Friday, 30 January 2026

सोशल मीडिया के दुष्प्रभाव

जिन चीज़ों को हम पढ़ के महसूस करते थे, आज उसे महसूस करने के लिए वीडियो देखना जरूरी हो गया है, ऐसे में वीडियो हमें उस जगह को थोड़ा भी महसूस करा नहीं पाता है। इसके उलट वो हमें अलग ही तरह से बेचैन करता है। एक बर्फबारी होने पर पहाड़ों में पहुँचने वाली हज़ारों की भीड़, या एक वीडियो वायरल होने पर किसी स्थान विशेष में खाने पहुँचने वाले लोग हों। दोनों वहाँ लाइन में लगे होंगे, असुविधा में होंगे लेकिन एक अघोषित ट्रेंड के शिकार बने हैं तो फँसे रहते हैं, इंसानी समाज के व्यवहार में ऐसा बदलाव कभी इतिहास में नहीं दिखा है।

आप किसी स्थान विशेष के लिए कैसे भी वीडियो बना लीजिए, उसमें लिखने वाली चीज़ों जैसी स्थिरता नहीं आयेगी। वीडियो का अपना एक अलग stimulation होता है। उसके अपने अलग खतरे हैं, अगर वीडियो फोटो के मामले में एक संजीदगी एक सादगी नहीं बरती गई तो उसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। इसका उदाहरण इसी से समझें कि हिंसा रूपी चीज़ों को वीडियो फोटो में ब्लर किया जाता रहा है, क्यों किया जाता है ताकि आपकी सोच वहाँ उतने तक स्थिर ना हो जाए, आपका दिमाग़ी विचलन वहाँ उसे देखकर स्थिर ना हो। आप किसी की फोटो वीडियो लेकर उसका पूरा जीवन तबाह करने की क्षमता रखते हैं। लंबे समय तक तंग करते हैं और उसमें सोशल मीडिया का तड़का लग गया तो सोने पे सुहागा। मानो आपके हाथ मशीन गन ही लग गया हो। अमेरिकी लेखिका susan ने कैमरे को बन्दूक से भी ज़्यादा ख़तरनाक ऐसे ही नहीं कहा था। पिछले कुछ एक साल में सोशल मीडिया माध्यमों से ये पागलपन बहुत ज़्यादा बढ़ा है। हर किसी को वीडियो रील देखकर केदारनाथ मनाली जाना है, क्यों जाना है उन्हें ख़ुद नहीं मालूम। ठीक कुछ ऐसा ही किसी रेस्तरां या किसी शॉपिंग वाली जगह के साथ भी है। हम किसके माध्यम से संचालित हो रहे हैं हमें ख़ुद इसका भान नहीं। पिछले कुछ वर्षों में जो लोगों के भीतर ये बेचैनी आई है, ये शोर आया है, इसके पीछे बहुत बड़ा योगदान सोशल मीडिया का है। सरकार या पार्टी ख़ुद इससे अछूती नहीं है। ख़ुद सोशल मीडिया ऐप बनाने वालों के कंट्रोल में भी यह चीज़ नहीं है कि वह लोगों के भीतर पैदा हुए इस पागलपन को कैसे रोके, वे ख़ुद अपने बच्चों को और ख़ुद को इन माध्यमों से दूर रखते हैं। आज अधिकतर scholar, scrollers में तब्दील हो चुके हैं। एक बड़ी आबादी ज़ोम्बी बन चुकी है, जिधर चाहें उधर आप उसे आसानी से ट्रिगर कर सकते हैं, बस एक ट्रेंड बनने की देर है।

कोई इस नशे से अछूता नहीं है। हम सब इसकी गिरफ्त में है। कुछ लोग देख पा रहे हैं, कुछ नहीं देख पा रहे हैं। आपको अब लोगों से मिलकर शांति महसूस नहीं होगी, अधिकतर लोग आपको बेचैन ही दिखेंगे मिलेंगे। इसलिए मैंने तो अब लोगों से मिलना बात करना बहुत कम कर दिया है। ये पिछले दो तीन सालों में मुझे लगता है सबके दोस्त कम हुए होंगे, सबके अपने कम हुए होंगे, एक आत्मीय बातचीत के लिए जो कुछ लोग हमारे जीवन में होते थे, वे लोग कम हुए हैं। सोशल मीडिया ने सबके जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया है, अस्थिर कर दिया है, सबके जीवन में भयानक शोर और उत्तेजना भर दी है। इसमें आप देखेंगे कि जानवरों पर भी इसका असर हो रहा है, उनको देखकर भी अब आपको शांति नहीं मिलती है, आसपास में ही गाय कुत्ते बिल्ली उनकी आँखें देखिएगा, अब वे शक भरी निगाहों से देखते हैं, उनकी भी भाव भंगिमा बदल चुकी है, अजीब तरह से व्यवहार करने लगते हैं। उन तक भी हमारा ये नया रेडिएशन कहीं ना कहीं पहुँच ही रहा है।

आपको अपना ख़ुद का लिटमस टेस्ट करना हो, अपने भीतर के अघोषित शोर और उत्तेजना की सूक्ष्म जाँच करनी हो तो उन लोगों से मिलिए, उन लोगों से बात करिए जो सोशल मीडिया ऐप्स का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करते। आपको उनकी बातचीत और अपनी बातचीत के तौर तरीकों में जमीन आसमान का फर्क दिखेगा, उनके चेहरे के भाव और आपके चेहरे के भाव भी अलग लगेंगे। पूरी जीवनशैली में ही बड़ा अंतर दिखेगा। तब शायद समझ आए कि हम सबके जीवन को, जीवन के एक एक अंग को एक ऐसी अदृश्य शक्ति बार-बार उत्तेजित कर रही है जिसे सोशल मीडिया कहते हैं।

मैं ख़ुद कहीं घूमने जाता हूँ तो उस जगह की फोटो वीडियो देखने से बचता हूँ। पिछले 7-8 साल से ये काम बंद कर दिया है। जब 3G और डोंगल का जमाना था, अनलिमिटेड इंटरनेट नहीं था तब खूब देखा है, और तब के बन रहे वीडियो फोटो उतने बेचैन भी नहीं करते थे। उतनी फोटो वीडियो मिलती भी नहीं था, सीमित और ठोस जानकारियां ही थी। शायद अनलिमिटेड नाम की चीज़ नहीं थी इसलिए तब सोशल मीडिया माध्यमों की पवित्रता भी कुछ हद तक बनी हुई थी, अब तो ये मार्केटिंग टूल बन चुके हैं।

अभी कुछ दिन पहले यहाँ दोस्तों के साथ गया था, यहाँ भी इसकी पहले कभी फोटो वीडियो नहीं देखी, जाकर बड़ा सुकून मिला। कुछ समय पहले vizag भी गया। भारत का कोना-कोना नाप के आने के बाद ये पास की जगह अब तक नहीं गया था। उसकी पवित्रता मैंने बचाकर रखी थी, कभी अलग से फोटो वीडियो देखने की तड़प ही नहीं हुई, जाने के ठीक पहले भी नहीं हुई। और जब गया तो संपूर्णता में उस जगह को आँखों से महसूस किया। घूमना भी एक लक्ज़री है एक आर्ट है, सबको आती नहीं हमारी जाती नहीं।

Thursday, 29 January 2026

दुख है -

बुद्ध आजीवन दुखों का अनुसंधान करते रहे। दुख को मृत्यु से भी बड़ा बताया और कहा - “दुख है, दुख का कारण है, कारण का निवारण है और निवारण आष्टांगिक मार्ग अपनाकर किया जा सकता है। आष्टांगिक मार्ग के बारे में आप विस्तार से पढ़ सकते हैं। बुद्ध के कहे का मोटा-मोटा सार यही रहा कि शांति से अपना जीवन जिया जाए, और किसी दूसरे को दुख ना दिया जाए, उसके दुख का भागी ना बना जाए।

अभी कल एक भतीजा सड़क दुर्घटना की चपेट में आया, उसके हाथ के ऊपर गाड़ी चल गई, अंततः हाथ पूरा काटना पड़ गया। वैसे तो हर घटना के पीछे कर्म-फल की अवधारणा को नहीं मानता हूँ। लेकिन अधिकतर मामलों में बुद्ध सही ही साबित होते हैं। जैसा कि बुद्ध ने कहा कि दुख है तो दुख का कारण भी होगा। भतीजे साहब का व्यवहार ऐसा कि परिवार के अलावा गाँव के लोग भी दुखी कि इतने व्यवहार कुशल लड़का जो पहली बार शहर कॉलेज की पढ़ाई के लिए गया था उसके साथ ऐसा कैसे हो गया। अब उक्त लड़के के पिताजी और दादाजी पर आते हैं, दोनों उच्च कोटि के धूर्त, लंपट और हिंसक किस्म के व्यक्ति। भतीजे के पिता का स्तर ऐसे समझें कि जवानी के दिनों में उसने अपनी माँ पर हाथ भी उठाया था। बाक़ी दोनों बाप बेटे का चरित्र ऐसा कि अनगिनत लोगों के दुख के भागी बने। आज जैसे ही भतीजे की दुर्घटना की खबर मिली, उसके बाप दादा का सारा कुछ पुराना फ़िल्म की तरह सामने चलने लगा। महीने भर पहले ही उनसे परेशान एक उन्हीं के परिचित ने कहा कि अगले ने जीवन तबाह कर दिया, कुछ उपाय बताओ, मैंने कहा - अपनी तरफ से कोई हिंसा मत करना, अगर ऐसा कुछ सोच भी रहे तो मेरे से बात करने की आवश्यकता नहीं है। आज उसी व्यक्ति ने दुःखी मन से दुर्घटना की सूचना दी है। इस बात की भरपूर गारंटी है कि उस बाप बेटे के चरित्र में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला है, बच्चे का हाथ कट गया तो क्या हुआ, अपना हिंसक चरित्र क्यों छोड़ा जाए। क्यूंकि इससे पहले भी ऐसे मामले देखे जहाँ जवान बच्चों की मृत्यु के बाद भी पिता को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा, उसके जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, यहाँ तो बस हाथ कटा है।

इंसान को चाहिए कि ख़राब से ख़राब स्थिति में भी इतनी सी बात का हमेशा ध्यान रखे कि वह किसी सज्जन या कमज़ोर पीड़ित वंचित या किसी भी व्यक्ति के दुख का भागी ना बने। क्यूंकि जब कुदरत न्याय करता है तो फिर आपको किसी को दोष देने लायक़ भी नहीं छोड़ता है।

Monday, 26 January 2026

एक चुप सौ सुख

क़ुदरत ने स्त्रियों को एक शक्ति ऐसी दी है जिसके सामने दुनिया का लगभग हर पुरुष पराजित हो जाता है। असल में अच्छे-अच्छे क़ाबिल धैर्यवान अहिंसक लड़कों का मनोबल और धैर्य तोड़ देने की ताक़त स्त्रियों में होती है। कुदरत से उन्हें यह गुण तो मिला हुआ है। “जहाँ ना पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि” की तर्ज पर “जिसे ना तोड़ पाए कोई मज़दूर मिस्त्री उसे तोड़ देती है स्त्री” प्रासंगिक जान पड़ता है। 


अभी हाल फ़िलहाल में छत्तीसगढ़ के एक स्थानीय फ़िल्मकार मोहित साहू पर एक महिला ने मारपीट का आरोप लगाया और लहूलुहान उसी हालत में थाने गई। मोहित का तो मीडिया ट्रायल मास लेवल पर हो गया कि जिस लड़की के साथ रिश्ते में है उसी लड़की पर ऐसे हाथ उठाया है। प्रथम दृष्ट्या किसी को भी यही लगेगा कि गलती लड़के की है। लेकिन कई बार हिंसा करने वाले के पक्ष को नहीं देखा जाता था। जैसा कि मैंने पहले कहा क़ुदरत ने स्त्रियों को वो शक्ति दी है जिस शक्ति के बल पर वह अच्छे से अच्छे अहिंसक शांतचित्त पुरुष को भी हिंसक बना सकती है। पूरी संभावना है कि इस वाले मामले में भी यही हुआ, आज पता चल रहा है कि मोहित ने तनाव में आकर फिनाइल पी लिया और अस्पताल में भर्ती है। इस घटना पर पत्नी से बाहर देर तक घूमने के एवज में डाँट खाए एक दोस्त ने कहा - “पुरुषों के केवल पैंट में चैन होता है, जीवन मैं चैन नहीं होता है।”


कई ऐसे लड़कों को जानता हूँ जिन्होंने जीवन में किसी को रे बे तक नहीं किया होगा, तमाम तरह के व्यसनों से दूर रहे, परस्त्रीगमन छोड़िए किसी को आँख उठाकर देखा तक नहीं होगा। ऐसे लोग भी एक समय के बाद रिश्तों की समस्याएं बताते हुए कहते मिले कि कई बार ऐसा होता है तनाव इतना हावी होता है कि मन करता है एक थप्पड़ रसीद कर दिया जाए। कई ऐसे लड़के होते हैं तो अपने जीवन का 3-4 दशक बिना किसी प्रकार की हिंसा किए निकाल चुके होते हैं लेकिन एक स्त्री जब हिंसक मानसिकता लिए उसके जीवन में आती है तो उसका जीवन नरक कर देती है। और यह बात स्त्री और पुरुष दोनों पर लागू है। दोनों को एक दूसरे की निजता का बखूबी सम्मान करना चाहिए। एक दूसरे के जीवन में बहुत ज़्यादा नहीं घुसना चाहिए। चाहे वह प्रेमी-प्रेमिका वाला रिश्ता हो या शादी का, अगर उसमें आपको अपने साँस लेने लायक स्पेस नहीं मिल रहा है, जबरन बहुत बेफ़िजुल की छोटी-छोटी बातों पर असुरक्षा का भाव पैदा हो रहा है और उस भय से कब्ज़ा कर लेने वाली प्रवृति पैदा हो रही है इसका अर्थ यह है कि गाड़ी सही नहीं चल रही है। इसीलिए देखने में यह आता है कि अधिकांश रिश्ते कुछ समय बाद दो भिखारियों की छीनाझपटी में बदल जाते हैं। क्यूंकि जो दोनो के पास नहीं है वही एक दूसरे से मांग रहे होते हैं। 


हमारे यहाँ रिश्तों में इतने भयानक स्तर पर असुरक्षा है कि जब-जब इंसान शादी के बंधन में बंधता है या अपने रिश्ते के बारे में लोगों को बताता है तो उसके दोस्त कम होने लगते हैं। इसमें भी कारण वही है कि वे बतौर दोस्त भी वे लोग जो बतौर दोस्त अब तक साथ थे वे भी कुछ हद तक आपको अपनी अथॉरिटी मानने लगते हैं। रिश्तों में अधिकतर यह देखने में आता है कि हमारा अपना जीवन उबाऊ नीरस होता है लेकिन उसे हम अपने पार्टनर के सहारे मनोरंजक बनाने की कोशिश करते हैं और फिर इसके भयावह दुष्परिणाम आते हैं, उन्हीं पर फिर टीवी सीरियल पर भी बनते हैं और जब यही भड़ास हिंसक रूप ले ले तो क्राइम पेट्रोल सावधान इंडिया के एपिसोड बनते हैं। रिश्तों में असुरक्षा संबंधी इन समस्याओं से कोई भी भारतीय अछूता नहीं है लेकिन इन समस्याओं को स्वीकार करते हुए हमेशा असुरक्षा कम करने का प्रयास होना चाहिए। 


चलते चलते : पंजाबी में एक कहावत है - “ एक चुप सौ सुख “, गृहस्थ जीवन जी रहे तमाम स्त्री-पुरुषों को सादर समर्पित।


Friday, 16 January 2026

6 साल बाद पब्लिक ट्रांसपोर्ट बस का सफ़र 

बाइकर बन जाना अकारण नहीं था। बस ट्रेन या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का कोई भी माध्यम हो, इनमें बहुत सफ़र किया है, लेकिन अब नहीं हो पाता, अब पब्लिक प्लेटफार्म में जाने से बचता हूँ। इंसानों से जितना कम संपर्क हो, वही ठीक लगता है, पता नहीं एक अजीब सा विरक्ति मोह भंग होने लगा है। इस बीच बस में एक दिन जाना हुआ। हम 6 फुटिये लोगों के लिए इस लोकल पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बस में जितना स्पेस है, इंडिगो की फ्लाइट में भी इतना ही स्पेस रहता है। मुझे इस वाले भारत को अब बिल्कुल देखने का मन नहीं करता है। ट्रेन से लेकर इन बसों में बहुत देख लिया है, इतनी कहानियाँ घूमती है की अब बेचैन करता है यह सब देखना।


बस में बड़ी संख्या में कॉलेज जाती लड़कियां दिखी। विडंबना कि लगभग हर लड़की के चेहरे पर स्कार्फ था। स्कार्फ जो एक साथ दो-दो काम कर रहा था, एक पर्यावरणीय प्रदूषण और दूसरा पुरुषों के आंखों के द्वारा होने वाला अनवरत प्रदूषण; इन दोनों से उनको एक स्कार्फ सुरक्षित कर रहा था। सेमेस्टर के परीक्षाओं की चर्चा करते जा रहे थे, जबकि उन्हें यह नहीं पता कि ये एक ऐसी अंधी गली है जहाँ एक गुणवत्ता वाला जीवन पा लेने की प्रायिकता जुए के खेल से भी ख़राब है। 


ऐसा प्रतीत होता है कि इन्हें अपने वर्तमान भविष्य दोनों का नहीं पता। साथ ही बड़ी संख्या में कुपोषित कृषकाय से चेहरे लिए मजदूरी करने वाले भी जा रहे थे, हताश निराश परेशान से चेहरे जिन्हें अपना असल मूल्य भी नहीं पता। पता नहीं आख़िरी बार कब उन्मुक्त होकर मुस्कुराए होंगे। लगातार मोम की तरह अपना जीवन जलाकर घिस रहे हैं और थोड़े-थोड़े मृत होते जा रहे हैं। खाने में क्या खा रहे हैं नहीं मालूम। ना शारीरिक सौष्ठव, शरीर में प्रोटीन-विटामिन की भरपूर कमी जो साफ़ दिखती है, साथ ही चेहरे पर अनवरत शोषण की रेखाएं। यह भारत बड़ा बेचैन करता है।


इस बेचैनी में भी गिद्ध सरीखे लोग इनका और खून निचोड़ लेने के लिए इस दलदल में उतरते हैं, इस भारत को और निचोड़ कर खोखला करते हैं। मुझे इससे दूर रहने में ही अपनी भलाई लगती है, क्यूंकि मैं इस भारत को और खोखला करने में अपना योगदान नहीं दे पाता हूँ तो बेहतर है कि जब तक परिस्थितियाँ अनुकूल ना हों इसकी छत्रछाया से ही दूर रहा जाए और अपने स्तर पर प्रयास करते रहा जाए। 


साँस लेने वाले दो ही तरह के लोग आज बचे हैं। उसमें एक या तो यह सब पीड़ा देखकर झेलकर खामोश मृतप्राय हो चुका है या फिर जो मजबूत टांगे लेकर ज़िंदा होने का दंभ पाल रहा है वह हरामखोरी की हद तक इंसानियत खो चुका है। व्यवस्था ने ज़िंदा रहने लायक और कोई विकल्प इनके पास छोड़ा भी नहीं है। 


एक बड़ी आबादी को हर चीज़ में अच्छा और सकारात्मक देखने की ऐसी बीमारी लग चुकी होती है कि वे एक बड़ी आबादी का दुख आजीवन नहीं देख पाते हैं। वे भूल जाते हैं कि हम सभी एक समाज के रूप में एक इकाई हैं। तालाब में रहने वाले एक जीवधारी के शरीर में भी अगर संक्रमण है, तो उस संक्रमण का विस्तार तालाब में रहने वाले सभी जीवों तक होता है।


इस सीमित जगह में बैठे-बैठे टांगों का दर्द तो मैनेज हो जाता है, लेकिन सीने में दर्द रह जाता है। मुझे अब इस भारत को देखना ही नहीं है, और दुआ करता हूँ कि मेरी तरह किसी और को भी इस भारत को देखना ना पड़े।