Sunday, 17 May 2026

हाशिये पर खड़ी भारत की विदेश नीति 

कुछ दिन पहले रशियन डिप्लोमेट Sergey Lavrov ने दिल्ली में एक प्रेस कांफ्रेंस किया। उसी बीच शायद किसी पत्रकार का बार-बार फ़ोन बज रहा था, उसने इस दौरान सीधे उसे बाहर जाने कह दिया, उसके बाद उसने फ़ोन जमा करने के लिए भी कहा और धमकी भी दे दी कि अगर आप जमा नहीं करेंगे तो मेरे सुरक्षा कर्मियों को बंदूक निकालने के लिए विवश होना पड़ेगा। इस प्रतिक्रिया पर भी पत्रकारों ने खी खी करके अपनी इति श्री किया जो कि बेहद शर्मनाक था, अनप्रोफेशनल था। 


पहली नज़र में ऊपरी तौर पर इस घटनाक्रम को देखें तो बतौर भारतीय यह हमारे लिए कितने शर्म की बात है कि एक प्रेस कांफ्रेंस का जो अनुशासन होता है उसका भी हम पालन नहीं कर पाते हैं और अंततः कुछ इस तरह हमें अपने ही देश में कोई बाहरी विदेश मंत्री आकर जलील कर देता है और हमारा स्तर बता देता है। 


दूसरा एक एंगल ये कि एक बाहरी डिप्लोमेट हमारी ही धरती पर ऐसा बोलने की हिम्मत कैसे कर जाता है। क्यूंकि हमने हमारी छवि इतनी ख़राब बनायी हुई है हमने अपनी हरकतों से। इसलिए बहुत हल्के में लेते हैं लोग हमें। लेकिन यह सब अचानक ऐसा कैसे हो गया। इसके लिए भी हमें थोड़ा इतिहास में जाना होगा और गहराई से चीज़ों को समझना होगा। 


देश आज़ाद होने के बाद से तब के नीति नियंताओं ने इस विविधता से भरे देश के हर एक पहलू को गंभीरता से समझा और उसी विविधता को अपनी नीतियों में परिलक्षित किया। चाहे वो हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था हो या हमारी विदेश नीति। चाहे किसी भी विचार को मानने वाले लोग हों सबके लिए जगह बनी। इस बीच पिछले दशक भर में ऐसा क्या बदल गया कि हमारी वैश्विक छवि इतनी ख़राब हो गई। इसका कारण समझने के लिए हमारी विदेश नीति को समझना होगा। हमारे नीति निर्माताओं ने Soft Power Diplomacy को चुना, यानी हम पहले प्रतिक्रिया देने वाले या हमला करने वाले देश नहीं हैं लेकिन कोई अगर हमें छेड़ेगा तो हम किसी की नहीं सुनेंगे। यानी soft वाला तत्व भी रहा लेकिन power भी रहा। इन्हीं तत्वों की बदौलत पूर्वी देश से भी हमारे मैत्री संबंध रहे और पश्चिमी देशों से भी हमने मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किया और यह सब लगातार वर्षों की मेहनत, मेल जोल व्यापार आदि से तैयार हुई पूंजी रही। हमने अमेरिका से भी व्यापार किया तो वहीं रूस और चीन से भी व्यापार जारी रहा, कभी हम अफ्रीकन देशों में निवेश करते रहे तो कभी अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों में कॉलेज हमारे निवेश से बना। इसराइल के साथ भी ज़रूरत तक रिश्ता बना कर रखा और फिलिस्तीन के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध रहा। ईरान इराक़ युद्ध हुआ, फिर भी दोनों से हमारे मज़बूत कूटनीतिक संबंध बने रहे जिसकी बानगी आज भी देखने मिलती है। हमने कभी किसी देश की एकतरफ़ा पक्षधरता नहीं की, जी हुजूरी नहीं की, जहाँ कहीं ग़लत देखा, हमने उस ग़लत को ग़लत कहकर अपना कूटनीतिक पक्ष खुलकर रखा। ऐसी ही कुछ मैत्रीपूर्ण कूटनीतिक संबंधों से ये Soft Power Diplomacy तैयार हुई। इसी सब से एक भारत देश की छवि बनी। जिसने भारतीयों को दुनिया के हर कोने में चाहे वो व्यापार पढ़ाई रोजगार कुछ भी हो, हर जगह स्थापित होने के लिए जगह बना दी, भारतीयों के लिए दुनिया के हर देश ने अपने दरवाजे खोल दिए, तब जाकर इतना बड़ा हमारा diaspora बना। आज दुनिया का सबसे बड़ा diaspora हमारा ही है। 


लेकिन अभी हाल के वर्षों में क्या हुआ है। जो हमारी विदेश नीति जिसे Soft Power कहा जाता, उसमें अब Power शब्द की महत्ता शायद ख़त्म हो गई है। अब उस विदेश नीति में बस Soft वाला तत्व रह गया है। और ऐसा तब होता है जब सत्ता देश हित को दरकिनार कर अपने व्यक्तिगत व्यावसायिक या अन्य हितों की प्रतिपूर्ति के लिए बड़े स्तर पर समझौते करती है। ऐसे समझौतों के होने से सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि आपको फिर एकतरफा पक्षधर बनना होता है, आपको किसी एक देश की चरण वंदना करनी होती है। जैसा अभी हाल फिलहाल में हमारे देश ने किया है। पूरी दुनिया में हमारी इज्जत उतारी जा रही है। चाहे वो ऑपरेशन सिंदूर में ट्रम्प द्वारा नीचा दिखाना हो या हमारे द्वारा इजराइल को पितृदेश कहना हो। ऐसे और बहुत से उदाहरण हैं। इन सब के भयानक दुष्परिणाम बतौर भारतीय हमें देखने को मिल रहे हैं। और शायद आगे भी देखने को मिलेंगे। 


चलिए बतौर देश, लगभग हर देश की अपनी कुछ खामियाँ चुनौतियाँ होती हैं, हमारी भी हैं। लेकिन कोई हमें इतना कैसे कमजोर समझ लेता है कि हमारे ही देश में आकर हमें धमकी दे जाता है और हमें नीचा दिखा जाता है। वे यही सोचते हैं कि इनका तो कोई स्टैंड ही नहीं है, किसी भी दूसरे देश के आगे लोट जाते हैं, इनकी क्या औक़ात कि हम इनसे तमीज से बात करें। बस यही नज़रिया तैयार होता है और फिर ऐसे वाक़ये सामने आते हैं। बस तुलना करिए कि क्या भारत की जगह किसी दूसरे देश में, उदाहरण के लिए चाइना अमेरिका या वियतनाम ईरान; यहाँ किसी ने ऐसा किया होता तो क्या ये रूस के नेता उन्हें ऐसा लताड़ पाते, उनकी हिम्मत ही नहीं पड़ती भले सामने वाले की गलती क्यों ना हो, प्यार से मना करते, ऐसे धमकी ना देते। 


ये सारा कुछ हमारी ख़राब वैश्विक छवि की वजह से हुआ है, और इस छवि को बुनने में इन नामुरादों ने पिछले दशक भर में कोई कसर नहीं छोड़ी है। बहुत दुख होता है देश का ऐसा हाल होता देखकर। आजकल एशियाई देशों जिनकों हमने एक तरफ़ से छोटे भाई की तरह रखा, थाईलैंड इंडोनेशिया मलेशिया आदि वहाँ भी हमें दुत्कार दिया जाता है। कोई इंडियन टूरिस्ट वहाँ जाता है, उसके साथ वहाँ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, क्यूंकि एक कमजोर और ख़राब छवि जो बन चुकी है। बहुत से जगह से NRI की ऐसी वीडियो आती रहती जिसमें वे कुछ गलती करते तो उन्हें सजा दी जाती और यह कहकर एक नैरेटिव बनाया जाता कि ये भारतीय तो ऐसे ही हैं, इनका इलाज करना जरूरी है। ठीक है हमारी अपनी कुछ सामाजिक सांस्कृतिक गड़बड़ियां हैं, लेकिन पूरे देश की आबादी को ऐसा कहना कहीं से भी उचित नहीं है। इससे कई बार हमारी कोई गलती नहीं भी होगी तब भी हमसे रूखा व्यवहार हर जगह किया जाता है। और यह पूरी दुनिया में हो रहा है, एक ख़राब गंदे कमजोर देश का नैरेटिव हमारे लिए मजबूती से बनता जा रहा है जो कि बहुत दुखद है चिंताजनक है दुर्भाग्यपूर्ण है। 

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