Sunday, 27 January 2019

~ व्यास घाटी से आया मेरा दोस्त ~


                    वो वाइल्ड लाइफ से जुड़ा हुआ छात्र है, मैं सिर्फ उसे फेसबुक के माध्यम से जानता हूं, वैसे तो वो देहरादून का है लेकिन उसका मूल गांव मुनस्यारी में ही है। एक बार वह व्यास घाटी में रिसर्च के सिलसिले में आता है, महीनों घाटियों में रिसर्च के बाद बरम गाँव अपने रिश्तेदारों के यहाँ पहुंचता है, फिर मुझे बरम से मुनस्यारी पहुंचने के‌ लिए गाड़ी के बारे में पूछता है, मुझ जैसे को जो खुद पहाड़ का नहीं है, उसे एक देहरादून का लड़का जो मूल रूप से मुनस्यारी का ही है, उसे बरम से मुनस्यारी का रास्ता तक नहीं पता होता। बात यहाँ खत्म नहीं होती।
वह बताता है कि मुनस्यारी के सुरींग गांव में उसके रिश्तेदार का घर है, रिश्तेदारों का घर होने के बावजूद, मुझसे उतनी जान पहचान न होने के बावजूद (सिवाय फेसबुक), शाम को भीगते हुए आता है और मेरे पास आकर रूकता है,
कहता है कि सुबह से बस एक पैकेट बिस्कुट खाया है,
जबकि उसके पास एक चालीस हजार का कैमरा है, बैकपैक है,
मैं उसे नास्ता कराता हूं, खाना खिलाता हूं,
फिर कमरे में बैठकर बातें होती हैं,
वो व्यास घाटी की एक से बढ़कर एक दंत कथाएँ सुनाता है,
दुःख और संताप से जुड़ी तमाम तरह की बातें करता है,
फिर मैं उससे घर परिवार के बारे में पूछता हूं,
तो अगला एक भी बात का ढंग से जवाब नहीं देता,
आंख में आंख डालकर बात भी नहीं करता,
तब जाकर मैं उस लड़के के लिए राय बनाने लगता हूं कि ये लड़का झोल है, जटिलता से भरे ज्ञान का चोगा पहना हुआ है।
मेरी कुछ मिनट की अनुपस्थिति में वो मेरे से बिना पूछे कमरे में रखा पूरा बुरांश का जूस गटकता है, असल में बुरांश का एक बोतल रूह आफजा की तरह होता है, यानि एक बोतल से एक बाल्टी जूस तैयार हो जाता है। क्या पता उस बंदे ने कैसे उस गाढ़े जूस को ही गटक लिया होगा।
फिर आखिरकार मुझे विवश होकर उसे अलविदा करना पड़ता है, और वो‌ हीरो अंत में जाते जाते मुझे भेंट स्वरूप कुछ एक हिमालय की जड़ी दे जाता है जो वह व्यास घाटी से लेकर आया था, इसे भेंट न कहकर ऐसा कह सकते हैं कि वह उस जड़ी बूटी को मेरे कमरे में छोड़कर जाता है, ताकि फिर से आ सके। और सचमुच वो एक‌ दिन तेज बारिश में फिर से टपक जाता है यह कहकर कि वो जड़ी आधा दे दो, एक दोस्त को देना है। मैं उस जड़ी को उसे पूरा लौटा देता हूं और फिर वह मुझसे दुबारा कभी नहीं मिलता, कभी नहीं, पता है क्यों?,, क्योंकि मैं हमेशा की तरह ऐसे नटवर लोगों के‌ लिए ब्लाॅक का आॅप्शन चुन लेता हूं।
ट्रेवलिंग करने का ये एक फायदा है, पिचहत्तर टाइप के बागड़बिल्ले मिलते रहते हैं।









फोटो - ये तस्वीरें व्यास घाटी की है, जो मैंने उससे स्मृति चिन्ह के रूप में ले ली थी। 



Monday, 14 January 2019

Khaliya Top, Munsyari, Uttarakhand


Khaliya top is an easy 10km trek from the balati band area, Munsiyari. It offers a magnificent view in summers of great Himalayan ranges. The five famous peaks namely Panchachuli, Hardeol, Rajrambha, Nandakot and Nandadevi are clearly visible from here and this makes it an amazing experience for even a first time trekker. The Khaliya top is at an astonishing altitude of 3500 metres above sea level.

It's one of those places you need to experience to understand what power nature holds. Experience in simple words would mean, staying on the top for atleast a day or two. It is a trek that most people chose to start in the morning and return by the evening, which in itself is very rewarding none the less, but to truly feel the place and the giants that surround you, the mighty peaks, you must stay. Two ways to do it would be either stay at the guest house alpine resort which is at the half way mark to the top or better you can keep a tent and stay at the top meadow area of khaliya bugyal. Well Overall It's a spectacular experience and the trek isn't very technical.














































Sunday, 13 January 2019

Book Review "The interpretation of dreams by Sigmund Frued"


"The interpretation of dreams by Sigmund Frued"

जैसा कि नाम‌ से ही स्पष्ट है कि किताब में सपनों की व्याख्या के बारे में है। सिग्मंड फ्राइड को मनोविज्ञान का पितामह भी कहा जाता है, इन्होंने मनोविज्ञान के क्षेत्र में मानो एक तरह से क्रांति ला दी थी। इनके द्वारा लिखे गये इस गूढ़ किताब का‌ ऐसे कुछ चंद लाइनों में सारांश लिखना तो बिल्कुल भी संभव नहीं है। इसलिए मूल किताब जो इंग्लिश में है उसे पढ़कर मैंने पाठकों के सुभीते के लिए उसके कुछ महत्वपूर्ण अंश का हिन्दी अनुवाद कर दिया है। आशा है आपको पसंद आएगा।


सपनों के मनोविज्ञान पर विभिन्न दार्शनिकों के मत निम्नानुसार हैं :-


मुझे अपने सपनों के बारे में बताइए, मैं आपके बारे में सब बता दूंगा।
- Plaff

किस्मत वाले होते हैं वे लोग जो सिर्फ सपने देखते हैं लेकिन‌ उसे पूरा कोई और करता है।
- Plato

सपनों की सहज और सरल व्याख्या पूर्णत: संभव नहीं है।
- Hegel

हमारे देखे गये दस सपनों में से नौ सपनें फिजूल‌ के होते हैं।
- Binz

सपनों को‌ लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे समझने के लिए कोई नियमावली‌ नहीं बनाई जा सकती।
- Radestock

सपनों की बातें करना नासमझी के अलावा और कुछ भी नहीं। ये एक तरह की मूर्खता ही है।
- fechner

सपनों का कोई एक निश्चित उद्देश्य नहीं होता है।
- Volkelt

तमाम टूटे बिखरे हुए तथ्य जो हमें सपनों के माध्यम से प्राप्त होते हैं, यही सपनों के वास्तविक मूल तत्व हैं।
- Lemoine

सपने देखना यानि एक ऐसी मनोवैज्ञानिक घटना जो वास्तविक तथ्यों पर आधारित न होकर रूपकों पर आधारित होती हैं।
- Scholz

जिसका जीवनक्रम जितना पवित्र होता है, उसके देखे गये सपनों में उतनी ही‌ पवित्रता होती है, और इसके ठीक उलट जिसका जीवन जितना अपवित्र होता है, उसे वैसे ही अपवित्रता से युक्त सपने आते हैं।
- Hindebrandt

सपनों की‌ तमाम खामियां एवं जटिलताएं ही इसके असली गुण हैं। जैसे कि अगर किसी व्यक्ति की एक सरल सी परिभाषा को दो अलग अलग लोगों को बताया जाए तो वे अपने तरीके से उसे परिभाषित करने लगते हैं, या यूं कहें कि अपने तरीके से सरलीकरण करते हैं। सपनों के साथ भी ऐसा ही है।
- Griesinger

कोई भी ऐसा सपना नहीं जिसमें दो चार बेतुकी बातें एवं मूर्खतापूर्ण तथ्य शामिल न हो।
- Maury

जो हम देखते हैं, सुनते हैं, चाहते हैं, करते हैं ; हमारा सपना इसी से ईर्द गिर्द ही होता है।
- Jessen

एक व्यक्ति सपने में जितने बेहतर तरीके से विदेशी भाषा बोल सकता है, उतना बेहतर वह असल जीवन में कभी नहीं बोल सकता।
- Vaschide

सपनों की सटीक व्याख्या इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ऐसा ना करने से "Gulliver Travel" जैसी फिजूल की फिल्में बन जाती हैं और लोग ऐसे फिल्मों से प्राप्त तथ्यों को वास्तविकता की कसौटी में बांधने लगते हैं या यूं कह सकते हैं कि सच मानने लगते हैं इससे सपनों के मनोविज्ञान को भारी क्षति नुकसान पहुंचती है।
- Pilcz

सपनों के अवलोकन की समस्याएं भी अनूठी हैं, इसलिए इसका सबसे बेहतर उपाय यह है कि सीधे काॅपी पेन पकड़कर हम लिखते चलें। यही सपनों की सटीक व्याख्या का सबसे बढ़िया उपाय है।
- Chabeneix

सपनों से प्राप्त विचार प्राय: बहिर्मुखी होते हैं।
- Scherner

विद्वता, भावुकता, रोचकता, क्रियात्मकता, नाटकीयता और रचनात्मकता से परिपूर्ण एक ऐसी घटना जिसका ना कोई आदि ना तो कोई अंत है। असल में सपनों के दौरान हमारा मस्तिष्क आत्मा का गुलाम बन जाता है।
- Dugas



किताब के कुछ महत्वपूर्ण अंश --

वास्तविक जीवन (जागृत अवस्था) में हम देखकर, बोलकर यानि भाषा और चित्रों के सहारे ही कल्पना करते हैं,सोचते हैं। लेकिन सपनों के दौरान तो उन चित्रों और भाषाओं की असल अवधारणा हमारे सामने आ जाती है और फिर हमें स्वर्ग जैसा महसूस होने लगता है लेकिन सपने से उठकर जागृत अवस्था में आने‌ के बाद इस बीज अवधारणा को पूरा संजोना हमारे लिए संभव ही नहीं हो पाता, हमें कुछ झलक जरूर मिल जाती है।

सपनों के मामले में एक अनुसंधान यह भी है कि हमारे देखे गये सपनों की सर्वाधिक पैदावार वहीं से तैयार होती है जब हम शांतचित्त अवस्था या जागृत अवस्था में कुछ सोचते विचारते हैं।


सुबह उठते ही सपनों को हम इसलिए भूल जाते हैं क्योंकि इनमें लड़ने की पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती। हम जैसे ही उठते हैं, आंख खोलते हैं, दिमाग दौड़ाने लगते हैं और हम सपनों को भूलने लगते हैं। ये ठीक वैसा ही है जैसे सूरज उगने के साथ धीरे-धीरे अंधेरा छंटने लगता है।


हमें किसी से नया नया प्यार हुआ है और हम सब कुछ भूलकर पूरी तरह से इस विषय की गिरफ्त में हैं, इस समयावधि में चाहकर भी हमें पैराशूट में उड़ने वाले या अन्य किसी विषय से जुड़े सपने नहीं आ सकते। यानि जो भी सपने आएंगे वो कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रेम से ही संबंधित होंगे।


जब कभी हमारे मन में दबी हुई कामुकता, वासना, विद्रोह, द्वेष आदि विषयों का किसी कारणवश उद्दीपन होता है, ऐसी स्थिति में ये विषय किसी अन्य पूर्ववर्ती विषय के साथ मिलकर एक खिचड़ी बना लेते हैं और फिर इसी वजह से हमें कभी कभार जटिल सपने आ जाते हैं।


जब हमारे मन में एक ही विषय चलता है या किसी गहरे शोक की वजह से हम उसके अलावा कुछ और नहीं सोचते या फिर जब हमारा मस्तिष्क अपनी पूरी ऊर्जा से किसी एक ही चीज पर द्वंद करता रहता है, ऐसी स्थिति में सोते समय जो "सपने" हमें आते हैं उसमें अधिकतर या तो दूसरे ग्रह जैसा कुछ होता है या फिर कोई ऐसा घटना होती है जिससे हमें अपने वर्तमान की कुछ झलक मिल जाती है और हम खुश हो जाते हैं।


जब हम‌ किसी बीमारी से ग्रसित होते हैं, ऐसी स्थिति में जब हमारे स्वाद की और सूंघने की शक्ति कम‌ होने लगती है तो इस समय हमारा मनोविज्ञान दुगुनी तेजी से काम करने लगता है और फिर हमें अधिकांशत: अपने भूतकाल से जुड़े सपने आते हैं जिसे हम लगभग पूरी तरीके से भूल चुके होते हैं।


* सपनों के विपरित प्रभाव ---
सपनों के दौरान हम जो देखते हैं कई बार चीजें उसके ठीक उलट हो जाती हैं। जैसे कि अगर हमें किसी के प्रति घृणा है या लंबे समय से हम किसी को नकार रहे हैं या नजरअंदाज करते आ रहे हैं, ऐसी स्थिति में हमें उनसे जुड़ा कुछ ऐसा सपना आ जाता है, जिसमें हम उनसे ऐसे प्रेमपूर्वक बर्ताव कर रहे होते हैं जैसे कि अमुक व्यक्ति हमारा सबसे घनिष्ठ हो।

सपनों के विपरित प्रभाव को इस एक उदाहरण से और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है -
एक बार एक बूढ़ा रात को‌ अचानक उठकर जोर जोर से हंसने लगता है, पास में सो रही उसकी पत्नी डर के मारे उठ जाती है और अपने पति से कहती है कि आप ऐसे क्यों हंस रहे हैं, पति यह सुनकर और जोर जोर से हंसने लगता है, फिर वह सो जाता है।
अगली सुबह वह अपने एक मित्र को सपने के बारे में बताते हुए कहता है - कल रात मैंने एक सपना देखा, पता नहीं आज उसी वजह से बहुत ज्यादा सिरदर्द भी हो रहा है। तो कल मैंने सपने में देखा कि तुम रात को मेरे घर आए हुए हो, और मेरे घर की लाइट बंद है, तुम मुझे कहते हो कि लाइट चालू करो लेकिन मैं बहुत कोशिश करने के बाद भी चाह कर भी लाइट चालू नहीं कर पाता, फिर मैं अपनी पत्नी से लाइट चालू करने के लिए कहते हूं वो भी बहुत कोशिश करती है लेकिन लाइट चालू नहीं कर पाती और फिर मेरी पत्नी निराश होकर सो जाती है और फिर तुम मेरे घर से जाने लगते हो, यह सब कुछ मुझे इतना हास्यास्पद लगता है कि मैं जोर जोर से हंसने लगता हूं वो भी रात को उठकर, ये मुझे मेरी पत्नी ने ही बताया।

असल में उस बूढ़े का सपने के दौरान जोर जोर से हंसना और उसके बाद उसे सिरदर्द की समस्या होना इस बात का प्रमाण है कि अब उसे गहरे शोक के गर्त में जाना है, और सचमुच कुछ दिन बाद उस बूढ़े की मृत्यु हो जाती है‌। क्योंकि सामान्यतः आदमी हंसने के बाद बहुत बेहतर महसूस करता है लेकिन बूढ़े को तो अगले दिन सिरदर्द की समस्या हुई, क्योंकि वो वास्तविक में न हंसकर सपने में हंस रहा था।
उसका निरंतर हंसना जीवन रूपी एक आखिरी प्रकाश था बिल्कुल एक टूटते तारे से निकलते प्रकाश की तरह जो अब फिर दुबारा उस रूप में कभी नहीं दिखेगा। असल में हमारे सपनों को बहुत अच्छे से पता होता है कि उन्हें दुःख, संताप, मृत्यु आदि घटनाओं को कैसे एक हास्यास्पद वाकये में परिवर्तित करना है।



* सपनों में विषयांतर ---

कई बार हमें ऐसे सपने आ जाते हैं जिनका कोई वजूद नहीं होता। लेकिन ऐसा सोचना हमारी गलतफहमी होती है, असल में उन सपनों का विषयांतर हो जाता है यानि हम सपना किसी देखते किसी और चीज के बारे में है और घटता कुछ और है।

सपनों के विषयांतर को इस उदाहरण से समझा जा सकता है -

एक बार एक लड़की सपना देखती है कि उसकी दीदी का बच्चा कब्र में सो रहा है, वो‌ इस सपने से डर जाती है। लेकिन असल में ऐसा कुछ भी नहीं होता, वो बच्चा बिल्कुल स्वस्थ रहता है। असल में इस सपने का असल अर्थ यह है कि सपना देखने वाली लड़की अपने किसी पुराने प्रेमी को बस एक बार देखना चाहती है, क्योंकि अपने प्रेमी को एक बार देख लेने की उत्कंठा उसके मन में हमेशा रहती है। इसलिए यहाँ इस सपने का संबंध दुःख से न होकर उस लड़की की आखिरी इच्छा से है।


Saturday, 3 November 2018

                   मेरा एक मुंहबोला छोटा भाई है, 12वीं पास है, अभी उसकी उम्र लगभग 20 साल की होगी। 12वीं पास करने के बाद वह काम के सिलसिले में शहर आया, सन् 2015 में उसे हमने रायपुर के एक मिठाई की एक दुकान में काम दिलवाया, 6000 रूपए प्रतिमाह फिक्स हुआ, साथ ही खाना पीना वहीं दुकान में ही, कारखाने में रहने की भी सुविधा थी, लेकिन‌ ज्यादा गुलामी की जकड़न महसूस न हो पाए इसलिए मैंने लगभग दो साल तक उसे अपने साथ रखा। साथ में उसी गांव का एक और 12वीं पास लड़का था,जो आंख के अस्पताल में काम करता था, यानि हम कुल तीन लोग थे। उन लोगों ने आगे बीए प्राइवेट का फार्म भरा, लेकिन दोनों बुरी तरीके से फेल हो गए‌। फिर मैंने उन्हें सख्त हिदायत दे दी कि मेरे से पूछे बिना आगे किसी भी प्रकार की पढ़ाई मत करना। अब पढ़ाई में उनकी कोई खास रूचि थी नहीं, तो पढ़ाई करने का क्या ही औचित्य।
इस बीच मेरे घरवाले, रिश्तेदार जब कभी मुझसे मिलने आते या फोन पर बात होती तो मुझे खूब कोसते कि कैसे लोगों के साथ रहता है, ये 12वीं पास मिठाई दुकान वाले वर्कर जैसे लोगों के साथ रहेगा तो तेरा बुध्दिभ्रष्ट हो जाएगा, अच्छे लोगों के साथ रहा कर, पढ़े-लिखे लोगों के साथ रहा कर, आदि आदि। मैं चुपचाप सुन लेता। ये वही 12वीं पास लड़के थे जो आज भी मेरे माता-पिता को पूरे हक‌ से मम्मी पापा कहकर बुलाते हैं।
खैर...

चूंकि मैं अधिकतर समय बाहर उत्तराखंड या कहीं और रहता। तो मैंने वह कमरा अपने उन दोनों छोटे भाईयों के भरोसे छोड़ दिया। साल भर पहले की बात होगी, मैं उत्तराखंड से वापस लौटा, मैं क्या देखता हूं कि वह कमरा जिसे मैंने उनके भरोसे छोड़ दिया था, उसे उन लोगों ने धर्मशाला बना दिया है, सब तरफ शराब की बोतलें, गूड़ाखु की डिबिया, चूना डब्बा, गुटखे का रैपर आदि बिखरा हुआ था। असल में उन्होंने इस बीच अपने गाँव से 3-4 और लोगों को बुला लिया था, और तो और इतने बड़े सयाने कि सबको छोटा मोटा काम दिला दिया था। ये तो चलो ठीक हुआ। लेकिन वे सारे लड़के पक्के नशेड़ी थे, आगे बढ़ने की जो लगन होनी चाहिए, वो तो उनमें बिल्कुल न थी। इन सब चीजों की वजह से मेरा सब्र का‌ बांध टूट चुका था, मैंने उन सबको दो दिन का समय दिया और कहा कि जाओ अपने लिए नया कमरा ढूंढ लो, नहीं तो मैं यहाँ से तुम सब का सामान बाहर फेंक‌ दूंगा।
मैंने अपने उस एक भाई को भी खूब डांट लगाई और समझाने की कोशिश करी कि तुम लोगों के कारण मैं घरवालों से ताने सुनता हूं, और तुम यहाँ 6000 की नौकरी करके अपने ये नशेड़ी दोस्तों के नाम‌ पर समाजसेवा मचा रहे हो, पहले खुद का फ्यूचर तो देख लिया करो।
लेकिन जड़बुध्दि थे, कहां समझते, कमरा भी नहीं ढूंढा ये सोचकर कि भैया हम लोग को ऐसे थोड़ी भगा देगा।
नवतप्पा का समय था, और मेरा पारा तो पहले ही चढ़ा हुआ था, मैंने एक दिन सुबह सुबह उन सबको वहाँ से भगा दिया और कहा कि जाओ आज के बाद कभी शक्ल मत दिखाना, लाइफ में कुछ नहीं कर सकते, कभी नहीं सुधर सकते। एक दो दिन तो बड़ा खराब लगा कि गुस्से में ये मैंने क्या कर दिया, इतनी गर्मी में कहां जाएंगे, कारखाने में रहेंगे, वहां तो कूलर तक नहीं है, यहां तो इस 40 पार गर्मी में कूलर तक काम नहीं करता है। इस बीच मैं खुद कुछ दिन बिना कूलर के रहा।
और फिर उनसे मेरा कभी संपर्क नहीं हुआ।

आज इतने लंबे समय बाद उस भाई से बात हुई तो पता चलता है कि उसने उन सभी नशेड़ी साथियों से दूरी बना ली है। और इस दौरान पैसे जमा करके पांच गाय खरीद ली है, एक गाय की कीमत तकरीबन 35000 और इतना दूध हो रहा है कि प्रतिमाह 40000 रूपए से ज्यादा कमाई हो जाती है। चूंकि खुद शहर में रहकर मिठाई दुकान में फिलहाल 10000-12000 रूपए प्रतिमाह कमा रहा है, तो गांव में गायों की देखरेख के लिए दो लोगों को 7000 रूपए प्रतिमाह में काम पर रखा हुआ है, कह रहा था 7000 रूपया ज्यादा है लेकिन अभी और कुछ बड़ा सोच रहा हूं इसलिए पैसे का नहीं देख रहा हूं, और सरकार से 5 रूपए प्रति लीटर वार्षिक बोनस यानि लगभग 50000 रूपया वहाँ से भी मिल जाएगा। बता रहा था कि अभी नवंबर के आखिरी सप्ताह में लखनऊ जाकर बकरीपालन का कोई ट्रेनिंग कोर्स करेगा और फिर जनवरी 2019 में 100 बकरियाँ खरीदने वाला है। और कह रहा था कि एक घोड़ा खरीदने का बड़ा मन है। मैंने हंसते हुए पूछा कि ये क्या है बे, लोग कार बाइक खरीदने का शौक रखते हैं और तू है कि घोड़ा पालना चाहता है‌। बोलता है बहुत मन है गांव में रहकर घोड़ा पालने का, अब इस मिठाई दुकान में कब तक सढ़ेंगे भैया, आखिर में गांव में ठाठ से रहना है। और फिर कहता है कि उस दिन जो नवतप्पे में आप हमको भगाये थे, पहले कुछ महीने तो बहुत खराब लगा कि कोई इतना बेकार आदमी कैसे हो सकता है कि अपनों को ही भगा दे।

फिर कहता है कि पहले एक दो महीने तो रहने खाने में ऐसा खर्च हुआ कि बहुत उधारी हो गया, ये नौबत आ गया था कि रायपुर छोड़ के भागने वाला था, फिर धीरे धीरे पूरा मैनेजमेंट समझ आ गया, खर्चा कम होने लगा। सच में आपके साथ रहते थे तो कोई फालतू खर्च नहीं होता था, तब लगा कि आप उस दिन अगर नहीं भगाए होते तो बढ़िया आराम से मिठाई दुकान में काम करते करते सढ़ जाता, आज ये इतना सब नहीं हो पाता‌।