन थोपने वाली संस्कृति हावी रही।


यहाँ से हम सिर्फ़ अकेले छत्तीसगढ़ राज्य को देखें तो छत्तीसगढ़ी को राजभाषा कहा गया जबकि भाषा की न्यूनतम शर्त भी यह पूरी नहीं करती जो कि व्याकरण है। मूल रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा कम और बोली अधिक रहा, जिसे उधार में लिपि की आवश्यकता होती है, देवनागरी लिपि में ही संधि समास और पूरा व्याकरण बना दिया गया, देवनागरी में ही लिखा जाने लगा, इसी में ही भाषा की खानापूर्ति कर दी गई। संस्कृति के नाम पर राष्ट्रीय मंच पर दिखाने के लिए स्टेपनी की तरह आदिवासी संस्कृति को आगे कर दिया गया। यहीं से असल समस्या शुरू होती है। ऐसे राज्यों के साथ हमेशा पहचान का संकट होता है। ऐसे ही राज्यों को दूसरे राज्यों में पूछा जाता है कि यह राज्य कहाँ पड़ता है, झारखंड में है क्या? यह सवाल बहुत लाजिमी है। ऐसे राज्यों का कोई मुख्य भोजन नहीं होता है, अगर स्थानीय भोजन होता भी है तो वह उस तरह से जगह नहीं बना पाता, ऐसा तभी होता है जब आपके पास भाषाई और सांस्कृतिक आधार नहीं होता है। फिर आपके राज्य में इंदौर के पोहे बेचे जाते हैं, अमृतसर के छोले कुलछे बेचे जाते हैं, हरियाणा की जलेबी बेची जाती है, यूपी का चाट और दाल पकवान बेचा जाता है, साउथ इंडियन खाने की चैन तैयार होती है, लेकिन स्थानीय जैसा कुछ होता ही नहीं है। हाँ, दिखावे के लिए एक दो सरकारी खोमचे बना दिए जाते हैं जहाँ स्थानीय भोजन की खेप मिल जाती है। 


जब आपके पास अपना ख़ुद का भाषाई और सांस्कृतिक आधार नहीं होता है, ऐसी स्थिति में ब्रिटिश संविधान विशेषज्ञ आइवर जेनिंग्स की भाषा में उधार लिए गए दस्तावेजों का संग्रह की तर्ज में सब कुछ उधार में ही चलता है। चाहे वह भाषाई आदान-प्रदान हो, या भोजन के तरीके हों। सब कुछ उधार वाला वाला ही हावी होता है। ऐसे राज्यों में ही स्थानीय भोजन को लेकर दिखावे से जड़ित आयोजन किए जाते हैं। उत्तराखंड में मड़ुवे की रोटी का शासकीय प्रचार होता है, इसी तरह झारखंड में धुसका और छत्तीसगढ़ में बोरे बासी अंगकार रोटी को महिमामंडित करने का यत्न किया जाता है। कभी आपने नहीं सुना होगा कि ओडिशा की सरकार आलू दम दही वड़ा का प्रचार कर रही हो, बंगाल सरकार छेने की मिठाई का प्रचार कर रही हो, आंध्र वाले इडली डोसा के लिए महोत्सव कर रहे हों, उनकी अपनी सार्वभौमिक स्वतः स्फूर्त पहचान है, उनको उस पहचान को बताने के लिए किसी विशेष आयोजन की आवश्यकता ही नहीं है, क्यूंकि यह उनकी सभ्यता का हिस्सा है, यह सभ्यता तैयार होती है अपनी ख़ुद की पुरातन लिपि से, संस्कृति से, इतिहास से। यह सभ्यता ऐसे नवीन राज्यों के पास नहीं होती है। 


ख़ुद की अपनी संस्कृति सभ्यता ना होने के अनेक दुष्प्रभाव बतौर राज्य साफ़ दिखाई पड़ता है। ऐसे राज्यों में प्रशासनिक ढाँचा आम लोगों पर बहुत हावी होता है, विरोध का स्तर न्यून होता है, सरकार पर नैतिक दबाव ना के बराबर होता है। ऐसी स्थिति में प्रशासन और आम जन के बीच एक दूरी सहज ही दिखती है। जैसे उदाहरण के लिए आम जन अपनी छत्तीसगढ़ बोली में बात करेगा लेकिन यहाँ केंद्र से यहाँ बैठाया गया अफ़सर हिंदी में ही बात करेगा तो एक आत्मिक जुड़ाव होता ही नहीं है। ऐसे राज्यों में बाहरी हिंदी पट्टी के राज्यों का स्वतः ही कब्जा हो जाता है। प्रशासनिक आधार पर देखें तो छत्तीसगढ़ में तो अवसर देख कर बड़ी संख्या में पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और बिहार के लोगों ने अपना सिक्का पहले ही जमा लिया। व्यापार वाले एंगल में भी ये हावी रहे। अखिल भारतीय सेवाओं में तो यहाँ हिंदी पट्टी का खासकर हरियाणा दिल्ली यूपी का कैडर हावी रहा है। उसमें भी बनिया और सवर्ण लोगों से पूरे प्रशासनिक ढांचे को भर दिया गया। उन्हीं की बल्ले-बल्ले है। धीरे से कुछ स्थानीय और दक्षिण के लोग आ रहे हैं लेकिन उनकी उपस्थिति/वजूद और उनका हस्तक्षेप ना के बराबर है। 


इन सब सांस्कृतिक सामाजिक पहलुओं को किनारे कर बतौर राज्य छत्तीसगढ़ को फ़ौरी तौर पर देखने से यही लगता है कि अपने पड़ोस के राज्यों ( ओडिशा, झारखंड ) से बेहतर ही कर रहा है। लेकिन गहराई में चीज़ों को देखता हूँ तो इस राज्य का मूल निवासी होने के नाते निराशा से मन दुखी हो जाता है। 


छत्तीसगढ़ के पास प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संपदा है। सरिया का दाम पूरे देश के लिए यहाँ से नियंत्रित होता है। स्टील सीमेंट का भी बहुत सा खेल यहाँ से होता है। बस्तर से खनिज निकालने के लिए रावघाट परियोजना के तहत रेल पहुँचा दी गई है। गोंडवानालैंड का हिस्सा होने की वजह से कोयले की नेमत बरसी है तो बिजली का सरप्लस प्रोडक्शन है ही। अकूत पैसा है। वास्तव में देखा जाए तो झारखंड, ओडिशा और आंध्रप्रदेश से भी कहीं ज़्यादा पैसा यहाँ है लेकिन फिर भी यहाँ एक अजीब तरह की लूट का कल्चर हावी है। शॉपिंग मॉल को छोड़ दें तो कहीं भी आपको तमीज की क्वालिटी नहीं दिखेगी, शॉपिंग मॉल की क्वालिटी के पीछे यहाँ की अपनी बाजारू मानसिकता कारण है, यहाँ के स्थानीय लोगों की दिखावे और बाजारू मानसिकता झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों से कहीं अधिक है। इसलिए यहाँ इन राज्यों से कहीं पहले सबसे पहले बड़े-बड़े मॉल खुले और वे चले भी। शहरों का अपना इंफ्रास्ट्रक्चर बहुत ख़राब, टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर तो एकदम ही निचले स्तर का। हर जगह लूट कल्चर हावी। आम लोगों को न्यूनतम स्तर की सुविधा भी देने की नहीं सोचते हैं। आप राज्य की राजधानी को ही देख लीजिए और बाक़ी राज्यों की राजधानी से तुलना करिए। इसमें भुवनेश्वर को तो छोड़ ही दीजिए, रांची की सड़कें रायपुर से कहीं बेहतर और साफ़ सुथरी है। सड़कों को साफ़ करने के लिए सफ़ाई मशीन वाली ट्रक बराबर चलती है। अपशिष्ट प्रबंधन भी काफ़ी बेहतर है। अलग से एक लेवल महसूस होता है। 


यहाँ प्रशासनिक ढाँचा हमेशा से सरकारों पर हावी ही रहा। लंबे समय तक भाजपा का शासन रहा तो यह लाज़मी है, भाजपा जहाँ रहती है वहाँ अधिकारी तंत्र और लूट तंत्र तुलनात्मक रूप से अधिक हावी हो जाता है। इन सब कारणों की वजह से कभी भी लोककल्याण वाली चीज़ों को ध्यान में नहीं रखा गया। टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी वाली चीज़ को तो इन्होंने ऐसा बर्बाद किया कि पूछिए ही मत। आप कहीं भी जाइए, आप बस्तर जाइए, आपको तमीज के होटल नहीं मिलेंगे, मिलेंगे तो जबरन महंगे, खान-पान का वैसा व्यवस्थित कल्चर नहीं मिलेगा, जैसा होना चाहिए। पर्यटन स्थलों में भी जितनी सुविधा होनी चाहिए, वैसी नहीं है, दूसरे राज्यों से तुलना करने पर लगता ही नहीं है कि गुणवत्ता वाला काम हुआ है, पैसा लगा है। साफ़ समझ आ जाता है कि एकदम चलताऊ और निचले स्तर का काम हुआ है। यह लूट की संस्कृति तभी पल्लवित होती है जब आपके पास एक सांस्कृतिक आधार नहीं होता है, आपके पास भाषाई मजबूती नहीं होती है, और जब यह नहीं होता है तो लोग एकजुट नहीं हो पाते हैं, सामूहिकता में चीज़ों को नहीं देख पाते हैं और प्रशासन को भी कभी संगठित विरोध नहीं देखना पड़ता है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य असल में पड़ोसी सांस्कृतिक सामाजिक ऐतिहासिक आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों के लिए एक तरह से लूट मशीन की तरह होते हैं, ऐसे राज्यों को केवल अपनी जरूरत के मुताबिक़ लूटा जाता है, और दिखावे के लिए उनके लिए थोड़ी बहुत सुविधाएं तैयार कर दी जाती है, और फिर ऐसी स्थिति में अधिसंख्य आबादी के पास बाजारू और दिखावेबाज़ बनने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। 

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